Class 12 Sociology Chapter 2 भारतीय समाज की जनसांख्यिकीय संरचना NCERT Solutions

एनसीईआरटी कक्षा 12 समाजशास्त्र, भारतीय समाज, अध्याय 2 भारतीय समाज की
जनसांख्यिकीय संरचना
के अंत में छपे सभी छह अभ्यास प्रश्नों के पूर्ण उत्तर, और उसके बाद पाठ के बीच पूछे गए सभी क्रियाकलाप और प्रश्न।
प्रश्न पुस्तक के अपने शब्दों में दिए गए हैं, और हर उत्तर उसी तरह लिखा
गया है जैसे परीक्षा में लिखा जाना चाहिए।

1 प्रश्न 1

प्रश्न 1

प्र. जनसांख्यिकीय संक्रमण के सिद्धांत के बुनियादी तर्क को स्पष्ट कीजिए।
संक्रमण अवधि ‘जनसंख्या विस्फोट’ के साथ क्यों जुड़ी है?

उत्तर:

मूल तर्क। जनसांख्यिकीय संक्रमण सिद्धांत जनसंख्या वृद्धि को समग्र
आर्थिक विकास के स्तरों से जोड़ता है, और मानता है कि हर समाज एक विशिष्ट
प्रतिमान से गुज़रता है। इसकी तीन मूल अवस्थाएँ हैं।

अवस्था 1। एक अल्पविकसित और तकनीकी रूप से पिछड़े समाज में निम्न
जनसंख्या वृद्धि। वृद्धि दर कम है क्योंकि मृत्यु दर और जन्म दर दोनों बहुत
ऊँची हैं, इसलिए दोनों के बीच का अंतर, यानी शुद्ध वृद्धि दर, कम रहता है।

अवस्था 2। संक्रमणकालीन अवस्था, पिछड़े से उन्नत समाज की ओर गति। यह
अवस्था जनसंख्या की बहुत ऊँची वृद्धि दर से पहचानी जाती है।

अवस्था 3। फिर से निम्न वृद्धि, एक विकसित समाज में जहाँ मृत्यु दर
और जन्म दर दोनों काफ़ी घट चुकी हैं और उनके बीच का अंतर फिर से छोटा हो जाता है।

संक्रमण ‘जनसंख्या विस्फोट’ क्यों लाता है। क्योंकि दोनों दरें
साथ-साथ नहीं गिरतीं। मृत्यु दर उन्नत रोग-नियंत्रण, लोक स्वास्थ्य और बेहतर
पोषण के ज़रिए अपेक्षाकृत तेज़ी से गिरती है। पर समाज को ग़रीबी और ऊँची
मृत्यु दर के दौर में विकसित हुए अपने प्रजनन व्यवहार को समृद्धि और लंबी आयु
की नई स्थिति के अनुसार बदलने में काफ़ी लंबा समय लगता है। इसलिए कुछ समय तक
अपेक्षाकृत कम लोग मरते हैं जबकि अब भी बहुत से जन्म होते
रहते हैं, और दोनों दरों के बीच बढ़ता यह अंतर ही जनसंख्या विस्फोट है।

यह संक्रमण पश्चिमी यूरोप में उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के आरंभ
में पूरा हुआ, और मृत्यु दर के गिरने के साथ जन्म दर घटाने के लिए संघर्ष कर
रहे अन्य कम विकसित देशों में भी लगभग यही प्रतिमान चलता है। भारत में
जनसांख्यिकीय संक्रमण अभी पूरा नहीं हुआ है, क्योंकि मृत्यु दर कम कर दी गई है पर
जन्म दर उसी अनुपात में नहीं घटाई जा सकी है।

2 प्रश्न 2

प्रश्न 2

प्र. माल्थस का यह विश्वास क्यों था कि अकाल और महामारी जैसी
विनाशकारी घटनाएँ, जो बड़े पैमाने पर मृत्यु का कारण बनती हैं, अपरिहार्य हैं?

उत्तर:

थॉमस रॉबर्ट माल्थस (1766-1834) ने अपने निबंध एन एस्से ऑन द प्रिंसिपल ऑफ़ पॉपुलेशन
(1798) में तर्क दिया कि मानव जनसंख्या जीविका के साधनों, विशेषकर भोजन, साथ
ही वस्त्र और कृषि पर आधारित अन्य उत्पादों की तुलना में कहीं तेज़ी से बढ़ती
है। जनसंख्या ज्यामितीय क्रम में बढ़ती है, जैसे 2, 4, 8, 16, 32, जबकि कृषि
उत्पादन में वृद्धि गणितीय या समांतर (अंकगणितीय) क्रम में होती है, जैसे 2, 4, 6, 8, 10।

चूँकि जनसंख्या वृद्धि जीविका के साधनों के उत्पादन में वृद्धि से हमेशा
आगे निकल जाती है, माल्थस का मानना था कि मानवता हमेशा के लिए ग़रीबी में जीने
को अभिशप्त है, और समृद्धि बढ़ाने का एकमात्र तरीका जनसंख्या वृद्धि पर
नियंत्रण है।

उनका मानना था कि मानवता के पास स्वेच्छा से अपनी जनसंख्या वृद्धि घटाने
की केवल सीमित क्षमता है, जिसे वे कृत्रिम निरोध कहते थे, जैसे विवाह
टालना, यौन संयम या ब्रह्मचर्य अपनाना। चूँकि ये स्वैच्छिक तरीक़े पर्याप्त
नहीं होंगे, माल्थस का मानना था कि प्राकृतिक निरोध, यानी अकाल और
महामारी जैसी घटनाएँ जो बड़े पैमाने पर मृत्यु का कारण बनती हैं, अपरिहार्य
हैं। उन्हें प्रकृति का जनसंख्या और भोजन आपूर्ति के बीच के असंतुलन को दूर
करने का तरीक़ा माना जाता था। बॉक्स 2.1 के उद्धरण में माल्थस का क्रम यह है: पहले
“मनुष्यों के दुर्गुण ही जनसंख्या को घटाने के सक्रिय और सक्षम कारक होते हैं”; वे
असफल हों तो “बीमारियाँ, महामारियाँ, घातक रोग और प्लेग आदि” उनका स्थान ले लेते
हैं; और अंत में अकाल।

3 प्रश्न 3

प्रश्न 3

प्र. मृत्यु दर और जन्म दर का क्या अर्थ है? कारण स्पष्ट कीजिए कि
जन्म दर में गिरावट अपेक्षाकृत धीमी गति से क्यों आती है जबकि मृत्यु दर बहुत
तेज़ी से गिरती है।

उत्तर:

जन्म दर किसी क्षेत्र में एक निश्चित अवधि, आमतौर पर एक वर्ष, में
हुए कुल जीवित जन्मों को उस क्षेत्र की कुल जनसंख्या (हज़ार में) से भाग देकर
निकाली जाती है, यानी प्रति 1000 जनसंख्या पर जीवित जन्म। मृत्यु दर
किसी क्षेत्र में एक निश्चित समय में हुई मौतों की संख्या है, प्रति 1000
जनसंख्या पर।

मृत्यु दर अपेक्षाकृत तेज़ी से गिरती है क्योंकि यह रोग-नियंत्रण, जनस्वास्थ्य
और बेहतर पोषण के उन्नत तरीकों के द्वारा नीचे लाई जा सकती है, जैसे भारत में अकाल और महामारी रोगों पर नियंत्रण से मृत्यु दर 1921 के बाद
तेज़ी से गिरी।

जन्म दर धीरे-धीरे गिरती है क्योंकि यह एक सामाजिक-सांस्कृतिक प्रघटना
है, जो अपेक्षाकृत धीरे बदलती है। परिवार का आकार, विवाह की आयु और संतान की
संख्या जैसे निर्णय गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़े होते हैं,
जो ग़रीबी और ऊँची मृत्यु दर के दौर में बनी थीं और नई परिस्थितियों के अनुसार
बदलने में लंबा समय लेती हैं। सामान्यतः समृद्धि का बढ़ता स्तर जन्म दर को
मजबूती से नीचे खींचता है: एक बार शिशु मृत्यु दर घटने और शिक्षा-जागरूकता बढ़ने
पर परिवार का आकार छोटा होने लगता है।

4 प्रश्न 4

प्रश्न 4

प्र. भारत में कौन-कौन से राज्य जनसंख्या संवृद्धि के ‘प्रतिस्थापन
स्तरों’ को प्राप्त कर चुके हैं अथवा प्राप्ति के बहुत नज़दीक हैं? कौन-से
राज्यों में अब भी जनसंख्या संवृद्धि की दरें बहुत ऊँची हैं? आपकी राय में इन
क्षेत्रीय अंतरों के क्या कारण हो सकते हैं?

उत्तर:

प्रतिस्थापन स्तर पर या उसके नज़दीक पहुँच चुके राज्य। 2016 में
आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल ने अपनी कुल
प्रजनन दर 1.7 (2016) तक नीचे ला दी थी, जो प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है।
केरल की कुल प्रजनन दर भी प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है, इसलिए इसकी जनसंख्या
भविष्य में घटने वाली है।

अब भी बहुत ऊँची वृद्धि दर वाले राज्य। 2016 में बिहार की कुल
प्रजनन दर 3.3, उत्तर प्रदेश की 3.1, मध्य प्रदेश की 2.8 और राजस्थान की 2.7
थी, और ये सभी प्रतिस्थापन स्तर से बहुत ऊपर हैं। सांख्यिकी नमूना पंजीकरण
प्रणाली रिपोर्ट 2020 के अनुसार बिहार (25.5) और उत्तर प्रदेश (25.1) की
अशोधित जन्म दर भारत में सबसे ऊँची है।

संभावित कारण (आपकी राय)। पुस्तक बताती है कि जन्म दर एक
सामाजिक-सांस्कृतिक प्रघटना है, कि समृद्धि का बढ़ता स्तर इसे मजबूती से नीचे
खींचता है, और कि शिशु मृत्यु दर घटने व शिक्षा-जागरूकता बढ़ने पर परिवार का
आकार छोटा होने लगता है। पुस्तक राज्यवार इतिहास नहीं देती, इसलिए आगे की बात
अपनी राय के रूप में लिखिए: जिन राज्यों में साक्षरता (विशेषकर स्त्री साक्षरता),
स्वास्थ्य सुविधाएँ और आर्थिक विकास अधिक है, वहाँ परिवार छोटे होते जाते हैं
और जन्म दर तेज़ी से घटती है। इसके विपरीत, जहाँ ग़रीबी, अशिक्षा और ऊँची शिशु
मृत्यु दर बनी रहती है, वहाँ परिवार बड़े रखने की प्रवृत्ति बनी रहती है और
प्रजनन दर ऊँची रहती है।

5 प्रश्न 5

प्रश्न 5

प्र. जनसंख्या की ‘आयु संरचना’ का क्या अर्थ है? आर्थिक विकास और
संवृद्धि के लिए उसकी क्या प्रासंगिकता है?

उत्तर:

आयु संरचना कुल जनसंख्या के सापेक्ष विभिन्न आयु वर्गों में लोगों
का अनुपात है। यह विकास के स्तर और औसत आयु संभाविता के साथ बदलती है: शुरू
में कमज़ोर चिकित्सा सुविधाएँ, बीमारी और ऊँची शिशु-मातृ मृत्यु दर छोटी आयु
सीमा बनाती हैं; विकास के साथ आयु संभाविता बढ़ती है, इसलिए छोटे आयु वर्गों
में छोटा और बड़े आयु वर्गों में बड़ा अनुपात रह जाता है।

आर्थिक प्रासंगिकता। आयु संरचना पराश्रितता अनुपात तय करती
है: पराश्रितों, यानी काम करने के लिए बहुत बूढ़े वृद्ध और बहुत छोटे बच्चों, की
तुलना कार्यशील आयु वर्ग (आमतौर पर 15 से 64 वर्ष) से। जब कार्यशील आयु वर्ग
का अनुपात बढ़ता है और पराश्रितता अनुपात घटता है, तो समाज को जनसांख्यिकीय
लाभांश
मिल सकता है, यानी अनर्जकों की तुलना में अधिक अर्जक होने का लाभ।
भारत का कुल पराश्रितता अनुपात 1970 के 79 से 2005 में 64 पर आ गया; आयु आधारित
पराश्रितता अनुपात 2025 में 48 तक गिर सकता है और 2050 में फिर 50 तक पहुँच जाएगा।
भारत में 2011 में एक-तिहाई जनसंख्या 15 वर्ष से कम आयु की थी और 2020 में
औसत भारतीय की आयु केवल 29 वर्ष थी (चीन-अमेरिका में 37, जापान में 48 के
मुक़ाबले), जो एक बड़े संभावित कार्यशील श्रम बल की ओर इशारा करता है। पर
पुस्तक स्पष्ट करती है कि यह लाभ अपने आप नहीं मिलता। यह तभी वास्तविक आर्थिक
वृद्धि में बदलता है जब कार्यशील आयु वर्ग की वृद्धि के साथ शिक्षा और रोज़गार
के स्तर भी बढ़ें, अन्यथा अशिक्षित और बेरोज़गार युवा अर्जक के बजाय पराश्रित
ही बने रहते हैं।

6 प्रश्न 6

प्रश्न 6

प्र. ‘स्त्री-पुरुष अनुपात’ का क्या अर्थ है? एक गिरते हुए
स्त्री-पुरुष अनुपात के क्या निहितार्थ हैं? क्या आप यह महसूस करते हैं कि
माता-पिता आज भी बेटियों की बजाय बेटों को अधिक पसंद करते हैं? आप की राय में
इस पसंद के क्या-क्या कारण हो सकते हैं?

उत्तर:

स्त्री-पुरुष अनुपात किसी क्षेत्र में किसी निश्चित समय पर प्रति
1000 पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या है।

घटते अनुपात के प्रभाव। भारत का स्त्री-पुरुष अनुपात एक सदी से
अधिक समय से घट रहा है, और बाल स्त्री-पुरुष अनुपात (0-6 वर्ष) तो और भी तेज़ी
से गिरा है: 1961 के 976 से 2011 में 919 तक, और 2001 में यह पहली बार समग्र
अनुपात से भी नीचे चला गया। इसके प्रभावों में शामिल हैं: लैंगिक असंतुलन का
गहराना, तथा यह संकेत कि समाज में बालिकाओं के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार मौजूद
है। (आप अपनी राय में आगे की समस्याएँ, जैसे विवाह-योग्य आयु में स्त्रियों की
कमी, भी जोड़ सकते हैं; पुस्तक इसकी चर्चा नहीं करती।) कम-से-कम नौ राज्य और
संघ राज्य क्षेत्र 900 से नीचे हैं, हरियाणा सबसे ख़राब (793) और
अरुणाचल प्रदेश सबसे अच्छा (972) है।

क्या बेटे को प्राथमिकता आज भी है। घटते बाल अनुपात से लगता है कि
यह प्राथमिकता आज भी मौजूद है; पुस्तक के अनुसार बाल स्त्री-पुरुष अनुपात में
गिरावट के अनेक कारण हैं और इनका स्रोत बालिकाओं के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार
में खोजना होगा। इनमें प्रमुख हैं: बालिकाओं की शैशवावस्था में उपेक्षा
(जिससे उनकी मृत्यु दर ऊँची होती है), लिंग-विशिष्ट गर्भपात (सोनोग्राम जैसी
तकनीकों के दुरुपयोग से बालिकाओं को जन्म लेने से रोकना), और कुछ क्षेत्रों
में बालिका शिशुओं की हत्या।

संभावित कारण। पुस्तक दिखाती है कि यह ग़रीबी, अज्ञानता या संसाधनों
की कमी का मामला नहीं है: पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली जैसे समृद्ध
क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति आय बहुत उच्च है पर बाल स्त्री-पुरुष अनुपात बहुत
निम्न है। कभी-कभी आर्थिक दृष्टि से समृद्ध परिवार अपेक्षाकृत कम (अक्सर एक या
दो) बच्चे चाहते हैं और अपनी पसंद के अनुसार ही लड़का या लड़की पैदा करना चाहते हैं, जो
अल्ट्रासाउंड तकनीक ने संभव बना दिया है। यह गहरी सामाजिक मान्यताओं से जुड़ा
है जो बेटों को बेटियों से अधिक महत्व देती हैं, और पुस्तक के अनुसार इसका
दीर्घकालीन समाधान समाज की अभिवृत्तियों पर अत्यधिक निर्भर करता है, हालाँकि नियम
एवं क़ानून भी इसमें मदद कर सकते हैं।

7 पाठ के भीतर के क्रियाकलाप और प्रश्न

अध्याय पाठ के बीच में भी प्रश्न पूछता है: चार क्रियाकलाप बॉक्स, बॉक्स 2.2 के बाद एक प्रश्न, “चार्ट 3 के लिए अभ्यास” और बॉक्स 2.5 के बाद एक प्रश्न। ये यहाँ उसी क्रम में दिए गए हैं जिस क्रम में पुस्तक इन्हें छापती है, आदर्श उत्तरों सहित। जहाँ क्रियाकलाप पता लगाने, सर्वेक्षण करने या चर्चा करने को कहता है, वहाँ उत्तर बताता है कि एक अच्छे उत्तर में क्या-क्या होना चाहिए; इसे अपनी खोज के साथ मिलाकर उपयोग करें।

क्रियाकलाप 2.1

प्र. पिछले पृष्ठ पर दिए गए अनुभाग और बॉक्स 2.1 में माल्थस के उद्धरण को पढ़िए। माल्थस के गलत साबित होने का एक कारण यह था कि कृषि की उत्पादकता में बहुत अधिक वृद्धि हो गई। वे कौन-से कारक थे जिनकी वजह से उत्पादकता बढ़ गई? क्या आप इन कारकों का पता लगा सकते हैं? माल्थस के गलत साबित होने के कुछ अन्य कारण क्या हो सकते हैं? इस विषय पर अपने सहपाठियों से चर्चा करें और अपने अध्यापक की सहायता से इन कारकों की सूची बनाएँ।

उत्तर: कृषि उत्पादकता बढ़ाने वाले कारकों में सिंचाई का विस्तार (जिसका नाम पुस्तक स्वयं भारत के संदर्भ में लेती है), बेहतर बीज, उर्वरक और कृषि मशीनें (पुस्तक से बाहर), तथा परिवहन और संचार के बेहतर साधन शामिल हैं, जिनसे अनाज अधिशेष क्षेत्रों से कमी वाले क्षेत्रों तक पहुँच सका। माल्थस के गलत साबित होने के अन्य कारण, अध्याय के अनुसार:

  • यूरोपीय देशों का ऐतिहासिक अनुभव: उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से जन्म दरें घटीं और महामारियाँ नियंत्रित हुईं, तथा तीव्र जनसंख्या वृद्धि के बावजूद खाद्य उत्पादन और जीवन-स्तर दोनों बढ़ते रहे।
  • कुछ विचारकों के अनुसार आर्थिक वृद्धि जनसंख्या वृद्धि से आगे निकल सकती है।
  • उदारवादी और मार्क्सवादी आलोचकों ने दिखाया कि ग़रीबी और भुखमरी जनसंख्या वृद्धि से नहीं, बल्कि आर्थिक संसाधनों के असमान बँटवारे से होती हैं।
  • समाज अपना प्रजनन व्यवहार बदलते हैं: समृद्धि बढ़ने, शिशु मृत्यु दर घटने और शिक्षा फैलने पर परिवार का आकार घटने लगता है, जैसा जनसांख्यिकीय संक्रमण का सिद्धांत दिखाता है।
क्रियाकलाप 2.2

प्र. यह जानने का प्रयास करें कि जन्मदर मृत्युदर की तुलना में कम क्यों है? कुछ ऐसे कारण हो सकते हैं जो परिवार या दंपति के इस निर्णय को प्रभावित कर सकते हैं कि वे कितने बच्चे पैदा करें? अपने परिवार या पास-पड़ोस के बुजुर्गों से उन संभावित कारणों के बारे में पता कीजिए कि पुराने ज़माने में लोग ज़्यादा बच्चे क्यों चाहते थे?

ध्यान दें: अध्याय के पाठ के अनुसार प्रश्न का आशय यह है कि जन्म दर धीरे-धीरे क्यों घटती है, जबकि मृत्यु दर अपेक्षाकृत तेज़ी से गिर सकती है।

उत्तर: मृत्यु दर तेज़ी से इसलिए गिर सकती है क्योंकि उसे घटाने वाले उपाय परिवार के बाहर से उपलब्ध कराए जा सकते हैं: रोग-नियंत्रण, बड़े पैमाने पर टीकाकरण, स्वच्छता, जनस्वास्थ्य और बेहतर पोषण। जन्म दर धीरे घटती है क्योंकि यह एक सामाजिक-सांस्कृतिक प्रघटना है; समाज को अपना प्रजनन व्यवहार बदलने में काफ़ी लंबा समय लगता है। दंपति के निर्णय को प्रभावित करने वाले कारक हैं: परिवार की आय और समृद्धि, बच्चों के जीवित रहने की संभावना (शिशु मृत्यु दर), शिक्षा और जागरूकता का स्तर (विशेषकर स्त्रियों की), बेटे को अधिमान्यता, बच्चों के श्रम या बुढ़ापे के सहारे की ज़रूरत, और परिवार नियोजन के साधनों तक पहुँच। बुज़ुर्ग संभवतः ये कारण बता सकते हैं (अपनी बातचीत से इन्हें जाँचिए): बहुत से बच्चे छोटी उम्र में मर जाते थे, इसलिए कुछ के बचे रहने के लिए अधिक बच्चे होते थे; बच्चे खेत और घर के काम में हाथ बँटाते थे; बुढ़ापे के सहारे के लिए बेटे चाहिए थे; और परिवार नियोजन की जानकारी या साधन कम थे।

बॉक्स 2.2 के बाद (कोविड-19)

प्र. 2020-21 में पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी से मिली। मीडिया स्रोतों से जानकारी एकत्रित करें और उसकी तुलना इस बॉक्स में जो दिया गया है उससे करें।

उत्तर: समाचार-पत्रों और सरकारी स्रोतों से अपनी जानकारी एकत्र करें, फिर इन बिंदुओं पर तुलना करें। दोनों विश्वव्यापी महामारियाँ थीं, यानी बहुत विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र में फैली महामारियाँ, और दोनों श्वसन तंत्र पर हमला करने वाले विषाणु से फैलीं। बॉक्स के अनुसार यद्यपि प्रथम विश्व युद्ध इस फ्लू का प्रत्यक्ष कारण नहीं था, सैनिकों के साथ-साथ रहने और सामूहिक आवागमन से यह तेज़ी से फैला; कोविड-19 कैसे फैला, यह अपने स्रोतों से देखिए। बॉक्स के अनुसार इंफ्लूएंज़ा से विश्व में कम-से-कम 4 करोड़ लोग मरे और भारत में अनुमानतः 170 लाख, यानी तत्कालीन जनसंख्या का लगभग 5%। कोविड-19 के जो आँकड़े आप एकत्र करें, उनसे इसकी तुलना करें, और सौ साल के अंतर पर ध्यान दें: कोविड-19 के टीके कितने समय में बने, यह अपने स्रोतों से देखिए, जबकि बॉक्स के अनुसार इंफ्लूएंज़ा विषाणु के आनुवंशिक बदलाव उसे मौजूदा टीकों से बचा लेते थे; लॉकडाउन, जाँच और जनसंचार माध्यमों ने भी कोविड-19 से निपटने के तरीक़े को आकार दिया।

चार्ट 3 के लिए अभ्यास

प्र. इस चार्ट का सावधानीपूर्वक अध्ययन करें। अपने अध्यापक की सहायता से यह पता लगाने का प्रयत्न करें कि 1961 की नयी पीढ़ी (0-4 आयु समूह) जब आने वाले वर्षों में पिरामिड में ऊपर की ओर बढ़ती जाएगी तो उसकी क्या स्थिति होगी।

  • वर्ष 1961 का 0-4 आयु समूह परवर्ती वर्षों के पिरामिडों में कहाँ स्थित होगा? बीस साल बाद 1981 के पिरामिड में यह 20-24 आयु समूह होगा, 2001 के पिरामिड में 40-44 आयु समूह, और 2026 के पिरामिड में 65-69 आयु समूह। ऊपर जाते हुए इसकी पट्टी छोटी होती जाती है, क्योंकि हर अवस्था में इस पीढ़ी के कुछ सदस्यों की मृत्यु हो जाती है।
  • जब आप 1961 से 2026 की ओर बढ़ेंगे तो पिरामिड का कौन सा हिस्सा सबसे चौड़ा होगा? 1961 में सबसे चौड़ी पट्टी बिल्कुल नीचे, 0-4 आयु समूह में है। पुस्तक के अनुसार जन्म दर धीरे गिरती है, इसलिए 1961 और 1981 के बीच आधार में ज़्यादा बदलाव नहीं आता और शुरुआती पिरामिडों में सबसे चौड़ा भाग नीचे के पास रहता है। 2026 के अनुमान में सबसे चौड़ा हिस्सा ऊपर खिसककर मध्य आयु वर्गों में आ जाता है (सटीक आयु समूह चार्ट 3 में देखिए): यही वह उभार है जिसे अध्याय जनसांख्यिकीय लाभांश कहता है।
  • आपके विचार में वर्ष 2051 और 3001 में पिरामिड का आकार कैसा होगा? अगर जन्म दर घटती रही और आयु संभाविता बढ़ती रही, तो 2051 तक उभार और ऊपर, अधिक आयु के कार्यशील और 60+ आयु समूहों में पहुँच जाएगा, आधार सँकरा होगा, और आकार जापान जैसे बूढ़े होते विकसित देशों की तरह एक स्तंभ या उलटे पिरामिड जैसा दिखने लगेगा। 3001 के लिए कोई अनुमान संभव नहीं है; अगर जनसंख्या प्रतिस्थापन स्तर पर स्थिर हो जाए, तो पिरामिड लगभग एक आयत जैसा होगा, जिसमें बुढ़ापे तक लगभग बराबर पट्टियाँ होंगी।

चार्ट 4 में यह भी देखने लायक है: 2026 के अनुमानों में उत्तर प्रदेश के पिरामिड का सबसे चौड़ा हिस्सा अब भी छोटी आयु के वर्गों की ओर है, जबकि केरल का ऊपर, बीच की आयु में (सटीक आयु समूह चार्ट 4 में देखिए), क्योंकि केरल आयु संरचना के मामले में विकसित देशों की स्थिति को प्राप्त करने लगा है।

क्रियाकलाप 2.3

प्र. आपके विचार से आयु संरचना का पीढ़ियों के बीच के संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ता है? उदाहरण के लिए, क्या उच्च पराश्रितता अनुपात युवा एवं बुज़ुर्ग पीढ़ियों के बीच अधिक तनाव की परिस्थितियाँ पैदा कर सकता है? अथवा क्या यह युवा एवं बुज़ुर्ग के बीच अधिक घनिष्ठ और नज़दीकी संबंध बनाएगा? इन प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा करें और कारण बताते हुए अपने निष्कर्षों की सूची तैयार करने का प्रयत्न करें।

उत्तर: दोनों परिणाम संभव हैं, और उनके कारण अलग-अलग हैं।

  • तनाव: पराश्रितता अनुपात ऊँचा होने पर कार्यशील आयु के अपेक्षाकृत कम लोगों को अपेक्षाकृत अधिक पराश्रितों का बोझ उठाना पड़ता है। अगर रोज़गार कम हो, जैसा अध्याय 15-30 आयु वर्ग के लिए दिखाता है, तो युवा कमाने वाले बुज़ुर्ग माता-पिता और छोटे भाई-बहनों के ख़र्च से परेशान हो सकते हैं, और बुज़ुर्ग ख़ुद को उपेक्षित महसूस कर सकते हैं।
  • घनिष्ठ संबंध: हो सकता है कि संयुक्त या विस्तारित परिवारों में माता-पिता के काम पर जाने पर बुज़ुर्ग पोते-पोतियों को सँभालें, और युवा बुज़ुर्गों की देखभाल करते हैं; पराश्रितों की बड़ी संख्या परिवार को आपसी सहयोग पर निर्भर बनाती है, जिससे संबंध मज़बूत होते हैं।
  • परिणाम किस पर निर्भर है: रोज़गार और आय, वृद्धावस्था पेंशन या सामाजिक सुरक्षा है या नहीं, परिवार और गृहस्थी का प्रकार, और समुदाय में बड़ों की देखभाल व सम्मान के मूल्य।
क्रियाकलाप 2.4

प्र. अपने विद्यालय में यह पता लगाने के लिए एक छोटा सा सर्वेक्षण करें कि आपके साथी छात्रों के परिवार कब (यानी कितनी पीढ़ियों पहले) आपके क्षेत्र या वह स्थान जहाँ आपका विद्यालय स्थित है, में रहने के लिए आए थे। परिणामों की तालिका बनाकर उनके बारे में कक्षा में चर्चा करें। आपके द्वारा किया गया सर्वेक्षण ग्रामीण-नगरीय प्रवसनों के बारे में आपको क्या बताता है?

उत्तर: एक तालिका बनाइए जिसमें ये स्तंभ हों: छात्र, किस पीढ़ी ने प्रवास किया (स्वयं, माता-पिता, दादा-दादी, उससे पहले), मूल स्थान (गाँव या क़स्बा), और आने का कारण। आपके सर्वेक्षण में दिख सकता है कि बहुत से परिवार एक या दो पीढ़ी पहले, गाँवों या छोटे क़स्बों से, आए थे; इसे अपने परिणामों से जाँचिए। परिणामों को अध्याय में दिए ग्रामीण-नगरीय प्रवसन के कारणों के साथ पढ़ें: काम की तलाश, क्योंकि कस्बे या शहर ग्रामीण जनता को चुंबक की तरह अपनी ओर आकर्षित करते हैं; तालाबों, वन प्रदेशों और गोचर भूमियों जैसे साझी संपत्ति के संसाधनों में कमी; और शहर की सापेक्ष गुमनामी जैसे सामाजिक कारण। अगर सर्वेक्षण में बहुत से हाल के प्रवासी मिलें, तो यह अध्याय की इस बात की पुष्टि करता है कि बढ़ते शहर जनसंख्या के इस प्रवाह के साक्षी हैं, और महानगर ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे क़स्बों दोनों से प्रवासियों को आकर्षित करते हैं।

बॉक्स 2.5 के बाद

प्र. इन नीति लक्ष्यों को पढ़ें और इनके पहलुओं पर विचार विमर्श करें।

उत्तर: राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के लक्ष्य दिखाते हैं कि जनसंख्या नीति केवल वृद्धि धीमी करने से आगे बढ़कर व्यापक सामाजिक-जनसांख्यिकीय उद्देश्यों तक पहुँच गई है। जनस्वास्थ्य व्यय को समयबद्ध ढंग से जी.डी.पी. के 2.5 प्रतिशत तक बढ़ाने (पुस्तक के अनुसार वर्तमान में 1.04 प्रतिशत) का अर्थ है अधिक सरकारी अस्पताल, डॉक्टर और पैरामेडिक्स। वर्ष 2025 तक राष्ट्रीय और उप-राष्ट्रीय स्तर पर कुल प्रजनन दर को 2.1 पर लाने का अर्थ है हर राज्य को प्रतिस्थापन स्तर तक लाना, जिसके लिए बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे ऊँची प्रजनन दर वाले राज्यों में विशेष प्रयास चाहिए। पाँच वर्ष से कम आयु की मृत्यु दर को 23, नवजात शिशु मृत्यु दर को 16 और एम.एम.आर. को 100 तक घटाना उस समस्या पर चोट है जिसे अध्याय पिछड़ेपन और ग़रीबी का स्पष्ट सूचक कहता है; शिशु मृत्यु दर घटने से जन्म दर भी घटती है। जन्म के समय जीवन प्रत्याशा को 67.5 से 70 वर्ष करने से जनसंख्या का बूढ़ा होना भी बढ़ेगा। अध्याय की समापन सीख इन सब पर लागू होती है: राज्य परिस्थितियाँ बना सकता है, पर प्रजनन दर में अंततः आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।