1 कब, कहाँ और कितनी बड़ी
इस सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता कहा जाता है, क्योंकि हड़प्पा वह स्थल था जहाँ इसे सबसे पहले पहचाना गया; इसे सिंधु घाटी सभ्यता भी कहते हैं। यह किसी राजा के नाम पर नहीं, एक स्थान के नाम पर है, और यही मुख्य बात है: यहाँ जो कुछ भी हम जानते हैं वह वस्तुओं से है, क्योंकि इसकी लिपि आज तक पढ़ी नहीं जा सकी है।
हड़प्पाई मिट्टी के बर्तन, ईंटें, मुहरें, बटखरे, मनके तथा ताँबे और काँसे की वस्तुएँ अफ़ग़ानिस्तान, बलूचिस्तान, सिंध और पाकिस्तान के पंजाब से लेकर जम्मू-कश्मीर, भारत के पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र तक पाई गई हैं। नगरीय चरण अचानक नहीं आया: यह संस्कृति लगभग 7000 ई.पू. के कृषक समुदायों से जुड़ती है और क्रमिक आंतरिक विकास से आरंभिक हड़प्पा चरण से विकसित हुई।
शेष स्थल क्षेत्रीय केंद्र, कृषि गाँव, बंदरगाह और निर्माण केंद्र हैं: यह भिन्न-भिन्न कार्यों वाली बस्तियों का एक जाल है, केवल पाँच नगर नहीं।

2 लोग क्या खाते थे और कैसे खेती करते थे
पुरा-वनस्पतिशास्त्री (archaeo-botanists) प्राचीन पौधों के अवशेष जैसे जले हुए अनाज और बीजों का अध्ययन करते हैं। पुरा-प्राणिविज्ञानी (archaeo-zoologists), जिन्हें जू-आर्कियोलॉजिस्ट भी कहते हैं, प्राचीन पशु-अस्थियों का अध्ययन करते हैं। दोनों मिलकर यह पुनर्निर्मित करते हैं कि लोग क्या खाते थे।
| प्रमाण | यह क्या दर्शाता है |
|---|---|
| गेहूँ, जौ, मसूर, चना, तिल | मुख्य अनाज और दालें। बाजरा केवल गुजरात में; चावल के प्रमाण दुर्लभ हैं। |
| गाय-बैल, भेड़, बकरी, भैंस, सूअर की अस्थियाँ | ये पशु पालतू बनाए गए थे। |
| जंगली सूअर, हिरण, घड़ियाल, मछली और पक्षियों की अस्थियाँ | जंगली जानवर, मछली और पक्षी खाए जाते थे। हड़प्पावासी स्वयं शिकार करते थे या शिकारी समुदायों से माँस प्राप्त करते थे, यह अज्ञात है। |
अनाज यह सिद्ध करता है कि खेती होती थी, यह नहीं कि वे कैसे खेती करते थे, और यही अंतर अध्याय आपको समझाना चाहता है।
| प्रश्न | प्रमाण क्या बताते हैं |
|---|---|
| क्या हल का प्रयोग होता था? | मुहरों और टेराकोटा मूर्तियों पर बैल संकेत देते हैं कि बैल हल खींचते थे; टेराकोटा हल के प्रतिरूप चोलिस्तान और बनावली (हरियाणा) से मिले हैं |
| कोई वास्तविक खेत मिला? | कालीबंगन (राजस्थान) में एक आरंभिक हड़प्पाकालीन जुता हुआ खेत, जिसमें समकोण पर दो दिशाओं में हल की रेखाएँ हैं, यानी एक साथ दो फ़सलें उगाई जाती थीं |
| फ़सल कैसे काटी जाती थी? | निश्चित नहीं: लकड़ी के हत्थों में जड़े पत्थर के फलक, या धातु के औज़ार |
| क्या सिंचाई होती थी? | संभवतः हाँ, क्योंकि अधिकतर स्थल अर्ध-शुष्क क्षेत्र में हैं। अफ़ग़ानिस्तान के शोर्तुगई में नहर के निशान मिले हैं, पर पंजाब या सिंध में नहीं, जहाँ नहरें गाद से भर गई होंगी। कुएँ प्रयोग होते थे, और धौलावीरा के जलाशय भी पानी संचित करते रहे होंगे |
मैके ने मोहनजोदड़ो की सैडल क्वर्न (चक्की-पत्थर) को दो प्रकारों में बाँटा: एक जिसमें छोटे पत्थर को आगे-पीछे घिसा जाता था, संभवतः अनाज पीसने के लिए, और दूसरा जिसमें दूसरे पत्थर से निचले पत्थर में गड्ढा बनाया जाता था, संभवतः मसालों के लिए, जिन्हें मज़दूर करी-स्टोन (curry stones) कहते थे। यहाँ सीखने वाली विधि यह है: किसी प्राचीन वस्तु की पहचान वर्तमान की समान दिखने वाली वस्तु से तुलना करके की जाती है। यह एक तुलना है, प्रमाण नहीं।
3 मोहनजोदड़ो: एक नियोजित नगर
हड़प्पा पहले खोजा गया था; मोहनजोदड़ो अधिक जाना जाता है क्योंकि वह बेहतर सुरक्षित रहा। हड़प्पा ईंट-चोरों द्वारा नष्ट कर दिया गया था, और 1875 में कनिंघम ने लिखा कि इतनी ईंटें ले जाई गई थीं कि उनसे लाहौर-मुल्तान रेलवे लाइन का लगभग 100 मील भाग बिछाया जा सका।

दुर्ग ऊँचा इसलिए है क्योंकि इसकी इमारतें कच्ची ईंट के चबूतरों पर खड़ी हैं, और यह परकोटे से घिरा है, अतः निचले नगर से अलग है, जो स्वयं भी परकोटे से घिरा था और आंशिक रूप से चबूतरों पर बना था। लगभग एक घनमीटर मिट्टी प्रति मज़दूर प्रतिदिन की दर से, अकेले नींव बनाने में लगभग चालीस लाख मानव-दिवस लगे होंगे।
4 : 2 : 1
धूप में सुखाई या पकाई गई ईंटें। दोनों में लंबाई : चौड़ाई : ऊँचाई का अनुपात 4 : 2 : 1 रहता था, जम्मू से गुजरात तक। यह इतनी दूर तक संयोग से एक समान नहीं हो सकता।

मुख्य नालियाँ चूने के गारे में जड़ी ईंटों की बनी थीं, ऊपर से ढीली ईंटों या पत्थर की पट्टियों से ढकी होती थीं जिन्हें सफ़ाई के लिए हटाया जा सकता था, और बीच-बीच में सम्प बने होते थे। रेत के ढेर आज भी उनके पास पड़े मिलते हैं, यानी सफ़ाई करने वाले हमेशा मलबा साथ नहीं ले जाते थे। नालियाँ केवल बड़े नगरों की सुविधा नहीं थीं: लोथल में घर कच्ची ईंट के थे जबकि नालियाँ पक्की ईंट की थीं।
| निचले नगर के घर की विशेषता | यह क्या दर्शाती है |
|---|---|
| कमरे एक केंद्रीय आँगन के चारों ओर | गर्म, शुष्क मौसम में खाना पकाना और बुनाई शायद यहीं होती थी |
| बाहर की ओर खुलने वाली भूतल की दीवारों में खिड़कियाँ नहीं; प्रवेश द्वार से घर के अंदर सीधे नहीं दिखता | निजता के प्रति स्पष्ट सजगता |
| ईंटों से फ़र्श किया स्नानघर, जिसका पानी दीवार से होकर सड़क तक जाता था | स्वच्छता योजना का हिस्सा थी, बाद में नहीं जोड़ी गई |
| कई घरों में सीढ़ियाँ | दूसरी मंज़िल या प्रयोग होने वाली छत |
| कुएँ, कुछ सड़क से ही प्रयोग किए जा सकते थे; मोहनजोदड़ो में लगभग 700 | घर में ही पानी, कभी-कभी राहगीरों के साथ साझा |
दुर्ग में सार्वजनिक दिखने वाली इमारतें थीं: एक अन्नागार, जिसका निचला ईंट वाला भाग बचा है जबकि ऊपरी लकड़ी का भाग नष्ट हो गया, और विशाल स्नानागार।

उत्तर की ओर एक गली पार करते ही एक छोटी इमारत थी जिसमें आठ स्नानघर थे, एक गलियारे के दोनों ओर चार-चार, सभी का पानी गलियारे की नाली में जाता था। यह संरचना अद्वितीय है और दुर्ग की अन्य असाधारण इमारतों के बीच स्थित है, इसलिए विद्वान इसे किसी विशेष धार्मिक स्नान के लिए मानते हैं।
यह मत लिखें कि हर हड़प्पाई नगर में पश्चिम में दुर्ग और पूर्व में निचला नगर होता ही था। यह सामान्य ढाँचा है, नियम नहीं। धौलावीरा और लोथल में पूरी बस्ती भीतरी परकोटों से घिरी थी, और लोथल का दुर्ग तो अलग से घिरा भी नहीं था, केवल ऊँचाई पर बना था।
4 क्या लोग समान थे? दफ़न और बहुमूल्य वस्तुएँ
अमीर-ग़रीब के कोई लिखित अभिलेख नहीं मिलते, इसलिए पुरातत्वविद दो अप्रत्यक्ष तरीके अपनाते हैं: दफ़न प्रथाएँ, और वस्तुओं को सामान्य व बहुमूल्य में बाँटना।
- शव गड्ढों में रखे जाते थे, कभी-कभी ईंटों से जड़े हुए। क्या यह अंतर सामाजिक भेद दर्शाता है, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।
- कुछ क़ब्रों में मिट्टी के बर्तन और आभूषण मिलते हैं, जो परलोक में विश्वास का संकेत हो सकते हैं।
- आभूषण स्त्री और पुरुष दोनों के साथ मिलते हैं। 1980 के दशक के मध्य में हड़प्पा के कब्रिस्तान में एक पुरुष की खोपड़ी के पास तीन शंख की चूड़ियाँ, एक जैस्पर मनका और सैकड़ों सूक्ष्म मनके मिले। कुछ शवों के साथ ताँबे के दर्पण भी दफ़नाए गए थे।
- कुल मिलाकर हड़प्पावासी शवों के साथ बहुमूल्य वस्तुएँ नहीं दफ़नाते थे, समकालीन मिस्र के विपरीत, जहाँ राजसी क़ब्रें धन-संपत्ति से भरी होती थीं।
फ़यॉन्स (faience) रेत या सिलिका के चूर्ण को रंग और गोंद के साथ मिलाकर, फिर पकाकर बनाई गई एक कृत्रिम सामग्री है। इसे बनाना कठिन था, इसलिए फ़यॉन्स की वस्तुओं को संभवतः बहुमूल्य माना जाता था।
निधि (hoard) वस्तुओं का एक समूह है जिसे सावधानी से रखा जाता है, अक्सर किसी बर्तन जैसे पात्र में। पुनः उपयोग के लिए बचाए गए आभूषण या धातु इसी तरह छिपाए जाते थे, और यदि मालिक कभी लौटकर उन्हें लेने नहीं आए, तो वे वहीं पड़े रहे जब तक किसी पुरातत्वविद ने उन्हें न खोजा।
यह विभाजन स्पष्ट नहीं है: तकली की चरखियाँ रोज़मर्रा के औज़ार हैं, फिर भी कुछ फ़यॉन्स की बनी हैं। वितरण का पैटर्न अधिक स्पष्ट है। दुर्लभ बहुमूल्य वस्तुएँ बड़ी बस्तियों में केंद्रित हैं: संभवतः इत्र की छोटी शीशियाँ रहीं फ़यॉन्स के लघु पात्र मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में मिलते हैं पर छोटे कालीबंगन में नहीं, और सोने का हर आभूषण किसी न किसी निधि से ही मिला है।
5 शिल्प, कच्चा माल और दूर का व्यापार
मोहनजोदड़ो 125 हेक्टेयर में फैला है; चन्हूदड़ो केवल 7 हेक्टेयर से कम में, और वहाँ लगभग सब कुछ शिल्प-कार्य से जुड़ा मिला है। इतना छोटा स्थल पूरी तरह निर्माण-कार्य को समर्पित होने का अर्थ है कि अर्थव्यवस्था विशेषीकृत थी।
| शिल्प | सामग्री | कहाँ |
|---|---|---|
| मनका-निर्माण | कार्नीलियन (लाल), जैस्पर, स्फटिक, क्वार्ट्ज़, सेलखड़ी; ताँबा, काँसा, सोना; शंख, फ़यॉन्स, टेराकोटा | चन्हूदड़ो, लोथल, और बड़े नगर भी |
| शंख की चूड़ियाँ, कलछी, जड़ाई का काम | तट से पूरे शंख | नागेश्वर और बालाकोट, दोनों तटीय |
| धातु-कार्य, मुहर-निर्माण, बटखरा-निर्माण | ताँबा, काँसा, सेलखड़ी, चर्ट | चन्हूदड़ो और बड़े नगरीय केंद्र |
मनके चक्रिका, बेलनाकार, गोल, पीपे के आकार और खंडित रूपों में मिलते हैं, कुछ में दो या अधिक पत्थर जोड़कर सीमेंट किए गए, कुछ पर सोने की टोपियाँ, और उन्हें उकेरकर, रंगकर या नक़्क़ाशी करके सजाया जाता था। सेलखड़ी मुलायम होती है और इसे अपने ही चूर्ण के लेप से भी ढाला जाता था, जिससे ऐसे आकार बनते थे जो कठोर पत्थरों से संभव नहीं थे; सेलखड़ी के सूक्ष्म मनके आज भी एक पहेली हैं। कार्नीलियन के लिए प्रयोगों से पता चला कि पीलापन लिए कच्चे माल को विभिन्न चरणों में तपाने से लाल रंग प्राप्त होता था।
विशेष प्रकार की छेद करने वाली छेनियाँ चन्हूदड़ो, लोथल और धौलावीरा से मिली हैं, और तैयार मनके इन छोटे केंद्रों से मोहनजोदड़ो और हड़प्पा तक जाते थे।
किसी शिल्प केंद्र को पहचानने के लिए कच्चा माल (पत्थर की गुठलियाँ, पूरे शंख, ताँबे का अयस्क), औज़ार, अधूरी वस्तुएँ, अस्वीकृत टुकड़े और बेकार सामग्री देखें। बेकार सामग्री सबसे अच्छा संकेतक है: कटे हुए शंख और पत्थर के टुकड़े वहीं छूट जाते हैं जहाँ काम हुआ था, और छोटे-छोटे टुकड़े तब भी बचे रहते हैं जब बड़े टुकड़ों का पुनः उपयोग हो जाता है। बड़े नगरों में मिली बेकार सामग्री से ही पता चलता है कि वहाँ भी शिल्प-कार्य होता था।
मिट्टी स्थानीय थी; पत्थर, लकड़ी और धातु स्थानीय नहीं थे, क्योंकि हड़प्पावासी जलोढ़ मैदान में रहते थे। सामान बैलगाड़ी से ढोया जाता था, जिसके टेराकोटा खिलौना प्रतिरूप मिले हैं, और नदी व समुद्री मार्गों से भी। सामग्री दो तरीकों से आती थी।
सामग्री के स्रोत पर ही बस जाना
- नागेश्वर और बालाकोट, शंख के लिए
- दूर अफ़ग़ानिस्तान का शोर्तुगई, लैपिस लाज़ुली, एक अत्यंत मूल्यवान नीले पत्थर, के सर्वोत्तम स्रोत के निकट
- लोथल, भरूच के कार्नीलियन, दक्षिण राजस्थान व उत्तर गुजरात की सेलखड़ी, और राजस्थान की धातु के निकट
अभियान भेजना
- राजस्थान के खेतड़ी में ताँबे के लिए, और दक्षिण भारत में सोने के लिए
- इनसे स्थानीय समुदायों से संपर्क बना, और वहाँ सेलखड़ी के सूक्ष्म मनकों जैसी हड़प्पाई वस्तुएँ मिलती हैं
- खेतड़ी में गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति भी है, जिसके गैर-हड़प्पाई मिट्टी के बर्तन हैं पर ताँबे की वस्तुओं की असाधारण प्रचुरता है। यह हड़प्पावासियों को ताँबा आपूर्ति करती रही होगी
ताँबा शायद ओमान से भी आता था: ओमानी और हड़प्पाई दोनों ताँबों में निकल पाया जाता है, और मोटी काली मिट्टी की परत चढ़ा एक बड़ा हड़प्पाई मर्तबान, जो तरल को रिसने से रोकता था, ओमान के स्थलों पर मिलता है, शायद ताँबे के बदले दिया गया। तीसरी सहस्राब्दी ई.पू. के मेसोपोटामियाई अभिलेख तीन व्यापारिक साझेदारों का नाम लेते हैं, और मेसोपोटामियाई ताँबे में भी निकल मिलता है।
| मेसोपोटामियाई नाम | संभवतः | प्रमाण |
|---|---|---|
| मगन | ओमान | अभिलेखों में कहा गया है कि ताँबा मगन से आता था, और निकल के अंश मेल खाते हैं |
| दिलमुन | बहरीन | वहाँ मिली गोल “फ़ारस की खाड़ी” मुहरों पर हड़प्पाई आकृतियाँ हैं, और दिलमुन के बटखरे हड़प्पाई मानक का अनुसरण करते थे |
| मेलुहा | हड़प्पाई क्षेत्र | सूचीबद्ध उत्पादों में कार्नीलियन, लैपिस लाज़ुली, ताँबा, सोना और विभिन्न प्रकार की लकड़ी शामिल हैं; मेलुहा को नाविकों की भूमि कहा गया है |
एक मेसोपोटामियाई मिथक मेलुहा के बारे में कहता है: “तुम्हारा पक्षी हाजा-पक्षी हो, उसकी पुकार राजमहल में सुनी जाए।” कुछ मानते हैं हाजा-पक्षी मोर था। हड़प्पाई मुहरों पर जहाज़ और नावें मिलती हैं, और एक मेसोपोटामियाई बेलनाकार मुहर पर कूबड़ वाले बैल की आकृति है जो सिंधु क्षेत्र से प्रभावित लगती है।
6 मुहरें, लिपि और बटखरे

मुहर पर आमतौर पर लेखन की एक पंक्ति होती है, संभवतः मालिक का नाम और पदवी, साथ ही एक आकृति, सामान्यतः कोई पशु, जो शायद उन लोगों के लिए अर्थ रखती थी जो पढ़ नहीं सकते थे।
- अब भी अपठित। कोई इसे पढ़ नहीं सकता।
- अभिलेख छोटे हैं; सबसे लंबे में लगभग 26 चिह्न हैं।
- वर्णमाला आधारित नहीं: इसमें 375 से 400 चिह्न हैं, एक ध्वनि के लिए एक चिह्न के हिसाब से यह बहुत अधिक है।
- दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी। कुछ मुहरों पर दाईं ओर चिह्न फैले हुए और बाईं ओर सिमटे हुए हैं, मानो उकेरने वाले ने दाईं से शुरू किया और जगह कम पड़ गई।
- मुहरों, ताँबे के औज़ारों, मर्तबानों के किनारों, ताँबे व टेराकोटा की पट्टिकाओं, आभूषणों, हड्डी की छड़ों और धौलावीरा के एक साइनबोर्ड पर मिलती है। यह नाशवान सामग्री पर भी लिखी गई होगी, इसलिए साक्षरता कितनी व्यापक थी, यह नहीं कहा जा सकता।
विनिमय चर्ट नामक पत्थर के बटखरों से नियंत्रित होता था, जो सामान्यतः घनाकार होते थे और उन पर कोई निशान नहीं होता था। निचली इकाइयाँ द्विआधारी (1, 2, 4, 8, 16, 32) थीं, संभवतः आभूषण और मनके तौलने के लिए; ऊँची इकाइयाँ दशमलव प्रणाली (160, 200, 320, 640) का पालन करती थीं। धातु के तराज़ू के पलड़े भी मिले हैं, अर्थात बटखरों का प्रयोग तराज़ू के साथ होता था।
7 सत्ता किसके हाथ थी, और सभ्यता कैसे समाप्त हुई
स्पष्ट है कि कोई निर्णय लेता था और उन्हें लागू करवाता था। प्रमाण कोई सिंहासन नहीं बल्कि एक पैटर्न है: मिट्टी के बर्तन, मुहरें, बटखरे और ईंटें असाधारण रूप से एक समान हैं, ईंटों का अनुपात जम्मू से गुजरात तक बना रहता है यद्यपि ईंटें एक ही स्थान पर नहीं बनतीं, बस्तियाँ सोच-समझकर बसाई गई थीं, और ईंटों, दीवारों व चबूतरों के लिए श्रम जुटाया गया था।
फिर भी पुरातत्व किसी शासक का प्रमाण नहीं देता। मोहनजोदड़ो की एक बड़ी इमारत को राजमहल नाम दिया गया, पर उसमें कुछ भी असाधारण नहीं मिला, और एक पत्थर की मूर्ति को केवल पुरोहित-राजा इसलिए कहा जाता है क्योंकि आरंभिक पुरातत्वविद मेसोपोटामिया के इतिहास से परिचित थे और वहाँ समानांतर खोज रहे थे। हड़प्पाई धार्मिक क्रियाओं को हम बहुत कम समझते हैं, और यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि जो कोई भी इन्हें संपन्न करता था, उसके पास राजनीतिक सत्ता थी या नहीं।
कोई शासक नहीं
कोई शासक नहीं था और सबकी समान स्थिति थी।
कई शासक
एक नहीं बल्कि कई शासक थे: मोहनजोदड़ो का अपना, हड़प्पा का अपना।
एक ही राज्य
एक ही राज्य था, क्योंकि समान पुरावशेष, नियोजित बस्तियाँ, मानक ईंट अनुपात, और कच्चे माल के निकट बसी बस्तियाँ इसकी ओर संकेत करती हैं।
NCERT यह भी बताती है कि हड़प्पावासी शायद किसी प्रकार की लोकतांत्रिक व्यवस्था का पालन करते थे, और इनमें से कई संरचनाएँ व्यावहारिक, उपयोगितावादी उद्देश्यों के लिए बनी प्रतीत होती हैं।
लगभग 1800 ई.पू. तक चोलिस्तान जैसे क्षेत्रों के अधिकांश परिपक्व हड़प्पा स्थल छोड़ दिए गए, जबकि जनसंख्या गुजरात, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फैल गई। जहाँ 1900 ई.पू. के बाद भी बस्ती बनी रही, वहाँ भौतिक संस्कृति पूरी तरह बदल गई।
क्या ग़ायब हो गया
- बटखरे, मुहरें और विशिष्ट मनके
- लिपि, दूर का व्यापार, शिल्प-विशेषीकरण
- बड़ी सार्वजनिक संरचनाएँ
- घर बनाने की अच्छी तकनीकें
उसकी जगह क्या आया
- बहुत कम सामग्रियों से बहुत कम वस्तुएँ बनना
- मानक प्रणाली की जगह स्थानीय बटखरे
- ग्रामीण जीवनशैली, उत्तर हड़प्पा या उत्तरवर्ती संस्कृतियाँ
- वीरान पड़े नगर, और एक हज़ार वर्ष से अधिक का इंतज़ार जब तक नए नगर, एक अलग क्षेत्र में, नहीं बने
बताए गए कारणों में जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, अत्यधिक बाढ़, नदियों का मार्ग बदलना या सूखना, और भूमि का अत्यधिक उपयोग शामिल हैं। हर कारण किसी न किसी बस्ती को समझा सकता है; कोई भी पूरे पतन को नहीं समझाता। प्रमाण इसके बजाय संकेत देते हैं कि कोई सशक्त एकीकृत तत्व, संभवतः हड़प्पाई राज्य, समाप्त हो गया: मुहरें, लिपि, विशिष्ट मनके और मिट्टी के बर्तन एक साथ ग़ायब होते हैं, मानक बटखरों की जगह स्थानीय बटखरे आते हैं, और नगर खाली होते जाते हैं।
दावा। मार्शल ने मोहनजोदड़ो की एक गली में, जिसे “डेडमैन लेन” कहा गया, मानव कंकालों की सूचना दी, और 1925 में उसी स्थल के एक हिस्से में सोलह कंकाल अपने आभूषणों सहित मिले। 1947 में व्हीलर ने इसे ऋग्वेद से जोड़ा, जिसमें पुर शब्द आया है, जिसका अर्थ किला या परकोटा है, और युद्ध-देवता इंद्र को पुरंदर, अर्थात किला-नाशक, कहा गया है: “परिस्थितिजन्य प्रमाणों के आधार पर, इंद्र दोषी ठहरता है।”
खंडन। 1964 में जॉर्ज डेल्स ने दिखाया कि सभी कंकाल एक ही काल के नहीं थे। नगर के अंतिम चरण को ढकने वाला कोई विध्वंस स्तर नहीं है, बड़े पैमाने पर जलने के प्रमाण नहीं हैं, हथियारों से घिरे कवचधारी योद्धा नहीं मिले, और दुर्ग, जो एकमात्र सुरक्षित भाग था, में अंतिम रक्षा के कोई प्रमाण नहीं मिले।
आनुवंशिक प्रमाण। हरियाणा के हिसार ज़िले में स्थित राखीगढ़ी, 550 हेक्टेयर में फैला सबसे बड़ा हड़प्पाई नगर, के कंकाल अवशेषों के DNA का अध्ययन डेक्कन कॉलेज पुणे ने CCMB हैदराबाद और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के साथ किया। हड़प्पावासी स्थानीय (indigenous) थे, जिनकी आनुवंशिक जड़ें 10,000 ई.पू. तक जाती हैं, और अधिकांश दक्षिण एशियाई जनसंख्या इन्हीं से वंशागत प्रतीत होती है। व्यापार से बाहरी जीन थोड़ी मात्रा में मिले, और हड़प्पाई जीन ईरान व मध्य एशिया की ओर फैले। यह आनुवंशिक और सांस्कृतिक निरंतरता तथाकथित आर्यों के बड़े पैमाने के आगमन को खारिज करती है, और पुनर्निर्मित त्रि-आयामी चेहरे की बनावट हरियाणा की आधुनिक जनसंख्या से बहुत मिलती-जुलती है: 5000 वर्षों की अटूट निरंतरता।
सीख: उन्हीं आँकड़ों की सावधानीपूर्वक पुनः जाँच पहले की व्याख्या को पूरी तरह पलट सकती है।
पुरा-आनुवंशिकी (archaeogenetics) प्राचीन जनसंख्याओं के DNA का अध्ययन है, जिसमें आणविक आनुवंशिकी का प्रयोग किसी जनसंख्या के इतिहास को समझने के लिए किया जाता है।
8 हमें कैसे पता चला: प्रमाणों को खोजना और पढ़ना
जब नगर खंडहर में बदल गए तो लोग उन्हें भूल गए, और सदियों बाद कोई नहीं जानता था कि बाढ़, कटाव और हल से निकली वस्तुओं का क्या अर्थ निकाला जाए। पुरातत्वविदों ने उन्हें पढ़ना कैसे सीखा, यह स्वयं एक परीक्षा योग्य विषय है।
| कौन | विधि | परिणाम |
|---|---|---|
| अलेक्ज़ेंडर कनिंघम, ASI के पहले महानिदेशक, 1800 के मध्य, भारतीय पुरातत्व के जनक | पाठ-केंद्रित विधि: लिखित शब्द को मार्गदर्शक मानना, चौथी से सातवीं सदी ई. के चीनी बौद्ध यात्रियों के वृत्तांतों से बस्तियों का पता लगाना, और अभिलेखों का संकलन व अनुवाद। उनकी रुचि आद्य ऐतिहासिक काल, लगभग 600 ई.पू. से 400 ई. में थी। | सभ्यता को पहचान नहीं पाए। हड़प्पा किसी तीर्थयात्री के मार्ग पर नहीं था और आद्य ऐतिहासिक काल का भी नहीं था, इसलिए यह उनके ढाँचे में कहीं फ़िट नहीं बैठता था। एक हड़प्पाई मुहर दिए जाने पर भी वे उसे स्थान नहीं दे सके: वे मानते थे कि भारतीय इतिहास गंगा घाटी के नगरों से आरंभ होता है। |
| दयाराम साहनी, फिर राखालदास बनर्जी, 1900 के आरंभिक वर्ष | हड़प्पा में आद्य ऐतिहासिक काल से पुरानी परतों में मुहरें मिलीं; फिर मोहनजोदड़ो में वैसी ही मुहरें। | दिखाया कि दोनों स्थल एक ही पुरातात्विक संस्कृति के थे। |
| जॉन मार्शल, जिन्होंने 1924 में इस खोज की घोषणा की | भारत में पहले पेशेवर पुरातत्वविद, यूनान और क्रीट के अनुभव के साथ, रोज़मर्रा के जीवन में उतनी ही रुचि जितनी असाधारण खोजों में। पर उन्होंने टीले में एक समान क्षैतिज इकाइयों में खुदाई की, उसकी परतों को नज़रअंदाज़ करते हुए। | दुनिया को एक नई सभ्यता दी, जो मेसोपोटामिया के समकालीन थी, जहाँ वैसी ही मुहरें मिली थीं। एस.एन. रॉय: “मार्शल भारत को तीन हज़ार वर्ष अधिक प्राचीन छोड़ गए, जितनी उन्हें मिली थी।” इसकी क़ीमत: अलग-अलग परतों की खोजें एक साथ मिला दी गईं, इसलिए संदर्भ (context) खो गया। |
| आर.ई.एम. व्हीलर, 1944 से महानिदेशक | एक समान रेखाओं में खुदाई के बजाय टीले के स्तरविन्यास (stratigraphy) का पालन किया। एक पूर्व सेना ब्रिगेडियर, उन्होंने सैन्य सटीकता खुदाई में लाई। | मार्शल की त्रुटि सुधारी और परत-दर-परत खुदाई को मानक बनाया। |
| विभाजन के बाद, और 1980 के दशक से | प्रमुख स्थल पाकिस्तान में चले गए, इसलिए भारतीय पुरातत्वविदों ने कच्छ, पंजाब और हरियाणा का सर्वेक्षण किया; बाद में, संयुक्त अंतरराष्ट्रीय दलों ने सतही अन्वेषण और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का प्रयोग किया। | कालीबंगन, लोथल, राखीगढ़ी और धौलावीरा खोजे और खोदे गए, और राखीगढ़ी में पुरा-आनुवंशिक अध्ययन आरंभ हुआ। |
स्तरविन्यास (stratigraphy) किसी स्थल की परतों का अध्ययन है। टीला (mound) उस स्थान पर जमा हुआ मानव-निवास का मलबा है जहाँ लोग रहते और स्थान का पुनः उपयोग करते रहे; बंजर परतें (sterile layers), जिनमें निवास के कोई निशान नहीं होते, स्थान छोड़ दिए जाने को दर्शाती हैं। सबसे निचली परतें सामान्यतः सबसे पुरानी होती हैं, इसलिए किसी परत में मिली वस्तुओं को किसी सांस्कृतिक काल से जोड़ा जा सकता है।
कनिंघम की कहानी का मुख्य बिंदु यह नहीं है कि वे लापरवाह थे। बिंदु यह है कि पुरातत्वविद जिन प्रश्नों से शुरुआत करता है, वही तय करते हैं कि वह क्या देख पाता है। यह वाक्य किसी भी “पुरातत्वविद अतीत का पुनर्निर्माण कैसे करते हैं” प्रश्न का आधा उत्तर है।
8.1 तीन समस्याएँ जो राह में आती हैं
अधिकांश वस्तुएँ नष्ट हो जाती हैं
कपड़ा, चमड़ा, लकड़ी और सरकंडे उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में सड़ जाते हैं। केवल पत्थर, जली हुई मिट्टी या टेराकोटा और धातु बचते हैं, इसलिए हड़प्पाई जीवन की पूरी श्रेणियाँ अनुपस्थित रह जाती हैं।
खोजें संयोगवश होती हैं
लोग केवल टूटी वस्तुएँ फेंकते थे और बाक़ी का पुनः उपयोग करते थे। कोई बहुमूल्य वस्तु अक्षुण्ण मिलने का अर्थ है कि वह खो गई थी या छिपाई गई थी और कभी वापस नहीं ली गई, इसलिए अक्षुण्ण मिली वस्तुएँ संयोग हैं, विशिष्ट वस्तुएँ नहीं।
प्रयोजन एक अनुमान है
सामग्री के अनुसार वर्गीकरण आसान है; प्रयोजन के अनुसार नहीं। औज़ार, आभूषण, दोनों, या धार्मिक वस्तु? पुरातत्वविद वर्तमान की समान वस्तुओं से समानता और संदर्भ से अनुमान लगाते हैं: घर, नाली, क़ब्र या भट्टी? वस्त्रों के लिए केवल अप्रत्यक्ष प्रमाण हैं, कपास के निशान और मूर्तियों में चित्रण।
8.2 सबसे कठिन पुनर्निर्माण: धर्म
आरंभिक पुरातत्वविदों ने मान लिया कि कोई भी असाधारण वस्तु धार्मिक होगी। इसलिए भारी आभूषणों और विस्तृत केशसज्जा वाली स्त्रियों की टेराकोटा मूर्तियाँ मातृदेवी बन गईं; एक घुटने पर हाथ रखे बैठे पुरुषों की पत्थर की मूर्तियाँ पुरोहित-राजा बन गईं; विशाल स्नानागार और कालीबंगन व लोथल की अग्नि-वेदियों को धार्मिक महत्व दे दिया गया; पौधों की आकृतियाँ प्रकृति-पूजा बन गईं; और शंकु आकार के पत्थर लिंग, शिव के प्रतीक के रूप में पूजे जाने वाले पालिशदार पत्थर, वर्गीकृत किए गए। एक सींग वाला “यूनिकॉर्न” स्पष्ट रूप से एक काल्पनिक मिश्रित प्राणी है। प्रसिद्ध मामला है आद्य-शिव मुहर: पालथी मारकर “योगिक” मुद्रा में बैठी एक आकृति, कभी-कभी पशुओं से घिरी हुई, जिसे शिव के प्रारंभिक रूप के रूप में पढ़ा गया। इसका तर्क ही वह है जिसकी परीक्षा में आलोचना करने को कहा जाता है।
मैके ने लैपिस लाज़ुली, जैस्पर और चैलसेडोनी के दो इंच से कम ऊँचाई वाले सुंदर तराशे शंकुओं के बारे में लिखा कि उन्हें लिंग माना जाता था, पर “यह भी उतना ही संभव है कि वे किसी खेल में प्रयोग होते हों।” एक ही वस्तु की दो बिल्कुल अलग कहानियाँ।
दशकों के काम से क्या हासिल हुआ
- हड़प्पाई अर्थव्यवस्था की काफ़ी अच्छी समझ
- सामाजिक भेदों को पहचानने की क्षमता
- सभ्यता कैसे कार्य करती थी, इसका कुछ अंदाज़ा
अब भी अनुत्तरित
- क्या विशाल स्नानागार सचमुच धार्मिक संरचना थी?
- साक्षरता कितनी व्यापक थी?
- कब्रिस्तानों में इतना कम सामाजिक भेद क्यों दिखता है?
- लिंग-भेद: क्या स्त्रियाँ मिट्टी के बर्तन बनाती थीं या केवल रंगती थीं, और टेराकोटा की स्त्री-मूर्तियों का प्रयोजन क्या था?
- हड़प्पावासियों और वैदिक लोगों में क्या संबंध था? कुछ विद्वान मानते हैं वे एक ही थे
- लिपि के डिकोड होने से भी शायद बहुत कम स्पष्ट होगा, यद्यपि एक द्विभाषी अभिलेख भाषा से जुड़े प्रश्नों का उत्तर दे सकता है
9 समयरेखा और पुनरावृत्ति
BP वर्तमान से पूर्व (Before Present) · ई.पू. ईसा-पूर्व · ई. ईस्वी · c. लैटिन circa से, जिसका अर्थ है अनुमानित। किसी विवादित तिथि से पहले “c.” लिखना दर्शाता है कि आप जानते हैं यह सटीक नहीं है।
| समयरेखा 1 · आरंभिक भारतीय पुरातत्व के प्रमुख काल (अनुमानित) | |
|---|---|
| 20 लाख BP | निम्न पुरापाषाण काल |
| 80,000 BP | मध्य पुरापाषाण काल |
| 35,000 BP | उच्च पुरापाषाण काल |
| 12,000 BP | मध्यपाषाण काल |
| 10,000 BP | नवपाषाण काल: आरंभिक कृषक और पशुपालक |
| 6,000 BP | ताम्रपाषाण काल: ताँबे का पहला प्रयोग |
| 2600 ई.पू. | हड़प्पा सभ्यता |
| 1000 ई.पू. | आरंभिक लौह युग, महापाषाणीय दफ़न |
| 600 ई.पू. से 400 ई. | आद्य ऐतिहासिक काल |
| समयरेखा 2 · हड़प्पाई पुरातत्व के प्रमुख विकास | |
|---|---|
| 1875 | एक हड़प्पाई मुहर पर कनिंघम की रिपोर्ट |
| 1921 | दयाराम साहनी हड़प्पा में खुदाई आरंभ करते हैं |
| 1922 | मोहनजोदड़ो में खुदाई आरंभ |
| 1946 | व्हीलर हड़प्पा में खुदाई करते हैं |
| 1955 | एस.आर. राव लोथल में खुदाई आरंभ करते हैं |
| 1960 | बी.बी. लाल और बी.के. थापर कालीबंगन में आरंभ करते हैं |
| 1974 | एम.आर. मुगल बहावलपुर में अन्वेषण आरंभ करते हैं |
| 1980 | एक जर्मन-इतालवी दल मोहनजोदड़ो में सतही अन्वेषण आरंभ करता है |
| 1986 | एक अमेरिकी दल हड़प्पा में खुदाई आरंभ करता है |
| 1990 | आर.एस. बिष्ट धौलावीरा में खुदाई आरंभ करते हैं |
| 1997 | अमरेंद्र नाथ राखीगढ़ी में खुदाई आरंभ करते हैं |
| 2013 | वसंत शिंदे राखीगढ़ी में पुरा-आनुवंशिक शोध आरंभ करते हैं |
- हड़प्पावासियों के बारे में जो कुछ भी हम जानते हैं वह भौतिक अवशेषों से है, क्योंकि लिपि अपठित है।
- तीन चरण: आरंभिक 6000 से 2600 ई.पू., परिपक्व और नगरीय 2600 से 1900 ई.पू., उत्तर और ग्रामीण 1900 से 1300 ई.पू.।
- मोहनजोदड़ो में योजना: पहले चबूतरे, फिर नालियों सहित ग्रिड सड़कें, फिर घर, सभी ईंटें निश्चित 4:2:1 अनुपात में।
- दुर्ग का अर्थ है छोटा, ऊँचा, परकोटे से घिरा, सार्वजनिक भवन; निचला नगर का अर्थ है बड़ा, नीचा, आवासीय। धौलावीरा और लोथल इस पैटर्न को तोड़ते हैं।
- दफ़न प्रथाएँ और बहुमूल्य वस्तुओं का वितरण संकेत देते हैं कि सामाजिक भेद थे, पर मिस्र के मानकों की तुलना में सीमित।
- शिल्प विशेषीकृत था, और कच्चा माल स्रोत पर बसी बस्तियों और भेजे गए अभियानों, दोनों से आता था।
- व्यापार ओमान, बहरीन और मेसोपोटामिया तक पहुँचता था, जहाँ हड़प्पाई क्षेत्र को संभवतः मेलुहा कहा जाता था।
- किसी शासक की पहचान नहीं हो सकी; ईंटों, मुहरों और बटखरों की एकरूपता केंद्रीय सत्ता के पक्ष में सबसे मज़बूत तर्क है।
- पतन किसी एक पर्यावरणीय कारण के बजाय एक एकीकृत तत्व के अंत के बाद हुआ।
- पुरातत्व का अपना इतिहास है: कनिंघम की पाठ-केंद्रित विधि, मार्शल का खोया हुआ संदर्भ, व्हीलर का स्तरविन्यास, और राखीगढ़ी में पुरा-आनुवंशिकी।
- 1 अंकइस सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता क्यों कहा जाता है?
- 1 अंकहड़प्पाई ईंटों में लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई का अनुपात बताइए।
- 1 अंकनिधि (hoard) को परिभाषित कीजिए।
- 1 अंकपाँच प्रमुख हड़प्पाई नगरों के नाम लिखिए।
- 1 अंकफ़यॉन्स क्या है, और इसे बहुमूल्य क्यों माना जाता था?
- 2 अंकपुरा-वनस्पतिशास्त्री और पुरा-प्राणिविज्ञानी क्या अध्ययन करते हैं?
- 2 अंककालीबंगन का जुता हुआ खेत हड़प्पाई कृषि के बारे में क्या बताता है?
- 2 अंकबेकार सामग्री (waste) किसी शिल्प उत्पादन केंद्र का सबसे अच्छा संकेतक क्यों है?
- 2 अंकमुहर और सीलबंदी में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- 2 अंकस्तरविन्यास क्या है, और मार्शल की विधि ने इससे मिलने वाली जानकारी को क्यों नष्ट किया?
- 3 अंकहड़प्पाई नगरों में लोगों को उपलब्ध भोजन की सूची बनाइए, और बताइए कौन-से समूह इन्हें उपलब्ध कराते होंगे।
- 3 अंकहड़प्पाई नगरों की जल-निकासी व्यवस्था का वर्णन कीजिए और बताइए यह नगर-नियोजन को कैसे सिद्ध करती है।
- 3 अंकपुरातत्वविद उपयोगी वस्तुओं और बहुमूल्य वस्तुओं में अंतर कैसे करते हैं? एक ऐसी वस्तु बताइए जिसे वर्गीकृत करना कठिन है।
- 3 अंककार्नीलियन का मनका बनाने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
- 3 अंकहड़प्पावासियों और ओमान, दिलमुन तथा मेसोपोटामिया के बीच संपर्क के क्या प्रमाण मिलते हैं?
- 3 अंकहड़प्पाई समाज में शासकों के बारे में विद्वानों के तीन मत बताइए।
- 3 अंककिसी हड़प्पाई दफ़न को देखिए। शव को कैसे रखा जाता था, उसके पास कौन-सी वस्तुएँ मिलती हैं, और वे परलोक संबंधी विश्वासों के बारे में क्या संकेत देती हैं?
- 3 अंकहड़प्पाई बटखरा प्रणाली का वर्णन कीजिए।
- 5 अंकएक नियोजित नगरीय केंद्र के रूप में मोहनजोदड़ो की विशिष्ट विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
- 5 अंकपुरातत्वविद हड़प्पाई समाज में सामाजिक-आर्थिक भेदों का पता कैसे लगाते हैं, और उन्हें कौन-से भेद मिलते हैं?
- 5 अंकशिल्प उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल की सूची बनाइए और चर्चा कीजिए कि ये कैसे प्राप्त किए जाते होंगे।
- 5 अंकपुरातत्वविद अतीत का पुनर्निर्माण कैसे करते हैं, और उन्हें किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है, इस पर चर्चा कीजिए।
- 5 अंकहड़प्पाई समाज में शासकों द्वारा निभाए गए कार्यों पर चर्चा कीजिए।
- 5 अंक“हड़प्पा सभ्यता का अंत किसी एक घटना के कारण नहीं हुआ था।” इस कथन की समीक्षा कीजिए।
- 5 अंककनिंघम से लेकर राखीगढ़ी के पुरा-आनुवंशिक शोध तक हड़प्पा सभ्यता की खोज का क्रम बताइए।
- 5 अंकआद्य-शिव मुहर का उदाहरण लेकर बताइए कि हड़प्पाई धर्म का पुनर्निर्माण इतना कठिन क्यों है।
- 5 अंकउपमहाद्वीप के रेखा-मानचित्र पर हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगन, लोथल, धौलावीरा, राखीगढ़ी, चन्हूदड़ो, बनावली और नागेश्वर को चिह्नित व नामांकित कीजिए।
- 1 अंकपरिपक्व हड़प्पा चरण की तिथि है:
(a) 6000 से 2600 ई.पू.(b) 2600 से 1900 ई.पू.(c) 1900 से 1300 ई.पू.(d) 1300 से 600 ई.पू. - 1 अंकएक आरंभिक हड़प्पाकालीन जुता हुआ खेत कहाँ मिला है?
(a) लोथल(b) बनावली(c) कालीबंगन(d) धौलावीरा - 1 अंकहड़प्पाई बटखरे सामान्यतः किस पत्थर के बने होते थे?
(a) चर्ट(b) सेलखड़ी(c) फ़यॉन्स(d) कार्नीलियन - 1 अंकमेसोपोटामियाई अभिलेखों में मेलुहा का सबसे संभावित अर्थ है:
(a) बहरीन(b) ओमान(c) हड़प्पाई क्षेत्र(d) अफ़ग़ानिस्तान - 1 अंक1924 में सिंधु घाटी सभ्यता की खोज की घोषणा किसने की?
(a) अलेक्ज़ेंडर कनिंघम(b) जॉन मार्शल(c) आर.ई.एम. व्हीलर(d) दयाराम साहनी - 1 अंकसबसे लंबे हड़प्पाई अभिलेख में लगभग कितने चिह्न हैं?
(a) 8 चिह्न(b) 26 चिह्न(c) 375 चिह्न(d) 400 चिह्न - 1 अंकहड़प्पाई कंकाल अवशेषों पर पुरा-आनुवंशिक शोध कहाँ किया गया?
(a) मोहनजोदड़ो(b) हड़प्पा(c) राखीगढ़ी(d) चन्हूदड़ो
चुनिए: (a) अभिकथन और कारण दोनों सही हैं तथा कारण, अभिकथन की सही व्याख्या करता है; (b) दोनों सही हैं पर कारण, अभिकथन की सही व्याख्या नहीं करता; (c) अभिकथन सही है, कारण ग़लत है; (d) अभिकथन ग़लत है, कारण सही है।
कारण (R): नालियों सहित सड़कें पहले बिछाई जाती थीं, और फिर उनके किनारे घर बनाए जाते थे।
कारण (R): सभी कंकाल एक ही काल के नहीं थे, और कोई विध्वंस स्तर या अंतिम रक्षा का प्रमाण नहीं मिलता।
कारण (R): विशाल स्नानागार दुर्ग पर अन्य विशिष्ट भवनों के बीच स्थित है।