परीक्षा से ठीक पहले के दोहराव के लिए इस अध्याय का निचोड़: परिभाषाएँ, तारीख़ें, संधियों के नाम, अंटार्कटिका के आँकड़े, भारत का पक्ष, तीनों तरह के पर्यावरण आंदोलन और मूलवासियों की संख्या। विस्तार से पढ़ने के लिए पूरे नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।
1 परिभाषाएँ
साझी संपदा उन संसाधनों को कहते हैं जिन पर किसी एक का नहीं बल्कि पूरे समुदाय का अधिकार होता है। इसके पीछे मूल तर्क यह है कि संसाधन की प्रकृति, उपयोग के स्तर और रख-रखाव के संदर्भ में समूह के हर सदस्य को समान अधिकार मिलेंगे और समान उत्तरदायित्व निभाने होंगे। किताब के अपने उदाहरण: संयुक्त परिवार का चूल्हा, चारागाह, मैदान, कुआँ या नदी।
वैश्विक संपदा या ‘मानवता की साझी विरासत’ वे क्षेत्र हैं जो किसी एक देश के संप्रभु क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं, इसलिए उनका प्रबंधन साझे तौर पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय करता है। इसमें पृथ्वी का वायुमंडल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह और बाहरी अंतरिक्ष शामिल हैं। प्रश्नावली में इसी को ‘विश्व की साझी विरासत’ कहा गया है।
टिकाऊ विकास आर्थिक वृद्धि का वह तरीका है जिससे पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे। इस पर सहमति 1992 के रियो-सम्मेलन में बनी।
साझी परंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ: पर्यावरण के विश्वव्यापी अपक्षय में विभिन्न राज्यों का योगदान अलग-अलग है, इसलिए ज़िम्मेदारी साझी तो है पर बराबर नहीं। यह तर्क 1992 के पृथ्वी सम्मेलन में स्वीकार किया गया, जिसे रियो-घोषणापत्र में दर्ज किया गया।
संसाधनों की भू-राजनीति इन सवालों से जूझती है: ‘‘किसे, क्या, कब, कहाँ और कैसे हासिल होता है’’।
मूलवासी (संयुक्त राष्ट्रसंघ की 1982 की शुरुआती परिभाषा): ऐसे लोगों के वंशज जो किसी मौजूदा देश में बहुत दिनों से रहते चले आ रहे थे; फिर किसी दूसरी संस्कृति या जातीय मूल के लोग विश्व के दूसरे हिस्से से वहाँ आये और इन्हें अधीन बना लिया।
जलयुद्ध: जीवनदायी जल-संसाधन को लेकर हिंसक संघर्ष की संभावना को इंगित करने के लिए विश्व-राजनीति के कुछ विद्वानों का गढ़ा शब्द।
पर्यावरणीय शरणार्थी: 1970 के दशक में अफ़्रीका की अनावृष्टि के बाद प्रचलित हुआ शब्द, जब पाँच देशों की उपजाऊ जमीन बंजर हो जाने से खेती असंभव हो गई और लोगों को घर-बार छोड़ना पड़ा।
पावन वन-प्रांतर या देवस्थान: वनों के वे हिस्से जिन्हें धार्मिक कारणों से काटा नहीं जाता, क्योंकि वहाँ देवता या किसी पुण्यात्मा का वास माना जाता है।
2 पर्यावरण की चिंता क्यों
| बात | ब्योरा |
|---|---|
| ज़मीन और पानी | कृषि-योग्य भूमि में बढ़ोत्तरी रुकी, उपजाऊ जमीन की उर्वरता घट रही; चारागाहों के चारे ख़त्म होने को; मत्स्य-भंडार घट रहा; जलाशयों की जलराशि तेज़ी से घटी और प्रदूषण बढ़ा। नतीजा: खाद्य-उत्पादन में कमी। |
| मानव विकास रिपोर्ट (2016) | विकासशील देशों की 66.3 करोड़ जनता को स्वच्छ जल नहीं; दो अरब चालीस करोड़ साफ़-सफ़ाई से वंचित; इस वजह से 30 लाख से ज़्यादा बच्चे हर साल मौत के शिकार। |
| वन | जलवायु और जलचक्र को संतुलित रखते हैं और इन्हीं में धरती की जैव-विविधता का भंडार है; कटाई से लोग विस्थापित। जैव-विविधता की हानि का कारण: प्रजातियों में समृद्ध पर्यावासों का विध्वंस। |
| ओज़ोन | ऊपरी वायुमंडल में ओज़ोन की मात्रा में लगातार कमी, यानी ओज़ोन परत में छेद; पारिस्थितिकी तंत्र और मनुष्य के स्वास्थ्य पर बड़ा ख़तरा। |
| समुद्र | मध्यवर्ती भाग अब भी अपेक्षाकृत स्वच्छ, पर तटवर्ती जल जमीनी क्रियाकलापों से प्रदूषित; तटों पर सघन बसाहट जारी। |
| अराल सागर | पानी विषाक्त होने से मत्स्य-उद्योग नष्ट, जहाजरानी उद्योग ख़त्म, नमक की सांद्रता से पैदावार कम; हज़ारों को घर-बार छोड़ना पड़ा। अनेक अनुसंधान हुए, समाधान नहीं हुआ। |
- ये मसले राजनीतिक क्यों (दो कारण): (1) सरकारें कदम उठाती हैं तो परिणति राजनीतिक होती है, और अधिकांश मसलों का पूरा समाधान कोई एक सरकार अकेले नहीं कर सकती; (2) तीन गहरे सवाल: कौन पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है? रोक लगाने की जिम्मेदारी किसकी है? संसाधनों पर किसको कितने इस्तेमाल का हक है? इनके जवाब बहुधा इस बात से तय होते हैं कि कौन देश कितना ताकतवर है।
- राजनीतिक चरित्र कब से: पर्यावरण के सरोकारों का इतिहास लंबा है, पर आर्थिक विकास के असर की चिंता ने 1960 के दशक के बाद से राजनीतिक चरित्र लिया।
- क्लब ऑव रोम: वैश्विक मामलों से सरोकार रखने वाले विद्वत् समूह ने 1972 में ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ प्रकाशित की, जो बढ़ती जनसंख्या के आलोक में संसाधनों के विनाश का अंदेशा बताती है।
- UNEP (संयुक्त राष्ट्रसंघ पर्यावरण कार्यक्रम) सहित अनेक अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने सम्मेलन कराये और अध्ययन को बढ़ावा दिया; तभी से पर्यावरण वैश्विक राजनीति का महत्त्वपूर्ण मसला बन गया।
3 पृथ्वी सम्मेलन और उसके परिणाम
| बात | ब्योरा |
|---|---|
| कब और कहाँ | 1992, ब्राजील का रियो डी जनेरियो; संयुक्त राष्ट्रसंघ का पर्यावरण और विकास पर केंद्रित सम्मेलन |
| कौन आया | 170 देश, हज़ारों स्वयंसेवी संगठन, अनेक बहुराष्ट्रीय निगम |
| पाँच साल पहले | 1987: ‘अवर कॉमन फ़्यूचर’ शीर्षक बर्टलैंड रिपोर्ट, चेतावनी कि आर्थिक विकास के चालू तौर-तरीके टिकाऊ साबित नहीं होंगे (दक्षिण की औद्योगिक विकास की प्रबल माँग के हवाले से) |
| उत्तर की चिंता | ओज़ोन परत की छेद और वैश्विक तापवृद्धि |
| दक्षिण की चिंता | आर्थिक विकास और पर्यावरण प्रबंधन के आपसी रिश्ते को सुलझाना |
| परिणाम | जलवायु-परिवर्तन, जैव-विविधता और वानिकी पर नियमाचार; ‘अजेंडा-21’; ‘टिकाऊ विकास’ पर सहमति; रियो-घोषणापत्र में साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ |
| बची हुई दिक़्क़त | आपसी अंतर बने रहे; टिकाऊ विकास पर अमल कैसे हो, यह तय नहीं; आलोचकों के अनुसार ‘अजेंडा-21’ का झुकाव पर्यावरण संरक्षण के बजाय आर्थिक वृद्धि की ओर है |
4 वैश्विक संपदा और अंटार्कटिका
| संधि / न्यायाचार | साल |
|---|---|
| अंटार्कटिका संधि | 1959 |
| मॉन्ट्रियल न्यायाचार (प्रोटोकॉल) | 1987 |
| अंटार्कटिका पर्यावरणीय न्यायाचार | 1991 |
| UNFCCC (यूनाइटेड नेशंस फ़्रेमवर्क कंवेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज) | 1992 |
| क्योटो प्रोटोकॉल (क्योटो, जापान) | 1997 |
- सहयोग टेढ़ी खीर क्यों: पारिस्थितिकी के हर मसले के साथ जुड़ी बड़ी समस्या यह है कि अपुष्ट वैज्ञानिक साक्ष्यों और समय-सीमा को लेकर मतभेद पैदा होते हैं, इसलिए सर्व-सामान्य पर्यावरणीय अजेंडा पर सहमति मुश्किल होती है।
- आँख खोल देने वाली घटना: 1980 के दशक के मध्य में अंटार्कटिका के ऊपर ओज़ोन परत में छेद की खोज।
- बाहरी अंतरिक्ष: प्रबंधन पर उत्तर-दक्षिण असमानता का असर; महत्त्वपूर्ण मसला प्रौद्योगिकी और औद्योगिक विकास का है, क्योंकि दोहन के फायदे न मौजूदा पीढ़ी में सबके लिए बराबर हैं और न आगे की पीढ़ियों के लिए।
| अंटार्कटिका के आँकड़े | मान |
|---|---|
| महादेशीय इलाके का विस्तार | 1 करोड़ 40 लाख वर्ग किलोमीटर |
| समुद्र में अतिरिक्त विस्तार | 3 करोड़ 60 लाख वर्ग किलोमीटर |
| विश्व का निर्जन क्षेत्र | 26 प्रतिशत |
| स्थलीय हिम | 90 प्रतिशत |
| धरती का स्वच्छ जल | 70 प्रतिशत |
- जीवन: सीमित स्थलीय जीवन, बहुत उर्वर समुद्री पारिस्थितिकी-तंत्र: सूक्ष्म शैवाल, कवक और लाइकेन, समुद्री स्तनधारी जीव, मत्स्य, कठिन वातावरण के अनुकूल पक्षी, और क्रिल, जो समुद्री आहार शृंखला की धुरी है।
- वैज्ञानिक महत्त्व: विश्व की जलवायु को संतुलित रखने में भूमिका; अंदरूनी हिमानी परत ग्रीन हाऊस गैस के जमाव का महत्त्वपूर्ण सूचना-स्रोत है और इससे लाखों बरस पहले के वायुमंडलीय तापमान का पता चलता है।
- दो दावे: (1) ब्रिटेन, अर्जेन्टीना, चिले, नार्वे, फ़्रांस, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ने संप्रभु अधिकार का वैधानिक दावा किया; (2) अन्य अधिकांश देश इसे विश्व की साझी संपदा मानते हैं, किसी देश के क्षेत्राधिकार में नहीं।
- 1959 के बाद गतिविधियाँ वैज्ञानिक अनुसंधान, मत्स्य आखेट और पर्यटन तक सीमित; फिर भी कुछ हिस्से तेल के रिसाव जैसे अवशिष्ट पदार्थ के दबाव में गुणवत्ता खो रहे हैं।
5 साझी परंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ
| पक्ष | तर्क |
|---|---|
| उत्तर के विकसित देश | पर्यावरण पर उसी दशा में चर्चा हो जिसमें वह आज है; संरक्षण में हर देश की जिम्मेदारी बराबर हो |
| दक्षिण के विकासशील देश | नुकसान अधिकांशतया विकसित देशों के औद्योगिक विकास से पहुँचा है, इसलिए भरपाई की ज़िम्मेदारी भी ज़्यादा उन्हीं की; विकासशील देश अभी औद्योगीकरण से गुजर रहे हैं, इसलिए उन पर वही प्रतिबंध न लगें; अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण कानून के निर्माण, प्रयोग और व्याख्या में उनकी विशिष्ट ज़रूरतों का ध्यान रहे |
‘धरती के पारिस्थितिकी तंत्र की अखंडता और गुणवत्ता की बहाली, सुरक्षा तथा संरक्षण के लिए विभिन्न देश विश्व-बंधुत्व की भावना से आपस में सहयोग करेंगे। पर्यावरण के विश्वव्यापी अपक्षय में विभिन्न राज्यों का योगदान अलग-अलग है। इसे देखते हुए विभिन्न राज्यों की ‘साझी परंतु अलग-अलग जिम्मेदारियाँ’ होगी। विकसित देशों के समाजों का वैश्विक पर्यावरण पर दबाव ज़्यादा है और इन देशों के पास विपुल प्रौद्योगिक एवं वित्तीय संसाधन हैं। इसे देखते हुए टिकाऊ विकास के अंतर्राष्ट्रीय प्रयास में विकसित देश अपनी ख़ास जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं।’
- UNFCCC (1992): देश अपनी क्षमता के अनुरूप, अपक्षय में अपनी हिस्सेदारी के आधार पर साझी परंतु अलग-अलग ज़िम्मेदारियाँ निभाएँगे। यह भी माना गया कि उत्सर्जन में सबसे बड़ा ऐतिहासिक और मौजूदा हिस्सा विकसित देशों का है और विकासशील देशों का प्रतिव्यक्ति उत्सर्जन कम है।
- क्योटो प्रोटोकॉल: औद्योगिक देशों के लिए ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लक्ष्य। गैसें: कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और हाइड्रो-फ़्लोरो कार्बन। चीन, भारत और अन्य विकासशील देश बाध्यताओं से बाहर।
6 साझी संपदा और पावन वन-प्रांतर
- घटने के चार कारण: निजीकरण, गहनतर खेती, आबादी की वृद्धि और पारिस्थितिकी तंत्र की गिरावट। इससे इसका आकार, गुणवत्ता और गरीबों को उपलब्धता तीनों घट रहे हैं।
- भारत का उदाहरण: सदियों के चलन और आपसी समझदारी से भारत के ग्रामीण समुदायों ने साझी संपदा के संदर्भ में अपने सदस्यों के अधिकार और दायित्व तय किए हैं। दक्षिण भारत के वन-प्रदेशों में पावन वन-प्रांतरों का प्रबंधन परंपरानुसार ग्रामीण समुदाय करता आ रहा है।
- देवस्थान के नाम: राजस्थान में वानी, केंकड़ी और ओरान; झारखंड में जहेरा थान और सरना; मेघालय में लिंगदोह; केरल में काव; उत्तराखंड में थान या देवभूमि; महाराष्ट्र में देव रहतिस।
- आधार: संसाधनों की विरलता नहीं, प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा ही वह आधार थी जिसने युगों तक इन वनों को बचाए रखा। हिंदू समवेत रूप से प्राकृतिक वस्तुओं की पूजा करते हैं, और बहुत से मंदिरों का निर्माण देवस्थान में हुआ है।
- महत्त्व: अब इसे समुदाय आधारित संसाधन-प्रबंधन माना जाता है; कुछ अनुसंधानकर्ताओं का विश्वास है कि इससे जैव-विविधता और पारिस्थितिकी-संरक्षण के साथ सांस्कृतिक वैविध्य भी कायम रहता है।
- कठिन समस्या: जब कानूनी स्वामित्व राज्य के पास हो और व्यावहारिक नियंत्रण समुदाय के हाथ में; दोनों के नीतिगत मानक अलग हैं और उपयोग के उद्देश्यों में मेल नहीं। नयी राष्ट्रीय वन-नीतियों तथा बसाहट के विस्तार से इनकी पहचान मंद पड़ रही है।
7 पर्यावरण के मसले पर भारत का पक्ष
| बात | ब्योरा |
|---|---|
| क्योटो | भारत ने 2002 में क्योटो प्रोटोकॉल (1997) पर हस्ताक्षर और अनुमोदन किया |
| छूट क्यों | औद्योगीकरण के दौर में ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन में भारत, चीन और अन्य विकासशील देशों का ख़ास योगदान नहीं था |
| आलोचकों की बात | भारत और चीन जल्दी ही उत्सर्जन में विकसित देशों की भाँति अगली कतार में होंगे |
| ग्रुप-8, जून 2005 | भारत ने बताया कि विकासशील देशों की प्रति व्यक्ति उत्सर्जन दर विकसित देशों की तुलना में नाममात्र है |
| भारत की दलील | ऐतिहासिक उत्तरदायित्व (UNFCCC): रिसाव की ऐतिहासिक और मौजूदा जवाबदेही ज़्यादातर विकसित देशों की; ‘विकासशील देशों की पहली और अपरिहार्य प्राथमिकता आर्थिक तथा सामाजिक विकास की है।’ |
| किसका विरोध | तेजी से औद्योगिक होते देशों (ब्राजील, चीन और भारत) पर बाध्यता; भारत इसे नियमाचार की मूल भावना के विरुद्ध और अनुचित मानता है |
| उत्सर्जन के आँकड़े | विश्व औसत (सन् 2000) 3.8 टन; भारत 2000 में 0.9 टन, 2030 तक अनुमानित 1.6 टन, यानी विश्व औसत के आधे से भी कम |
| 1997 का पुनरावलोकन | रियो के समझौतों के क्रियान्वयन पर निष्कर्ष: रियायती शर्तों पर नये और अतिरिक्त वित्तीय संसाधन तथा बेहतर प्रौद्योगिकी देने में कोई सार्थक प्रगति नहीं |
| दक्षेस | SAARC देश पर्यावरण के प्रमुख वैश्विक मसलों पर एक समान राय बनायें, ताकि क्षेत्र की आवाज़ वज़नी हो |
- भारत के कदम: नेशनल ऑटो-फ़्यूल पॉलिसी (वाहनों के लिए स्वच्छतर ईंधन अनिवार्य) · ऊर्जा-संरक्षण अधिनियम, 2001 (ऊर्जा का कारगर इस्तेमाल) · बिजली अधिनियम, 2003 (नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा) · प्राकृतिक गैस के आयात और स्वच्छ कोयले पर आधारित प्रौद्योगिकी · बायोडीजल राष्ट्रीय मिशन (2011-12 तक, 1 करोड़ 10 लाख हेक्टेयर भूमि) · 2 अक्तूबर 2016 को पेरिस जलवायु समझौते का अनुमोदन · विश्व के सबसे बड़े नवीकरणीय ऊर्जा कार्यक्रमों में से एक।
8 पर्यावरण आंदोलन: तीन प्रकार
| प्रकार | किताब के उदाहरण और बातें |
|---|---|
| वन-आंदोलन | दक्षिणी देशों में दबाव: मैक्सिको, चिले, ब्राज़ील, मलेशिया, इंडोनेशिया, महादेशीय अफ़्रीका और भारत। तीन दशकों की सक्रियता के बावजूद तीसरी दुनिया में कटाई खतरनाक गति से जारी; पिछले दशक में विशालतम वनों का विनाश बढ़ा। |
| खनिज-उद्योग के विरुद्ध | खनिज-उद्योग पृथ्वी पर मौजूद सबसे ताकतवर उद्योगों में एक है। उदारीकरण से दक्षिण की अर्थव्यवस्थाएँ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खुलीं। शिकायतें: धरती के भीतर मौजूद संसाधनों को बाहर निकालना, रसायनों का भरपूर उपयोग, भूमि और जलमार्गों का प्रदूषण, स्थानीय वनस्पतियों का विनाश, जन-समुदायों का विस्थापन। उदाहरण: फिलीपिन्स में ऑस्ट्रेलियाई कंपनी ‘वेस्टर्न माइनिंग कारपोरेशन’ के खिलाफ अभियान; खुद ऑस्ट्रेलिया में विरोध के दो कारण: परमाण्विक शक्ति की मुख़ालफत और ऑस्ट्रेलियाई आदिवासियों के बुनियादी अधिकारों की पैरोकारी। बांग्लादेश के दिनाजपुर ज़िले के फुलवाड़ी में पूरा समुदाय कोयला खनन परियोजना के विरोध में उठ खड़ा हुआ। |
| बाँध-विरोधी आंदोलन | अब इन्हें नदियों को बचाने के आंदोलन के रूप में देखा जाता है, क्योंकि ये नदियों और नदी-घाटियों के टिकाऊ तथा न्यायसंगत प्रबंधन की बात उठाते हैं। विश्व का पहला बाँध-विरोधी आंदोलन: 1980 के दशक के शुरुआती और मध्यवर्ती वर्षों में ऑस्ट्रेलिया में फ़्रैंकलिन नदी और उसके परिवर्ती वन को बचाने का आंदोलन, जो वन और विजनपन की पैरोकारी भी करता था। बड़े बाँधों की होड़: तुर्की से थाईलैंड और दक्षिण अफ़्रीका तक, इंडोनेशिया से चीन तक। भारत में नर्मदा आंदोलन सबसे प्रसिद्ध; भारत के ये आंदोलन अहिंसा पर आधारित होने के कारण समानधर्मी हैं। |
बुनियादी फ़र्क़: दक्षिणी देशों के वन निर्जन नहीं हैं, जबकि उत्तरी गोलार्द्ध के वन जनविहीन हैं या ऐसे देखे जाते हैं। इसीलिए उत्तर में वनभूमि को निर्जन भूमि का दर्जा मिला। यह दृष्टिकोण मनुष्य को प्रकृति का हिस्सा नहीं मानता और पर्यावरण को ऐसी चीज़ मानता है जिसे बाग-बगीचे या अभयारण्य में बदलकर मनुष्यों से बचाया जाए। विजनपन का नज़रिया ऑस्ट्रेलिया, स्केंडिनेविया, उत्तरी अमरीका और न्यूजीलैंड में हावी है, जहाँ ‘अविकसित निर्जन वन-क्षेत्र’ अपेक्षाकृत ज़्यादा हैं।
दक्षिण में भी विजनपन के अभियान: फिलीपिन्स में ‘हरित-संगठनों’ ने गरुड़ तथा अन्य शिकारी पक्षियों को बचाने की मुहिम चलायी; भारत में ‘बंगाल-टाइगर’ को बचाने की मुहिम; अफ़्रीका में हाथीदाँत के व्यापार के विरुद्ध लंबा अभियान; ब्राजील और इंडोनेशिया के जंगलों में प्रसिद्ध संघर्ष। हाल में विजनपन के मसलों को जैव-विविधता के मसलों का रूप दिया गया है, और अनेक अभियानों की शुरुआत तथा वित्तीय मदद वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड (WWF) जैसे संगठनों ने की।
9 संसाधनों की भू-राजनीति
- जड़: यूरोपीय ताकतों के विश्वव्यापी प्रसार का एक मुख्य साधन और मकसद संसाधन रहे। पश्चिमी सोच व्यापारिक संबंध, युद्ध और ताकत के इर्द-गिर्द रही, जिसके मूल में थी विदेश में संसाधनों की मौजूदगी और समुद्री नौवहन में दक्षता।
- इमारती लकड़ी: नौवहन लकड़ी पर आधारित था, इसलिए जहाज की शहतीरों के लिए इमारती लकड़ी की आपूर्ति 17वीं सदी से प्रमुख यूरोपीय शक्तियों की प्राथमिकता रही।
- दोनों विश्वयुद्ध: सामरिक संसाधनों, ख़ासकर तेल की निर्बाध आपूर्ति का महत्त्व उजागर हुआ।
- शीतयुद्ध के चार कदम (उत्तर के विकसित देश): संसाधन-दोहन के इलाकों और समुद्री परिवहन-मार्गों के इर्द-गिर्द सेना की तैनाती · महत्त्वपूर्ण संसाधनों का भंडारण · उत्पादक देशों में मनपसंद सरकारों की बहाली · बहुराष्ट्रीय निगमों और अपने हितसाधक अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को समर्थन। चिंता यह थी कि सोवियत संघ अबाध पहुँच को खतरे में डाल सकता है, और यह भी कि खाड़ी के तेल तथा दक्षिणी और पश्चिमी एशिया के खनिज पर विकसित देशों का नियंत्रण बना रहे।
- शीतयुद्ध के बाद: चिंता सुरक्षित आपूर्ति बनाए रखने की; रेडियोधर्मी खनिज़ों से जुड़े व्यावसायिक फ़ैसले भी चिंता का विषय; फिर भी तेल वैश्विक रणनीति में सबसे महत्त्वपूर्ण संसाधन बना हुआ है।
| तेल के आँकड़े | मान |
|---|---|
| खाड़ी-क्षेत्र का विश्व तेल-उत्पादन में हिस्सा | 30 प्रतिशत |
| खाड़ी-क्षेत्र में विश्व के ज्ञात तेल-भंडार का हिस्सा | 64 प्रतिशत (इसीलिए यही एकलौता क्षेत्र माँग में ख़ास बढ़ोत्तरी पूरी कर सकता है) |
| सऊदी अरब | विश्व के कुल तेल-भंडार का एक चौथाई; सबसे बड़ा तेल-उत्पादक देश |
| इराक | ज्ञात तेल-भंडार सऊदी अरब के बाद दूसरे नंबर पर; बड़े हिस्से की खोज-बीन बाक़ी, संभावना है कि भंडार 112 अरब बैरल से कहीं ज़्यादा हो |
| उपभोक्ता | संयुक्त राज्य अमरीका, यूरोप, जापान तथा चीन और भारत; ये सब इस इलाके से बहुत दूर |
| परिवहन-ऊर्जा | दुनिया को परिवहन के लिए जितनी ऊर्जा चाहिए, उसका 95 फीसदी पेट्रोलियम से; उत्पादों की कड़ी अंतहीन (टूथपेस्ट, पेसमेकर, पेंट, स्याही) |
- पानी: कुछ भागों में साफ़ पानी की कमी और असमान वितरण; इसलिए साझे जल-संसाधन पर मतभेद 21वीं सदी में फसाद की जड़ बन सकते हैं। इसी को इंगित करने के लिए ‘जलयुद्ध’ शब्द गढ़ा गया।
- प्रारूपी विवाद: उद्गम से दूर बसा देश आपत्ति जताता है जब उद्गम के नजदीक बसा देश बाँध बनाता है, अत्यधिक सिंचाई करता है या नदी को प्रदूषित करता है, क्योंकि इससे दूर के देश को पानी कम या ख़राब मिलेगा।
- दो उदाहरण: 1950 और 1960 के दशक में इज़रायल, सीरिया तथा जार्डन के बीच संघर्ष, जब हर देश ने जॉर्डन और यारमुक नदी से पानी का बहाव मोड़ने की कोशिश की; और फ़िलहाल तुर्की, सीरिया और इराक के बीच फरात नदी पर बाँध को लेकर तनातनी।
10 मूलवासी और उनके अधिकार
| जगह | संख्या |
|---|---|
| विश्वभर में (भारत सहित) | लगभग 30 करोड़ |
| फिलीपिन्स का कोरडिलेरा क्षेत्र | 20 लाख |
| चिले के मापुशे | 10 लाख |
| बांग्लादेश का चटगांव पर्वतीय क्षेत्र | 6 लाख आदिवासी |
| उत्तर अमरीकी मूलवासी | 35 लाख |
| पनामा नहर के पूरब के कुना | 50 हज़ार |
| उत्तरी सोवियत | 10 लाख |
- कहाँ रहते हैं: मध्य और दक्षिण अमरीका, अफ़्रीका, दक्षिणपूर्व एशिया तथा भारत, जहाँ इन्हें आदिवासी या जनजाति कहा जाता है; ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड समेत ओसियाना के द्वीपीय देशों में हजारों सालों से पॉलिनेशिया, मैलनेशिया और माइक्रोनेशिया वंश के मूलवासी।
- माँग: इन्हें मूलवासी कौम के रूप में अपनी स्वतंत्र पहचान रखने वाला समुदाय माना जाए। दावेदारी का जुमला: हम यहाँ ‘अनंत काल से रहते चले आ रहे हैं’।
- सबसे बड़ा ख़तरा: जमीन और उस पर आधारित जीवन-प्रणालियों के बारे में इनकी विश्वदृष्टि आश्चर्यजनक रूप से एक जैसी है। भूमि की हानि का अर्थ है आर्थिक-संसाधनों के एक आधार की हानि, और यही इनके जीवन के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है।
- भारत में: अनुसूचित जनजाति या आदिवासी, कुल जनसंख्या का आठ प्रतिशत। कुछेक घुमन्तू जनजातियों को छोड़कर अधिकांश खेती पर निर्भर; सदियों तक जितनी बन पड़े उतनी जमीन पर बेधड़क खेती करते रहे, पर ब्रितानी औपनिवेशिक शासन के बाद बाहरी लोगों से सामना हुआ। राजनीतिक प्रतिनिधित्व में संवैधानिक सुरक्षा है, पर विकास का लाभ नहीं मिला; आज़ादी के बाद की परियोजनाओं से विस्थापित होने वालों में यह सबसे बड़ा समुदाय है और इसने विकास की बहुत बड़ी कीमत चुकायी है।
- संगठन: 1970 के दशक में मूलवासी नेताओं के बीच अंतर्राष्ट्रीय संपर्क बढ़ा; 1975 में ‘वर्ल्ड काउंसिल ऑफ इंडिजिनस पीपल’ का गठन हुआ। संयुक्त राष्ट्रसंघ में सबसे पहले इसी परिषद् को परामर्शदायी परिषद् का दर्ज़ा मिला; आदिवासियों के सरोकारों से जुड़े 10 अन्य स्वयंसेवी संगठनों को भी यह दर्ज़ा दिया गया है।
- आगे का सूत्र: अगले अध्याय में चर्चित वैश्वीकरण-विरोधी आंदोलनों में से अनेक ने मूलवासियों के अधिकारों पर जोर दिया है।
11 एक नज़र में: तारीख़ें
| साल | घटना |
|---|---|
| 1959 | अंटार्कटिका संधि; इसके बाद वहाँ गतिविधियाँ सीमित |
| 1960 का दशक | पर्यावरण की चिंता ने राजनीतिक चरित्र लिया |
| 1972 | ‘क्लब ऑव रोम’ की ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ |
| 1970 का दशक | अफ़्रीका की अनावृष्टि, ‘पर्यावरणीय शरणार्थी’ शब्द; मूलवासी नेताओं के संपर्क बढ़े |
| 1975 | ‘वर्ल्ड काउंसिल ऑफ इंडिजिनस पीपल’ का गठन |
| 1982 | संयुक्त राष्ट्रसंघ की मूलवासियों की शुरुआती परिभाषा |
| 1980 का दशक (शुरुआती-मध्य) | विश्व का पहला बाँध-विरोधी आंदोलन (फ़्रैंकलिन नदी, ऑस्ट्रेलिया); दशक के मध्य में अंटार्कटिका पर ओज़ोन छेद की खोज |
| 1987 | मॉन्ट्रियल न्यायाचार; बर्टलैंड रिपोर्ट ‘अवर कॉमन फ़्यूचर’ |
| 1991 | अंटार्कटिका पर्यावरणीय न्यायाचार |
| 1992 | पृथ्वी सम्मेलन (रियो), अजेंडा-21, टिकाऊ विकास, रियो-घोषणापत्र, UNFCCC |
| 1997 | क्योटो प्रोटोकॉल (क्योटो, जापान); भारत का रियो-क्रियान्वयन का पुनरावलोकन |
| 2001 / 2003 | ऊर्जा-संरक्षण अधिनियम / बिजली अधिनियम |
| 2002 | भारत का क्योटो प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर और अनुमोदन |
| जून 2005 | ग्रुप-8 की बैठक में भारत की दलील |
| 2 अक्तूबर 2016 | भारत ने पेरिस जलवायु समझौते का अनुमोदन किया |