- भू-उपयोग के नौ आधिकारिक संवर्ग, और “रिपोर्टिंग क्षेत्र” “भौगोलिक क्षेत्र” से कैसे भिन्न है
- 1950-51 से 2019-20 के बीच कौन-से भू-उपयोग संवर्ग बढ़े और कौन-से घटे, और क्यों
- साझा संपत्ति संसाधन (CPR) क्या हैं और भूमिहीन व सीमांत परिवारों के लिए ये सबसे अधिक महत्वपूर्ण क्यों हैं
- फ़सल गहनता की गणना कैसे करें, और तीन फ़सल ऋतुओं में अंतर
- भारत की प्रमुख खाद्य, तिलहन, रेशेदार व रोपण फ़सलों की कृषि दशाएँ, अग्रणी राज्य व उत्पादन हिस्सा
- स्वतंत्रता के बाद भारतीय कृषि कैसे विकसित हुई, और वह आज भी किन आठ समस्याओं का सामना करती है
1भू-उपयोग वर्गीकरण
आपके चारों ओर हर भूमि किसी-न-किसी काम में लगी है: कोई स्कूल, सड़क, उद्यान, खेत या चरागाह। भूराजस्व विभाग इन उपयोगों का अभिलेख रखता है, और इन संवर्गों का योग रिपोर्टिंग (प्रतिवेदन) क्षेत्र कहलाता है। यह भौगोलिक क्षेत्र जैसा बिल्कुल नहीं है, जिसे भारतीय सर्वेक्षण विभाग सीधे मापता है और जो स्थायी रहता है। रिपोर्टिंग क्षेत्र भूराजस्व अनुमानों पर आधारित होने से थोड़ा घट-बढ़ सकता है, जबकि भौगोलिक क्षेत्र नहीं बदलता।
रिपोर्टिंग क्षेत्र
- भूराजस्व अभिलेखों के नौ भू-उपयोग संवर्गों का योग
- राजस्व अनुमानों के साथ थोड़ा बदल सकता है
भौगोलिक क्षेत्र
- भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा सीधे मापा जाता है
- स्थायी है, नहीं बदलता
भूराजस्व अभिलेख सारी भूमि को नौ संवर्गों में वर्गीकृत करते हैं:
| # | संवर्ग | इसका अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | वनों के अधीन क्षेत्र | वह क्षेत्र जिसे सरकार ने वन वृद्धि हेतु सीमांकित किया है, वास्तविक वन आच्छादित क्षेत्र से अलग |
| 2 | बंजर व व्यर्थ-भूमि | बंजर पहाड़ी भूभाग, मरुस्थल, खड्ड: प्रचलित प्रौद्योगिकी से कृषि योग्य नहीं बनाई जा सकती |
| 3 | गैर कृषि-कार्यों में प्रयुक्त भूमि | बस्तियाँ (ग्रामीण व शहरी), अवसंरचना (सड़कें, नहरें), उद्योग, दुकानें |
| 4 | स्थायी चरागाह क्षेत्र | अधिकतर ग्राम पंचायत या सरकार के स्वामित्व में; केवल छोटा भाग निजी स्वामित्व में |
| 5 | विविध तरु-फ़सलों व उपवनों के अंतर्गत क्षेत्र | उद्यान व फलदार वृक्ष; अधिकतर निजी स्वामित्व; निवल बोए क्षेत्र में शामिल नहीं |
| 6 | कृषि योग्य व्यर्थ भूमि | 5 वर्षों से अधिक परती; भूमि उद्धार तकनीक से कृषि योग्य बनाई जा सकती है |
| 7 | वर्तमान परती भूमि | एक कृषि वर्ष या उससे कम समय तक कृषिरहित: भूमि की उर्वरता वापस पाने हेतु |
| 8 | पुरातन परती भूमि | एक वर्ष से अधिक पर पाँच वर्षों से कम समय तक कृषिरहित |
| 9 | निवल बोया क्षेत्र | वह भूमि जिस पर फ़सलें वास्तव में उगाई व काटी जाती हैं |
संवर्ग 6 (कृषि योग्य व्यर्थ भूमि, 5 वर्ष से अधिक परती) और संवर्ग 8 (पुरातन परती भूमि, 1-5 वर्ष) आपस में गड्डमड्ड हो जाते हैं। याद रखें: यदि परती भूमि 5 वर्ष पार कर जाती है, तो वह कृषि योग्य व्यर्थ भूमि में पुनर्वर्गीकृत हो जाती है।
1.1 समय के साथ भू-उपयोग क्यों बदलता है
अर्थव्यवस्था अपने भू-उपयोग को तीन तरीकों से प्रभावित करती है:
अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ता है
जनसंख्या, आय व प्रौद्योगिकी साथ-साथ बढ़ते हैं, इसलिए भूमि पर दबाव बढ़ता है और सीमांत भूमि भी प्रयोग में आने लगती है।
इसकी संरचना बदलती है
द्वितीयक व तृतीयक सेक्टर प्राथमिक सेक्टर से अधिक तेज़ी से बढ़ते हैं, जिससे भूमि धीरे-धीरे कृषि से गैर-कृषि उपयोग की ओर जाती है। शहरों के चारों ओर यह विशेष रूप से तीव्र है।
कृषि भूमि पर दबाव बना रहता है
अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान घटता है, पर कृषि भूमि पर दबाव कम नहीं होता: इस पर निर्भर जनसंख्या बहुत धीरे घटती है, और हर वर्ष अधिक लोगों को भोजन देना पड़ता है।
2भू-उपयोग परिवर्तन (1950-51 से 2019-20) तथा साझा संपत्ति संसाधन
चूँकि रिपोर्टिंग क्षेत्र लगभग स्थिर रहा है, एक संवर्ग में कमी प्रायः दूसरे में वृद्धि दर्शाती है। पाँच संवर्गों में वृद्धि हुई और चार में गिरावट आई।
| भू-उपयोग संवर्ग | 1950-51 (%) | 2019-20 (%) | प्रवृत्ति |
|---|---|---|---|
| वन | 17.0 | 23.4 | वृद्धि |
| गैर-कृषि कार्यों में प्रयुक्त भूमि | 3.2 | 9.1 | वृद्धि (सबसे तेज़ दर) |
| बंजर व व्यर्थ-भूमि | 13.4 | 5.4 | गिरावट |
| स्थायी चरागाह क्षेत्र | 2.3 | 3.4 | वृद्धि |
| फ़सल वृक्षों के अधीन क्षेत्र | 6.9 | 1.0 | गिरावट |
| कृषि योग्य व्यर्थ भूमि | 8.0 | 3.9 | गिरावट |
| पुरातन परती भूमि | 6.1 | 3.7 | गिरावट |
| वर्तमान परती भूमि | 3.7 | 4.5 | वृद्धि |
| निवल बोया क्षेत्र | 41.7 | 45.6 | वृद्धि |

इसे “5 ऊपर, 4 नीचे” के रूप में याद रखें: वन, गैर-कृषि कार्य, स्थायी चरागाह, वर्तमान परती भूमि, निवल बोया क्षेत्र बढ़े; बंजर व व्यर्थ-भूमि, कृषि योग्य व्यर्थ भूमि, फ़सल वृक्षों के अधीन क्षेत्र, पुरातन परती भूमि घटे।
गैर-कृषि उपयोग सबसे तेज़ बढ़ा
भारत के उद्योग व सेवा क्षेत्रों की ओर बढ़ते झुकाव, और ग्रामीण-शहरी बस्तियों के विस्तार के कारण।
वन हिस्सा कागज़ पर बढ़ा
अधिकतर बड़े सीमांकित क्षेत्र के कारण, ज़रूरी नहीं कि वास्तविक वन आच्छादन में वृद्धि हुई हो।
वर्तमान परती भूमि में उतार-चढ़ाव
केवल दो आँकड़ों से इसे समझाया नहीं जा सकता; यह वार्षिक वर्षा व फ़सल-चक्र पर निर्भर करता है।
निवल बोया क्षेत्र हाल में बढ़ा
मुख्यतः कृषि योग्य व्यर्थ भूमि को अब हल के नीचे लाए जाने के कारण; पहले यह धीरे-धीरे घट रहा था।
2.1 साझा संपत्ति संसाधन (CPR)
साझा संपत्ति संसाधन (CPR) समुदाय का वह प्राकृतिक संसाधन है जिस पर हर सदस्य को कुछ कर्तव्यों के साथ उपयोग व पहुँच का अधिकार होता है, पर किसी व्यक्ति का उस पर निजी संपत्ति अधिकार नहीं होता, जैसे सामुदायिक वन, चरागाह भूमि, ग्रामीण जलीय क्षेत्र व अन्य सार्वजनिक स्थान।
स्वामित्व के आधार पर भूमि या तो निजी भूसंपत्ति (किसी व्यक्ति या समूह के स्वामित्व में) होती है या CPR (राज्य के स्वामित्व में, सामुदायिक उपयोग हेतु)। CPR चारा, इंधन-लकड़ी और फल, गिरी, रेशे, औषधीय पौधों जैसे लघु वन-उत्पाद उपलब्ध कराते हैं।
भूमिहीन व सीमांत किसानों के लिए
बहुत-से लोग पशुपालन से मिलने वाली आय पर निर्भर हैं, जिसके लिए CPR चारा देते हैं; जहाँ इनकी अपनी भूमि तक पहुँच सीमित है, वहाँ यह सबसे अधिक मायने रखता है।
महिलाओं के लिए
ग्रामीण क्षेत्रों में चारा व इंधन-लकड़ी का संग्रह अधिकतर महिलाएँ करती हैं; घटता CPR उन्हें दोनों के लिए दूर तक भटकने को मजबूर करता है।
3कृषि भू-उपयोग, कृषि योग्य भूमि तथा फ़सल गहनता
भूसंसाधन उन लोगों के लिए अधिक महत्वपूर्ण हैं जिनकी आजीविका कृषि पर निर्भर है, तीन कारणों से:
कृषि पूर्णतया भूमि पर आधारित है
द्वितीयक या तृतीयक कार्यों के विपरीत, भूमि का योगदान उत्पादन में अधिक प्रत्यक्ष है, इसलिए भूमि तक पहुँच न होना सीधे ग्रामीण गरीबी से जुड़ा है।
भूमि की गुणवत्ता उत्पादकता तय करती है
भूमि की गुणवत्ता का कृषि उत्पादन पर सीधा प्रभाव पड़ता है, जो अधिकतर अन्य कार्यों में सच नहीं है।
भू-स्वामित्व का सामाजिक मूल्य भी है
यह ऋण व आपदाओं के विरुद्ध सुरक्षा देता है, और ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ाता है।
3.1 सकल कृषि योग्य भूमि
सकल कृषि योग्य भूमि = निवल बोया गया क्षेत्र + सभी प्रकार की परती भूमि + कृषि योग्य व्यर्थ भूमि।
| संवर्ग | रिपोर्टिंग क्षेत्र का % | सकल कृषि योग्य भूमि का % | ||
|---|---|---|---|---|
| 1950-51 | 2019-20 | 1950-51 | 2019-20 | |
| कृषि योग्य व्यर्थ भूमि | 8.0 | 3.9 | 13.4 | 6.8 |
| पुरातन परती भूमि | 6.1 | 3.7 | 10.2 | 6.4 |
| वर्तमान परती भूमि | 3.7 | 4.5 | 6.2 | 7.8 |
| निवल बोया गया क्षेत्र | 41.7 | 45.6 | 70.0 | 79.0 |
| सकल कृषि योग्य भूमि | 59.5 | 57.7 | 100.0 | 100.0 |
सकल कृषि योग्य भूमि में केवल मामूली गिरावट आई है, पर कृषि की गई भूमि में इससे अधिक कमी आई है, यद्यपि कृषि योग्य व्यर्थ भूमि भी घटी है, इसलिए भारत में नया निवल बोया क्षेत्र जोड़ने की गुंजाइश सीमित है।
3.2 फ़सल गहनता
भारत में भूमि की कमी है पर श्रम प्रचुर है, इसलिए सभी फ़सलों से प्रति इकाई क्षेत्र कुल उत्पादन बढ़ाना (केवल एक फ़सल की उपज नहीं) बेहतर भूमि-बचत रणनीति है, क्योंकि इससे श्रम की माँग भी बढ़ती है।
3.3 फ़सल ऋतुएँ
उत्तरी व आंतरिक भारत में तीन स्पष्ट फ़सल ऋतुएँ हैं। दक्षिणी भारत में ऐसा कोई स्पष्ट अंतर नहीं: पर्याप्त मृदा-आर्द्रता होने पर वहाँ एक ही फ़सल वर्ष में तीन बार तक उगाई जा सकती है।
| ऋतु | प्रमुख फ़सलें (उत्तरी राज्य) | प्रमुख फ़सलें (दक्षिणी राज्य) |
|---|---|---|
| खरीफ़ (जून-सितंबर) | चावल, कपास, बाजरा, मक्का, ज्वार, तुर (अरहर) | चावल, मक्का, रागी, ज्वार, मूँगफली |
| रबी (अक्टूबर-मार्च) | गेहूँ, चना, तोरिया व सरसों, जौ | चावल, मक्का, रागी, मूँगफली |
| ज़ायद (अप्रैल-जून) | सब्ज़ियाँ, फल, चारा फ़सलें | चावल, सब्ज़ियाँ, चारा फ़सलें |
3.4 कृषि के प्रकार
कृषि को आर्द्रता के मुख्य स्रोत के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है: सिंचित या वर्षा निर्भर (बारानी)।
शुष्क भूमि कृषि (रागी, बाजरा, मूँग, चना, ग्वार) मुख्यतः 75 सेमी से कम वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों तक सीमित है। आर्द्र भूमि कृषि में चावल, जूट व गन्ना जैसी जल-गहन फ़सलें उगाई जाती हैं, और ताज़े पानी की जलकृषि भी होती है।
4भारत की प्रमुख फ़सलें
खाद्यान्न भारत के कुल बोए क्षेत्र का लगभग दो-तिहाई भाग घेरते हैं, और अनाज संरचना के आधार पर अनाज तथा दालों में बँटते हैं।
4.1 अनाज (कुल बोए क्षेत्र का लगभग 54%)
भारत विश्व के लगभग 11% अनाज का उत्पादन करता है, अमेरिका व चीन के बाद तीसरे स्थान पर। अनाज उत्तम अनाज (चावल, गेहूँ) या मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी) होते हैं।
| अनाज | ऋतु व दशाएँ | बोए क्षेत्र का % | अग्रणी राज्य | विश्व रैंक / हिस्सा |
|---|---|---|---|---|
| चावल | उष्ण आर्द्र; समुद्रतल से 2,000 मी तक; उत्तर में खरीफ़, दक्षिण व प. बंगाल में वर्ष में 3 फ़सलें तक (औस, अमन, बोरो) | ~25% | पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब | विश्व उत्पादन का 22.07%, चीन के बाद दूसरा स्थान (2018) |
| गेहूँ | शीतोष्ण; रबी फ़सल; अधिकतर सिंचित, हिमालयी उच्च भाग व मालवा (म.प्र.) में वर्षा-आधारित | ~14% | उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान | विश्व उत्पादन का 12.8% (2017) |
| ज्वार | दक्षिण-मध्य भारत के अर्ध-शुष्क क्षेत्र; दक्षिण में खरीफ़+रबी, उत्तर में खरीफ़ चारा फ़सल | ~5.3% | महाराष्ट्र (आधे से अधिक राष्ट्रीय उत्पादन), कर्नाटक, म.प्र., आं.प्र., तेलंगाना | n/a |
| बाजरा | पश्चिम-उत्तर-पश्चिम भारत का गर्म शुष्क क्षेत्र; सूखा-सहनशील; एकल या मिश्रित फ़सल | ~5.2% | महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा | n/a |
| मक्का | खाद्य+चारा फ़सल; अर्ध-शुष्क, निम्न कोटि मिट्टी; पंजाब व पूर्वोत्तर छोड़कर लगभग सभी जगह | ~3.6% | कर्नाटक, म.प्र., बिहार, आं.प्र., तेलंगाना, राजस्थान, उ.प्र. | n/a |
पंजाब व हरियाणा परंपरागत चावल उत्पादक राज्य नहीं हैं: वहाँ चावल की कृषि हरित क्रांति के बाद 1970 के दशक में ही शुरू हुई। यह ठीक यही तथ्य पहले भी पूछा जा चुका है।
4.2 दालें (कुल बोए क्षेत्र का लगभग 11%)
दालें फलीदार फ़सलें हैं, प्रोटीन से भरपूर, और मिट्टी में स्वाभाविक रूप से नाइट्रोजन योगीकरण करती हैं। भारत विश्व का अग्रणी उत्पादक है, पर पैदावार कम व अनियमित है क्योंकि दालें अधिकतर वर्षा-निर्भर शुष्क क्षेत्रों की फ़सल हैं।
| दाल | दशाएँ | बोए क्षेत्र का % | अग्रणी राज्य |
|---|---|---|---|
| चना | उपोष्ण, वर्षा-आधारित रबी फ़सल; केवल 1-2 हल्की बौछारें चाहिए; हरित क्रांति के बाद हरियाणा, पंजाब, उत्तरी राजस्थान में गेहूँ से विस्थापित | ~2.8% | मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आं.प्र., तेलंगाना, राजस्थान |
| अरहर (तुर / लाल चना / पिजन पी) | सीमांत भूमि, वर्षा-आधारित, मध्य व दक्षिणी भारत के शुष्क भाग | ~2% | महाराष्ट्र (~राष्ट्रीय उत्पादन का 1/3), उ.प्र., कर्नाटक, गुजरात, म.प्र. |
4.3 तिलहन (कुल बोए क्षेत्र का लगभग 14%)
| तिलहन | दशाएँ | बोए क्षेत्र का % | अग्रणी राज्य |
|---|---|---|---|
| मूँगफली | मुख्यतः वर्षा-आधारित खरीफ़, शुष्क क्षेत्र; दक्षिण में रबी भी | ~3.6% | गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, आं.प्र., कर्नाटक, महाराष्ट्र |
| तोरिया व सरसों | राई, सरसों, तोरिया, तारामीरा शामिल; उपोष्ण, रबी; पाला-संवेदनशील | ~2.5% | राजस्थान (~राष्ट्रीय उत्पादन का 1/3), हरियाणा, मध्य प्रदेश |
| सोयाबीन | n/a | n/a | मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र मिलकर ~90% राष्ट्रीय उत्पादन |
| सूरजमुखी | उत्तर में गौण फ़सल, वहाँ सिंचाई से अधिक पैदावार | n/a | कर्नाटक, आं.प्र., तेलंगाना, सटा महाराष्ट्र |
भारत विश्व की 18.8% मूँगफली उत्पन्न करता है (2018)। तिलहन उगाने वाले क्षेत्रों में मालवा पठार, मराठवाड़ा, गुजरात, राजस्थान, तेलंगाना, रायलसीमा (आं.प्र.) व कर्नाटक पठार शामिल हैं।
4.4 रेशेदार फ़सलें
| फ़सल | दशाएँ | बोए क्षेत्र का % | अग्रणी राज्य | विश्व हिस्सा |
|---|---|---|---|---|
| कपास | उष्ण कटिबंधीय, खरीफ़, अर्ध-शुष्क; छोटे रेशे (भारतीय) व लंबे रेशे (‘नरमा’, अमेरिकन); फूल आने पर आकाश साफ़ चाहिए | ~4.7% | गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आं.प्र., पंजाब, हरियाणा | चीन के बाद दूसरा स्थान |
| जूट | पश्चिम बंगाल व सटे पूर्वी भाग की व्यापारिक फ़सल; विभाजन में बड़ा जूट क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में चला गया | ~0.5% | पश्चिम बंगाल (~राष्ट्रीय उत्पादन का 3/4), बिहार, असम | विश्व उत्पादन का ~60% (3/5) |
4.5 अन्य महत्वपूर्ण फ़सलें
| फ़सल | दशाएँ | बोए क्षेत्र का % | अग्रणी राज्य | विश्व हिस्सा |
|---|---|---|---|---|
| गन्ना | उष्ण कटिबंधीय; भारत में अधिकतर सिंचित, अन्यत्र वर्षा-आधारित के विपरीत | ~2.4% | उत्तर प्रदेश (~40% राष्ट्रीय उत्पादन), महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आं.प्र. | ब्राज़ील के बाद दूसरा स्थान (2018), विश्व उत्पादन का ~19.76% |
| चाय | रोपण फ़सल; तरंगित पहाड़ी भूमि, अच्छे अपवाह वाली मिट्टी, आर्द्र/उपार्द्र उष्ण कटिबंध; 1840 में ब्रह्मपुत्र घाटी, असम में शुरू | n/a | असम (राष्ट्रीय उत्पादन का आधे से अधिक), पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु | विश्व उत्पादन का ~21.22% (2018), चीन के बाद दूसरा निर्यातक |
| कॉफ़ी | उष्ण कटिबंधीय रोपण फ़सल; तीन किस्में: अरेबिका, रोबस्ता, लिबेरिका; भारत मुख्यतः उत्तम किस्म अरेबिका उगाता है | n/a | कर्नाटक (राष्ट्रीय उत्पादन के 2/3 से अधिक), केरल, तमिलनाडु | विश्व उत्पादन का ~3.17%, आठवाँ स्थान (2018) |
विभाजन के समय भारत ने अपना बड़ा कपास-उत्पादक क्षेत्र पाकिस्तान को और जूट-उत्पादक क्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) को खो दिया था; दोनों फ़सलों का आज का वितरण अब भी उस विभाजन की छाप रखता है।
5भारत में कृषि विकास
उच्च उत्पादकता किस्में (HYV) मैक्सिको के गेहूँ व फिलीपींस के चावल की सुधरी हुई बीज किस्में हैं, जिन्होंने रासायनिक खाद व निश्चित सिंचाई के साथ मिलकर खाद्यान्न उत्पादन में वह तीव्र वृद्धि दी जिसे हरित क्रांति कहा जाता है।
5.1 उत्पादन व प्रौद्योगिकी में वृद्धि (पिछले 50 वर्ष)
1960 के दशक से कीटनाशकों की खपत में भी महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है, क्योंकि HYV किस्में पुरानी किस्मों की तुलना में कीट व रोगों के प्रति कहीं अधिक संवेदनशील हैं।
भारत का किसान पोर्टल किसानों को बीमा, भंडारण, फ़सलों, बीजों, कीटनाशकों, मशीनरी, बाज़ार मूल्यों व कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी हेतु एक ही मंच देता है, साथ ही मिट्टी की उर्वरता, भंडारण व प्रशिक्षण के ब्लॉक-स्तरीय विवरण वाला एक इंटरेक्टिव मानचित्र भी।
6भारतीय कृषि की समस्याएँ
अधिकतर कृषि समस्याएँ प्रादेशिक हैं, पर आठ पूरे देश में सामान्य हैं: भौतिक बाधाओं से लेकर संस्थागत अवरोधों तक।
अनियमित मानसून पर निर्भरता
सिंचाई कृषि क्षेत्र के केवल ~33% भाग को कवर करती है; शेष सीधे वर्षा पर निर्भर है। कमज़ोर मानसून वर्ष और राजस्थान जैसे सूखा-प्रवण क्षेत्र सूखे व आकस्मिक बाढ़ (जैसे 2006 व 2017 में महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान) दोनों झेलते हैं।
निम्न उत्पादकता
चावल, गेहूँ, कपास व तिलहन की पैदावार अमेरिका, रूस या जापान से बहुत कम है, मुख्यतः भूमि पर अत्यधिक दबाव के कारण।
वित्तीय बाध्यताएँ तथा ऋणग्रस्तता
आधुनिक निवेश महँगे हैं; सीमांत व छोटे किसानों की बचत बहुत कम या नहीं के बराबर है, इसलिए वे संस्थाओं व महाजनों से उधार लेते हैं; फ़सल विफलता उन्हें कर्ज़ के जाल में फँसा देती है।
भूमि सुधारों की कमी
औपनिवेशिक-युग की महालवाड़ी, रैयतवाड़ी व ज़मींदारी प्रणालियों (ज़मींदारी सबसे शोषणकारी) के तहत असमान भूमि वितरण को स्वतंत्रता के बाद कमज़ोर राजनीतिक इच्छाशक्ति के कारण पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सका।
छोटे, विखंडित भूजोत
60% से अधिक किसानों के पास एक हेक्टेयर से छोटे भूजोत हैं और लगभग 40% किसानों के भूजोत तो 0.5 हेक्टेयर से भी छोटे हैं। जनसंख्या दबाव में औसत भूजोत आकार लगातार सिकुड़ रहा है, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी बँटवारे से भूमि और विखंडित होती है; छोटे, बिखरे भूजोत अलाभकारी हैं।
वाणिज्यीकरण का अभाव
बहुत-से छोटे व सीमांत किसान केवल अपने परिवार भर के लिए खाद्यान्न उगाते हैं; व्यापारिक, आधुनिक कृषि अधिकतर सिंचित क्षेत्रों तक सीमित है।
व्यापक अल्प रोज़गारी
विशेषकर असिंचित क्षेत्रों में मौसमी बेरोज़गारी 4 से 8 महीने तक रहती है, क्योंकि कृषि कार्य वर्ष-भर लगातार श्रम-गहन नहीं है।
कृषि योग्य भूमि का निम्नीकरण
दोषपूर्ण सिंचाई से क्षारता, लवणता व जलाक्रांतता, साथ ही अत्यधिक कीटनाशक प्रयोग व बहु-फ़सलीकरण से नाइट्रोजन योगीकरण में बाधा। यह सब मृदा उर्वरता घटाता है, विशेषकर सिंचित क्षेत्रों में।
पुस्तक किसानों की ऋणग्रस्तता व आत्महत्याओं को एक चिंतन-प्रश्न के रूप में उठाती है, तथ्य के रूप में नहीं। यदि इस पर लिखना हो तो “ऋणग्रस्तता एक जुड़ा हुआ कारक है” कहें, “ऋणग्रस्तता आत्महत्या का कारण है” नहीं। पुस्तक के अपने दावे से आगे न बढ़ें।
- नौ भू-उपयोग संवर्गों का योग रिपोर्टिंग क्षेत्र है, भौगोलिक क्षेत्र नहीं
- 5 संवर्ग बढ़े (1950-51 → 2019-20): वन, गैर-कृषि उपयोग, स्थायी चरागाह, वर्तमान परती भूमि, निवल बोया क्षेत्र। 4 घटे: बंजर व व्यर्थ-भूमि, कृषि योग्य व्यर्थ भूमि, फ़सल वृक्षों के अधीन क्षेत्र, पुरातन परती भूमि
- CPR भूमिहीन, सीमांत किसानों व ग्रामीण महिलाओं के लिए सबसे अधिक मायने रखते हैं
- सकल कृषि योग्य भूमि = निवल बोया गया क्षेत्र + सभी परती भूमि + कृषि योग्य व्यर्थ भूमि
- फ़सल गहनता (%) = (GCA ÷ NSA) × 100
- खरीफ़ (जून-सितंबर), रबी (अक्टूबर-मार्च), ज़ायद (अप्रैल-जून): तीन ऋतुएँ केवल उत्तरी व आंतरिक भारत में लागू
- कृषि के प्रकार: सिंचित (रक्षित / उत्पादक) व वर्षा निर्भर (शुष्क भूमि / आर्द्र भूमि)
- खाद्यान्न = बोए क्षेत्र का ~2/3; अनाज ~54%, दालें ~11%; तिलहन ~14%
- चावल, गेहूँ = प्रमुख अनाज; चना, अरहर = प्रमुख दालें; मूँगफली, तोरिया व सरसों = प्रमुख तिलहन; कपास, जूट = रेशेदार फ़सलें; गन्ना, चाय, कॉफ़ी = अन्य प्रमुख फ़सलें
- हरित क्रांति (1960 के दशक-मध्य): HYV + उर्वरक + निश्चित सिंचाई, शुरुआत में सिंचित क्षेत्रों तक सीमित
- आठ समस्याएँ: अनियमित मानसून, निम्न उत्पादकता, ऋणग्रस्तता, भूमि सुधारों की कमी, विखंडित भूजोत, वाणिज्यीकरण का अभाव, अल्प रोज़गारी, भूमि निम्नीकरण
- 1 अंकनिम्न में से कौन-सा भू-उपयोग संवर्ग नहीं है?
(क) परती भूमि(ख) सीमांत भूमि(ग) निवल बोया क्षेत्र(घ) कृषि योग्य व्यर्थ भूमि - 1 अंकपिछले 40 वर्षों में वनों का अनुपात बढ़ने का मुख्य कारण क्या है?
(क) वनीकरण के विस्तृत व सक्षम प्रयास(ख) सामुदायिक वनों के अधीन क्षेत्र में वृद्धि(ग) वन बढ़ोतरी हेतु निर्धारित अधिसूचित क्षेत्र में वृद्धि(घ) वन क्षेत्र प्रबंधन में लोगों की बेहतर भागीदारी - 1 अंकसिंचित क्षेत्रों में भू-निम्नीकरण का मुख्य प्रकार कौन-सा है?
(क) अवनालिका अपरदन(ख) वायु अपरदन(ग) मृदा लवणता(घ) भूमि पर सिल्ट का जमाव - 1 अंकशुष्क कृषि में निम्न में से कौन-सी फ़सल नहीं बोई जाती?
(क) रागी(ख) ज्वार(ग) मूँगफली(घ) गन्ना - 1 अंकनिम्न में से कौन से देशों में गेहूँ व चावल की HYV किस्में विकसित की गई थीं?
(क) जापान तथा ऑस्ट्रेलिया(ख) संयुक्त राज्य अमेरिका तथा जापान(ग) मैक्सिको तथा फिलीपींस(घ) मैक्सिको तथा सिंगापुर - 1 अंकहरित क्रांति शुरुआत में किन क्षेत्रों तक सीमित थी?
(क) केवल वर्षा-निर्भर क्षेत्र(ख) पहाड़ी राज्य(ग) केवल सिंचित क्षेत्र(घ) तटीय राज्य - 1 अंकइनमें से किस दाल को “लाल चना” या “पिजन पी” भी कहा जाता है?
(क) चना(ख) तुर (अरहर)(ग) मूँग(घ) उड़द - 1 अंकपाँच वर्षों से अधिक समय तक कृषिरहित परती भूमि किस संवर्ग में वर्गीकृत होती है?
(क) वर्तमान परती भूमि(ख) बंजर भूमि(ग) कृषि योग्य व्यर्थ भूमि(घ) निवल बोया क्षेत्र
कारण (R): पंजाब व हरियाणा के सिंचित क्षेत्रों में चावल की कृषि हरित क्रांति के बाद केवल 1970 के दशक में शुरू की गई थी।
कारण (R): वन के रूप में वर्गीकृत क्षेत्र वह है जिसे सरकार ने वन वृद्धि हेतु सीमांकित किया है, जो वास्तविक वृक्ष आच्छादन में बिना कोई वृद्धि हुए भी बढ़ सकता है।
कारण (R): बहुत-से भूमिहीन व सीमांत परिवार पशुपालन से मिलने वाली आय पर निर्भर हैं, जिसके लिए CPR चारा उपलब्ध कराते हैं।
- 3 अंकबंजर भूमि तथा कृषि योग्य व्यर्थ भूमि में अंतर स्पष्ट करें।
- 3 अंकनिवल बोया गया क्षेत्र तथा सकल बोया गया क्षेत्र में अंतर बताएँ।
- 3 अंकभारत जैसे देश में फ़सल गहनता बढ़ाने की नीति अपनाने की आवश्यकता क्यों है?
- 3 अंककुल कृषि योग्य भूमि को किस प्रकार मापा जाता है?
- 3 अंकशुष्क कृषि तथा आर्द्र कृषि में क्या अंतर हैं?
- 3 अंकरक्षित सिंचाई तथा उत्पादक सिंचाई में क्या अंतर है?
- 3 अंकपंजाब व हरियाणा आज चावल के प्रमुख उत्पादक होते हुए भी परंपरागत चावल उत्पादक राज्य क्यों नहीं गिने जाते?
- 3 अंकसाझा संपत्ति संसाधन क्या हैं, और ये विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं?
- 5 अंकभारत में भूसंसाधनों की विभिन्न प्रकार की पर्यावरणीय समस्याएँ कौन-सी हैं? उनका निदान कैसे किया जाए?
- 5 अंकभारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् कृषि विकास की महत्वपूर्ण नीतियों का वर्णन करें।
- 5 अंकभारत की किन्हीं दो अनाज फ़सलों की कृषि दशाओं, प्रमुख उत्पादक राज्यों तथा पैदावार की प्रवृत्ति का वर्णन करें।
- 5 अंकभारतीय कृषि की किन्हीं चार समस्याओं की व्याख्या करें, हर एक के लिए एक उदाहरण या आँकड़े सहित।
- 1 अंकइस ज़िले में किस प्रकार की कृषि की जा रही है?
- 1 अंकइसी प्रकार की कृषि के अंतर्गत उगाई जाने वाली एक और फ़सल का नाम बताएँ।
- 2 अंकयहाँ के किसान नहरी सिंचाई की बजाय नमी संरक्षण पर क्यों निर्भर हैं, दो बिंदुओं में समझाएँ।