इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. सांस्कृतिक विविधता को अध्याय जिस अर्थ में प्रयोग करता है, वह परिभाषित करें।
उत्तर: सांस्कृतिक विविधता का अर्थ है भाषा, धर्म, पंथ, प्रजाति या जाति जैसे चिह्नों से परिभाषित अनेक भिन्न-भिन्न सामाजिक समूहों और समुदायों का साथ रहना। “विविधता” शब्द असमानताओं के बजाय अंतरों पर बल देता है।
प्र. प्रदत्त पहचान क्या है?
उत्तर: ऐसी पहचान जो जन्म और अपनेपन पर आधारित होती है, किसी अर्जित योग्यता या उपलब्धि पर नहीं; यह वह है जो हम “हैं”, न कि जो हम “बन गए हैं”।
प्र. राज्य की मैक्स वेबर की परिभाषा दीजिए।
उत्तर: राज्य “एक ऐसा निकाय होता है जो एक विशेष क्षेत्र में विधिसम्मत एकाधिकार का सफलतापूर्ण दावा करता है” (वेबर 1970ः78)।
प्र. राष्ट्र-राज्य क्या है?
उत्तर: राष्ट्र-राज्य वह राष्ट्र है जिसने अपना राज्य पाने में सफलता पाई हो।
प्र. अध्याय के अनुसार क्षेत्रवाद किन आधारों पर पनपता है?
उत्तर: भारत में क्षेत्रवाद भारत की भाषाओं, संस्कृतियों, जनजातियों और धर्मों की विविधता के कारण पाया जाता है; विशेष क्षेत्रों में इन पहचान-चिह्नकों के भौगोलिक संकेंद्रण से इसे प्रोत्साहन मिलता है, और क्षेत्रीय वंचन का भाव अग्नि में घी का काम करता है।
प्र. राज्य पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट कब कार्यान्वित हुई?
उत्तर: 1 नवंबर 1956 को।
प्र. छोटी संख्या के अलावा, “अल्पसंख्यक” के समाजशास्त्रीय अर्थ में और क्या निहित है?
उत्तर: इसमें आमतौर पर असुविधा या हानि का कुछ भाव निहित होता है, और अल्पसंख्यक सदस्य एक सामूहिकता बनाते हैं: समूह के प्रति एकजुटता और अपनेपन की प्रबल भावना।
प्र. अध्याय में दी गई नागरिक समाज की परिभाषा दीजिए।
उत्तर: नागरिक समाज वह व्यापक, स्वैच्छिक क्षेत्र है जो परिवार के निजी क्षेत्र से परे है, पर राज्य और बाज़ार दोनों से बाहर है, जहाँ व्यक्ति संस्थाएँ-संगठन बनाते हैं और सामाजिक मुद्दे उठाते हैं।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. आत्मसात्करण और एकीकरण की नीतियों में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर: आत्मसात्करण सभी नागरिकों को एक समान सांस्कृतिक मूल्य और मानक अपनाने के लिए राज़ी, प्रोत्साहित या मजबूर करता है, जो आमतौर पर संपूर्ण रूप से या अधिकांशतः प्रभावशाली समूह के होते हैं, और समूहों की सांस्कृतिक विभिन्नताओं को मिटाने की कोशिश करता है। एकीकरण का उद्देश्य वही है पर शैली अलग: यह केवल सार्वजनिक संस्कृति को एक समान राष्ट्रीय स्वरूप तक सीमित रखता है, जबकि “गैर-राष्ट्रीय” संस्कृतियों को निजी क्षेत्र में बने रहने देता है।
प्र. कई राष्ट्रों की कोई एक साझा भाषा या धर्म क्यों नहीं होता? पुस्तक का तर्क दीजिए।
उत्तर: पुस्तक दोनों तरफ के उदाहरण देती है: कई राष्ट्रों की कोई एक साझा भाषा, धर्म या नृजातीयता नहीं है, और कई भाषाएँ, धर्म या नृजातीयताएँ कई राष्ट्रों में फैली हैं, फिर भी वे एक राष्ट्र में नहीं मिलतीं। इसलिए कोई एक सांस्कृतिक कसौटी किसी राष्ट्र को भरोसेमंद ढंग से परिभाषित या एकजुट नहीं करती।
प्र. समुदायिक पहचान को “प्रदत्त” क्यों कहा जाता है, और यह इतनी पूर्ण क्यों महसूस होती है?
उत्तर: सामुदायिक पहचान “प्रदत्त” है क्योंकि यह पूरी तरह जन्म से तय होती है, इसमें कोई पूर्वशर्त और कोई चुनाव नहीं होता, किसी पेशे या टीम के विपरीत जिसके लिए परीक्षा पास करनी या कौशल दिखाना होता है। फिर भी यह बिना-शर्त सदस्यता पूर्ण भी होती है: लोग इससे गहराई से भावनात्मक रूप से जुड़े रहते हैं, ठीक इसलिए क्योंकि यह आकस्मिक है और लगभग असंभव-सा छोड़ना है।
प्र. पुस्तक दोहरी नागरिकता का क्या उदाहरण देती है, और यह क्या दिखाता है?
उत्तर: यहूदी अमेरिकी एक साथ इज़राइल और अमेरिका, दोनों के नागरिक हो सकते हैं, और एक देश की सेना में दूसरे की नागरिकता खोए बिना सेवा कर सकते हैं। यह दिखाता है कि आधुनिक एक-राष्ट्र-एक-राज्य का बंधन कोई निरपेक्ष या सार्वभौमिक नियम नहीं है।
प्र. सन् 2000 में छत्तीसगढ़, उत्तरांचल और झारखंड का निर्माण पहले हुए भाषायी पुनर्गठन से कैसे भिन्न था?
उत्तर: पहले का पुनर्गठन (1956, SRC के बाद) मुख्यतः भाषा से प्रेरित था। सन् 2000 के निर्माणों में भाषा की कोई प्रमुख भूमिका नहीं थी; जनजातीय पहचान, भाषा, क्षेत्रीय वंचन और पारिस्थितिकी पर आधारित नृजातीयता ने मिलकर राज्यत्व का आधार बनाया।
प्र. पुस्तक ‘राज्य’ शब्द को मोटे और सामान्य अक्षरों में लिखने का जो भेद बताती है, वह क्या है?
उत्तर: जहाँ ‘राज्य’ शब्द मोटे अक्षरों में लिखा गया है, वहाँ वह भारतीय राष्ट्र-राज्य के भीतर एक संघीय इकाई का द्योतक है; जहाँ वह सामान्य अक्षरों में लिखा गया है, वहाँ वह व्यापक संकल्पना श्रेणी के लिए प्रयुक्त हुआ है, जैसे ‘राष्ट्र-राज्य’ में।
प्र. पारसी और सिख को एक अर्थ में वंचित और दूसरे में नहीं, ऐसे अल्पसंख्यक के उदाहरण के रूप में क्यों दिया जाता है?
उत्तर: वे आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत संपन्न हो सकते हैं, फिर भी हिंदुओं की विशाल बहुसंख्या के सामने अपनी छोटी संख्या के कारण सांस्कृतिक रूप से वंचित हो सकते हैं, जो दिखाता है कि कोई समूह एक अर्थ (सांस्कृतिक) में सुविधावंचित और दूसरे अर्थ (आर्थिक) में संपन्न हो सकता है।
प्र. पुस्तक धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक संरक्षण के बीच जो तनाव बताती है, वह क्या है?
उत्तर: अल्पसंख्यक संरक्षण का अर्थ है उन्हें विशेष ध्यान देना जहाँ सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया उन्हें नुकसान पहुँचाती है, पर इससे “तुष्टीकरण” का आरोप लगता है। विरोधी इसे वोट पाने का बहाना कहते हैं; समर्थक कहते हैं कि ऐसे संरक्षण के बिना धर्मनिरपेक्षता बहुसंख्यक के मूल्य अल्पसंख्यकों पर थोपने का बहाना बन सकती है।
प्र. भारत में केंद्र-राज्य संबंध किन संवैधानिक उपबंधों से तय होते हैं?
उत्तर: संविधान राज्य-सूची, केंद्र-सूची और दोनों के लिए साझा समवर्ती सूची देता है; राज्य विधानमंडल राज्यसभा की संरचना तय करते हैं; और केंद्र-राज्य संबंधों के लिए आवधिक समितियाँ बनती हैं, जैसे वित्त आयोग, जो हर पाँच वर्ष में केंद्र-राज्य कर-राजस्व बँटवारे के लिए गठित होता है। प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में भी राज्यों की अपनी विस्तृत योजनाएँ शामिल होती हैं, जो हर राज्य के अपने राज्य योजना आयोग द्वारा तैयार की जाती हैं।
प्र. “विविधता में अनेकता” मुहावरे का क्या अर्थ है, और यह संविधान में कैसे पहुँचा?
उत्तर: ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध लंबे संघर्ष में भारतीय राष्ट्रवादियों ने भारत की विविधता को मान्यता और आदर देने की आवश्यकता समझी, और “विविधता में अनेकता” का मुहावरा भारतीय समाज के बहुल एवं विविध स्वरूप को समझने का एक सूत्र बन गया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कई अधिवेशनों में अल्पसंख्यक और सांस्कृतिक अधिकारों को लेकर बहस हुई, और यह बहस आगे चलकर संविधान का हिस्सा बनी (ज़ैदी 1984)।
प्र. बॉक्स 6.8 में दिया गया कबीर का दोहा भारत की किस परंपरा को दर्शाता है?
उत्तर: भारत में धार्मिक बहुलवाद की एक लंबी परंपरा है, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व से लेकर वास्तविक समन्वयवाद तक, जो भक्ति और सूफी आंदोलनों के भक्ति-गीतों में स्पष्ट दिखती है। कबीरदास का दोहा, “मोको कहाँ ढूंढ़े रे बंदे, मैं तो तेरे पास में”, इसी समन्वयी, धार्मिक भेद से परे परंपरा का एक चिरस्थायी प्रतीक है।
प्र. गांधी और टैगोर ने अपवर्जक (exclusive) राष्ट्रवाद की किस तरह आलोचना की?
उत्तर: भारतीय राष्ट्रवाद की प्रभावशाली प्रवृत्ति समावेशी और लोकतांत्रिक रही, जिसमें “लोग” शब्द को धर्म, नृजातीयता, प्रजाति या जाति द्वारा परिभाषित किसी विशेष समूह के प्रसंग से नहीं देखा गया। मानवतावादी विचारों ने भारतीय राष्ट्रवादियों को प्रभावित किया, और अपवर्जक राष्ट्रवाद की बुराई पर महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर ने खुलकर टिप्पणी की। टैगोर ने अपने निबंध “ऑन नेशनलिज़्म” (1917) में लिखा कि जहाँ पाश्चात्य राष्ट्रवाद की भावना हावी होती है, वहाँ सभी लोगों को बचपन से ही घृणा करना और महत्त्वाकांक्षाओं का पोषण करना सिखाया जाता है, जैसे इतिहास में अर्धसत्यों और असत्यों को गढ़कर और अन्य प्रजातियों के बारे में लगातार मिथ्यानिरूपण करके; और पूरे जनसमुदाय के मन में अपनी श्रेष्ठता का असामान्य दंभ भरना पश्चिम की नकल करना है।
प्र. भारत में सांप्रदायिक हिंसा के इतिहास और उपनिवेशवाद की भूमिका के बारे में पुस्तक क्या कहती है?
उत्तर: भारत में सांप्रदायिकता तनाव और हिंसा का बार-बार आने वाला स्रोत रही है, जिसमें स्वतंत्रता-पूर्व के दंगे भी शामिल हैं, जो अक्सर, पर हमेशा नहीं, औपनिवेशिक फूट-डालो-राज-करो नीति का परिणाम थे। पर पुस्तक यह भी साफ कर देती है कि उपनिवेशवाद ने अंतर-सामुदायिक झगड़ों को जन्म नहीं दिया: उपनिवेश काल से पहले भी ऐसे झगड़ों का लंबा इतिहास रहा है, और आज़ादी के बाद हुए दंगों के लिए उपनिवेशवाद को निश्चित रूप से दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. पुस्तक के अपने कम-से-कम चार गिनाए गए हस्तक्षेपों का प्रयोग करते हुए बताएँ कि आत्मसात्करणवादी और एकीकरणवादी राज्य एकल राष्ट्रीय पहचान बनाने की कोशिश कैसे करते हैं।
उत्तर: बॉक्स 6.1 के अनुसार, एकल पहचान चाहने वाले राज्य सामान्यतः: (1) शक्ति को उन मंचों पर केंद्रित करते हैं जहाँ प्रभावशाली समूह बहुसंख्यक हो, स्थानीय या अल्पसंख्यक समूहों की स्वायत्तता मिटाकर; (2) प्रभावशाली समूह की परंपराओं पर आधारित एक एकीकृत कानून-न्याय व्यवस्था थोपते हैं, अन्य समूहों की वैकल्पिक व्यवस्थाएँ खत्म करके; (3) प्रभावशाली समूह की भाषा को ही एकमात्र राजभाषा बनाते हैं, सभी सार्वजनिक संस्थाओं में इसे अनिवार्य करके; (4) प्रभावशाली समूह की भाषा-संस्कृति को राज्य-नियंत्रित मीडिया और शिक्षा संस्थाओं से बढ़ावा देते हैं; अन्य हस्तक्षेपों में प्रभावशाली समूह के इतिहास-नायकों का सम्मान करने वाले राज्य-प्रतीक अपनाना, और अल्पसंख्यक समूहों से ज़मीन, जंगल और मत्स्य क्षेत्र छीनकर उन्हें “राष्ट्रीय संसाधन” घोषित करना शामिल है।
प्र. पोट्टि श्रीरामुलु के अनशन से लेकर 1956 की SRC रिपोर्ट तक, भारत के राज्यों के भाषायी पुनर्गठन की कहानी बताएँ।
उत्तर: 1920 के दशक में कांग्रेस स्वयं अपनी प्रांतीय इकाइयों को भाषायी आधार पर पुनर्गठित कर चुकी थी, और गांधीजी सहित नेताओं ने स्वतंत्रता के बाद भाषायी प्रांतों का वचन दिया था। पर 1947 की स्वतंत्रता विभाजन के साथ आई, और शीर्ष कांग्रेसी नेताओं (नेहरू, पटेल, राजाजी) ने इस वचन को पूरा करने में हिचकिचाहट दिखाई, क्योंकि उन्हें डर था कि भाषा और विभाजन करवा सकती है। मराठी और कन्नड़ भाषियों के आंदोलन बढ़े, पर सबसे उग्र विरोध तेलुगु भाषियों से आया: एक पूर्व गाँधीवादी नेता पोट्टि श्रीरामुलु अक्टूबर 1952 में इस मुद्दे को लेकर आमरण अनशन पर बैठ गए, और दिसंबर 1952 में उनकी मृत्यु हो गई। उनके बलिदान ने हिंसक विरोध भड़का दिए; परिणामस्वरूप आंध्र प्रदेश राज्य की स्थापना करनी पड़ी, और इसके अलावा राज्य पुनर्गठन आयोग (SRC) की स्थापना करनी पड़ी। SRC की रिपोर्ट, जो 1 नवंबर 1956 को कार्यान्वित हुई, ने भाषायी राज्यों के सिद्धांत पर अंतिम, औपचारिक मुहर लगाई।
प्र. भारत को न आत्मसात्करणवादी, न एकीकरणवादी राष्ट्र-राज्य क्यों माना जाता है, स्पष्ट करें।
उत्तर: स्वतंत्र भारत ने शुरू से ही आत्मसात्करण को नकारा है, हालाँकि प्रभावशाली हिंदू समुदाय के कुछ वर्गों ने इसकी माँग की है। “राष्ट्रीय एकीकरण” राज्य की नीति में लगातार महत्वपूर्ण रहा है, पर भारत बॉक्स 6.1 के अर्थ में भी एकीकरणवादी नहीं रहा: संविधान भारत को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित करता है, फिर भी धर्म, भाषा और ऐसे अन्य सामुदायिक चिह्नकों को सार्वजनिक जीवन से बाहर नहीं किया गया है; राज्य इन्हें स्पष्ट रूप से मान्यता देता है, और अंतरराष्ट्रीय मानकों की तुलना में अल्पसंख्यक धर्मों को बहुत मज़बूत संवैधानिक सुरक्षा मिली है। पुस्तक का अपना आकलन है कि आमतौर पर भारत में कानूनों या सिद्धांतों की कोई कमी नहीं रही, बल्कि उनके पालन या व्यवहार में थोड़ी कसर रही है; कुल मिलाकर भारत को “राज्य-राष्ट्र” का एक अच्छा उदाहरण माना जा सकता है, यद्यपि यह राष्ट्र-राज्यों की समस्याओं से पूर्ण रूप से मुक्त नहीं है।
प्र. पुस्तक के अपने उदाहरणों का प्रयोग करते हुए “अल्पसंख्यक” के समाजशास्त्रीय अर्थ को समझाएँ।
उत्तर: समाजशास्त्र में “अल्पसंख्यक” केवल संख्यात्मक अवधारणा नहीं है: इसमें आमतौर पर सापेक्ष हानि का भाव होता है और यह माँगता है कि सदस्य एक सामूहिकता बनाएँ, यानी समूह के प्रति एकजुटता और अपनेपन की प्रबल भावना। अत्यंत धनवान लोगों को आमतौर पर अल्पसंख्यक नहीं कहा जा सकता; और यदि कहना ही हो तो उनके साथ कोई विशेषक जोड़ दिया जाता है, जैसे “विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यक”। बाएँ हाथ से काम करने वालों या 29 फरवरी को जन्मे लोगों जैसा कोई सामूहिकता-रहित सांख्यिकीय अल्पसंख्यक समाजशास्त्रीय अर्थ में अल्पसंख्यक नहीं है। असामान्य मामले भी हैं: पारसी या सिख आर्थिक रूप से संपन्न हो सकते हैं, फिर भी हिंदू बहुसंख्या के सामने अपनी छोटी संख्या के कारण सांस्कृतिक रूप से वंचित हो सकते हैं, जो दिखाता है कि एक समूह एक अर्थ में वंचित और दूसरे में नहीं भी हो सकता।
प्र. सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता में अंतर समझाएँ, और सांप्रदायिकता को “राजनीति के बारे में, धर्म के बारे में नहीं” क्यों कहा जाता है।
उत्तर: सांप्रदायिकता, दक्षिण एशियाई अर्थ में, धर्म से जुड़ी एक आक्रामक राजनीतिक विचारधारा है, जो अपने समूह को ही वैध या श्रेष्ठ समूह मानती है। यह राजनीति के बारे में है, धर्म के बारे में नहीं, क्योंकि व्यक्तिगत आस्था और सांप्रदायिकता में कोई ज़रूरी संबंध नहीं है: एक सांप्रदायिक व्यक्ति श्रद्धालु हो भी सकता है और नहीं भी, और एक श्रद्धालु व्यक्ति सांप्रदायिक हो भी सकता है और नहीं भी; असली बात है अन्य पहचानों के प्रति व्यक्ति का रवैया। धर्मनिरपेक्षता, भारतीय अर्थ में, सांप्रदायिकता के विपरीत है: धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति या राज्य किसी एक धर्म का दूसरों से ऊपर पक्ष नहीं लेता, जिसका अर्थ है सभी धर्मों का समान सम्मान, न कि पृथक्करण या धर्म के प्रति द्वेष।
प्र. नागरिक समाज क्या है समझाएँ, और पुस्तक के अनुसार यह जिन मुद्दों पर काम करता है, उनकी सूची दें।
उत्तर: नागरिक समाज वह व्यापक क्षेत्र है जो परिवार के निजी क्षेत्र से परे है, पर राज्य और बाज़ार दोनों से बाहर है: यह सक्रिय नागरिकता का क्षेत्र है, जहाँ व्यक्ति स्वेच्छा से संस्थाएँ बनाते हैं, सामाजिक मुद्दे उठाते हैं, और राज्य को प्रभावित करने या उससे माँग करने की कोशिश करते हैं। इसमें राजनीतिक दल, मीडिया संस्थाएँ, मज़दूर संघ, गैर-सरकारी संगठन और धार्मिक संगठन आते हैं, बशर्ते वे राज्य-नियंत्रित न हों और विशुद्ध वाणिज्यिक न हों। पुस्तक मुद्दों की एक विस्तृत सूची गिनाती है: भूमि अधिकारों के लिए जनजातीय संघर्ष, नगरीय शासन का हस्तांतरण, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के खिलाफ अभियान, बाँध-विस्थापितों का पुनर्वास, मशीनीकृत मछली पकड़ने के विरुद्ध मछुआरों का संघर्ष, फेरीवालों-पटरी निवासियों का पुनर्वास, गंदी बस्तियाँ हटाने के विरुद्ध और आवासीय अधिकारों के अभियान, प्राथमिक शिक्षा सुधार, और दलितों को भूमि वितरण।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. “भारतीय राष्ट्र-राज्य विश्व के सबसे सांस्कृतिक रूप से विविधतापूर्ण देशों में से एक है।” पुस्तक के अपने जनसांख्यिकीय आँकड़ों और भारत ने इस विविधता को कैसे संभाला, इसके विवरण का प्रयोग करते हुए इस कथन पर चर्चा करें।
उत्तर: पुस्तक के 2011 की जनगणना के अपने आँकड़ों के अनुसार भारत की विविधता: लगभग 121 करोड़ की जनसंख्या, लगभग 1,632 भाषाएँ और बोलियाँ, जिनमें से 22 आठवीं अनुसूची के तहत आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त; धार्मिक दृष्टि से, लगभग 80% हिंदू, 14.2% मुसलमान, 2.3% ईसाई, 1.7% सिख, 0.7% बौद्ध और 0.4% जैन। आत्मसात्करण (सभी नागरिकों को एक समान संस्कृति अपनाने के लिए राज़ी या मजबूर करना, समूहों की विभिन्नताएँ मिटाना) या एकीकरण (केवल एक सार्वजनिक संस्कृति, अन्य संस्कृतियाँ निजी क्षेत्र में) अपनाने वाले राज्यों के विपरीत, भारत ने बॉक्स 6.1 में वर्णित शुद्ध रूप में कोई भी मॉडल नहीं अपनाया: इसने स्वतंत्रता के समय ही आत्मसात्करण को नकार दिया, और यद्यपि “राष्ट्रीय एकीकरण” एक स्थायी नीतिगत विषय बना रहा, इसका संविधान भारत को धर्मनिरपेक्ष घोषित करते हुए भी धर्म और भाषा को सार्वजनिक जीवन में स्पष्ट रूप से मान्यता देता है, अल्पसंख्यकों को मज़बूत संवैधानिक सुरक्षा के साथ। बॉक्स 6.2 इसे “राज्य-राष्ट्र” के निर्माण के रूप में देखता है: एक ही लोकतांत्रिक राज्य के भीतर कई, पूरक पहचानें साथ रहती हैं, नागरिक अपने देश और अपने समुदाय, दोनों से पहचान रखते हैं। पुस्तक इस दृष्टिकोण को भारत को इतनी बड़ी विविधता के बावजूद जोड़े रखने का श्रेय देती है, तदात्मीकरण, विश्वास और समर्थन के सूचकों पर भारत के कार्य-निष्पादन को लंबे समय से स्थापित और अधिक संपन्न लोकतंत्रों की तुलना में विशेष रूप से प्रभावोत्पादक बताती है, साथ ही एक गंभीर चुनौती भी नाम लेती है: संपूर्ण देश पर एक अकेली हिंदू पहचान थोपने के लिए उत्सुक समूहों का उभार, जो समावेश और अल्पसंख्यक अधिकारों को नुकसान पहुँचाता है।
प्र. भारत के राज्यों के क्षेत्रवाद और भाषायी पुनर्गठन को आकार देने में भाषा की, धर्म की नहीं, भूमिका पर चर्चा करें, और भारत के अनुभव की तुलना श्रीलंका और पाकिस्तान से करें।
उत्तर: पुस्तक स्पष्ट कहती है कि क्षेत्रीय और जनजातीय पहचान के साथ मिलकर भाषा ने, धर्म ने नहीं, भारत में नृजातीय-राष्ट्रीय पहचान बनाने का सबसे सशक्त साधन बनकर काम किया है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने शुरू में ब्रिटिश-काल के बड़े बहुभाषी-बहुनृजातीय प्रांतों को बनाए रखा, पर तीव्र जन-आंदोलनों ने इन्हें भाषायी राज्यों में पुनर्गठित करने पर मजबूर किया: यह प्रक्रिया कांग्रेस के अपने 1920 के दशक के भाषायी पुनर्गठन से शुरू होकर, पोट्टि श्रीरामुलु के आमरण अनशन (अक्टूबर 1952; दिसंबर 1952 में मृत्यु) और आंध्र प्रदेश की स्थापना से होते हुए, 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग की अंतिम स्वीकृति तक चली। नेहरू सहित कई नेताओं की आशंका (कि भाषा-आधारित राज्य भारत के उप-विभाजन को तेज़ कर देंगे) के विपरीत हुआ: भाषायी राज्यों ने भारतीय एकता को मज़बूत किया, कमज़ोर नहीं, जिससे “कन्नडिग और भारतीय” या “बंगाली और भारतीय” होना पूरी तरह संगत बन गया। पुस्तक इसकी तुलना सीधे दो पड़ोसियों से करती है: उसी वर्ष, 1956 में, श्रीलंका की संसद ने तमिल विरोध के बावजूद सिंहली को एकमात्र राजभाषा घोषित किया, और श्रीलंका का 1983 से चला गृहयुद्ध, पुस्तक के अनुसार, कुछ हद तक बहुसंख्यक भाषाई समूह द्वारा अल्पसंख्यकों के अधिकारों की उपेक्षा का परिणाम है; और पाकिस्तान 1971 में इसलिए विभाजित हुआ क्योंकि पश्चिमी भाग के पंजाबी-उर्दू भाषी पूर्वी भाग के बंगालियों की भावनाओं का आदर नहीं करना चाहते थे। पुस्तक का अपना निष्कर्ष, रामचंद्र गुहा को उद्धृत करते हुए, यह है कि यदि भारतीय भाषाई समुदायों की भावनाओं की उपेक्षा की जाती, तो शायद यहाँ “एक भाषा, चौदह या पंद्रह राष्ट्र” जैसी स्थिति बनती, न कि वह समायोजन जो भाषायी राज्यों ने वास्तव में हासिल किया। पर सभी भाषायी समुदायों को राज्यत्व नहीं मिला: छत्तीसगढ़, उत्तरांचल और झारखंड (2000) के निर्माण में भाषा की कोई प्रमुख भूमिका नहीं थी; जनजातीय पहचान, भाषा, क्षेत्रीय वंचन और पारिस्थितिकी पर आधारित नृजातीयता ने मिलकर इनका आधार बनाया।
प्र. अंबेडकर के संविधान सभा भाषण, अनुच्छेद 29-30, और धर्मनिरपेक्षता व अल्पसंख्यक संरक्षण के बीच के तनाव का उल्लेख करते हुए भारत में अल्पसंख्यक अधिकार और राष्ट्र-निर्माण पर चर्चा करें।
उत्तर: भारतीय राष्ट्रवाद की प्रभावशाली प्रवृत्ति समावेशी और लोकतांत्रिक रही, जिसमें “लोग” शब्द को धर्म, नृजातीयता, प्रजाति या जाति द्वारा परिभाषित किसी विशेष समूह के प्रसंग से नहीं देखा गया; गांधी और टैगोर, दोनों ने अपवर्जक राष्ट्रवाद की बुराई की आलोचना की। इस समावेशी दृष्टिकोण को असरदार बनाने के लिए इसे संविधान में जगह देनी पड़ी, क्योंकि प्रभावशाली समूह में यह मान लेने की प्रबल प्रवृत्ति होती है कि उसकी संस्कृति ही राष्ट्र-राज्य की संस्कृति है। डॉ. भीमराव अंबेडकर, संविधान के प्रमुख शिल्पकार, ने इसे संविधान सभा में सीधे संबोधित किया: उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यक वर्ग “एक ऐसी विस्फोटक शक्ति है जो यदि भड़क उठे तो राज्य की संपूर्ण रचना को तार-तार कर देगी”, और यह भी कि भारत के अल्पसंख्यक “अपने अस्तित्व को बहुसंख्यकों के हाथों में सौंपने के लिए सहमत हुए हैं”; आयरलैंड में कारसन के विपरीत, जिन्होंने कहा था “हम तुम्हारे द्वारा शासित होना ही नहीं चाहते”, भारत में अल्पसंख्यकों के किसी भी वर्ग ने यह रुख नहीं अपनाया। इस भरोसे को ठोस संवैधानिक गारंटियों का साथ मिला: अनुच्छेद 29 किसी भी अनुभाग को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का अधिकार देता है, और राज्य-पोषित या राज्य-सहायता प्राप्त शिक्षा संस्थाओं में केवल धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के आधार पर प्रवेश से वंचित करने पर रोक लगाता है; अनुच्छेद 30 सभी अल्पसंख्यक-वर्गों को अपनी शिक्षा संस्थाएँ स्थापित और प्रशासित करने का अधिकार देता है, राज्य-सहायता में बिना भेदभाव के। फिर भी पुस्तक एक तनाव के बारे में स्पष्ट है: धर्मनिरपेक्षता, भारतीय अर्थ में सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान, अल्पसंख्यक संरक्षण की प्रतिबद्धता के साथ-साथ चलती है, और अल्पसंख्यकों के लिए कोई भी विशेष ध्यान आलोचकों द्वारा “तुष्टीकरण” कहलाने का जोखिम उठाता है, जबकि समर्थक तर्क देते हैं कि इसके बिना धर्मनिरपेक्षता बहुसंख्यक मूल्य थोपने का साधन बन सकती है।
5 केस स्टडी
(क) 2 अंक अध्याय की परिभाषाओं के अनुसार, यह “आत्मसात्करण” या “एकीकरण” की नीति के अधिक करीब है? अपने उत्तर का औचित्य दें।
उत्तर: यह आत्मसात्करण के अधिक करीब है। एकीकरण केवल सार्वजनिक संस्कृति को एक समान राष्ट्रीय स्वरूप तक सीमित रखता है और निजी क्षेत्रों में विभिन्नताएँ बने रहने देता है। यहाँ राज्य इससे आगे जाकर निजी जीवन (घर, पारिवारिक आयोजन, पूजा-स्थल) में भी क्षेत्रीय भाषाओं को दबाता है, यानी समूहों के बीच की सांस्कृतिक विभिन्नताओं को ही मिटाने की कोशिश करता है, जो बॉक्स 6.1 में आत्मसात्करण का वर्णन है।
(ख) 2 अंक अध्याय के अपने तर्क का प्रयोग करते हुए, इस नीति को अपनाने से इस देश को कौन-सा जोखिम है, समझाएँ।
उत्तर: अपने अल्पसंख्यक भाषा-समुदायों की सांस्कृतिक विविधता का दमन उन्हें अलग-थलग कर देगा, क्योंकि उनकी संस्कृति को “गैर-राष्ट्रीय” मान लिया जाएगा; अध्याय चेतावनी देता है कि ऐसा दमन उस सामुदायिक पहचान को कम करने के बजाय और गहरा भी कर सकता है जिसे राज्य मिटाने की कोशिश कर रहा है, अध्याय श्रीलंका का उदाहरण देता है, जहाँ नृजातीय संघर्ष के कारणभूत अनेक विवादास्पद मुद्दों में एक था, सिंहली भाषा को एक राष्ट्रीय भाषा के रूप में थोपा जाना।
(क) 2 अंक अध्याय की अपनी कसौटी का प्रयोग करते हुए समझाएँ कि यह संगठन “नागरिक समाज” का हिस्सा क्यों माना जाएगा।
उत्तर: यह अध्याय की दो-भाग वाली कसौटी पर खरा उतरता है: यह राज्य-नियंत्रित नहीं है, और यह विशुद्ध वाणिज्यिक, मुनाफ़ा कमाने वाली संस्था नहीं है। यह नागरिकों का एक स्वैच्छिक संगठन है जो एक सामूहिक हित (सरकार की जवाबदेही) के लिए बना है, ठीक वैसे ही जैसे अध्याय नागरिक समाज को परिभाषित करता है।
(ख) 2 अंक अध्याय में नामित कौन-सा वास्तविक कानून इस संगठन के काम से मिलता-जुलता है, और उस कानून ने क्या हासिल किया?
उत्तर: यह सूचनाधिकार अधिनियम, 2005 के पीछे के अभियान से मिलता-जुलता है, जो ग्रामीण राजस्थान में गाँव-विकास निधि की जानकारी के लिए आंदोलन के रूप में शुरू हुआ और आगे चलकर राष्ट्रव्यापी अभियान बन गया। नौकरशाही के विरोध के बावजूद, इसने सरकार को नागरिकों को सूचना का औपचारिक अधिकार देने वाला कानून बनाने पर मजबूर किया, जो नागरिक समाज की राज्य को जवाबदेह बनाने की भूमिका को दर्शाता है।