कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 अध्याय 7 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ NCERT समाधान (NCERT Solutions) हिंदी में

NCERT कक्षा 12 राजनीति विज्ञान, पुस्तक स्वतंत्र भारत में राजनीति-II, अध्याय 7 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ की प्रश्नावली के सभी 10 प्रश्नों के पूरे हल, और आख़िर में पाठ के बीच पूछे गए प्रश्नों के उत्तर। प्रश्न हिंदी संस्करण से ही लिए गए हैं, उसी की अपनी संख्या और उसी के अपने विकल्प-क्रम के साथ, क्योंकि अंग्रेज़ी और हिंदी संस्करण की प्रश्नावली हर अध्याय में एक जैसी नहीं होती।

दो बातें, पढ़ने से पहले

1. प्रश्न 1 में पुस्तक की छपाई की एक त्रुटि है। हिंदी संस्करण में ‘अ’ स्तंभ के चौथे मद पर भी (ख) ही छपा है, जबकि वह (घ) होना चाहिए। अंग्रेज़ी संस्करण में वहाँ ठीक (d) छपा है। नीचे उत्तर (घ) मानकर दिया गया है, ताकि किताब में दो बार (ख) देखकर आप उलझें नहीं। दाहिने स्तंभ में दोनों संस्करण (i) (ii) (iii) (iv) ही छापते हैं।

2. प्रश्न 2 मानचित्र में रंग भरने को कहता है। यहाँ उसका उत्तर राज्यवार सूची के रूप में दिया गया है, और पूर्वोत्तर का हमारा अपना बिंदु-मानचित्र (भारत की आधिकारिक रूपरेखा पर, हर राज्य पर एक चिह्न, प्रवृत्ति के अनुसार क, ख, ग) अध्याय 7 के हमारे नोट्स के खंड 5 में छपा है। उत्तर-पुस्तिका में आपको दिए गए मानचित्र पर ही रंग भरना है; नीचे की सूची बताती है कि किस राज्य पर कौन-सा रंग जाएगा।

1 प्रश्न 1

प्रश्न: निम्नलिखित में मेल करें:

अ (क्षेत्रीय आकांक्षाओं की प्रकृति): (क) सामाजिक-धार्मिक पहचान के आधार पर राज्य का निर्माण · (ख) भाषायी पहचान और केंद्र के साथ तनाव · (ग) क्षेत्रीय असंतुलन के फलस्वरूप राज्य का निर्माण · (घ) आदिवासी पहचान के आधार पर अलगाववादी माँग
ब (राज्य): (i) नगालैंड/मिजोरम · (ii) झारखंड/छत्तीसगढ़ · (iii) पंजाब · (iv) तमिलनाडु

उत्तर

(क) का मेल: (iii) पंजाब। पंजाबी-भाषी सूबे की माँग सिख पहचान से जुड़ी हुई थी; अकाली दल सिखों की राजनीतिक शाखा के रूप में बना था और पंजाबी-भाषी सूबे में सिख बहुसंख्यक हो गए।

(ख) का मेल: (iv) तमिलनाडु। द्रविड़ आंदोलन ने उत्तरी भारत के प्रभुत्व को नकारा, डीएमके हिंदी को राजभाषा का दर्ज़ा देने के खिलाफ़ थी और 1965 का हिंदी विरोधी आंदोलन इसी तनाव की सबसे बड़ी मिसाल है।

(ग) का मेल: (ii) झारखंड/छत्तीसगढ़। अध्याय इन्हें उन राज्यों में गिनता है जो विविधता की चुनौती से निपटने के लिए देश की अंदरूनी सीमा रेखाओं के पुनर्निर्धारण से बने, और इनके पीछे मुख्य मुद्दा क्षेत्रीय असंतुलन तथा पिछड़ेपन का रहा।

(घ) का मेल: (i) नगालैंड/मिजोरम। दोनों जगह अलगाववादी माँग आदिवासी पहचान के आधार पर उठी: नगालैंड में अंगमी जापू फिजो के नेतृत्व में 1951 में आज़ादी की घोषणा हुई, और मिजोरम में लालडेंगा के नेतृत्व में मिजो नेशनल फ्रंट ने 1966 में सशस्त्र अभियान शुरू किया।

2 प्रश्न 2

प्रश्न: पूर्वोत्तर के लोगों की क्षेत्रीय आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति कई रूपों में होती है। बाहरी लोगों के खिलाफ़ आंदोलन, ज्यादा स्वायत्तता की माँग के आंदोलन और अलग देश बनाने की माँग करना, ऐसी ही कुछ अभिव्यक्तियाँ हैं। पूर्वोत्तर के मानचित्र पर इन तीनों के लिए अलग-अलग रंग भरिए और दिखाइए कि किस राज्य में कौन-सी प्रवृत्ति ज्यादा प्रबल है।

उत्तर: तीनों प्रवृत्तियाँ, राज्यवार

मानचित्र पर तीन अलग रंग लीजिए और नीचे दी गई सूची के अनुसार भरिए। हर दावा अध्याय के अपने पाठ से है।

रंग 1: बाहरी लोगों के खिलाफ़ आंदोलन
असम सबसे प्रबल उदाहरण है: 1979 से 1985 तक चला असम आंदोलन, आसू के नेतृत्व में, अवैध आप्रवासियों और मतदाता सूची में उनके नाम दर्ज होने के खिलाफ़।
त्रिपुरा में यह मसला और गंभीर है, क्योंकि यहाँ के मूल निवासी खुद अपने ही प्रदेश में अल्पसंख्यक बन गए हैं।
मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश में भी इसी भय के कारण चकमा शरणार्थियों को लेकर गुस्सा है।

रंग 2: ज्यादा स्वायत्तता की माँग
असम के भीतर बोडो, करबी और दिमसा समुदायों ने अपने लिए अलग राज्य की माँग की; करबी और दिमसा को जिला-परिषद् के अंतर्गत तथा बोडो को स्वायत्त परिषद् का दर्जा देकर उन्हें असम में ही रखा गया।
मेघालय (खासी पहाड़ी क्षेत्र) इसी धारा से बना: ‘ईस्टर्न इंडिया ट्राइबल यूनियन’ और 1960 की ‘ऑल पार्टी हिल्स कांफ्रेंस’ ने असम से अलग जनजातीय राज्य की माँग की।
मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और मणिपुर का राज्य बनना भी इसी माँग के दायरे में आता है: केंद्र सरकार ने असम को बाँटकर मेघालय, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश बनाए, और त्रिपुरा तथा मणिपुर को राज्य का दर्जा दिया।

रंग 3: अलग देश बनाने की माँग
नगालैंड: फिजो के नेतृत्व में 1951 में भारत से आज़ादी की घोषणा; अध्याय के अनुसार इस समस्या का समाधान अब भी बाकी है।
मिजोरम: मिजो नेशनल फ्रंट ने 1966 में आज़ादी की माँग के साथ सशस्त्र अभियान शुरू किया, जो 1986 के शांति समझौते पर खत्म हुआ।

ध्यान रहे: असम पर एक से ज्यादा रंग जाएँगे, क्योंकि वहाँ ‘बाहरी’ का विरोध और स्वायत्तता की माँग दोनों प्रबल रहे। मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा पर भी एक से ज्यादा रंग जाएँगे। यही अध्याय का बिंदु है कि पूर्वोत्तर के राज्यों से बड़ी बेतरतीब किस्म की माँगें उठीं।

3 प्रश्न 3

प्रश्न: पंजाब समझौते के मुख्य प्रावधान क्या थे? क्या ये प्रावधान पंजाब और उसके पड़ोसी राज्यों के बीच तनाव बढ़ाने के कारण बन सकते हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर

समझौता कब और किसके बीच: 1984 के चुनावों के बाद सत्ता में आने पर नए प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने नरमपंथी अकाली नेताओं से बातचीत की शुरुआत की और अकाली दल के तत्कालीन अध्यक्ष हरचंद सिंह लोंगोवाल के साथ 1985 के जुलाई में एक समझौता हुआ। इसे राजीव गाँधी लोंगोवाल समझौता अथवा पंजाब समझौता कहा जाता है। अध्याय इसे पंजाब में अमन कायम करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम बताता है।

मुख्य प्रावधान:

1. चंडीगढ़ पंजाब को दे दिया जाएगा।
2. पंजाब तथा हरियाणा के बीच सीमा-विवाद को सुलझाने के लिए एक अलग आयोग की नियुक्ति होगी।
3. पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच रावी-व्यास के पानी के बँटवारे के बारे में फ़ैसला करने के लिए एक ट्रिब्यूनल (न्यायाधिकरण) बैठाया जाएगा।
4. सरकार पंजाब में उग्रवाद से प्रभावित लोगों को मुआवजा देने और उनके साथ बेहतर सलूक करने पर राजी हुई।
5. पंजाब से विशेष सुरक्षा बल अधिनियम को वापस लेने की बात पर भी सहमति हुई।

क्या ये प्रावधान तनाव बढ़ा सकते हैं? हाँ, दो प्रावधान ऐसे हैं:

चंडीगढ़ का सवाल। चंडीगढ़ पंजाब और हरियाणा दोनों की राजधानी है। उसे पंजाब को दे देने का सीधा मतलब है कि हरियाणा को अपनी अलग राजधानी चाहिए, और इसी के साथ यह सवाल भी खड़ा होता है कि बदले में हरियाणा को कौन-से इलाके मिलेंगे। समझौते ने इसी के लिए सीमा-विवाद पर एक अलग आयोग रखा, यानी विवाद उसी वक्त सुलझा नहीं था।

पानी का बँटवारा। रावी-व्यास का पानी पंजाब, हरियाणा और राजस्थान तीनों को चाहिए, और यह ऐसा संसाधन है जिसमें एक राज्य को ज्यादा मिलने का मतलब दूसरे को कम मिलना है। अध्याय खुद बताता है कि 1980 में अकाली सरकार की बर्खास्तगी के बाद अकाली दल ने पंजाब तथा पड़ोसी राज्यों के बीच पानी के बँटवारे के मुद्दे पर ही एक आंदोलन चलाया था। इसे ट्रिब्यूनल के हवाले करना विवाद का फ़ैसला नहीं था।

निष्कर्ष: दोनों मामलों में समझौते ने विवाद तय नहीं किया, बल्कि उसे आयोग और ट्रिब्यूनल को सौंप दिया, इसलिए ये प्रावधान अपने आप में आगे के तनाव का आधार बन सकते हैं। अध्याय यह भी दर्ज करता है कि पंजाब में न तो अमन आसानी से कायम हुआ और न ही समझौते के तत्काल बाद, और हिंसा का चक्र लगभग एक दशक तक चलता रहा।

4 प्रश्न 4

प्रश्न: आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के विवादास्पद होने के क्या कारण थे?

उत्तर

प्रस्ताव क्या था: 1970 के दशक में अकालियों के एक तबके ने पंजाब के लिए स्वायत्तता की माँग उठायी और 1973 में आनंदपुर साहिब में हुए एक सम्मेलन में इस आशय का प्रस्ताव पारित हुआ।

विवाद के कारण:

1. क्षेत्रीय स्वायत्तता की माँग। प्रस्ताव में क्षेत्रीय स्वायत्तता की बात उठायी गई थी, और उसकी माँगों में केंद्र-राज्य संबंधों को पुनर्परिभाषित करने की बात भी शामिल थी। इसे केंद्र की शक्तियों को घटाने की माँग के रूप में पढ़ा जा सकता था।

2. ‘कौम’ और ‘बोलबाला’ की भाषा। प्रस्ताव में सिख ‘कौम’ (नेशन या समुदाय) की आकांक्षाओं पर ज़ोर देते हुए सिखों के ‘बोलबाला’ (प्रभुत्व या वर्चस्व) का ऐलान किया गया। ‘कौम’ के दो अर्थ हो सकते हैं, और उसे ‘नेशन’ के अर्थ में पढ़ने पर वह अलग राष्ट्र के दावे के करीब चला जाता है।

3. दो तरह की पढ़त संभव थी। एक पढ़त यह थी कि यह प्रस्ताव भारत में संघवाद को मजबूत करने की अपील करता है, जो अध्याय का अपना वाक्य है। दूसरी पढ़त यह थी कि यह अलगाववाद की तरफ़ बढ़ता कदम है। इसी दुहरेपन ने प्रस्ताव को विवादास्पद बनाया।

4. आगे के घटनाक्रम ने विवाद बढ़ाया। अध्याय दर्ज करता है कि प्रस्ताव का सिख जन-समुदाय पर बड़ा कम असर पड़ा। लेकिन 1980 में अकाली दल की सरकार बर्खास्त होने के बाद दल ने पानी के बँटवारे पर आंदोलन चलाया और धार्मिक नेताओं के एक तबके ने स्वायत्त सिख पहचान की बात उठायी। इसके बाद नेतृत्व नरमपंथी अकालियों के हाथ से निकलकर चरमपंथी तत्त्वों के हाथ में चला गया और आंदोलन ने सशस्त्र विद्रोह का रूप ले लिया। इस पृष्ठभूमि में प्रस्ताव की भाषा और भी विवादास्पद हो गई।

5 प्रश्न 5

प्रश्न: जम्मू-कश्मीर की अंदरुनी विभिन्नताओं की व्याख्या कीजिए और बताइए कि इन विभिन्नताओं के कारण इस राज्य में किस तरह अनेक क्षेत्रीय आकांक्षाओं ने सर उठाया है।

उत्तर

तीन सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र: जम्मू और कश्मीर तीन क्षेत्रों, जम्मू, कश्मीर और लद्दाख, से बना हुआ है।

जम्मू: इस क्षेत्र में छोटी पहाड़ियाँ और मैदानी भाग हैं। इसमें मुख्य रूप से हिन्दू रहते हैं; मुसलमान, सिख और अन्य मतों के लोग भी रहते हैं।
कश्मीर: इस क्षेत्र में मुख्य रूप से कश्मीर घाटी है। यहाँ रहने वाले अधिकांश कश्मीरी मुसलमान हैं और शेष हिन्दू, सिख, बौद्ध तथा अन्य हैं।
लद्दाख: यह मुख्य रूप से पहाड़ी क्षेत्र है। इसकी जनसंख्या बहुत कम है, जिसमें लगभग बराबर संख्या में बौद्ध और मुसलमान हैं।

इन विभिन्नताओं से कौन-सी आकांक्षाएँ उठीं:

1. कश्मीरियत की आकांक्षा। पाकिस्तानी नेताओं ने सोचा कि कश्मीर क्षेत्र पाकिस्तान का हिस्सा है, क्योंकि रियासत की अधिकांश आबादी मुसलमान थी। परंतु उस रियासत के लोगों ने इसे इस तरह नहीं देखा; उन्होंने सोचा कि सबसे पहले वे कश्मीरी हैं। क्षेत्रीय अभिलाषा का यही मुद्दा कश्मीरियत कहलाता है। यानी यहाँ धार्मिक पहचान अपने आप में राजनीतिक चुनाव तय नहीं करती थी।

2. स्वायत्तता पर दो विपरीत आकांक्षाएँ। अनुच्छेद 370 के विशेष दर्जे ने दो विपरीत प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया। जम्मू और कश्मीर के बाहर लोगों का एक वर्ग मानता था कि यह विशेष दर्जा राज्य को भारत से पूर्ण रूप से एकीकृत नहीं होने देता, इसलिए अनुच्छेद 370 को रद्द कर देना चाहिए और राज्य को किसी भी अन्य राज्य की तरह माना जाना चाहिए। दूसरी ओर अधिकांश कश्मीरियों का मानना था कि यह स्वायत्तता पर्याप्त नहीं है।

3. कश्मीरियों की तीन शिकायतें। पहली, कबायली हमले से उत्पन्न परिस्थिति के सामान्य होने पर विलय का मामला राज्य के लोगों को विचार के लिए देने का वायदा अभी तक पूरा नहीं हुआ, जिससे ‘जनमत-संग्रह’ की माँग उठी। दूसरी, अनुच्छेद 370 द्वारा दिया गया विशेष संघीय दर्जा व्यवहारिक रूप से कम कर दिया गया, जिससे स्वायत्तता बहाल करने या ‘अधिक राज्य स्वायत्तता’ की माँग उठी। तीसरी, यह अनुभव किया गया कि जिस प्रकार का लोकतंत्र शेष भारत में है, वैसा जम्मू और कश्मीर राज्य में लागू नहीं किया गया है।

4. विकास और राजनीति की अलग-अलग आकांक्षाएँ। अध्याय कहता है कि जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख भारत में बहुलवादी समाज के जीते-जागते उदाहरण हैं: वहाँ न केवल हर प्रकार की, यानी धार्मिक, सांस्कृतिक, भाषाई, जातीय और जनजातीय, विविधताएँ हैं, बल्कि विविध प्रकार की राजनीतिक और विकास की आकांक्षाएँ भी हैं, जिन्हें नवीनतम अधिनियम द्वारा प्राप्त करने की इच्छा की गई है।

5. बाहरी पक्ष भी साथ चलता रहा। पाकिस्तान ने सदा दावा किया कि कश्मीर घाटी पाकिस्तान का हिस्सा होनी चाहिए। 1947 के कबायली हमले के परिणामस्वरूप राज्य का एक हिस्सा पाकिस्तानी नियंत्रण में आ गया; यह पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर भारतीय क्षेत्र है, जिस पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है।

6 प्रश्न 6

प्रश्न: कश्मीर की क्षेत्रीय स्वायत्तता के मसले पर विभिन्न पक्ष क्या हैं? इनमें कौन-सा पक्ष आपको समुचित जान पड़ता है? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए।

उत्तर

पहला पक्ष: अनुच्छेद 370 को रद्द किया जाए। जम्मू और कश्मीर के बाहर लोगों का एक वर्ग विश्वास करता था कि अनुच्छेद 370 द्वारा प्रदत्त राज्य का विशेष दर्जा राज्य को भारत से पूर्ण रूप से एकीकृत नहीं होने देता है। इस वर्ग को लगा कि अनुच्छेद 370 को रद्द कर देना चाहिए और जम्मू और कश्मीर को भारत के किसी भी अन्य राज्य की तरह माना जाना चाहिए।

दूसरा पक्ष: स्वायत्तता पर्याप्त नहीं, उसे बढ़ाया जाए। अधिकांश कश्मीरियों का मानना है कि अनुच्छेद 370 द्वारा प्रदत्त स्वायत्तता पर्याप्त नहीं है। इस पक्ष की तीन शिकायतें प्रश्न 5 में दी गई हैं: जनमत-संग्रह के अधूरे वायदे से जुड़ी माँग, ‘अधिक राज्य स्वायत्तता’ की माँग, और यह शिकायत कि शेष भारत जैसा लोकतंत्र राज्य में लागू नहीं हुआ।

तीसरा पक्ष: अलग राष्ट्र की माँग। 1989 तक राज्य एक पृथक कश्मीरी राष्ट्र बनाने को लेकर एक उग्रवादी आंदोलन के कब्जे में आ गया। इन विद्रोहियों को पाकिस्तान से नैतिक, आर्थिक और फौजी समर्थन मिला। 1990 से पूरा समय जम्मू और कश्मीर ने विद्रोहियों के हाथों और सेना की कार्रवाई से असाधारण हिंसा झेली।

चौथा पक्ष: चुनावी राजनीति के भीतर स्वायत्तता। 1996 में विधानसभा चुनाव हुए, जिनमें फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस जम्मू और कश्मीर के लिए क्षेत्रीय स्वायत्तता की माँग के साथ सत्ता में आई। यानी स्वायत्तता की माँग को चुनावी और संवैधानिक रास्ते से उठाने का पक्ष भी मौजूद रहा।

पाँचवाँ पक्ष: 2019 के बाद की स्थिति। 5 अगस्त, 2019 को जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 द्वारा अनुच्छेद 370 समाप्त कर दिया गया और राज्य को पुनर्गठित कर दो केंद्र शासित प्रदेश, जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख, बना दिए गए।

अपनी राय (नमूना उत्तर, तर्क सहित): यह मत-आधारित प्रश्न है, इसलिए कोई एक उत्तर ‘सही’ नहीं है; अंक तर्क पर मिलते हैं। अध्याय के अपने निष्कर्षों के आधार पर लोकतांत्रिक बातचीत और संवैधानिक दायरे में समाधान वाला पक्ष सबसे समुचित जान पड़ता है, और इसके तीन कारण अध्याय स्वयं देता है:

1. अध्याय का दूसरा सबक यही है कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं को दबाने की जगह उनके साथ लोकतांत्रिक बातचीत का तरीका अपनाना सबसे अच्छा होता है, और बातचीत का लक्ष्य यह रखा गया कि विवाद के मुद्दों को संविधान के दायरे में रहकर निपटा लिया जाए।
2. मिजोरम के उदाहरण से पता चलता है कि राजनीतिक सुलह के जरिए अलगाववाद की समस्या से बड़े कारगर तरीके से निपटा जा सकता है।
3. जहाँ राजनीतिक तथा चुनावी प्रक्रिया अवरुद्ध हुई, वहाँ नतीजा लंबा संघर्ष और हिंसा रहा; जहाँ बातचीत हुई, वहाँ सौहार्द का माहौल बना और तनाव कम हुआ।

उत्तर लिखते समय अपना पक्ष चुनकर उसके पीछे इसी तरह अध्याय से लिए गए दो या तीन तर्क देना काफ़ी है।

7 प्रश्न 7

प्रश्न: असम आंदोलन सांस्कृतिक अभिमान और आर्थिक पिछड़ेपन की मिली-जुली अभिव्यक्ति था। व्याख्या कीजिए।

उत्तर

सांस्कृतिक अभिमान का पक्ष:

1. असमी लोगों को संदेह था कि बांग्लादेश से आकर बहुत-सी मुस्लिम आबादी असम में बसी हुई है।
2. लोगों के मन में यह भावना घर कर गई थी कि इन विदेशी लोगों को पहचानकर उन्हें अपने देश नहीं भेजा गया तो स्थानीय असमी जनता अल्पसंख्यक हो जाएगी। यानी सवाल अपनी भाषा, अपनी पहचान और अपने संख्या-बल को बचाने का था।
3. ‘आसू’ का आंदोलन अवैध आप्रवासी, बंगाली और अन्य लोगों के दबदबे तथा मतदाता सूची में लाखों आप्रवासियों के नाम दर्ज कर लेने के खिलाफ़ था।
4. आंदोलन की माँग थी कि 1951 के बाद जितने भी लोग असम में आकर बसे हैं उन्हें असम से बाहर भेजा जाए।

आर्थिक पिछड़ेपन का पक्ष:

1. असम में तेल, चाय और कोयले जैसे प्राकृतिक संसाधनों की मौजूदगी के बावजूद व्यापक गरीबी थी।
2. यहाँ की जनता ने माना कि असम के प्राकृतिक संसाधन बाहर भेजे जा रहे हैं और असमी लोगों को कोई फ़ायदा नहीं हो रहा है।
3. स्थानीय जनता भारत के दूसरे राज्यों अथवा किसी अन्य देश से आए लोगों को रोजगार के अवसरों और राजनीतिक सत्ता के एतबार से एक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखती थी, और मानती थी कि ये लोग यहाँ की जमीन हथिया रहे हैं।
4. पूर्वोत्तर का अलग-थलग पड़ जाना और देश के अन्य हिस्सों के मुकाबले आर्थिक रूप से पिछड़ा होना अध्याय की अपनी सूची में उन बातों में है जिन्होंने मिलकर एक जटिल स्थिति पैदा की।

दोनों पक्ष एक साथ कैसे दिखे: आंदोलन के तरीकों में भी दोनों चिंताएँ साथ चलीं। 1979 में ‘आसू’ ने विदेशियों के विरोध में आंदोलन चलाया, जिसने कई नए तरीके आजमाए और असमी जनता के हर तबके का समर्थन हासिल किया। इसी दौरान रेलगाड़ियों की आवाजाही तथा बिहार स्थित बरौनी तेलशोधक कारखाने को तेल-आपूर्ति रोकने की भी कोशिश की गई, जो सीधे इस शिकायत से जुड़ा कदम था कि असम के संसाधन बाहर जा रहे हैं। आंदोलन के दौरान हिंसक और त्रासद घटनाएँ भी हुईं; बहुत-से लोगों को जान गंवानी पड़ी और धन-संपत्ति का नुकसान हुआ।

पटाक्षेप: छह साल की सतत अस्थिरता के बाद राजीव गाँधी के नेतृत्व वाली सरकार ने ‘आसू’ के नेताओं से बातचीत शुरू की और 1985 में समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत बांग्लादेश-युद्ध के दौरान अथवा उसके बाद के सालों में असम आए लोगों की पहचान कर उन्हें वापस भेजने की बात तय हुई। समझौते से शांति कायम हुई और प्रदेश की राजनीति का चेहरा भी बदला, लेकिन ‘आप्रवास’ की समस्या का समाधान नहीं हो पाया।

8 प्रश्न 8

प्रश्न: हर क्षेत्रीय आंदोलन अलगाववादी माँग की तरफ अग्रसर नहीं होता। इस अध्याय से उदाहरण देकर इस तथ्य की व्याख्या कीजिए।

उत्तर

1. द्रविड़ आंदोलन। यह भारत के क्षेत्रीय आंदोलनों में सबसे ताकतवर आंदोलन था और भारतीय राजनीति में क्षेत्रीयतावादी भावनाओं की सर्वप्रथम तथा सबसे प्रबल अभिव्यक्ति। आंदोलन के नेतृवर्ग के एक हिस्से की आकांक्षा एक स्वतंत्र द्रविड़ राष्ट्र बनाने की थी, पर आंदोलन ने कभी सशस्त्र संघर्ष की राह नहीं अपनायी; नेतृत्व ने अपनी माँग आगे बढ़ाने के लिए सार्वजनिक बहसों और चुनावी मंच का ही इस्तेमाल किया। 1967 के विधानसभा चुनावों में डीएमके को बड़ी सफलता मिली, और अध्याय का निष्कर्ष है कि तमिलनाडु की राजनीति क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद के बीच सहकारिता की भावना का अच्छा उदाहरण पेश करती है। द्रविड़ दलों में से एक न एक 1996 से केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा रहा है।

2. भाषा के आधार पर राज्यों की माँग। मौजूदा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात ऐसे ही जन आंदोलनों वाले राज्य हैं। पंजाबी-भाषी लोगों ने 1950 के दशक के उत्तरार्द्ध से अपने लिए अलग राज्य की आवाज़ उठानी शुरू की और 1966 में पंजाब तथा हरियाणा बने। बाद में छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड का गठन हुआ। ये सब माँगें भारत संघ के भीतर पूरी हुईं।

3. पूर्वोत्तर की स्वायत्तता की माँगें। असम के बोडो, करबी और दिमसा जैसे समुदायों ने अपने लिए अलग राज्य की माँग की, पर चूँकि छोटे-छोटे और निरंतर लघुतर होते राज्य बनाते चले जाना संभव नहीं था, इसलिए संघीय राजव्यवस्था के कुछ और प्रावधानों का उपयोग करके यह माँग संतुष्ट की गई और इन समुदायों को असम में ही रखा गया। करबी और दिमसा को जिला-परिषद् के अंतर्गत स्वायत्तता दी गई, जबकि बोडो जनजाति को स्वायत्त परिषद् का दर्जा दिया गया। अध्याय कहता है कि स्वायत्तता की माँगों से निपटना आसान था, क्योंकि संविधान में विभिन्नताओं का समाहार संघ में करने के लिए प्रावधान पहले से मौजूद थे।

4. सिक्किम। यहाँ चोग्याल के खिलाफ़ चला आंदोलन भारत से अलग होने की नहीं, भारत के साथ जुड़ने की माँग तक पहुँचा। 1974 के पहले लोकतांत्रिक चुनाव में सिक्किम कांग्रेस को भारी विजय मिली, विधानसभा ने अप्रैल 1975 में पूर्ण विलय का प्रस्ताव पारित किया, जनमत-संग्रह ने उस पर मुहर लगाई और सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बन गया।

5. गोवा। मुक्ति के बाद वहाँ का सवाल महाराष्ट्र में विलय बनाम अलग गोवानी पहचान का था, अलग देश का नहीं। जनवरी 1967 के विशेष जनमत सर्वेक्षण में अधिकतर लोगों ने महाराष्ट्र से अलग रहने के पक्ष में मत डाला, गोवा संघशासित प्रदेश बना रहा और 1987 में भारत संघ का एक राज्य बना।

निष्कर्ष: अध्याय का पहला और बुनियादी सबक यही है कि क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग हैं, और क्षेत्रीय मुद्दे की अभिव्यक्ति कोई असामान्य अथवा लोकतांत्रिक राजनीति के व्याकरण से बाहर की घटना नहीं है। मिजोरम इसका उलटा भी दिखाता है: जो आंदोलन अलगाववाद तक चला गया था, वह भी बातचीत के जरिए वापस लोकतांत्रिक राजनीति में लौट आया।

9 प्रश्न 9

प्रश्न: भारत के विभिन्न भागों से उठने वाली क्षेत्रीय मांगों से ‘विविधता में एकता’ के सिद्धांत की अभिव्यक्ति होती है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? तर्क दीजिए।

उत्तर

हाँ, इस कथन से सहमत हुआ जा सकता है। पाँच तर्क, सब अध्याय से:

1. संविधान का अपना वादा। भारत में विभिन्न क्षेत्र और भाषायी समूहों को अपनी संस्कृति बनाए रखने का अधिकार होगा। हमने एकता की भावधारा से बँधे एक ऐसे सामाजिक जीवन के निर्माण का निर्णय लिया था, जिसमें इस समाज को आकार देने वाली तमाम संस्कृतियों की विशिष्टता बनी रहे। भारतीय राष्ट्रवाद ने एकता और विविधता के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है, और राष्ट्र का मतलब यह नहीं है कि क्षेत्र को नकार दिया जाए।

2. भारत का रास्ता दूसरों से अलग रहा। इस अर्थ में भारत का नज़रिया यूरोप के कई देशों से अलग रहा, जहाँ सांस्कृतिक विभिन्नता को राष्ट्र की एकता के लिए खतरे के रूप में देखा गया। भारत ने विविधता के सवाल पर लोकतांत्रिक दृष्टिकोण अपनाया, जिसमें क्षेत्रीयता राष्ट्र-विरोधी नहीं मानी जाती।

3. माँगें संघ के भीतर पूरी हुईं। विविधता की चुनौती से निपटने के लिए देश की अंदरूनी सीमा रेखाओं का पुनर्निर्धारण किया गया: भाषायी राज्य बने, 1966 में पंजाब और हरियाणा बने, पूर्वोत्तर का पुनर्गठन हुआ, और बाद में छत्तीसगढ़, उत्तराखंड तथा झारखंड बने। नए राज्य बनना विघटन नहीं, समायोजन था।

4. लचीला संविधान। भारत ने जो संघीय प्रणाली अपनायी है वह बहुत लचीली है। अगर अधिकतर राज्यों के अधिकार समान हैं तो जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों के लिए विशेष प्रावधान भी किए गए, हालाँकि जम्मू-कश्मीर के लिए विशेष प्रावधानों वाला अनुच्छेद 370 अगस्त 2019 में निरस्त कर दिया गया। संविधान की छठी अनुसूची में विभिन्न जनजातियों को अपने आचार-व्यवहार और पारंपरिक नियमों को संरक्षित रखने की पूर्ण स्वायत्तता दी गई है, और ये प्रावधान पूर्वोत्तर की कुछ जटिल राजनीतिक समस्याओं को सुलझाने में बड़े निर्णायक साबित हुए।

5. अध्याय का अपना निष्कर्ष। भारत का संवैधानिक ढाँचा ज्यादा लचीला और सर्वसमावेशी है। जिस तरह की चुनौतियाँ भारत में पेश आयीं वैसी कुछ दूसरे देशों में भी आयीं, लेकिन भारत का संवैधानिक ढाँचा उसे विशिष्ट बनाता है: क्षेत्रीय आकांक्षाओं को यहाँ अलगाववाद की राह पर जाने का मौका नहीं मिला, और भारत की राजनीति ने यह स्वीकार किया है कि क्षेत्रीयता लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग है।

दूसरा पहलू भी लिखिए: अध्याय यह भी दर्ज करता है कि ऐसी व्यवस्था में कभी-कभी तनाव या परेशानियाँ खड़ी हो सकती हैं। कभी राष्ट्रीय एकता के सरोकार क्षेत्रीय आकांक्षाओं और ज़रूरतों पर भारी पड़ सकते हैं, और कभी कोई क्षेत्रीय सरोकारों के कारण राष्ट्र की वृहत्तर आवश्यकताओं से आँखें मूँद सकता है। पंजाब, कश्मीर और पूर्वोत्तर के लंबे संघर्ष यही दिखाते हैं कि ‘विविधता में एकता’ अपने आप नहीं बनी रहती, उसे लगातार लोकतांत्रिक बातचीत से साधना पड़ता है।

10 प्रश्न 10

प्रश्न: नीचे लिखे अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें:

“हजारिका का एक गीत… एकता की विजय पर है; पूर्वोत्तर के सात राज्यों को इस गीत में एक ही माँ की सात बेटियाँ कहा गया है… मेघालय अपने रास्ते गई… अरुणाचल भी अलग हुई और मिजोरम असम के द्वार पर दूल्हे की तरह दूसरी बेटी से ब्याह रचाने को खड़ा है… इस गीत का अंत असमी लोगों की एकता को बनाए रखने के संकल्प के साथ होता है और इसमें समकालीन असम में मौजूद छोटी-छोटी कौमों को भी अपने साथ एकजुट रखने की बात कही गई है… करबी और मिजिंग भाई-बहन हमारे ही प्रियजन हैं।
—संजीब बरुआ”

(क) लेखक यहाँ किस एकता की बात कह रहा है?

गीत दो स्तरों की एकता की बात करता है।

पहली, पूरे पूर्वोत्तर की एकता। पूर्वोत्तर के सात राज्यों को एक ही माँ की सात बेटियाँ कहा गया है, यानी अलग-अलग राज्य बन जाने के बाद भी उनका आपसी रिश्ता टूटा नहीं है। मेघालय, अरुणाचल और मिजोरम का अलग होना यहाँ बिछड़ना नहीं, बेटियों का अपने-अपने घर जाना है।

दूसरी, असम के भीतर की एकता। गीत का अंत असमी लोगों की एकता को बनाए रखने के संकल्प के साथ होता है, और उसमें समकालीन असम में मौजूद छोटी-छोटी कौमों को भी अपने साथ एकजुट रखने की बात कही गई है: करबी और मिजिंग भाई-बहन हमारे ही प्रियजन हैं। यानी असमी पहचान का मतलब बाकी समुदायों को बाहर करना नहीं है।

दोनों मिलकर वही बात कहते हैं जो अध्याय कहता है: अलग राज्य बन जाना एकता का उलटा नहीं है, और विविधता को मानते हुए भी एकता रखी जा सकती है।

(ख) पुराने राज्य असम से अलग करके पूर्वोत्तर के कुछ राज्य क्यों बनाए गए?

1. आजादी के वक्त मणिपुर और त्रिपुरा को छोड़ दें तो यह पूरा इलाका असम कहलाता था।
2. गैर-असमी लोगों को जब लगा कि असम की सरकार उन पर असमी भाषा थोप रही है तो इस इलाके से राजनीतिक स्वायत्तता की माँग उठी। पूरे राज्य में असमी भाषा को लादने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और दंगे हुए।
3. बड़े जनजाति समुदाय के नेता असम से अलग होना चाहते थे। इन लोगों ने ‘ईस्टर्न इंडिया ट्राइबल यूनियन’ का गठन किया, जो 1960 में कहीं ज्यादा व्यापक ‘ऑल पार्टी हिल्स कांफ्रेंस’ में तब्दील हो गया, और इन नेताओं की माँग थी कि असम से अलग एक जनजातीय राज्य बनाया जाए।
4. आखिरकार एक जनजातीय राज्य की जगह असम को काटकर कई जनजातीय राज्य बने। केंद्र सरकार ने अलग-अलग वक्त पर असम को बाँटकर मेघालय, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश बनाए; त्रिपुरा और मणिपुर को भी राज्य का दर्जा दिया गया।
5. तारीख़ों में: नगालैंड को 1963 में राज्य बनाया गया; मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय 1972 में राज्य बने; मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश को 1987 में राज्य का दर्ज़ा मिला। 1972 तक पूर्वोत्तर का पुनर्गठन पूरा हो चुका था, लेकिन स्वायत्तता की माँग खत्म न हुई।

(ग) क्या आपको लगता है कि भारत के सभी क्षेत्रों के ऊपर एकता की यही बात लागू हो सकती है? क्यों?

यह मत-आधारित प्रश्न है। नीचे दोनों तरफ़ के तर्क अध्याय से दिए गए हैं; उत्तर में अपना पक्ष चुनकर दो या तीन तर्क लिखना काफ़ी है।

हाँ, काफ़ी हद तक लागू हो सकती है, क्योंकि: क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग हैं और उनका उठना कोई असामान्य घटना नहीं है। तमिलनाडु की राजनीति क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद के बीच सहकारिता की भावना का अच्छा उदाहरण पेश करती है। सिक्किम का विलय स्थानीय जनता के समर्थन से हुआ, इसलिए वह वहाँ की राजनीति में कोई विभेदकारी मुद्दा न बन सका। भारत का संवैधानिक ढाँचा लचीला और सर्वसमावेशी है, इसीलिए क्षेत्रीय आकांक्षाओं को यहाँ अलगाववाद की राह पर जाने का मौका नहीं मिला।

पर यह अपने आप नहीं होता, क्योंकि: कभी राष्ट्रीय एकता के सरोकार क्षेत्रीय आकांक्षाओं और ज़रूरतों पर भारी पड़ सकते हैं, और कभी कोई क्षेत्रीय सरोकारों के कारण राष्ट्र की वृहत्तर आवश्यकताओं से आँखें मूँद सकता है। नगालैंड की समस्या का समाधान होना अब भी बाकी है। ‘बाहरी’ का मसला असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की राजनीति में एक जीवंत मसला बना हुआ है, और त्रिपुरा में तो मूल निवासी खुद अपने ही प्रदेश में अल्पसंख्यक बन गए हैं। आर्थिक विकास में क्षेत्रीय असंतुलन रहने पर पिछड़े क्षेत्रों को लगेगा कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है।

निष्कर्ष: एकता की यह बात हर क्षेत्र पर लागू हो सकती है, पर तभी जब सत्ता की साझेदारी हो, राष्ट्रीय स्तर के निर्णयों में क्षेत्रों की बातों को वजन मिले, आर्थिक असंतुलन घटे, और आकांक्षाओं को दबाने की जगह उनके साथ लोकतांत्रिक बातचीत की जाए।

11 पाठ के बीच के प्रश्न

अध्याय प्रश्नावली के अलावा पाठ के बीच में भी सवाल पूछता है: हाशिये की टिप्पणियों में और एक कार्टून के कैप्शन में। नीचे इनके उत्तर उसी क्रम में दिए गए हैं जिसमें ये किताब में आते हैं, किताब के अपने शब्दों में।

हाशिये की टिप्पणी (भारत सरकार का नज़रिया)

प्र. क्या इसका मतलब यह हुआ कि क्षेत्रवाद सांप्रदायिकता के समान खतरनाक नहीं है? क्या हम यह भी कह सकते हैं कि क्षेत्रवाद अपने आप में खतरनाक नहीं?

उत्तर: अध्याय के अनुसार क्षेत्रवाद अपने आप में खतरनाक नहीं है, क्योंकि भारत ने विविधता के सवाल पर लोकतांत्रिक दृष्टिकोण अपनाया: लोकतंत्र में क्षेत्रीय आकांक्षाओं की राजनीतिक अभिव्यक्ति की अनुमति है और इन्हें राष्ट्र-विरोधी नहीं माना जाता। राज्यों की सीमाएँ नए सिरे से खींचकर, स्वायत्तता देकर और सत्ता में भागीदारी देकर ऐसी आकांक्षाओं को समाहित किया जा सकता है; तमिलनाडु की क्षेत्रीय राजनीति इसका अच्छा उदाहरण है कि क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद साथ-साथ चल सकते हैं। लेकिन अध्याय यह भी कहता है कि कभी-कभी क्षेत्रीय सरोकारों के कारण राष्ट्र की वृहत्तर आवश्यकताओं से आँखें मूँद ली जाती हैं, और 1980 के दशक में कुछ क्षेत्रीय आंदोलनों ने हथियार उठाए और अलगाव की माँग की। इसलिए क्षेत्रवाद तभी खतरनाक बनता है जब वह अलगाववादी या हिंसक रूप ले ले; लोकतांत्रिक ढंग से व्यक्त क्षेत्रवाद राजनीति का सामान्य हिस्सा है। (यह चर्चा वाला प्रश्न है; अपनी राय कारणों के साथ लिखिए।)

हाशिये की टिप्पणी (तनाव के दायरे)

प्र. खतरे की बात हमेशा सीमांत के राज्यों के संदर्भ में ही क्यों उठाई जाती है? क्या इस सबके पीछे विदेशी हाथ ही होता है?

उत्तर: हमेशा नहीं: अध्याय भाषाई राज्यों के लिए आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात के आंदोलनों तथा छत्तीसगढ़ और झारखंड के गठन का भी ज़िक्र करता है, जो सीमांत राज्य नहीं हैं। लेकिन सबसे गंभीर चुनौतियाँ, यानी जम्मू-कश्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर, सीमांत इलाकों से ही आईं, और इसके कई कारण हैं। सीमांत राज्यों में बाहरी पहलू जुड़ जाता है: 1947 में पाकिस्तान ने कश्मीर पर कबायली हमला करवाया और बाद में उग्रवादियों को नैतिक, भौतिक और सैन्य मदद दी; मिजो नेशनल फ्रंट को पाकिस्तानी सरकार से मदद और तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में शरण मिली। पर सब कुछ विदेशी हाथ नहीं था। विभाजन ने पूर्वोत्तर को चारों तरफ़ से भूमि से घिरा इलाका बना दिया, वह शेष भारत से कट गया और विकास के मामले में उपेक्षित रहा; लंबी अंतर्राष्ट्रीय सीमा और शेष भारत से कमज़ोर संचार ने वहाँ की राजनीति को और नाज़ुक बनाया। पड़ोसी देशों से बड़े पैमाने पर आप्रवासन ने ‘बाहरी’ लोगों के खिलाफ़ आंदोलनों को जन्म दिया, जैसे असम आंदोलन। कश्मीर में भी अध्याय चुनावों में धाँधली के आरोपों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के कमज़ोर होने को असंतोष का अंदरूनी कारण बताता है।

हाशिये की टिप्पणी (जम्मू एवं कश्मीर)

प्र. पर यह सारी बात तो सरकार, अधिकारियों, नेताओं और आतंकवादियों के बारे में है। जम्मू एवं कश्मीर की जनता के बारे में कोई कुछ क्यों नहीं कहता? लोकतंत्र में तो जनता की इच्छा को महत्त्व दिया जाना चाहिए। क्यों मैं ठीक कह रही हूँ न?

उत्तर: हाँ, और अध्याय दिखाता है कि जब जनता की इच्छा की अनदेखी हुई तो क्या हुआ। इंदिरा गाँधी और शेख अब्दुल्ला के समझौते के बाद कश्मीरियों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति जो भरोसा बना था, उसे केंद्र के हस्तक्षेप से फारूक अब्दुल्ला की सरकार की बर्खास्तगी से धक्का लगा; 1987 के चुनाव के बारे में व्यापक धारणा बनी कि नतीजे जनता की पसंद को नहीं दिखाते और पूरी चुनाव-प्रक्रिया में धाँधली हुई; और अकुशल प्रशासन के खिलाफ़ नाराज़गी तथा यह भावना कि केंद्र के इशारे पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमज़ोर किया जा रहा है, उग्रवाद के उभार के साथ गंभीर राजनीतिक संकट में बदल गई। अध्याय जिन शिकायतों का ज़िक्र करता है उनमें एक यही है कि शेष भारत में जिस तरह लोकतंत्र अमल में लाया जाता है, वैसा जम्मू-कश्मीर में संस्थागत रूप नहीं ले सका। अध्याय के सबक भी यही कहते हैं कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं से निपटने का सबसे अच्छा तरीका दमन नहीं, लोकतांत्रिक बातचीत और सत्ता में भागीदारी है। जनता की इच्छा का अर्थ यह भी है कि जम्मू, कश्मीर और लद्दाख, तीनों क्षेत्रों के लोगों की अलग-अलग आकांक्षाएँ सुनी जाएँ। (अपनी राय कारणों के साथ लिखिए।)

कार्टून का कैप्शन (आतंकवादी घटनाओं की ‘तालिका’)

प्र. क्या आजकल भी आपको इस तरह के समाचार सुनने को मिलते हैं! किन-किन क्षेत्रों में आप स्थिति को सामान्य होते हुए पाते हैं?

उत्तर: कार्टून 1980 के दशक के उस दौर का है जब पंजाब, दार्जिलिंग, दिल्ली और मिजोरम में आतंकवादी घटनाओं की ख़बरें रोज़ की बात थीं। आज ऐसी ख़बरें बहुत कम सुनने को मिलती हैं, और अध्याय खुद कई क्षेत्रों में सामान्य स्थिति लौटने की बात दर्ज करता है: मिजोरम में 1986 के राजीव गाँधी-लालडेंगा समझौते के बाद शांति आई और आज वह इस क्षेत्र की सबसे शांत जगहों में है; पंजाब में 1990 के दशक के मध्य तक शांति लौट आई, 1997 में उग्रवाद के बाद के पहले सामान्य चुनाव हुए और राजनीति धीरे-धीरे धर्मनिरपेक्ष ढर्रे पर लौट आई; असम में 1985 के समझौते से शांति आई, हालाँकि आप्रवासन की समस्या बनी रही। दूसरी ओर नगालैंड की समस्या अब भी अंतिम समाधान की प्रतीक्षा में है। (अपने समय की ख़बरों के आधार पर उदाहरण जोड़ सकते हैं।)