1मेसोपोटामिया की शुरुआत : भूमि, नाम और खोज
1.1 घुमंतू जीवन से बसे जीवन तक
नगर अचानक नहीं बन गए। नगरों से पहले, इंसान लाखों साल तक शिकार करके और जंगली पौधे बटोरकर ही जीता था, और एक जगह से दूसरी जगह घूमता रहता था। यह अध्याय इसी के बाद की कहानी है, जब यह सब बदलना शुरू हुआ।
लगभग 10,000 साल पहले लोगों ने धीरे-धीरे खाना बटोरना छोड़कर उसे उगाना शुरू किया, यानी बसी हुई खेती। पश्चिम एशिया में गेहूँ, जौ, मटर और दालें उगाई गईं; पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया में बाजरा और चावल। इसी दौर में भेड़, बकरी, गाय, सूअर और गधे को पालतू बनाया गया। इसके कुछ समय बाद, लगभग 5,000 साल पहले, बैल और गधों को हल और गाड़ियों में जोता जाने लगा।
कुछ विद्वान इस पूरे बदलाव को “क्रांति” कहते हैं, क्योंकि कुछ ही हज़ार वर्षों में इंसान का जीना-रहना पहचान में न आने लायक़ बदल गया। पहले नगरों के बनते ही यह रफ़्तार और तेज़ हो गई।
1.2 भूमि और उसके बदलते नाम
शहरी जीवन की शुरुआत सबसे पहले मेसोपोटामिया में हुई, यानी फ़रात और दज़ला नदियों के बीच की भूमि में, जो आज इराक़ गणराज्य का हिस्सा है। मेसोपोटामिया की सभ्यता अपनी समृद्धि, शहरी जीवन, विशाल और समृद्ध साहित्य, तथा गणित और खगोलशास्त्र के लिए जानी जाती है।
मेसोपोटामिया यूनानी शब्दों मेसोस यानी “मध्य”, और पोटैमोस यानी “नदी” से बना है। यह दो नदियों, फ़रात और दज़ला, के बीच की भूमि है।
2000 ई.पू. के बाद मेसोपोटामिया का लेखन और साहित्य पूर्वी भूमध्यसागर, उत्तरी सीरिया और तुर्की तक फैल गया, और इस पूरे इलाक़े के राज्य आपस में और मिस्र के फ़िरौन को भी मेसोपोटामिया की भाषा और लिपि में ही चिट्ठियाँ लिखते थे। लेकिन इस भूमि का अपना नाम, और इसकी मुख्य भाषा, सदियों के साथ बदलती रही।
| काल | भूमि का नाम | मुख्य भाषा |
|---|---|---|
| सबसे पुराना लिखित इतिहास | सुमेर और अक्कद (नगरीकृत दक्षिण) | सुमेरियन, इस भूमि की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा |
| लगभग 2400 ई.पू. से | सुमेर और अक्कद | अक्कदी भाषा धीरे-धीरे सुमेरियन की जगह लेती है, और सिकंदर के समय (336-323 ई.पू.) तक चलती है |
| 2000 ई.पू. के बाद | बेबीलोनिया, जब बेबीलोन एक महत्वपूर्ण नगर बना | अक्कदी जारी रहती है; 1400 ई.पू. से अरामाइक भाषा धीरे-धीरे आने लगती है |
| लगभग 1100 ई.पू. से | असीरिया, जब असीरियनों ने उत्तर में अपना राज्य बनाया | 1000 ई.पू. के बाद अरामाइक व्यापक रूप से बोली जाने लगती है, और आज भी इराक़ के कुछ हिस्सों में बोली जाती है |
सुमेर/अक्कद → अक्कदी भाषा → बेबीलोनिया → असीरिया
इसी क्रम में पढ़ें तो प्राचीन मेसोपोटामिया का पूरा राजनीतिक इतिहास चार नामों में समा जाता है।
1.3 अतीत की खुदाई : पुरातत्व और बाईबल
मेसोपोटामिया में पुरातत्व की शुरुआत 1840 के दशक में हुई। उरुक और मारी जैसे स्थलों पर दशकों तक खुदाई चलती रही, इतनी लंबी कि भारत के किसी भी स्थल में ऐसा नहीं हुआ। इसी वजह से इतिहासकार सैकड़ों मेसोपोटामियाई इमारतों, मूर्तियों, गहनों, क़ब्रों, औज़ारों और मुद्राओं के साथ-साथ हज़ारों लिखित पट्टिकाओं का भी अध्ययन कर पाते हैं।
यूरोपीय लोगों की मेसोपोटामिया में दिलचस्पी सबसे पहले बाईबल की वजह से बनी। बाईबल के पुराने नियम की उत्पत्ति नामक किताब में ‘शिनार’ (सुमेर) का उल्लेख ईंटों से बने नगरों की भूमि के रूप में मिलता है। शुरुआती यात्री और विद्वान मेसोपोटामिया को अपनी पुरखों की धरती मानते थे, और जब पुरातात्विक खुदाई शुरू हुई, तो पहला मक़सद यही था कि बाईबल की कहानियों को शब्दशः सच साबित किया जाए।
बाईबल के अनुसार एक बड़ी जलप्रलय पूरी धरती के जीवन को मिटाने वाली थी, लेकिन नूह ने एक नाव बनाकर हर जानवर की एक जोड़ी बचा ली। मेसोपोटामिया की परंपरा में भी बिल्कुल ऐसी ही एक कथा है, बस नूह की जगह इसमें ज़िउसूद्र या उतनापिष्टिम नाम का नायक है। 1873 में तो एक ब्रिटिश अख़बार ने ब्रिटिश म्यूज़ियम के एक पूरे अभियान को सिर्फ़ इसी जलप्रलय की कथा वाली पट्टिका खोजने के लिए फ़ंड किया था।
1960 के दशक तक इतिहासकार समझ चुके थे कि पुराने नियम की कहानियाँ शब्दशः सच नहीं थीं, बल्कि इतिहास के बड़े बदलावों को याद रखने का एक तरीक़ा थीं। पुरातात्विक तरीक़े कहीं ज़्यादा सावधान हो गए, और ध्यान एक नए सवाल पर गया : “क्या बाईबल सच है” नहीं, बल्कि “आम मेसोपोटामियावासी असल में कैसे रहते थे”। इस अध्याय का ज़्यादातर हिस्सा इसी बाद वाले, ज़्यादा वैज्ञानिक अध्ययन पर आधारित है।
2भूमि और नगर का विचार
2.1 मेसोपोटामिया का भूगोल
इराक़ में एक-दूसरे से बिल्कुल अलग कई तरह के इलाक़े साथ-साथ हैं, और इसी विविधता ने तय किया कि नगर कहाँ बन सकते थे और कहाँ नहीं।
| क्षेत्र | कैसा था | क्या मिलता था |
|---|---|---|
| उत्तर-पूर्व | हरे-भरे लहरदार मैदान, जो पेड़ों से ढके पहाड़ों तक जाते हैं, धाराएँ और खेती लायक़ बारिश | वर्षा-आधारित खेती, 7000-6000 ई.पू. जितनी पुरानी |
| उत्तर | स्टेपी नाम का ऊँचा मैदानी इलाक़ा | खेती से ज़्यादा भेड़-बकरी चराने के लिए अच्छा, ख़ासकर जाड़े की बारिश के बाद |
| पूर्व | दज़ला नदी की सहायक धाराएँ | ईरान के पहाड़ों तक जाने के रास्ते |
| दक्षिण | मरुस्थल | यहीं पहला नगर और पहला लेखन आया, सिर्फ़ इसलिए कि फ़रात और दज़ला की बाढ़ उत्तर के पहाड़ों से गाद बहाकर लाती और बिछा देती थी |
बारिश न होने पर भी, सिंचित दक्षिणी मेसोपोटामिया, किताब के अपने शब्दों में, किसी भी प्राचीन सभ्यता की “सबसे उपजाऊ” खेती व्यवस्था थी, यहाँ तक कि रोमन साम्राज्य से भी ज़्यादा उपजाऊ। इसकी वजह गाद थी, बारिश नहीं। यह तुलना एक-अंक के प्रश्न में बार-बार पूछी जाती है।
2.2 नगर क्यों बने? शहरीकरण का विचार
यह सोचना आसान लगता है कि नगर सिर्फ़ इसलिए बने क्योंकि मेसोपोटामिया का ग्रामीण इलाक़ा भोजन से भरपूर था। लेकिन अध्याय साफ़ कहता है कि यह पूरा जवाब नहीं है, और NCERT का पहला अभ्यास प्रश्न भी ठीक यही पूछता है।
नगर सिर्फ़ बड़ी जनसंख्या वाली जगह नहीं होता। शहरीकरण तब होता है जब अर्थव्यवस्था में भोजन उगाने के अलावा व्यापार, निर्माण और सेवाएँ भी विकसित होती हैं, जिससे लोगों का साथ रहना फ़ायदेमंद बन जाता है। इसी लगातार आदान-प्रदान की ज़रूरत को श्रम विभाजन कहते हैं।
एक पत्थर की मुद्रा बनाने वाले शिल्पी को लीजिए। उसे काँसे के औज़ार चाहिए जो वह ख़ुद नहीं बना सकता, और रंगीन पत्थर चाहिए जिन्हें कहाँ से लाना है यह भी उसे नहीं पता; उसका हुनर बारीक नक़्क़ाशी है, व्यापार या धातु-शिल्प नहीं। काँसे के औज़ार बनाने वाला ख़ुद तांबा-टिन खोदने नहीं जाता। हर कोई एक-दूसरे पर निर्भर है, और इस व्यापार, भंडारण और डिलिवरी को व्यवस्थित करने के लिए किसी को ज़िम्मेदारी लेनी पड़ती है, इसीलिए शहरी अर्थव्यवस्थाओं को अक्सर लिखित रिकॉर्ड की ज़रूरत पड़ती है।
NCERT आपसे कहता है कि उपजाऊ खेती, जल परिवहन, धातु-पत्थर की कमी, श्रम विभाजन, मुद्राओं का उपयोग, और राजाओं की सैन्य शक्ति को आवश्यक शर्त, कारण और परिणाम में बाँटें। एक समझदार तरीक़ा यह है :
आवश्यक शर्तें (मौजूद थीं, पर अकेले काफ़ी नहीं थीं) : उपजाऊ खेती, और सस्ता जल परिवहन।
कारण (जिन्होंने असल में नगर बनने को धक्का दिया) : धातु-पत्थर की कमी, जिसने संगठित लंबी दूरी के व्यापार को मजबूर किया, और उससे बना श्रम विभाजन।
परिणाम (शहरी जीवन शुरू होने के बाद के नतीजे) : मालिकाना और प्रामाणिकता दिखाने के लिए मुद्राओं का उपयोग, और राजाओं की श्रम को अनिवार्य बनाने की ताक़त।
3व्यापार और पहली पट्टिकाएँ
3.1 नगरों में सामान कैसे पहुँचता था : व्यापार
मेसोपोटामिया में भोजन चाहे जितना भरपूर हो, इसके खनिज संसाधन बहुत कम थे। दक्षिणी मेसोपोटामिया में औज़ार, मुद्रा या गहनों लायक़ अच्छा पत्थर लगभग नहीं था; खजूर और चिनार की लकड़ी गाड़ी या नाव बनाने लायक़ मज़बूत नहीं थी; और औज़ार, बर्तन या गहनों के लिए धातु बिल्कुल नहीं थी।
इसलिए मेसोपोटामियावासी अपने भरपूर कपड़े और खेती की उपज को तुर्की, ईरान और खाड़ी पार के इलाक़ों से आई लकड़ी, तांबा, टिन, चाँदी, सोना, सीप और पत्थरों से बदलते थे। इतना नियमित और संगठित व्यापार तभी संभव था जब कोई सामाजिक व्यवस्था अभियानों की तैयारी और व्यापार का प्रबंध करे।
यह मत लिखिए कि सस्ता ज़मीनी परिवहन ही नगरों के बनने की वजह था। अध्याय ठीक इसका उल्टा कहता है : पालतू जानवर और बैलगाड़ियाँ लंबी दूरी में इतना ज़्यादा चारा खा जाती हैं कि यह किफ़ायती नहीं रहता। सबसे सस्ता तरीक़ा जल परिवहन था, यानी धारा या हवा से चलने वाली नावें और बजरे, और मेसोपोटामिया की नहरें ही इन व्यापारिक रास्तों का काम भी करती थीं।
3.2 लेखन का विकास
हर समाज बोलकर बात करता है, पर लेखन इससे अलग है : यह उन्हीं ध्वनियों को किसी सतह पर दिखने वाले चिह्नों में बदल देता है। मेसोपोटामिया की सबसे पहली पट्टिकाएँ, लगभग 3200 ई.पू. में लिखी गईं, इनमें सिर्फ़ चित्र जैसे चिह्न और संख्याएँ थीं।
ऐसी क़रीब 5,000 शुरुआती पट्टिकाएँ मिली हैं। ये कोई कहानियाँ या चिट्ठियाँ नहीं हैं, बल्कि सूचियाँ हैं : बैल, मछली और रोटी की, जो दक्षिण के एक नगर उरुक के मंदिरों में आती या वहाँ से बँटती थीं। यानी लेखन की शुरुआत रिकॉर्ड रखने के लिए हुई, क्योंकि शहरी जीवन में लेन-देन लगातार होता था, कई लोगों और कई तरह के सामान के साथ।

मेसोपोटामियावासी गीली मिट्टी की पट्टिकाओं पर लिखते थे, जिन्हें हाथ में पकड़ने लायक़ चपटा किया जाता था और दोनों तरफ़ से चिकना किया जाता था। लेखक तिरछी कटी नरकट क़लम की तेज़ नोक से गीली सतह पर पच्चर के आकार के चिह्न दबाता था। धूप में सूखते ही मिट्टी लगभग बर्तन जैसी सख़्त हो जाती, और उस पर दोबारा कोई नया चिह्न नहीं दबाया जा सकता था। यही वजह है कि हर छोटे-से-छोटे लेन-देन के लिए अलग पट्टिका चाहिए होती थी, और यही वजह है कि मेसोपोटामियाई स्थलों पर पट्टिकाएँ सैकड़ों की संख्या में मिलती हैं।
कीलाकार लिपि (अंग्रेज़ी में क्यूनीफ़ार्म) का नाम लैटिन शब्दों क्यूनियस यानी “पच्चर”, और फ़ोर्मा यानी “आकार” से बना है। यह मिट्टी की पट्टिकाओं पर कटी हुई नरकट से दबाकर बनाई गई पच्चर-आकार की लिपि है, जो सबसे पहले मेसोपोटामिया में इस्तेमाल हुई।
लगभग 2600 ई.पू. तक यह लिपि पूरी तरह कीलाकार बन चुकी थी, और सुमेरियन भाषा में लिखी जाती थी। यहाँ से लेखन सिर्फ़ रिकॉर्ड रखने से आगे निकल गया : अब इसका उपयोग शब्दकोश बनाने, ज़मीन के हस्तांतरण को क़ानूनी मान्यता देने, राजाओं के महान कामों का बखान करने, और राजा द्वारा किए गए क़ानूनी बदलावों की घोषणा के लिए भी होने लगा। अक्कदी भाषा में कीलाकार लेखन पहली सदी ई. तक, यानी अपनी शुरुआत के 2,000 से भी ज़्यादा साल बाद तक, इस्तेमाल होता रहा।
4लेखन कैसे काम करता था
4.1 कीलाकार : प्रणाली, और इसे कौन पढ़ पाता था
कीलाकार का कोई चिह्न अंग्रेज़ी के “m” या “a” जैसे किसी एक अक्षर के लिए नहीं होता था। इसके बजाय, हर चिह्न पूरे एक शब्दांश के लिए होता था, जैसे -पुत-, -ला- या -इन-। इसी वजह से एक मेसोपोटामियाई लेखक को सैकड़ों अलग-अलग चिह्न याद रखने पड़ते थे, और उसे इतनी तेज़ी से लिखना पड़ता था कि गीली मिट्टी सूखने से पहले पट्टिका पूरी हो जाए। लेखन एक कुशल हुनर था, और इससे भी बढ़कर, एक ज़बरदस्त बौद्धिक उपलब्धि था : किसी भाषा की ध्वनियों को दिखने वाले चिह्नों की एक पूरी प्रणाली में बदल देना।
यह सीखना जितना मुश्किल था, उसे देखते हुए कोई हैरानी की बात नहीं कि बहुत कम मेसोपोटामियावासी पढ़-लिख पाते थे। जो राजा पढ़ना जानता था, वह अपने ही किसी घमंड भरे अभिलेख में इस बात का ज़िक्र ज़रूर करवाता था। फिर भी, ज़्यादातर लेखन बोलचाल की भाषा को ही दर्शाता था, किसी अधिकारी की चिट्ठी राजा को ज़ोर से पढ़कर सुनानी होती थी, इसलिए वह बोलचाल की तरह ही शुरू होती थी : “मेरे स्वामी क को कहो : … आपका सेवक ख यह कहता है : मैंने सौंपा गया काम पूरा कर दिया है…”
4.2 लेखन का उपयोग : एनमर्कर की कथा
एक लंबी सुमेरियन कविता बताती है कि व्यापार और शहरी जीवन लेखन से कैसे जुड़े, इसकी कहानी उरुक के एक शुरुआती शासक एनमर्कर से है, उरुक ही मेसोपोटामिया की परंपरा में इतना केंद्रीय था कि उसे बस “नगर” कहा जाता था।
एनमर्कर को एक नगर के मंदिर को सजाने के लिए लापीस लाज़ुली और क़ीमती धातुएँ चाहिए थीं, तो उसने अपने दूत को दूर देश अरट्टा में बार-बार भेजा, सात पहाड़ी शृंखलाएँ पार करवाकर, धमकियाँ और वादे लेकर। आख़िर में दूत “मुँह से थक गया” और लंबे मौखिक संदेशों को याद नहीं रख पाया। तब, कविता कहती है, “एनमर्कर ने अपने हाथ में मिट्टी की एक पट्टिका बनाई, और उस पर शब्द लिख दिए। उन दिनों तक मिट्टी पर शब्द लिखे जाने का चलन नहीं था।”
अरट्टा के स्वामी और एनमर्कर की सुमेरियन कथा से
इसे लेखन के शब्दशः आविष्कार के तौर पर नहीं लेना चाहिए। यह जो बताता है वह यह है कि मेसोपोटामियावासी अपने ही इतिहास को कैसे समझते थे : व्यापार और लेखन, दोनों को राजसत्ता ने संगठित किया, और लेखन को ख़ुद मेसोपोटामियाई शहरी संस्कृति की श्रेष्ठता का सबूत माना जाता था।
5मंदिर, राजा और उरुक
5.1 मंदिर और राजा : दक्षिणी मेसोपोटामिया का शहरीकरण
5000 ई.पू. से दक्षिणी मेसोपोटामिया के गाँव धीरे-धीरे अलग-अलग तरह के नगरों में बदलने लगे : कुछ मंदिरों के आस-पास बसे, कुछ व्यापार केंद्र बने, और कुछ साम्राज्य के नगर थे। यह अध्याय सिर्फ़ पहले दो तरह के नगरों पर बात करता है।
सबसे पुराना ज्ञात मंदिर एक छोटा-सा मंदिर था, कच्ची ईंटों से बना। समय के साथ मंदिर पक्की ईंट में बड़े होते गए, खुले आँगनों के चारों तरफ़ कमरों के साथ। एक मंदिर को आम घर से अलग करने वाली एक चीज़ हमेशा रहती थी : उसकी बाहरी दीवार, जो नियमित अंतराल पर भीतर-बाहर जाती थी, क्योंकि मंदिर किसी देवता का घर होता था।
मंदिर को किसी ख़ास देवता का निवास माना जाता था, जैसे उर के चंद्र देवता या प्रेम और युद्ध की देवी इन्नाना, और खेतों, मछलीघरों तथा पशुओं का सैद्धांतिक स्वामी भी। समय के साथ यह तेल, अनाज और ऊन जैसी उपज को प्रसंस्कृत भी करने लगा, और समुदाय के लिखित रिकॉर्ड भी रखता था, जिससे यह पूरे नगर की मुख्य संस्था बन गया।
पर मेसोपोटामिया में खेती कभी पूरी तरह ख़तरों से मुक्त नहीं रही। फ़रात की धाराओं में किसी साल बहुत ज़्यादा पानी आ जाता, या वे अपना रास्ता ही बदल लेतीं, और ऊपरी धारा के गाँव इतना पानी रोक लेते कि नीचे के गाँव सूखे रह जाते, या कोई धारा की गाद साफ़ न करे तो आगे पानी रुक जाता। इन्हीं सब वजहों से ज़मीन और पानी पर बार-बार संघर्ष होता रहा।
राजा अपने आस-पास ही गाँव वालों को बसने के लिए भी प्रोत्साहित करते थे, ताकि ज़रूरत पड़ने पर जल्दी सेना खड़ी की जा सके, और इसलिए भी कि पास-पास रहने से लोग ख़ुद ज़्यादा सुरक्षित रहते थे।
5.2 उरुक : राजा, मंदिर और नई तकनीक का नगर
उरुक, जो सबसे पुराने मंदिर-नगरों में से एक था, यह पूरी प्रक्रिया सबसे साफ़ तरीक़े से दिखाता है। इसकी कला में हथियारबंद वीरों और उनके शिकार बने लोगों के चित्र मिलते हैं, और लगभग 3000 ई.पू. तक यह बढ़कर 250 हैक्टेयर का हो गया था, यानी बाद में बनने वाले मोहनजोदड़ो से दोगुना, और इसी दौरान आस-पास के दर्जनों छोटे गाँव उजड़ गए। यह जनसंख्या का एक बड़ा शहर की ओर खिसकना था।
उरुक ने बहुत जल्दी ही एक सुरक्षा दीवार बना ली, और यहाँ लगातार बसाव लगभग 4200 ई.पू. से लेकर लगभग 400 ई. तक चलता रहा। युद्ध-बंदियों और स्थानीय लोगों को मंदिर या सीधे राजा के लिए अनिवार्य श्रम में लगाया जाता था, यह कोई खेती पर लगा कर नहीं था; इन्हें राशन दिया जाता था, और सैकड़ों राशन-सूचियाँ आज भी मिलती हैं जो बताती हैं कि हर व्यक्ति को कितना अनाज, कपड़ा या तेल मिला। अनुमान है कि अकेले एक मंदिर बनाने में 1,500 लोगों को दस-दस घंटे रोज़, पूरे पाँच साल तक काम करना पड़ा।

ज़िगुरात प्राचीन मेसोपोटामियाई नगरों में बना एक सीढ़ीदार, मीनार जैसा मंदिर-चबूतरा है। बेबीलोन में अपने चरम पर एक ज़िगुरात इसके धार्मिक केंद्र का हिस्सा था, जिस तक एक जुलूस-मार्ग जाता था।
लगभग 3000 ई.पू. के आस-पास उरुक में सच्ची तकनीकी प्रगति भी दिखी : कई तरह के शिल्प के लिए काँसे के औज़ार, ईंट के खंभे (क्योंकि बड़े हॉल की छत सँभालने लायक़ लकड़ी वहाँ नहीं थी), और मंदिर की दीवारों में जड़े रंग-बिरंगे मिट्टी के शंकु जो एक रंगीन मोज़ेक बना देते थे। सबसे बड़ी तकनीक थी कुम्हार का चाक, जो वाक़ई एक तकनीकी मील का पत्थर था, इससे एक कारख़ाना एक साथ दर्जनों लगभग एक-जैसे बर्तन “बड़े पैमाने पर” बना सकता था।
काँसा तांबे और टिन की मिश्रधातु है। दोनों धातुएँ दूर से मँगानी पड़ती थीं, इसलिए काँसे का इस्तेमाल करने का मतलब था लंबी दूरी का व्यापार जुटाना, और काँसे के औज़ारों से ही बारीक बढ़ईगीरी, मनके छेदना और मुद्रा पर नक़्क़ाशी संभव हो पाती थी।
6मुद्राएँ और उर का रोज़मर्रा जीवन
6.1 मुद्रा : एक शहरी वस्तु
भारत में शुरुआती पत्थर की मुद्राएँ चपटी होती थीं और सतह पर दबाई जाती थीं। मेसोपोटामिया में, पहली सहस्राब्दी ई.पू. के अंत तक, बिल्कुल अलग डिज़ाइन इस्तेमाल होता था।
बेलनाकार मुद्रा पत्थर का एक छोटा बेलन होता था, बीच में छेद करके एक डंडी पर फ़िट किया जाता था, फिर गीली मिट्टी पर लुढ़काया जाता था ताकि एक लगातार चलता हुआ चित्र बन जाए। इन्हें बहुत हुनरमंद शिल्पी उकेरते थे, और कभी-कभी इन पर लेखन भी होता था, मालिक का नाम, उसका देवता, या उसका पद।

मुद्रा को कपड़े की गठरी की गाँठ पर, या किसी बंद बर्तन के मुँह पर लुढ़काया जा सकता था, ताकि अंदर की चीज़ छेड़छाड़ से सुरक्षित रहे। मिट्टी की पट्टिका पर लिखी चिट्ठी पर लुढ़काने से यह प्रामाणिकता की मुद्रा बन जाती थी, यानी सबूत कि चिट्ठी सचमुच किसने भेजी है। कुल मिलाकर, मुद्रा नगर में रहने वाले किसी व्यक्ति की सार्वजनिक भूमिका का निशान थी।
6.2 नगर में जीवन : परिवार और उर के घर
एक शासक वर्ग साफ़ तौर पर मौजूद था : इससे साफ़ और कुछ नहीं दिखाता कि उर में कुछ राजाओं और रानियों के साथ दबे हुए वह बेशुमार धन-दौलत, गहने, सोने के बर्तन, सीप और लापीस लाज़ुली से जड़े संगीत के बाजे, और सोने के औपचारिक खंजर।
पर आम परिवारों का क्या हाल था? विवाद और विरासत से जुड़े क़ानूनी दस्तावेज़ बताते हैं कि मेसोपोटामियाई समाज में एकल परिवार ही आम था, हालाँकि विवाहित बेटा अक्सर अपने परिवार के साथ माता-पिता के ही घर में रहता था। घर का मुखिया पिता होता था। विवाह की एक तय प्रक्रिया थी : शादी की सहमति की घोषणा, वधू के माता-पिता की मंज़ूरी, वर पक्ष से वधू पक्ष को उपहार, शादी में दोनों तरफ़ से उपहारों का आदान-प्रदान, और मंदिर में साथ मिलकर भेंट चढ़ाना। जब सास बाद में बहू को लेने आती, तो वधू को अपने ही पिता से विरासत का हिस्सा मिलता था; और बेटों को पिता का घर, पशु और खेत विरासत में मिलते थे।
एकल परिवार वह परिवार होता है जिसमें सिर्फ़ पति, पत्नी और उनके बच्चे शामिल हों, न कि कोई बड़ा संयुक्त परिवार।
उर, जो खुदाई में सामने आए सबसे पुराने नगरों में से एक है, को 1930 के दशक में व्यवस्थित तरीक़े से खोदा गया। इसकी तंग, घुमावदार गलियाँ बताती हैं कि यहाँ कोई असली नगर-योजना नहीं थी, ये पहिएदार गाड़ी के लायक़ भी चौड़ी नहीं थीं, इसलिए अनाज और लकड़ी गधों की पीठ पर ही आती थी। समकालीन मोहनजोदड़ो के उलट, उर में सड़क की नालियाँ बिल्कुल नहीं थीं; इसके बजाय नालियाँ और मिट्टी के पाइप निजी आँगनों के भीतर होते थे, और छतें भीतर की तरफ़ ढलवाँ होती थीं ताकि बारिश का पानी आँगन के ढके हौज़ों में चला जाए।
हौज़ ज़मीन में खोदा गया एक ढका हुआ गड्ढा होता है, जिसमें पानी और गंदा पानी दोनों जाकर जमा होते हैं।
फिर भी लोग अपने घर का कूड़ा सीधे गलियों में ही फेंक देते थे, इसलिए गलियों का स्तर धीरे-धीरे ऊँचा होता गया, और बारिश के बाद घर में कीचड़ न घुसे इसके लिए दहलीज़ों को बार-बार ऊँचा करना पड़ता था। कमरों में कोई खिड़की नहीं होती थी; सारी रोशनी आँगन की तरफ़ खुलने वाले दरवाज़ों से ही आती थी, इससे परिवारों को निजता भी मिलती थी। उर में मिली शगुन-पट्टिकाओं में घर से जुड़े अंधविश्वास भी दर्ज मिलते हैं : ऊँची दहलीज़ धन लाती थी, ऐसा मुख्य दरवाज़ा जो किसी दूसरे घर की तरफ़ न खुले वह शुभ माना जाता था, पर अगर घर का मुख्य लकड़ी का दरवाज़ा भीतर की बजाय बाहर की तरफ़ खुलता, तो पट्टिकाएँ चेतावनी देती थीं कि “पत्नी अपने पति के लिए मुसीबत बन जाएगी।” उर के नगर-क़ब्रिस्तान में राजघराने और आम लोगों, दोनों की क़ब्रें मिली हैं, और कुछ लोगों को तो सीधे आम घरों के फ़र्श के नीचे ही दफ़नाया गया था।
7मारी : चरागाही क्षेत्र में व्यापार
7.1 मारी : चरागाही क्षेत्र में बसा व्यापारिक नगर
2000 ई.पू. के बाद मारी की राजधानी फली-फूली, पर यह उपजाऊ दक्षिणी मैदान में नहीं, बल्कि फ़रात के काफ़ी ऊपरी हिस्से में बसी थी, जहाँ खेती और पशुपालन साथ-साथ चलते थे, हालाँकि मारी की ज़्यादातर ज़मीन भेड़-बकरी चराने के लिए ही इस्तेमाल होती थी।
किसानों और पशुचारकों को एक-दूसरे की ज़रूरत थी : पशुचारक अनाज और धातु के औज़ारों के बदले जवान पशु, पनीर, चमड़ा और मांस देते थे, और बाड़े में रखे झुंड की खाद खेत के लिए खाद का काम करती थी। पर टकराव भी सच में होता था, पशुचारक का झुंड पानी के लिए बोए हुए खेत से गुज़रकर उसे बर्बाद कर सकता था, घुमंतू पशुचारक गाँव पर छापा मारकर अनाज का भंडार लूट सकते थे, और बसे हुए समुदाय पशुचारकों को कुछ रास्तों पर नहर के पानी तक पहुँचने से भी रोक सकते थे।
पशुचारक किसानों को क्या देते थे
- जवान पशु, पनीर, चमड़ा और मांस
- बाड़े में रखे झुंड की खाद, खेतों के लिए
टकराव किस बात पर होता था
- झुंड का बोए हुए खेतों में घुसकर उन्हें बर्बाद करना
- गाँव के अनाज-भंडार पर छापे
- गाँवों का पशुचारकों को नहर के पानी से रोकना
मेसोपोटामिया के पूरे इतिहास में पश्चिमी मरुस्थल से घुमंतू समूह लगातार इस समृद्ध खेती वाले इलाक़े में आते रहे, पहले पशुचारक, फ़सल काटने वाले मज़दूर या किराए के सैनिक बनकर, और इनमें से कुछ इतने समृद्ध हो गए कि उन्होंने अपने ही राजवंश खड़े कर लिए, इनमें अक्कदी, एमोराइट, असीरियन और अरामाइक लोग शामिल थे। मारी के राजा ख़ुद एमोराइट थे, जिनकी पोशाक इस इलाक़े के मूल निवासियों से अलग थी; वे मेसोपोटामिया के परंपरागत देवताओं का सम्मान भी करते थे, और साथ ही मारी में स्टेपी के देवता डैगन के लिए एक मंदिर भी बनवाया। अध्याय के मुताबिक़ अलग-अलग लोगों और संस्कृतियों के लिए यह खुलापन ही मेसोपोटामियाई सभ्यता की जीवंतता की एक वजह था।
7.2 मारी में राजा ज़िमरीलिम का महल
मारी का विशाल महल, जो राजा ज़िमरीलिम (1810-1760 ई.पू.) का निवास था, राजपरिवार का घर, राज्य के प्रशासन का केंद्र, और ख़ासकर क़ीमती धातु के गहनों के उत्पादन का केंद्र भी था। यह इतना मशहूर था कि उत्तरी सीरिया का एक छोटा-सा राजा सिर्फ़ इसे देखने के लिए वहाँ गया, अपने साथ ज़िमरीलिम के किसी दोस्त का परिचय-पत्र लेकर।

मारी के राजाओं को फिर भी चौकस रहना पड़ता था : अलग-अलग क़बीलों के पशुचारकों को राज्य में घूमने की इजाज़त तो थी, पर उन पर नज़र भी रखी जाती थी। अधिकारियों की चिट्ठियों में अक्सर रात में आग के संकेतों का ज़िक्र मिलता है, यानी एक पशुचारक-शिविर दूसरे को ख़बर दे रहा है कि शायद कोई हमला होने वाला है।
मारी की असली ताक़त उसकी सेना नहीं, उसका व्यापार था। फ़रात नदी पर, दक्षिणी नगरों और तुर्की-सीरिया-लेबनान के खनिज-समृद्ध पहाड़ी इलाक़ों के बीच बिल्कुल सही जगह पर बसा हुआ, यहाँ लकड़ी, तांबा, टिन, तेल और शराब ले जाने वाली नावें आती-जाती थीं। अधिकारी हर माल की जाँच करते थे, एक नाव में शराब के 300 मर्तबान तक आ सकते थे, और आगे बहने देने से पहले माल की क़ीमत का लगभग दसवाँ हिस्सा शुल्क वसूला जाता था। तांबा तो ‘अलाशिया’ नाम के टापू (साइप्रस) से आता था, और टिन का भी व्यापार होता था, दोनों इसलिए ज़रूरी थे क्योंकि काँसा ही उस दौर की सबसे बड़ी औद्योगिक धातु थी। मारी सैन्य रूप से मज़बूत नहीं था, फिर भी सिर्फ़ इसी व्यापार की वजह से बेहद समृद्ध बन गया।
8खुदाई और अतीत को याद रखना
8.1 छोटे पैमाने की खुदाई : अबू सलाबिख की मिसाल
आज के मेसोपोटामियाई पुरातत्वविद एक सदी पुरानी विशाल, दशकों तक चलने वाली खुदाई से बिल्कुल अलग तरीक़े से काम करते हैं; अब बड़ी टीमों के लिए पैसा जुटा पाना बहुत कम लोगों के बस में है, इसलिए छोटे और ज़्यादा सावधान तरीक़े से खुदाई करना ही आम बात है।
अबू सलाबिख, लगभग 2500 ई.पू. का लगभग 10 हैक्टेयर का और 10,000 से कम आबादी वाला एक छोटा नगर, इस तरीक़े को अच्छी तरह दिखाता है। पुरातत्वविदों ने पहले टीले की ऊपरी सतह की कुछ मिलीमीटर परत को खुरचा, जब नीचे की मिट्टी अभी भी थोड़ी नम थी, तब वे दबी हुई ईंट की दीवारों के रंग और बनावट को पहचान पाए। इसके बाद उन्होंने टनों मिट्टी को छानकर पौधों और जानवरों के बेहद छोटे अवशेष निकाले, और गलियों में बिखरी मछली की जली हुई हड्डियाँ बड़ी मात्रा में मिलीं।
रसोई की पहचान
वहीं मिले पौधों के बीज और रेशे, जहाँ कभी गोबर के उपले जलाए गए थे
रहने के कमरों की पहचान
रसोई के मुक़ाबले वहाँ ऐसे निशान बहुत कम मिले
खुले घूमते सूअरों की पहचान
गलियों में बिखरे नन्हे सूअरों के दाँत मिलने से
छत वाले और खुले कमरों की पहचान
फ़र्श की सूक्ष्म जाँच से, यह दिखाकर कि किस कमरे में चिनार की लकड़ी, ताड़ के पत्ते या पुआल की छत थी
अबू सलाबिख में एक घर की क़ब्र में शव के साथ सूअर की हड्डियाँ भी मिलीं, संभवतः यह माना जाता था कि मृतक को परलोक में पोषण के लिए यह मांस चाहिए होगा।
8.2 मेसोपोटामियाई संस्कृति में नगर : गिल्गोमिश महाकाव्य
मेसोपोटामियावासियों को अपने नगरों में कई अलग-अलग समुदायों और संस्कृतियों के साथ-साथ रहने पर सच्चा गर्व था, और जब कोई नगर युद्ध में तबाह होता, तो वे उसे कविता में याद करते थे।
इसकी सबसे मार्मिक मिसाल बारह पट्टिकाओं पर लिखे गिल्गोमिश महाकाव्य के अंत में मिलती है। कहा जाता है कि गिल्गोमिश ने एनमर्कर के कुछ समय बाद उरुक पर राज किया, वह एक महान वीर था जिसने दूर-दूर तक लोगों को अपने अधीन किया, जब तक कि उसके सबसे क़रीबी दोस्त की मौत ने उसे झकझोर नहीं दिया और वह अमरता का रहस्य खोजने निकल पड़ा। उसने दुनिया को घेरने वाला माना जाने वाला पानी भी पार किया, पर अमरता नहीं पा सका, और उरुक लौट आया।
वहाँ गिल्गोमिश को अपने ही बनाए हुए नगर की दीवार पर आगे-पीछे टहलते हुए सुकून मिला, वह पकी ईंटों की उन नींवों को निहारता रहा जो उसी ने रखवाई थीं। वह किसी क़बीलाई वीर की तरह यह सोचकर संतोष नहीं करता कि उसके बेटे उससे ज़्यादा जिएँगे। इसके बजाय उसे उस नगर पर गर्व होता है जो उसके लोगों ने मिलकर बनाया।
इस अध्याय की एक ही बात याद रखनी हो तो यही : मेसोपोटामियावासी की असली विरासत नगर था, ख़ानदान नहीं
8.3 लेखन की देन : गणित और समय
कहानियाँ ज़बानी भी आगे बढ़ सकती हैं, पर विज्ञान नहीं, इसके लिए लिखे गए ग्रंथ चाहिए जिन्हें आने वाली पीढ़ियों के विद्वान पढ़ें और उन्हीं पर आगे काम करें। शायद मेसोपोटामिया की दुनिया को सबसे बड़ी देन यही है : गणित और समय-गणना की एक लिखित विद्वत परंपरा।
लगभग 1800 ई.पू. की पट्टिकाओं में गुणा-भाग की सारणियाँ, वर्ग और वर्गमूल की सारणियाँ, और यहाँ तक कि चक्रवृद्धि ब्याज की सारणियाँ भी मिलती हैं। एक पट्टिका में √2 का मान इस तरह दिया गया है :
विद्यार्थियों को इस तरह के सवाल भी दिए जाते थे : किसी दिए गए क्षेत्रफल के खेत में एक उँगली जितनी गहराई तक पानी भरा हो, तो पानी का आयतन बताओ। और आज लगभग हर इंसान जिस समय-व्यवस्था का इस्तेमाल करता है, यानी साल के बारह महीने, महीने के चार सप्ताह, दिन के चौबीस घंटे और घंटे के साठ मिनट, यह सीधे मेसोपोटामिया के खगोलशास्त्र से आई है। यह सिकंदर के उत्तराधिकारियों से होते हुए रोमन दुनिया तक, फिर इस्लामी दुनिया तक, और आख़िर में मध्यकालीन यूरोप तक पहुँची। मेसोपोटामियाई खगोलशास्त्री सूर्य और चंद्र ग्रहणों को भी साल, महीने और दिन के साथ बड़ी सावधानी से दर्ज करते थे, और तारों तथा नक्षत्रों की स्थिति भी।
यह सब लेखन के बिना, और पाठशाला जैसी शहरी संस्था के बिना संभव ही नहीं था, जहाँ विद्यार्थी पुरानी पट्टिकाओं को पढ़ते और नक़ल करते थे, और जहाँ कुछ लड़कों को सिर्फ़ रिकॉर्ड रखने वाला नहीं, बल्कि पहले के काम पर आगे बढ़ने वाला विद्वान बनने की तालीम दी जाती थी।
लौह युग में उत्तर के असीरियनों ने एक साम्राज्य खड़ा किया, जो अपने चरम (720-610 ई.पू.) पर मिस्र तक फैला था, और इसकी अर्थव्यवस्था “शिकारी” क़िस्म की थी, यानी विशाल अधीन जनसंख्या से मज़दूरी और श्रद्धांजलि के रूप में अनाज, पशु, धातु और शिल्प-वस्तुएँ खींची जाती थीं।
फिर भी असीरियाई राजा दक्षिणी इलाक़े, बेबीलोनिया, को ही उच्च संस्कृति का असली केंद्र मानते थे। आख़िरी बड़े असीरियाई राजा असुरबनिपाल (668-627 ई.पू.) ने अपनी राजधानी निनवै में एक पुस्तकालय बनवाया, और अपने ही लेखकों को दक्षिण भेजकर इतिहास, महाकाव्य, शगुन-साहित्य, ज्योतिष, भजन और कविताओं की पुरानी पट्टिकाएँ ढुँढ़वाईं।
यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि बेबीलोनिया की लेखक-पाठशालाएँ छात्रों को दर्जनों पट्टिकाएँ नक़ल करने का प्रशिक्षण देती थीं, और क्योंकि सुमेरियन, भले ही लगभग 1800 ई.पू. तक बोली जानी बंद हो चुकी थी, फिर भी शब्दावली-सूचियों, चिह्न-सूचियों और द्विभाषी सुमेरियन-अक्कदी पट्टिकाओं के ज़रिए जान-बूझकर पढ़ाई जाती रही। इसीलिए लगभग 650 ई.पू. में भी 2000 ई.पू. जितनी पुरानी पट्टिकाएँ पढ़ी जा सकती थीं, और असुरबनिपाल के लेखकों को ठीक-ठीक पता था कि उन्हें कहाँ ढूँढ़ना है। गिल्गोमिश महाकाव्य जैसे बड़े ग्रंथों की नक़लों में नक़ल करने वाले का नाम और तारीख़ दोनों लिखी जाती थीं, और पट्टिकाओं की सूची भी बनाई जाती थी, किसी टोकरी पर लगे मिट्टी के लेबल पर लिखा मिल सकता था “इतनी पट्टिकाएँ भूत-प्रेत भगाने के विषय पर, X द्वारा लिखी गईं”।
8.5 एक शुरुआती पुरातत्वविद : बेबीलोन का नैबोनिडस
625 ई.पू. में नैबोपोलास्सर ने बेबीलोनिया को असीरियाई सत्ता से आज़ाद करवाया, और उसके उत्तराधिकारियों ने राज्य का विस्तार करते हुए बेबीलोन नगर को भी और भव्य बनाया। 539 ई.पू. में ईरान के एकेमेनिड शासकों की जीत के बाद भी, और 331 ई.पू. में सिकंदर की विजय तक, बेबीलोन दुनिया का सबसे बड़ा नगर बना रहा, 850 हैक्टेयर से भी बड़ा, तिहरी दीवार, बड़े महल-मंदिर, एक ज़िगुरात, और धार्मिक केंद्र तक जाने वाला एक जुलूस-मार्ग।
पट्टलेख एक पत्थर की पट्टिका होती है जिस पर लेख या चित्र उकेरे गए हों। नैबोनिडस ने एक प्राचीन पट्टलेख पर उकेरी छवि से यह जाना कि एक पुजारिन का पहनावा कैसा होना चाहिए।
नैबोनिडस, स्वतंत्र बेबीलोन का आख़िरी शासक, अपनी भावना में इतिहास के सबसे पुराने ज्ञात “पुरातत्वविदों” में से एक माना जा सकता है। उसने ख़ुद लिखा कि उर के देवता ने उसे सपने में आकर उर की मुख्य पुजारिन का लंबे समय से भुला दिया गया पद फिर से शुरू करने का आदेश दिया। किसी नमूने की तलाश में उसे एक बहुत पुराने राजा का पट्टलेख मिला, जिसे आज हम लगभग 1150 ई.पू. का मानते हैं, जिस पर पुजारिन की छवि उकेरी थी, और उसने उसी पर दिखे कपड़ों और गहनों के आधार पर अपनी बेटी को उसके अभिषेक के लिए सजाया।
एक और मौक़े पर नैबोनिडस के आदमी उसके पास अक्कद के राजा सारगोन के नाम खुदी एक टूटी मूर्ति लेकर आए, जिसके बारे में आज हमें पता है कि उसने लगभग 2370 ई.पू. में राज किया था। नैबोनिडस के अपने शब्दों में, “देवताओं के प्रति श्रद्धा और राजसत्ता के प्रति सम्मान” के कारण उसने कुशल शिल्पियों को बुलाकर मूर्ति का सिर फिर से बनवाया, यानी अपने से 1,800 साल से भी पहले हुए एक शासक को भी सहेजने लायक़ मानकर।
9समय-रेखा : लेखन कला और शहरी जीवन एक नज़र में
- मेसोपोटामिया का मतलब है “नदियों के बीच”, यानी फ़रात और दज़ला के बीच की भूमि, आज का इराक़
- नगरों के लिए सिर्फ़ खाने की बहुतायत काफ़ी नहीं, व्यापार, विशेषज्ञता और सामाजिक व्यवस्था चाहिए, यही शहरीकरण है
- लेखन लगभग 3200 ई.पू. में उरुक के मंदिरों के रिकॉर्ड रखने के लिए शुरू हुआ, फिर क़ानून, साहित्य और शब्दकोश तक फैल गया
- कीलाकार चिह्न अक्षर नहीं, शब्दांश दर्शाते थे, इसलिए बहुत कम प्रशिक्षित लोग ही पढ़-लिख पाते थे
- दक्षिणी मेसोपोटामिया में खनिजों की कमी ने लकड़ी, धातु और पत्थर के लिए लंबी दूरी का व्यापार मजबूर कर दिया
- मंदिर नगर की पहली बड़ी संस्था थी; ज़मीन-पानी के संघर्ष ने योद्धा नेताओं को राजा बनने में मदद की
- उरुक, उर और मारी शहरी जीवन के तीन अलग पहलू दिखाते हैं : मंदिर की सत्ता, आम घर, और चरागाही व्यापार
- बेलनाकार मुद्रा, चपटी मुद्रा की जगह लुढ़काई जाती थी, और मालिकाना हक़, सुरक्षा और प्रामाणिकता दिखाती थी
- मेसोपोटामियाई गणित और 12 महीने-24 घंटे-60 मिनट की समय-व्यवस्था यूनान, रोम, इस्लाम और मध्यकालीन यूरोप होते हुए हम तक पहुँची
- निनवै में असुरबनिपाल का पुस्तकालय, और सारगोन की मूर्ति के प्रति नैबोनिडस का सम्मान, दिखाते हैं कि मेसोपोटामियावासी अपने ही प्राचीन अतीत को पहले से ही सहेज और पढ़ रहे थे
- क्या मैं अपने शब्दों में बता सकता हूँ कि सिर्फ़ “प्राकृतिक उर्वरता” से शुरुआती शहरीकरण क्यों नहीं समझाया जा सकता?
- क्या मैं उपजाऊ खेती, जल परिवहन, धातु की कमी, श्रम विभाजन, मुद्राएँ और अनिवार्य श्रम को आवश्यक शर्त, कारण और परिणाम में बाँटकर अपनी वजह बता सकता हूँ?
- क्या मैं बता सकता हूँ कि लेखक मिट्टी की पट्टिका असल में कैसे बनाता और लिखता था?
- क्या मैं समझा सकता हूँ कि दक्षिणी मेसोपोटामिया की पहली बड़ी शहरी संस्था बाज़ार नहीं, मंदिर क्यों था?
- क्या मैं मेसोपोटामिया की नगरों के अलावा कम-से-कम तीन और पहचान बता सकता हूँ, और उनमें से एक को समझा सकता हूँ (लेखन, गणित, या समय-गणना)?
- क्या मैं बता सकता हूँ कि उर के घर मोहनजोदड़ो से किस एक बात में अलग थे?
- क्या मैं समझा सकता हूँ कि मारी जैसे व्यापारिक नगर के लिए पशुचारक फ़ायदेमंद भी थे और ख़तरा भी?