कक्षा 12 इतिहास अध्याय 9 उपनिवेशवाद और देहात NCERT समाधान (NCERT Solutions) हिंदी में

NCERT की पाठ्यपुस्तक भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग III के अध्याय 9 ‘उपनिवेशवाद और देहात’ के अभ्यास के सभी बारह प्रश्नों (100-150 शब्दों वाले पाँच प्रश्न, लगभग 250-300 शब्दों के चार लघु निबंध, मानचित्र कार्य और दोनों परियोजना कार्य) के पूरे आदर्श उत्तर, हिंदी संस्करण के अपने शब्दों में, और उसके बाद अध्याय के बीच में पूछे गए सभी प्रश्न (चर्चा कीजिए और स्रोतों व चित्रों के साथ दिए प्रश्न)। पहले ख़ुद उत्तर लिखिए, फिर यहाँ मिलाकर देखिए।

1 जोतदार की सत्ता

प्रश्न 1 (100-150 शब्द)

प्र. ग्रामीण बंगाल के बहुत से इलाकों में जोतदार एक ताकतवर हस्ती क्यों था?

उत्तर:
1. विशाल भूभाग और स्थानीय निवास। फ्रांसिस बुकानन के दिनाजपुर सर्वेक्षण के अनुसार जोतदार हज़ारों एकड़ भूमि रखते थे और, अनुपस्थित रहने वाले ज़मींदार के विपरीत, स्वयं गाँव में निवास करते थे, जिससे उनकी दैनिक सत्ता कहीं अधिक प्रत्यक्ष थी।
2. व्यापार और महाजनी पर नियंत्रण। वे स्थानीय व्यापार व महाजनी पर नियंत्रण रखते थे, अन्य रैयतों को धन उधार देते और उनकी उपज ख़रीदते थे, जिससे ग़रीब गाँववाले उन पर निर्भर हो जाते थे।
3. ज़मींदार का प्रतिरोध करने की क्षमता। वे बहुत हठी थे और जानते थे कि ज़मींदार का उन पर कोई वास्तविक नियंत्रण नहीं; ज़मींदार के अधिकारी कचहरी में बुलाकर रोकते तो वे उलटे फ़ौजदारी थाना या मुन्सिफ़ की कचहरी में जाकर शिकायत करते कि उनका अपमान किया गया और छोटे रैयतों को भी ज़मींदार-विरोधी बनाते।
निष्कर्ष। इस तरह जोतदार ने क़ानूनी भू-स्वामी (ज़मींदार) से कहीं अधिक वास्तविक ग्रामीण सत्ता अपने हाथ में रख ली, जो उत्तर बंगाल में सबसे मज़बूत थी, यद्यपि इसी तरह के व्यक्ति अन्यत्र ‘हवलदार’ या गाँटीदार जैसे नामों से भी मिलते थे।

2 ज़मींदारों का नियंत्रण बनाए रखना

प्रश्न 2 (100-150 शब्द)

प्र. ज़मींदार लोग अपनी ज़मींदारियों पर किस प्रकार नियंत्रण बनाए रखते थे?

उत्तर:
1. फ़र्जी बिक्री। ज़मींदार पहले कुछ संपत्ति किसी महिला रिश्तेदार को हस्तांतरित कर देते (कंपनी के नियम स्त्रियों की संपत्ति को ज़ब्ती से बचाते थे), फिर जान-बूझकर राजस्व रोककर नीलामी को बाध्य करते।
2. बेनामी ख़रीद। नीलामी में ज़मींदार के अपने ही एजेंट संपदा ख़रीद लेते, भुगतान से इनकार करते, दोबारा बिक्री बाध्य करते, और यह चक्र दोहराते जब तक राज्य व अन्य बोलीदाता हार नहीं मान लेते। 1793-1801 के बीच चार प्रमुख ज़मींदारियों में ऐसी बेनामी ख़रीद लगभग 30 लाख रुपये की थी।
3. ज़मीनी प्रतिरोध। बाहरी ख़रीदारों को पूर्व ज़मींदार के लठियालों (सशस्त्र गुंडों) के हमलों और रैयतों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ता था, क्योंकि रैयत अपने ज़मींदार के प्रति वफ़ादारी और उसके प्रजा के रूप में स्व-पहचान से बँधे थे।
निष्कर्ष। इन रणनीतियों से बर्दवान जैसी ज़मींदारियों में 95 प्रतिशत से अधिक बिक्री केवल काल्पनिक साबित हुई, और राजा वास्तविक नियंत्रण में बना रहा।

3 पहाड़िया लोगों की प्रतिक्रिया

प्रश्न 3 (100-150 शब्द)

प्र. पहाड़िया लोगों ने बाहरी लोगों के आगमन पर कैसी प्रतिक्रिया दर्शाई?

उत्तर:
1. अविश्वास और पलायन। बुकानन की उन्नीसवीं सदी के आरंभ की यात्रा-डायरी दिखाती है कि पहाड़िया लोग बाहरी लोगों से बात करने के बजाय अपने गाँव छोड़कर भाग जाते थे।
2. भूमि पर दावेदारी और छापे। पहाड़िया पूरे क्षेत्र को अपनी भूमि व पहचान मानते थे, और उनके मुखिया मैदानों पर छापे का नेतृत्व करते थे: अभाव में जीवित रहने, सत्ता जताने और राजनीतिक संबंध तय करने के लिए।
3. एक सहमत संतुलन। मैदानी ज़मींदार अक्सर शांति के बदले श्रद्धांजलि देते और व्यापारी पहाड़िया-नियंत्रित मार्गों से सुरक्षित मार्ग के लिए चुंगी देते थे, यह दिखाते हुए कि यह पूर्ण शत्रुता नहीं बल्कि एक व्यावहारिक, सहमति से बना संबंध था।
4. शांति स्थापना की विफलता। क्लीवलैंड की 1780 के दशक की शांति स्थापना की नीति (मुखियाओं को वार्षिक भत्ता, बदले में अपने आदमियों का चाल-चलन ठीक रखने की ज़िम्मेदारी) में से कई मुखियाओं ने इनकार किया; जिन्होंने स्वीकार किया वे अक्सर अपने समुदाय का सम्मान खो बैठे।
निष्कर्ष। जब बसी हुई खेती फैलने लगी, यह सहमति टूट गई और पहाड़िया धीरे-धीरे गहरी, अधिक शुष्क पहाड़ियों में धकेल दिए गए।

4 संथाल विद्रोह के कारण

प्रश्न 4 (100-150 शब्द)

प्र. संथालों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह क्यों किया?

उत्तर:
1. दामिन-इ-कोह में बसना। 1832 में दामिन-इ-कोह संथाल क्षेत्र के रूप में सीमांकित हुई; संथाल वन साफ़ करते, चावल-कपास के लिए ज़मीन जोतते हुए, तेज़ी से बसे (गाँव 1838-51 में 40 से बढ़कर 1,473 हुए)।
2. भारी राजकीय कर। उनकी नई साफ़ की गई भूमि पर भारी राजकीय कर लगाया गया, जो उनकी नई, अस्थिर आय पर बड़ा बोझ था।
3. दिकू महाजनों का शोषण। ऊँची-ब्याज के महाजन (दिकू) अवैतनिक ऋण पर उनकी भूमि हड़प लेते थे, इस तरह उनकी मेहनत से साफ़ की गई ज़मीन ही उनसे छिन जाती।
4. ज़मींदारों के दावे। ज़मींदार भी दामिन में दावे पेश करने लगे, जिससे संथालों की भूमि पर उनका अपना नियंत्रण और कमज़ोर होता गया।
निष्कर्ष। इन संचित दबावों ने 1850 के दशक तक संथालों को यह निष्कर्ष निकालने पर मजबूर किया कि विद्रोह ही एकमात्र विकल्प बचा है, जिससे 1855-56 का संथाल विद्रोह हुआ, जिसके बाद संथाल परगना (5,500 वर्ग मील) बनाई गई।

5 दक्कन के रैयतों का क्रोध

प्रश्न 5 (100-150 शब्द)

प्र. दक्कन के रैयत ऋणदाताओं के प्रति क्रुद्ध क्यों थे?

उत्तर:
1. ऋण स्वयं मुद्दा नहीं था। महाजनी औपनिवेशिक शासन से बहुत पहले से थी, इसलिए केवल कर्ज़दार होना ही रैयतों के क्रोध का कारण नहीं था।
2. रूढ़ मानदंड का त्याग। असली मुद्दा यह था कि महाजनों ने इस पुराने, स्वीकृत नियम को तोड़ दिया कि ब्याज कभी मूलधन से अधिक नहीं हो सकता; एक मामले में 100 रुपये के ऋण पर 2,000 रुपये से अधिक ब्याज वसूला गया।
3. क़ानून का दुरुपयोग। 1859 का परिसीमन क़ानून, जो ऋण-पत्रों को तीन वर्ष तक सीमित कर रैयतों की रक्षा करने के लिए था, महाजनों ने इसे उल्टा मोड़ दिया: हर तीन वर्ष में नया पत्र बाध्य कर पुराने ब्याज को मूलधन में मिला दिया, जिससे ब्याज चक्रवृद्ध हो गया।
4. बेईमान लेखा-व्यवहार। साहूकार उपज ले जाते समय खाते में जमा करने का आश्वासन देते पर वास्तव में कोई उल्लेख नहीं करते, कोई रसीद भी नहीं देते, और नकद ग्राहकों की अपेक्षा 25 से 50 प्रतिशत अधिक क़ीमत माँगते।
निष्कर्ष। इसी अन्याय के एहसास ने 1875 में रैयतों को साहूकारों की बही-खाते जलाने और ऋण-पत्र माँगने पर मजबूर किया।

6 इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद नीलामियाँ

प्रश्न 6 (लघु निबंध, लगभग 250-300 शब्द)

प्र. इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद बहुत-सी ज़मींदारियाँ क्यों नीलाम कर दी गईं?

उत्तर:
1. सदा के लिए निश्चित माँग। 1793 के इस्तमरारी बंदोबस्त ने राजस्व राशि सदा के लिए, चार्ल्स कार्नवालिस के गवर्नर-जनरल रहते हुए, तय कर दी; ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे शुरू से ही ऊँचा तय किया, यह उम्मीद करते हुए कि उत्पादन-क़ीमतें बढ़ने पर बोझ हल्का होगा।
2. ग़लत समय। यह ऊँची माँग ठीक 1790 के दशक में लागू हुई, जब कृषि-क़ीमतें दबी हुई थीं, जिससे रैयतों के लिए ज़मींदार को भुगतान करना ही कठिन हो गया।
3. कोई लचीलापन नहीं। फ़सल चाहे जैसी भी हो, राजस्व अपरिवर्तनीय रहता था, और सूर्यास्त विधि के अंतर्गत निश्चित तिथि के सूर्यास्त तक भुगतान न पहुँचने पर ज़मींदारी नीलामी के लिए उत्तरदायी होती थी।
4. कमज़ोर सत्ता। इस्तमरारी बंदोबस्त ने ज़मींदारों की अपनी शक्ति भी सीमित कर दी: उनकी सेनाएँ भंग की गईं, चुंगी समाप्त हुई, और उनकी कचहरी कंपनी-नियुक्त कलक्टर के अधीन आ गई।
5. वसूली का संघर्ष। लगान-वसूली स्वयं बुरी फ़सलों, जान-बूझकर देरी और जोतदारों जैसे धनी किसानों के प्रतिरोध से जूझती एक निरंतर संघर्ष थी; क़ानूनी सहारा इतना धीमा था कि अकेले बर्दवान में 1798 में 30,000 से अधिक लंबित मुक़दमे थे।
निष्कर्ष। इन सबका परिणाम था कि बंगाल की 75 प्रतिशत से अधिक ज़मींदारियों ने हाथ बदले; पर फ़र्जी बिक्री व बेनामी ख़रीद जैसी रणनीतियों से दिखता है कि नीलामी का अर्थ हमेशा नियंत्रण का वास्तविक हस्तांतरण नहीं था।

7 पहाड़िया बनाम संथाल की आजीविका

प्रश्न 7 (लघु निबंध, लगभग 250-300 शब्द)

प्र. पहाड़िया लोगों की आजीविका संथालों की आजीविका से किस रूप में भिन्न थी?

उत्तर:
1. कृषि-पद्धति। पहाड़िया कुदालों से झूम खेती करते थे: पैबंद काटकर जलाना, राख-समृद्ध मिट्टी में दालें-बाजरा उगाना, फिर उर्वरता घटने पर आगे बढ़ जाना। संथाल इसके विपरीत हल से बसी हुई खेती करते, स्थायी रूप से एक ही ज़मीन पर टिके रहते।
2. अतिरिक्त संसाधन। पहाड़िया खाने के लिए महुआ के फूल, बेचने के लिए रेशम के कोया और राल इकट्ठा करते, काठकोयला बनाने के लिए लकड़ियाँ इकट्ठी करते और परती अंडरग्रोथ पर पशु चराते, यानी वनों पर गहराई से निर्भर एक मिश्रित वन-अर्थव्यवस्था चलाते थे।
3. फ़सल का उद्देश्य। संथाल बाज़ार और महाजन दोनों के लिए व्यावसायिक फ़सलें (चावल, कपास) उगाते थे, यानी उनकी खेती नक़दी-अर्थव्यवस्था से कहीं अधिक जुड़ी थी, जबकि पहाड़िया की खेती मुख्यतः निर्वाह के लिए थी।
4. भूमि से संबंध। पहाड़िया पूरे क्षेत्र को अपनी साझा भूमि व पहचान मानते और आवश्यकता पड़ने पर मैदानों पर छापे मारते; संथाल एक निश्चित सीमांकित क्षेत्र (दामिन-इ-कोह) में व्यक्तिगत रूप से साफ़ की गई भूमि पर बसे।
निष्कर्ष। इन भिन्न पद्धतियों के कारण दोनों समुदायों पर औपनिवेशिक नीतियों का प्रभाव भी अलग पड़ा: पहाड़िया अपनी उपजाऊ निचली ढलानें खोकर पंगु हुए, जबकि संथाल कर व दिकू-शोषण के बोझ तले विद्रोह तक पहुँचे।

8 अमेरिकी गृहयुद्ध का प्रभाव

प्रश्न 8 (लघु निबंध, लगभग 250-300 शब्द)

प्र. अमेरिकी गृहयुद्ध ने भारत में रैयत समुदाय के जीवन को कैसे प्रभावित किया?

उत्तर:
1. माँग में उछाल। ब्रिटेन का कपास-उद्योग अमेरिकी कच्चे कपास पर भारी निर्भर था; 1861 के अमेरिकी गृहयुद्ध ने अमेरिकी निर्यात सामान्य के 3 प्रतिशत से कम कर दिया, जिससे भारतीय कपास की उन्मत्त माँग भेजी गई।
2. आसान साख और विस्तार। बम्बई के निर्यात-व्यापारियों ने नगरीय साहूकारों को नक़द अग्रिम दिया, जो आगे ग्रामीण महाजनों तक पहुँचा; कपास उगाए जाने वाले प्रत्येक एकड़ के लिए 100 रु. अग्रिम राशि दी जाने लगी, और 1860-64 के बीच दक्कन का कपास-रक़बा दोगुना हो गया।
3. असमान लाभ। उछाल के लाभ असमान थे: कुछ धनी किसान समृद्ध हुए, पर अधिकतर रैयतों के लिए विस्तृत कपास-खेती का अर्थ केवल भारी ऋण था।
4. अचानक पतन। 1865 में गृहयुद्ध समाप्त होते ही अमेरिकी कपास लौटा, भारतीय निर्यात-क़ीमतें तेज़ी से गिरीं, और साहूकार, अब आश्वस्त नहीं, साख देना बंद कर पुराना ऋण वापस माँगने लगे।
5. दोहरी मार। ठीक इसी क्षण अगले राजस्व-बंदोबस्त ने माँग को 50-100 प्रतिशत बढ़ा दिया, जबकि महाजनों ने नई साख देने से इनकार कर दिया।
निष्कर्ष। यह दोहरा झटका, सूखती साख और बढ़ती राजस्व-माँग, दक्कन के रैयतों को महाजनों पर पूर्ण निर्भर बना गया और अंततः 1875 के दक्कन विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार की।

9 सरकारी स्रोतों की समस्याएँ

प्रश्न 9 (लघु निबंध, लगभग 250-300 शब्द)

प्र. किसानों का इतिहास लिखने में सरकारी स्रोतों के उपयोग के बारे में क्या समस्याएँ आती हैं?

उत्तर:
1. लेखक निष्पक्ष नहीं होते। पाँचवीं रिपोर्ट (1813) के लेखक ईस्ट इंडिया कंपनी के कुशासन के विरुद्ध एक राजनीतिक मामला बना रहे थे, इसलिए इसने ज़मींदारी सत्ता के पतन को अतिरंजित किया, जबकि व्यवहार में, जैसा फ़र्जी बिक्री दिखाती है, ज़मींदार अक्सर नियंत्रण बनाए रखते थे।
2. सरकार अपनी नीति को दोष नहीं देती। दक्कन दंगा आयोग (1878) ने विशेष रूप से पूछे जाने पर भी निष्कर्ष निकाला कि केवल महाजन ही 1875 के विद्रोह के लिए दोषी थे, राज्य की अपनी राजस्व-माँग नहीं। यह औपनिवेशिक अभिलेखों में बार-बार दोहराया जाने वाला एक पैटर्न है।
3. फिर भी अमूल्य आँकड़े। इसके बावजूद ऐसी रिपोर्टें रैयतों-साहूकारों के साक्षात्कार और राजस्व-क़ीमत-ब्याज के विस्तृत आँकड़े देती हैं, जो अन्यथा उपलब्ध नहीं होते।
4. चित्रात्मक स्रोत भी तटस्थ नहीं। विलियम होजेज के राजमहल पहाड़ियों के चित्र भी बताते हैं कि कोई चित्र कभी तटस्थ अभिलेख नहीं होता, जो अधिकारी “उपद्रवी” व ख़तरनाक कहते थे उसे कलाकार रोमांटिक, “चित्रात्मक” दिखा सकता है।
निष्कर्ष। इसलिए इतिहासकारों को सरकारी स्रोतों को अस्वीकार नहीं, बल्कि जहाँ भी संभव हो समाचार-पत्रों, ग़ैर-सरकारी वृत्तांतों, क़ानूनी अभिलेखों और मौखिक स्रोतों के विरुद्ध पढ़ना ज़रूरी है, ताकि किसी एक पक्ष की आवाज़ पूरी कहानी न बन जाए।

10 मानचित्र कार्य

प्रश्न 10 (मानचित्र कार्य)

प्र. उपमहाद्वीप के बाह्यरेखा मानचित्र (खाके) में इस अध्याय में वर्णित क्षेत्रों को अंकित कीजिए। यह भी पता लगाइए कि क्या ऐसे भी कोई इलाके थे जहाँ इस्तमरारी बंदोबस्त और रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू थी। ऐसे इलाकों को मानचित्र में भी अंकित कीजिए।

उत्तर: यह उत्तर तालिका और चरणों के रूप में है, छपा हुआ मानचित्र नहीं: इसे उपमहाद्वीप के अपने बाह्यरेखा मानचित्र पर बनाइए।
अध्याय में वर्णित क्षेत्र: बंगाल (बर्दवान, उत्तरी बंगाल का दिनाजपुर, कलकत्ता); राजमहल की पहाड़ियाँ और दामिन-इ-कोह, साथ में भागलपुर और बीरभूम, जिनमें से संथाल परगना बनाया गया; और बम्बई दक्कन (पूना ज़िले का सूपा, अहमदनगर और करजत तालुका का मीरगाँव), कपास के बंदरगाह बम्बई सहित।
पता लगाकर अंकित करने वाले अन्य इलाके: अध्याय बताता है कि इस्तमरारी बंदोबस्त को बंगाल से बाहर बिरले ही लागू किया गया और उन्नीसवीं शताब्दी में शामिल किए गए प्रदेशों में अस्थायी राजस्व बंदोबस्त किए गए। अपने अध्ययन से आप पाएँगे कि इस्तमरारी बंदोबस्त बिहार और उड़ीसा (बंगाल प्रेसीडेंसी के भाग) तथा मद्रास प्रेसीडेंसी के कुछ भागों में भी लागू था, जबकि रैयतवाड़ी व्यवस्था मद्रास प्रेसीडेंसी के अधिकांश भाग और बम्बई प्रेसीडेंसी में लागू थी। दोनों व्यवस्थाओं को अलग-अलग रंगों में दिखाइए।

स्थान या क्षेत्र आज का राज्य किस रूप में अंकित करें
बर्दवान, दिनाजपुर, कलकत्ता पश्चिम बंगाल (बर्दवान, कलकत्ता); दिनाजपुर नगर अब बांग्लादेश में है, जबकि उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर ज़िले पश्चिम बंगाल में हैं बंगाल: इस्तमरारी बंदोबस्त
राजमहल की पहाड़ियाँ, दामिन-इ-कोह (संथाल परगना) झारखंड पहाड़ी क्षेत्र: पहाड़िया और संथाल
भागलपुर, बीरभूम बिहार, पश्चिम बंगाल ज़िले जिनसे संथाल परगना बनाया गया
पूना (सूपा), अहमदनगर (मीरगाँव, करजत) महाराष्ट्र बम्बई दक्कन: रैयतवाड़ी, 1875 के विद्रोह
बम्बई महाराष्ट्र कपास का बंदरगाह
बिहार और उड़ीसा; मद्रास प्रेसीडेंसी के कुछ भाग बिहार, ओडिशा; तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश इस्तमरारी बंदोबस्त (अपने अध्ययन से)
मद्रास प्रेसीडेंसी का अधिकांश भाग; बम्बई प्रेसीडेंसी तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक; महाराष्ट्र, गुजरात रैयतवाड़ी (अपने अध्ययन से)

मानचित्र कैसे बनाएँ: (1) इस्तमरारी बंदोबस्त वाले क्षेत्र एक रंग में और रैयतवाड़ी वाले दूसरे रंग में छायांकित कीजिए; (2) नगरों को बिंदु से अंकित करके नाम लिखिए; (3) राजमहल की पहाड़ियों को पहाड़ी-चिह्न से दिखाइए और दामिन-इ-कोह की सीमा खींचिए; (4) संकेत-सूची और शीर्षक लिखिए।

11 परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11 (परियोजना कार्य)

प्र. फ्रांसिस बुकानन ने पूर्वी भारत के अनेक जिलों के बारे में रिपोर्टें प्रकाशित की थीं। उनमें से एक रिपोर्ट पढ़िए और इस अध्याय में चर्चित विषयों पर ध्यान केंद्रित करते हुए उस रिपोर्ट में ग्रामीण समाज के बारे में उपलब्ध जानकारी को संकलित कीजिए। यह भी बताइए कि इतिहासकार लोग ऐसी रिपोर्टों का किस प्रकार उपयोग कर सकते हैं।

उत्तर (परियोजना कैसे करें): बुकानन की किसी एक ज़िला रिपोर्ट (जैसे दिनाजपुर या भागलपुर) को चुनिए। अध्याय के विषयों के अनुसार उसकी जानकारी संकलित कीजिए: ज़मींदार और जोतदार, रैयत और बटाईदार, ज़मीन और फ़सलें, जंगल, पहाड़ी लोग और नए बाशिंदे, व्यापार, साहूकारी और खनिज। फिर बताइए कि इतिहासकार इसका उपयोग कैसे कर सकता है: समय के एक क्षण-विशेष का समृद्ध, प्रत्यक्ष विवरण, पर सावधानी से पढ़ा जाने वाला, क्योंकि बुकानन कंपनी का कर्मचारी था, कंपनी के ख़र्च पर बड़े दल के साथ यात्रा करता था, वाणिज्यिक दृष्टि से मूल्यवान साधनों की खोज करता था और भूदृश्य को इस नज़र से देखता था कि उसे अधिक उत्पादक कैसे बनाया जाए। जहाँ संभव हो, इसका मिलान दूसरे अभिलेखों (राजस्व अभिलेख, अर्जियाँ) से कीजिए।

प्रश्न 12 (परियोजना कार्य)

प्र. आप जिस क्षेत्र में रहते हैं, वहाँ के ग्रामीण समुदाय के वृद्धजनों से चर्चा कीजिए और उन खेतों में जाइए जिन्हें वे अब जोतते हैं। यह पता लगाइए कि वे क्या पैदा करते हैं, वे अपनी रोजी-रोटी कैसे कमाते हैं, उनके माता-पिता क्या करते थे, उनके बेटे-बेटियाँ अब क्या करती हैं और पिछले 75 सालों में उनके जीवन में क्या क्या परिवर्तन आए हैं। अपने निष्कर्षों के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।

उत्तर (परियोजना कैसे करें): प्रश्न के शीर्षकों के अनुसार प्रश्नों की एक छोटी सूची बनाइए: फ़सलें और उपज, आजीविका के साधन, तीन पीढ़ियों का काम, और मुख्य परिवर्तन। खेतों में जाकर देखिए कि क्या उगाया जाता है और कैसे (औज़ार, सिंचाई, बाज़ार में बिक्री), और उत्तरों को नाम व आयु सहित ध्यान से दर्ज कीजिए। रिपोर्ट में तीनों पीढ़ियों की तुलना कीजिए और परिवर्तनों (जैसे ऋण और कर्ज़, नकदी फ़सलें, जोत का आकार, पलायन, शिक्षा) को समझाइए, और जहाँ संभव हो उन्हें इस अध्याय के विषयों (राजस्व, साहूकार, वाणिज्यिक फ़सलें) से जोड़िए। याद रखिए कि ऐसे मौखिक स्रोत इसलिए मूल्यवान हैं क्योंकि वे लोगों का अपना नज़रिया देते हैं, जो सरकारी अभिलेखों में अकसर छूट जाता है।

12 पाठ के बीच में पूछे गए प्रश्न

अध्याय अपने ‘चर्चा कीजिए’ बॉक्सों में और स्रोतों व चित्रों के साथ भी प्रश्न पूछता है। उनके उत्तर यहाँ पुस्तक के क्रम में दिए गए हैं।

पाठगत प्रश्न 1 · खंड 1.1

प्र. राजा कंपनी को राजस्व क्यों नहीं अदा कर पाया था? नीलामी में ख़रीददार कौन थे? यह कहानी उस समय पूर्वी भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में क्या हो रहा था, इसके बारे में हमें क्या बताती है?

उत्तर: इस्तमरारी बंदोबस्त में तय राजस्व बहुत ऊँचा था, 1790 के दशक में कृषि उपज की कीमतें नीची थीं और रैयत अपना लगान नहीं चुका पा रहे थे, इसलिए राजा पर राजस्व की बड़ी भारी रकम बकाया हो गई। नीलामी के अनेक ख़रीददार राजा के अपने नौकर या एजेंट थे, जिन्होंने राजा की ओर से ही ज़मीनें ख़रीदीं; 95 प्रतिशत से अधिक बिक्री फ़र्जी थी। यह कहानी बताती है कि नई राजस्व प्रणाली से ज़मींदार भारी दबाव में थे और बड़े पैमाने पर संपदाएँ नीलाम हो रही थीं, पर ज़मींदार अपनी ज़मींदारी बचाने के चतुर तरीक़े भी निकाल रहे थे।

पाठगत प्रश्न 2 · स्रोत 1

प्र. यह बताइए कि जोतदार ज़मींदारों की सत्ता का किस प्रकार प्रतिरोध किया करते थे।

उत्तर: बुकानन के अनुसार जोतदार राजस्व के रूप में थोड़े से रुपये ही देते थे और लगभग हर किस्त में बक़ाया छोड़ देते थे; उनके पास पट्टे की हकदारी से ज़्यादा ज़मीनें थीं; ज़मींदार के अधिकारी उन्हें कचहरी में रोकते तो वे फ़ौजदारी थाना या मुन्सिफ़ की कचहरी में शिकायत कर देते कि उनका अपमान हुआ है; और वे छोटे-छोटे रैयत को राजस्व न देने के लिए भड़काते थे। अध्याय के अनुसार वे गाँव की जमा बढ़ाने के प्रयत्नों का घोर प्रतिरोध करते, ज़मींदारी अधिकारियों को कर्तव्य-पालन से रोकते, अपने पर निर्भर रैयतों को एकजुट रखते और नीलामी में ज़मींदारों की ज़मीनें ख़रीद लेते थे।

पाठगत प्रश्न 3 · चित्र 9.5

प्र. चित्र 9.5 के साथ दिए गए पाठ को सावधानीपूर्वक पढ़िए और तीर के निशानों के साथ-साथ उपयुक्त स्थलों पर ये शब्द भरिए: लगान, राजस्व, ब्याज, उधार (ऋण), उपज।

उत्तर: ज़मींदार से कंपनी की ओर: राजस्व। रैयत से ज़मींदार की ओर, और जोतदार से ज़मींदार की ओर: लगान। शिकमी रैयत से रैयत की ओर, और शिकमी रैयत से जोतदार की ओर: लगान। जोतदार से रैयत की ओर: उधार (ऋण)। रैयत से जोतदार की ओर: उधार पर ब्याज और उपज (जिसे जोतदार बेचते थे)।

पाठगत प्रश्न 4 · स्रोत 2

प्र. जिस लहज़े में साक्ष्य अभिलिखित किया गया है, उससे आप रिपोर्ट में वर्णित तथ्यों के प्रति रिपोर्ट लिखने वाले के रुख़ के बारे में क्या सोचते हैं? आंकड़ों के ज़रिये रिपोर्ट में क्या दर्शाने की कोशिश की गई है? क्या इन दो वर्षों के आंकड़ों से आपके विचार से, किसी भी समस्या के बारे में दीर्घकालीन निष्कर्ष निकालना संभव होगा?

उत्तर: लहज़ा चिंता और ज़मींदारों के प्रति सहानुभूति का है: रिपोर्ट ज़ोर देती है कि राजस्व समय पर नहीं वसूला जाता था, ज़मीनें बार-बार नीलामी पर रखी जाती थीं, और देश के बहुत पुराने परिवारों को ग़रीबी और बरबादी का सामना करना पड़ा। आँकड़ों से वह यह दिखाना चाहती है कि बहुत बड़ी मात्रा में ज़मीनें बिक रही थीं और पुरानी ज़मींदारी व्यवस्था कंपनी की राजस्व प्रणाली के कारण टूट रही थी। पर केवल दो वर्षों (1796-97 और 1797-98) के आँकड़ों से दीर्घकालीन निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं: ये मंदी के असामान्य वर्ष थे, और ये आँकड़े यह नहीं बताते कि कई बिक्रियाँ फ़र्जी थीं और ज़मींदार अकसर अपनी संपदाएँ वापस ख़रीद लेते थे।

पाठगत प्रश्न 5 · खंड 1.6 · चर्चा कीजिए

प्र. आपने ज़मींदारों के हाल के बारे में अभी जो कुछ पढ़ा है उसकी तुलना अध्याय 8 में दिए गए विवरण से कीजिए।

उत्तर: अध्याय 8 (मुग़ल भारत) में ज़मींदार शक्तिशाली भूस्वामी थे: उनकी मिल्कियत ज़मीनें, किले और सैनिक टुकड़ियाँ थीं, वे राज्य की ओर से राजस्व वसूलते, नयी ज़मीनें बसाते, बाज़ार (हाट) स्थापित करते और किसानों से उनके रिश्तों में पारस्परिकता और संरक्षण का पुट था। इस्तमरारी बंदोबस्त (इस अध्याय) में उन्हें राज्य का राजस्व संग्राहक माना गया, भू-स्वामी नहीं; उनकी सैन्य-टुकड़ियाँ भंग कर दी गईं, सीमा शुल्क समाप्त हुआ और कचहरियाँ कलेक्टर की देखरेख में आ गईं; उन्हें बहुत ऊँचा निर्धारित राजस्व समय पर चुकाना पड़ता था वरना ज़मींदारी नीलाम हो जाती, और जोतदार उन्हें चुनौती दे रहे थे। फिर भी दोनों कालों में ज़मींदार आसानी से विस्थापित नहीं होते थे और अपने स्थानीय प्रभाव से टिके रहते थे।

पाठगत प्रश्न 6 · चित्र 9.8

प्र. ऊपर दिए गए चित्र को देखिए और यह पता लगाइए कि होजेज ने राजमहल की पहाड़ियों को किसलिए रमणीय माना था।

उत्तर: होजेज स्वच्छंदतावाद (रूमानी विचारधारा) से प्रेरित चित्रोपम दृश्यों का खोजी था: उसे समतल-सपाट भूखंड नीरस लगते थे और ऊँची-नीची, उबड़-खाबड़, विविधतापूर्ण ज़मीन में सुंदरता दिखती थी। चित्र में विशाल, फैले हुए पेड़ों के नीचे छप्पर की कुछ झोपड़ियाँ और एक छोटी-सी मानव आकृति है; पेड़ों से छनकर आती तेज़ रोशनी और आगे की गहरी छाया है। आधुनिक सभ्यता से अछूती यह प्रकृति उसे अलौकिक और रमणीय लगी, इसलिए जिन पहाड़ियों को औपनिवेशिक अधिकारी भयंकर और उजाड़ मानते थे, वे उसके चित्र में मनमोहक दिखती हैं।

पाठगत प्रश्न 7 · चित्र 9.8 और 9.9

प्र. चित्र 9.8 और 9.9 को देखिए। इन चित्रों द्वारा जनजातीय मनुष्य और प्रकृति के बीच के संबंधों को किस प्रकार दर्शाया गया है; वर्णन कीजिए।

उत्तर: दोनों चित्रों में मनुष्य बहुत छोटे और प्रकृति में लगभग खोए हुए दिखते हैं: चित्र 9.8 में झोपड़ियाँ ऊँचे पेड़ों के नीचे हैं और जंगल के किनारे एक अकेली आकृति बैठी है; चित्र 9.9 में घने जंगल से घिरी चट्टानी पहाड़ी के नीचे पानी के किनारे एक छोटी-सी आकृति बैठी है। जनजातीय लोग प्रकृति के साथ सामंजस्य में, उसके हिस्से के रूप में दिखाए गए हैं, उसके स्वामी के रूप में नहीं; जंगल उन्हें आश्रय देता है और वे उसे नहीं बिगाड़ते। यह रूमानी, चित्रोपम दृष्टि है, अधिकारियों की दृष्टि नहीं।

पाठगत प्रश्न 8 · चित्र 9.10

प्र. चित्र 9.12 से इस संथाल गाँव के चित्र की तुलना कीजिए।

उत्तर: चित्र 9.10 में बड़े छायादार पेड़ों के नीचे छप्पर वाली झोपड़ियों का शांत गाँव है और कुछ लोग अपने काम में लगे हैं: शांतिपूर्ण, नीरव और रमणीय, बाहरी दुनिया से अप्रभावित। चित्र 9.12 विद्रोह के बाद का है: उसमें संथाल धनुष-बाण और कुल्हाड़ियाँ लिए सिपाहियों पर हमला करते उग्र योद्धाओं के रूप में दिखाए गए हैं और ज़मीन पर मृत व घायल शरीर पड़े हैं। जो लोग पहले शांत बाशिंदे लगते थे, अब नृशंस और बर्बर दिखाए गए; विद्रोह ने संथालों के प्रति ब्रिटिश धारणा बदल दी।

पाठगत प्रश्न 9 · चित्र 9.12, 9.13 और 9.14

प्र. कल्पना कीजिए कि आप ‘इलस्ट्रेटेड लंडन न्यूज़’ के पाठक हैं। चित्र 9.12, 9.13 और 9.14 में चित्रित दृश्यों के प्रति आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? इन चित्रों से आपके मन में संथालों की क्या-क्या छवि बनती है?

उत्तर: इंग्लैंड का पाठक चित्र 9.12 की हिंसा देखकर शायद डर और आक्रोश महसूस करता, फिर चित्र 9.13 और 9.14 देखकर राहत और गर्व, जिनमें संथालों के गाँव जल रहे हैं और विद्रोही जंज़ीरों में जेल ले जाए जा रहे हैं, जबकि ब्रिटिश अधिकारी विजयगर्व से हाथी और घोड़े पर सवार हैं। इन चित्रों से संथालों की छवि बर्बर, हिंसक और ख़तरनाक लोगों की बनती, जिन्हें काबू में रखना ज़रूरी है, और अंग्रेज़ों की छवि ऐसे शक्तिशाली शासकों की जिन्होंने विद्रोह कुचलकर व्यवस्था बहाल कर दी।

पाठगत प्रश्न 10 · स्रोत 5 · चर्चा कीजिए

प्र. बुकानन का वर्णन विकास के संबंध में उसके विचारों के बारे में क्या बतलाता है? उद्धरणों से उदाहरण देते हुए अपनी दलील पेश कीजिए। यदि आप एक पहाड़िया वनवासी होते तो उसके इन विचारों के प्रति आपकी प्रतिक्रिया क्या होती?

उत्तर: बुकानन के लिए विकास का अर्थ था जंगलों को स्थायी, वाणिज्यिक खेती में बदलना। वह लिखता है, ‘कमी है तो बस इस क्षेत्र में कुछ प्रगति की और विस्तृत तथा उन्नत खेती की’; वह चाहता है कि ‘लकड़ी की जगह टसर और लाख के लिए… बड़े-बड़े बागान लगाए जा सकते हैं; बाक़ी जंगल को भी साफ़ किया जा सकता है।’ उसकी प्रगति की कसौटी यह थी कि ज़मीन कंपनी के लिए कितनी उत्पादक और लाभदायक बनाई जा सकती है। एक पहाड़िया वनवासी इन विचारों का विरोध करता, क्योंकि जंगल ही उसके जीवन (शिकार, खाद्य बटोरना, झूम खेती, चरागाह) और पहचान का आधार था; जंगल साफ़ होने से उसकी आजीविका नष्ट हो जाती और उसे बेदखल होना पड़ता।

पाठगत प्रश्न 11 · स्रोत 7

प्र. लेखक द्वारा प्रयुक्त भाषा या शब्दावली से अकसर उसके पूर्वाग्रहों का पता चल जाता है, स्रोत 7 को सावधानीपूर्वक पढ़िए और उन शब्दों को छाँटिए जिनसे लेखक के पूर्वाग्रहों का पता चलता है। चर्चा कीजिए कि उस इलाके का रैयत उसी स्थिति का किन शब्दों में वर्णन करता होगा।

उत्तर: रिपोर्ट रैयतों को ‘अपराधी’ कहती है, लिखती है कि वे ‘जासूसी’ करते हैं, ‘गुप्तचर’ ख़बर पहुँचाते हैं, वे ‘झुंड’ बनाकर जाते हैं, ऋणदाताओं पर ‘हमला करके छीन लेते हैं’ और सरकारी अधिकारी को देखकर ‘तितर-बितर’ हो जाते हैं, मानो वे अपराधियों का गिरोह हों। एक रैयत इन्हीं घटनाओं को अन्याय के विरुद्ध सामूहिक विरोध के रूप में बताता: ऐसे साहूकारों से तंग आकर, जो अनुचित ब्याज लेते, ऋण देने से इनकार करते, खातों में धोखाधड़ी करते और ज़मीन व पशु छीन लेते थे, गाँव वाले मिलकर उन बंधपत्रों और दस्तावेज़ों को वापस माँगने गए जिनके सहारे उन्हें ठगा जा रहा था।

पाठगत प्रश्न 12 · चित्र 9.17

प्र. चित्र 9.17 के तीन भाग हैं जिनमें कपास ढोने के भिन्न-भिन्न साधन दर्शाए गए हैं। चित्र में कपास के बोझ से दबे जा रहे बैलों, सड़क पर पड़े शिलाखंडों और नौका पर लदी गाँठों के विशाल ढेर को देखिए। कलाकार इन तसवीरों के जरिए क्या दर्शाना चाहता है?

उत्तर: तीनों भागों में कपास बैलों की पीठ पर, नौकाओं में और बैलगाड़ियों में ढोई जा रही है। कलाकार दिखाना चाहता है कि परिवहन के पुराने साधन धीमे, कठिन और अक्षम थे: बैल बोझ से दबे जा रहे हैं, गाड़ियाँ पथरीली सड़कों पर संघर्ष करती हैं और नौकाएँ ख़तरनाक ढंग से लदी हैं। संदेश यह है कि भारत ब्रिटेन की ज़रूरत की कपास दे सकता है, पर तभी जब परिवहन सुधरे, जैसे रेलें बनाकर।

पाठगत प्रश्न 13 · स्रोत 8

प्र. रैयत अपनी अर्जी में क्या शिकायत कर रहा है। ऋणदाता द्वारा किसान से ले जाई जाने वाली फसल उसके खाते में क्यों नहीं चढ़ाई जाती? किसानों को कोई रसीद क्यों नहीं दी जाती? यदि आप ऋणदाता होते तो इन व्यवहारों के लिए आप क्या-क्या कारण देते?

उत्तर: रैयत शिकायत करता है कि साहूकार अत्याचार कर रहे हैं: घर-खर्च के लिए उन्हें साहूकारों से पैसा, कपड़ा और अनाज माँगना पड़ता है, जो बड़ी कठिनाई से और कड़ी शर्तों वाले बंधपत्र लिखकर मिलता है; कपड़ा-अनाज नकद दरों पर नहीं बेचा जाता, नकद ग्राहकों की अपेक्षा 25 से 50 प्रतिशत (अधिक) कीमत ली जाती है; और खेतों की उपज ले जाकर भी उसे खाते में नहीं चढ़ाया जाता और रसीद नहीं दी जाती। फसल खाते में न चढ़ाने और रसीद न देने से कर्ज़ बड़ा बना रहता था और किसान यह साबित नहीं कर पाता था कि उसने कितना चुका दिया है, इसलिए वह साहूकार के वश में रहता था। ऋणदाता के रूप में कोई यह कारण दे सकता है कि उपज से केवल ब्याज का कुछ हिस्सा चुकता था, किसान अकसर समय पर नहीं चुकाते थे, कीमतें अनिश्चित थीं और उधार पर बिक्री में जोखिम था, इसलिए ऊँची कीमतें और कड़ी शर्तें ज़रूरी थीं।

पाठगत प्रश्न 14 · भाड़ा-पत्र वाला स्रोत

प्र. उन सभी वचनबद्धताओं की सूची बनाइए जो किसान इस दस्तावेज़ में दे रहा है। ऐसा कोई दस्तावेज़ हमें किसान और ऋणदाता के बीच के संबंधों के बारे में क्या बताता है। इससे किसान और बैलों (जो पहले उसी के थे) के बीच के संबंधों में क्या अंतर आएगा?

उत्तर: वचनबद्धताएँ: उसने देय ऋण के खाते में अपनी लोहे के धुरों वाली दो गाड़ियाँ, साज-सामान और चार बैल ऋणदाता को बेच दिए हैं; उसने उन्हीं गाड़ियों और बैलों को भाड़े पर लिया है; वह हर माह चार रुपए की दर से भाड़ा देगा; वह ऋणदाता की अपनी लिखावट में रसीद लेगा; और रसीद न मिलने पर वह यह दलील नहीं देगा कि भाड़ा चुका दिया गया है। यह दस्तावेज़ दिखाता है कि किसान पूरी तरह ऋणदाता पर निर्भर था, जो अब उसके खेती के साधनों का मालिक था और न्यायालय में यह दस्तावेज़ लागू करा सकता था। जो बैल पहले किसान के अपने थे, वे अब ऋणदाता के हो गए; किसान उनका मालिक नहीं, अपने ही पशुओं का भाड़ा देने वाला बन गया।

पाठगत प्रश्न 15 · स्रोत 10

प्र. ब्याज की उस मद का हिसाब लगाइए जो रैयत इन वर्षों में दे रहा था।

उत्तर: बंधपत्र 3-2 आने प्रतिशत की मासिक दर पर है (16 आने = 1 रुपया, इसलिए 100 रु. पर हर महीने 3.125 रु.), यानी 3.125 × 12 = 37.5 प्रतिशत वार्षिक। क्योंकि हर तीन साल या उसके आसपास न चुकाया गया मूलधन और ब्याज मिलाकर नया बंधपत्र लिखा जाता था, ब्याज पर भी ब्याज लगता था, इसलिए बोझ और तेज़ी से बढ़ा: याचिका के अनुसार 12 वर्ष के अंत में 1000 रु. की राशि पर कुल ब्याज 2,028 रु. 10 आना 3 पैसे हो गया, यानी मूलधन के दोगुने से भी अधिक।

पाठगत प्रश्न 16 · खंड 4 · चर्चा कीजिए

प्र. आजकल आप जिस क्षेत्र में रहते हैं वहाँ पर ली जाने वाली ब्याज दरों का पता लगाइए। यह भी पता लगाइए कि क्या ये दरें पिछले 50 वर्षों में बदली हैं। क्या भिन्न-भिन्न वर्गों के लोगों द्वारा अदा की जाने वाली दरों में कोई अंतर है? यदि है तो इन अंतरों के क्या कारण हैं?

उत्तर: एक आदर्श उत्तर: आज बैंक और सहकारी समितियाँ किसानों को अपेक्षाकृत कम दर पर, सरकारी योजनाओं में अकसर कुछ प्रतिशत वार्षिक पर, ऋण देती हैं, जबकि निजी साहूकार अब भी हर महीने दो से पाँच प्रतिशत तक ले सकते हैं। पचास वर्ष पहले, जब गाँवों में बैंक कम थे, अधिकतर लोग बहुत ऊँची दरों पर साहूकारों पर निर्भर थे। दरों में आज भी अंतर है: दस्तावेज़ और ज़मानत वाले भूस्वामियों को बैंक से सस्ता ऋण मिल जाता है, जबकि छोटे किसान, मज़दूर और बिना ज़मानत वाले ग़रीब परिवार अकसर ऊँची दरों पर साहूकारों से उधार लेते हैं। कारण हैं ज़मानत, बैंक तक पहुँच, ऋणदाता को दिखने वाला जोखिम और तुरंत ज़रूरत।