NCERT की पाठ्यपुस्तक भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग III के अध्याय ‘महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन’ के अभ्यास के सभी बारह प्रश्न, हिंदी संस्करण के अपने शब्दों में, हर एक के आदर्श उत्तर के साथ: पाँच प्रश्न ‘उत्तर दीजिए (लगभग 100-150 शब्दों में)’, चार ‘लघु निबंध (लगभग 250-300 शब्दों में)’, एक मानचित्र कार्य और दो परियोजना कार्य (कोई एक)। इनके बाद अध्याय के भीतर स्रोतों और चित्रों के साथ तथा “चर्चा कीजिए” बॉक्सों में पूछे गए नौ प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं। पहले ख़ुद उत्तर लिखिए, फिर यहाँ मिलाकर देखिए।
1 महात्मा गांधी ने आम लोगों जैसा दिखने के लिए क्या किया?
प्र. महात्मा गांधी ने खुद को आम लोगों जैसा दिखाने के लिए क्या किया?
उत्तर: गांधीजी ने एक सादी धोती पहनी और चरखे पर दैनिक घंटे बिताए, ठीक वैसे ही जैसे लाखों किसान और शिल्पी पहनते और जीते थे, अन्य अभिजात राष्ट्रवादी नेताओं के विपरीत। इस पहनावे और दिनचर्या ने प्रतीकात्मक रूप से मानसिक और शारीरिक श्रम के बीच पारंपरिक जाति-सीमा भी तोड़ी, क्योंकि कताई एक ऐसा काम था जिसे उच्च और निम्न जाति दोनों साथ कर सकते थे।
इससे परे, उन्होंने अपने कार्यों से भी पहचान बनाई: 1917-18 में चंपारन, खेड़ा और अहमदाबाद जैसे बिल्कुल स्थानीय, ग़रीबों से जुड़े मुद्दों में व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप किया, अंग्रेज़ी के बजाय स्थानीय भाषाओं में संदेश पहुँचाने पर बल दिया, और प्रांतीय कांग्रेस समितियों को औपनिवेशिक प्रशासनिक रेखाओं के बजाय भाषाई रेखाओं पर पुनर्गठित किया। इन सबका संचयी प्रभाव यह हुआ कि 1922 तक किसान, श्रमिक और शिल्पी उन्हें “महात्मा” मानकर पूजने लगे, ठीक इसलिए क्योंकि वे उन्हीं की तरह पहनते, रहते और बोलते थे।
2 किसानों की दृष्टि में महात्मा गांधी
प्र. किसान महात्मा गांधी को किस तरह देखते थे?
उत्तर: इतिहासकार शाहिद अमीन के अध्ययन के अनुसार, फ़रवरी 1921 के गांधी-दौरे के समय पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसानों ने उन्हें लगभग अलौकिक, चमत्कारी शक्तियों वाला मान लिया था। छोटे-छोटे रेलवे स्टेशनों पर 10,000 से 20,000 तक की भीड़ जुटती, लोग उन पर नोट और सिक्के बरसाते, और यह अफ़वाहें फैलतीं कि उनकी आलोचना करने वाले की फ़सल नष्ट हो जाएगी या घर ढह जाएगा, कि एक किसान के कहने पर उसके कड़ाह के बीच से दो टुकड़े हो गए, या किसी के खेत का गेहूँ तिल में बदल गया।
यह ज़रूरी है कि इन अफ़वाहों को शाब्दिक सत्य के रूप में न पढ़ा जाए। ये इस बात का प्रमाण नहीं देतीं कि गांधीजी वास्तव में क्या कर सकते थे; ये इस बात का प्रमाण हैं कि उस विशेष क्षण में पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसान गांधीजी से क्या आशा रखते और क्या मानना चाहते थे, यानी एक ऐसे उद्धारक की, जो उनकी दैनिक पीड़ाओं का निवारण कर सके। इसी प्रकार का सबक 1857 के विद्रोह की अफ़वाहों से भी मिलता है: अफ़वाह को उसके पीछे के मन के लिए पढ़ें, उसके शाब्दिक सत्य के लिए नहीं।
3 नमक-क़ानून संघर्ष का महत्वपूर्ण मुद्दा क्यों बना
प्र. नमक-क़ानून स्वतंत्रता संघर्ष का महत्वपूर्ण मुद्दा क्यों बन गया था?
उत्तर: नमक हर भारतीय घर की, अमीर हो या ग़रीब, प्रतिदिन की अनिवार्य आवश्यकता था, इसलिए ब्रिटिश नमक-एकाधिकार, जो भारतीयों को अपने ही घरेलू प्रयोग के लिए भी नमक बनाने से रोकता था, एक ऐसा निशाना था जो राजनीतिक रूप से सक्रिय दायरों से कहीं आगे, हर साधारण घर तक असंतोष पहुँचा सकता था।
गांधीजी ने स्वयं इसे “चौतरफा अभिशाप” बताया: यह लोगों को एक मूल्यवान, सरल ग्राम-उद्योग से वंचित करता, प्रकृति द्वारा प्रचुरता से दी गई संपत्ति को नष्ट करता, यह विनाश स्वयं अतिरिक्त राष्ट्रीय व्यय बनता, और सबसे ऊपर, एक भूखी जनता से 1,000 प्रतिशत से अधिक का अभूतपूर्व कर वसूला जाता था। साथ ही यह एक ऐसा क़ानून-भंग था जिसे कोई भी साधारण व्यक्ति समुद्र-तट पर एक मुट्ठी नमक बनाकर तुरंत कर सकता था, बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के, इसलिए यह व्यापक जन-भागीदारी के लिए आदर्श मुद्दा साबित हुआ।
4 समाचार-पत्र राष्ट्रीय आंदोलन के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण स्रोत क्यों हैं
प्र. राष्ट्रीय आंदोलन के अध्ययन के लिए समाचार-पत्र महत्वपूर्ण स्रोत क्यों हैं?
उत्तर: अंग्रेज़ी और विभिन्न भारतीय भाषाओं में छपने वाले समकालीन समाचार-पत्रों ने महात्मा गांधी की गतिविधियों पर लगातार नज़र रखी और उनके बारे में ख़बरें छापीं, जो आज इतिहासकारों को घटनाओं की तिथिवार, विस्तृत जानकारी और यह भी संकेत देते हैं कि आम भारतीय उनके बारे में क्या सोचते थे।
पर अख़बारी ब्योरों को पूर्वाग्रह-मुक्त, तटस्थ स्रोत मानकर स्वीकार नहीं किया जा सकता। इन्हें प्रकाशित करने वाले लोगों की अपनी राजनीतिक सोच और विश्व-दृष्टिकोण था, जो यह तय करता था कि क्या प्रकाशित होगा और घटनाओं की रिपोर्टिंग किस तरह होगी; इसीलिए लंदन से निकलने वाले अख़बार का विवरण भारतीय राष्ट्रवादी अख़बार में छपी रिपोर्ट जैसा नहीं हो सकता था। इसलिए समाचार-पत्रों को साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल तो करना चाहिए, पर हर वक्तव्य को यथार्थ का शब्दशः सच ब्योरा मानने के बजाय यह पूछते हुए पढ़ना चाहिए कि वह किसके हित और दृष्टिकोण को दर्शाता है।
5 चरखे को राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में चुनने का कारण
प्र. चरखे को राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में क्यों चुना गया?
उत्तर: चरखा साधारण और सस्ता था, किसी भी ग़रीब के घर में मौजूद हो सकता था, इसलिए यह गांधीजी की ग़रीबों से पहचान बनाने की मुहिम का सबसे सुलभ, दृश्य प्रतीक बना। उन्होंने स्वयं समझाया कि उन्हें मशीनरी से नहीं बल्कि “श्रम बचाने” के नाम पर हज़ारों को बेरोज़गार कर देने वाली इसकी अंधाधुंध दौड़ से आपत्ति थी; वे समय और श्रम सबके लिए बचाना चाहते थे, कुछ लोगों के लिए नहीं, और चरखा स्वयं “मशीनरी का एक उत्कृष्ट टुकड़ा” होते हुए भी इसके नियंत्रित, मानवीय प्रयोग का प्रतीक था।
इसके साथ ही, दैनिक कताई मानसिक और शारीरिक श्रम के बीच पारंपरिक जाति-सीमा को भी तोड़ती थी, क्योंकि उच्च और निम्न जाति दोनों इसे साथ कर सकते थे। और व्यावहारिक स्तर पर, यह विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार व स्वदेशी खादी को अपनाने का एक ठोस, रोज़ अपनाया जा सकने वाला साधन था, जिससे आर्थिक स्वावलंबन का संदेश भी जुड़ा।
6 निबंध · असहयोग एक प्रकार का प्रतिरोध कैसे था
प्र. असहयोग एक प्रकार का प्रतिरोध कैसे था?
उत्तर: असहयोग गांधीजी की इस मान्यता पर आधारित था कि ब्रिटिश शासन भारतीयों के “स्वैच्छिक सहयोग” के बिना नहीं चल सकता; इसलिए इसने भारतीयों से सरकारी स्कूल, कॉलेज और अदालतें छोड़ने और कर चुकाना बंद करने को कहा, यानी हिंसा के बिना, केवल सहयोग वापस लेकर शासन को असहनीय बनाने की रणनीति। इसे ख़िलाफ़त आंदोलन से जोड़ा गया ताकि हिंदू और मुसलमान एक ही संघर्ष में एकजुट हो सकें।
यह प्रतिरोध का एक रूप इसलिए था क्योंकि इसने साधारण, दैनिक जीवन की क्रियाओं (स्कूल जाना, कर चुकाना, अदालत में मुक़दमा लड़ना) को ही राजनीतिक अवज्ञा के अवसर में बदल दिया, जिससे लाखों साधारण लोग बिना हथियार उठाए भाग ले सके। इसने अभूतपूर्व लोकप्रिय कार्रवाई छोड़ी: विद्यार्थियों ने स्कूल छोड़े, वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार किया, और 1921 में 396 हड़तालों ने 6,00,000 श्रमिकों को शामिल किया, जिससे 70 लाख कार्य-दिवसों की लागत आई।
देहात में इसका रूप और भी विविध था: उत्तरी आंध्र की पहाड़ी जनजातियों ने वन-क़ानून तोड़े, अवध के किसानों ने कर देने से इनकार किया, कुमाऊँ के किसानों ने बलात श्रम से इनकार किया, अक्सर स्थानीय राष्ट्रवादी नेतृत्व की अवहेलना करते हुए और “असहयोग” की व्याख्या अपने ही हितों के अनुसार करते हुए। यह दिखाता है कि असहयोग किसी एक केंद्रीय आदेश से चलने वाला आंदोलन नहीं बल्कि विभिन्न सामाजिक समूहों द्वारा अपनाया गया, बहुरूपी प्रतिरोध था, जो अंततः चौरी चौरा की हिंसा के बाद गांधीजी द्वारा वापस ले लिया गया।
7 निबंध · गोलमेज़ सम्मेलन में वार्ता के अनिर्णायक रहने के कारण
प्र. गोलमेज़ सम्मेलन में हुई वार्ता से कोई नतीजा क्यों नहीं निकल पाया?
उत्तर: पहला गोलमेज़ सम्मेलन (नवंबर 1930) गांधीजी की अनुपस्थिति में हुआ, क्योंकि वे तब जेल में थे, और भारत के सबसे प्रमुख राजनीतिक नेता के बिना यह सम्मेलन लगभग निरर्थक साबित हुआ। जनवरी 1931 में रिहा होने के बाद गांधीजी ने वायसराय इरविन से बार-बार मुलाक़ात की, जिससे गांधी-इरविन समझौता हुआ, पर इसमें भी गांधीजी केवल भविष्य की वार्ता का आश्वासन ही ले सके, वास्तविक राजनीतिक स्वतंत्रता का नहीं।
दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन (1931 के अंत) में गांधीजी स्वयं कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करने गए, पर उनका यह दावा कि उनकी पार्टी पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करती है, तीन अलग-अलग दिशाओं से चुनौती दी गई: मुस्लिम लीग ने मुस्लिम अल्पसंख्यक के लिए अलग हितों का दावा किया, रियासतों ने कहा कि उनके क्षेत्रों पर कांग्रेस का कोई दावा नहीं, और बी.आर. अम्बेडकर ने तर्क दिया कि गांधीजी और कांग्रेस निम्नतम जातियों का वास्तविक प्रतिनिधित्व नहीं करते। इतने भिन्न, परस्पर-विरोधी हितों को एक साथ संतुष्ट करने वाला कोई एकमत हल निकालना असंभव साबित हुआ।
इसके अलावा नया वायसराय लॉर्ड विलिंग्डन गांधीजी के प्रति गहरी असहानुभूति रखता था; अपनी बहन को लिखे निजी पत्र में उसने गांधीजी के हर कदम के पीछे “राजनीतिक चाल” देखी, जिससे ब्रिटिश पक्ष की ओर से वास्तविक समझौते की इच्छाशक्ति भी कमज़ोर बनी रही। इन सब कारणों, नेतृत्व की अनुपस्थिति, प्रतिस्पर्धी दावों और ब्रिटिश अनिच्छा, के संयोजन ने संवाद को अनिर्णायक बना दिया।
8 निबंध · महात्मा गांधी द्वारा राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप का रूपांतरण
प्र. महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप को किस तरह बदल डाला?
उत्तर: गांधीजी से पहले भारतीय राष्ट्रवाद मुख्यतः शहरी अभिजात वर्ग, वकीलों, व्यापारियों और शिक्षितों तक सीमित था; उनके अपने 1916 के BHU भाषण ने ही स्वीकार किया कि राष्ट्रवाद में “लाखों गरीब” भारतीयों की उपस्थिति नहीं थी। गांधीजी ने 1917-22 के बीच चंपारन, खेड़ा और अहमदाबाद से शुरू करते हुए राष्ट्रवाद को किसानों, श्रमिकों और शिल्पियों तक विस्तृत किया, धोती और चरखे जैसे प्रतीकों के माध्यम से उनसे प्रत्यक्ष पहचान बनाते हुए।
उन्होंने आंदोलन का संगठनात्मक ढाँचा भी बदला: नई कांग्रेस शाखाएँ बनीं, रियासतों में प्रजा मंडल उभरे, और प्रांतीय कांग्रेस समितियाँ औपनिवेशिक प्रशासनिक सीमाओं के बजाय भाषाई रेखाओं पर पुनर्गठित हुईं, जिससे संदेश स्थानीय भाषाओं में आम जनता तक पहुँचने लगा। असहयोग (1920-22) और नमक सत्याग्रह (1930) जैसे आंदोलनों ने सत्याग्रह को व्यापक जन-लामबंदी के औज़ार में बदल दिया, नमक मार्च तो पहला ऐसा आंदोलन बना जिसमें स्त्रियों ने भी बड़े पैमाने पर भाग लिया।
इसके साथ ही गांधीजी ने राष्ट्रवाद को नैतिक-सामाजिक सुधार से भी जोड़ा, अस्पृश्यता-विरोध, हिंदू-मुस्लिम एकता और खादी के प्रचार को स्वतंत्रता की पूर्व-शर्तें मानते हुए, यद्यपि पृथक निर्वाचिका पर अम्बेडकर की चुनौती ने उनके सार्वभौमिक प्रतिनिधित्व के दावे की वास्तविक सीमाएँ भी उजागर कीं। अंततः भारत छोड़ो (1942) तक आंदोलन जन-आंदोलन का पर्याय बन चुका था, राष्ट्रवाद अब किसी एक वर्ग की नहीं, विविध सामाजिक समूहों की साझा परियोजना था, यही गांधीजी का सबसे स्थायी रूपांतरण था।
9 निबंध · निजी पत्र और आत्मकथाएँ बनाम आधिकारिक वृत्तांत
प्र. निजी पत्रों और आत्मकथाओं से किसी व्यक्ति के बारे में क्या पता चलता है? ये स्रोत सरकारी ब्योरों से किस तरह भिन्न होते हैं?
उत्तर: निजी पत्र लेखक के तात्कालिक, प्रायः अधिक स्पष्ट और बेबाक विचार दिखाते हैं। उदाहरण के लिए 1936 में जब कांग्रेस अध्यक्ष नेहरू की समाजवादी वाक्पटुता ने रूढ़िवादी राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल को चिंतित किया, तो प्रसाद-नेहरू-गांधी के बीच हुए पत्राचार ने कांग्रेस के भीतर के वास्तविक वैचारिक तनाव और गांधीजी की निरंतर मध्यस्थ भूमिका को उजागर किया, ऐसी बातें जो किसी औपचारिक प्रस्ताव या भाषण में कभी सामने नहीं आतीं। फिर भी रेखा धुंधली है: पत्र अक्सर यह जानते हुए लिखे जाते थे कि वे बाद में प्रकाशित हो सकते हैं (गांधीजी स्वयं उन्हें लिखे पत्र हरिजन में छापते थे; नेहरू ने अपना संकलन ‘अ बंच ऑफ़ ओल्ड लेटर्स’ प्रकाशित किया), जो लेखक की वास्तविक स्वतंत्रता को कुछ हद तक सीमित कर सकता है।
आत्मकथाएँ इससे भी अधिक सतर्कता माँगती हैं क्योंकि ये पूर्वदर्शी होती हैं, स्मृति से लिखी जातीं, और इस बात से आकारित होती हैं कि लेखक क्या याद रखा जाना चाहता है और कैसे देखा जाना चाहता है; इसलिए किसी आत्मकथा को पढ़ने का अर्थ है यह पूछना कि क्या छोड़ा गया और क्यों, न केवल क्या बताया गया।
ये दोनों औपनिवेशिक पुलिस रिपोर्टों या सरकारी वृत्तांतों से मौलिक रूप से भिन्न हैं। पुलिस रिपोर्टें (जैसे गृह विभाग की पाक्षिक रिपोर्टें) सत्ता बनाए रखने की चिंता से लिखी जातीं और अक्सर वही दर्ज करतीं जो अधिकारी मानना चाहते थे, आंदोलन का वास्तविक प्रभाव कम आँकते हुए, ज़मीनी सच्चाई नहीं। इस प्रकार निजी पत्र और आत्मकथाएँ व्यक्तिगत, प्रत्यक्ष अंतर्दृष्टि देते हैं जबकि सरकारी ब्योरे संस्थागत, आत्म-आश्वासन देने वाला दृष्टिकोण, इसलिए इतिहासकार को दोनों को एक-दूसरे के विरुद्ध जाँचना ज़रूरी है, किसी एक को अंतिम सत्य मानकर नहीं।
10 मानचित्र कार्य · दांडी यात्रा का मार्ग
प्र. दाण्डी मार्च के मार्ग का पता लगाइए। गुजरात के नक्शे पर इस यात्रा के मार्ग को चिह्नित कीजिए और उस पर पड़ने वाले मुख्य शहरों व गाँवों को चिह्नित कीजिए।
उत्तर (यह गुजरात के नक्शे पर करने का अभ्यास है; यहाँ अध्याय में दी गई जानकारी सूची के रूप में दी गई है):
आरंभ और अंत: 12 मार्च 1930 को गांधीजी साबरमती के अपने आश्रम से चले और तीन हफ़्तों बाद समुद्र तट पर स्थित दाण्डी पहुँचे, जहाँ 5 अप्रैल को उन्होंने भाषण दिया और 6 अप्रैल 1930 को नमक कानून तोड़ा गया।
रास्ते में: अध्याय रास्ते के एक गाँव, वसना, का नाम लेता है, जहाँ गांधीजी ने ऊँची जातियों से कहा कि स्वराज चाहते हो तो अछूतों की सेवा करनी होगी। नक्शे पर साबरमती, वसना और दाण्डी को चिह्नित कीजिए और यात्रा की रेखा दक्षिण में समुद्र तट की ओर खींचिए।
अन्य पड़ाव: अध्याय सभी पड़ावों के नाम नहीं देता; बाकी शहरों और गाँवों के लिए एटलस या यात्रा के किसी विश्वसनीय विवरण का सहारा लीजिए।
11 परियोजना कार्य (कोई एक): दो आत्मकथाएँ
प्र. दो राष्ट्रवादी नेताओं की आत्मकथाएँ पढ़िए। देखिए कि उन दोनों में लेखकों ने अपने जीवन और समय को किस तरह अलग-अलग प्रस्तुत किया है और राष्ट्रीय आंदोलन की किस प्रकार व्याख्या की है। देखिए कि उनके विचारों में क्या भिन्नता है। अपने अध्ययन के आधार पर एक रिपोर्ट लिखिए।
उत्तर (परियोजना के लिए तरीका):
दो आत्मकथाएँ चुनिए (जैसे महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की)।
स्पष्ट शीर्षकों में तुलना कीजिए: लेखक अपने जीवन और निर्णयों को कैसे प्रस्तुत करता है; असहयोग, नमक यात्रा या भारत छोड़ो जैसी घटनाओं का वर्णन कैसे करता है; और दूसरे नेताओं के बारे में क्या राय रखता है।
अध्याय की सीख अपनाइए: आत्मकथाएँ पूर्वदर्शी होती हैं और अक्सर स्मृति से लिखी जाती हैं; आत्मकथा लिखना अपनी एक तस्वीर गढ़ने का तरीका है। इसलिए देखिए कि लेखक क्या नहीं बताता और उस चुप्पी के कारण समझने की कोशिश कीजिए।
निष्कर्ष में लिखिए कि दोनों लेखकों के राष्ट्रीय आंदोलन संबंधी विचार कैसे और क्यों भिन्न हैं।
12 परियोजना कार्य (कोई एक): पत्र और भाषण
प्र. राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान घटी कोई एक घटना चुनिए। उसके विषय में तत्कालीन नेताओं द्वारा लिखे गए पत्रों और भाषणों को खोज कर पढ़िए। उनमें से कुछ अब प्रकाशित हो चुके हैं। आप जिन नेताओं को चुनते हैं उनमें से कुछ आपके इलाके के भी हो सकते हैं। उच्च स्तर पर राष्ट्रीय नेतृत्व की गतिविधियों को स्थानीय नेता किस तरह देखते थे इसके बारे में जानने की कोशिश कीजिए। अपने अध्ययन के आधार पर आंदोलन के बारे में लिखिए।
उत्तर (परियोजना के लिए तरीका):
एक घटना चुनिए (जैसे असहयोग, नमक सत्याग्रह या भारत छोड़ो) और उस समय के प्रकाशित पत्र-भाषण खोजिए, जिनमें आपके क्षेत्र के किसी स्थानीय नेता के भी हों।
अध्याय के उदाहरण को आदर्श मानिए: स्रोत 7 में 1936 के नेहरू, राजेंद्र प्रसाद और गांधीजी के पत्र कांग्रेस के भीतर के मतभेद और गांधीजी की मध्यस्थ भूमिका दिखाते हैं।
स्रोत की सीमा याद रखिए: भाषण सार्वजनिक आवाज़ दिखाते हैं और पत्र निजी विचारों की झलक देते हैं, पर यह रेखा अक्सर धुंधली होती है क्योंकि पत्र इस जानकारी के साथ भी लिखे जाते हैं कि वे प्रकाशित हो सकते हैं।
अपना विवरण लिखिए कि स्थानीय नेता राष्ट्रीय नेतृत्व को कैसे देखते थे, कहाँ सहमत थे और कहाँ अलग।
13 पाठ के बीच में पूछे गए प्रश्न
अध्याय के भीतर स्रोतों और चित्रों के साथ तथा “चर्चा कीजिए” बॉक्सों में पूछे गए प्रश्न, उसी क्रम में जिसमें पुस्तक उन्हें छापती है।
प्र. 1915 से पूर्व भारत में हुए राष्ट्रीय आंदोलनों के बारे में और जानकारी इकट्ठा कीजिए व पता लगाइए कि क्या महात्मा गाँधी की टिप्पणियाँ न्यायसंगत हैं।
उत्तर: फरवरी 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन पर गाँधी जी ने मज़दूर गरीबों की ओर ध्यान न देने के लिए भारतीय विशिष्ट वर्ग को आड़े हाथों लिया और कहा, ‘हमारी मुक्ति केवल किसानों के माध्यम से ही हो सकती है। न तो वकील, न डॉक्टर, न ही ज़मींदार इसे सुरक्षित रख सकते हैं।’ टिप्पणियाँ काफ़ी हद तक न्यायसंगत: 1915 से पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की शाखाएँ मुख्यतः शहरों और कस्बों में थीं; गोपाल कृष्ण गोखले (और मोहम्मद अली जिन्ना) जैसे उदारवादी क्रमिक और समझाने-बुझाने वाले तरीके के हिमायती थे; और 1905-07 के स्वदेशी आंदोलन ने भी, जिसने ‘लाल, बाल और पाल’ जैसे नेताओं को जन्म दिया, कांग्रेस की अपील का विस्तार मुख्यतः मध्य वर्गों में ही किया। अध्याय के अनुसार गाँधी जी का भाषण ‘वास्तविक तथ्य का ही उद्घाटन था’ कि भारतीय राष्ट्रवाद वकीलों, डॉक्टरों और ज़मींदारों जैसे विशिष्ट वर्गों की रचना था। भारतीय जनसंख्या के अधिसंख्य हिस्से, किसान और कामगार, न आंदोलन के नेतृत्व में थे, न बनारस के श्रोताओं में। एक सीमा: 1915 का भारत 1893 की तुलना में राजनीतिक दृष्टि से कहीं अधिक सक्रिय था, और दूर-दूर के प्रांतों के नेताओं ने संघर्ष को अखिल भारतीय चरित्र दे दिया था, यानी आंदोलन बढ़ रहा था; पर यह अभी किसानों, श्रमिकों और कारीगरों का जन-आंदोलन नहीं बना था, जो गाँधी जी के नेतृत्व में 1919-22 के बाद ही हुआ।
प्र. आपने अध्याय 10 में अफ़वाहों के बारे में पढ़ा और देखा कि अफ़वाहों का प्रसार एक समय के विश्वास के ढाँचों के बारे में बताता है, यह बताता है उन लोगों के मन-मस्तिष्क के बारे में जो इन अफ़वाहों में विश्वास करते हैं और उन परिस्थितियों के बारे में जो इन विश्वासों को संभव बनाती हैं। आपके अनुसार गाँधी जी के विषय में अफ़वाहों से क्या पता चलता है?
उत्तर: (1) गहरी आस्था और श्रद्धा: किसान गाँधी जी को ‘महात्मा’, ‘गाँधी बाबा’ या ‘गाँधी महाराज’ मानते थे जिनके पास चमत्कारी शक्तियाँ थीं: गन्ने के रस से भरा कड़ाहा दो हिस्सों में टूट जाना, गेहूँ का तिल बन जाना। (2) मुक्ति की आशा: लोग मानते थे कि उन्हें किसानों की शिकायतें दूर करने के लिए भेजा गया है, वे स्थानीय अधिकारियों के निर्णय पलट सकते हैं और उनकी शक्ति अंग्रेज़ बादशाह से भी बढ़कर है; यह ऊँचे करों और दमनकारी अधिकारियों से उनकी पीड़ा और एक ऐसे उद्धारकर्ता की चाह दिखाता है जो उनके जीवन में गरिमा लौटा सके। (3) उनके कार्यक्रम का नैतिक दबाव: चरखे पर प्रश्न उठाने वाले, जुआ खेलते हुए गाँधी जी को अपशब्द कहने वाले, या शराब छोड़ने का निश्चय तोड़ने वाले पर विपत्ति आने की अफ़वाहें बताती हैं कि चरखा, नशाबंदी और आत्मानुशासन का उनका संदेश फैल रहा था और लोग इसे एक-दूसरे पर लागू करवा रहे थे। (4) किसानों की अपनी समझ: किसान गाँधी जी को कांग्रेस नेताओं की भाषा में नहीं, अपने विश्वासों के मुहावरे में समझ रहे थे। (5) परिस्थितियाँ: उनकी सात्विक जीवन शैली, धोती और चरखे जैसे प्रतीक, गरीबों से उनका तादात्म्य, उनके दौरों में जुटने वाली हज़ारों की भीड़, और इन कहानियों को दर्ज करने व फैलाने वाले स्थानीय समाचार-पत्रों ने ऐसे विश्वासों को संभव बनाया।
प्र. असहयोग क्या था? विभिन्न सामाजिक वर्गों ने आन्दोलन में किन विभिन्न तरीकों से भाग लिया, इसके बारे में पता लगाइये।
उत्तर: असहयोग क्या था: रॉलेट सत्याग्रह के बाद गाँधी जी द्वारा शुरू किया गया अभियान, जिसमें उपनिवेशवाद का ख़ात्मा चाहने वाले भारतीयों से आग्रह किया गया कि वे स्कूलों, कॉलेजों और न्यायालयों में न जाएँ तथा कर न चुकाएँ, यानी अंग्रेज़ी सरकार के साथ ‘(सभी) ऐच्छिक संबंधों का परित्याग’ करें। गाँधी जी ने कहा कि ठीक ढंग से असहयोग हो तो भारत एक वर्ष में स्वराज प्राप्त कर लेगा, और हिंदुओं-मुसलमानों को एक करने के लिए इसे खिलाफ़त आंदोलन से जोड़ा। लुई फिशर के अनुसार असहयोग ‘शांतिपूर्ण होने के लिए पर्याप्त नकारात्मक और प्रभावी होने के लिए पर्याप्त सकारात्मक’ था। फरवरी 1922 में चौरी-चौरा की हिंसा के बाद इसे वापस ले लिया गया।
विभिन्न वर्गों की भागीदारी: (1) विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में जाना छोड़ दिया; (2) वकीलों ने अदालत जाने से मना कर दिया; (3) श्रमिक-वर्ग हड़ताल पर गया: 1921 में 396 हड़तालें, 6 लाख श्रमिक, 70 लाख कार्यदिवसों का नुकसान; (4) उत्तरी आंध्र की पहाड़ी जनजातियों ने वन्य कानूनों की अवहेलना की; (5) अवध के किसानों ने कर नहीं चुकाए; (6) कुमाऊँ के किसानों ने औपनिवेशिक अधिकारियों का सामान ढोने से मना किया; (7) विदेशी कपड़ा इकट्ठा करके होलियों में जलाया गया (चित्र 11.4); (8) मुसलमान खिलाफ़त आंदोलन के माध्यम से जुड़े। इन वर्गों ने ‘असहयोग’ के आह्वान की व्याख्या प्रायः अपने हितों के अनुसार की, कभी-कभी स्थानीय राष्ट्रवादी नेतृत्व की अवज्ञा करते हुए भी।
प्र. औपनिवेशिक सरकार द्वारा नमक को क्यों नष्ट किया जाता था? महात्मा गाँधी नमक कर को अन्य करों की तुलना में अधिक दमनात्मक क्यों मानते थे?
उत्तर: नमक क्यों नष्ट किया जाता था: नमक के उत्पादन और बिक्री पर सरकार का एकाधिकार था। बिना कर (जो कभी-कभी नमक के मूल्य का चौदह गुना तक होता था) अदा किए गए नमक के प्रयोग को रोकने के लिए सरकार उस नमक को, जिसे वह लाभ पर नहीं बेच पाती थी, नष्ट कर देती थी; और जहाँ भी आस-पास के लोगों द्वारा अपने प्रयोग के लिए प्राकृतिक नमक उठा ले जाने की संभावना होती, वहाँ ऐसे अधिकारी नियुक्त कर दिए जाते जिनका ‘एकमात्र कार्य विनाश करना’ होता। कोंकण तट और दाण्डी में कई मन नमक नष्ट किया गया।
नमक कर अधिक दमनात्मक क्यों: (1) यह ‘राष्ट्र की अत्यधिक महत्वपूर्ण आवश्यकता’ पर कर था, जिसकी हर घर को, चाहे वह कितना भी गरीब हो, ज़रूरत थी; (2) यह जनता को अपने प्रयोग के लिए भी नमक बनाने से रोकता था; (3) प्रकृति ने जिसे बिना श्रम के उत्पादित किया, उसे राष्ट्रीय खर्चे से नष्ट किया जाता था; (4) भूखे लोगों से ‘हज़ार प्रतिशत से अधिक’ की उगाही होती थी। गाँधी जी ने नमक एकाधिकार को ‘चौतरफा अभिशाप’ कहा: यह लोगों को बहुमूल्य सुलभ ग्राम उद्योग से वंचित करता है, प्रकृति द्वारा बहुतायत में उत्पादित संपदा का विनाश करता है, इस विनाश से राष्ट्रीय खर्च बढ़ता है, और चौथा, इतना भारी कर वसूला जाता है।
प्र. इस भाषण के आधार पर बताइए कि गाँधी जी औपनिवेशिक राज्य को कैसे देखते थे?
उत्तर: (1) शक्तिशाली: ‘सरकार चाहती तो हम में से हरेक को गिरफ़्तार कर सकती थी’, और गाँधी जी को साबरमती में ही गिरफ़्तारी की आशंका थी। (2) नैतिक दबाव के प्रति संवेदनशील: उनके अनुसार वे दाण्डी तक ‘शांति और अहिंसा’ की शक्ति से पहुँचे; सरकार को शांति की सेना को गिरफ़्तार करने में ‘शर्म महसूस होती है’, और ‘अगर कोई व्यक्ति ऐसा काम करने में शर्मिंदा महसूस करता है जो उसके पड़ोसियों को भी रास नहीं आ सकता, तो वह एक शिष्ट-सभ्य व्यक्ति है’। (3) विश्व जनमत से प्रभावित: सरकार ने संभवतः ‘विश्व जनमत का खयाल करके ही’ उन्हें गिरफ़्तार नहीं किया। (4) हल्के व्यंग्य के साथ: वे सरकार को उसके ‘धैर्य और सहिष्णुता’ के लिए ‘बधाई’ देते हैं, पर साफ़ कहते हैं कि वे कल नमक कानून तोड़ेंगे, सरकार बर्दाश्त करे या न करे। (5) जागे हुए राष्ट्र को रोकने में असमर्थ: उन्हें और सारे नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया जाए तब भी आंदोलन चलेगा, क्योंकि ‘जब एक पूरा राष्ट्र उठ खड़ा होता है और आगे बढ़ने लगता है तो उसे नेता की जरूरत नहीं रह जाती’।
प्र. स्रोत 5 एवं 6 को पढ़िए। दमित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचिका के मुद्दे पर अम्बेडकर और महात्मा गाँधी के बीच काल्पनिक संवाद को लिखिए।
उत्तर (दोनों स्रोतों पर आधारित एक नमूना संवाद):
अम्बेडकर: महात्मा जी, दमित वर्ग अस्तित्व के संघर्ष में खुद को कायम नहीं रख सकते। जिस धर्म से वे बँधे हैं वह उन्हें सम्मानजनक स्थान देने की बजाय कोढ़ियों की तरह देखता है।
गाँधी जी: मैं मानता हूँ कि उनकी दशा कलंक है। पर ‘अस्पृश्यों’ के लिए पृथक निर्वाचिका से उनकी दासता स्थायी रूप ले लेगी। क्या आप चाहते हैं कि ‘अस्पृश्य’ हमेशा ‘अस्पृश्य’ ही बने रहें?
अम्बेडकर: वे दो वक्त की रोटी के लिए पूरी तरह सवर्ण हिंदुओं पर आश्रित हैं; उनके पास आजीविका का कोई स्वतंत्र साधन नहीं। हिंदू समाज ने उनके सामने खुलने वाली हर संभावना को बंद कर दिया है। वे अपनी रक्षा कैसे करेंगे?
गाँधी जी: पृथक निर्वाचिका से उनके प्रति कलंक का भाव और मज़बूत होगा और वे बाकी हिंदू समाज से हमेशा के लिए अलग रह जाएँगे। ज़रूरत इस बात की है कि ‘अस्पृश्यता’ का विनाश किया जाए, जो एक अड़ियल ‘श्रेष्ठ’ वर्ग द्वारा एक ‘कमतर’ वर्ग पर थोपी गई अवैध व्यवस्था है।
अम्बेडकर: जब तक वह दिन नहीं आता, उन्हें संगठित निरंकुशता का सामना करना है। कोई भी निष्पक्ष व्यक्ति मानेगा कि ऐसे समुदाय के लिए अपनी रक्षा का एकमात्र रास्ता यही है कि उसे राजनीतिक सत्ता में हिस्सा मिले।
गाँधी जी: और जब आप अस्पृश्यता की इस अवैध प्रथा को नष्ट कर देंगे, तो किसी को पृथक निर्वाचिका की आवश्यकता ही कहाँ रह जाएगी? आइए उन्हें समाज की मुख्यधारा में जोड़ने का काम करें, हमेशा के लिए अलग करने का नहीं।
अम्बेडकर: उनका एकीकरण उन्हीं लोगों की सद्भावना पर नहीं छोड़ा जा सकता जिन्होंने उनका दमन किया है। ऐसे अपंग बना दिए गए समुदाय के लिए राजनीतिक सत्ता ही एकमात्र रास्ता है।
प्र. इन पत्रों पर तीन प्रश्न: (क) इन पत्रों से इस बारे में क्या पता चलता है कि समय के साथ कांग्रेस के आदर्श किस तरह विकसित हो रहे थे? (ख) राष्ट्रीय आंदोलन में महात्मा गाँधी की भूमिका के बारे में इन पत्रों से क्या पता चलता है? (ग) क्या ऐसे पत्रों से कांग्रेस की आंतरिक कार्यप्रणाली तथा राष्ट्रीय आंदोलन के बारे में कोई विशेष दृष्टि प्राप्त होती है?
उत्तर: (क) कांग्रेस के आदर्शों का विकास: 1930 के दशक तक कांग्रेस में नए विचार आ रहे थे। समाजवाद और सोवियत संघ के प्रयोगों से प्रभावित नेहरू ने फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ बयान दिए और मज़दूरों व किसानों की माँगों का समर्थन किया, तथा गरीबी और बेरोज़गारी पर ज़ोर दिया। राजेन्द्र प्रसाद और सरदार पटेल के नेतृत्व में रूढ़िवादियों की शिकायत थी कि वे ऐसे विषय पर बोल रहे हैं जिसे कांग्रेस ने स्वीकार नहीं किया है और वे बहुमत के बजाय अल्पमत के प्रवक्ता की तरह काम कर रहे हैं। यानी कांग्रेस के आदर्श समाजवादियों और रूढ़िवादियों के बीच बहस और टकराव से, पर एक ‘बड़ी एकता’ को बचाए रखने के प्रयास के भीतर विकसित हो रहे थे।
(ख) गाँधी जी की भूमिका: वे मध्यस्थ थे जो कांग्रेस को एकजुट रखते थे। उन्होंने वर्धा में दोनों पक्षों से बात की, नेहरू के रेडिकल तेवरों पर अंकुश लगाया और प्रसाद व अन्य को नेहरू के नेतृत्व का महत्त्व समझाया; रूढ़िवादियों ने ‘महात्मा जी से लंबी बातचीत’ के बाद अपना इस्तीफ़ा वापस ले लिया। उन्होंने नेहरू को स्पष्ट पर स्नेहपूर्ण पत्र लिखा (‘मेरा प्यार, बापू’), साथियों की शिकायतें समझाईं, और उन्हें ‘काँटों का ताज’ (कांग्रेस की अध्यक्षता) पहने रहने और समिति की बैठकों में फिर से विनोदी बनने को कहा। नेहरू ने भी मामला सुलझाने के लिए उनका आभार माना।
(ग) विशेष दृष्टि: हाँ। पत्र सार्वजनिक रुख़ के पीछे की निजी भावनाएँ दिखाते हैं: आहत होना, गुस्सा, थकान, किनारे कर दिए जाने का डर। इनसे पता चलता है कि कार्यकारिणी समिति बहस, इस्तीफ़े की धमकियों और समझौते से काम करती थी, उद्योगपति भी उस पर प्रभाव डालने की कोशिश करते थे, और राष्ट्रीय आंदोलन कोई एक ठोस इकाई नहीं बल्कि विभिन्न समूहों और विचारधाराओं का गठबंधन था जो आपसी बातचीत से एक रहता था। पर ध्यान रहे कि निजी-सार्वजनिक का फ़र्क टूट भी जाता है: नेहरू ने स्वयं ये पत्र ए बंच ऑफ ओल्ड लेटर्स (1958) में प्रकाशित किए, और पत्र कभी-कभी भविष्य में छपने की संभावना को ध्यान में रखकर लिखे जाते हैं।
प्र. क्या आपको इस तसवीर और पुलिस की पाक्षिक रिपोर्टों में दी गई जानकारियों के बीच कोई अंतर्विरोध दिखायी देता है?
उत्तर: हाँ। चित्र 11.16 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान बम्बई में कांग्रेस के वॉलंटियरों की पुलिस से भिड़ंत दिखाई गई है: प्रतिबद्ध स्वयंसेवकों की भीड़ पुलिस से खुला टकराव कर रही है, जो सक्रिय जन-भागीदारी और प्रतिरोध को दर्शाता है। इसके विपरीत पाक्षिक रिपोर्टें यह मानने को तैयार नहीं थीं कि गाँधी जी की कार्रवाइयों के प्रति कोई व्यापक जनसमर्थन पैदा हो रहा है; वे यात्रा को एक नाटक, एक करतब, और शासन के अंतर्गत सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे लोगों को गोलबंद करने की हताश कोशिश बताती थीं, और लिखती थीं कि बैठकों में लोगों ने ‘कोई विशेष उत्साह नहीं दिखाया’। चित्र एक गंभीर जन-आंदोलन दिखाता है जिसे रिपोर्टें छोटा करके बताती थीं। (रिपोर्टें स्वयं भी दर्ज करती हैं कि बंबई में 12 मार्च को सुबह राष्ट्रीय झंडे को सलामी दी गई।)
प्र. पाक्षिक रिपोर्टों को ध्यान से पढ़िए। याद रखिए कि ये औपनिवेशिक गृह विभाग की गोपनीय रिपोर्टों के अंश हैं। इन रिपोर्टों में हमेशा केवल पुलिस की ओर से भेजी गई जानकारियों को ही नहीं लिखा जाता था। (1) स्रोत की पृष्ठभूमि से यह बात किस हद तक प्रभावित होती है कि इन रिपोर्टों में क्या कहा जा रहा है? उपरोक्त अंशों से उद्धरण लेते हुए अपने तर्क को स्पष्ट कीजिए। (2) क्या आपको लगता है कि गृह विभाग महात्मा गाँधी की संभावित गिरफ़्तारी के बारे में लोगों की सोच को अपनी रिपोर्टों में सही ढंग से दर्ज नहीं कर रहा था? यदि आपका उत्तर हाँ है, तो उसके समर्थन में कारण बताइए। 5 अप्रैल 1930 को दांडी में अपने भाषण में गाँधी जी ने गिरफ़्तारियों के सवाल पर जो कहा था, उसे दोबारा पढ़िए। (3) महात्मा गाँधी को क्यों गिरफ़्तार नहीं किया गया? (4) गृह विभाग लगातार यह क्यों कहता रहा कि दांडी यात्रा के प्रति लोगों में कोई उत्साह नहीं है।
उत्तर:
(1) स्रोत की पृष्ठभूमि का प्रभाव: ये औपनिवेशिक गृह विभाग की गोपनीय रिपोर्टें थीं, जो पुलिस की सूचनाओं पर आधारित थीं पर जिनमें यह भी दिख जाता था कि आला अधिकारी क्या देखते थे या क्या मानना चाहते थे। शासकों द्वारा शासकों के लिए लिखी गई ये रिपोर्टें आंदोलन को छोटा करके बताती हैं और ख़ुद को आश्वस्त करती हैं: ‘रबी की फसल अच्छी हुई है इसलिए फिलहाल किसान फसलों की कटाई में व्यस्त हैं। विद्यार्थी आने वाली परीक्षाओं की तैयारी में जुटे हैं’; ‘जो बैठकें आयोजित की गईं उनमें लोगों ने कोई विशेष उत्साह नहीं दिखाया और आम जनता पर कोई गहरा असर नहीं छोड़ा है’; ‘आम जनता उनकी यात्रा को नाटकीय और उनके कार्यक्रम को अव्यावहारिक मानती है’; ‘वास्तव में बहुत कम नमक बनाया गया है’। राष्ट्रवादी अख़बारों के प्रति शत्रुता भी दिखती है (‘केसरी प्रेस ने आक्रामक भाषा का प्रयोग किया है’)। फिर भी इन्हीं रिपोर्टों में जनसमर्थन के संकेत छूट जाते हैं: नागपुर की सभा में ‘3,000 से ज्यादा लोग जुटे थे’, ‘इन बैठकों में महिलाओं की संख्या बढ़ती जा रही है’, 12 मार्च को नागपुर में ‘ज्यादातर स्कूल-कॉलेज सूने दिखाई दिए’, और संयुक्त प्रांत के ग्यारह शहरों में ‘नमक कानून की खुलेआम अवहेलना की जा रही है’।
(2) गिरफ़्तारी के बारे में लोगों की सोच: हाँ, ऐसा लगता है कि गृह विभाग इसे पूरी तरह और सही ढंग से दर्ज नहीं कर रहा था। रिपोर्टें एक ओर लोगों की भावना को कम करके आँकती हैं (बंगाल: ‘फिलहाल ऐसी आग भड़कने के कोई गंभीर आसार दिखाई नहीं देते’; बिहार और उड़ीसा: गिरफ़्तारी की भविष्यवाणी सच न होने से ‘योजनाएँ धरी की धरी रह गई हैं’), और दूसरी ओर उनकी अपनी चिंता झलकती है: मद्रास की रिपोर्ट कहती है कि हिंदू जनता गाँधी जी को ‘अगाध श्रद्धा’ से देखती है, और बंगाल की रिपोर्ट मानती है कि उनके विरुद्ध कार्रवाई हुई तो ‘बंगाल के ज्वलनशील हालात में चिंगारी भड़क उठेगी’; केसरी के अनुसार गिरफ़्तारी से सरकार ‘राष्ट्र के कोप का भाजन’ बनेगी। गाँधी जी ने दाण्डी में स्पष्ट कहा था कि उन्हें गिरफ़्तारी की आशंका थी, पर यदि उन्हें और सारे नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया जाए तब भी आंदोलन चलेगा, क्योंकि ‘जब एक पूरा राष्ट्र उठ खड़ा होता है और आगे बढ़ने लगता है तो उसे नेता की जरूरत नहीं रह जाती’। यानी गिरफ़्तारी से आंदोलन रुकता नहीं, और भड़कता; रिपोर्टें इस सच्चाई को खुलकर स्वीकार नहीं करती थीं।
(3) गाँधी जी को क्यों गिरफ़्तार नहीं किया गया (यात्रा के दौरान): सरकार को भारत में जनता की प्रतिक्रिया और उन्हें शहीद बना देने का डर था; उसे विश्व जनमत की चिंता थी, क्योंकि यूरोप और अमेरिकी प्रेस यात्रा को व्यापक कवरेज दे रही थी (गाँधी जी ने कहा कि सरकार ने संभवतः ‘विश्व जनमत का खयाल करके ही’ यह फैसला लिया); और वायसराय इर्विन पहले इस कार्रवाई का महत्त्व समझ नहीं पाए, जबकि अधिकारी यह मानना चाहते थे कि यात्रा अपने आप ठंडी पड़ जाएगी। (बाद में लगभग 60,000 लोगों के साथ गाँधी जी को भी गिरफ़्तार किया गया।)
(4) ‘कोई उत्साह नहीं’ कहते रहने का कारण: अधिकारी स्वयं यह मानना चाहते थे, और अपने उच्चाधिकारियों को भी विश्वास दिलाना चाहते थे, कि ब्रिटिश शासन सुरक्षित है और जनता संतुष्ट है; व्यापक जनसमर्थन स्वीकार करने का अर्थ होता यह मानना कि वे आंदोलन को नियंत्रित नहीं कर पा रहे। अध्याय के अनुसार ये रिपोर्टें प्रायः उन अधिकारियों के डर और बेचैनी को दर्शाती हैं जो आंदोलन पर काबू नहीं कर पा रहे थे; राज्य जनता पर जितनी अधिक नज़र रखता था, अपने शासन के आधार को लेकर उतना ही अधिक चिंतित होता था।