लगभग 600 ई.पू. से 600 ई.
1 पृष्ठभूमि, और वह व्यक्ति जिसने इसे खोला
यह अध्याय 1,500 वर्षों को समेटता है, लगभग 600 ई.पू. से 600 ई., हड़प्पा सभ्यता के बाद का काल। इस दौरान पहले से हो रहा था: सिंधु और उसकी सहायक नदियों के किनारे ऋग्वेद की रचना; उत्तर भारत, दक्कन के पठार और कर्नाटक के कुछ भागों में कृषि बस्तियाँ; दक्कन और उससे आगे दक्षिण में पशुचारक जनसंख्या; और पहली सहस्राब्दी ई.पू. से, महापाषाण (megaliths), यानी मृतकों के ऊपर बनी विस्तृत पत्थर संरचनाएँ, मध्य और दक्षिण भारत में, जिनके साथ अक्सर लोहे के औज़ार और हथियार दफ़नाए मिलते हैं।
फिर लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से तीन बातें एक साथ घटित होती हैं, और अध्याय इसी बारे में है कि ये कैसे जुड़ी हैं: आरंभिक राज्य, साम्राज्य और राज्यतंत्र उभरते हैं, कृषि उत्पादन का पुनर्गठन होता है, और लगभग हर जगह नए नगर बनते हैं।
इनमें से कोई भी पूरी कहानी नहीं बताता, और अध्याय का अंतिम भाग पूरी तरह इसी पर केंद्रित है।
पुरालेखशास्त्र (epigraphy) अभिलेखों का अध्ययन है। अभिलेख (inscriptions) पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतहों पर उकेरे गए लेख हैं। ये सामान्यतः उनकी उपलब्धियों, गतिविधियों या विचारों को दर्ज करते हैं जिन्होंने उन्हें बनवाया: राजाओं के कारनामे, या स्त्री-पुरुषों द्वारा धार्मिक संस्थाओं को दिए गए दान।
- ये लगभग स्थायी अभिलेख हैं, और कुछ पर तिथि भी अंकित है।
- बिना तिथि वालों को पुरालिपिशास्त्र (palaeography), यानी लेखन-शैलियों के अध्ययन, से काफ़ी सटीक रूप से तिथि दी जाती है। उदाहरण के लिए, अक्षर “अ” लगभग 250 ई.पू. में एक तरह से और लगभग 500 ई. तक बिल्कुल अलग ढंग से लिखा जाता था।
- सबसे पुराने अभिलेख प्राकृत में थे, जो आम लोगों द्वारा प्रयुक्त भाषाओं का नाम है। पालि, तमिल और संस्कृत का भी प्रयोग हुआ। लोग संभवतः अन्य भाषाएँ भी बोलते थे जो कभी लिखी नहीं गईं।
1830 के दशक में जेम्स प्रिंसेप, ईस्ट इंडिया कंपनी की टकसाल में एक अधिकारी, ने ब्राह्मी और खरोष्ठी को समझा, जो सबसे पुराने अभिलेखों और सिक्कों की लिपियाँ थीं। इनमें से अधिकतर में एक राजा पियदस्सी, “देखने में सुंदर”, का नाम था, और कुछ में उसे अशोक भी कहा गया, जो बौद्ध ग्रंथों से पहले ही प्रसिद्ध था। इस जुड़ाव ने सब कुछ बदल दिया: विद्वान अब कई भाषाओं के अभिलेखों और ग्रंथों का प्रयोग कर प्रमुख राजवंशों की वंशावली पुनर्निर्मित कर सके, और बीसवीं सदी के आरंभ तक राजनीतिक इतिहास की मोटी रूपरेखा तैयार हो चुकी थी। विद्वानों ने फिर एक कठिन प्रश्न पूछा, क्या राजनीतिक परिवर्तन आर्थिक और सामाजिक विकास से जुड़ा था, और पाया कि जुड़ाव वास्तविक था पर हमेशा सरल या सीधा नहीं।
2 सबसे पुराने राज्य: सोलह महाजनपद
छठी शताब्दी ई.पू. एक बड़ा मोड़ है: आरंभिक राज्य और नगर, लोहे का बढ़ता प्रयोग, मुद्रा का विकास, और बौद्ध धर्म व जैन धर्म सहित विविध विचार-प्रणालियाँ। आरंभिक बौद्ध और जैन ग्रंथ सोलह राज्यों को महाजनपद कहते हैं। सूचियाँ भिन्न-भिन्न हैं, पर वज्जि, मगध, कोशल, कुरु, पांचाल, गांधार और अवंति सबसे अधिक बार आते हैं, इसलिए ये सबसे महत्वपूर्ण रहे होंगे।
जनपद का अर्थ है वह भूमि जहाँ कोई जन, यानी लोग, कुल या जनजाति, पैर रखता या बसता है। यह शब्द प्राकृत और संस्कृत दोनों में प्रयुक्त होता है। महाजनपद का अर्थ है एक बड़ा जनपद।
| महाजनपद | राजधानी | महाजनपद | राजधानी |
|---|---|---|---|
| गांधार | तक्षशिला | वत्स | कौशाम्बी |
| कुरु | इंद्रप्रस्थ | काशी | वाराणसी |
| पांचाल | अहिच्छत्र | कोशल | श्रावस्ती |
| शूरसेन | मथुरा | मल्ल | कुशीनगर |
| अवंति | उज्जयिनी | वज्जि | वैशाली |
| चेदि | सुक्तिमती | मगध | राजगृह, बाद में पाटलिपुत्र |
| अंग | चंपा | मत्स्य, कंबोज, अश्मक, वंग | सोलह की सूची में शामिल अन्य |
2.1 दो प्रकार के राज्य
राजतंत्र
- एक ही राजा द्वारा शासित
- राजा आदर्श रूप से क्षत्रिय होता था, जैसा धर्मसूत्रों में बताया गया है
- कुछ ने स्थायी सेनाएँ और नियमित नौकरशाही बनाई
- अन्य मिलिशिया (सैन्य-दल) पर निर्भर थे, जो सामान्यतः किसानों से भर्ती होता था
गण या संघ
- कुलीनतंत्र (oligarchy): सत्ता कई पुरुषों में बँटी होती थी, जिन्हें सामूहिक रूप से राजा कहा जाता था
- महावीर और बुद्ध दोनों ऐसे ही गणों से थे
- वज्जि संघ में राजा संभवतः भूमि पर सामूहिक नियंत्रण रखते थे
- स्रोतों के अभाव में इनका इतिहास पुनर्निर्मित करना कठिन है, फिर भी कुछ लगभग एक हज़ार वर्षों तक टिके रहे
कुलीनतंत्र (oligarchy) शासन का वह रूप है जिसमें सत्ता कुछ पुरुषों के समूह द्वारा चलाई जाती है। रोमन गणराज्य, अपने नाम के बावजूद, एक कुलीनतंत्र था।
हर महाजनपद की एक राजधानी होती थी, जो सामान्यतः दुर्गीकृत (fortified) होती थी। दुर्ग, सेनाएँ और आरंभिक नौकरशाही: सबमें धन लगता था। लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने धर्मसूत्र नामक संस्कृत ग्रंथ रचे, जिनमें राजाओं और अन्य सामाजिक वर्गों के लिए नियम तय किए गए थे: राजाओं को कृषकों, व्यापारियों और शिल्पियों से कर और भेंट वसूलनी चाहिए। पशुचारकों और वनवासियों पर कर लगता था या नहीं, यह अज्ञात है। जो ज्ञात है वह यह है कि पड़ोसी राज्यों पर छापा मारना धन प्राप्त करने का एक मान्य, वैध तरीका माना जाता था।
2.2 सोलह में सबसे आगे: मगध
छठी और चौथी शताब्दी ई.पू. के बीच, मगध (आज का बिहार) सबसे शक्तिशाली महाजनपद बन गया। “क्यों” एक पसंदीदा परीक्षा-प्रश्न है, और दो प्रकार के उत्तरों को अलग रखना ज़रूरी है।
आधुनिक इतिहासकार भूगोल की ओर इशारा करते हैं
- विशेष रूप से उपजाऊ कृषि
- आज के झारखंड में सुलभ लौह खदानें, औज़ारों और हथियारों के लिए
- क्षेत्र के वनों से हाथी, सेना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा
- गंगा और उसकी सहायक नदियाँ, जो सस्ता और सुविधाजनक संचार देती थीं
आरंभिक बौद्ध और जैन लेखक व्यक्तियों की ओर इशारा करते हैं
- निर्ममता से महत्वाकांक्षी राजाओं की नीतियाँ
- बिंबिसार, अजातशत्रु और महापद्म नंद सबसे जाने-माने हैं
- उनके मंत्री, जिन्होंने नीतियाँ लागू कीं
राजधानी पहले राजगृह थी, जो आज के राजगीर के लिए प्राकृत नाम है, पहाड़ियों के बीच बसी एक दुर्गीकृत बस्ती जिसका अर्थ है “राजा का घर”। चौथी शताब्दी ई.पू. में यह पाटलिपुत्र, आज का पटना, में स्थानांतरित हो गई, जो गंगा के मार्गों पर नियंत्रण रखती थी।
3 एक आरंभिक साम्राज्य: मौर्य
मगध की वृद्धि का चरम मौर्य साम्राज्य में हुआ। चंद्रगुप्त मौर्य ने लगभग 321 ई.पू. इसकी स्थापना की, और अफ़ग़ानिस्तान व बलूचिस्तान तक उत्तर-पश्चिम में नियंत्रण फैलाया। उसका पौत्र अशोक, शायद आरंभिक भारत का सबसे प्रसिद्ध शासक, ने आज के तटीय उड़ीसा, कलिंग को जीता।
अशोक पहला शासक था जिसने अपनी प्रजा और अधिकारियों के लिए संदेश पत्थर पर उकेरवाए, प्राकृतिक शिलाओं और पॉलिशदार स्तंभों पर, जो उसकी समझ के अनुसार धम्म की घोषणा करते थे।
अशोक के धम्म में बड़ों के प्रति सम्मान, ब्राह्मणों और सांसारिक जीवन त्यागने वालों के प्रति उदारता, दास और सेवकों के प्रति दयालु व्यवहार, और अपने से भिन्न धर्मों व परंपराओं के प्रति सम्मान शामिल था।
अधिकतर अशोक अभिलेख प्राकृत भाषा में, ब्राह्मी लिपि में लिखे गए हैं। उत्तर-पश्चिम के अभिलेख आरामाइक और यूनानी में हैं, और उत्तर-पश्चिम के कुछ प्राकृत अभिलेख खरोष्ठी लिपि में लिखे गए हैं। अफ़ग़ानिस्तान के अभिलेखों के लिए आरामाइक और यूनानी लिपियाँ प्रयुक्त हुईं।
3.1 साम्राज्य का प्रशासन

अभिलेखों में पाँच प्रमुख राजनीतिक केंद्रों का नाम है: राजधानी पाटलिपुत्र और प्रांतीय केंद्र तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसली और सुवर्णगिरि। स्थान चयन सोच-समझकर हुआ था: तक्षशिला और उज्जयिनी महत्वपूर्ण दूर-व्यापार मार्गों पर स्थित थे, और सुवर्णगिरि, शाब्दिक रूप से “सोने का पहाड़”, संभवतः कर्नाटक की सोने की खदानों का दोहन करने के लिए था।
यह मत लिखें कि मौर्यों का पूरे साम्राज्य में एक समान प्रशासन था। लगभग एक जैसा संदेश हर जगह उकेरा गया, आज के पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांतों से लेकर आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और उत्तराखंड तक, पर इतिहासकार अब मानते हैं कि एक समान व्यवस्था असंभव-सी थी: क्षेत्र बहुत अधिक विविध थे। अफ़ग़ानिस्तान के पहाड़ी इलाक़े की तुलना उड़ीसा के तट से करें। नियंत्रण संभवतः राजधानी और प्रांतीय केंद्रों के आसपास सबसे मज़बूत था।
थल और नदी-मार्गों से संचार अनिवार्य था: केंद्र से किसी प्रांत तक की यात्रा में हफ़्तों या महीनों लग सकते थे और रसद व सुरक्षा की ज़रूरत होती थी, सुरक्षा सेना द्वारा दी जाती थी। मेगस्थनीज़ एक समिति का वर्णन करता है जिसमें छह उपसमितियाँ सैन्य गतिविधियों का समन्वय करती थीं।
नौसेना
बेड़े की देखभाल करती थी।
परिवहन और रसद
सबसे व्यस्त उपसमिति: उपकरण ढोने के लिए बैलगाड़ियों की व्यवस्था, सैनिकों के लिए भोजन और पशुओं के लिए चारा जुटाना, और सैनिकों की देखभाल के लिए सेवक व शिल्पी भर्ती करना।
पैदल सैनिक
पैदल सेना।
घुड़सवार
अश्वारोही सेना।
रथ
रथ सेना।
हाथी
वनों से पकड़े जाते, जिनके लिए अर्थशास्त्र में विस्तृत नियम दिए गए हैं।
अशोक ने साम्राज्य को धम्म के प्रसार से भी जोड़े रखा, जिसके सिद्धांत सरल और लगभग सार्वभौमिक रूप से लागू होने योग्य थे, और जिनसे वह इस लोक और परलोक दोनों में कल्याण सुनिश्चित मानता था। संदेश फैलाने के लिए धम्म महामात्त नामक विशेष अधिकारी नियुक्त किए गए थे।
मेगस्थनीज़ लिखता है कि राज्य के बड़े अधिकारी “नदियों की देखरेख करते हैं, भूमि नापते हैं, जैसा मिस्र में होता है, और जल-द्वारों का निरीक्षण करते हैं जिनसे मुख्य नहरों से पानी उनकी शाखाओं में छोड़ा जाता है, ताकि हर किसी को समान मात्रा में पानी मिले।” यही अधिकारी शिकारियों की देखरेख करते थे और उन्हें पुरस्कृत या दंडित करने का अधिकार रखते थे, कर वसूलते थे, और भूमि से जुड़े व्यवसायों, लकड़हारे, बढ़ई, लोहार, खनिकों, की देखरेख करते थे।
स्रोत 2 · हाथी पकड़ने पर अर्थशास्त्र। हाथी-वन के रक्षक, पालकों, पैर-बाँधने वालों, सीमा-रक्षकों, वनवासियों और परिचारिकाओं की सहायता से, पाँच या सात मादा हाथियों से जंगली हाथियों को बाँधते थे, झुंडों का पता उनके मूत्र और गोबर से लगाते थे। यूनानी स्रोत मौर्य शासक को 6,00,000 पैदल सैनिक, 30,000 घुड़सवार और 9,000 हाथी होने का श्रेय देते हैं, जिन्हें कुछ इतिहासकार अतिरंजित मानते हैं।
3.2 साम्राज्य कितना महत्वपूर्ण था?
इसे एक मील का पत्थर क्यों माना गया
- उन्नीसवीं सदी के भारतीय इतिहासकार, जो स्वयं ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन भारत में लिख रहे थे, एक आरंभिक भारतीय साम्राज्य के विचार को चुनौतीपूर्ण और रोमांचक पाते थे
- मौर्य पाषाण-मूर्तिकला को साम्राज्यों की विशिष्ट भव्य कला माना गया
- अशोक का संदेश अन्य शासकों से भिन्न लगता था: अधिक शक्तिशाली और परिश्रमी, फिर भी भव्य उपाधियों वाले बाद के राजाओं से अधिक विनम्र
- बीसवीं सदी के राष्ट्रवादी नेता उसे एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व मानते थे
इतिहासकार अब इसे सीमित क्यों मानते हैं
- यह केवल लगभग 150 वर्ष चला, जो उपमहाद्वीपीय इतिहास में एक छोटा समय है
- यह पूरे उपमहाद्वीप को नहीं ढकता था
- नियंत्रण अपनी सीमाओं के भीतर भी एक समान नहीं था
- दूसरी शताब्दी ई.पू. तक उपमहाद्वीप के कई हिस्सों में नए मुखिया-राज्य और राज्यतंत्र उभर चुके थे
4 राजसत्ता की नई अवधारणाएँ
4.1 दक्षिण के मुखिया और राजा
दक्कन और उससे आगे दक्षिण में नए राज्य, जिनमें तमिलकम में चोल, चेर और पांड्य मुखिया-राज्य शामिल थे, स्थिर और समृद्ध सिद्ध हुए। तमिलकम प्राचीन तमिल देश है, जिसमें तमिलनाडु के अलावा आज के आंध्र प्रदेश और केरल के कुछ भाग भी शामिल थे।
मुखिया (chief) एक शक्तिशाली व्यक्ति होता है जिसका पद वंशानुगत हो भी सकता है और नहीं भी। वह अपने कुटुंबियों से समर्थन प्राप्त करता है, और उसके कार्यों में विशेष अनुष्ठान करना, युद्ध में नेतृत्व और विवादों में मध्यस्थता शामिल हो सकती है। वह अपने अधीनस्थों से भेंट प्राप्त करता है, राजाओं के विपरीत जो कर वसूलते हैं, और अक्सर इन्हें अपने समर्थकों में बाँट देता है। मुखिया-राज्यों में सामान्यतः स्थायी सेनाएँ या अधिकारी नहीं होते।
हम इन राज्यों को आरंभिक तमिल संगम ग्रंथों से जानते हैं, जिनकी कविताएँ बताती हैं कि मुखिया कैसे संसाधन प्राप्त करते और बाँटते थे। अन्य शासक, जिनमें पश्चिमी और मध्य भारत के सातवाहन (लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ई.) और मध्य एशियाई मूल के शक, जिन्होंने उत्तर-पश्चिम और पश्चिम में राज्य स्थापित किए, शामिल थे, दूर-व्यापार से राजस्व प्राप्त करते थे। इनकी सामाजिक उत्पत्ति अक्सर अस्पष्ट थी, और शक्तिशाली बनने पर इन्होंने विभिन्न तरीकों से सामाजिक प्रतिष्ठा का दावा किया।
तमिल महाकाव्य शिलप्पदिकारम वर्णन करता है कि लोग पहाड़ से गाते-नाचते उतरते हैं, विजयी मुखिया को सम्मान देते और भेंट लाते हैं: हाथीदाँत, सुगंधित लकड़ी, हिरण के बालों के पंखे, शहद, चंदन, गेरू, सुरमा, हल्दी, इलायची, काली मिर्च; नारियल, आम, औषधीय पौधे, फल, प्याज़, गन्ना, फूल, सुपारी, केले; और बाघ के बच्चे, सिंह, हाथी, बंदर, भालू, हिरण, कस्तूरी मृग, लोमड़ी, मोर, कस्तूरी बिलाव, जंगली मुर्गे और बोलने वाले तोते सहित पशु-पक्षी।
यह क्यों महत्वपूर्ण है: वन और पहाड़ की उपज भेंट के रूप में मुखिया तक पहुँचती थी और वह इसे पुनर्वितरित करता था। यही राजा द्वारा कर वसूलने से इसका अंतर है।
4.2 दैवी राजा
उच्च प्रतिष्ठा का दावा करने का एक तरीका था देवताओं से स्वयं को जोड़ना, और मध्य एशिया से लेकर उत्तर-पश्चिम भारत तक शासन करने वाले कुषाण (लगभग पहली शताब्दी ई.पू. से पहली शताब्दी ई.) इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं। उनका इतिहास अभिलेखों और साहित्यिक परंपराओं से मिलता है, पर वे जिस राजसत्ता को प्रस्तुत करना चाहते थे, वह उनके सिक्कों और मूर्तिकला में सबसे अच्छी तरह दिखती है।

कुषाण शासकों की विशाल मूर्तियाँ मथुरा (उत्तर प्रदेश) के निकट मत नामक स्थान पर एक मंदिर में और अफ़ग़ानिस्तान के एक मंदिर में इसी प्रकार की मूर्तियाँ स्थापित थीं, जिन्हें कुछ इतिहासकार यह मानते हुए पढ़ते हैं कि कुषाण स्वयं को ईश्वर-तुल्य समझते थे। कई ने देवपुत्र, “ईश्वर का पुत्र”, की उपाधि भी अपनाई, संभवतः स्वयं को स्वर्ग-पुत्र कहने वाले चीनी शासकों से प्रेरित होकर।
चौथी शताब्दी तक फिर से बड़े राज्य बने, जिनमें गुप्त साम्राज्य शामिल था। कई राज्य सामंतों पर निर्भर थे: ऐसे पुरुष जो भूमि पर नियंत्रण सहित स्थानीय संसाधनों से अपना निर्वाह करते और श्रद्धांजलि व सैन्य सहायता देते थे। यह व्यवस्था दोनों ओर काम करती थी: एक शक्तिशाली सामंत राजा बन सकता था, और एक कमज़ोर शासक अधीनता में गिर सकता था।
प्रशस्तियाँ कवियों द्वारा संस्कृत में रचित रचनाएँ हैं जो विशेष रूप से राजाओं और सामान्यतः आश्रयदाताओं की प्रशंसा में लिखी जाती थीं। इतिहासकार अक्सर इनसे तथ्यात्मक जानकारी निकालते हैं, पर जिन्होंने इन्हें रचा और पढ़ा वे इन्हें शाब्दिक रूप से सत्य वृत्तांत के बजाय काव्य-रचना के रूप में सँजोते थे।
इसे इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख भी कहते हैं, जो समुद्रगुप्त (लगभग चौथी शताब्दी ई.) के दरबारी कवि हरिषेण द्वारा संस्कृत में रचित है: समुद्रगुप्त संभवतः सबसे शक्तिशाली गुप्त शासक था। इसमें उसे पृथ्वी पर बिना किसी प्रतिद्वंद्वी के, अपने पैरों के तलवों से अन्य राजाओं की प्रसिद्धि मिटा देने वाला बताया गया है; पुरुष, परम सत्ता, अच्छों की समृद्धि और बुरों के विनाश का कारण; अगम्य; जिसका कोमल हृदय केवल भक्ति और विनम्रता से जीता जा सकता है; करुणामय; लाखों गायों का दाता; जिसका मन दुखी, ग़रीब, असहाय और पीड़ितों के उत्थान के लिए समर्पित है; दीप्तिमान, मानवता के प्रति साक्षात दया; और कुबेर, वरुण, इंद्र और यम के समान।
इसे “राजाओं ने दैवी दर्जे का दावा क्यों किया” के लिए प्रयोग करें। यह दावा शासक को किसी भी प्रतिद्वंद्वी से परे रखता था, ऐसे समय में जब शक्तिशाली सामंत स्वयं राजा बन सकते थे।
5 बदलता ग्रामीण जीवन
5.1 प्रजा अपने शासकों के बारे में क्या सोचती थी?
अभिलेख इसका उत्तर नहीं देते, क्योंकि आम लोगों ने अपने विचारों के वृत्तांत शायद ही कभी छोड़े। इतिहासकार जातक और पंचतंत्र जैसे संग्रहों की कहानियों से इसका हल निकालते हैं, जो संभवतः लोकप्रिय मौखिक कथाएँ थीं जिन्हें बाद में लिखा गया। जातक प्रथम सहस्राब्दी ई. के मध्य के आसपास पालि में लिखे गए।
यह एक दुष्ट राजा की प्रजा का वर्णन करता है: वृद्ध स्त्री-पुरुष, कृषक, पशुपालक, गाँव के लड़के, यहाँ तक कि पशु भी। जब राजा भेस बदलकर यह सुनने गया कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं, तो सबने उसे कोसा, शिकायत की कि वे रात में डाकुओं और दिन में कर-वसूलने वालों से त्रस्त हैं। इससे बचने के लिए उन्होंने गाँव छोड़कर जंगल की राह ली।
राजा और ग्रामीण प्रजा के बीच संबंध तनावपूर्ण हो सकते थे: राजा ऊँचे कर माँगकर अपना ख़ज़ाना भरते थे और किसानों को यह माँग अत्याचारपूर्ण लगती थी। जंगल में भाग जाना एक प्रतिक्रिया थी; उत्पादन बढ़ाना दूसरी, और यही वह है जिसने ग्रामीण जीवन को बदल दिया।
5.2 उत्पादन बढ़ाने की रणनीतियाँ
| रणनीति | इसमें क्या शामिल था | कहाँ फैली और कहाँ नहीं |
|---|---|---|
| हल-कृषि | लोहे की नोक वाला हल-फल जलोढ़ मिट्टी को पलटता था, लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से गंगा और कावेरी जैसी उपजाऊ नदी घाटियों में | अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में सफल रहा। पंजाब और राजस्थान के अर्ध-शुष्क भागों के कृषकों ने इसे बीसवीं सदी तक नहीं अपनाया, और उत्तर-पूर्व व मध्य उपमहाद्वीप के पहाड़ी इलाक़ों के लोग कुदाल-कृषि करते थे, जो वहाँ के भूभाग के अधिक अनुकूल थी |
| रोपाई (transplantation) | पहले बीज बिखेरे जाते हैं; जब पौध बड़ी हो जाती है तो उसे जलभराव वाले खेतों में रोपा जाता है। इससे बचत-दर और उपज दोनों बढ़ती हैं | गंगा घाटी के कुछ भागों में धान का उत्पादन नाटकीय रूप से बढ़ाया, पर उत्पादक के लिए यह अत्यंत श्रमसाध्य काम था |
| सिंचाई | कुएँ और तालाब, और कम सामान्यतः नहरें | समुदायों और व्यक्तियों दोनों द्वारा आयोजित। व्यक्ति सामान्यतः शक्तिशाली पुरुष होते थे जिनमें राजा भी शामिल थे, जो ऐसे कार्यों को अभिलेखों में दर्ज कराते थे |
गिरनार के निकट एक संस्कृत शिलालेख (लगभग दूसरी शताब्दी ई.) से ज्ञात एक कृत्रिम जलाशय, जो शक शासक रुद्रदामन की उपलब्धियों को दर्ज करता है। यह झील, बाँधों और जल-नालियों सहित, मौर्यों के अधीन एक स्थानीय राज्यपाल द्वारा बनवाई गई थी; एक भयंकर तूफ़ान ने बाँध तोड़ दिए और पानी बह निकला; रुद्रदामन ने दावा किया कि उसने अपने संसाधनों से, प्रजा पर कोई कर लगाए बिना, इसकी मरम्मत करवाई। उसी शिला पर एक अन्य अभिलेख, लगभग पाँचवीं शताब्दी का, एक गुप्त शासक द्वारा इसकी पुनः मरम्मत दर्ज करता है।
ध्यान दें अभिलेख क्या कर रहा है। यह सिंचाई-कार्य का तटस्थ अभिलेख नहीं है; यह एक शासक द्वारा यह प्रचारित करना है कि उसने इसका ख़र्च स्वयं वहन किया।
5.3 ग्रामीण समाज में भेद
नई तकनीकों ने उत्पादन बढ़ाया, पर लाभ बहुत असमान रूप से बँटा, और भूमि पर काम करने वालों में बढ़ता भेद उभरा।
गृहपति किसी परिवार का स्वामी, मुखिया या प्रधान होता था, जो एक साझा निवास में रहने वाली स्त्रियों, बच्चों, दासों और श्रमिकों पर नियंत्रण रखता था, और परिवार के संसाधनों, भूमि, पशु और अन्य वस्तुओं, का स्वामी होता था। यह शब्द कभी-कभी नगरीय अभिजात वर्ग, जिसमें धनी व्यापारी शामिल हैं, के पुरुषों के लिए दर्जा-सूचक भी प्रयुक्त होता है। पालि ग्रंथ इसे छोटे किसानों और बड़े भूस्वामियों दोनों के लिए प्रयोग करते हैं।
आरंभिक तमिल संगम साहित्य अपनी ही गाँव-श्रेणियाँ बताता है: वेल्लाळर, बड़े भूस्वामी; उळवर, हलवाहक; अडिमई, दास। ये भेद भूमि, श्रम और नई तकनीकों तक असमान पहुँच पर टिके थे, इसलिए भूमि पर नियंत्रण महत्वपूर्ण हो गया और विधि-ग्रंथों में इस पर बहस होती थी।
मनुस्मृति, आरंभिक भारत का संस्कृत में एक सुप्रसिद्ध विधि-ग्रंथ, लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ई. के बीच संकलित, राजा को सलाह देता है कि क्योंकि सीमाओं की अज्ञानता से लगातार विवाद उठते हैं, उसे सीमा-बिंदुओं पर छिपे हुए सीमा-चिह्न गाड़ने चाहिए: पत्थर, हड्डियाँ, गाय के बाल, भूसी, राख, मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े, सूखा गोबर, ईंटें, कोयला, कंकड़, रेत, और अन्य पदार्थ जो मिट्टी में सड़ें नहीं।
5.4 भूमि-अनुदान और नए ग्रामीण अभिजात
ईसा की आरंभिक शताब्दियों से भूमि-अनुदान शुरू होते हैं, जो अभिलेखों में दर्ज हैं: कुछ पत्थर पर, अधिकतर ताम्रपत्रों पर, जो प्राप्तकर्ताओं को लेन-देन के प्रमाण के रूप में सौंपे जाते थे। बचे हुए अभिलेख सामान्यतः धार्मिक संस्थाओं या ब्राह्मणों को दिए गए अनुदान हैं, अधिकतर संस्कृत में, यद्यपि सातवीं शताब्दी से एक भाग संस्कृत और शेष तमिल या तेलुगु जैसी स्थानीय भाषा में हो सकता है।
अग्रहार वह भूमि थी जो किसी ब्राह्मण को अनुदान में दी जाती थी, जिसे सामान्यतः राजा को भूमि-राजस्व और अन्य देय राशियाँ चुकाने से छूट मिलती थी, और अक्सर उसे स्वयं स्थानीय लोगों से यह वसूलने का अधिकार भी दिया जाता था।
प्रभावती गुप्त, चंद्रगुप्त द्वितीय (लगभग 375 से 415 ई.) की पुत्री, का विवाह दक्कन में शक्तिशाली वाकाटक परिवार में हुआ। संस्कृत विधि-ग्रंथ कहते हैं कि स्त्रियों को भूमि पर स्वतंत्र अधिकार नहीं होना चाहिए, फिर भी उसका अभिलेख दिखाता है कि उसके पास एक गाँव था जिसे उसने अनुदान में दे दिया। वह एक रानी के रूप में अपवाद रही होगी, आरंभिक भारतीय इतिहास से ज्ञात बहुत कम रानियों में से एक, या फिर विधिक प्रावधान एक समान रूप से लागू नहीं होते होंगे।
वह दंगुण के ग्रामकुटुंबिनों (गृहस्थों या किसानों), ब्राह्मणों और अन्य को आदेश देती है कि गाँव आचार्य चनालस्वामिन को दान किया गया है, जिनके आदेशों का उन्हें पालन करना है। अग्रहार की छूटें इस प्रकार हैं: सैनिकों और पुलिसकर्मियों का प्रवेश वर्जित; भ्रमणशील राजकीय अधिकारियों को घास, आसन हेतु पशु-चर्म और कोयला देने से मुक्ति; किण्वित मदिरा ख़रीदने और नमक खोदने के राजकीय विशेषाधिकार से; खदानों व खदिर वृक्षों के अधिकार से; फूल और दूध देने से; और छिपे ख़ज़ानों व निक्षेपों के अधिकार तथा प्रमुख व लघु करों सहित दान की गई। तेरहवें राज्य-वर्ष में लिखा गया, चक्रदास द्वारा उकेरा गया।
भूमि-अनुदान शक्ति दर्शाते हैं
- शासक वंशों की कृषि को नए क्षेत्रों में फैलाने की रणनीति का हिस्सा
- अनुदान छोटे भूखंडों से लेकर बंजर भूमि के विशाल विस्तार तक थे, जो विस्तार-नीति से मेल खाता है
भूमि-अनुदान कमज़ोरी दर्शाते हैं
- राजनीतिक शक्ति के कमज़ोर होने का संकेत: सामंतों पर नियंत्रण खोते राजा भूमि देकर सहयोगी जीतने का प्रयास करते थे
- इस दृष्टि से, राजाओं ने प्रशस्तियों में स्वयं को अतिमानव के रूप में इसीलिए प्रस्तुत किया क्योंकि वे नियंत्रण खो रहे थे और उन्हें कम से कम सत्ता का आभास चाहिए था
भूमि-अनुदान आपको कृषकों और राज्य के बारे में बताते हैं, पर सबके बारे में नहीं। पशुचारक, मछुआरे, आखेटक-संग्राहक, गतिशील या अर्ध-स्थायी शिल्पी और स्थानांतरी कृषक अक्सर अधिकारियों या सामंतों की पहुँच से बाहर रहते थे, और सामान्यतः अपने जीवन का कोई विस्तृत अभिलेख नहीं छोड़ते थे। जो उत्तर ग्रामीण जीवन को केवल किसानों और ज़मींदारों तक सीमित मानता है, वह इन्हें छोड़ देता है।
हर्षचरित, कन्नौज के हर्षवर्धन की संस्कृत जीवनी, उसके दरबारी कवि बाणभट्ट (लगभग सातवीं शताब्दी ई.) द्वारा रचित, विंध्य के जंगल के किनारे एक बस्ती की दुर्लभ झलक देती है। छोटे किसान धान-भूमि, खलिहान और कृषि-योग्य भूमि आपस में बाँटते थे। यह मुख्यतः कुदाल-कृषि थी, क्योंकि “काले लोहे जैसी” कठोर काली मिट्टी वाले, विरल घास से ढके खेतों में हल चलाना कठिन था। लोग छाल के गट्ठर, तोड़े फूलों की बोरियाँ, सन और भाँग के बोझ, शहद, मोर के पंख, मोम की मालाएँ, लकड़ियाँ और घास ढोते थे, और गाँव की स्त्रियाँ वन-फलों की टोकरियाँ लेकर पड़ोसी गाँवों में बेचने जल्दी-जल्दी जाती थीं।
6 नगर और व्यापार
6.1 नए नगर और उनमें कौन रहता था
लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से नगरीय केंद्र उभरे, इनमें से कई महाजनपदों की राजधानियाँ थीं। लगभग हर बड़ा नगर किसी संचार-मार्ग पर स्थित था: पाटलिपुत्र नदी-मार्गों पर, उज्जयिनी थल-मार्गों पर, पुहार तट के निकट जहाँ समुद्री मार्ग शुरू होते थे, और मथुरा, वाणिज्यिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधि का हलचल भरा केंद्र।
यह पाटलिग्राम नामक एक गाँव के रूप में शुरू हुआ। पाँचवीं शताब्दी ई.पू. में मगध के शासकों ने राजगृह से अपनी राजधानी यहाँ स्थानांतरित की और इसका नाम बदल दिया; चौथी शताब्दी ई.पू. तक यह मौर्य राजधानी और एशिया के सबसे बड़े नगरों में से एक बन गया। बाद में इसका महत्व घट गया, और जब चीनी यात्री ह्वेनसांग ने सातवीं शताब्दी ई. में इसकी यात्रा की तो उसने इसे खंडहर और बहुत कम जनसंख्या वाला पाया।
खुदाई कठिन है क्योंकि, हड़प्पाई नगरों के विपरीत, इनमें से अधिकतर स्थलों पर आज भी लोग रहते हैं। फिर भी विभिन्न प्रकार के पुरावशेष मिले हैं: उत्तरी काली पॉलिशदार मृद्भांड (NBPW), संभवतः धनी लोगों द्वारा प्रयुक्त चमकदार कटोरे और थालियाँ, और सोने, चाँदी, ताँबे, काँसे, हाथीदाँत, काँच, शंख व टेराकोटा के आभूषण, औज़ार, हथियार, पात्र और मूर्तियाँ।
दान-अभिलेख (votive inscriptions) धार्मिक संस्थाओं को दिए गए उपहार दर्ज करते हैं। दूसरी शताब्दी ई.पू. से कई नगरों में छोटे दान-अभिलेख मिलते हैं, जिनमें दाता का नाम और कभी-कभी उसका व्यवसाय भी होता है।
यही छोटे अभिलेख हमें बताते हैं कि आरंभिक ऐतिहासिक नगरों में कौन रहता था: धोबी, बुनकर, लिपिक, बढ़ई, कुम्हार, सुनार, लोहार, अधिकारी, धार्मिक गुरु, व्यापारी और राजा। मथुरा की एक मूर्ति पर प्राकृत अभिलेख है जिसमें कहा गया है कि नागपिया, सुनार (सोवनिक) धर्मक की पत्नी, ने इसे एक मंदिर में स्थापित किया।
श्रेणियाँ (guilds/shrenis) शिल्प-उत्पादकों और व्यापारियों के संगठन थे। ये संभवतः कच्चा माल जुटाते, उत्पादन को नियमित करते, और तैयार माल बेचते थे।
6.2 उपमहाद्वीप के भीतर और बाहर व्यापार
शासक अक्सर इन मार्गों पर नियंत्रण का प्रयास करते थे, संभवतः शुल्क लेकर सुरक्षा देते हुए। इनका प्रयोग करने वालों में पैदल फेरीवाले से लेकर बैलगाड़ियों और भार-पशुओं के काफ़िलों वाले व्यापारी और जोखिम भरे पर अत्यंत लाभदायक उद्यम वाले समुद्री यात्री शामिल थे। सफल व्यापारी, तमिल में मशातुवन और प्राकृत में सेट्ठी व सत्थवाह, अत्यंत धनी बन सकते थे। ले जाई जाने वाली वस्तुओं में नमक, अनाज, कपड़ा, धातु-अयस्क और तैयार उत्पाद, पत्थर, लकड़ी और औषधीय पौधे शामिल थे। रोमन साम्राज्य में मसालों, विशेषतः काली मिर्च, की भारी माँग थी, साथ ही वस्त्र और औषधीय पौधे भी, ये सभी अरब सागर पार कर भूमध्य सागर तक पहुँचते थे।
Periplus यूनानी में “चारों ओर नौवहन” का अर्थ रखता है और Erythraean लाल सागर के लिए यूनानी नाम था। एक अज्ञात यूनानी नाविक द्वारा लगभग पहली शताब्दी ई. का यह वृत्तांत मलाबार तट (आज का केरल) का वर्णन करता है। विदेशी व्यापारी वहाँ काली मिर्च और मलाबाथ्रम, संभवतः दालचीनी, के लिए बड़े जहाज़ भेजते थे। आयात: बड़ी मात्रा में सिक्के, पुखराज, सुरमा, मूँगा, कच्चा काँच, ताँबा, टिन, सीसा। निर्यात: काली मिर्च, बारीक मोती, हाथीदाँत, रेशमी वस्त्र, हर प्रकार के पारदर्शी पत्थर, हीरे, नीलम, कछुए का ख़ोल। तमिलनाडु के कोडुमनल में क़ीमती और अर्ध-क़ीमती पत्थरों से मनके बनाने का एक उद्योग मिला है, इसलिए स्थानीय व्यापारी संभवतः ऐसे स्थलों से पत्थर तटीय बंदरगाहों तक ले जाते थे।
6.3 सिक्के और राजा
मुद्राशास्त्र (numismatics) सिक्कों का अध्ययन है, जिसमें उनके लिपि व आकृति जैसे दृश्य तत्व, धातु-विश्लेषण, और जिन संदर्भों में वे मिले हैं, सब शामिल हैं।
दक्षिण भारत के स्थलों पर रोमन सिक्कों के भंडार मिले हैं, जो कभी रोमन साम्राज्य का हिस्सा नहीं था: अध्याय का यह सबसे स्पष्ट प्रमाण है कि व्यापार-जाल राजनीतिक सीमाओं तक सीमित नहीं थे।
600 ई. के बाद की पहेली
- लगभग छठी शताब्दी ई. से स्वर्ण सिक्कों की खोजें घटती जाती हैं
- क्या यह कोई आर्थिक संकट था? इतिहासकार बँटे हुए हैं
दो उत्तर
- कुछ मानते हैं कि पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन ने दूर-व्यापार समाप्त कर दिया, जिससे इससे समृद्ध हुए राज्य, समुदाय और क्षेत्र प्रभावित हुए
- अन्य मानते हैं कि उस समय नए नगर और व्यापार-जाल उभर रहे थे, कि सिक्कों का उल्लेख अभी भी अभिलेखों और ग्रंथों में मिलता है, और कम खोजों का अर्थ केवल यह हो सकता है कि सिक्के संचित होने के बजाय प्रचलन में थे
7 मूल बातों पर वापस: अभिलेख कैसे समझे गए
खरोष्ठी अलग ढंग से समझी गई। लगभग दूसरी और पहली शताब्दी ई.पू. में उत्तर-पश्चिम पर शासन करने वाले इंडो-ग्रीक राजाओं के सिक्कों पर एक ही राजकीय नाम यूनानी और खरोष्ठी दोनों में अंकित हैं, इसलिए यूनानी पढ़ सकने वाले विद्वानों ने अक्षरों की तुलना की: अपोलोडोटस जैसे नाम में “अ” का प्रतीक दोनों लिपियों में मिलता है। एक बार प्रिंसेप ने भाषा को प्राकृत पहचान लिया, तो लंबे अभिलेख भी पढ़े जा सके।
7.1 पढ़ पाने के बाद इतिहासकार किसी अभिलेख से क्या करते हैं
“राजा देवानाम्पिय पियदस्सी इस प्रकार कहते हैं: अतीत में, मामलों को निपटाने या नियमित रिपोर्ट प्राप्त करने की कोई व्यवस्था नहीं थी। पर मैंने निम्न व्यवस्था बनाई है। प्रतिवेदक मुझे हर समय, कहीं भी, चाहे मैं भोजन कर रहा होऊँ, अंतःपुर में, शयनकक्ष में, गौशाला में, यात्रा पर, या उद्यान में हूँ, प्रजा के मामलों की सूचना दें। और मैं हर जगह प्रजा के मामलों का निपटारा करूँगा।”
शासक की पहचान करें
इस अभिलेख में अशोक नाम नहीं है। इसमें देवानाम्पिय, अक्सर “देवताओं का प्रिय” अनूदित, और पियदस्सी, “देखने में सुंदर”, उपाधियों का प्रयोग है। अशोक अन्य अभिलेखों में नामांकित है जिनमें यही उपाधियाँ हैं, और क्योंकि सामग्री, शैली, भाषा और पुरालिपि में सब मेल खाते हैं, पुरालेखविदों ने निष्कर्ष निकाला कि एक ही शासक ने ये सभी जारी किए।
दावे की जाँच करें
अशोक कहता है कि पहले के शासकों ने रिपोर्ट प्राप्त करने की कोई व्यवस्था नहीं की थी। उससे पहले के राजनीतिक इतिहास को देखते हुए, क्या यह सच है? इतिहासकारों को लगातार आकलन करना होता है कि किसी अभिलेख का कथन सत्य, संभाव्य या अतिरंजित है।
जोड़ों को चिह्नित करें
पुरालेखविद वाक्यों को स्पष्ट करने के लिए कोष्ठक में शब्द जोड़ते हैं, और उन्हें सावधानी से यह करना होता है ताकि लेखक का इच्छित अर्थ न बदले।
पूछें कि इसे कौन पढ़ सकता था
यदि आदेश नगरों और मार्गों के निकट शिलाओं पर उकेरे गए थे, तो क्या राहगीर उन्हें पढ़ने के लिए रुकते जब अधिकतर लोग शायद साक्षर नहीं थे? क्या पाटलिपुत्र में प्रयुक्त प्राकृत सब समझते थे? क्या आदेशों का पालन होता था? इन प्रश्नों के उत्तर आसान नहीं हैं।
शासन के आठ वर्ष बाद, देवानाम्पिय पियदस्सी ने कलिंगों को जीता। एक लाख पचास हज़ार लोग निर्वासित हुए, एक लाख मारे गए, और कई और मर गए। इसके बाद उसने धम्म के गहन अध्ययन, धम्म-प्रेम और लोगों को धम्म की शिक्षा देने में स्वयं को समर्पित कर दिया, और अभिलेख उसका पश्चाताप दर्ज करता है, इस नरसंहार, मृत्यु और निर्वासन को अत्यंत पीड़ादायक और शोचनीय बताते हुए।
पेचीदगी। अशोक के अभिलेख आज के उड़ीसा में मिले हैं, पर उसकी वेदना बताने वाला अभिलेख वहाँ अनुपस्थित है: जिस क्षेत्र को वास्तव में जीता गया, वहीं यह पश्चाताप दर्ज नहीं है। क्या वहाँ यह वेदना संबोधित करने के लिए बहुत पीड़ादायक थी? अध्याय इसका प्रयोग यह दिखाने के लिए करता है कि किसी अभिलेख को शब्दशः मान लेना कभी पर्याप्त नहीं है।
8 अभिलेखीय प्रमाणों की सीमाएँ
तकनीकी सीमाएँ
- अक्षर कभी-कभी बहुत हल्के उकेरे गए होते हैं, इसलिए पुनर्निर्माण अनिश्चित रहते हैं
- अभिलेख क्षतिग्रस्त हो सकते हैं या उनमें अक्षर लुप्त हो सकते हैं
- शब्दों का सटीक अर्थ हमेशा स्पष्ट नहीं होता, और कुछ किसी विशेष स्थान या समय से जुड़े होते हैं, इसलिए विद्वान लगातार वैकल्पिक वाचन पर बहस करते हैं
- अब तक खोजे गए कई हज़ार अभिलेखों में से सभी को समझा, प्रकाशित और अनूदित नहीं किया गया है, और इससे कहीं अधिक अभिलेख रहे होंगे जो बचे ही नहीं। जो हमारे पास है वह संभवतः उकेरे गए का केवल एक अंश है
गहरी सीमा
- जो राजनीतिक या आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण था, वह सब दर्ज ही नहीं हुआ
- दैनिक कृषि-प्रथाओं और रोज़मर्रा जीवन के सुख-दुख का कोई उल्लेख नहीं मिलता। अभिलेख भव्य, असाधारण घटनाओं पर केंद्रित हैं
- इनकी विषय-वस्तु लगभग हमेशा उसी का दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है जिसने इन्हें बनवाया, इसलिए इन्हें अन्य दृष्टिकोणों के साथ रखकर देखना ज़रूरी है
- इसलिए अकेले पुरालेखशास्त्र राजनीतिक और आर्थिक इतिहास की पूरी समझ नहीं दे सकता
NCERT अभ्यास का प्रश्न 7 डी.सी. सरकार को उद्धृत करता है: “भारतीयों के जीवन, संस्कृति और गतिविधियों का ऐसा कोई पहलू नहीं जो अभिलेखों में प्रतिबिंबित न हो।” अपेक्षित उत्तर संतुलित होना चाहिए। सहमत हों कि अभिलेख राजाओं, युद्धों, दान, भूमि, व्यवसायों, श्रेणियों और सिंचाई-कार्यों को समेटते हैं, फिर इस भाग का प्रयोग यह दिखाने के लिए करें कि वे क्या छोड़ देते हैं और किसका दृष्टिकोण वहन करते हैं।
इतिहासकारों की रुचियाँ भी बदली हैं, जिससे पुराने स्रोतों से क्या पूछा जाता है वह भी बदल गया है। उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के आरंभ के विद्वान मुख्यतः राजाओं में रुचि रखते थे। बीसवीं सदी के मध्य से, आर्थिक परिवर्तन और सामाजिक समूहों का उदय कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया। हाल के दशक हाशिए पर पड़े समूहों के इतिहास में तल्लीन हैं, जो संभवतः पुराने स्रोतों की नई जाँच और विश्लेषण की नई रणनीतियाँ लाएगा।
9 समयरेखा और पुनरावृत्ति
| समयरेखा 1 · प्रमुख राजनीतिक और आर्थिक विकास | |
|---|---|
| लगभग 600-500 ई.पू. | धान की रोपाई; गंगा घाटी में नगरीकरण; महाजनपद; आहत मुद्राएँ |
| लगभग 500-400 ई.पू. | मगध के शासक सत्ता सुदृढ़ करते हैं |
| लगभग 327-325 ई.पू. | मैसेडोनिया के सिकंदर का आक्रमण |
| लगभग 321 ई.पू. | चंद्रगुप्त मौर्य का राज्यारोहण |
| लगभग 272/268-231 ई.पू. | अशोक का शासनकाल |
| लगभग 185 ई.पू. | मौर्य साम्राज्य का अंत |
| लगभग 200-100 ई.पू. | उत्तर-पश्चिम में इंडो-ग्रीक शासन; दक्षिण भारत में चोल, चेर, पांड्य; दक्कन में सातवाहन |
| लगभग 100 ई.पू.-200 ई. | उत्तर-पश्चिम में शक शासक; रोमन व्यापार; स्वर्ण मुद्रा |
| लगभग 78 ई.? | कनिष्क का राज्यारोहण (तिथि अनिश्चित) |
| लगभग 100-200 ई. | सातवाहन और शक शासकों द्वारा भूमि-अनुदान का सबसे पुराना अभिलेखीय प्रमाण |
| लगभग 320 ई. | गुप्त शासन का आरंभ |
| लगभग 335-375 ई. | समुद्रगुप्त |
| लगभग 375-415 ई. | चंद्रगुप्त द्वितीय; दक्कन में वाकाटक |
| लगभग 500-600 ई. | कर्नाटक में चालुक्यों और तमिलनाडु में पल्लवों का उदय |
| लगभग 606-647 ई. | कन्नौज के राजा हर्षवर्धन; ह्वेनसांग बौद्ध ग्रंथों की खोज में आता है |
| लगभग 712 ई. | अरब सिंध को जीतते हैं |
| समयरेखा 2 · पुरालेखशास्त्र में प्रमुख प्रगति | |
|---|---|
| 1784 | एशियाटिक सोसाइटी (बंगाल) की स्थापना |
| 1810 का दशक | कॉलिन मैकेंज़ी संस्कृत और द्रविड़ भाषाओं के 8,000 से अधिक अभिलेख एकत्र करते हैं |
| 1838 | जेम्स प्रिंसेप द्वारा अशोक-ब्राह्मी का वाचन |
| 1877 | अलेक्ज़ेंडर कनिंघम अशोक के अभिलेखों का एक संग्रह प्रकाशित करते हैं |
| 1886 | दक्षिण भारतीय अभिलेखों की पत्रिका, एपिग्राफ़िया कर्नाटिका, का पहला अंक |
| 1888 | एपिग्राफ़िया इंडिका का पहला अंक |
| 1965-66 | डी.सी. सरकार “इंडियन एपिग्राफ़ी” और “इंडियन एपिग्राफ़िकल ग्लॉसरी” प्रकाशित करते हैं |
- 1830 के दशक में प्रिंसेप द्वारा ब्राह्मी और खरोष्ठी के वाचन ने आरंभिक भारतीय राजनीतिक इतिहास को पठनीय बनाया, और पियदस्सी को अशोक के रूप में पहचाना।
- छठी शताब्दी ई.पू. तक सोलह महाजनपद; अधिकतर राजतंत्र थे, कुछ गण या संघ थे जिन पर कई राजा शासन करते थे।
- मगध उपजाऊ कृषि, लोहे, हाथियों और गंगा के कारण, या महत्वाकांक्षी राजाओं के कारण जीता: यह इस पर निर्भर है कि आप कौन-सा स्रोत मानते हैं।
- मौर्य साम्राज्य के पाँच राजनीतिक केंद्र थे और कोई एक समान प्रशासन नहीं था; अशोक ने इसे धम्म और धम्म महामात्तों से जोड़े रखा।
- यह केवल लगभग 150 वर्ष चला और कभी पूरे उपमहाद्वीप को नहीं ढका, इसलिए इसका महत्व सावधानी से बताना चाहिए।
- मुखिया भेंट प्राप्त करते और पुनर्वितरित करते थे; राजा कर वसूलते थे। यही अंतर संगम और शिलप्पदिकारम स्रोत दिखाते हैं।
- कुषाणों ने विशाल मूर्तियों और देवपुत्र उपाधि से दिव्यता का दावा किया; गुप्तों की प्रशस्तियों में, जैसे प्रयाग प्रशस्ति में, प्रशंसा की गई।
- लोहे के हल-फल, रोपाई और सिंचाई से ग्रामीण जीवन बदला, पर असमान रूप से, जिससे गृहपति, वेल्लाळर, उळवर और अडिमई जैसे वर्ग बने।
- भूमि-अनुदान या तो कृषि-विस्तार के प्रमाण के रूप में पढ़े जाते हैं या राजाओं के सामंतों पर नियंत्रण खोने के प्रमाण के रूप में।
- नगरों में श्रेणियाँ और नामित व्यवसायों की लंबी सूची थी; व्यापार रोम तक पहुँचता था, और दक्षिण भारत में रोमन सिक्कों के भंडार सिद्ध करते हैं कि व्यापार राजनीतिक सीमाएँ पार करता था।
- अभिलेख शक्तिशाली पर आंशिक हैं: वे बनवाने वाले के दृष्टिकोण से भव्य घटनाएँ दर्ज करते हैं, और सामान्य जीवन को पूरी तरह छोड़ देते हैं।
- 1 अंकपुरालेखशास्त्र (epigraphy) क्या है?
- 1 अंकब्राह्मी और खरोष्ठी को किसने और किस दशक में समझा?
- 1 अंकजनपद शब्द का क्या अर्थ है?
- 1 अंकमौर्य साम्राज्य के पाँच प्रमुख राजनीतिक केंद्रों के नाम लिखिए।
- 1 अंकअग्रहार क्या है?
- 1 अंकप्रयाग प्रशस्ति की रचना किसने की, और किस शासक के बारे में?
- 2 अंकगण या संघ क्या थे, और इनसे जुड़े दो प्रसिद्ध पुरुषों के नाम बताइए।
- 2 अंकगृहपति को परिभाषित कीजिए।
- 2 अंकश्रेणियाँ क्या थीं, और वे क्या करती थीं?
- 2 अंकरोपाई (transplantation) क्या है, और इसने धान की उपज कैसे बढ़ाई?
- 2 अंकखरोष्ठी कैसे समझी गई?
- 3 अंकमहाजनपदों की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
- 3 अंकमगध सबसे शक्तिशाली महाजनपद क्यों बना? इतिहासकारों और आरंभिक लेखकों, दोनों की व्याख्याएँ दीजिए।
- 3 अंकअशोक का धम्म क्या था, और उसने इसे फैलाने का प्रयास कैसे किया?
- 3 अंकशिलप्पदिकारम की भेंट-सूची का प्रयोग करते हुए मुखिया और राजा में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- 3 अंकइतिहासकार इस काल के आम लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण कैसे करते हैं?
- 3 अंकसुदर्शन झील अभिलेख हमें शासकों और सिंचाई के बारे में क्या बताता है?
- 3 अंकपुरालेखविदों के सामने आने वाली कुछ समस्याओं की सूची बनाइए।
- 3 अंकदक्षिण भारत और रोमन साम्राज्य के बीच दूर-व्यापार के क्या प्रमाण हैं?
- 5 अंकमौर्य प्रशासन की मुख्य विशेषताओं की चर्चा कीजिए। आपके द्वारा पढ़े गए अशोक अभिलेखों में इनमें से कौन-सी स्पष्ट हैं?
- 5 अंक“मौर्य साम्राज्य कितना महत्वपूर्ण था?” इस प्रश्न के दोनों पक्षों की जाँच कीजिए।
- 5 अंकमौर्योत्तर काल में विकसित हुई राजसत्ता की अवधारणाओं की चर्चा कीजिए।
- 5 अंकलगभग 600 ई.पू. से 600 ई. की अवधि में कृषि-प्रथाएँ कितनी बदलीं?
- 5 अंकभूमि-अनुदान राजसत्ता के बारे में क्या बताते हैं, इस पर इतिहासकारों की बहस स्पष्ट कीजिए।
- 5 अंकआरंभिक ऐतिहासिक नगरों में शिल्प-उत्पादन के प्रमाणों की चर्चा कीजिए। यह हड़प्पाई नगरों के प्रमाणों से कैसे भिन्न है?
- 5 अंकडी.सी. सरकार ने लिखा कि “भारतीयों के जीवन, संस्कृति और गतिविधियों का ऐसा कोई पहलू नहीं जो अभिलेखों में प्रतिबिंबित न हो।” चर्चा कीजिए।
- 5 अंकपांड्य मुखिया को दी गई वस्तुओं की सूची की तुलना दंगुण गाँव में उत्पादित वस्तुओं से कीजिए। आपको क्या समानताएँ और अंतर दिखते हैं?
- 5 अंकभारत के रेखा-मानचित्र पर तक्षशिला, उज्जयिनी, पाटलिपुत्र, राजगीर, मथुरा, कौशाम्बी, श्रावस्ती, गिरनार और साँची को चिह्नित व नामांकित कीजिए।
- 1 अंकअधिकतर आरंभिक अभिलेखों में मिलने वाले “पियदस्सी” नाम का अर्थ है:
(a) देवताओं का प्रिय(b) देखने में सुंदर(c) ईश्वर का पुत्र(d) राजाओं का राजा - 1 अंकउपमहाद्वीप के सबसे पुराने अभिलेख किस भाषा में लिखे गए थे?
(a) संस्कृत(b) प्राकृत(c) पालि(d) तमिल - 1 अंकसुवर्णगिरि संभवतः किस कारण महत्वपूर्ण था?
(a) निकट की लौह खदानें(b) निकट की स्वर्ण खदानें(c) बंदरगाह(d) हाथी-वन - 1 अंकदेवपुत्र उपाधि किस वंश के कई शासकों ने अपनाई?
(a) मौर्य(b) गुप्त(c) कुषाण(d) सातवाहन - 1 अंकशासकों के नाम और चित्र वाले पहले सिक्के किसने जारी किए?
(a) इंडो-ग्रीक(b) कुषाण(c) यौधेय(d) गुप्त - 1 अंकअशोक-ब्राह्मी कब समझी गई?
(a) 1784(b) 1838(c) 1877(d) 1888 - 1 अंकसंगम साहित्य में “उळवर” का अर्थ है:
(a) बड़े भूस्वामी(b) हलवाहक(c) दास(d) व्यापारी
चुनिए: (a) अभिकथन और कारण दोनों सही हैं तथा कारण, अभिकथन की सही व्याख्या करता है; (b) दोनों सही हैं पर कारण, अभिकथन की सही व्याख्या नहीं करता; (c) अभिकथन सही है, कारण ग़लत है; (d) अभिकथन ग़लत है, कारण सही है।
कारण (R): साम्राज्य के भीतर के क्षेत्र, पहाड़ी अफ़ग़ानिस्तान से तटीय उड़ीसा तक, बहुत अधिक विविध थे।
कारण (R): इन्हें दरबारी कवियों ने रचा था और इन्हें काव्य-रचना के रूप में सँजोया जाता था।
कारण (R): दक्षिण भारत में रोमन सिक्कों के भंडार मिले हैं, जो कभी रोमन साम्राज्य का हिस्सा नहीं था।