NCERT की पाठ्यपुस्तक भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार के अध्याय 3 «चुनाव और प्रतिनिधित्व» की प्रश्नावली के दसों प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
1 प्रत्यक्ष लोकतंत्र के सबसे नज़दीक कौन
प्र. निम्नलिखित में कौन प्रत्यक्ष लोकतंत्र के सबसे नज़दीक बैठता है?
(क) परिवार की बैठक में होने वाली चर्चा
(ख) कक्षा-संचालक (क्लास-मॉनीटर) का चुनाव
(ग) किसी राजनीतिक दल द्वारा अपने उम्मीदवार का चयन
(घ) मीडिया द्वारा करवाये गये जनमत-संग्रह
उत्तर: (क)। प्रत्यक्ष लोकतंत्र वह है जिसमें लोग ख़ुद, बिना किसी प्रतिनिधि के, फ़ैसले में हिस्सा लें। इन चार में परिवार की बैठक ही ऐसी है जहाँ सभी सदस्य ख़ुद मौजूद रहकर सीधे चर्चा और फ़ैसले में शामिल होते हैं। क्लास-मॉनीटर का चुनाव ख़ुद एक प्रतिनिधि चुनने का उदाहरण है, दल का उम्मीदवार-चयन आंतरिक प्रक्रिया है, और मीडिया का जनमत-संग्रह कोई बाध्यकारी फ़ैसला नहीं है।
ध्यान दें: अंग्रेज़ी संस्करण में इसी प्रश्न का एक पाँचवाँ विकल्प है, “ग्राम सभा द्वारा लिए गए फ़ैसले”, और तब उत्तर वही होता है। हिंदी संस्करण में यह विकल्प है ही नहीं, इसलिए हिंदी माध्यम के छात्र (क) लिखें।
2 निर्वाचन आयोग का काम नहीं
प्र. निम्नलिखित में कौन-सा कार्य निर्वाचन आयोग द्वारा नहीं किया जाता?
(क) मतदाता-सूची तैयार करना
(ख) उम्मीदवारों का नामांकन करना
(ग) मतदान-केंद्रों की स्थापना करना
(घ) आचार-संहिता लागू करना
(ङ) पंचायत चुनावों का पर्यवेक्षण करना
उत्तर: (ख) और (ङ) दोनों। उम्मीदवारों का नामांकन स्वयं उम्मीदवार या उसका दल करता है, निर्वाचन आयोग सिर्फ़ नामांकन की जाँच-प्रक्रिया की देखरेख करता है, वह किसी का नामांकन ख़ुद नहीं करता। पंचायत और नगर निकाय चुनावों का पर्यवेक्षण राज्य निर्वाचन आयुक्त करते हैं, निर्वाचन आयोग नहीं। बाक़ी तीनों (मतदाता-सूची, मतदान-केंद्र, आचार-संहिता) निर्वाचन आयोग के ही काम हैं।
3 राज्य सभा और लोक सभा में क्या समान
प्र. निम्नलिखित में कौन-सी बात राज्य सभा और लोक सभा के सदस्यों के चुनाव की प्रणाली में समान है?
(क) 18 वर्ष से ज़्यादा उम्र का हर नागरिक मतदान करने के योग्य है
(ख) मतदाता विभिन्न प्रत्याशियों को वरीयता क्रम में रख सकता है
(ग) प्रत्येक मत का समान मूल्य होता है
(घ) विजयी उम्मीदवार को आधे से अधिक मत प्राप्त होने चाहिए
उत्तर: (ग)। दोनों प्रणालियों में हर मत का मूल्य समान होता है। बाक़ी विकल्प ग़लत हैं: (क) राज्य सभा में मतदाता आम जनता नहीं, विधायक होते हैं, इसलिए 18 वर्ष की उम्र की शर्त लोक सभा पर लागू होती है, राज्य सभा पर नहीं। (ख) वरीयता क्रम सिर्फ़ राज्य सभा (एकल संक्रमणीय मत) में होता है, लोक सभा (सर्वाधिक मत से जीत) में नहीं। (घ) राज्य सभा में कोटा-आधारित जीत होती है, पर लोक सभा में विजेता को आधे से ज़्यादा वोट मिलना ज़रूरी नहीं।
4 सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली में विजेता कौन
प्र. सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली में वही प्रत्याशी विजेता घोषित किया जाता है जो:
(क) सर्वाधिक संख्या में मत अर्जित करता है
(ख) देश में सर्वाधिक मत पाने वाले दल का सदस्य हो
(ग) चुनाव-क्षेत्र के अन्य उम्मीदवारों से ज़्यादा मत हासिल करता है
(घ) 50 प्रतिशत से अधिक मत हासिल करके प्रथम स्थान पर आता है
उत्तर: (ग)। सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली में विजेता वह होता है जिसे अपने चुनाव-क्षेत्र में बाक़ी सब उम्मीदवारों से ज़्यादा वोट मिलते हैं, चाहे वे कुल वोटों के आधे से कम ही क्यों न हों। यहाँ (क) और (ग) में फ़र्क़ बारीक है और यही प्रश्न की जान है: (क) यह नहीं बताता कि मत कहाँ सबसे ज़्यादा हों, जबकि सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली का फ़ैसला हमेशा चुनाव-क्षेत्र के भीतर होता है, पूरे देश के जोड़ पर नहीं। (ख) ग़लत है क्योंकि देश भर में दल को मिले वोट से जीत तय नहीं होती, और (घ) ग़लत है क्योंकि 50 प्रतिशत की कोई शर्त नहीं।
प्र. आरक्षित चुनाव-क्षेत्र और पृथक निर्वाचन-मंडल की व्यवस्था में क्या अंतर है? संविधान निर्माताओं ने पृथक निर्वाचन-मंडल को क्यों स्वीकार नहीं किया?
उत्तर:
1. अंतर: पृथक निर्वाचन-मंडल में किसी समुदाय के प्रतिनिधि को केवल उसी समुदाय के मतदाता चुनते थे, यानी मतदाता वर्ग ही समुदाय के आधार पर बँटा होता था। आरक्षित चुनाव-क्षेत्र में क्षेत्र के सभी मतदाता, चाहे वे किसी भी समुदाय के हों, वोट डाल सकते हैं, पर उम्मीदवार सिर्फ़ आरक्षित समुदाय से ही खड़ा हो सकता है।
2. क्यों नहीं अपनाया गया: संविधान सभा में तजम्मुल हुसैन जैसे सदस्यों ने चेतावनी दी कि पृथक निर्वाचन-मंडल भारत के लिए अभिशाप साबित हुए हैं और इन्होंने देश को बेहिसाब नुक़सान पहुँचाया है।
3. डर यह था कि इस व्यवस्था से समुदाय राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ जाएँगे, आपस में घुल-मिल नहीं पाएँगे, जिससे राष्ट्रीय एकता कमज़ोर होगी।
4. जयपाल सिंह जैसे आदिवासी प्रतिनिधियों ने भी पृथक निर्वाचन-मंडल की जगह सीटों के आरक्षण का समर्थन किया, यह कहते हुए कि वे राष्ट्र में घुलना-मिलना चाहते हैं, अलग-थलग नहीं रहना चाहते।
6 ग़लत कथन सुधारें
प्र. निम्नलिखित में कौन-सा कथन ग़लत है? इसकी पहचान करें और किसी एक शब्द या पद को बदलकर, जोड़कर या नए क्रम में सजाकर इसे सही करें।
(क) सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली का पालन भारत के हर चुनाव में होता है।
(ख) निर्वाचन आयोग पंचायत और नगरपालिका के चुनावों का पर्यवेक्षण नहीं करता।
(ग) भारत के राष्ट्रपति किसी चुनाव आयुक्त को नहीं हटा सकते।
(घ) निर्वाचन आयोग में एक से ज़्यादा चुनाव आयुक्त की नियुक्ति अनिवार्य है।
उत्तर:
(क) ग़लत है। सुधार: “सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली का पालन भारत के अधिकांश चुनावों में होता है” (राज्य सभा, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में समानुपातिक प्रतिनिधित्व (एकल संक्रमणीय मत) प्रणाली अपनाई जाती है, इसलिए ‘हर चुनाव’ कहना ग़लत है)।
(ग) ग़लत है। सुधार: “भारत के राष्ट्रपति चुनाव आयुक्तों को हटा सकते हैं” (राष्ट्रपति चुनाव आयुक्तों को हटा सकते हैं, हालाँकि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए विशेष बहुमत की शर्त है)।
(घ) ग़लत है। सुधार: “निर्वाचन आयोग में एक से ज़्यादा चुनाव आयुक्त की नियुक्ति अनिवार्य नहीं है” (किताब के शब्दों में, “भारत का निर्वाचन आयोग एक सदस्यीय या बहु-सदस्यीय भी हो सकता है”। 1989 तक यह एक-सदस्यीय था, 1993 से बहु-सदस्यीय बना हुआ है, पर संविधान बहु-सदस्यीय होना अनिवार्य नहीं करता)।
सिर्फ़ (ख) सही कथन है, क्योंकि पंचायत और नगरपालिका के चुनाव राज्य निर्वाचन आयुक्त कराते हैं, निर्वाचन आयोग नहीं।
7 महिला प्रतिनिधित्व सुधारने के उपाय
प्र. भारतीय चुनाव-व्यवस्था का लक्ष्य समाज के कमज़ोर तबक़ों की नुमाइंदगी सुनिश्चित करना है, लेकिन हमारी विधायिका में महिला सदस्यों की संख्या केवल 12 प्रतिशत तक पहुँची है। इस स्थिति में सुधार के लिए आप क्या उपाय सुझाएँगे?
उत्तर:
1. क़ानूनी आरक्षण: नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 को जल्द से जल्द पूरी तरह लागू करना, जो लोक सभा और विधान सभाओं में महिलाओं के लिए सीट-आरक्षण का प्रावधान करता है।
2. पार्टी टिकट-वितरण में सुधार: राजनीतिक दलों को अपने उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं का एक न्यूनतम अनुपात तय करने के लिए प्रोत्साहित या बाध्य करना।
3. राजनीतिक भागीदारी बढ़ाना: स्थानीय निकायों में पहले से लागू महिला आरक्षण का अनुभव दिखाता है कि इससे महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी और नेतृत्व क्षमता, दोनों बढ़ती हैं; इसी अनुभव को ऊपर के स्तरों पर भी दोहराया जा सकता है।
4. जागरूकता और समर्थन: मतदाताओं में महिला उम्मीदवारों के प्रति भरोसा बढ़ाने के लिए जागरूकता अभियान, और निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण व संसाधन उपलब्ध कराना।
8 सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली या समानुपातिक प्रतिनिधित्व : चार इच्छाएँ
प्र. एक नए देश के संविधान पर हुई एक संगोष्ठी में वक्ताओं ने निम्नलिखित इच्छाएँ जताईं। हर कथन के लिए बताएँ कि उनके लिए सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली या समानुपातिक प्रतिनिधित्व, कौन-सी प्रणाली उपयुक्त होगी।
(क) लोगों को साफ़-साफ़ पता होना चाहिए कि उनका प्रतिनिधि कौन है, ताकि वे उसे निजी तौर पर जवाबदेह ठहरा सकें।
(ख) हमारे यहाँ भाषाई रूप से अल्पसंख्यक छोटे-छोटे समुदाय हैं जो पूरे देश में फैले हैं, हमें उनकी ठीक-ठीक नुमाइंदगी सुनिश्चित करनी चाहिए।
(ग) अलग-अलग दलों के बीच सीट और वोट को लेकर कोई विसंगति नहीं होनी चाहिए।
(घ) लोग किसी अच्छे उम्मीदवार को चुनने में समर्थ होने चाहिए, भले ही वे उसके राजनीतिक दल को पसंद न करते हों।
उत्तर:
(क) सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली उपयुक्त है। इसमें हर क्षेत्र का सिर्फ़ एक प्रतिनिधि होता है, इसलिए मतदाता आसानी से जान सकते हैं कि उन्हें किसके पास जाना है।
(ख) समानुपातिक प्रतिनिधित्व उपयुक्त है। छोटे और बिखरे हुए भाषाई समुदाय किसी एक क्षेत्र में बहुमत में नहीं होते, इसलिए सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली में उन्हें कहीं भी सीट मिलना मुश्किल है। समानुपातिक प्रतिनिधित्व में पूरे देश के उनके वोट जोड़कर उन्हें उचित प्रतिनिधित्व मिल सकता है।
(ग) समानुपातिक प्रतिनिधित्व उपयुक्त है। समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की परिभाषा ही यह है कि हर दल को वोट के अनुपात में ही सीटें मिलें, यानी सीट-वोट में कोई विसंगति नहीं रहती।
(घ) सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली उपयुक्त है। सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली में मतदाता सीधे उम्मीदवार को वोट देता है, इसलिए वह पार्टी से अलग हटकर भी किसी अच्छे उम्मीदवार को चुन सकता है। समानुपातिक प्रतिनिधित्व में मतदाता पार्टी को वोट देता है, व्यक्तिगत उम्मीदवार को चुनने की यह आज़ादी नहीं मिलती।
प्र. एक भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने एक राजनीतिक दल का सदस्य बनकर चुनाव लड़ा। इस पर दो विचार सामने आए। एक विचार है कि भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एक स्वतंत्र नागरिक है और उसे किसी भी दल में शामिल होने व चुनाव लड़ने का अधिकार है। दूसरे विचार के अनुसार, ऐसा होने देने से निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है, इसलिए भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं देनी चाहिए। आप किस पक्ष से सहमत हैं और क्यों?
उत्तर: दूसरे पक्ष से ज़्यादा सहमति बनती है, कारण इस प्रकार हैं:
1. निर्वाचन आयोग की सबसे बड़ी ताक़त उसकी निष्पक्षता है। अगर मुख्य चुनाव आयुक्त पद छोड़ते ही किसी दल में शामिल हो सकें, तो पद पर रहते हुए भी उनके फ़ैसलों में भविष्य के राजनीतिक हितों का प्रभाव आने की आशंका बनी रहेगी।
2. सिर्फ़ आशंका होना ही काफ़ी है, क्योंकि निर्वाचन आयोग जैसी संस्था की साख उसके सचमुच निष्पक्ष होने पर नहीं, बल्कि जनता के उसे निष्पक्ष मानने पर भी टिकी है।
3. फिर भी नागरिक अधिकारों के पक्ष का तर्क कमज़ोर नहीं है, हर नागरिक को राजनीति में भाग लेने और चुनाव लड़ने का मौलिक अधिकार है, जिसे किसी एक पूर्व पद के आधार पर स्थायी रूप से नहीं छीना जा सकता।
4. इसलिए एक संतुलित रास्ता यह हो सकता है कि भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त और आयुक्तों के लिए पद छोड़ने के बाद एक निश्चित ‘शीतलन अवधि’ (cooling-off period) तय की जाए, जिसके दौरान वे कोई राजनीतिक पद न लें, ठीक वैसे ही जैसे कुछ अन्य संवैधानिक पदों के लिए होता है।
10 क्या भारत समानुपातिक प्रतिनिधित्व अपनाने के लिए तैयार है?
प्र. “भारतीय लोकतंत्र अब उस अनगढ़ ‘सर्वाधिक मत से जीत’ प्रणाली को छोड़कर समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली अपनाने के लिए तैयार हो चुका है।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? पक्ष या विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर: यह एक खुला प्रश्न है, दोनों तरफ़ के तर्क समझकर अपना संतुलित पक्ष रखा जा सकता है।
पक्ष में तर्क (समानुपातिक प्रतिनिधित्व अपनाना चाहिए):
1. सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली में वोट और सीट के बीच भारी असंतुलन आता है, जैसा 1984 के उदाहरण में देखा गया।
2. समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली छोटे और बिखरे समुदायों को बेहतर प्रतिनिधित्व दे सकती है।
विपक्ष में तर्क (सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली बनी रहनी चाहिए):
3. सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली की सादगी और स्पष्ट जवाबदेही ही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है, समानुपातिक प्रतिनिधित्व में मतदाता को अपना निजी प्रतिनिधि पहचानना मुश्किल हो जाता है।
4. भारत जैसे विशाल और विविध देश में समानुपातिक प्रतिनिधित्व से स्थिर संसदीय सरकार बनाना कठिन हो सकता है, जैसा इज़राइल के अक्सर गठबंधन बनने के अनुभव से पता चलता है।
5. सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली के अनुभव ने अब तक भारत में शांतिपूर्ण सत्ता-परिवर्तन और स्थिर सरकारें दी हैं, इसे पूरी तरह छोड़ना जोखिम भरा हो सकता है।
संतुलित निष्कर्ष: भारत को शायद पूरी तरह समानुपातिक प्रतिनिधित्व अपनाने की बजाय, दोनों प्रणालियों को मिलाने वाला कोई मिला-जुला (mixed) मॉडल आज़माना चाहिए, जैसा कुछ देशों में पहले से चलन में है, ताकि सादगी और स्थिरता के साथ-साथ बेहतर प्रतिनिधित्व भी मिल सके।
11 पाठ के बीच के प्रश्न
अध्याय के बीच में भी कई प्रश्न पूछे गए हैं: शुरुआती चर्चा में, ‘कार्टून बूझें’ में, हाशिये की टिप्पणियों में, ‘खुद करें-खुद सीखें’ में, इज़राइल वाले बॉक्स में, ‘कहाँ पहुँचे? क्या समझे?’ में और विशेष बहुमत वाले बॉक्स में। इनके उत्तर नीचे उसी क्रम में दिए गए हैं जिस क्रम में ये पुस्तक में आते हैं, प्रश्न पुस्तक के अपने शब्दों में।
प्र. क्या बिना चुनाव के लोकतंत्र कायम रह सकता है? क्या बिना लोकतंत्र के चुनाव हो सकता है?
उत्तर. किसी बड़े आधुनिक लोकतंत्र में बिना चुनाव के काम नहीं चल सकता। सभी नागरिक हर फ़ैसले में सीधे भाग नहीं ले सकते, इसलिए वे प्रतिनिधि चुनते हैं, और प्रतिनिधि चुनने का तरीक़ा ही चुनाव है। बिना चुनाव का प्रत्यक्ष लोकतंत्र केवल छोटे स्तर पर संभव है, जैसे प्राचीन यूनान के नगर-राज्य या ग्राम सभा। दूसरी ओर, बिना लोकतंत्र के भी चुनाव हो सकते हैं: अनेक गैर-लोकतांत्रिक शासक चुनाव कराते हैं, पर ऐसे ढंग से कि उनके शासन को कोई खतरा न हो, यानी चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं होते। अतः लोकतंत्र के लिए चुनाव ज़रूरी हैं, पर अकेले काफ़ी नहीं।
प्र. कहा जाता है कि चुनाव लोकतंत्र का त्यौहार है लेकिन इस कार्टून में उसे एक आफत के रूप में दिखाया गया है। क्या यह लोकतंत्र के लिए अच्छा है?
उत्तर. भारत जैसे बड़े देश में चुनाव के समय शोर, भीड़ और भाग-दौड़ होती ही है: रैलियाँ, प्रचार और समर्थकों की भीड़। पर इस शोर के पीछे निर्वाचन आयोग नियमों, तय कार्यक्रम और आचार-संहिता के साथ चुनाव व्यवस्थित ढंग से कराता है, और सब लोग नतीजे को स्वीकार करते हैं। जनता का उत्साह और भागीदारी लोकतंत्र के लिए अच्छी है, क्योंकि इससे पता चलता है कि लोग अपनी सरकार चुनने को महत्त्व देते हैं। असली अव्यवस्था, जैसे हिंसा, धाँधली या डराना-धमकाना, लोकतंत्र के लिए बुरी है, और निर्वाचन आयोग के पास इसे रोकने की शक्ति है, यहाँ तक कि वह चुनाव टाल या रद्द भी कर सकता है।
प्र. क्या आप ऐसे कुछ गैर-लोकतांत्रिक चुनावों के उदाहरण दे सकते हैं? आपकी राय में कौन-सी बात एक लोकतांत्रिक चुनाव को एक गैर-लोकतांत्रिक चुनाव से अलग करती है? किसी देश में चुनावों को लोकतांत्रिक ढंग से संपन्न कराना सुनिश्चित करने के लिए क्या करना चाहिये?
उत्तर. उदाहरण: ऐसे देश जहाँ एक ही सत्ताधारी दल किसी असली विपक्ष को चुनाव नहीं लड़ने देता, या जहाँ सैनिक शासक केवल लोकतांत्रिक दिखने के लिए चुनाव कराते हैं और नतीजा पहले से तय होता है। लोकतांत्रिक चुनाव की पहचान है: हर वयस्क को वोट का अधिकार; हर नागरिक को चुनाव लड़ने का अधिकार; उम्मीदवारों और दलों के बीच असली विकल्प; स्वतंत्र प्रचार; गुप्त मतदान; निष्पक्ष संस्था द्वारा सही गिनती; और सत्ताधारी दल हार जाए तब भी नतीजे को स्वीकार करना। इसे सुनिश्चित करने के लिए कौन वोट देगा, कौन चुनाव लड़ेगा, कौन देख-रेख करेगा और वोट कैसे गिने जाएँगे, ये बुनियादी नियम संविधान में लिखे होने चाहिए, और चुनाव एक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग को कराने चाहिए।
प्र. इन नियमों को संविधान में लिखने की क्या ज़रूरत है? इन्हें संसद क्यों नहीं तय करती? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि ये नियम चुनाव से पहले सभी दल मिलकर तय करें?
उत्तर. क्योंकि यही नियम तय करते हैं कि कौन जीतेगा, इसलिए इन्हें खेल शुरू होने से पहले, खिलाड़ियों से ऊपर की किसी सत्ता द्वारा तय किया जाना चाहिए। संसद पर सत्ताधारी दल का नियंत्रण होता है, जो ख़ुद एक खिलाड़ी है; अगर वह जब चाहे नियम बदल सके, तो हर चुनाव से पहले अपने फ़ायदे के लिए बदल देगा। हर चुनाव से पहले सब दलों को सहमत करना अनिश्चित और अस्थिर होगा, और ताकतवर दल हावी हो जाएँगे। बुनियादी नियम संविधान में लिखने से वे किसी एक सरकार की पहुँच से बाहर हो जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे खेल के नियम और अंपायर खेल शुरू होने से पहले तय होते हैं। ब्योरे फिर भी विधायिका कानून बनाकर तय करती है।
प्र. भारत तथा किसी अन्य देश के चुनावों के संबंध में अखबारों की खबरों को काटें। उन कतरनों को निम्न वर्गों में बाँटें: प्रतिनिधित्व की व्यवस्था; मतदाताओं की योग्यता; चुनाव आयोग की भूमिका। यदि आपके पास इंटरनेट है, तो भारत निर्वाचन आयोग और ACE प्रोजेक्ट (The Electoral Knowledge Network) की वेबसाइट पर जाएँ और इन विषयों पर चार देशों के बारे में सूचनाएँ एकत्र करें।
उत्तर. यह परियोजना कार्य है; कतरनें आपकी अपनी होंगी। एक नमूना वर्गीकरण: प्रतिनिधित्व की व्यवस्था: सर्वाधिक वोट से जीत वाली प्रणाली से लोक सभा के नतीजे, राज्य सभा के चुनाव, या इज़राइल और नीदरलैंड जैसे देशों में समानुपातिक प्रतिनिधित्व से हुए चुनाव की खबरें। मतदाताओं की योग्यता: 18 वर्ष पूरे होने पर नए मतदाताओं का नाम जोड़ना, मतदाता-सूची का पुनरीक्षण। चुनाव आयोग की भूमिका: चुनाव कार्यक्रम की घोषणा, आचार-संहिता, किसी बूथ पर पुनर्मतदान का आदेश, चुनाव के दौरान अधिकारियों का तबादला। चार देशों की तुलना के लिए भारत (सर्वाधिक वोट से जीत, मताधिकार की आयु 18), ब्रिटेन (सर्वाधिक वोट से जीत), इज़राइल (समानुपातिक प्रतिनिधित्व, पूरा देश एक निर्वाचन क्षेत्र) और अर्जेंटीना या पुर्तगाल (बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों वाला समानुपातिक प्रतिनिधित्व) लिए जा सकते हैं।
प्र. अपनी कक्षा में चुनाव सम्पन्न कर चार कक्षा-प्रतिनिधियों को तीन अलग-अलग तरीकों से चुनें: हर छात्र एक वोट दे, सबसे अधिक वोट वाले चार चुने जाएँ; हर छात्र के पास चार वोट हों जिन्हें वह एक ही प्रत्याशी को दे या बाँट दे; हर छात्र वरीयता क्रम में वोट दे और गणना राज्य सभा वाली विधि से हो। क्या इन सभी तरीकों से चुनाव कराने पर वही चार लोग चुनाव जीते? यदि नहीं, तो क्या फर्क पड़ा? और क्यों?
उत्तर. आम तौर पर तीनों तरीकों में वही चार लोग नहीं जीतते। एक-एक वोट वाले तरीके में कक्षा के सबसे बड़े समूह के लोकप्रिय प्रत्याशी अक्सर चारों सीटें ले जाते हैं। चार वोट इकट्ठे देने वाले तरीके में एक छोटा समूह अपने सारे वोट एक ही प्रत्याशी को देकर उसे जिता सकता है, यानी अल्पसंख्यक समूह को भी प्रतिनिधित्व मिल जाता है। वरीयता क्रम और कोटा वाले तरीके (राज्य सभा की तरह) में हटाए गए प्रत्याशियों के वोट दूसरी वरीयता को चले जाते हैं, इसलिए नतीजा पूरी कक्षा की पसंद को ज़्यादा न्यायपूर्ण ढंग से दिखाता है। यही अध्याय की मुख्य बात है: वोट गिनने के नियम तय करते हैं कि कौन जीतेगा, कुछ नियम बड़े समूहों के पक्ष में होते हैं और कुछ छोटे समूहों की मदद करते हैं।
प्र. 50 प्रतिशत से भी कम वोट और 80 प्रतिशत से अधिक सीटें! क्या यह ठीक है? हमारे संविधान निर्माताओं ने ऐसी गड़बड़ व्यवस्था को कैसे स्वीकार किया?
उत्तर. यह अनुचित लगता है, क्योंकि हारने वाले उम्मीदवारों को मिले वोट ‘बर्बाद’ हो जाते हैं। पर संविधान निर्माताओं ने इस प्रणाली को ठोस कारणों से अपनाया: यह आम मतदाता के लिए समझने में सरल है; हर निर्वाचन क्षेत्र का एक प्रतिनिधि होता है जिसे जवाबदेह ठहराया जा सकता है; यह सबसे बड़े दल या गठबंधन को कुछ बोनस सीटें देकर संसदीय व्यवस्था में स्थायी सरकार बनाने में मदद करती है; और यह किसी क्षेत्र में विभिन्न सामाजिक वर्गों को एकजुट होकर चुनाव जीतने के लिए प्रेरित करती है, बजाय इसके कि हर समुदाय अपनी अलग पार्टी बनाए। साथ ही उन्होंने आरक्षित चुनाव-क्षेत्रों की व्यवस्था की ताकि वंचित वर्ग प्रतिनिधित्व से बाहर न रह जाएँ।
प्र. यह तो बड़ा भ्रम पैदा करने वाला है। इस व्यवस्था में हमें कैसे पता चलेगा कि हमारा सांसद या विधायक कौन है? यदि मुझे कोई काम कराना है, तो मैं किसके पास जाऊँगा?
उत्तर. यही समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली की कमज़ोरी है। इसमें मतदाता उम्मीदवार को नहीं, पार्टी को वोट देता है और प्रतिनिधि पार्टी की सूची से चुने जाते हैं; बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र में एक ही क्षेत्र से अलग-अलग दलों के कई प्रतिनिधि होते हैं। इसलिए कोई एक प्रतिनिधि ऐसा नहीं होता जो किसी एक इलाके का प्रतिनिधित्व करे और उसके लिए जवाबदेह हो। मतदाता को आम तौर पर अपनी पसंद के दल के स्थानीय कार्यालय या क्षेत्र के किसी भी प्रतिनिधि के पास जाना पड़ता। सर्वाधिक वोट से जीत वाली प्रणाली में हर निर्वाचन क्षेत्र का ठीक एक सांसद या विधायक होता है जिसे जवाबदेह ठहराया जा सकता है, और यह भारत द्वारा इस प्रणाली को अपनाने का एक कारण है।
प्र. निम्नलिखित सारणी में 2015 के नेसेट के चुनाव-परिणाम दिये गये हैं। इसके आधार पर आप यह पता लगा सकते हैं कि विभिन्न पार्टियों को कितने प्रतिशत सीट मिलीं।
उत्तर. नेसेट में कुल 120 सीटें हैं, इसलिए सीटों का प्रतिशत = सीटें ÷ 120 × 100:
लिकुड: 30 सीटें = 25.00% (वोट 23.40%)
ज़ियोनिस्ट शिविर: 24 सीटें = 20.00% (वोट 18.67%)
संयुक्त सूची: 13 सीटें = 10.83% (वोट 10.61%)
येश ऐटिड: 11 सीटें = 9.17% (वोट 8.82%)
कुलानु: 10 सीटें = 8.33% (वोट 7.49%)
हबायित हयेहुदी: 8 सीटें = 6.67% (वोट 6.74%)
शास: 7 सीटें = 5.83% (वोट 5.74%)
इज़राइल बीइटेनु: 6 सीटें = 5.00% (वोट 5.10%)
यू टी जे: 6 सीटें = 5.00% (वोट 4.99%)
इज़राइल का वामपक्ष: 5 सीटें = 4.17% (वोट 3.93%)
अन्य दल: 0 सीट = 0% (वोट 4.51%, हर दल 3.25% की न्यूनतम सीमा से नीचे)।
हर दल की सीटों का प्रतिशत उसके वोटों के प्रतिशत के बहुत क़रीब है; छोटा-सा अंतर इसलिए है कि 3.25% से कम वोट वाले दलों के वोट सीटों में नहीं गिने जाते। किसी भी दल को 61 सीटों का बहुमत नहीं मिला, इसलिए गठबंधन सरकार बनानी पड़ी।
प्र. इस कार्टून में भीमकाय काँग्रेस के आगे विपक्ष एक बौने के रूप में दिखाया गया है। क्या यह हमारी निर्वाचन प्रणाली का परिणाम था?
उत्तर. 1949 में तो नहीं। यह कार्टून (29 मई 1949) जब छपा, तब तक संविधान के तहत कोई आम चुनाव हुआ ही नहीं था: संविधान सभा, जो उस समय विधायिका का काम भी कर रही थी, प्रांतीय विधान सभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुनी गई थी और उसमें काँग्रेस का दबदबा था। उस समय का बौना विपक्ष राष्ट्रीय आंदोलन के बाद काँग्रेस के प्रभुत्व का परिणाम था, सर्वाधिक वोट से जीत वाली प्रणाली का नहीं। पर कार्टून उस असर की ओर इशारा करता है जो इस प्रणाली ने बाद में दिखाया: सबसे बड़े दल को उसके वोटों के अनुपात से कहीं ज़्यादा सीटें मिल जाती हैं और हारे हुए उम्मीदवारों के वोट बेकार चले जाते हैं, इसलिए ठीक-ठाक वोट पाने वाले विपक्षी दलों को भी बहुत कम सीटें मिल सकती हैं। शुरुआती आम चुनावों में इसने काँग्रेस के दबदबे के साथ मिलकर विपक्ष को छोटा रखा; 1989 के बाद इसी प्रणाली में गठबंधन सरकारें और मज़बूत विपक्षी दल भी उभरे।
प्र. नीचे 2016 में तमिलनाडु विधान सभा चुनाव के परिणाम दिये गये हैं (कुल सीटें 234)। विधान सभा की संरचना कैसी होती यदि वहाँ इज़राइल की तरह समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली होती? किस पार्टी का बहुमत होगा? कौन सरकार बनायेगा? इस व्यवस्था का राजनीतिक दलों के संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
उत्तर. 234 सीटें वोटों के अनुपात में बाँटने पर (नोटा के 1.30% वोट छोड़कर) विधान सभा लगभग ऐसी होती: ए आई ए डी एम के 97 (असल में 135), डी एम के 75 (88), आई एन सी 15 (8), पी एम के 12 (0), बी जे पी 7 (0), डी एम डी के 6 (0), सी पी आई 2 (0), आई यू एम एल 2 (1), अन्य दल 15 (0), निर्दलीय 3 (0)। अगर इज़राइल की तरह 3.25% की न्यूनतम सीमा भी लागू होती, तो बी जे पी, डी एम डी के, सी पी आई, आई यू एम एल और निर्दलीयों को कोई सीट न मिलती और उनका हिस्सा बड़े दलों में बँट जाता। दोनों ही स्थितियों में किसी भी दल को बहुमत (118 सीटें) नहीं मिलता। सरकार गठबंधन की बनती, सबसे बड़े दल ए आई ए डी एम के के नेतृत्व में और छोटे दलों के समर्थन से। प्रभाव यह होता कि दलों को चुनाव के बाद मोल-भाव और गठबंधन करने पड़ते, छोटे दलों का प्रभाव बढ़ जाता, और सरकारें सर्वाधिक वोट से जीत वाली प्रणाली की तुलना में कम स्थिर होतीं।
प्र. भारत की आबादी में मुसलमान 14.2 प्रतिशत हैं, लेकिन लोक सभा में मुसलमान सांसदों की संख्या सामान्यतः 6 प्रतिशत से थोड़ा कम रही है। तीन छात्रों ने अलग-अलग निष्कर्ष निकाले। हिलाल: यह सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली के अन्याय को दिखाता है, हमें समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली अपनानी चाहिये थी। आरिफ: मुसलमानों को भी उसी तरह का आरक्षण दिया जाय, जैसा अनुसूचित जातियों और जनजातियों को दिया गया। सबा: मुसलमान महिलाओं को इसमें कुछ भी नहीं मिलेगा, हमें मुसलमान महिलाओं के लिए अलग आरक्षण चाहिये। आप बतायें कि आप उनसे सहमत हैं या असहमत और क्यों?
उत्तर. हिलाल आंशिक रूप से सही है: सर्वाधिक मत वाली प्रणाली में जो समूह ज़्यादातर क्षेत्रों में अल्पसंख्यक हो, वह हर जगह हार सकता है, जबकि समानुपातिक प्रतिनिधित्व में दलों को वोटों के अनुपात में सीटें मिलती हैं। पर समानुपातिक प्रतिनिधित्व अपने आप ज़्यादा मुसलमान प्रतिनिधि की गारंटी नहीं देता, यह इस पर निर्भर है कि दल अपनी सूची में किसे रखते हैं, और इस प्रणाली की अपनी कमियाँ हैं, जैसे अस्थिर सरकारें और समुदाय के आधार पर दल बनना। आरिफ का सुझाव कठिन है: संविधान निर्माताओं ने धर्म के आधार पर प्रतिनिधित्व को अस्वीकार कर दिया था, जैसा तजम्मुल हुसैन का भाषण दिखाता है, और अनुसूचित जाति-जनजाति का आरक्षण जाति-आधारित भेदभाव और बहिष्कार पर आधारित है, धर्म पर नहीं। सबा की यह बात ठीक है कि हर समूह के अंदर महिलाएँ सबसे कम प्रतिनिधित्व पाती हैं, पर धर्म के आधार पर मुसलमान महिलाओं के अलग आरक्षण पर भी वही आपत्ति लागू होगी; बेहतर है कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व सामान्य रूप से बढ़ाया जाए, जैसा नारी शक्ति वंदन अधिनियम करता है, और दल मुसलमान उम्मीदवारों और महिलाओं को ज़्यादा टिकट दें।
प्र. मैं इतनी समझ रखती हूँ कि भविष्य में अपने करियर को चुन सकूँ और इतनी उम्रदराज़ हूँ कि ड्राइविंग लाइसेंस बना सकूँ, तो क्या मैं इतनी बड़ी नहीं कि वोट डाल सकूँ? यदि ये कानून मुझपर लागू होते हैं, तो मैं इन कानूनों को बनाने वाले के बारे में फ़ैसला क्यों नहीं ले सकती?
उत्तर. यह तर्क मज़बूत है, और इसी कारण मताधिकार की आयु घटाई गई। 1989 तक वयस्क भारतीय का मतलब 21 वर्ष से अधिक आयु का नागरिक था; 1989 में संविधान संशोधन से यह आयु घटाकर 18 वर्ष कर दी गई। 18 वर्ष का व्यक्ति करियर चुन सकता है, गाड़ी चला सकता है और कानून उस पर लागू होते हैं, इसलिए उचित है कि कानून बनाने वालों को चुनने में भी उसकी भागीदारी हो। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार इस विश्वास पर टिका है कि सभी वयस्क नागरिक बराबर रूप से यह तय करने में सक्षम हैं कि उनके और देश के लिए क्या अच्छा है।
प्र. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को हाथी के रूप में क्यों दिखाया गया है? क्या यह संभालने योग्य नहीं है? या यह उस कहानी की तरह है जिसमें कई अंधे हाथी के अलग-अलग अंगों के आधार पर उसे बताने की कोशिश करते हैं?
उत्तर. इसे हाथी इसलिए दिखाया गया है क्योंकि 1951-52 के पहले आम चुनाव में भारत जैसे विशाल और विविध देश के हर वयस्क को वोट देना एक बहुत बड़ा और अभूतपूर्व काम था, और कई लोगों को शक था कि करोड़ों मतदाता, जिनमें ज़्यादातर अनपढ़ थे, समझदारी से वोट दे पाएँगे। यह संभालने के बाहर साबित नहीं हुआ: पुस्तक के अनुसार 1951-52 से लोक सभा के 17 चुनाव हो चुके थे (18वाँ चुनाव 2024 में हुआ), और भागीदारी बढ़ती गई है। अंधों और हाथी की कहानी भी यहाँ लागू होती है: हर व्यक्ति या समूह मतदाताओं का केवल एक हिस्सा देखता है (अपनी जाति, क्षेत्र या हित), जबकि सार्वभौमिक मताधिकार पूरी जनता है, जिसे कोई एक हिस्सा न पूरी तरह समझ सकता है, न नियंत्रित कर सकता है।
प्र. क्या अब यह व्यवस्था स्थायी हो गई है या सरकार एक सदस्यीय निर्वाचन आयोग को दुबारा कायम कर सकती है? क्या संविधान इस खेल की आज्ञा देता है?
उत्तर. यह व्यवहार में तय हुआ है, संविधान से नहीं। संविधान के अनुसार निर्वाचन आयोग एक सदस्यीय या बहु-सदस्यीय, दोनों हो सकता है, इसलिए कानूनी रूप से सरकार इसे फिर एक सदस्यीय बना सकती है; 1989 के चुनाव के बाद ऐसा हुआ भी था। 1993 से यह बहु-सदस्यीय बना हुआ है, और अब आम सहमति है कि बहु-सदस्यीय आयोग ज़्यादा उपयुक्त है, क्योंकि इसमें शक्ति बँटी रहती है और जवाबदेही ज़्यादा होती है। इसलिए वापस जाना कानूनी रूप से संभव है, पर इसे आयोग को कमज़ोर करने की कोशिश मानकर कड़ी आलोचना होगी।
प्र. कल्पना करें कि आप की कक्षा में 75 विद्यार्थी हैं। लेकिन मतदान के दिन केवल 51 विद्यार्थी उपस्थित हैं और उनमें केवल 50 ने ही मतदान में भाग लिया। इस परिस्थिति में आप कब कह सकेंगे कि प्रस्ताव ‘विशेष बहुमत’ से पास हो गया है? अन्य उन दो स्थानों को ढूँढ़ें जहाँ पर विशेष बहुमत की चर्चा की गई है।
उत्तर. विशेष बहुमत के लिए दोनों शर्तें पूरी होनी चाहिए। उपस्थित और मतदान करने वालों का दो-तिहाई: 50 का दो-तिहाई 33.3 है, यानी कम से कम 34 वोट पक्ष में। कुल सदस्य संख्या का साधारण बहुमत: 75 के आधे से अधिक, यानी कम से कम 38 वोट पक्ष में। दोनों शर्तें तभी पूरी होंगी जब कम से कम 38 विद्यार्थी प्रस्ताव के पक्ष में वोट दें; इसलिए 50 में से 38 या उससे अधिक वोट मिलने पर प्रस्ताव विशेष बहुमत से पास माना जाएगा। (ध्यान दें: अंग्रेज़ी संस्करण में कक्षा में 57 विद्यार्थी दिए गए हैं, जहाँ उत्तर 34 आता है।) कार्यपालिका वाले अध्याय में राष्ट्रपति पर महाभियोग के अलावा, विशेष बहुमत की चर्चा न्यायपालिका वाले अध्याय में सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को हटाने के संबंध में, और ‘संविधान: एक जीवंत दस्तावेज़’ वाले अध्याय में संविधान संशोधन के संबंध में की गई है।
प्र. नेताजी चुनाव आयोग से डर गये हैं, वे कह रहे हैं कि हमें ‘निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव’ की चुनौती झेलनी है। नेता चुनाव आयोग से डरते क्यों हैं? क्या यह स्थिति लोकतंत्र के लिए अच्छी है?
उत्तर. नेता चुनाव आयोग से इसलिए डरते हैं क्योंकि आयोग ने अपनी शक्तियों का दृढ़ता से प्रयोग किया है: वह आदर्श आचार-संहिता लागू करता है, चुनाव ड्यूटी पर लगे अधिकारियों पर नियंत्रण रखता है और उनका तबादला कर सकता है, पुनर्मतदान या पुनर्गणना का आदेश दे सकता है, और स्वतंत्र-निष्पक्ष न हो सकने वाले चुनाव को टाल या रद्द कर सकता है। जो नेता पैसे, बाहुबल या सरकारी मशीनरी के सहारे जीतना चाहते हैं, वे आसानी से ऐसा नहीं कर पाते। हाँ, यह लोकतंत्र के लिए अच्छा है, क्योंकि चुनाव तभी स्वतंत्र और निष्पक्ष होते हैं जब सत्ता में बैठे लोग नियमों को अपने पक्ष में न मोड़ सकें, और इससे मतदाता का व्यवस्था में भरोसा बढ़ता है।
प्र. निर्वाचन आयोग को इन शक्तियों और विशेषाधिकारों को देने के बारे में आप क्या सोचते हैं? यदि ऐसा नहीं किया जाता तो क्या होता? (i) निर्वाचन आयोग चुनाव संबंधी कार्यों में लगाये गये सरकारी कर्मचारियों को आदेश दे सकता है। (ii) सरकार मुख्य निर्वाचन आयुक्त को नहीं हटा सकती। (iii) आयोग उस चुनाव को रद्द कर सकता है जो उसे निष्पक्ष न लगे।
उत्तर.
(i) आयोग के पास अपना बहुत सीमित कर्मचारी-वर्ग है और वह सरकार की प्रशासनिक मशीनरी से चुनाव कराता है। अधिकारी निष्पक्ष रहें, इसके लिए उन पर आयोग का नियंत्रण ज़रूरी है। यह शक्ति न होती तो सत्ताधारी दल अधिकारियों का इस्तेमाल अपने उम्मीदवारों के पक्ष में कर सकता था।
(ii) मुख्य निर्वाचन आयुक्त को संसद के दोनों सदनों की विशेष बहुमत से की गई सिफ़ारिश पर ही हटाया जा सकता है। कार्यकाल की यह सुरक्षा उसे निडर होकर काम करने देती है। यह न होती तो सत्ताधारी दल ऐसे आयुक्त को हटा सकता था जो उसका पक्ष लेने से इनकार करे।
(iii) यह शक्ति चुनाव की शुचिता की रक्षा करती है। यह न होती तो धाँधली, हिंसा या डराने-धमकाने से दूषित चुनाव को भी मानना पड़ता, और उसका नतीजा मतदाताओं की असली इच्छा नहीं दिखाता।
प्र. क्या कानून में परिवर्तन करके चुनावों में धन और बल के प्रयोग को रोका जा सकता है? क्या केवल कानून बदलने से कोई चीज़ वास्तव में बदलती है?
उत्तर. कानून मदद कर सकते हैं: चुनाव ख़र्च की सीमा, सरकारी कोष से चुनाव ख़र्च, आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों पर रोक और दलों के कामकाज का नियमन, ये सब धन और बल के असर को घटा सकते हैं। पर केवल कानून काफ़ी नहीं। अध्याय बताता है कि कानूनों और औपचारिक प्रावधानों की अपनी सीमाएँ हैं: स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तभी हो सकते हैं जब उम्मीदवार, दल और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े सभी लोग लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा की भावना का पालन करें। वास्तविक बदलाव के लिए सतर्क और सक्रिय नागरिक तथा निगरानी करने वाले स्वयंसेवी संगठन भी चाहिए। ख़ुद निर्वाचन आयोग का अनुभव दिखाता है कि पहले से मौजूद शक्तियों का प्रभावी इस्तेमाल बिना नए कानून के भी बहुत कुछ बदल सकता है।
प्र. क्या गंभीर अपराध में संलिप्त अपराधी के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध होना चाहिए?
उत्तर. इस पर दोनों पक्षों में तर्क हैं। पक्ष में: कानून बनाने वालों का रिकॉर्ड साफ़ होना चाहिए, और आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवार राजनीति में बाहुबल लाते हैं, इसीलिए चुनाव सुधार का एक सुझाव है कि आपराधिक मामले वाले उम्मीदवारों को, अपील लंबित होने पर भी, चुनाव लड़ने से रोका जाए। विपक्ष में: जब तक अदालत किसी को दोषी न ठहराए तब तक वह दोषी नहीं है, और विरोधियों को चुनाव से बाहर रखने के लिए झूठे मुकदमे भी दर्ज कराए जा सकते हैं। अभी कानून के अनुसार जिस व्यक्ति को किसी अपराध में दो या अधिक वर्ष की जेल हुई हो, वह चुनाव नहीं लड़ सकता। संतुलित रास्ता यह है कि गंभीर अपराधों में जिन पर अदालत आरोप तय कर चुकी हो उन्हें रोका जाए, और झूठे मुकदमों से बचाने के लिए मुकदमों की जल्दी सुनवाई हो।