1मंगोलों के बारे में हमें कैसे पता चलता है
1.1 दूसरों की नज़र से लिखा गया इतिहास
चंगेज़ खान से मिलने से पहले एक अलग तरह का सवाल पूछना ज़रूरी है: इतिहासकारों को उसके बारे में पता ही कैसे चला? मंगोल लोग स्टेपी पर रहते थे, यानी मध्य एशिया के विशाल, समतल, घास के मैदानों में, और अपने झुंडों के साथ लगातार घूमते रहते थे, इसलिए उन्होंने ख़ुद लगभग कुछ नहीं लिखा। मंगोल समाज के बारे में जो कुछ भी हमें पता है, वह ज़्यादातर साहित्यकारों के इतिवृत्तों, यात्रा-वृत्तांतों और दस्तावेज़ों से आता है: यानी नगरों में रहने वाले पढ़े-लिखे लेखकों से, जो ख़ुद मंगोल नहीं थे।
इनमें से कई लेखक मंगोलों के प्रति शत्रुतापूर्ण थे या यायावर जीवन को समझते ही नहीं थे। लेकिन मंगोलों की साम्राज्यिक सफलता ने हर तरह के पढ़े-लिखे लोगों को आकर्षित किया: बौद्ध, कन्फ़्यूशियसवादी, ईसाई, तुर्की और मुस्लिम पृष्ठभूमि के लोग, कुछ बस गुज़रते हुए, कुछ मंगोल शासकों की सेवा में रुककर। मंगोल रीति-रिवाजों से पूरी तरह परिचित न होते हुए भी, कई ने सहानुभूतिपूर्ण विवरण लिखे, कुछ तो प्रशंसा से भरे हुए, आम “नगरवासी बनाम बर्बर” वाली शत्रुतापूर्ण कहानी के साथ-साथ।
यह मत लिखिए कि “बर्बर” शब्द मंगोलों ने ख़ुद कमाया था। यह एक बहुत पुराना यूनानी शब्द है, barbaros, जो शुरू में हर उस व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होता था जो यूनानी नहीं था और जिसकी भाषा बेमतलब शोर जैसी लगती थी, “बर-बर”। बाद में रोमनों ने यही रूढ़ि जर्मन कबीलों, गॉल और हूणों के लिए दोहराई, और चीनियों के अपने अलग, उतने ही नकारात्मक शब्द स्टेपी के लोगों के लिए थे। यह एक ऐसा लेबल है जो बसे हुए, यानी नगर-आधारित समाजों ने यायावरों पर चस्पाँ किया: मंगोलों के अस्तित्व में आने से सदियों पहले से।
1.2 मंगोलों का गुप्त इतिहास, और आधुनिक शोध
चंगेज़ खान पर सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती वृत्तांत वह रचना है जिसका मूल मंगोल नाम, रोमन लिपि में लगभग Mongqol-un niuca tobcian लिखा जाता है: अंग्रेज़ी में इसे बस “गुप्त इतिहास” (Secret History) कहा जाता है।
मंगोलों का गुप्त इतिहास चंगेज़ खान के जीवन का सबसे पुराना बचा हुआ वृत्तांत है, जो उसकी मृत्यु के तुरंत बाद रचा गया। इसके अपने मंगोल और चीनी संस्करण भी आपस में पूरी तरह मेल नहीं खाते: यह याद दिलाता है कि कोई एक “मूल” पाठ बिना बदले नहीं बचा।

मंगोल साम्राज्य कई महाद्वीपों में फैला था, इसलिए इसके स्रोत भी बहुत सारी भाषाओं में मिलते हैं: चीनी, मंगोल, फ़ारसी और अरबी सबसे महत्वपूर्ण हैं, पर इतालवी, लातिन, फ्रांसीसी और रूसी में भी सामग्री है। अक्सर एक ही घटना का वर्णन दो भाषाओं में एकदम अलग-अलग मिलता है: यहाँ तक कि मार्को पोलो के मंगोल दरबार तक की यात्रा के इतालवी और लातिन विवरण भी आपस में मेल नहीं खाते। इसीलिए मंगोलों का अध्ययन करने वाले इतिहासकारों को अक्सर भाषाविद् की तरह भी काम करना पड़ता है, शब्दों की बारीक़ी से तुलना करते हुए: जैसे इगोर दे राशेविल्त्स ने गुप्त इतिहास पर, और गेरहार्ड डोएर्फ़र ने फ़ारसी में घुले मंगोल और तुर्की शब्दों पर किया।
सबसे मूल्यवान आधुनिक शोध रूस से आया। अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी में, ज़ारशाही यात्रियों, सैनिकों, व्यापारियों और इतिहास-प्रेमी विद्वानों ने, जैसे-जैसे रूसी साम्राज्य मध्य एशिया में फैला, विस्तृत सर्वेक्षण-टिप्पणियाँ लिखीं। बीसवीं सदी की शुरुआत में, रूसी क्रांति के बाद, सोवियत इतिहासकारों ने मंगोल इतिहास को अपने आर्थिक-विकास के सिद्धांत में फिट करने की कोशिश की: यह तर्क देते हुए कि मंगोल समाज पुरानी “कबीलाई” व्यवस्था से “सामंती” व्यवस्था की ओर बढ़ रहा था, जिसमें एक सामंत ज़मीन का मालिक होता और किसान उसके लिए काम करते। इस कठोर, सिद्धांत-पहले वाले नज़रिए के बावजूद, बोरिस याकोवलेविच व्लादिमिरत्सोव जैसे विद्वानों ने मंगोल भाषा, समाज और संस्कृति पर उत्कृष्ट शोध किया।
एक और सोवियत विद्वान, वासिली व्लादिमिरोविच बार्थोल्ड, ने चंगेज़ खान के जीवन का सहानुभूतिपूर्ण, सकारात्मक मूल्यांकन लिखा: इससे उन्हें स्तालिनकालीन सेंसरों से असली परेशानी हुई, जिन्हें डर था कि यह मध्य एशिया में क्षेत्रीय राष्ट्रवाद को बढ़ावा दे सकता है। दशकों तक उनका काम बहुत सीमित रहा, और वह पूरा नौ खंडों में तभी प्रकाशित हो पाया जब स्तालिन की मृत्यु के बाद, 1960 के दशक के अधिक उदार ख्रुश्चेव-युग का समय आया।
2चंगेज़ खान का विश्व-साम्राज्य
2.1 स्वर्ग से मिला अधिकार
“यायावर साम्राज्य” शीर्षक विरोधाभासी लग सकता है। यायावरों की आम छवि है: घुमक्कड़ लोग, जिनमें परिवारों के बीच धन या भूमिका का कोई बड़ा फ़र्क़ नहीं होता, और राजनीतिक संगठन के नाम पर बहुत कम कुछ होता है: जबकि “साम्राज्य” शब्द ठीक इसके उलट संकेत देता है: एक स्थिर जगह, जटिल सामाजिक-आर्थिक ढाँचा, और एक विशाल क्षेत्र को चलाने की सुव्यवस्थित प्रणाली। किसी असली यायावर साम्राज्य का गहराई से अध्ययन करने पर यह दिखता है कि यह विरोधाभास टिकता ही नहीं। इस किताब के अध्याय 4 में एक ऐसे ही यायावर समूह, अरब-प्रायद्वीप के बद्दू, का अध्ययन हो चुका है, जिन्होंने इस्लामी दुनिया में अपने राज्य बनाए; यहाँ हम एक बिल्कुल अलग यायावर समूह, मध्य एशिया के मंगोलों, को देखेंगे।
तेरहवीं सदी के शुरुआती दशकों तक, यूरोप और एशिया के बड़े साम्राज्यों के पास डरने की पूरी वजह थी: मध्य एशिया की स्टेपी में एक नई शक्ति उभर रही थी: चंगेज़ खान, जिसकी मृत्यु 1227 में हुई, ने मंगोल लोगों को एकजुट कर लिया था। पर उसकी महत्वाकांक्षा मंगोल कबीलों के संघ (यानी मिलकर काम करने वाले कबीलों के गठबंधन) के नेतृत्व से कहीं आगे थी: उसे सचमुच विश्वास था कि पूरी दुनिया पर शासन करने का ईश्वर-प्रदत्त अधिकार उसे मिला है।

उसके पौत्र मोंके (1251-60) ने इसी विश्वास को फ्रांस के राजा लुई नवम् (1226-70) को दी एक चौंकाने वाली आत्मविश्वास-भरी चेतावनी में शब्द दिए: “स्वर्ग में केवल एक शाश्वत आकाश है, धरती पर केवल एक स्वामी: चंगेज़ खान, स्वर्ग का पुत्र… अगर तुम हमारे विरुद्ध सेना लाते हो, तो हम जानते हैं क्या करना है।” ये ख़ाली धमकियाँ नहीं थीं। बातू, एक और पौत्र, ने 1236 से 1241 तक ऐसे अभियान चलाए जिन्होंने रूसी भूमि को मॉस्को तक तबाह किया, पोलैंड और हंगरी पर कब्ज़ा किया, और वियना के फाटकों के बाहर डेरा डाला। चीन, मध्य-पूर्व और यूरोप के बहुत से लोगों को सचमुच लगा कि “शाश्वत आकाश” मंगोलों के साथ है, और चंगेज़ खान की विजयें ईश्वर के प्रकोप से कम कुछ नहीं हैं।
2.2 बुखारा पर कब्ज़ा
1220 में बुखारा के पतन के बाद, फ़ारसी इतिहासकार जुवैनी ने चंगेज़ खान के नगर के धनी निवासियों को कहे शब्द दर्ज किए: “हे लोगो, जान लो कि तुमने बड़े पाप किए हैं… अगर तुम पूछो कि मेरे पास इसका क्या प्रमाण है, तो मैं कहता हूँ कि मैं स्वयं ईश्वर का दंड हूँ।” एक व्यक्ति, जो बुखारा की तबाही और लूट से बचकर भागा था, से बाद में पूछा गया कि नगर का क्या हुआ। उसका पूरा जवाब था: “वे आए, उन्होंने [दीवारों के नीचे सुरंग खोदी], जलाया, मारा, लूटा और चले गए।”
जुवैनी के बुखारा-पतन (1220) के वृत्तांत से
ये दोनों आवाज़ें: विजेता का अपना आत्म-न्यायीकरण, और एक बचे हुए व्यक्ति का थका हुआ, संक्षिप्त उत्तर: सबसे बड़े सवाल को सामने लाती हैं: मंगोलों ने, इतने छोटे और बिखरे हुए समाज से शुरू करके, सिकंदर की विजयों से भी बड़ा साम्राज्य कैसे बनाया, और अपने ईश्वर-प्रदत्त अधिकार पर इतना भरोसा रखने वाला व्यक्ति इतने अलग-अलग लोगों और धर्मों पर शासन कैसे करता था?
3मंगोलों की सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि
3.1 स्टेपी के पशुचारक और शिकारी-संग्राहक
मंगोल कोई एक जैसे, एकसमान लोग नहीं थे: यह एक विविध समूह था, जो पूर्व में तातार, खिताई और मंचू, और पश्चिम में तुर्की कबीलों से भाषाई नज़दीकी रखता था। कुछ मंगोल पशुचारक थे, जो घोड़े, भेड़ और थोड़ा-बहुत गाय, बकरी, ऊँट पालते थे, और आज के मंगोलिया के विशाल घास के मैदानों में घूमते थे: एक भव्य भूभाग, चौड़े क्षितिज, लहराते मैदान, पश्चिम में बर्फ़ से ढके अल्ताई पर्वत, दक्षिण में सूखा गोबी मरुस्थल, और ओनोन तथा सेलेंगा नदियों तथा अनगिनत पहाड़ी झरनों से सिंचित।
गेर वह पोर्टेबल, खाल से ढका तंबू था जिसमें मंगोल रहते थे, अपने झुंडों के साथ शीत और ग्रीष्म चरागाहों के बीच घूमते हुए। न तो पशुचारक और न ही शिकारी-संग्राहक अर्थव्यवस्था घनी, स्थायी बस्ती को सहारा दे सकती थी, इसलिए इस क्षेत्र में अपने नगर नहीं थे।
शिकारी-संग्राहकों का एक अलग, विनम्र समूह और उत्तर में, साइबेरियाई जंगलों में रहता था, गर्मियों में पकड़े जानवरों की खाल बेचकर गुज़ारा करता था। पूरे क्षेत्र में तापमान की अति थी: लंबी, कठोर सर्दियाँ, उसके बाद छोटी, सूखी गर्मियाँ; पशुचारक इलाक़ों में थोड़ी खेती संभव थी, पर पश्चिम के कुछ तुर्कों के विपरीत, मंगोलों ने खेती को कभी वास्तव में नहीं अपनाया।
3.2 वंशावलियाँ, संघ और एक सतर्क पड़ोसी
मंगोल समाज पितृवंशीय वंशावलियों में बँटा था: यानी पिता की ओर से चली परिवार-रेखाएँ, एक साझा पुरुष पूर्वज तक जाती हुई। धनी परिवार, जिनके पास ज़्यादा पशु और बेहतर चरागाह होते, ज़्यादा अनुयायी जुटाते और स्थानीय राजनीति में ज़्यादा प्रभावशाली होते। पर संसाधन हमेशा दुर्लभ थे: कोई कठोर सर्दी या बुरा सूखा पूरे परिवारों को दूर तक चारा खोजने पर मजबूर कर देता, जिससे चरागाह को लेकर विवाद और पशु-लूट के लिए छापे होते। परिवारों के समूह कभी-कभी किसी शक्तिशाली वंश के इर्द-गिर्द आक्रमण या बचाव के लिए इकट्ठे होते, पर कुछ अपवादों को छोड़कर, ये संघ छोटे और अल्पजीवी ही रहते।
परीक्षा के लिए एक उपयोगी तुलना: चंगेज़ खान के मंगोल-तुर्की संघ जैसा आकार पहले सिर्फ़ पाँचवीं सदी में अट्टीला के संघ का था, जिसकी मृत्यु 453 में हुई थी: जो हूणों का प्रसिद्ध शासक था। मुख्य फ़र्क़ है टिकाऊपन का: अट्टीला का संघ उसकी मृत्यु के साथ ही टूट गया, जबकि चंगेज़ खान की व्यवस्था इतनी मज़बूत थी कि वह अपने संस्थापक के बाद भी टिकी रही और चीन, ईरान तथा पूर्वी यूरोप की बड़ी, बेहतर हथियारों वाली सेनाओं को भी हरा सकी।
| स्टेपी संघ | लगभग समय | मुख्यतः किस समूह के लोग |
|---|---|---|
| हिउंग-नु | 200 ई.पू. | तुर्क |
| जुआन-जुआन | 400 ई. | मंगोल |
| एप्थलाइट हूण | 400 ई. | मंगोल |
| तुर्क-चुएह | 550 ई. | तुर्क |
| उइग़ुर | 740 ई. | तुर्क |
| खिताई | 940 ई. | मंगोल |
ये संघ सब एक ही क्षेत्र पर शासन नहीं करते थे, और सब बराबर बड़े या जटिल भी नहीं थे: पर इन सबका यायावर दुनिया पर, और असमान रूप से चीन तथा उसके पड़ोसियों पर, वास्तविक प्रभाव पड़ा। स्टेपी के दुर्लभ संसाधनों ने मंगोलों को बसे हुए चीन के साथ लगातार व्यापार करने पर मजबूर किया: कृषि उपज और लोहे के बर्तनों के बदले मंगोल घोड़े, खाल और शिकार: यह व्यापार दोनों के लिए फ़ायदेमंद था, पर कभी पूरी तरह शांतिपूर्ण नहीं। जिस पक्ष का पलड़ा भारी होता, वह बेहतर शर्तों के लिए दबाव डालता, और जब मंगोल कबीले एकजुट होते, तो अक्सर व्यापार की जगह सीधी लूट ले लेती।
इस ख़तरे का चीन का दीर्घकालीन जवाब था किलेबंदी। स्टेपी छापों से बचाव के लिए दीवारें आठवीं सदी ई.पू. जितनी पुरानी हैं, और तीसरी सदी ई.पू. से इन बिखरी दीवारों को धीरे-धीरे एक ही, निरंतर रक्षा-रेखा में जोड़ा गया: वही ढाँचा जिसे आज हम चीन की महान दीवार कहते हैं, जो उत्तरी चीन में यायावर छापों से हुए डर और उथल-पुथल का एक जीता-जागता प्रमाण है।
4चंगेज़ खान का जीवन-वृत्त
4.1 तेमुजिन से सार्वभौम शासक तक
जिस व्यक्ति को दुनिया चंगेज़ खान के नाम से जानेगी, उसका जन्म आज के उत्तरी मंगोलिया में ओनोन नदी के पास हुआ। NCERT के अपने पाठ में इसकी दो अलग-अलग तारीख़ें मिलती हैं: चलती हुई गद्य में लगभग 1162, और अपनी ही समय-सारणी में लगभग 1167: इसलिए किसी भी प्रश्न में दोनों में से कोई भी तारीख़ आ सकती है, चौंकिएगा मत।
उसका नाम रखा गया तेमुजिन, वह येसुगेई का बेटा था, जो कियात का मुखिया था: बोरजिगिद कुल से जुड़े परिवारों का एक समूह। कम उम्र में ही उसके पिता की हत्या कर दी गई, और उसकी माँ ओएलुन-एके ने उसे और उसके भाइयों को बड़ी कठिनाई में पाला। इसके बाद के वर्षों में और भी झटके आए: तेमुजिन को बंदी बनाकर ग़ुलाम बना लिया गया, और शादी के तुरंत बाद उसकी पत्नी बोर्ते का अपहरण हो गया, जिसे वापस पाने के लिए उसे लड़ना पड़ा।
इन्हीं मुश्किल सालों में तेमुजिन ने वे गठबंधन बनाए जिन्होंने उसके उत्थान की नींव रखी: बोघूरचू उसका पहला, आजीवन विश्वसनीय साथी बना; जमूका, उसका ख़ून का भाई (अंडा), एक और था, हालाँकि यह दोस्ती बाद में कड़वी दुश्मनी में बदल गई; और उसने ओंग खान, जिसे तुगरिल भी कहा जाता था, केरेयितों के शासक और अपने पिता के पुराने रक्त-बंधु, के साथ पुराना गठबंधन फिर से जोड़ा। 1180 और 1190 के दशकों में, तेमुजिन ओंग खान का साथी बना रहा और इसी गठबंधन का इस्तेमाल करके उसने जमूका को हराया, और फिर, पूरी तरह आश्वस्त होकर, बारी-बारी अपने बाक़ी प्रतिद्वंद्वियों पर हमला किया: तातार (जिन्होंने उसके पिता की हत्या की थी), केरेयित और स्वयं ओंग खान 1203 तक, और अंततः नाइमान लोग तथा जमूका फिर से, 1206 में।
कुरिलताई मंगोल सरदारों की एक सभा थी, जो अभियान, लूट का बँटवारा, चरागाह-भूमि और उत्तराधिकार जैसे सामूहिक फ़ैसले लेने के लिए बुलाई जाती थी। 1206 के इसी कुरिलताई में तेमुजिन को “मंगोलों का महान खान” (क़ान) घोषित किया गया, और उसे उपाधि मिली चंगेज़ खान, यानी “सागर जैसा खान” या “सार्वभौम शासक”।
इस कुरिलताई से ठीक पहले, चंगेज़ खान मंगोलों को पहले से ही एक कहीं ज़्यादा अनुशासित सैन्य शक्ति में बदल चुका था (देखें भाग 5), जो आगे के हर अभियान की नींव बनी।
4.2 चीन और मध्य एशिया की विजय
चंगेज़ खान का पहला बड़ा लक्ष्य चीन था, जो उस समय तीन अलग हिस्सों में बँटा था: उत्तर-पश्चिम में तिब्बती मूल का हिसि हिसिया, उत्तर में पेकिंग से शासन करने वाला जुर्चेन-वंश का चिन राज्य, और दक्षिण पर नियंत्रण रखने वाला सुंग वंश। हिसि हिसिया 1209 तक पराजित हो चुका था; महान दीवार ख़ुद 1213 में तोड़ी गई और पेकिंग 1215 में लूटा गया। चिन के विरुद्ध लड़ाई 1234 तक खिंचती रही, पर चंगेज़ खान इससे इतना संतुष्ट था कि वह 1216 में ही मंगोलिया लौट गया, बाक़ी अभियान अपने अधीनस्थों पर छोड़कर।
1218 में क़ारा खिता को हराने के बाद: जो चीन के उत्तर-पश्चिम में तिएन शान पर्वतों पर नियंत्रण रखते थे: मंगोल शक्ति आमू दरिया नदी और ट्रांसओक्सिआना (आमू दरिया और सिर दरिया नदियों के बीच का उपजाऊ क्षेत्र, आज के उज़्बेकिस्तान-ताजिकिस्तान में) तथा ख़्वारज़्म की सीमाओं तक पहुँच गई। जब ख़्वारज़्म के शासक सुल्तान मुहम्मद ने मंगोल दूतों को मरवा दिया, तो 1219 और 1221 के बीच चंगेज़ खान का जवाब भयानक था: ओष्ट्रार, बुखारा, समरक़ंद, बल्ख, गुरगंज, मर्व, निशापुर और हिरात जैसे बड़े नगरों ने आत्मसमर्पण कर दिया, जबकि जिन नगरों ने विरोध किया, वे पूरी तरह तबाह कर दिए गए। निशापुर में, घेराबंदी के दौरान एक मंगोल राजकुमार की मौत के बाद, चंगेज़ खान ने आदेश दिया कि नगर को “इस तरह उजाड़ दिया जाए कि उस जगह पर हल चलाया जा सके”, और उसके अपने इतिहासकारों के शब्दों में, “न बिल्ली, न कुत्ता जीवित बचे।”
नीचे दिए मौत के आँकड़ों को आधुनिक जनगणना जैसा सटीक मानकर मत लिखिए। NCERT का अपना पाठ ख़ुद दिखाता है कि ये आँकड़े कैसे निकाले गए: जुवैनी ख़ुद बताता है कि मर्व में 13,00,000 का आँकड़ा इसलिए निकला क्योंकि शव गिनने में तेरह दिन लगे, और हर दिन कथित रूप से 1,00,000 शव गिने गए। ये इतिहासकारों के अनुमान हैं, जनगणना नहीं, और NCERT के अपने अभ्यास-प्रश्न ख़ासतौर पर यही पूछते हैं कि ऐसे आँकड़े इतने बढ़ा-चढ़ाकर क्यों बताए गए।
छोटे नगर भी इसी बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए परंपरा के अनुसार भुगतते रहे: नासा में 70,000 मृत, बैहक़ ज़िले में एक और 70,000, और कुहिस्तान प्रांत के तून में 12,000 लोगों को मार डाला गया।
मंगोल सेनाएँ सुल्तान मुहम्मद का पीछा करती हुई अज़रबैजान तक गईं, क्रीमिया में रूसी सेनाओं को हराया, और कैस्पियन सागर को घेर लिया, जबकि दूसरी टुकड़ी उसके बेटे जलालुद्दीन का पीछा करती हुई अफ़गानिस्तान और सिंध तक गई। सिंधु नदी के तट पर चंगेज़ खान ने उत्तर भारत और असम होकर मंगोलिया लौटने पर भी विचार किया, पर गर्मी, अनजाना भूभाग, और उसके शमन (आत्माओं की दुनिया के संकेत पढ़ने वाला पुरोहित) द्वारा बताए गए अपशकुनों ने उसका इरादा बदल दिया।
4.3 मृत्यु, सैन्य पद्धति, और पश्चिमी विस्तार की सीमा
चंगेज़ खान की मृत्यु 1227 में हुई, अपने वयस्क जीवन का ज़्यादातर हिस्सा सैन्य अभियानों में बिताकर। उसकी असाधारण सफलता का राज़ था: स्टेपी के जाने-पहचाने कौशलों को घातक नई रणनीतियों में बदल देना: कुशल घुड़सवारी ने मंगोल सेना को गति और गतिशीलता दी, नियमित शिकार-अभियानों से निखरी तेज़ घुड़सवार तीरंदाज़ी ने उसे मारक क्षमता दी, और सर्दियों की गहराई में भी अभियान चलाने की तत्परता, जमी हुई नदियों को राजमार्ग की तरह इस्तेमाल करते हुए, उसे आश्चर्य का तत्व देती थी। चंगेज़ खान ने घेराबंदी यंत्रों और नाफ़्था (आग लगाने वाला, तेल-आधारित एक शुरुआती हथियार) की बमबारी का इस्तेमाल भी जल्दी सीख लिया, अपने इंजीनियरों को हल्के, आसानी से ले जाने योग्य उपकरणों से लैस करके, जो उन क़िलेबंद नगरों को भी तोड़ देते थे जिनसे यायावर परंपरागत रूप से जूझते थे।
चंगेज़ खान की मृत्यु के बाद मंगोल विस्तार दो अलग चरणों में हुआ: पहला, 1236-42, जिसमें रूसी स्टेपी, बुल्गार, कीव, पोलैंड और हंगरी में बड़ी जीत मिली; दूसरा, 1255-1300, जिसमें संपूर्ण चीन (1279) की विजय पूरी हुई, और ईरान, इराक़ तथा सीरिया भी जोड़े गए, जिसके बाद सीमा आख़िरकार स्थिर हो गई।
वियना, और उससे आगे पश्चिमी यूरोप, साथ ही मिस्र भी, वाक़ई मंगोलों की पहुँच में थे। पर 1260 के दशक के बाद पश्चिम की ओर बढ़ने की मूल गति बनी नहीं रह सकी: हंगरी की स्टेपी से मंगोलों का पीछे हटना और मिस्री सेना से उनकी हार एक असली मोड़ था। इसकी तीन वजहें हैं: चंगेज़ खान के बेटे जोची और ओगोदेई के वंशजों को अपने ही परिवार की उत्तराधिकार-राजनीति दूर यूरोप के अभियानों से ज़्यादा महत्वपूर्ण लगी; उसके सबसे छोटे बेटे तोलुई से उतरी उभरती शाखा ने 1260 के दशक में अपने संसाधन चीन-विजय में झोंक दिए, जिससे मिस्र के विरुद्ध भेजी गई सेना छोटी और कमज़ोर रह गई; और अलग से, जोची और तोलुई के वंशजों के बीच रूस-ईरान सीमा पर चलते संघर्ष ने भी जोची की शाखा का ध्यान आगे के यूरोपीय अभियानों से हटाए रखा। (भाग 5 में आगे बताया गया है कि चंगेज़ खान ने अपना साम्राज्य इन्हीं चार बेटों में कैसे बाँटा था।)
5सामाजिक, राजनीतिक और सैन्य संगठन
5.1 दशमलव सेना और एक नया कुलीन वर्ग
मंगोलों में, जैसे कई और यायावर समाजों में भी, कबीले का हर सक्षम वयस्क पुरुष हथियार उठाता था: ज़रूरत पड़ने पर वे सब मिलकर ही सेना बन जाते थे। जैसे-जैसे चंगेज़ खान ने अलग-अलग मंगोल कबीलों को एकजुट किया और नए विजित लोगों को अपनी सेना में शामिल किया, यह पहले का छोटा, काफ़ी एक-जैसा समूह एक असाधारण रूप से मिली-जुली सेना में बदल गया: इसमें तुर्की उइग़ुर जैसे लोग भी थे, जो स्वेच्छा से शामिल हुए, और केरेयित जैसे पराजित लोग भी, जिन्हें उनकी पहले की दुश्मनी के बावजूद अपना लिया गया।
चंगेज़ खान ने अपनी सेना को पुरानी स्टेपी दशमलव प्रणाली पर संगठित किया: 10, 100, 1,000 और, कम से कम काग़ज़ पर, 10,000 सैनिकों की इकाइयाँ, हालाँकि किसी इकाई में पूरी संख्या शायद ही कभी होती थी; 10,000 सैनिकों की इकाई को तुमन कहा जाता था। पुरानी व्यवस्था के विपरीत, जहाँ कबीला और कुल इन्हीं इकाइयों के भीतर साथ-साथ रहते थे, उसने जान-बूझकर पुराने कबीलाई समूहों को तोड़ा और उनके सदस्यों को नई, मिली-जुली इकाइयों में बाँट दिया: बिना अनुमति अपने तय समूह से हटने की कोशिश करने वाले को कठोर दंड मिलता था।
यह नई सेना चंगेज़ खान के चार बेटों और ख़ास तौर पर चुने गए सेनापतियों, नोयान, के अधीन काम करती थी। इनके साथ एक नया कुलीन वर्ग भी खड़ा हुआ, जो पुराने कबीलाई दर्जे पर नहीं, बल्कि चंगेज़ खान के प्रति निजी निष्ठा पर टिका था: कुछ लंबे समय से साथ रहे अनुयायियों को सार्वजनिक रूप से उसका “ख़ून का भाई” (अंडा) कहकर सम्मानित किया गया, जबकि साधारण मूल के कुछ स्वतंत्र लोगों को उसका बंधुआ सेवक (नौकर), एक व्यक्तिगत सेवक जो अपने स्वामी से गहराई से जुड़ा हो, का ख़ास दर्जा मिला। दोनों ही तरह से, अब दर्जा वंश से नहीं, बल्कि महान खान से नज़दीकी से तय होता था।
5.2 चार उलुस, और साम्राज्य की मशीनरी
चंगेज़ खान ने अपनी विजयों पर शासन की ज़िम्मेदारी अपने चार बेटों में बाँट दी, हिस्सों को उलुस कहा गया। सबसे ज़रूरी बात, उसके अपने जीवनकाल में उलुस अभी कोई तय भूभाग नहीं था: विजय जारी रहने के साथ सीमाएँ अभी तरल ही थीं।
जोची (सबसे बड़ा)
उसे रूसी स्टेपी मिली, एक ऐसी सीमा जिसे NCERT ख़ुद बताता है “जहाँ तक उसके घोड़े पहुँच सकें, वहाँ तक फैली हुई”
चघताई
उसे ट्रांसऑक्सियानी स्टेपी और पामीर पर्वतों के उत्तर के इलाक़े मिले, अपने भाई जोची के हिस्से से सटे हुए
ओगोदेई
उसे उत्तराधिकारी और भावी महान खान घोषित किया गया; गद्दी संभालते ही उसने कराकोरम में अपनी राजधानी बनाई
तोलुई (सबसे छोटा)
उसे मंगोल मातृभूमि, अपनी पैतृक भूमि, प्राप्त हुई
इस साझा साम्राज्य को एकजुट बनाए रखने के लिए, हर राजकुमार की अपनी सैन्य टुकड़ी, एक तामा, हर उलुस में तैनात रहती थी, और कुरिलताई लगातार परिवार से जुड़े मामलों पर फ़ैसले लेती रहती: अभियान, लूट, चरागाह, और उत्तराधिकार।
याम चंगेज़ खान की तेज़ डाक-व्यवस्था थी: नियमित दूरी पर बने चौकियों पर ताज़ा घोड़े और सवार तैनात रहते थे, जो उसकी मृत्यु के बाद और परिष्कृत हुई, यहाँ तक कि विदेशी यात्री भी इसकी गति और भरोसेमंदी देखकर हैरान रह जाते थे। इसे कुबकुर कर से वित्त मिलता था: हर यायावर परिवार अपने झुंड (घोड़े या पशुधन) का दसवाँ हिस्सा देता, जो वे इस व्यवस्था के फ़ायदों के बदले ख़ुशी-ख़ुशी चुकाते थे।
6मंगोल और बसे हुए समाज
6.1 विजय की क़ीमत, और उसके बाद की शांति
विजित लोगों के पास अपने नए यायावर शासकों से नफ़रत करने की पूरी वजह थी। तेरहवीं सदी के पहले आधे हिस्से में, नगर तबाह हुए, खेत बर्बाद हुए, व्यापार और शिल्प-उत्पादन बाधित हुआ; हज़ारों लोग मारे गए और उससे भी ज़्यादा को ग़ुलाम बनाया गया, हालाँकि सही आँकड़ों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि उस समय के इतिहासकारों ने उन्हें बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताया।
कनात ईरानी पठार के शुष्क इलाक़ों में इस्तेमाल होने वाली एक भूमिगत सिंचाई नहर है। मंगोल विजय की अस्थिरता में इन नहरों का नियमित रख-रखाव रुक गया और वे बिगड़ गईं, जिससे मरुस्थल फैलने लगा: यह एक पारिस्थितिक धक्का था जिससे खुरासान का कुछ हिस्सा कभी पूरी तरह उबर नहीं पाया।
फिर भी, विजय की धूल बैठने के बाद, एक यात्री पहली बार यूरोप से चीन तक ज़मीनी रास्ते से, एक ही जुड़ी हुई मंगोल-नियंत्रित व्यवस्था के भीतर यात्रा कर सकता था। इस शांति में रेशम मार्ग का व्यापार अपने शिखर पर पहुँचा, और पहले के विपरीत, यह अब सिर्फ़ चीन में ही नहीं रुकता था: यह उत्तर की ओर मंगोलिया तक, नए साम्राज्य के केंद्र कराकोरम तक जाता था।
पैक्स मंगोलिका (“मंगोल शांति”) उस दौर को कहते हैं जब मंगोल विजय के स्थिर हो जाने के बाद यूरेशिया में अपेक्षाकृत शांति और आवाजाही रही, जिसने रेशम मार्ग के व्यापार और लंबी दूरी की यात्रा को पहले से कहीं ज़्यादा फलने-फूलने दिया। यात्रियों को सुरक्षित आवाजाही के लिए एक पास दिया जाता था, फ़ारसी में पैज़ा, मंगोल में जेरेज़ा, और व्यापारी इसी सुरक्षा के बदले बाज कर देते थे, दोनों ही मंगोल खान के अधिकार को मानने का प्रतीक थे।

फ्रांसीसी भिक्षु विलियम रूब्रुक को फ्रांस के राजा लुई नवम् ने महान खान मोंके के दरबार में दूत बनाकर भेजा। वह 1254 में मोंके की राजधानी कराकोरम पहुँचा, जहाँ उसकी मुलाक़ात लोरेन (फ्रांस) से आई पाक़ेत नाम की एक महिला से हुई, जिसे हंगरी से लाया गया था, और गियोम बूशे नाम के एक पेरिसी सुनार से भी, जो पहले रानी सोरग़ाग़तानी की सेवा में था और बाद में मोंके के अपने भाई की। रूब्रुक ने देखा कि दरबार के बड़े उत्सवों में नेस्तोरियन गिरजे (एक पूर्वी ईसाई समुदाय) के पादरी सबसे पहले महान खान का प्याला आशीर्वाद देने के लिए बुलाए जाते, उसके बाद मुस्लिम धर्मगुरु और बौद्ध-ताओवादी भिक्षु आते।
विलियम रूब्रुक का 1254 का यह वृत्तांत पैक्स मंगोलिका को असल में काम करते हुए दिखाने वाली सबसे साफ़ तस्वीर है
6.2 पशुचारक या रक्षक? किसानों पर शासन कैसे हो
विजित खेतों का क्या किया जाए, इस पर मंगोल नेतृत्व ख़ुद बँटा हुआ था। 1230 के दशक में, उत्तर चीन में चिन वंश के विरुद्ध युद्ध के दौरान, एक मज़बूत गुट ने पूरी किसान आबादी को मार डालने और उनके खेतों को मंगोल झुंडों के लिए चरागाह बना देने की माँग की। पर 1270 के दशक तक, दक्षिण चीन को भी विजित करके मंगोल शासन में लाए जाने के बाद, चंगेज़ खान का ही पौत्र कुबलई खान (जिसकी मृत्यु 1294 में हुई) इसके उलट, किसानों और नगरों के रक्षक के रूप में सामने आया।
गज़न खान का 1290 के दशक का अपने मंगोल-तुर्की सेनापतियों को दिया भाषण एक पसंदीदा उद्धरण-आधारित प्रश्न है। यह ध्यान दीजिए कि इसे असल में किसने लिखा: NCERT का अपना पाठ कहता है कि यह “संभवतः उसके फ़ारसी वज़ीर (मुख्यमंत्री) रशीदुद्दीन ने लिखा था”, और यही वजह है कि यह इतनी सावधानी से समझाता है कि बर्बाद किसानों का मतलब है भविष्य में अनाज न मिलना, और “आज्ञाकारी” किसानों को विद्रोहियों से अलग समझना चाहिए।
यही बदलाव साम्राज्य के प्रशासन में भी दिखता है। चंगेज़ खान के अपने शासनकाल से ही, मंगोलों ने उन्हीं समाजों से प्रशासक भर्ती करने शुरू कर दिए थे जिन्हें उन्होंने जीता था, और उन्हें साम्राज्य में इधर-उधर भेजा भी जाता था: चीनी सचिव ईरान में सेवा करते, फ़ारसी लोग चीन में। जब तक ये अपने मंगोल स्वामियों के लिए राजस्व जुटाते रहते, इन्हें भरोसा दिया जाता और ये सचमुच प्रभावशाली भी बन सकते थे: चीनी मंत्री ये-लू-चुत्साई ने ओगोदेई की कुछ लूट-पाट वाली प्रवृत्तियों पर लगाम लगाई, जुवैनी परिवार ने तेरहवीं सदी के आख़िरी हिस्से में ईरान में ऐसी ही भूमिका निभाई, और वज़ीर रशीदुद्दीन ने ही गज़न खान का किसानों की रक्षा वाला भाषण लिखा।
7एक साम्राज्य से चार खानेतों तक
7.1 चार वंश, चार राज्य
मूल स्टेपी मातृभूमि से जितनी दूर, वहाँ बसकर स्थानीय ढंग अपनाने का दबाव उतना ही ज़्यादा था। तेरहवीं सदी के मध्य तक, एक साझा परिवार-विरासत (यानी परिवार के भीतर आगे बढ़ने वाली संपत्ति) की भावना धीरे-धीरे अलग-अलग वंशों में बदल गई, हर एक अपने हिस्से पर शासन करता, और उलुस शब्द, जिसका मतलब कभी एक तरल, लगातार बदलती सीमा था, अब एक स्थायी क्षेत्रीय राज्य का मतलब रखने लगा। यह आंशिक रूप से उत्तराधिकार-संघर्ष का नतीजा था, क्योंकि चंगेज़-वंशज महान खान की गद्दी और सबसे बेहतरीन चरागाहों: दोनों के लिए आपस में लड़ते रहे।
| वंशज | शासक वंश / नाम | मुख्य क्षेत्र |
|---|---|---|
| तोलुई | युआन वंश | चीन |
| तोलुई (हुलेगु की शाखा) | इल-खानी राज्य | ईरान |
| चघताई | चघताईद | ट्रांसओक्सिआना के उत्तर की स्टेपी, “तुर्किस्तान” |
| जोची | “गोल्डन होर्ड” (स्वर्ण गिरोह) | रूसी स्टेपी |
यायावर परंपराएँ सबसे लंबे समय तक चघताई (मध्य एशिया) और गोल्डन होर्ड (रूस) के स्टेपी-निवासी वंशजों में बनी रहीं: ठीक वही दो खानेतें जो चीन और ईरान के नए, बसे हुए दरबारों से सबसे दूर थीं।
7.2 परिवार की कहानी किसकी नज़र से?
इस बँटवारे ने अतीत को याद करने के तरीक़े को भी बदल दिया। तोलुईद शाखा, जिसके पास चीन और ईरान दोनों का नियंत्रण था और जो अपनी प्रतिद्वंद्वी शाखाओं से कहीं ज़्यादा साहित्यकारों को धन दे सकती थी, परिवार के झगड़ों की अपनी कहानी सबसे बेहतर ढंग से इतिहास में दर्ज करवा सकी: अपने संरक्षण में लिखवाए गए इतिवृत्तों के ज़रिए। ख़ुद चंगेज़ खान भी इस दोबारा-लेखन से नहीं बच पाया: इल-खानी ईरान के तेरहवीं सदी के आख़िरी दौर के फ़ारसी इतिवृत्तों ने नाटकीय असर के लिए उसकी हत्याओं को भी बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया: एक चश्मदीद के अनुसार बुखारा के क़िले के 400 रक्षक, एक ऐसे ही इतिवृत्त में बढ़कर 30,000 मारे गए बता दिए गए। फिर भी यही इतिवृत्त चंगेज़ खान की भरपूर प्रशंसा भी करते रहे, साथ ही यह राहत भी जताते कि “अतीत की बड़ी हत्याएँ अब ख़त्म हो चुकी हैं।”
8यास, और विश्व-इतिहास में चंगेज़ खान
8.1 यास: क़ानून और उसकी विरासत
यास वह विधि-संहिता है जिसे चंगेज़ खान ने 1206 के कुरिलताई में घोषित किया माना जाता है। इस शब्द का शुरुआती रूप, यसाक, बस “क़ानून”, “आदेश” या “फ़रमान” का मतलब रखता था, और इससे जुड़े जो थोड़े विवरण बचे हैं, वे शिकार, सेना और डाक-व्यवस्था के प्रशासनिक नियमों से जुड़े हैं। तेरहवीं सदी के मध्य तक मंगोल व्यापक अर्थ में यास शब्द का इस्तेमाल “चंगेज़ खान की पूरी विधि-संहिता” बताने के लिए करने लगे।
इसका अर्थ इतना क्यों बढ़ा? तब तक मंगोल, राजनीतिक रूप से हावी होते हुए भी, संख्या में एक छोटा अल्पसंख्यक थे, जो अपने-अपने क़ानूनों वाले सुसंस्कृत, नगरीय समाजों पर शासन कर रहे थे। अपने ही पूर्वज से मिली एक पवित्र विधि का दावा मंगोलों को अपनी पहचान बचाने देता, चंगेज़ खान को मूसा या सुलेमान जैसे विधि-दाता का दर्जा देता, और बसे हुए जीवन-शैली को अपनाते हुए भी अपनी जातीय पहचान बनाए रखने का आत्मविश्वास देता।
1221 में बुखारा के उत्सव मैदान में चंगेज़ खान ने नगर के धनी मुस्लिम निवासियों को इकट्ठा करके उन्हें पापी कहकर धिक्कारा था। सोलहवीं सदी के अंत में, उसका एक दूर का वंशज, अब्दुल्लाह खान, उसी जगह गया: पर मुस्लिम नमाज़ अदा करने के लिए। उसके इतिहासकार, हाफ़िज़-ए-तनीश, ने इस्लामी श्रद्धा के इस कार्य को “चंगेज़ खान के यास के अनुसार” बताया।
एक क़ानून को कैसे खींचकर उस काम को सही ठहराने में इस्तेमाल किया गया, जो उसके कथित रचनाकार ने कभी किया ही नहीं
यास, दूसरे शब्दों में, संभवतः सामान्य मंगोल रीति-रिवाजों का एक संकलन ही था, बस चंगेज़ खान के नाम का वज़न लिए हुए। उसने ख़ुद ऐसी औपचारिक संहिता की योजना बनाई हो या न बनाई हो, यह एक सचमुच शक्तिशाली, एकीकृत विचार बन गया, जिसे उसके वंशजों ने अपनी बदलती परिस्थितियों के अनुसार बार-बार नए ढंग से गढ़ा: जैसा कि विद्वान डेविड अयालोन के शोध ने विस्तार से दिखाया है।
8.2 निष्कर्ष : चंगेज़ खान की दो छवियाँ
आज चंगेज़ खान का क्या मतलब है, यह पूछिए, तो दो बिल्कुल विपरीत जवाब मिलते हैं। असली मुद्दा यह तय करना नहीं कि इनमें से “सच्चा” कौन-सा है, बल्कि यह देखना है कि एक हावी नज़रिया दूसरे को कितनी आसानी से पूरी तरह मिटा सकता है।
विजित लोगों की नज़र में
- नगरों का विनाशक
- हज़ारों की मौत का ज़िम्मेदार
- चीन, ईरान और पूर्वी यूरोप में डर और नफ़रत का पात्र
मंगोलों की नज़र में
- सबसे महान नेता
- लोगों को एकजुट किया, अंतहीन कबीलाई युद्ध ख़त्म किए
- समृद्धि लाया और मार्को पोलो जैसे यात्रियों के लिए व्यापार-मार्ग बहाल किए
दोनों नज़रियों से परे, मंगोल साम्राज्य का आकार ही अपने आप में उल्लेखनीय है: मंगोल खान अलग-अलग व्यक्तिगत आस्था रखते थे, शमनवादी, बौद्ध, ईसाई, और बाद में इस्लाम, पर उन्होंने कभी निजी विश्वास को सार्वजनिक नीति पर हावी नहीं होने दिया, और हर जातीय समूह तथा धर्म से प्रशासक और सैनिक भर्ती किए। उस समय के लिए यह बहुसांस्कृतिक, बहुभाषी, बहु-धार्मिक सहनशीलता सचमुच असाधारण थी, और इतिहासकार आज भी अध्ययन कर रहे हैं कि इसने बाद के शासनों, भारत के मुगलों समेत, को कैसे एक वैचारिक मॉडल दिया होगा।
चंगेज़ खान की नक़ल करने वालों को भी उसके नाम की ज़रूरत पड़ी। चौदहवीं सदी के अंत में, तैमूर (1370-1405), जो एक और विश्व-विजेता बनने का सपना देखता था, ख़ुद को सम्राट घोषित करने से हिचकिचाया, क्योंकि वह चंगेज़-वंश से नहीं था: जब उसने आख़िर घोषणा की, तो सिर्फ़ चंगेज़-वंशी परिवार के “दामाद” (गुरेगन) के रूप में। और आज, सोवियत नियंत्रण के दशकों बाद, मंगोलिया ने चंगेज़ खान को अपने महान राष्ट्रीय नायक के रूप में फिर से अपनाया है, जिसकी स्मृति एक बार फिर देश की अपनी पहचान गढ़ने में मदद कर रही है।
9समय-सारणी: चंगेज़ खान और मंगोल एक नज़र में
- यायावरों ने ख़ुद लगभग कुछ नहीं लिखा, इसलिए मंगोलों पर लगभग हर स्रोत किसी बाहरी व्यक्ति ने लिखा, और मंगोलों का गुप्त इतिहास इनमें सबसे पुराना है
- चंगेज़ खान (तेमुजिन) बंदी बनाए जाने और धोखे से उबरकर 1206 के कुरिलताई में “सार्वभौम शासक” घोषित हुआ
- उसने पुराने मंगोल कबीलों को तोड़कर सेना को दशमलव प्रणाली (10 से लेकर तुमन तक) पर फिर से बनाया, साथ ही अंडा और नौकर जैसे उसके प्रति निजी निष्ठा रखने वाले नए कुलीन वर्ग के साथ
- उसके चार बेटों को चार उलुस मिले: जोची (रूस), चघताई (ट्रांसओक्सिआना), ओगोदेई (महान खान, कराकोरम) और तोलुई (मंगोलिया): जो उसके अपने जीवनकाल में तरल सीमाएँ थीं, स्थायी राज्य नहीं
- मंगोल विजय बसे हुए समाजों के लिए विनाशकारी थी, पर उसके बाद की पैक्स मंगोलिका ने रेशम मार्ग को पहले से कहीं ज़्यादा खोल दिया
- किसानों पर शासन के नज़रिए बदले, किसानों को मार डालने से लेकर उनकी रक्षा करने तक, जब कुबलई खान और गज़न खान जैसे शासकों को स्थिर, कर देने वाली ग्रामीण आबादी की ज़रूरत महसूस हुई
- साझा पारिवारिक साम्राज्य चार खानेतों में बँट गया: युआन (चीन), इल-खानी (ईरान), चघताई खानेत (मध्य एशिया) और गोल्डन होर्ड (रूस)
- यास, चंगेज़ खान की कथित विधि-संहिता, को उसके उत्तराधिकारियों ने उसकी मृत्यु के सदियों बाद तक अपने ढंग से ढाला
- चंगेज़ खान को विनाशक और इतिहास के सबसे सफल राष्ट्र-निर्माता, दोनों रूपों में याद किया जाता है, और आधुनिक मंगोलिया ने उसे अपने राष्ट्रीय नायक के रूप में फिर से अपनाया है
- क्या मैं समझा सकता/सकती हूँ कि मंगोलों पर लगभग हर ऐतिहासिक स्रोत किसी ग़ैर-मंगोल ने ही क्यों लिखा?
- क्या मैं तेमुजिन के 1206 के कुरिलताई में “चंगेज़ खान” बनने तक के उत्थान को क्रम से बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं बता सकता/सकती हूँ कि दशमलव सेना ने पुरानी कबीलाई निष्ठाओं को कैसे तोड़ा, और नए दर्जों, नोयान, अंडा, नौकर, के नाम बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं चारों उलुस के नाम और चंगेज़ खान के किस बेटे को कौन-सा मिला, यह बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं पैक्स मंगोलिका और उससे पहले हुई तबाही के बीच फ़र्क़ समझा सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं बता सकता/सकती हूँ कि 1230 और 1270-90 के दशकों के बीच किसानों को लेकर मंगोल नीति क्यों बदली?
- क्या मैं वे चारों खानेतें गिना सकता/सकती हूँ जिनमें मंगोल साम्राज्य आख़िरकार बँटा, और हर एक किसके वंशज थे?
- क्या मैं समझा सकता/सकती हूँ कि यास का अर्थ “प्रशासनिक नियम” से बढ़कर “चंगेज़ खान की पूरी विधि-संहिता” कैसे हो गया?
- 3 अंकमंगोलों के लिए व्यापार इतना महत्वपूर्ण क्यों था?
- 3 अंकचंगेज़ खान को मंगोल कबीलों को नए सामाजिक-सैन्य समूहों में बाँटने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई?
- 4 अंकयास को लेकर बाद के मंगोलों के विचार चंगेज़ खान की स्मृति के साथ उनके असहज संबंध को कैसे दर्शाते हैं?
- 4 अंक“यदि इतिहास नगर-आधारित साहित्यकारों के लिखित अभिलेखों पर निर्भर हो, तो यायावर समाजों को हमेशा शत्रुतापूर्ण चित्रण मिलेगा।” क्या आप सहमत हैं? क्या यह फ़ारसी इतिवृत्तों में मंगोल अभियानों की बढ़ी-चढ़ी हताहत संख्या की व्याख्या करता है?
- 6 अंकमंगोल और बद्दू समाजों के यायावर तत्व को ध्यान में रखते हुए, उनके ऐतिहासिक अनुभव किस तरह अलग रहे, और क्यों?
- 6 अंकविलियम रूब्रुक के मोंके के दरबार (कराकोरम) के विवरण में लोरेन की एक महिला, एक पेरिसी सुनार, और नेस्तोरियन, मुस्लिम, बौद्ध तथा ताओवादी धर्मगुरु साथ मौजूद दिखते हैं। यह पैक्स मंगोलिका की प्रकृति को कैसे उजागर करता है?
- 1 अंककुरिलताई क्या था?
- 1 अंकमंगोल साम्राज्य के बँटवारे से बनी चारों खानेतों के नाम बताइए।
- 1 अंकचंगेज़ खान की दशमलव सेना में 10,000 सैनिकों की इकाई को क्या कहा जाता था?
(क) नोयान(ख) तुमन(ग) नौकर(घ) अंडा - 1 अंकगोल्डन होर्ड पर चंगेज़ खान के किस बेटे के वंशजों का शासन था?
(क) ओगोदेई(ख) तोलुई(ग) जोची(घ) चघताई
CBSE परीक्षाओं में हर अभिकथन-कारण (A-R) प्रश्न में एक जैसे चार विकल्प होते हैं: (क) A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या करता है; (ख) A और R दोनों सही हैं, पर R, A की व्याख्या नहीं करता; (ग) A सही है, पर R ग़लत है; (घ) A ग़लत है, पर R सही है। पहले तय कीजिए कि A सही है या नहीं, फिर R सही है या नहीं, और आख़िर में यह कि क्या R सचमुच A की व्याख्या करता है।
कारण (R): उसके जीवनकाल में मंगोल अभी भी लगातार विस्तार कर रहे थे, इसलिए जोची जैसे किसी उलुस की सीमा “जहाँ तक उसके घोड़े पहुँच सकें” वहाँ तक फैलती थी।
कारण (R): यह शब्द संभवतः सामान्य मंगोल रीति-रिवाजों का एक संकलन था, जिसे उसके उत्तराधिकारियों ने चंगेज़ खान के नाम और अधिकार से जोड़ दिया।