कक्षा 12 राजनीति विज्ञान पुस्तक 2 अध्याय 7 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ शॉर्ट नोट्स (Short Notes) हिंदी में

परीक्षा से ठीक पहले के दोहराव के लिए इस अध्याय का निचोड़: क्षेत्रीय आकांक्षाओं पर भारत सरकार का नज़रिया, जम्मू और कश्मीर की पूरी कहानी 1947 से 2019 तक, पंजाब का घटनाक्रम, द्रविड़ आंदोलन, पूर्वोत्तर के तीन मुद्दे, असम आंदोलन और असम समझौता, मिजोरम तथा नगालैंड, सिक्किम का विलय, गोवा की मुक्ति और समाहार के पाँच सबक। हर तारीख़, हर नाम, हर आँकड़ा और हर बक्से की बात एक जगह। विस्तार से पढ़ने के लिए पूरे नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।

पढ़ने से पहले एक ज़रूरी बात: यह अध्याय अद्यतन किया गया है

इस अध्याय का जम्मू और कश्मीर वाला हिस्सा दोबारा लिखा गया है और अब वह 5 अगस्त, 2019 तक आता है। पुराने संस्करण से पढ़ा हुआ उत्तर यहाँ ग़लत बैठेगा। तीन बातें ख़ास तौर पर याद रखिए:

1. जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 द्वारा अनुच्छेद 370 समाप्त कर दिया गया और राज्य को पुनर्गठित कर दो केंद्र शासित प्रदेश, जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख, बना दिए गए। 2. यही बात अध्याय के समाहार खंड में दोबारा आती है, इसलिए दोनों जगह से पूछी जा सकती है। 3. अध्याय अब 2002 से 2018 तक की सरकारों का पूरा क्रम भी देता है, जो पहले नहीं था।

बाकी अध्याय की प्रश्नावली और पाठ आपस में मेल खाते हैं। किसी प्रश्न का विषय ऐसा नहीं है जो पाठ से हटा दिया गया हो, इसलिए यहाँ अलग से कुछ रटने की ज़रूरत नहीं।

1 परिभाषाएँ और मुख्य शब्द

याद कर लेंपरिभाषा 1

क्षेत्रीय आकांक्षा: किसी क्षेत्र के लोगों की यह माँग कि उनकी अलग पहचान, संस्कृति और हितों को मान्यता मिले और उन्हें अपने मामलों में स्वायत्तता तथा राष्ट्रीय निर्णयों में हिस्सेदारी मिले। अध्याय कहता है कि ऐसी आकांक्षाएँ लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग हैं।

याद कर लेंपरिभाषा 2

कश्मीरियत: जम्मू और कश्मीर रियासत के लोगों की वह क्षेत्रीय अभिलाषा कि सबसे पहले वे कश्मीरी हैं। पाकिस्तानी नेताओं ने रियासत को मुस्लिम बहुसंख्या के आधार पर पाकिस्तान का हिस्सा माना था, पर वहाँ के लोगों ने इसे इस तरह नहीं देखा।

याद कर लेंपरिभाषा 3

शरणागति: सिक्किम को आज़ादी के समय प्राप्त वह दर्जा, जिसका मतलब था कि सिक्किम भारत का अंग तो नहीं था लेकिन पूरी तरह संप्रभु राष्ट्र भी नहीं था। रक्षा और विदेशी मामले भारत सरकार के पास थे, आंतरिक प्रशासन राजा चोग्याल के पास।

याद कर लेंपरिभाषा 4

‘बोलबाला’ और ‘कौम’: आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के अपने शब्द। प्रस्ताव में सिख ‘कौम’ (नेशन या समुदाय) की आकांक्षाओं पर ज़ोर देते हुए सिखों के ‘बोलबाला’ (प्रभुत्व या वर्चस्व) का ऐलान किया गया था।

याद कर लेंपरिभाषा 5

पी.ओ.जे.के.: पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर। अध्याय के अपने शब्दों में यह भारतीय क्षेत्र है, जिस पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है। यह 1947 के कबायली हमले के परिणामस्वरूप पाकिस्तानी नियंत्रण में आया।

2 क्षेत्र और राष्ट्र: भारत सरकार का नज़रिया

1980 का दशक स्वायत्तता की माँग का दशक था और इसे बड़े संघर्ष तथा समझौते के दशक के रूप में याद किया जाएगा। इसी दशक में असम, पंजाब, मिजोरम और जम्मू-कश्मीर में क्षेत्रीय आकांक्षाओं ने सर उठाया।

भारत का नज़रिया, पाँच बिंदुओं में: 1. विभिन्न क्षेत्र और भाषायी समूहों को अपनी संस्कृति बनाए रखने का अधिकार। 2. एकता की भावधारा से बँधा ऐसा सामाजिक जीवन, जिसमें तमाम संस्कृतियों की विशिष्टता बनी रहे। 3. राष्ट्र का मतलब यह नहीं कि क्षेत्र को नकार दिया जाए। 4. यह नज़रिया यूरोप के कई देशों से अलग रहा, जहाँ सांस्कृतिक विभिन्नता को राष्ट्र की एकता के लिए ख़तरे के रूप में देखा गया। 5. लोकतंत्र क्षेत्रीयता को राष्ट्र-विरोधी नहीं मानता, क्षेत्रीय आकांक्षाओं की राजनीतिक अभिव्यक्ति की अनुमति देता है और नीति-निर्माण में उन्हें भागीदारी देता है।

तनाव के दायरे: आज़ादी के तुरंत बाद विभाजन, विस्थापन, देसी रियासतों का विलय और राज्यों का पुनर्गठन। जम्मू-कश्मीर का मसला। पूर्वोत्तर में पहले नगालैंड और फिर मिजोरम में अलग होने की माँग। दक्षिण में द्रविड़ आंदोलन से जुड़े कुछ समूहों ने एक समय अलग राष्ट्र की बात उठायी। भाषा के आधार पर राज्य बनाने के आंदोलन आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात में चले; तमिलनाडु में हिंदी को राजभाषा बनाने के ख़िलाफ़ आंदोलन चला; 1966 में पंजाब और हरियाणा बने; बाद में छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड का गठन हुआ।

3 जम्मू और कश्मीर: पूरी कहानी एक जगह

तीन क्षेत्र: जम्मू (छोटी पहाड़ियाँ और मैदानी भाग, मुख्य रूप से हिन्दू, साथ ही मुसलमान, सिख और अन्य), कश्मीर (मुख्य रूप से घाटी, अधिकांश कश्मीरी मुसलमान, शेष हिन्दू, सिख, बौद्ध तथा अन्य), लद्दाख (मुख्य रूप से पहाड़ी, जनसंख्या बहुत कम, लगभग बराबर संख्या में बौद्ध और मुसलमान)।

समस्या की जड़ें: 1947 से पहले जम्मू और कश्मीर एक राजसी रियासत थी। शासक महाराजा हरि सिंह भारत या पाकिस्तान में शामिल होना नहीं चाहते थे, बल्कि स्वतंत्र दर्जा चाहते थे। शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में नेशनल कॉन्फ्रेंस का लोकप्रिय आंदोलन महाराजा से छुटकारा चाहता था और पाकिस्तान में शामिल होने के विरुद्ध था। नेशनल कॉन्फ्रेंस एक धर्मनिरपेक्ष संगठन था और शेख अब्दुल्ला नेहरू सहित कुछ राष्ट्रवादी नेताओं के व्यक्तिगत मित्र थे।

तारीख़ों का क्रम: अक्तूबर 1947 पाकिस्तान ने कबायली घुसपैठिए भेजे; महाराजा ने विलय प्रपत्र पर हस्ताक्षर किए और भारत ने सैनिक सहायता दी। 21 अप्रैल, 1948 संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रस्ताव, तीन चरणों वाली प्रक्रिया: (1) पाकिस्तान अपने वे सारे नागरिक वापस बुलाए जो कश्मीर में घुस गए थे, (2) भारत धीरे-धीरे फौज कम करे ताकि कानून व्यवस्था बनी रहे, (3) स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से जनमत संग्रह हो। इस प्रस्ताव के अंतर्गत कोई प्रगति न हो सकी। मार्च 1948 शेख अब्दुल्ला प्रधानमंत्री बने और भारत अनुच्छेद 370 के अंतर्गत अस्थाई स्वायत्तता देने को सहमत हुआ।

अनुच्छेद 370 पर दो विपरीत प्रतिक्रियाएँ

पहला पक्ष (राज्य के बाहर का एक वर्ग): विशेष दर्जा राज्य को भारत से पूर्ण रूप से एकीकृत नहीं होने देता, इसलिए अनुच्छेद 370 को रद्द कर देना चाहिए और जम्मू और कश्मीर को किसी भी अन्य राज्य की तरह माना जाना चाहिए।

दूसरा पक्ष (अधिकांश कश्मीरी): यह स्वायत्तता पर्याप्त नहीं है। तीन मुख्य शिकायतें: (1) कबायली हमले से उत्पन्न परिस्थिति सामान्य होने पर विलय का मामला राज्य के लोगों को विचार के लिए देने का वायदा पूरा नहीं हुआ, जिससे ‘जनमत-संग्रह’ की माँग उठी; (2) विशेष संघीय दर्जा व्यवहारिक रूप से कम कर दिया गया, जिससे ‘अधिक राज्य स्वायत्तता’ की माँग उठी; (3) जिस प्रकार का लोकतंत्र शेष भारत में है, वैसा राज्य में लागू नहीं किया गया।

1948 से 1989: शेख अब्दुल्ला ने भूमि सुधार और अन्य नीतियाँ शुरू कीं जिनसे सामान्य जन को लाभ पहुँचा, पर कश्मीर के दर्जे पर केंद्र से मतभेद बढ़े। 1953 में वे पदच्युत किए गए और कई वर्षों तक कैद रखे गए। 1953 से 1974 के बीच कांग्रेस पार्टी ने राज्य की नीतियों पर प्रभाव डाला। 1965 में राज्य के प्रधानमंत्री का पदनाम बदलकर मुख्यमंत्री किया गया और गुलाम मोहम्मद सादिक राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। 1974 में इंदिरा गाँधी और शेख अब्दुल्ला के बीच समझौता हुआ और वे मुख्यमंत्री बने; 1977 में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने बहुमत से जीत हासिल की। 1982 में शेख अब्दुल्ला के निधन पर नेतृत्व फारूक अब्दुल्ला के पास गया, पर जल्द ही राज्यपाल ने उन्हें पदच्युत कर दिया। 1986 में नेशनल कॉन्फ्रेंस के कांग्रेस से चुनावी गठबंधन ने यह भावना पुष्ट की कि केंद्र राज्य की राजनीति में हस्तक्षेप कर रहा है। 1987 के चुनाव के परिणामों पर व्यापक संदेह हुआ। 1989 तक राज्य पृथक कश्मीरी राष्ट्र बनाने को लेकर एक उग्रवादी आंदोलन के कब्जे में आ गया, जिसे पाकिस्तान से नैतिक, आर्थिक और फौजी समर्थन मिला।

1990 से 2019: 1990 से राज्य ने विद्रोहियों के हाथों और सेना की कार्रवाई से असाधारण हिंसा झेली। 1996 में चुनाव हुए और नेशनल कॉन्फ्रेंस क्षेत्रीय स्वायत्तता की माँग के साथ सत्ता में आई। 2002 में पीडीपी और कांग्रेस की मिली-जुली सरकार बनी; मुफ़्ती मोहम्मद पहले तीन वर्ष मुखिया रहे, फिर गुलाम नबी आज़ाद, जो जुलाई 2008 के राष्ट्रपति शासन के कारण कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। अगला चुनाव नवंबर-दिसंबर 2008 में हुआ और 2009 में उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में सरकार आई, पर राज्य को लगातार हुर्रियत कॉन्फ्रेंस द्वारा पैदा की गई गड़बड़ियों का सामना करना पड़ा। 2014 के चुनाव में पिछले 25 वर्षों में सबसे अधिक मतदान रिकार्ड हुआ और मुफ़्ती मोहम्मद सईद के नेतृत्व में पीडीपी-भाजपा सरकार बनी। उनके निधन के बाद अप्रैल 2016 में महबूबा मुफ़्ती राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। जून 2018 में भाजपा के समर्थन वापस लेने पर राष्ट्रपति शासन लगा। 5 अगस्त, 2019 को जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 द्वारा अनुच्छेद 370 समाप्त कर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों, जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख, में पुनर्गठित कर दिया गया।

यह भी याद रखें: अनुच्छेद 370 के बावजूद जम्मू और कश्मीर को हिंसा, सीमा पार का आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता झेलनी पड़ी; निर्दोष नागरिक, सुरक्षाकर्मी और उग्रवादी मारे गए; और कश्मीर घाटी से बड़े पैमाने पर कश्मीरी पंडितों का पलायन हुआ। अध्याय जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख को भारत में बहुलवादी समाज के जीते-जागते उदाहरण कहता है।

4 पंजाब: 1966 से 1997 तक

पृष्ठभूमि: पंजाब की सामाजिक बुनावट पहली बार विभाजन के समय बदली, फिर इसके कुछ हिस्सों से हरियाणा और हिमाचल प्रदेश बने। देश के शेष हिस्से का भाषायी पुनर्गठन 1950 के दशक में हुआ, पर पंजाब को 1966 तक इंतज़ार करना पड़ा। अकाली दल का गठन सिखों की राजनीतिक शाखा के रूप में 1920 के दशक में हुआ था और उसी ने ‘पंजाबी सूबा’ आंदोलन चलाया। पंजाबी-भाषी सूबे में सिख बहुसंख्यक हो गए।

अकालियों की तीन कमज़ोरियाँ: (1) अकाली दल ने 1967 और 1977 में गठबंधन सरकार बनायी, पर उनकी सरकार को केंद्र ने कार्यकाल पूरा करने से पहले बर्खास्त कर दिया था; (2) पंजाब के हिंदुओं के बीच कुछ ख़ास समर्थन नहीं था; (3) सिख समुदाय भी जाति और वर्ग के धरातल पर बँटा हुआ था, और कांग्रेस को दलितों के बीच अकालियों से कहीं ज्यादा समर्थन प्राप्त था।

आनंदपुर साहिब प्रस्ताव, 1973: क्षेत्रीय स्वायत्तता की बात; केंद्र-राज्य संबंधों को पुनर्परिभाषित करने की माँग; सिख ‘कौम’ की आकांक्षाओं पर ज़ोर और सिखों के ‘बोलबाला’ का ऐलान; और भारत में संघवाद को मजबूत करने की अपील। इसका सिख जन-समुदाय पर बड़ा कम असर पड़ा। 1980 में अकाली सरकार की बर्खास्तगी के बाद दल ने पड़ोसी राज्यों के साथ पानी के बँटवारे पर आंदोलन चलाया और धार्मिक नेताओं के एक तबके ने स्वायत्त सिख पहचान की बात उठायी।

हिंसा का चक्र: नेतृत्व नरमपंथी अकालियों के हाथ से चरमपंथी तत्त्वों के हाथ में गया और आंदोलन ने सशस्त्र विद्रोह का रूप ले लिया। उग्रवादियों ने अमृतसर के स्वर्णमंदिर में मुख्यालय बनाया और वह एक हथियारबंद किले में तब्दील हो गया। जून 1984 में ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ चला; उग्रवादी मार भगाए गए, पर स्वर्णमंदिर को क्षति पहुँची और सिखों की भावनाओं को गहरी चोट लगी। 31 अक्तूबर 1984 को प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की उन्हीं के सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी, जो ऑपरेशन ब्लू स्टार का बदला लेना चाहते थे। इसके बाद दिल्ली सहित उत्तर भारत में सिख समुदाय के विरुद्ध हिंसा कई हफ़्तों तक जारी रही। दो हज़ार से ज्यादा सिख दिल्ली में मारे गए; कानपुर, बोकारो और चास जैसी कई जगहों पर सैकड़ों सिख मारे गए। सिखों को सबसे ज्यादा दुख यह था कि सरकार ने स्थिति सामान्य बनाने के लिए बड़ी देर से कदम उठाए और हिंसा करने वालों को कारगर तरीके से दंड भी नहीं दिया गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2005 में संसद में इस रक्तपात पर अफसोस जताया और देश से माफी माँगी।

पंजाब समझौता (राजीव गाँधी लोंगोवाल समझौता), जुलाई 1985: पाँच प्रावधान

1. चंडीगढ़ पंजाब को दे दिया जाएगा। 2. पंजाब तथा हरियाणा के बीच सीमा-विवाद सुलझाने के लिए एक अलग आयोग की नियुक्ति होगी। 3. पंजाब-हरियाणा-राजस्थान के बीच रावी-व्यास के पानी के बँटवारे पर फ़ैसले के लिए एक ट्रिब्यूनल बैठाया जाएगा। 4. सरकार पंजाब में उग्रवाद से प्रभावित लोगों को मुआवजा देने और उनके साथ बेहतर सलूक करने पर राजी हुई। 5. पंजाब से विशेष सुरक्षा बल अधिनियम को वापस लेने पर सहमति हुई।

समझौते के बाद: अमन न आसानी से आया, न तुरंत। हिंसा का चक्र लगभग एक दशक चला; उग्रवादी हिंसा और उसे दबाने की कार्रवाइयों में मानवाधिकार का व्यापक उल्लंघन हुआ और पुलिस की ओर से भी ज्यादती हुई। अकाली दल बिखर गया और केंद्र को राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। 1992 के चुनाव में महज 24 फीसदी मतदाता वोट डालने आए। 1990 के दशक के मध्यवर्ती वर्षों में शांति बहाल हुई और 1997 में अकाली दल (बादल) और भाजपा के गठबंधन को बड़ी विजय मिली, जो उग्रवाद के खात्मे के बाद का पहला चुनाव था।

5 द्रविड़ आंदोलन

यह भारत के क्षेत्रीय आंदोलनों में सबसे ताकतवर था और भारतीय राजनीति में क्षेत्रीयतावादी भावनाओं की सर्वप्रथम और सबसे प्रबल अभिव्यक्ति। नेतृवर्ग के एक हिस्से की आकांक्षा स्वतंत्र द्रविड़ राष्ट्र की थी, फिर भी आंदोलन ने कभी सशस्त्र संघर्ष की राह नहीं अपनायी; नेतृत्व ने सार्वजनिक बहसों और चुनावी मंच का ही इस्तेमाल किया। बागडोर ई. वी. रामास्वामी नायकर ‘पेरियार’ के हाथों में थी और इससे ‘द्रविड़ कड़गम’ का सूत्रपात हुआ, जो ब्राह्मणों के वर्चस्व का विरोध करता था और उत्तरी भारत के राजनीतिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक प्रभुत्व को नकारते हुए क्षेत्रीय गौरव पर ज़ोर देता था। शुरू में यह समग्र दक्षिण भारतीय संदर्भ में बोलता था, पर अन्य दक्षिणी राज्यों से समर्थन न मिलने के कारण तमिलनाडु तक सिमट गया।

डीएमके का तीन-सूत्री आंदोलन (1953-54): (1) कल्लाकुडी रेलवे स्टेशन का नया नाम डालमियापुरम निरस्त हो और मूल नाम बहाल हो, जो उत्तर भारतीय आर्थिक प्रतीकों के प्रति विरोध था; (2) स्कूली पाठ्यक्रम में तमिल संस्कृति के इतिहास को ज़्यादा महत्त्व मिले; (3) राज्य सरकार का शिल्पकर्म शिक्षा कार्यक्रम बदले, जो संगठन के अनुसार ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा देता था। डीएमके हिंदी को राजभाषा का दर्ज़ा देने के भी खिलाफ़ थी, और 1965 के हिंदी विरोधी आंदोलन की सफलता ने उसे और लोकप्रिय बनाया।

आगे का सफ़र: 1967 के विधानसभा चुनावों में बड़ी सफलता, और तब से तमिलनाडु की राजनीति में द्रविड़ दलों का वर्चस्व। संस्थापक सी. अन्नादुरै की मृत्यु के बाद दल में दोफाड़ हुआ: एक डीएमके नाम से चला, दूसरा आल इंडिया अन्ना द्रमुक कहलाया। दोनों दल चार दशकों से दबदबा बनाए हुए हैं और इनमें से एक न एक 1996 से केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा रहा है। 1990 के दशक में एमडीएमके (मरुमलर्ची द्रविड़ मुनेत्र कड़गम), पीएमके (पट्टाली मक्कल कच्ची) और डीएमडीके (देसिया मुरपोक्कू द्रविड़ कड़गम) जैसे दल आए। अध्याय का निष्कर्ष: तमिलनाडु की राजनीति क्षेत्रवाद और राष्ट्रवाद के बीच सहकारिता का अच्छा उदाहरण है।

6 पूर्वोत्तर: तीन मुद्दे

बुनियादी आँकड़े: क्षेत्र में आठ राज्य हैं। अरुणाचल प्रदेश, असम, नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम और मेघालय को ‘सात बहनें’ कहा जाता है; सिक्किम को, जिसे सूची में जोड़ा गया है, उन सात राज्यों का ‘भाई’ कहा जाता है। यहाँ देश की कुल 4 फीसदी आबादी रहती है, जबकि क्षेत्रफल में हिस्सा उसका लगभग दोगुना है। 22 किलोमीटर लंबी एक पतली-सी राहदारी इस इलाके को शेष भारत से जोड़ती है; बाकी सीमाएँ चीन, म्यांमार और बांग्लादेश से लगती हैं और यह इलाका भारत के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश-द्वार है।

राज्य बनने के वर्ष: नगालैंड 1963; मणिपुर, त्रिपुरा और मेघालय 1972; मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश 1987। त्रिपुरा, मणिपुर और मेघालय का खासी पहाड़ी क्षेत्र पहले अलग-अलग रियासतें थीं। 1947 के विभाजन से पूर्वोत्तर शेष भारत से अलग-थलग पड़ गया, जिसका अर्थव्यवस्था पर दुष्प्रभाव पड़ा और विकास पर ध्यान नहीं दिया जा सका; पड़ोसी राज्यों और देशों से आने वाले शरणार्थियों से जनसंख्या की संरचना में बड़ा बदलाव आया।

तीन मुद्दे: स्वायत्तता की माँग, अलगाव के आंदोलन और ‘बाहरी’ लोगों का विरोध। पहले मुद्दे पर 1970 के दशक में कुछ शुरुआती पहल हुई; शेष दो ने 1980 के दशक में नाटकीय मोड़ लिया।

स्वायत्तता की माँग: आज़ादी के वक्त मणिपुर और त्रिपुरा को छोड़कर यह पूरा इलाका असम कहलाता था। असमी भाषा थोपे जाने के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन और दंगे हुए। जनजाति नेताओं ने ‘ईस्टर्न इंडिया ट्राइबल यूनियन’ बनाई, जो 1960 में ‘ऑल पार्टी हिल्स कांफ्रेंस’ में तब्दील हो गई और एक अलग जनजातीय राज्य की माँग की। आखिरकार असम को काटकर कई राज्य बने और 1972 तक पुनर्गठन पूरा हो गया, पर माँगें खत्म न हुईं। असम के बोडो, करबी और दिमसा जैसे समुदायों ने अलग राज्य माँगा; चूँकि लगातार छोटे राज्य बनाते जाना संभव नहीं था, इसलिए करबी और दिमसा को जिला-परिषद् के अंतर्गत और बोडो को स्वायत्त परिषद् का दर्जा देकर उन्हें असम में ही रखा गया।

अलगाववादी आंदोलन: मिजोरम। आज़ादी के बाद मिजो पर्वतीय क्षेत्र असम के भीतर एक स्वायत्त जिला था। कुछ मिजो लोगों का मानना था कि वे कभी ‘ब्रिटिश इंडिया’ के अंग नहीं रहे। 1959 के भारी अकाल में असम सरकार की नाकामी के बाद अलगाववादी आंदोलन को जनसमर्थन मिला और लालडेंगा के नेतृत्व में मिजो नेशनल फ्रंट बना। 1966 में उसने आज़ादी की माँग करते हुए सशस्त्र अभियान शुरू किया और दो दशक तक लड़ाई चली। उसने गुरिल्ला युद्ध किया, उसे पाकिस्तान की सरकार ने समर्थन दिया और तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में विद्रोहियों ने ठिकाने बनाए; भारतीय सेना की जवाबी कार्रवाई में आम जनता को भी कष्ट उठाने पड़े और एक दफ़े वायुसेना तक का इस्तेमाल हुआ। दोनों पक्षों की हानि भाँपकर लालडेंगा भारत आए और 1986 में राजीव गाँधी के साथ शांति समझौता हुआ: मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा और कुछ विशेष अधिकार मिले, मिजो नेशनल फ्रंट ने अलगाववाद छोड़ा, लालडेंगा मुख्यमंत्री बने। आज मिजोरम पूर्वोत्तर का सबसे शांतिपूर्ण राज्य है।

मिजोरम: 1986 या 1987? दोनों, और दोनों किताब के अपने वाक्य हैं

अध्याय दो जगह दो बातें कहता है और वे आपस में टकराती नहीं हैं। 1986 में राजीव गाँधी और लालडेंगा के बीच शांति समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा देना तय हुआ। पूर्वोत्तर के पुनर्गठन वाली सूची में अध्याय लिखता है कि मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश को 1987 में राज्य का दर्ज़ा दिया गया। यानी समझौता 1986 का, राज्य का दर्जा 1987 का। प्रश्न में जो पूछा जाए, वही लिखिए।

अलगाववादी आंदोलन: नगालैंड। कहानी मिजोरम जैसी है, पर आंदोलन ज्यादा पुराना है और हल अब तक नहीं निकला। अंगमी जापू फिजो के नेतृत्व में नगा लोगों के एक तबके ने 1951 में अपने को भारत से आज़ाद घोषित कर दिया; फिजो ने बातचीत के कई प्रस्ताव ठुकराए। हिंसक विद्रोह के एक दौर के बाद नगा लोगों के एक तबके ने भारत सरकार के साथ समझौते पर दस्तखत किए, लेकिन अन्य विद्रोहियों ने इसे नहीं माना।

7 असम आंदोलन और असम समझौता

दो जड़ें, एक आंदोलन। सांस्कृतिक: असमी लोगों को संदेह था कि बांग्लादेश से आकर बहुत-सी मुस्लिम आबादी असम में बसी है, और यह भावना घर कर गई थी कि इन्हें पहचानकर वापस न भेजा गया तो स्थानीय असमी जनता अल्पसंख्यक हो जाएगी। आर्थिक: असम में तेल, चाय और कोयले जैसे संसाधनों की मौजूदगी के बावजूद व्यापक गरीबी थी, और जनता ने माना कि संसाधन बाहर भेजे जा रहे हैं और असमी लोगों को कोई फ़ायदा नहीं हो रहा।

आंदोलन: 1979 में ऑल असम स्टूडेंट्स् यूनियन (आसू) ने विदेशियों के विरोध में आंदोलन चलाया। आसू एक छात्र-संगठन था और इसका जुड़ाव किसी भी राजनीतिक दल से नहीं था। आंदोलन अवैध आप्रवासी, बंगाली और अन्य लोगों के दबदबे तथा मतदाता सूची में लाखों आप्रवासियों के नाम दर्ज कर लेने के ख़िलाफ़ था, और माँग थी कि 1951 के बाद असम में आकर बसे लोगों को बाहर भेजा जाए। आंदोलन ने असमी जनता के हर तबके का समर्थन हासिल किया; हिंसक और त्रासद घटनाएँ भी हुईं, बहुत-से लोगों को जान गंवानी पड़ी और धन-संपत्ति का नुकसान हुआ। रेलगाड़ियों की आवाजाही तथा बिहार स्थित बरौनी तेलशोधक कारखाने को तेल-आपूर्ति रोकने की भी कोशिश की गई।

असम समझौता, 1985: छह साल की सतत अस्थिरता के बाद राजीव गाँधी की सरकार ने आसू के नेताओं से बातचीत की। तय हुआ कि जो लोग बांग्लादेश-युद्ध के दौरान अथवा उसके बाद के सालों में असम आए हैं, उनकी पहचान की जाएगी और उन्हें वापस भेजा जाएगा। इसके बाद आसू और असम गण संग्राम परिषद् ने मिलकर ‘असम गण परिषद्’ बनाई, जो 1985 में विदेशी लोगों की समस्या सुलझाने और ‘स्वर्णिम असम’ बनाने के वायदे के साथ सत्ता में आई। समझौते से शांति कायम हुई और राजनीति का चेहरा बदला, लेकिन ‘आप्रवास’ की समस्या का समाधान नहीं हो पाया। यह समस्या त्रिपुरा में ज्यादा गंभीर है, क्योंकि वहाँ मूल निवासी खुद अपने ही प्रदेश में अल्पसंख्यक बन गए हैं; मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश में भी इसी भय के कारण चकमा शरणार्थियों को लेकर गुस्सा है।

8 सिक्किम और गोवा

सिक्किम का विलय: ‘शरणागति’ की व्यवस्था कारगर नहीं रही, क्योंकि राजा स्थानीय जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को संभाल नहीं सके। आबादी में बड़ा हिस्सा नेपालियों का था और उनके मन में यह भाव घर कर गया कि चोग्याल अल्पसंख्यक लेपचा-भूटिया के एक छोटे-से अभिजन तबके का शासन उन पर लाद रहा है। चोग्याल विरोधी दोनों समुदायों के नेताओं ने भारत सरकार से मदद माँगी और समर्थन हासिल किया। 1974 में सिक्किम विधानसभा का पहला लोकतांत्रिक चुनाव हुआ, जिसमें सिक्किम कांग्रेस को भारी विजय मिली। विधानसभा ने पहले भारत का ‘सह-प्रान्त’ बनने की कोशिश की और फिर अप्रैल 1975 में पूर्ण विलय का प्रस्ताव पारित किया; तुरंत बाद हुए जनमत-संग्रह में जनता ने उस पर मुहर लगा दी और सिक्किम भारत का 22वाँ राज्य बन गया। चोग्याल ने फ़ैसला नहीं माना और उनके समर्थकों ने भारत सरकार पर साजिश रचने तथा बल-प्रयोग करने का आरोप लगाया, पर विलय को स्थानीय जनता का समर्थन हासिल था, इसलिए यह मामला सिक्किम की राजनीति में कोई विभेदकारी मुद्दा न बन सका। नेता: काजी लैंदुप दोरजी खांगसरपा, जिन्होंने 1962 में सिक्किम नेशनल कांग्रेस की स्थापना की थी।

गोवा की मुक्ति: 1947 में अंग्रेजी साम्राज्य का खात्मा हुआ, पर पुर्तगाल ने गोवा, दमन और दीव से शासन हटाने से इनकार कर दिया; यह क्षेत्र सोलहवीं सदी से औपनिवेशिक शासन में था और वहाँ जनता का दमन, नागरिक अधिकारों से वंचना तथा बलात् धर्म-परिवर्तन हुआ। आज़ादी के लिए मजबूत जन आंदोलन चला, जिसे महाराष्ट्र के समाजवादी सत्याग्रहियों ने बल दिया। दिसंबर 1961 में भारत सरकार ने सेना भेजी और दो दिन की कार्रवाई में गोवा मुक्त हुआ; गोवा, दमन और दीव संघशासित प्रदेश बना। फिर महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी ने महाराष्ट्र में विलय की माँग रखी, जबकि यूनाइटेड गोअन पार्टी (यूजीपी) के नेतृत्व में बहुत-से गोवावासी गोवानी पहचान, संस्कृति और कोंकणी भाषा की अलग अहमियत बनाए रखना चाहते थे। जनवरी 1967 के विशेष जनमत सर्वेक्षण में अधिकतर लोगों ने महाराष्ट्र से अलग रहने के पक्ष में मत डाला, इसलिए गोवा संघशासित प्रदेश बना रहा और अंततः 1987 में भारत संघ का एक राज्य बना।

9 समाहार: पाँच सबक

1. क्षेत्रीय आकांक्षाएँ लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग हैं। ग्रेट ब्रिटेन जैसे छोटे देश में भी स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड में क्षेत्रीय आकांक्षाएँ उभरी हैं; स्पेन में बास्क लोगों और श्रीलंका में तमिलों ने अलगाववादी माँग की।

2. दमन नहीं, लोकतांत्रिक बातचीत। बातचीत के जरिए सरकार ने क्षेत्रीय आंदोलनों के साथ समझौता किया, जिससे सौहार्द बना और तनाव कम हुआ। मिजोरम दिखाता है कि राजनीतिक सुलह से अलगाववाद की समस्या से कारगर तरीके से निपटा जा सकता है।

3. सत्ता की साझेदारी। सिर्फ़ लोकतांत्रिक ढाँचा खड़ा कर लेना काफ़ी नहीं; विभिन्न क्षेत्रों के दलों और समूहों को केंद्रीय राजव्यवस्था में हिस्सेदार बनाना भी जरूरी है। राष्ट्रीय निर्णयों में क्षेत्रों को वजन न मिले तो उनमें अन्याय और अलगाव का बोध पनपेगा।

4. आर्थिक असमानता। इलाकों के बीच विकास की असमानता से पिछड़े क्षेत्रों को भेदभाव महसूस होता है। कुछ राज्य गरीब रहें और बाकी तेजी से बढ़ें तो क्षेत्रीय असंतुलन पैदा होगा और अंतर्प्रान्तीय तथा अंतर्क्षेत्रीय आप्रवास भी बढ़ेगा।

5. संविधान निर्माताओं की दूरदृष्टि। भारत की संघीय प्रणाली बहुत लचीली है: अधिकतर राज्यों के अधिकार समान हैं, पर जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों के लिए विशेष प्रावधान भी किए गए, हालाँकि जम्मू-कश्मीर वाला अनुच्छेद 370 अगस्त 2019 में निरस्त कर दिया गया। संविधान की छठी अनुसूची जनजातियों को अपने आचार-व्यवहार और पारंपरिक नियम संरक्षित रखने की पूर्ण स्वायत्तता देती है, और ये प्रावधान पूर्वोत्तर की जटिल समस्याओं को सुलझाने में निर्णायक साबित हुए।

10 बक्से, तस्वीरें और हाशिये: वह सामग्री जो अकसर छूट जाती है

अध्याय का शुरुआती पोस्टर

साभार: उत्तराखंड सांस्कृतिक मोर्चा। इसकी ख़ास बात यह है कि इसमें सात भाषाओं का इस्तेमाल किया गया है, जिसका उद्देश्य तमाम भारतीय नागरिकों तक अपनी बात पहुँचाना है। अध्याय का निष्कर्ष: पोस्टर से यह साफ़ ज़ाहिर है कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं का राष्ट्रीय भावनाओं से कोई बुनियादी टकराव नहीं है। अध्याय यह भी कहता है कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं को अकसर क्षेत्र विशेष की भाषा में अभिव्यक्त किया जाता है।

अध्याय के चार शुरुआती सवाल

1. क्षेत्रीय आकांक्षाओं और उनसे उपजे तनाव को किन कारणों से बल मिलता है? 2. भारत सरकार ने ऐसी चुनौतियों और तनावों के प्रति क्या कदम उठाए? 3. लोकतांत्रिक अधिकारों और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन साधने में किस किस्म की कठिनाइयाँ आती हैं? 4. लोकतंत्र में विविधताओं के बीच एकता कायम करने के लिहाज से हमें क्या सीख मिलती है?

द्रविड़ आंदोलन का नारा

अध्याय द्रविड़ आंदोलन के एक बेहद लोकप्रिय नारे का हिंदी रूपांतर देता है: ‘उत्तर हर दिन बढ़ता जाए, दक्षिण दिन-दिन घटता जाए’। पेरियार का जीवन-परिचय भी बॉक्स में है: 1879-1973, आत्मसम्मान आंदोलन के जनक (1925), जस्टिस पार्टी के कार्यकर्ता, द्रविड़ कड़गम की स्थापना, और यह मत कि ‘उत्तर भारतीय लोग एवं ब्राह्मण द्रविड़ों से अलग आर्य हैं’।

सिने-संसार: रोज़ा

वर्ष: 1992 · निर्देशक: मणिरत्नम् · पटकथा: मणिरत्नम् · अभिनय (हिंदी): मधु, अरविन्द स्वामी, पंकज कपूर, जनगराज। इस तमिल फिल्म में एक नवोढ़ा पत्नी के दुख और साहस की कहानी है। रोज़ा के पति ऋषि को, जो खुफिया संदेशों को पढ़ने में माहिर है और कश्मीर में तैनात है, उग्रवादी अपहरण कर लेते हैं; अपहरणकर्त्ताओं की माँग है कि जेल में बंद उनके सरगना को छोड़ा जाए। रोज़ा अधिकारियों और राजनेताओं के दरवाज़े खटखटाती दर-दर भटकती है। फिल्म भारत-पाकिस्तान विवाद की पृष्ठभूमि में बनी थी, इसलिए बहुत लोकप्रिय हुई और हिंदी सहित अन्य भाषाओं में भी रूपांतरित हुई।

दो उद्धरण, दोनों 2005 के

न्यायमूर्ति नानावती जाँच आयोग, रिपोर्ट, खंड-I, 2005: ‘‘इस बात के साक्ष्य मिले हैं कि 31-10-84 को या तो बैठकें हुई अथवा हमलावरों से संपर्क साधा गया और उनसे सिखों को जान से मारने तथा उनके घरों और दुकानों को लूटने के लिए कहा गया। बड़े व्यवस्थित तरीके से हमले हुए और हमलावरों को पुलिस का भी ज्यादा भय नहीं था।’’

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, 11 अगस्त, 2005, राज्यसभा की बहस में: ‘‘सिख समुदाय से ही नहीं पूरे भारत राष्ट्र से माफी माँगने में मुझे कोई संकोच नहीं क्योंकि 1984 में जो कुछ हुआ वह राष्ट्र की अवधारणा तथा संविधान के लिखे का नकार था।’’

व्यक्ति-परिचय बॉक्स: वे नाम जो सीधे पूछे जाते हैं

ई. वी. रामास्वामी नायकर ‘पेरियार’ (1879-1973): जाति-विरोधी आंदोलन एवं द्रविड़ अस्मिता के उद्भावक; राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में; आत्मसम्मान आंदोलन के जनक (1925); जस्टिस पार्टी के कार्यकर्ता और द्रविड़ कड़गम की स्थापना।

शेख मोहम्मद अब्दुल्ला (1905-1982): जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता एवं धर्मनिरपेक्षता के समर्थक; नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता; विलय के बाद जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री (1947); बर्खास्तगी और कारावास (1953-1964); पुनः कारावास (1965-1968); 1974 में इंदिरा गाँधी के साथ समझौता और मुख्यमंत्री पद।

मास्टर तारा सिंह (1885-1967): प्रमुख सिख धार्मिक एवं राजनीतिक नेता; शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के शुरुआती नेताओं में से एक; अकाली आंदोलन के नेता; स्वतंत्रता के बाद अलग पंजाब राज्य के निर्माण के समर्थक।

संत हरचंद सिंह लोंगोवाल (1932-1985): 1980 में अकाली दल के अध्यक्ष; अकालियों की प्रमुख माँगों को लेकर प्रधानमंत्री राजीव गाँधी से समझौता; अज्ञात सिख युवक द्वारा हत्या।

लालडेंगा (1937-1990): मिजो नेशनल फ्रंट के संस्थापक और नेता; 1959 के अकाल के बाद विद्रोही बने; 1986 में राजीव गाँधी के साथ समझौता; नव-निर्मित मिजोरम के मुख्यमंत्री।

अंगमी जापू फिजो (1904-1990): नगालैंड की आज़ादी के आंदोलन के नेता; नगा नेशनल काउंसिल के अध्यक्ष; भूमिगत हुए; पाकिस्तान में शरण ली; जीवन के अंतिम तीन दशक ब्रिटेन में गुजारे।

काजी लैंदुप दोरजी खांगसरपा (1904): सिक्किम के लोकतंत्र बहाली आंदोलन के नेता; सिक्किम प्रजामंडल एवं सिक्किम राज्य कांग्रेस के संस्थापक; 1962 में सिक्किम नेशनल कांग्रेस की स्थापना; एकीकरण के बाद सिक्किम कांग्रेस का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय।

राजीव गाँधी (1944-1991): 1984 से 1989 के बीच भारत के प्रधानमंत्री; इंदिरा गाँधी के पुत्र; पंजाब के आतंकवादियों, मिजो-विद्रोहियों तथा असम में छात्र संघ से समझौता; भारतीय शांति सेना श्रीलंका की सरकार के अनुरोध पर श्रीलंका भेजी; संदिग्ध एलटीटीई आत्मघाती द्वारा हत्या।

प्रश्न 10 का अवतरण: हजारिका का गीत

प्रश्नावली का आखिरी प्रश्न संजीब बरुआ के एक अवतरण पर है, जिसमें हजारिका के एक गीत की चर्चा है। गीत एकता की विजय पर है: पूर्वोत्तर के सात राज्यों को इसमें एक ही माँ की सात बेटियाँ कहा गया है। मेघालय अपने रास्ते गई, अरुणाचल भी अलग हुई, और मिजोरम असम के द्वार पर दूल्हे की तरह खड़ा है। गीत का अंत असमी लोगों की एकता बनाए रखने के संकल्प के साथ होता है और इसमें असम की छोटी-छोटी कौमों को भी साथ रखने की बात है: करबी और मिजिंग भाई-बहन हमारे ही प्रियजन हैं। यानी अलग राज्य बन जाना एकता का उलटा नहीं है।

एक और अनुच्छेद जो अध्याय नाम लेता है

अध्याय याद दिलाता है कि पिछली कक्षा में आपने अनुच्छेद 370 और 371 के अंतर्गत विशेष प्रावधानों के बारे में पढ़ा है। समाहार खंड इसी को दोहराता है: अधिकतर राज्यों के अधिकार समान हैं, पर जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों के लिए विशेष प्रावधान भी किए गए। इसलिए प्रश्न में केवल 370 नहीं, 371 भी आ सकता है।

हाशिये के सवाल

अध्याय हाशिये पर पाँच सवाल छोड़ता है, और परीक्षा में इन्हीं की तर्ज़ पर मत-आधारित प्रश्न आते हैं: 1. क्या क्षेत्रवाद सांप्रदायिकता के समान खतरनाक नहीं है, और क्या वह अपने आप में खतरनाक नहीं? 2. खतरे की बात हमेशा सीमांत के राज्यों के संदर्भ में ही क्यों उठाई जाती है, और क्या इसके पीछे हमेशा विदेशी हाथ होता है? 3. जम्मू एवं कश्मीर की जनता के बारे में कोई कुछ क्यों नहीं कहता, जबकि लोकतंत्र में जनता की इच्छा को महत्त्व दिया जाना चाहिए? 4. क्या दिल्ली के लोग यूरोप के नक्शे के बारे में ज्यादा और अपने देश के पूर्वोत्तर के बारे में कम जानते हैं? 5. ‘भीतरी’ और ‘बाहरी’ का मामला क्या है, जब कोई पहले पहुँचा आदमी ही दूसरों को ‘बाहरी’ समझने लगता है?

आख़िरी दोहराव: दस चीज़ें जो सबसे ज़्यादा पूछी जाती हैं

1. जम्मू-कश्मीर: अनुच्छेद 370, 21 अप्रैल 1948 का संरा प्रस्ताव और उसके तीन चरण, 5 अगस्त 2019 का पुनर्गठन अधिनियम और दो केंद्र शासित प्रदेश। 2. कश्मीरियों की तीन शिकायतें और अनुच्छेद 370 पर दो विपरीत प्रतिक्रियाएँ। 3. पंजाब समझौता, जुलाई 1985, राजीव गाँधी और लोंगोवाल, पाँच प्रावधान, और 1992 का 24 फीसदी मतदान। 4. आनंदपुर साहिब प्रस्ताव 1973: क्षेत्रीय स्वायत्तता, केंद्र-राज्य संबंध, ‘कौम’, ‘बोलबाला’, संघवाद। 5. ऑपरेशन ब्लू स्टार जून 1984, 31 अक्तूबर 1984, दो हज़ार से ज्यादा सिख दिल्ली में, नानावती आयोग और 2005 का माफ़ीनामा। 6. पूर्वोत्तर: आठ राज्य, 4 फीसदी आबादी, 22 किलोमीटर राहदारी, तीन मुद्दे, और राज्यों के वर्ष 1963 / 1972 / 1987। 7. असम आंदोलन 1979-1985, आसू, 1951 की कट-ऑफ़, बरौनी, असम समझौता 1985, असम गण परिषद् और ‘स्वर्णिम असम’। 8. मिजोरम 1959 अकाल, लालडेंगा, 1966 सशस्त्र अभियान, 1986 समझौता; नगालैंड फिजो, 1951, समस्या अनसुलझी। 9. सिक्किम ‘शरणागति’, चोग्याल, 1974 चुनाव, अप्रैल 1975 प्रस्ताव, 22वाँ राज्य; गोवा दिसंबर 1961, जनवरी 1967 जनमत सर्वेक्षण, 1987 में राज्य। 10. समाहार के पाँच सबक, विदेशी उदाहरण स्कॉटलैंड-वेल्स-उत्तरी आयरलैंड, बास्क, श्रीलंकाई तमिल, और छठी अनुसूची।