एनसीईआरटी की पुस्तक विश्व इतिहास के कुछ विषय के अध्याय 1 “लेखन कला और शहरी जीवन” के अभ्यास के सभी छह प्रश्न, हिंदी संस्करण में छपे प्रश्नों के अनुसार (शब्द वही हैं, नुक़्ते इस वेबसाइट की एक जैसी वर्तनी के अनुसार लगाए गए हैं), और हर प्रश्न के नीचे पूरा आदर्श उत्तर। पाठ के बीच छपे क्रियाकलाप और चित्र-प्रश्न अंत में हल किए गए हैं। पहले ख़ुद लिखिए, फिर मिलाइए।
इस अध्याय के हिंदी और अंग्रेज़ी संस्करणों के अभ्यास प्रश्न पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं। यहाँ प्रश्न हिंदी संस्करण के अनुसार दिए गए हैं, और जहाँ अंग्रेज़ी संस्करण अलग है वहाँ उत्तर में उसकी जानकारी भी दे दी गई है।
1 उर्वरता, खाद्य उत्पादन और आरंभिक शहरीकरण
प्र. आप यह कैसे कह सकते हैं कि प्राकृतिक उर्वरता तथा खाद्य उत्पादन के उच्च स्तर ही आरंभ में शहरीकरण के कारण थे?
उत्तर: सच यह है कि अच्छी उपज नगर को संभव बनाती है, उसे जन्म नहीं देती, इसलिए इन्हें अकेला कारण नहीं कहा जा सकता। (अंग्रेज़ी संस्करण में यही प्रश्न निषेध के साथ छपा है, यानी “ये आरंभिक शहरीकरण के कारण नहीं थे, ऐसा हम क्यों कहते हैं”, और उत्तर की सामग्री दोनों में एक ही है।)
दक्षिणी मेसोपोटामिया की सिंचित खेती बेहद उपजाऊ थी, फिर भी वहाँ के गाँव हज़ारों साल तक अनाज उगाते रहे और उनमें से कोई नगर नहीं बना, और उत्तर-पूर्व के उपजाऊ मैदानों में तो लगभग 7000 ई.पू. से खेती हो रही थी।
नगर की असली पहचान उसकी अर्थव्यवस्था है। नगर में भोजन उगाना कई कामों में से सिर्फ़ एक होता है, उसके साथ व्यापार, निर्माण और सेवाएँ भी चलती हैं, और कोई भी अपने आप में पूरा नहीं रहता। मुद्रा गढ़ने वाला बारीक नक़्क़ाशी जानता है, पर काँसे के औज़ार और रंगीन पत्थर उसे कहीं और से लेने पड़ते हैं, और धातु का काम करने वाला ख़ुद खान खोदने नहीं निकलता। इसी विशेषज्ञता और आपसी निर्भरता को श्रम विभाजन कहते हैं, जो किताब के अनुसार शहरी-जीवन की विशेषता है, और इसे चलाने के लिए भंडारण, अभियानों की तैयारी और लिखित हिसाब की सामाजिक व्यवस्था चाहिए।
अध्याय एक दूसरी बात और ज़ोर से कहता है। दक्षिणी मेसोपोटामिया में अच्छा पत्थर, धातु और मज़बूत लकड़ी थी ही नहीं, इसलिए उसे अपने कपड़े और अनाज देकर तुर्की, ईरान और खाड़ी पार से लकड़ी, तांबा, टिन, चाँदी, सोना, सीपी और पत्थर मँगाने पड़े। यानी बहुतायत नहीं, कमी ही वह चीज़ थी जिसने नगर की बुनियाद बनने वाली व्यवस्था खड़ी करवाई। इसलिए ऊँचा खाद्य उत्पादन एक ज़रूरी पृष्ठभूमि थी, और असली कारण थे व्यापार, विशेषज्ञता और उनके लिए ज़रूरी संगठन।
2 आवश्यक दशाएँ और शहरों के विकास के परिणाम
प्र. आपके विचार से निम्नलिखित में से कौन-सी आवश्यक दशाएँ थीं जिनकी वजह से प्रारंभ में शहरीकरण हुआ था और निम्नलिखित में से कौन-कौन सी बातें शहरों के विकास के फलस्वरूप उत्पन्न हुईं?
(क) अत्यंत उत्पादक खेती,
(ख) जल-परिवहन,
(ग) धातु और पत्थर की कमी,
(घ) श्रम विभाजन,
(ङ) मुद्राओं का प्रयोग,
(च) राजाओं की सैन्य-शक्ति जिसने श्रम को अनिवार्य बना दिया।
उत्तर:
आवश्यक दशाएँ
(क) अत्यंत उत्पादक खेती। नगर में बहुत से लोग ऐसे रहते हैं जो अपना अनाज ख़ुद नहीं उगाते, इसलिए भरोसे लायक़ अतिरिक्त उपज पहले से होनी चाहिए। यह दशा है, कारण नहीं, क्योंकि गाँवों में सदियों तक अतिरिक्त उपज रही और नगर नहीं बने।
(ख) जल-परिवहन। भारवाहक पशु और बैलगाड़ियाँ लंबी यात्रा का चारा खुद खा जाती हैं, जबकि नावें और बजरे धारा या हवा से चलते हैं। मेसोपोटामिया की नहरें बस्तियों के बीच बहती थीं और व्यापार के रास्ते भी थीं। इस सस्ती ढुलाई के बिना नगर का व्यापार टिक नहीं सकता था।
(ग) धातु और पत्थर की कमी। यह वह दशा है जिसने संगठित व्यापार को मजबूर किया, इसलिए इसे शहरीकरण का सबसे सक्रिय कारण माना जाता है। दक्षिण को अपने कपड़े और उपज देकर दूर-दूर से लकड़ी, तांबा, टिन, चाँदी, सोना, सीपी और पत्थर मँगाने पड़े, और इतने बड़े व्यापार के लिए भंडारण, तालमेल तथा लिखित हिसाब चाहिए, जो लोगों को नगर में इकट्ठा करता है।
(घ) श्रम विभाजन। यह दशा और चालक शक्ति दोनों है। जैसे ही दक्ष लोग एक-दूसरे पर निर्भर हुए, पास-पास रहना मजबूरी बन गया, और यही आपसी निर्भरता नगर को आगे बढ़ाती है।
शहरों के विकास के फलस्वरूप उत्पन्न बातें
(ङ) मुद्राओं का प्रयोग। बेलनाकार मुद्रा गठरी की गाँठ या मर्तबान के मुँह पर लुढ़काकर सामान को छेड़छाड़ से बचाती थी, और मिट्टी की चिट्ठी पर लुढ़काने से भेजने वाले की पहचान का प्रमाण बन जाती थी। ये दोनों काम वहीं ज़रूरी हैं जहाँ अनजान लोग बार-बार लेन-देन करें, इसलिए मुद्रा शहरी जीवन की उपज है।
(च) राजाओं की सैन्य-शक्ति जिसने श्रम को अनिवार्य बना दिया। राजपद पहले से बसे और भरे-पूरे इलाक़े में ज़मीन और पानी के बार-बार के झगड़ों से निकला। एक बार बन जाने के बाद राजाओं ने युद्ध-बंदियों और स्थानीय लोगों को मंदिर या अपने लिए अनिवार्य श्रम पर लगाया और उन्हें राशन दिया। यह शहरी समाज ने पैदा किया, इसने शहरी समाज को पैदा नहीं किया।
ध्यान रहे: अंग्रेज़ी संस्करण में यही प्रश्न तीन वर्गों में बाँटने को कहता है, आवश्यक दशाएँ, कारण और परिणाम। उस विभाजन में (क) और (ख) आवश्यक दशाएँ, (ग) और (घ) कारण, तथा (ङ) और (च) परिणाम होंगे।
3 खानाबदोश पशुचारक और शहरी जीवन
प्र. यह कहना क्यों सही होगा कि खानाबदोश पशुचारक निश्चित रूप से शहरी जीवन के लिए ख़तरा थे?
उत्तर: (अंग्रेज़ी संस्करण में यह प्रश्न निषेध के साथ छपा है, यानी “चलते-फिरते पशुचारक शहरी जीवन के लिए ज़रूरी तौर पर ख़तरा क्यों नहीं थे”, इसलिए नीचे दोनों पक्ष दिए गए हैं और अंत में अध्याय की अपनी स्थिति भी।)
जिन बातों से उन्हें ख़तरा कहा जा सकता है
पानी तक पहुँचने के लिए खेत पार करता रेवड़ बोई हुई फ़सल उजाड़ सकता था। चलते-फिरते चरवाहे गाँव का जमा हुआ अनाज लूट सकते थे। बसे हुए समुदाय उन्हें कुछ रास्तों पर नहर के पानी तक जाने से रोकते थे, जिससे टकराव और बढ़ता था। यही वजह है कि मारी के राजा क़बीलों पर नज़र रखते थे और अधिकारियों की चिट्ठियों में रात के समय एक शिविर से दूसरे शिविर तक जाने वाले आग के संकेतों का ज़िक्र मिलता है, जिनसे एक अधिकारी को संदेह हुआ कि कोई छापा या हमला करने की योजना बन रही है।
जिन बातों से वे ज़रूरी तौर पर ख़तरा नहीं थे
दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत थी। पशुचारक बसे हुए इलाक़ों में छोटे जानवर, पनीर, चमड़ा और मांस लाते थे और बदले में अनाज तथा धातु के औज़ार ले जाते थे। कटी हुई फ़सल के खेत में बाँधे गए रेवड़ का गोबर खेत को उपजाऊ बनाता था। पशुचारक बसे हुए समाज की कमियाँ भी भरते थे, फ़सल काटने के मज़दूर और भाड़े के सैनिक बनकर।
अध्याय की अपनी स्थिति
मेसोपोटामिया के इतिहास में पश्चिमी मरुस्थल के खानाबदोश समूह बार-बार भीतर आते रहे, पहले चरवाहे, मज़दूर या सैनिक बनकर, और उनमें से कुछ इतने समृद्ध हो गए कि अपने राजवंश बना लिए, जैसे अक्कदी, एमोराइट, असीरियाई और आरामेइन (हिंदी पुस्तक की सूची में यहाँ “आर्मीनियन” छपा है, पर अंग्रेज़ी संस्करण के अनुसार ये आरामेइन (Aramaeans) थे, जिनकी भाषा अरामाइक थी)। मारी के अपने राजा एमोराइट थे, जो इस भूमि के परंपरागत देवताओं का सम्मान करते थे और साथ ही स्टेपी के देवता डैगन के लिए मारी में मंदिर भी बनवाते थे। अध्याय अलग-अलग लोगों को अपना लेने की इसी क्षमता को मेसोपोटामियाई सभ्यता की ताक़त मानता है, इसलिए संतुलित उत्तर यही है कि टकराव सचमुच था, पर पशुचारक नगर के लिए ज़रूरी तौर पर ख़तरा नहीं थे।
4 पुराने मंदिर घर जैसे क्यों रहे होंगे
प्र. आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि पुराने मंदिर बहुत कुछ घर जैसे ही होंगे?
उत्तर: क्योंकि उन्हें ठीक वही समझा भी जाता था। मंदिर किसी देवता का निवास था, जैसे उर का चंद्र देवता या प्रेम और युद्ध की देवी इन्नाना, और घर उसी के लिए बनाया जाता है जिसे उसमें रहना हो। इसीलिए लगभग 5000 ई.पू. का सबसे पुराना ज्ञात मंदिर कच्ची ईंट का एक छोटा-सा पूजा-स्थल था, और अध्याय बताता है कि कुछ प्रारंभिक मंदिर साधारण घरों से अलग क़िस्म के नहीं होते थे।
शुरू से सिर्फ़ एक बात उसे अलग करती थी: उसकी बाहरी दीवार नियमित अंतराल पर भीतर-बाहर जाती थी, जो किसी आम घर की दीवार में नहीं होता था। बाक़ी सब कुछ समय के साथ आया। चुने हुए स्थानों पर उसे बार-बार बनाया गया, वह समय के साथ बड़ा होता गया, और उसने ऐसे काम संभाल लिए जो किसी घर के नहीं थे: देवता को आस-पास के खेतों, मत्स्य क्षेत्रों और पशुओं का स्वामी माना जाने लगा, वहाँ तेल पेरने, अनाज पीसने, सूत कातने और बुनने का काम होने लगा, और समुदाय के लिखित अभिलेख भी वहीं रखे जाने लगे। जो मंदिर देवता के घर के रूप में शुरू हुआ था, वह पूरे नगर की सबसे बड़ी संस्था बन गया।
5 नयी संस्थाएँ और राजा की पहल
प्र. शहरी जीवन शुरू होने के बाद कौन-कौन सी नयी संस्थाएँ अस्तित्व में आईं? आपके विचार से उनमें से कौन-सी संस्थाएँ राजा की पहल पर निर्भर थीं।
उत्तर:
शहरी जीवन के साथ आईं नयी संस्थाएँ
मंदिर, जो नगर का आर्थिक और धार्मिक केंद्र बना; राजपद; राशन पर टिका अनिवार्य श्रम; संगठित लंबी दूरी का व्यापार; लिखित अभिलेख और लेखकों की पाठशालाएँ; दस्तकारों का श्रम विभाजन; तथा मालिकाना हक़ और प्रामाणिकता दिखाने वाली मुद्राएँ।
जो राजा की पहल पर निर्भर थीं
1. अनिवार्य श्रम। युद्ध-बंदियों और स्थानीय लोगों को सीधे मंदिर या शासक के लिए काम पर लगाया जाता था। यह खेती पर लगने वाला कर नहीं, ज़बरदस्ती की सेवा थी, और मज़दूरों को मिलने वाले अनाज, कपड़े तथा तेल की सैकड़ों राशन-सूचियाँ बची हैं। ऐसा दबाव सैन्य ताक़त वाला ही डाल सकता था, और इसके बिना यह समझाया ही नहीं जा सकता कि एक मंदिर बनाने में 1,500 आदमी रोज़ दस घंटे पाँच साल तक कैसे लगे रहे।
2. संगठित लंबी दूरी का व्यापार। एनमर्कर वाली सुमेरियन कविता साफ़ कहती है कि उरुक के इस प्राचीन शासक ने सुमेर का पहला व्यापार संगठित किया और लाजवर्द पत्थर तथा बहुमूल्य धातुओं के लिए सात पहाड़ी शृंखलाएँ पार करके अरट्टा तक दूत भेजा। इतने बड़े अभियानों के लिए अधिकार, रक्षक और साधन किसी एक घर या कारख़ाने के बस की बात नहीं थी।
3. नगर की रक्षा-दीवार और विशाल निर्माण। उरुक ने बहुत जल्दी रक्षा-दीवार बनवाई, और गिल्गेमिश पक्की ईंट की नींव वाली जिस नगर-दीवार के लिए याद किया जाता है वह भी इसी तरह का काम है। दीवारें, मंदिर और राजमहल संगठित श्रम के काम हैं, यानी बात फिर पहले बिंदु पर लौट आती है।
4. लेखन, जैसा वे ख़ुद मानते थे। उनकी परंपरा में मिट्टी पर पहली बार शब्द लिखने का श्रेय एनमर्कर को है। ऐतिहासिक सच जो भी हो, इससे इतना ज़रूर पता चलता है कि वे हिसाब रखने को भी राजपद की ही देन मानते थे।
जो उसकी पहल पर निर्भर नहीं थीं
5. मंदिर। वह राजपद से पुराना है। दक्षिण में लगभग 5000 ई.पू. से कच्ची ईंट का छोटा पूजा-स्थल मौजूद था, राजाओं के होने से बहुत पहले, और वह अपने ही विकास से नगर की सबसे बड़ी संस्था बना। सफल योद्धा नेता उसे लूट से सजाते थे और उसी से उन्हें प्रतिष्ठा मिलती थी, यानी मंदिर ने राजा बनाए, राजा ने मंदिर नहीं।
6. श्रम विभाजन और मुद्राओं का प्रयोग। ये शहरी अर्थव्यवस्था के अपने कामकाज से निकले। दक्षों को एक-दूसरे की ज़रूरत थी, और मुद्रा वहीं चाहिए थी जहाँ अनजान लोग सामान और चिट्ठियाँ बदलते हों।
निष्कर्ष
7. राजा की पहल पर वही संस्थाएँ टिकी थीं जिनमें बल या बड़े पैमाने का तालमेल चाहिए, यानी अनिवार्य श्रम, संगठित व्यापार और विशाल निर्माण। मंदिर और दस्तकारी समुदाय के जीवन से उपजे, और राजाओं ने बाद में उन्हें अपनाकर और बड़ा किया।
6 पुरानी कहानियों से मिलने वाली झलक
प्र. किन पुरानी कहानियों से हमें मेसोपोटामिया की सभ्यता की झलक मिलती है?
उत्तर:
1. गिल्गेमिश महाकाव्य। बारह पट्टिकाओं पर लिखा यह महाकाव्य उरुक के उस वीर की कथा है जो अपने सबसे प्रिय मित्र की मृत्यु से हिलकर अमरता का रहस्य खोजने निकला, दुनिया को घेरने वाली मानी जाने वाली जलराशियों तक पार कीं, और ख़ाली हाथ लौटा। उसे सांत्वना अपने ही बनवाए नगर की दीवार पर टहलते हुए, उसकी पक्की ईंट की नींव निहारते हुए मिली। क़बीलाई समाज का नायक इस विचार से संतोष पाता कि उसके बेटे उसके बाद जीवित रहेंगे; गिल्गेमिश को संतोष उस नगर से मिलता है जो उसके लोगों ने मिलकर बनाया। इससे पता चलता है कि मेसोपोटामियावासी के लिए असली विरासत नगर थी, वंश नहीं।
2. एनमर्कर और अरट्टा के स्वामी की कथा। इस लंबी सुमेरियन कविता में उरुक का प्राचीन शासक सुमेर का पहला व्यापार संगठित करता है और फिर, जब दूत इतना चकरा जाता है कि अपनी बात सही तरह व्यक्त नहीं कर पाता और संदेशों का घालमेल कर देता है, मिट्टी की पट्टिका बनाकर शब्द लिख देता है। इससे साफ़ है कि वे व्यापार और लेखन दोनों को राजपद की देन मानते थे, और उसी कविता में लेखन को पड़ोसी अरट्टा पर अपनी श्रेष्ठता का चिह्न भी बताया गया है।
3. जलप्लावन की कथा। मेसोपोटामिया की परंपरा में इस कथा का नायक ज़िउसूद्र या उतनापिष्टिम है, और वह बाईबल की नोआ वाली कथा से इतनी मिलती-जुलती है कि 1873 में एक ब्रिटिश अख़बार ने वह पट्टिका ढूँढ़ने के लिए ब्रिटिश म्यूज़ियम के पूरे अभियान का ख़र्च उठाया। 1960 के दशक तक विद्वान मान चुके थे कि ऐसी कथाएँ शब्दशः सच नहीं, बल्कि ऐतिहासिक बदलावों को याद रखने का तरीक़ा हैं।
4. उजड़े नगरों का विलाप। मेसोपोटामियावासियों को अलग-अलग समुदायों और संस्कृतियों के लोगों के साथ रहने पर गर्व था, और जब कोई नगर युद्ध में उजड़ता तो वे उस पर शोक-कविताएँ लिखते थे। इससे उनके शहरी जीवन के प्रति लगाव का पता चलता है।
5. अतीत को सहेजने की आदत। गिल्गेमिश महाकाव्य जैसी रचनाओं की नक़लों पर नक़ल करने वाले का नाम और तारीख़ दर्ज रहती थी, और असुरबनिपाल ने निनवै के अपने पुस्तकालय के लिए पुरानी पट्टिकाएँ ढुँढ़वाने दक्षिण में लेखक भेजे। इससे एक ऐसी सभ्यता दिखती है जो अपनी ही प्राचीनता के प्रति सचेत थी।
निष्कर्ष
6. हिसाब की पट्टिकाएँ बताती हैं कि उनके पास क्या था और वे क्या बेचते-ख़रीदते थे। ये कहानियाँ बताती हैं कि वे क्या सोचते और किसे बड़ा मानते थे: राजपद की उनकी समझ, नगरों का उनका गर्व, लेखन की उनकी व्याख्या, और आपदा की उनकी स्मृति।
7 पाठ के बीच के क्रियाकलाप और चित्र-प्रश्न
अभ्यास के छह प्रश्नों के अलावा पुस्तक में खंड एक की भूमिका में एक विचारणीय प्रश्न, कालक्रम एक के साथ एक क्रियाकलाप, अध्याय के बीच चार क्रियाकलाप और तीन चित्रों के नीचे प्रश्न छपे हैं। नीचे इन सबके उत्तर उसी क्रम में दिए गए हैं जिस क्रम में ये पुस्तक में आते हैं।
प्र. एक विचारणीय प्रश्न यह है कि यदि लेखन कला का विकास नहीं हुआ होता, तो इन शहरों में विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ कैसे संभव होतीं?
उत्तर: लेखन के बिना इन शहरों की ज़्यादातर गतिविधियाँ इतने बड़े पैमाने पर संभव ही नहीं होतीं। लेखन की शुरुआत लगभग 3200 ई.पू. में इसीलिए हुई कि शहरी जीवन में लेन-देन अलग-अलग समय पर होते थे और उनमें बहुत से लोग और तरह-तरह का माल शामिल रहता था: उरुक की लगभग 5,000 सबसे पुरानी पट्टिकाएँ मंदिरों में आने-जाने वाले बैलों, मछलियों और रोटियों की सूचियाँ हैं। मंदिर अनाज, हल के बैलों, रोटी, जौ की शराब और मछली के बँटवारे का लिखित हिसाब रखता था, और काम पर लगाए गए लोगों को दिए गए अनाज, कपड़े या तेल की सैकड़ों राशन-सूचियाँ मिली हैं। लेखन से ज़मीन के हस्तांतरण को क़ानूनी मान्यता मिलती थी, राजाओं और अधिकारियों के बीच पत्र-व्यवहार चलता था (मारी के अधिकारी पशुचारकों के शिविरों की ख़बर पत्रों से ही देते थे), राजाओं के कारनामे और प्रथागत क़ानूनों में किए गए बदलाव दर्ज होते थे, और गणित तथा खगोलविद्या का वह ज्ञान बन पाया जिस पर आगे के विद्वानों ने काम किया। कहानियाँ ज़बानी चल सकती हैं, पर हिसाब, अनुबंध, पत्र और विज्ञान के लिए लिखित पाठ चाहिए।
प्र. प्रत्येक छह खानों से एक तिथि को लीजिए और उस क्षेत्र में रहने वाले पुरुषों और स्त्रियों के लिए उस तिथि की प्रक्रिया/घटना का क्या महत्त्व रहा होगा, इस पर विचार-विमर्श कीजिए।
उत्तर: हर खाने से एक-एक प्रविष्टि लेकर एक संभावित उत्तर:
अफ़्रीका, 3000-2000 ई.पू.: हल द्वारा कृषि, प्रथम राजवंश, नगर, पिरामिड, कैलेंडर, चित्रात्मक लिपि, पैपाइरस पर लेखन (मिस्र)। हल से एक परिवार पशुओं की ताक़त लगाकर ज़्यादा ज़मीन जोत सकता था; राज्यों और नगरों के साथ कर, मंदिर और महल के काम, और लिपिक जैसे नए पेशे आए; कैलेंडर से बुआई और त्योहारों की योजना बनाना आसान हुआ।
यूरोप, 6000-5000 ई.पू.: गेहूँ और जौ की खेती (यूनान)। अनाज उगाने का मतलब था फ़सल पकने तक एक जगह रुकना, ज़्यादा स्थायी घर बनाना और अनाज जमा करना, यानी पुरुषों और स्त्रियों दोनों का रोज़ का काम संग्रह और शिकार से हटकर खेती, भंडारण और भोजन तैयार करने की ओर गया।
एशिया, 4000-3000 ई.पू.: कुम्हार के चाक का प्रयोग, यातायात के लिए पहिए का प्रयोग (3600 ई.पू.), लेखन का प्रयोग (3200 ई.पू., मेसोपोटामिया), काँसे का प्रयोग। अब बर्तन जल्दी और बड़ी संख्या में बन सकते थे, गाड़ियाँ ज़्यादा बोझ ढो सकती थीं और लेखन से लिपिक का नया काम बना, इसलिए ज़्यादा लोग केवल खेती के बजाय शिल्प और व्यापार से जीने लगे।
दक्षिण एशिया, 7000-6000 ई.पू.: प्रारंभिक कृषि-बस्तियाँ (बलूचिस्तान)। पशु पालने वाले किसानों के गाँवों का अर्थ था स्थायी जीवन, पक्के ठिकाने और जमा किया हुआ अनाज, और उसी लंबी प्रक्रिया की शुरुआत जो आगे चलकर हड़प्पा के नगरों तक पहुँची।
अमरीका, 3000-2000 ई.पू.: गिनि पिग और टर्की को पालतू बनाया गया, मक्के की खेती। भरोसे की अनाज-फ़सल और पालतू पशुओं से परिवारों को भोजन की स्थिर आपूर्ति मिली और शिकार पर निर्भरता घटी।
आस्ट्रेलिया/प्रशांत महासागरीय द्वीप, 1200-1100 ई.पू.: पोलिनेशिया और माइक्रोनेशिया में बस्तियाँ। पुरुषों और स्त्रियों को समुद्र में लंबी यात्राएँ करके द्वीपों पर नए समुदाय बसाने पड़े, और वे अपने साथ पौधे, पशु और हुनर ले गए।
यह विचार-विमर्श का प्रश्न है, इसलिए कोई भी छह प्रविष्टियाँ ली जा सकती हैं, बस हर खाने से एक हो और रोज़मर्रा के जीवन पर उसका असर समझाया जाए।
प्र. जलप्लावन के बारे में अनेक समाजों में अपनी-अपनी पुराण-कथाएँ प्रचलित हैं। ये कुछ ऐसे तरीके हैं जो इतिहास में हुए महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों की यादों को अमिट रखते हुए अभिव्यक्त करते हैं। इनके बारे में कुछ और जानकारी का पता लगाएँ और यह बताएँ कि जलप्लावन से पहले और उसके बाद का जनजीवन कैसा रहा होगा।
उत्तर: अध्याय ख़ुद ऐसी दो कथाएँ देता है। बाईबल के अनुसार जलप्लावन पृथ्वी पर संपूर्ण जीवन को नष्ट करने वाला था, किंतु परमेश्वर ने जलप्लावन के बाद भी जीवन को सुरक्षित रखने के लिए नोआ नाम के एक मनुष्य को चुना। नोआ ने एक बहुत विशाल नाव बनाई और उसमें सभी जीव-जंतुओं का एक-एक जोड़ा रख लिया; जलप्लावन में बाक़ी सब नष्ट हो गया, पर नाव में रखे सभी जोड़े बच गए। मेसोपोटामिया के परंपरागत साहित्य में भी ऐसी ही एक कहानी है, जिसके मुख्य पात्र को ज़िउसूद्र या उतनापिष्टिम कहा गया है। 1873 में एक ब्रिटिश समाचार-पत्र ने ब्रिटिश संग्रहालय के उस खोज-अभियान का ख़र्च उठाया जिसमें जलप्लावन की कहानी वाली पट्टिका खोजी जानी थी। दूसरी संस्कृतियों में भी ऐसी कथाएँ हैं, जैसे भारत की मनु की कथा, जिसमें एक मछली (मत्स्य) मनु को महाप्रलय से बचाती है। ऐसी कथाओं में जलप्लावन से पहले का जीवन प्रायः एक बिगड़ी हुई दुनिया के रूप में दिखाया जाता है जो बहा दी गई, और उसके बाद का जीवन कुछ बचे हुए लोगों द्वारा की गई एक नई शुरुआत के रूप में, जो मानव समाज को फिर से बसाते हैं। जैसा अध्याय बताता है, 1960 के दशक तक यह समझ लिया गया था कि ऐसी कहानियाँ अक्षरशः सही नहीं हैं, बल्कि इतिहास में हुए महत्त्वपूर्ण परिवर्तनों को अपने ढंग से अभिव्यक्त करती हैं, जैसे फ़रात जैसी नदियों की वास्तविक बाढ़ें, जो कभी फ़सलें डुबो देती थीं और कभी अपना रास्ता ही बदल लेती थीं।
प्र. क्या शहरी जीवन धातुओं के इस्तेमाल के बिना संभव होता? इस विषय पर चर्चा कीजिए।
उत्तर: मेसोपोटामिया में जिस रूप में शहरी जीवन विकसित हुआ, वह धातुओं के बिना लगभग असंभव होता। सबसे पुराने नगर काँस्य युग के हैं, लगभग 3000 ई.पू. के, और अध्याय बताता है कि सही-सही बढ़ईगीरी, मनकों में छेद करने, पत्थर की मुद्राएँ तराशने और जड़ाऊ फ़र्नीचर के लिए सीपी काटने के लिए धातु के औज़ार ज़रूरी थे, और भालों की नोक जैसे हथियार भी काँसे के होते थे। मुद्रा तराशने वाले को काँसे के ऐसे औज़ार चाहिए थे जो वह ख़ुद नहीं बना सकता था, यानी विशेषज्ञता, जो शहरी जीवन की पहचान है, धातु पर टिकी थी। ताँबा और टिन पाने के लिए दूर-दराज़ का संगठित व्यापार करना पड़ता था, जिसके लिए भंडारण, हिसाब-किताब और अभियान भेज सकने वाले नेता चाहिए थे। इसलिए धातुएँ नगरों के लिए सिर्फ़ उपयोगी नहीं थीं; उन्हें पाने की ज़रूरत ने ही वह संगठन खड़ा करने में मदद की जिस पर शहरी जीवन टिका था। धातु के बिना एक बड़ा गाँव बस सकता था, पर मेसोपोटामिया के नगर जैसी विशेषज्ञता और व्यापार वाली अर्थव्यवस्था नहीं।
प्र. पत्थर लाने से लेकर इस मूर्ति के निर्माण में और किन विशेषज्ञों का योगदान रहा होगा। उनकी सूची बनाइए।
उत्तर: वार्का शीर्ष, स्त्री का यह सिर, 3000 ई.पू. में उरुक नगर में सफ़ेद संगमरमर को तराशकर बनाया गया था, ऐसे कठोर पत्थर से जिसे काफ़ी दूर से लाना पड़ा होगा, और उसकी आँखों और भौंहों में लाजवर्द, सफ़ेद सीपी और काले डामर की जड़ाई रही होगी। इसके निर्माण में ये विशेषज्ञ लगे होंगे: खान से पत्थर काटने वाले; दूर देशों से पत्थर, लाजवर्द और सीपी लाने वाले व्यापारी और अभियान का प्रबंध करने वाले; माल ढोने वाले नाविक या भारवाहक पशुओं के चालक; काँसे के औज़ार बनाने वाले धातुकर्मी; लोहारों के लिए ईंधन देने वाले कोयला बनाने वाले; चेहरा तराशने वाला मूर्तिकार; लाजवर्द, सीपी और डामर काटकर जड़ने वाले कारीगर; और सामग्री तथा मज़दूरों के राशन का हिसाब रखने वाले लिपिक या मंदिर के अधिकारी।
प्र. प्रत्येक की छाप का विवरण दें। क्या उन पर कीलाकार लिपि अंकित है?
उत्तर: पुस्तक के चित्र की पाँचों छापों में: पहली (ऊपर बाएँ) में पौधों के बीच आकृतियाँ जानवरों से जूझ रही हैं, यानी संघर्ष का दृश्य है; दूसरी (ऊपर दाएँ) में पौधों के बीच बकरी जैसे जानवर उछल रहे हैं; तीसरी (बीच में) में मानव आकृतियाँ मवेशियों के साथ हैं; चौथी (नीचे बाएँ) में दो ऊँची इमारतों के अग्रभाग के बीच जानवर हैं और नीचे पानी की लहरदार रेखा है; पाँचवीं (नीचे दाएँ) में मवेशियों का लंबा जुलूस पंक्तियों में चल रहा है और बीच-बीच में सरकंडों से बने ढाँचे हैं। हर चित्र बिना टूटे लगातार चलता है, क्योंकि मोहर को गीली मिट्टी पर घुमाया जाता था। इन पाँचों छापों में से किसी पर भी कीलाकार लिपि की साफ़ पंक्ति नहीं दिखती; ये चित्र-दृश्य हैं। अध्याय बताता है कि मोहरों पर कभी-कभी ही लेख होता था, जैसे मालिक का नाम, उसके इष्टदेव का नाम या उसका पद।
प्र. क्या आप चित्र में टेढ़ी-मेढ़ी गलियों के अलावा, दो या तीन बंद गलियाँ भी खोज सकते हैं?
उत्तर: हाँ। उर के रिहायशी इलाक़े (लगभग 2000 ई.पू.) के नक़्शे में टेढ़ी-मेढ़ी गलियों के साथ चलते हुए वे छोटी गलियाँ देखिए जो उनसे निकलती हैं और किसी दूसरी गली में निकले बिना घरों की दीवारों पर जाकर ख़त्म हो जाती हैं। ऐसी दो-तीन बंद गलियाँ पहचानी जा सकती हैं, जिनसे केवल उनके किनारे के कुछ घरों तक पहुँचा जा सकता है। यह अध्याय की इस बात से मेल खाता है कि सँकरी, टेढ़ी-मेढ़ी गलियाँ और घरों के अनियमित भूखंड नगर-नियोजन के अभाव को दिखाते हैं, और पहिए वाली गाड़ियाँ बहुत से घरों तक नहीं पहुँच सकती थीं, इसलिए अनाज और ईंधन गधों पर लादकर आता था।
प्र. चित्र में प्रवेश द्वार से भीतरी आँगन तक के मार्ग का पता लगाइए। आप क्या सोचते हैं कि भंडारगृह में क्या रखा जाता होगा? रसोईघर की पहचान कैसे की जा सकती है?
उत्तर: मारी में ज़िमरीलिम के राजमहल का सिर्फ़ एक ही प्रवेश द्वार था, जो उत्तर की ओर था। प्रवेश द्वार से आगंतुक पहले बड़े, खुले और सुंदर फ़र्श वाले बाहरी आँगन (131) में आता था, जिसके पास दीवार-चित्रों वाला सभागृह (132) था, जहाँ राजा विदेशी गणमान्य लोगों और अपनी प्रजा से मिलता था; वहाँ से रास्ता आगे भीतरी आँगन (106) तक जाता था, जिसमें सफ़ेद पत्थर जड़ा था और जो सिंहासन कक्ष के पास था; यहीं राजा संभवतः अपने साथियों के साथ भोजन करता था। भंडारगृहों में राजा की मेज़ के लिए हर रोज़ पेश की जाने वाली भारी मात्रा की खाद्य-सामग्री, यानी आटा, रोटी, मांस, मछली, फल, मदिरा और बियर, साथ ही अनाज, तेल और मदिरा के मटके, और महल की कार्यशालाओं का कच्चा माल तथा बना हुआ सामान, विशेषकर क़ीमती धातुओं के आभूषण, रखे जाते होंगे। चित्र में रसोईघर की पहचान उसकी एक ऊँचे चबूतरे पर बनी चूल्हों या भट्ठियों की पंक्ति से होती है, जिनमें आग के लिए मुँह बने हैं; ऐसा ढाँचा केवल खाना पकाने के काम आता है।
प्र. आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि असुरबनिपाल और नैबोनिडस ने मेसोपोटामिया की प्राचीन परंपराओं की कद्र की?
उत्तर: दोनों शासकों ने अपनी सत्ता को एक प्राचीन और सम्मानित अतीत से जोड़ा। असीरियाई राजा मूल रूप से बाहर से आए थे और वे दक्षिणी क्षेत्र बेबीलोनिया को उच्च संस्कृति का केंद्र मानते थे; असुरबनिपाल ने निनवै में इतिहास, महाकाव्य, शकुन-साहित्य, ज्योतिष, स्तुतियों और कविताओं की पट्टिकाएँ जमा कीं और उन्हें अपने इष्टदेव नाबू के मंदिर के पुस्तकालय में रखा, जैसा उसने लिखा, “अपने जीवन के लिए, अपनी आत्मा के कल्याण के लिए और अपने शाही सिंहासन की नींव को मजबूत बनाए रखने के लिए”। स्वतंत्र बेबीलोन के अंतिम शासक नैबोनिडस ने सपने के बाद उर की उच्च महिला पुरोहित का भुला दिया गया पद फिर शुरू किया, और यह जानने के लिए कि उसकी वेशभूषा कैसी हो, एक प्राचीन पट्टलेख का सहारा लिया; उसने अक्कद के राजा सारगोन की टूटी मूर्ति की मरम्मत भी करवाई, “देवताओं के प्रति भक्ति और राजा के प्रति अपनी निष्ठा के कारण”। पुरानी परंपराओं की कद्र करके वे अपनी धर्मनिष्ठा दिखाते थे, ख़ुद को सुदूर अतीत के महान राजाओं से जोड़ते थे और अपने शासन को उचित तथा इस भूमि के लंबे इतिहास में जड़ें रखने वाला सिद्ध करते थे।