इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. फ़िराक गोरखपुरी का मूल नाम क्या था?
उत्तर: फ़िराक गोरखपुरी का मूल नाम रघुपति सहाय ‘फ़िराक’ था।
प्र. फ़िराक गोरखपुरी का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर: फ़िराक गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त, सन् 1896 को गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था।
प्र. फ़िराक गोरखपुरी का निधन कब हुआ?
उत्तर: फ़िराक गोरखपुरी का निधन सन् 1983 में हुआ।
प्र. फ़िराक ने डिप्टी कलेक्टर का पद कब और किस कारण त्यागा?
उत्तर: फ़िराक ने 1918 में स्वराज आंदोलन के लिए डिप्टी कलेक्टर का पद त्याग दिया था।
प्र. फ़िराक की किन्हीं दो प्रमुख कृतियों के नाम लिखिए।
उत्तर: गुले-नग्मा और उर्दू ग़ज़लगोई (अथवा बज़्मे ज़िंदगी: रंगे-शायरी)।
प्र. फ़िराक को किन्हीं दो सम्मानों के नाम लिखिए।
उत्तर: ज्ञानपीठ पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड (अथवा गुले-नग्मा के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार)।
प्र. रुबाई की परिभाषा एक वाक्य में लिखिए।
उत्तर: रुबाई उर्दू और फ़ारसी का एक छंद या लेखन शैली है जिसमें चार पंक्तियाँ होती हैं, पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति में तुक (काफ़िया) मिलाया जाता है, तीसरी पंक्ति स्वच्छंद होती है।
प्र. पाठ में उर्दू शायरी की रूमानी परंपरा तोड़ने वाले किन शायरों के नाम उदाहरण के रूप में आए हैं?
उत्तर: नज़ीर अकबराबादी और इल्ताफ़ हुसैन हाली (इनके साथ फ़िराक गोरखपुरी भी इसी धारा का एक प्रमुख नाम हैं)।
प्र. ‘लोका देना’ और ‘हई’ शब्दों के अर्थ लिखिए।
उत्तर: ‘लोका देना’ का अर्थ है उछाल-उछाल कर प्यार करने की एक क्रिया, और ‘हई’ का अर्थ है ‘है ही’।
प्र. रुबाई 3 में बच्चे के घरौंदे में क्या जलाया जाता है?
उत्तर: रुबाई 3 के अनुसार दीवाली की शाम बच्चे के घरौंदे में दिए जलाए जाते हैं।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. फ़िराक गोरखपुरी का संक्षिप्त जीवन-परिचय दीजिए।
उत्तर: फ़िराक गोरखपुरी (मूल नाम रघुपति सहाय) का जन्म 28 अगस्त 1896 को गोरखपुर में हुआ। शिक्षा रामकृष्ण की कहानियों से शुरू होकर अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी में हुई। 1917 में डिप्टी कलेक्टर पद पर चयनित हुए, पर स्वराज आंदोलन के लिए 1918 में इसे त्याग दिया, और 1920 में स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने के कारण डेढ़ वर्ष जेल में रहे। बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग में अध्यापक रहे। उनका निधन 1983 में हुआ।
प्र. फ़िराक गोरखपुरी को मिले सम्मानों और उनकी प्रमुख कृतियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर: फ़िराक को गुले-नग्मा के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड मिले। उनकी प्रमुख कृतियों में गुले-नग्मा, बज़्मे ज़िंदगी: रंगे-शायरी और उर्दू ग़ज़लगोई शामिल हैं।
प्र. उर्दू शायरी की रूमानियत, रहस्य और शास्त्रीयता वाली परंपरा में फ़िराक गोरखपुरी का क्या स्थान है?
उत्तर: पाठ के अनुसार उर्दू शायरी का बड़ा हिस्सा रूमानियत, रहस्य और शास्त्रीयता से बँधा रहा है, जिसमें लोकजीवन और प्रकृति के पक्ष बहुत कम उभर पाए हैं। नज़ीर अकबराबादी, इल्ताफ़ हुसैन हाली जैसे जिन कुछ शायरों ने इस रिवायत को तोड़ा है, उनमें एक प्रमुख नाम फ़िराक गोरखपुरी का भी है। पाठ फ़िराक को ‘पहला’ नहीं, ‘एक प्रमुख नाम’ कहता है।
प्र. मीर और ग़ालिब की शैली से फ़िराक की शैली की तुलना कीजिए।
उत्तर: उर्दू शायरी में शेर लिखे नहीं जाते, कहे जाते हैं, यानी एक तरह का संवाद प्रमुख होता है। मीर और ग़ालिब की तरह फ़िराक ने भी इसी ‘कहने’ की शैली को साधकर आम आदमी या साधारण जन से अपनी बात कही।
प्र. रुबाई छंद की बनावट स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: रुबाई उर्दू और फ़ारसी का एक छंद है जिसमें चार पंक्तियाँ होती हैं। इसकी पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति में तुक (काफ़िया) मिलाया जाता है, जबकि तीसरी पंक्ति स्वच्छंद होती है (यानी उसमें तुक मिलाना ज़रूरी नहीं)। जैसे पहली रुबाई में ‘खड़ी’, ‘गोद-भरी’ और ‘हँसी’ की तुक मिलती है, जबकि तीसरी पंक्ति ‘लोका देती है’ स्वच्छंद है।
प्र. फ़िराक की रुबाइयों में हिंदी, उर्दू और लोकभाषा का मेल किन शब्दों से स्पष्ट होता है?
उत्तर: लोका देना, घुटनियों में लेकर कपड़े पिन्हाना, गेसुओं में कंघी करना, रूपवती मुखड़ा, नर्म दमक, ज़िदयाया बालक और रस की पुतली जैसे प्रयोग हिंदी, उर्दू और लोकभाषा के अनूठे गठबंधन को दिखाते हैं, यह गांधी जी की कल्पना की ‘हिंदुस्तानी’ भाषा जैसा मेल है।
प्र. रुबाई 4 में माँ बच्चे की चाँद की ज़िद किस प्रकार पूरी करती है? ‘चाँद की परछाईं भी चाँद ही है’ कथन के आलोक में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: रुबाई 4 में बच्चा आँगन में चाँद के लिए ज़िद पर अड़कर ठुनक रहा है। माँ उसे दर्पण देकर कहती है, ‘देख आईने में चाँद उतर आया है।’ पाठ कहता है: “चाँद की परछाईं भी चाँद ही है। कल्पना की आँख का भला क्या मुकाबला।” इसी कल्पना के सहारे माँ बच्चे को बहलाती है।
प्र. फ़िराक की रुबाइयों की भाषा की तुलना सूरदास के वात्सल्य वर्णन से किस प्रकार की गई है?
उत्तर: पाठ के अनुसार फ़िराक की रुबाई में हिंदी का एक घरेलू रूप दिखता है, भाषा सहज है, और प्रसंग सूरदास के वात्सल्य वर्णन की सादगी की याद दिलाता है, जैसे ‘मुझे चाँद चाहिए, मैया री, मैं चंद्र खिलौना लैहों’ जैसा बिंब (पाठ की आपसदारी में सूरदास की पंक्ति ‘मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों’ दी गई है)। फ़िराक की रुबाई में भी माँ आईना देकर बच्चे को बहलाती है, यही समानता दोनों को जोड़ती है।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. पाँचों रुबाइयों में वात्सल्य भाव किस प्रकार व्यक्त हुआ है, उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: पहली से चौथी रुबाई में माँ का बच्चे के प्रति गहरा वात्सल्य भाव दिखता है, और पाँचवीं रुबाई में बहन का भाई के प्रति स्नेह दिखता है। पहली रुबाई में माँ बच्चे को गोद में झुलाती और हवा में लोका देती है। दूसरी में वह बच्चे को नहलाकर, गेसू संवारकर प्यार से कपड़े पहनाती है। तीसरी रुबाई में दीवाली पर बच्चे के घरौंदे में दिए जलाकर उसकी खुशी बढ़ाती है। चौथी रुबाई में जब बच्चा चाँद के लिए मचलता है तो माँ दर्पण देकर उसका मन बहला देती है। पाँचवीं रुबाई में बहन-भाई का स्नेह रक्षाबंधन के रूप में दिखता है। इन रुबाइयों में यह स्नेह सहज और घरेलू भाषा में व्यक्त हुआ है।
प्र. फ़िराक गोरखपुरी को हिंदी की पाठ्यपुस्तक में शामिल किए जाने का औचित्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: फ़िराक गोरखपुरी उर्दू के शायर हैं, फिर भी इस हिंदी पाठ्यपुस्तक में उनका स्थान उचित है। पाठ के अनुसार फ़िराक की रुबाई में हिंदी का एक घरेलू रूप दिखता है, भाषा सहज है और प्रसंग सूरदास के वात्सल्य वर्णन की सादगी की याद दिलाता है। लोका देना, घुटनियों में लेकर कपड़े पिन्हाना, गेसुओं में कंघी करना, रूपवती मुखड़ा, नर्म दमक, ज़िदयाया बालक, रस की पुतली जैसे प्रयोग हिंदी, उर्दू और लोकभाषा के उस अनूठे गठबंधन के हैं जिसे गांधी जी हिंदुस्तानी के रूप में पल्लवित करना चाहते थे। उन्होंने उर्दू शायरी की रूमानी परंपरा तोड़कर लोकजीवन, प्रकृति और भारतीय संस्कृति के प्रतीकों (दीवाली, रक्षाबंधन) को अपनाया। यही हिंदी-उर्दू की साझा भाव-भूमि उनके इस पाठ्यपुस्तक में शामिल होने का औचित्य है।
प्र. रुबाई छंद की विशेषताएँ, फ़िराक की पाँचों रुबाइयों के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: रुबाई उर्दू-फ़ारसी परंपरा का चार-पंक्ति वाला छंद है, जिसकी पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति में तुक मिलती है और तीसरी पंक्ति स्वच्छंद रहती है। फ़िराक की रुबाइयाँ चार-चार पंक्तियों की हैं, और हर रुबाई में एक ही दृश्य (झुलाना, नहलाना, दीवाली, चाँद-दर्पण, रक्षाबंधन) को चार पंक्तियों में इतनी सघनता से बाँधा गया है कि पूरा भाव एक ही साँस में पूरा हो जाता है।
प्र. फ़िराक की भाषा-दृष्टि को स्पष्ट करते हुए बताइए कि वे किस तरह आम आदमी से जुड़ते हैं।
उत्तर: फ़िराक ने परंपरागत भावबोध और शब्द-भंडार का उपयोग करते हुए उसे नयी भाषा और नए विषयों से जोड़ा। उन्होंने सामाजिक दुख-दर्द को व्यक्तिगत अनुभूति बनाकर शायरी में ढाला और भारतीय संस्कृति व लोकभाषा के प्रतीकों का प्रयोग किया। मीर और ग़ालिब की तरह उन्होंने भी संवाद-प्रधान ‘कहने’ की शैली अपनाई, जिससे वे आम आदमी या साधारण जन से सीधे अपनी बात कह सके।
प्र. रुबाई 4 और रुबाई 5 की तुलना करते हुए बताइए कि दोनों में कौन-सा साझा तत्व है और क्या अंतर है।
उत्तर: रुबाई 4 और रुबाई 5 दोनों में आकाश की वस्तुओं (चाँद, घटा) और घरेलू सुख के बीच संबंध दिखाया गया है। रुबाई 4 में बच्चे की चाँद की ज़िद और माँ का दर्पण के ज़रिए उसे बहलाना है, जबकि रुबाई 5 में सावन की घटा और बिजली की चमक की तुलना भाई-बहन के रिश्ते और चमकती राखी से की गई है। अंतर यह है कि रुबाई 4 माँ-बच्चे के वात्सल्य पर केंद्रित है, जबकि रुबाई 5 भाई-बहन के रक्षाबंधन-पर्व पर केंद्रित है।
प्र. पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि फ़िराक की रुबाइयों में प्रकृति और त्योहारों का चित्रण किस प्रकार हुआ है।
उत्तर: फ़िराक ने प्रकृति, मौसम और भौतिक जगत के सौंदर्य को अपनी शायरी का विषय बनाया। रुबाई 3 में दीवाली की सजावट और चीनी-मिट्टी के जगमगाते खिलौनों का चित्रण है। रुबाई 5 में सावन की हलकी घटा और बिजली की चमक के सहारे रक्षाबंधन पर्व को चित्रित किया गया है, जहाँ प्रकृति की घटना (बिजली) को मानवीय रिश्ते (भाई-बहन) से जोड़ा गया है। इस तरह त्योहार और प्रकृति दोनों फ़िराक की रुबाइयों में घुल-मिल गए हैं।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. फ़िराक गोरखपुरी के जीवन-परिचय और उनकी काव्य-विशेषताओं का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर: फ़िराक गोरखपुरी (मूल नाम रघुपति सहाय) का जन्म 28 अगस्त 1896 को गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। शुरुआती शिक्षा रामकृष्ण की कहानियों से हुई, बाद में अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी में शिक्षा प्राप्त की। 1917 में डिप्टी कलेक्टर पद पर चयनित हुए, पर स्वराज आंदोलन के लिए 1918 में इसे त्याग दिया, और 1920 में स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने पर डेढ़ वर्ष जेल में रहे। बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग में अध्यापक रहे। उन्हें गुले-नग्मा के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड मिले, प्रमुख कृतियाँ गुले-नग्मा, बज़्मे ज़िंदगी: रंगे-शायरी और उर्दू ग़ज़लगोई हैं। उनका निधन 1983 में हुआ। काव्य-दृष्टि की बात करें तो उन्होंने परंपरागत भावबोध को नयी भाषा से जोड़ा, सामाजिक दुख-दर्द को व्यक्तिगत अनुभूति में ढाला, और मीर-ग़ालिब जैसी संवाद-प्रधान ‘कहने’ की शैली अपनाकर आम आदमी से अपनी बात कही।
प्र. उर्दू शायरी की परंपरा और फ़िराक के योगदान का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर: उर्दू शायरी का बड़ा हिस्सा रूमानियत, रहस्य और शास्त्रीयता से बँधा रहा है, जिसमें लोकजीवन और प्रकृति के पक्ष बहुत कम उभर पाए। नज़ीर अकबराबादी, इल्ताफ़ हुसैन हाली जैसे जिन कुछ शायरों ने इस रिवायत को तोड़ा है, उनमें एक प्रमुख नाम फ़िराक गोरखपुरी का भी है। फ़िराक ने परंपरागत भावबोध और शब्द-भंडार का उपयोग करते हुए उसे नयी भाषा और नए विषयों से जोड़ा, उनके यहाँ सामाजिक दुख-दर्द व्यक्तिगत अनुभूति बनकर शायरी में ढला है। इंसान के हाथों इंसान पर जो गुज़रती है, उसकी तल्ख़ सच्चाई और आने वाले कल की उम्मीद, दोनों को उन्होंने भारतीय संस्कृति और लोकभाषा के प्रतीकों से जोड़ा। मीर और ग़ालिब की तरह उन्होंने भी शेर ‘कहने’ की संवाद-प्रधान शैली को साधा, और आम आदमी या साधारण जन से अपनी बात कही, प्रकृति व भौतिक जगत के सौंदर्य को अपना विषय बनाकर। उनका अपना कथन है, ‘दिव्यता भौतिकता से पृथक वस्तु नहीं है। जिसे हम भौतिक कहते हैं वही दिव्य भी है।’
प्र. फ़िराक की पाँचों रुबाइयों का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: पहली रुबाई में माँ आँगन में बच्चे को गोद में भरकर झुलाती है और हवा में लोका देती है, जिससे बच्चे की हँसी गूँज उठती है। दूसरी रुबाई में माँ बच्चे को नहलाकर, उलझे गेसुओं में कंघी करके, प्यार से कपड़े पहनाती है और बच्चा प्यार से मुँह को देखता है। तीसरी रुबाई में दीवाली की सजी-धजी शाम में जगमगाते चीनी-मिट्टी के खिलौने और माँ के मुखड़े की नर्म दमक के बीच बच्चे के घरौंदे में दिए जलाए जाते हैं। चौथी रुबाई में बच्चा चाँद के लिए ज़िद पर अड़कर ठुनकता है, तो माँ दर्पण देकर चाँद की परछाईं दिखाती है, पाठ के अनुसार चाँद की परछाईं भी चाँद ही है, इस तरह वह बच्चे का मन बहला देती है। पाँचवीं रुबाई में रक्षाबंधन की सुबह, सावन की हलकी घटा के बीच, बिजली की तरह चमकते लच्छों वाली राखी बहन अपने भाई को बाँधती है। पहली से चौथी रुबाई माँ और बच्चे के वात्सल्य-भरे पलों को दिखाती हैं, और पाँचवीं रुबाई भाई-बहन के रक्षाबंधन को।
प्र. रुबाई छंद की बनावट स्पष्ट करते हुए बताइए कि फ़िराक की भाषा में हिंदी, उर्दू और लोकभाषा का मेल किस तरह हुआ है, और इसका क्या महत्त्व है।
उत्तर: रुबाई उर्दू और फ़ारसी का एक छंद है जिसमें चार पंक्तियाँ होती हैं, पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति में तुक (काफ़िया) मिलाया जाता है, तीसरी पंक्ति स्वच्छंद रहती है। फ़िराक की रुबाइयाँ चार-चार पंक्तियों की हैं; जैसे पहली रुबाई में ‘खड़ी’, ‘गोद-भरी’ और ‘हँसी’ की तुक है। भाषा की दृष्टि से देखें तो फ़िराक की रुबाई में हिंदी का एक घरेलू रूप दिखता है, भाषा सहज है और प्रसंग सूरदास के वात्सल्य वर्णन की सादगी की याद दिलाता है। लोका देना, घुटनियों में लेकर कपड़े पिन्हाना, गेसुओं में कंघी करना, रूपवती मुखड़ा, नर्म दमक, ज़िदयाया बालक, रस की पुतली जैसे प्रयोग हिंदी, उर्दू और लोकभाषा के अनूठे गठबंधन को दिखाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे गांधी जी हिंदुस्तानी भाषा की कल्पना करते थे। यह भाषा-मेल इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि एक उर्दू शायर भी हिंदी क्षेत्र की भावभूमि और भाषा को उतनी ही सहजता से अपना सकता है, जितना कोई हिंदी कवि, यही भारतीय भाषाओं की साझा रचनात्मकता है।
5 केस स्टडी
हाथों पे झुलाती है उसे गोद-भरी
रह-रह के हवा में जो लोका देती है
गूँज उठती है खिलखिलाते बच्चे की हँसी
(क) 1 अंक इस पद्यांश में माँ बच्चे को कहाँ खड़ी होकर झुलाती है? (क) आँगन में (ख) छत पर (ग) बाज़ार में (घ) मंदिर में
उत्तर: सही उत्तर (क) है: आँगन में। पाठ के अनुसार ‘आँगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी, हाथों पे झुलाती है उसे गोद-भरी।’
(ख) 1 अंक ‘लोका देना’ का क्या अर्थ है? (क) सुला देना (ख) उछाल-उछाल कर प्यार करना (ग) नहलाना (घ) कपड़े पहनाना
उत्तर: सही उत्तर (ख) है: उछाल-उछाल कर प्यार करना। पाठ की अपनी शब्द-छवि सूची में यही अर्थ दिया गया है।
(ग) 2 अंक इस पद्यांश में वात्सल्य भाव किस प्रकार व्यक्त हुआ है?
उत्तर: माँ बच्चे को गोद में भरकर आँगन में खड़ी है और उसे हाथों पर झुलाती है। बीच-बीच में हवा में लोका देने पर बच्चे की खिलखिलाती हँसी गूँज उठती है। यह पूरा दृश्य माँ के गहरे वात्सल्य भाव और बच्चे की निश्छल प्रसन्नता को बहुत सहज भाषा में व्यक्त करता है।
बालक तो हई चाँद पै ललचाया है
दर्पण उसे दे के कह रही है माँ
देख आईने में चाँद उतर आया है
(क) 1 अंक बालक किस चीज़ के लिए ललचाया हुआ है? (क) खिलौने के लिए (ख) चाँद के लिए (ग) मिठाई के लिए (घ) कपड़ों के लिए
उत्तर: सही उत्तर (ख) है: चाँद के लिए। पाठ के अनुसार ‘बालक तो हई चाँद पै ललचाया है।’
(ख) 1 अंक माँ बच्चे को शांत करने के लिए क्या देती है? (क) खिलौना (ख) दर्पण (ग) मिठाई (घ) किताब
उत्तर: सही उत्तर (ख) है: दर्पण। पाठ के अनुसार माँ ‘दर्पण उसे दे के कह रही है’ कि आईने में चाँद उतर आया है।
(ग) 2 अंक इस पद्यांश के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि माँ बच्चे को किस चतुराई से बहलाती है।
उत्तर: बच्चा आकाश के चाँद के लिए ज़िद पर अड़ा है। माँ बच्चे को एक दर्पण पकड़ा देती है, जिसमें चाँद की ही परछाईं दिखती है, पाठ के अनुसार चाँद की परछाईं भी चाँद ही है। कल्पना के सहारे बच्चे को बहलाना ही माँ की सहज चतुराई और वात्सल्य है।