NCERT की पाठ्यपुस्तक भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार के अध्याय 3 «चुनाव और प्रतिनिधित्व» की प्रश्नावली के दसों प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
1 प्रत्यक्ष लोकतंत्र के सबसे नज़दीक कौन
प्र. निम्नलिखित में कौन प्रत्यक्ष लोकतंत्र के सबसे नज़दीक बैठता है?
(क) परिवार की बैठक में होने वाली चर्चा
(ख) कक्षा-संचालक (क्लास-मॉनीटर) का चुनाव
(ग) किसी राजनीतिक दल द्वारा अपने उम्मीदवार का चयन
(घ) मीडिया द्वारा करवाये गये जनमत-संग्रह
उत्तर: (क)। प्रत्यक्ष लोकतंत्र वह है जिसमें लोग ख़ुद, बिना किसी प्रतिनिधि के, फ़ैसले में हिस्सा लें। इन चार में परिवार की बैठक ही ऐसी है जहाँ सभी सदस्य ख़ुद मौजूद रहकर सीधे चर्चा और फ़ैसले में शामिल होते हैं। क्लास-मॉनीटर का चुनाव ख़ुद एक प्रतिनिधि चुनने का उदाहरण है, दल का उम्मीदवार-चयन आंतरिक प्रक्रिया है, और मीडिया का जनमत-संग्रह कोई बाध्यकारी फ़ैसला नहीं है।
ध्यान दें: अंग्रेज़ी संस्करण में इसी प्रश्न का एक पाँचवाँ विकल्प है, “ग्राम सभा द्वारा लिए गए फ़ैसले”, और तब उत्तर वही होता है। हिंदी संस्करण में यह विकल्प है ही नहीं, इसलिए हिंदी माध्यम के छात्र (क) लिखें।
2 निर्वाचन आयोग का काम नहीं
प्र. निम्नलिखित में कौन-सा कार्य निर्वाचन आयोग द्वारा नहीं किया जाता?
(क) मतदाता-सूची तैयार करना
(ख) उम्मीदवारों का नामांकन करना
(ग) मतदान-केंद्रों की स्थापना करना
(घ) आचार-संहिता लागू करना
(ङ) पंचायत चुनावों का पर्यवेक्षण करना
उत्तर: (ख) और (ङ) दोनों। उम्मीदवारों का नामांकन स्वयं उम्मीदवार या उसका दल करता है, निर्वाचन आयोग सिर्फ़ नामांकन की जाँच-प्रक्रिया की देखरेख करता है, वह किसी का नामांकन ख़ुद नहीं करता। पंचायत और नगर निकाय चुनावों का पर्यवेक्षण राज्य निर्वाचन आयुक्त करते हैं, निर्वाचन आयोग नहीं। बाक़ी तीनों (मतदाता-सूची, मतदान-केंद्र, आचार-संहिता) निर्वाचन आयोग के ही काम हैं।
3 राज्य सभा और लोक सभा में क्या समान
प्र. निम्नलिखित में कौन-सी बात राज्य सभा और लोक सभा के सदस्यों के चुनाव की प्रणाली में समान है?
(क) 18 वर्ष से ज़्यादा उम्र का हर नागरिक मतदान करने के योग्य है
(ख) मतदाता विभिन्न प्रत्याशियों को वरीयता क्रम में रख सकता है
(ग) प्रत्येक मत का समान मूल्य होता है
(घ) विजयी उम्मीदवार को आधे से अधिक मत प्राप्त होने चाहिए
उत्तर: (ग)। दोनों प्रणालियों में हर मत का मूल्य समान होता है। बाक़ी विकल्प ग़लत हैं: (क) राज्य सभा में मतदाता आम जनता नहीं, विधायक होते हैं, इसलिए 18 वर्ष की उम्र की शर्त लोक सभा पर लागू होती है, राज्य सभा पर नहीं। (ख) वरीयता क्रम सिर्फ़ राज्य सभा (STV) में होता है, लोक सभा (FPTP) में नहीं। (घ) राज्य सभा में कोटा-आधारित जीत होती है, पर लोक सभा में विजेता को आधे से ज़्यादा वोट मिलना ज़रूरी नहीं।
4 FPTP में विजेता कौन
प्र. सर्वाधिक मत से जीत वाली (FPTP) प्रणाली में वही प्रत्याशी विजेता घोषित किया जाता है जो:
(क) सर्वाधिक संख्या में मत अर्जित करता है
(ख) देश में सर्वाधिक मत पाने वाले दल का सदस्य हो
(ग) चुनाव-क्षेत्र के अन्य उम्मीदवारों से ज़्यादा मत हासिल करता है
(घ) 50 प्रतिशत से अधिक मत हासिल करके प्रथम स्थान पर आता है
उत्तर: (ग)। FPTP में विजेता वह होता है जिसे अपने चुनाव-क्षेत्र में बाक़ी सब उम्मीदवारों से ज़्यादा वोट मिलते हैं, चाहे वे कुल वोटों के आधे से कम ही क्यों न हों। यहाँ (क) और (ग) में फ़र्क़ बारीक है और यही प्रश्न की जान है: (क) यह नहीं बताता कि मत कहाँ सबसे ज़्यादा हों, जबकि FPTP का फ़ैसला हमेशा चुनाव-क्षेत्र के भीतर होता है, पूरे देश के जोड़ पर नहीं। (ख) ग़लत है क्योंकि देश भर में दल को मिले वोट से जीत तय नहीं होती, और (घ) ग़लत है क्योंकि 50 प्रतिशत की कोई शर्त नहीं।
प्र. आरक्षित चुनाव-क्षेत्र और पृथक निर्वाचन-मंडल की व्यवस्था में क्या अंतर है? संविधान निर्माताओं ने पृथक निर्वाचन-मंडल को क्यों स्वीकार नहीं किया?
उत्तर:
1. अंतर: पृथक निर्वाचन-मंडल में किसी समुदाय के प्रतिनिधि को केवल उसी समुदाय के मतदाता चुनते थे, यानी मतदाता वर्ग ही समुदाय के आधार पर बँटा होता था। आरक्षित चुनाव-क्षेत्र में क्षेत्र के सभी मतदाता, चाहे वे किसी भी समुदाय के हों, वोट डाल सकते हैं, पर उम्मीदवार सिर्फ़ आरक्षित समुदाय से ही खड़ा हो सकता है।
2. क्यों नहीं अपनाया गया: संविधान सभा में तजम्मुल हुसैन जैसे सदस्यों ने चेतावनी दी कि पृथक निर्वाचन-मंडल भारत के लिए अभिशाप साबित हुए हैं और इन्होंने देश को बेहिसाब नुक़सान पहुँचाया है।
3. डर यह था कि इस व्यवस्था से समुदाय राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ जाएँगे, आपस में घुल-मिल नहीं पाएँगे, जिससे राष्ट्रीय एकता कमज़ोर होगी।
4. जयपाल सिंह जैसे आदिवासी प्रतिनिधियों ने भी पृथक निर्वाचन-मंडल की जगह सीटों के आरक्षण का समर्थन किया, यह कहते हुए कि वे राष्ट्र में घुलना-मिलना चाहते हैं, अलग-थलग नहीं रहना चाहते।
6 ग़लत कथन सुधारें
प्र. निम्नलिखित में कौन-सा कथन ग़लत है? इसकी पहचान करें और किसी एक शब्द या पद को बदलकर, जोड़कर या नए क्रम में सजाकर इसे सही करें।
(क) FPTP प्रणाली का पालन भारत के हर चुनाव में होता है।
(ख) निर्वाचन आयोग पंचायत और नगरपालिका के चुनावों का पर्यवेक्षण नहीं करता।
(ग) भारत के राष्ट्रपति किसी चुनाव आयुक्त को नहीं हटा सकते।
(घ) निर्वाचन आयोग में एक से ज़्यादा चुनाव आयुक्त की नियुक्ति अनिवार्य है।
उत्तर:
(क) ग़लत है। सुधार: “FPTP प्रणाली का पालन भारत के अधिकांश चुनावों में होता है” (राज्य सभा, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में PR/STV प्रणाली अपनाई जाती है, इसलिए ‘हर चुनाव’ कहना ग़लत है)।
(ग) ग़लत है। सुधार: “भारत के राष्ट्रपति चुनाव आयुक्तों को हटा सकते हैं” (राष्ट्रपति चुनाव आयुक्तों को हटा सकते हैं, हालाँकि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए विशेष बहुमत की शर्त है)।
(घ) ग़लत है। सुधार: “निर्वाचन आयोग में एक से ज़्यादा चुनाव आयुक्त की नियुक्ति अनिवार्य नहीं है” (किताब के शब्दों में, “भारत का निर्वाचन आयोग एक सदस्यीय या बहु-सदस्यीय भी हो सकता है”। 1989 तक यह एक-सदस्यीय था, 1993 से बहु-सदस्यीय बना हुआ है, पर संविधान बहु-सदस्यीय होना अनिवार्य नहीं करता)।
सिर्फ़ (ख) सही कथन है, क्योंकि पंचायत और नगरपालिका के चुनाव राज्य निर्वाचन आयुक्त कराते हैं, निर्वाचन आयोग नहीं।
7 महिला प्रतिनिधित्व सुधारने के उपाय
प्र. भारतीय चुनाव-व्यवस्था का लक्ष्य समाज के कमज़ोर तबक़ों की नुमाइंदगी सुनिश्चित करना है, लेकिन हमारी विधायिका में महिला सदस्यों की संख्या केवल 12 प्रतिशत तक पहुँची है। इस स्थिति में सुधार के लिए आप क्या उपाय सुझाएँगे?
उत्तर:
1. क़ानूनी आरक्षण: नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 को जल्द से जल्द पूरी तरह लागू करना, जो लोक सभा और विधान सभाओं में महिलाओं के लिए सीट-आरक्षण का प्रावधान करता है।
2. पार्टी टिकट-वितरण में सुधार: राजनीतिक दलों को अपने उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं का एक न्यूनतम अनुपात तय करने के लिए प्रोत्साहित या बाध्य करना।
3. राजनीतिक भागीदारी बढ़ाना: स्थानीय निकायों में पहले से लागू महिला आरक्षण का अनुभव दिखाता है कि इससे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और नेतृत्व क्षमता, दोनों बढ़ती हैं; इसी अनुभव को ऊपर के स्तरों पर भी दोहराया जा सकता है।
4. जागरूकता और समर्थन: मतदाताओं में महिला उम्मीदवारों के प्रति भरोसा बढ़ाने के लिए जागरूकता अभियान, और निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण व संसाधन उपलब्ध कराना।
8 FPTP या PR : चार इच्छाएँ
प्र. एक नए देश के संविधान पर हुई एक संगोष्ठी में वक्ताओं ने निम्नलिखित इच्छाएँ जताईं। हर कथन के लिए बताएँ कि उनके लिए FPTP या PR, कौन-सी प्रणाली उपयुक्त होगी।
(क) लोगों को साफ़-साफ़ पता होना चाहिए कि उनका प्रतिनिधि कौन है, ताकि वे उसे निजी तौर पर जवाबदेह ठहरा सकें।
(ख) हमारे यहाँ भाषाई रूप से अल्पसंख्यक छोटे-छोटे समुदाय हैं जो पूरे देश में फैले हैं, हमें उनकी ठीक-ठीक नुमाइंदगी सुनिश्चित करनी चाहिए।
(ग) अलग-अलग दलों के बीच सीट और वोट को लेकर कोई विसंगति नहीं होनी चाहिए।
(घ) लोग किसी अच्छे उम्मीदवार को चुनने में समर्थ होने चाहिए, भले ही वे उसके राजनीतिक दल को पसंद न करते हों।
उत्तर:
(क) FPTP उपयुक्त है। इसमें हर क्षेत्र का सिर्फ़ एक प्रतिनिधि होता है, इसलिए मतदाता आसानी से जान सकते हैं कि उन्हें किसके पास जाना है।
(ख) PR उपयुक्त है। छोटे और बिखरे हुए भाषाई समुदाय किसी एक क्षेत्र में बहुमत में नहीं होते, इसलिए FPTP में उन्हें कहीं भी सीट मिलना मुश्किल है। PR में पूरे देश के उनके वोट जोड़कर उन्हें उचित प्रतिनिधित्व मिल सकता है।
(ग) PR उपयुक्त है। PR प्रणाली की परिभाषा ही यह है कि हर दल को वोट के अनुपात में ही सीटें मिलें, यानी सीट-वोट में कोई विसंगति नहीं रहती।
(घ) FPTP उपयुक्त है। FPTP में मतदाता सीधे उम्मीदवार को वोट देता है, इसलिए वह पार्टी से अलग हटकर भी किसी अच्छे उम्मीदवार को चुन सकता है। PR में मतदाता पार्टी को वोट देता है, व्यक्तिगत उम्मीदवार को चुनने की यह आज़ादी नहीं मिलती।
प्र. एक भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने एक राजनीतिक दल का सदस्य बनकर चुनाव लड़ा। इस पर दो विचार सामने आए। एक विचार है कि भूतपूर्व CEC एक स्वतंत्र नागरिक है और उसे किसी भी दल में शामिल होने व चुनाव लड़ने का अधिकार है। दूसरे विचार के अनुसार, ऐसा होने देने से निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है, इसलिए भूतपूर्व CEC को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। आप किस पक्ष से सहमत हैं और क्यों?
उत्तर: दूसरे पक्ष से ज़्यादा सहमति बनती है, कारण इस प्रकार हैं:
1. निर्वाचन आयोग की सबसे बड़ी ताक़त उसकी निष्पक्षता है। अगर CEC पद छोड़ते ही किसी दल में शामिल हो सकें, तो पद पर रहते हुए भी उनके फ़ैसलों में भविष्य के राजनीतिक हितों का प्रभाव आने की आशंका बनी रहेगी।
2. सिर्फ़ आशंका होना ही काफ़ी है, क्योंकि निर्वाचन आयोग जैसी संस्था की साख उसके सचमुच निष्पक्ष होने पर नहीं, बल्कि जनता के उसे निष्पक्ष मानने पर भी टिकी है।
3. फिर भी नागरिक अधिकारों के पक्ष का तर्क कमज़ोर नहीं है, हर नागरिक को राजनीति में भाग लेने और चुनाव लड़ने का मौलिक अधिकार है, जिसे किसी एक पूर्व पद के आधार पर स्थायी रूप से नहीं छीना जा सकता।
4. इसलिए एक संतुलित रास्ता यह हो सकता है कि भूतपूर्व CEC और आयुक्तों के लिए पद छोड़ने के बाद एक निश्चित ‘शीतलन अवधि’ (cooling-off period) तय की जाए, जिसके दौरान वे कोई राजनीतिक पद न लें, ठीक वैसे ही जैसे कुछ अन्य संवैधानिक पदों के लिए होता है।
10 क्या भारत PR अपनाने के लिए तैयार है?
प्र. “भारतीय लोकतंत्र अब उस अनगढ़ ‘सर्वाधिक मत से जीत’ प्रणाली को छोड़कर समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली अपनाने के लिए तैयार हो चुका है।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? पक्ष या विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर: यह एक खुला प्रश्न है, दोनों तरफ़ के तर्क समझकर अपना संतुलित पक्ष रखा जा सकता है।
पक्ष में तर्क (PR अपनाना चाहिए):
1. FPTP में वोट और सीट के बीच भारी असंतुलन आता है, जैसा 1984 के उदाहरण में देखा गया।
2. PR छोटे और बिखरे समुदायों को बेहतर प्रतिनिधित्व दे सकता है।
विपक्ष में तर्क (FPTP बना रहना चाहिए):
3. FPTP की सादगी और स्पष्ट जवाबदेही ही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है, PR में मतदाता को अपना निजी प्रतिनिधि पहचानना मुश्किल हो जाता है।
4. भारत जैसे विशाल और विविध देश में PR से स्थिर संसदीय सरकार बनाना कठिन हो सकता है, जैसा इज़राइल के अक्सर गठबंधन बनने के अनुभव से पता चलता है।
5. FPTP के अनुभव ने अब तक भारत में शांतिपूर्ण सत्ता-परिवर्तन और स्थिर सरकारें दी हैं, इसे पूरी तरह छोड़ना जोखिम भरा हो सकता है।
संतुलित निष्कर्ष: भारत को शायद पूरी तरह PR अपनाने की बजाय, दोनों प्रणालियों को मिलाने वाला कोई मिला-जुला (mixed) मॉडल आज़माना चाहिए, जैसा कुछ देशों में पहले से चलन में है, ताकि सादगी और स्थिरता के साथ-साथ बेहतर प्रतिनिधित्व भी मिल सके।