1 परिचय
शतरंज खेलते वक़्त अगर काला घोड़ा अचानक ढाई घर की जगह सीधा चलने लगे तो क्या होगा? या क्रिकेट में कोई अंपायर ही न हो तो? किसी भी खेल में कुछ नियम मानने ही पड़ते हैं, और नियम बदलते ही खेल का नतीजा बदल जाता है। ठीक यही बात चुनावों पर भी लागू होती है।
- चुनाव कराने के अलग-अलग नियम या तरीक़े हो सकते हैं, और चुने गए नियम पर ही चुनाव का नतीजा निर्भर करता है
- चुनाव को निष्पक्ष ढंग से कराने के लिए एक तंत्र भी चाहिए
- ये दोनों फ़ैसले खेल शुरू होने से पहले तय होने चाहिए, इसलिए इन्हें किसी सरकार पर नहीं छोड़ा जा सकता
- इसीलिए चुनाव से जुड़े ये बुनियादी फ़ैसले किसी लोकतांत्रिक देश के संविधान में ही लिखे जाते हैं
दो सीधे सवालों से शुरुआत करते हैं: क्या बिना चुनाव के लोकतंत्र हो सकता है? और क्या बिना लोकतंत्र के चुनाव हो सकते हैं?
2.1 प्रत्यक्ष बनाम अप्रत्यक्ष लोकतंत्र
- बड़े लोकतंत्र में सभी नागरिक हर फ़ैसले में सीधे हिस्सा नहीं ले सकते, इसलिए लोग अपने प्रतिनिधि चुनते हैं
- यही वजह है कि चुनाव इतने महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं, भारत जैसे लोकतंत्र में हमारा ध्यान अक्सर पिछले चुनावों पर ही जाता है
प्रत्यक्ष लोकतंत्र
- नागरिक रोज़मर्रा के फ़ैसलों और शासन चलाने में ख़ुद सीधे हिस्सा लेते हैं
- प्राचीन यूनान के नगर-राज्य इसके उदाहरण माने जाते हैं; आज की ग्राम सभाएँ इसका सबसे निकटतम उदाहरण हैं
- लाखों-करोड़ों लोगों वाले देश में यह व्यावहारिक नहीं
अप्रत्यक्ष लोकतंत्र
- नागरिक अपने प्रतिनिधि चुनते हैं, वही शासन और प्रशासन चलाते हैं
- प्रतिनिधि चुनने के इसी तरीक़े को चुनाव कहते हैं
- नीति बनाने में नागरिकों की भूमिका सीमित और अप्रत्यक्ष रहती है
चुनाव होने का मतलब यह नहीं कि देश लोकतांत्रिक है। कई ग़ैर-लोकतांत्रिक शासक भी अपने को लोकतांत्रिक दिखाने के लिए इस तरह चुनाव कराते हैं कि उनकी सत्ता को कोई ख़तरा न हो। असली सवाल यह है कि चुनाव सचमुच स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं या नहीं।
2.2 संविधान के पाँच बुनियादी सवाल
चुनाव से जुड़े ये पाँच बुनियादी नियम हर लोकतांत्रिक संविधान तय करता है, और इनके ब्योरे विधायिका द्वारा बनाए क़ानूनों पर छोड़ दिए जाते हैं।
कौन मत देने के योग्य है?
कौन चुनाव लड़ने के योग्य है?
कौन चुनाव की देख-रेख करेगा?
मतदाता अपना प्रतिनिधि कैसे चुनेंगे?
वोटों की गिनती और प्रतिनिधि का चुनाव कैसे होगा?
पहले तीन सवाल यह सुनिश्चित करते हैं कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हों। आख़िरी दो सवाल यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रतिनिधित्व निष्पक्ष हो। इस अध्याय में हम दोनों पहलुओं पर बात करेंगे।
वोट डालने के बाद सबसे ज़्यादा वोट पाने वाला प्रत्याशी जीत जाता है, यह बात इतनी आम लगती है कि इस पर सोचने की ज़रूरत ही नहीं लगती। पर चुनाव कराने के कई अलग-अलग तरीक़े होते हैं, और हर तरीक़ा चुनाव के नतीजे को बदल सकता है। कुछ नियम बड़ी पार्टियों के पक्ष में जाते हैं, कुछ छोटी पार्टियों के; कुछ बहुसंख्यक समुदाय के पक्ष में, कुछ अल्पसंख्यकों की रक्षा करते हैं।
3.1 सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली (First Past the Post, FPTP)
सर्वाधिक मत से जीत वाली प्रणाली (First Past the Post, FPTP) वह प्रणाली है जिसमें देश को कई निर्वाचन क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है, हर क्षेत्र से एक प्रतिनिधि चुना जाता है, और जिस प्रत्याशी को उस क्षेत्र में सबसे ज़्यादा वोट मिलते हैं वही विजयी घोषित होता है, भले ही उसे आधे से ज़्यादा वोट न मिले हों। इसे बहुलवादी व्यवस्था (Plurality System) भी कहते हैं। यही भारत के संविधान में तय किया गया तरीक़ा है।
1984 के लोक सभा चुनाव में काँग्रेस पार्टी को 543 में से 415 सीटें मिलीं (415/543 = 76.4%)। NCERT इन्हें एक जगह “तीन-चौथाई सीटें” और दूसरी जगह “80 प्रतिशत से भी अधिक सीटें” कहता है; उत्तर में किताब का वाक्य “80 प्रतिशत से भी अधिक” लिखें। पर काँग्रेस को कुल वोटों का सिर्फ़ 48% ही मिला था। भाजपा को 7.4% वोट मिले, पर सिर्फ़ 2 सीटें। यह इसलिए हुआ क्योंकि जिन सीटों पर काँग्रेस जीती, वहाँ भी उसे अक्सर आधे से कम वोट मिले थे, बाक़ी वोट अलग-अलग उम्मीदवारों में बँट गए।
- जो उम्मीदवार हारते हैं, उन्हें मिले वोट ‘बर्बाद’ हो जाते हैं, उन्हें कोई सीट नहीं मिलती
- अगर किसी क्षेत्र में एक पार्टी को सिर्फ़ 25% वोट मिलें, पर बाक़ी सबको उससे भी कम, तो वह पार्टी सिर्फ़ 25% वोटों पर ही सारी सीटें जीत सकती है
3.2 समानुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation, PR)
समानुपातिक प्रतिनिधित्व (PR) वह प्रणाली है जिसमें हर पार्टी को विधायिका में उतने ही प्रतिशत सीटें मिलती हैं जितना उसे वोट का प्रतिशत मिला है। मतदाता उम्मीदवार को नहीं, पार्टी को वोट देता है, और हर पार्टी अपनी पहले से घोषित सूची में से उतने उम्मीदवार चुन लेती है।
- इज़राइल में पूरा देश एक ही निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है; नीदरलैंड भी इसी तरह
- अर्जेंटीना और पुर्तगाल जैसे देशों में इसकी जगह देश को कई बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों में बाँटा जाता है
- दोनों ही रूपों में मतदाता पार्टी को वोट देता है, उम्मीदवार को नहीं
इज़राइल में हर चार साल में चुनाव होते हैं। हर पार्टी को उसके वोट-प्रतिशत के अनुपात में ही सीटें मिलती हैं, इसलिए सीमित जनाधार वाली छोटी पार्टियों को भी विधायिका में कुछ प्रतिनिधित्व मिल जाता है। शर्त यह है कि सीट पाने के लिए पार्टी को कम से कम 3.25% वोट मिलने चाहिए। 2015 के चुनाव में Likud को 23.40% वोट पर 30 सीटें मिलीं, Zionist Camp को 18.67% वोट पर 24 सीटें। इससे अक्सर गठबंधन सरकार बनती है।
भारत में PR प्रणाली सीमित पैमाने पर अप्रत्यक्ष चुनावों के लिए अपनाई गई है, यानी राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्य सभा और विधान परिषद् के चुनाव में।
3.3 FPTP बनाम PR : पूरी तुलना
| आधार | FPTP | PR |
|---|---|---|
| निर्वाचन क्षेत्र | छोटी-छोटी भौगोलिक इकाइयाँ | बड़े क्षेत्र, पूरा देश भी एक क्षेत्र हो सकता है |
| प्रतिनिधि | हर क्षेत्र से केवल एक | एक क्षेत्र से कई प्रतिनिधि चुने जा सकते हैं |
| वोट किसे | मतदाता प्रत्याशी को वोट देता है | मतदाता पार्टी को वोट देता है |
| सीट-वोट अनुपात | पार्टी को वोट से ज़्यादा सीटें मिल सकती हैं | हर पार्टी को वोट के अनुपात में ही सीटें |
| जीत के लिए बहुमत | ज़रूरी नहीं, सबसे ज़्यादा वोट काफ़ी | विजयी उम्मीदवार को वोटों का बहुमत मिलता है |
| उदाहरण | यूनाइटेड किंगडम, भारत | इज़राइल, नीदरलैंड |
3.4 राज्य सभा में PR कैसे काम करता है : एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (STV)
एकल संक्रमणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote, STV) PR का वह रूप है जिससे राज्य सभा के सदस्य चुने जाते हैं। हर राज्य की विधान सभा के विधायक ही मतदाता होते हैं, और हर मतदाता उम्मीदवारों को वरीयता क्रम में रैंक करता है।
3.5 भारत ने FPTP प्रणाली क्यों अपनाई?
PR प्रणाली में एक क्षेत्र से कई प्रतिनिधि अलग-अलग पार्टियों के हो सकते हैं, इसलिए मतदाता को यह साफ़ पता नहीं चलता कि किसी काम के लिए किसके पास जाना है। FPTP में हर क्षेत्र का एक ही प्रतिनिधि होता है, यही जवाबदेही वाला तर्क परीक्षा में सबसे ज़्यादा पूछा जाता है।
- अनुभव ने संविधान निर्माताओं की उम्मीद की पुष्टि की है, FPTP सरल और आम मतदाता के लिए जाना-पहचाना साबित हुआ
- इसने केंद्र और राज्यों में बड़ी पार्टियों को स्पष्ट बहुमत जीतने में मदद की
- आम तौर पर FPTP से द्वि-दलीय व्यवस्था बनती है, यानी दो बड़ी पार्टियाँ बारी-बारी से सत्ता में आती हैं
- भारत में यह अनुभव थोड़ा अलग रहा: आज़ादी के बाद एक-दल का दबदबा रहा, साथ में कई छोटी पार्टियाँ भी थीं
- 1989 के बाद भारत में बहु-दलीय गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ, जिससे FPTP के बावजूद नई और छोटी पार्टियों को भी चुनावी मुक़ाबले में जगह मिली
कुल 234 सीटों (232 पर चुनाव) में से AIADMK को 40.77% वोट पर 135 सीटें मिलीं, DMK को 31.64% वोट पर 88 सीटें। अगर यही चुनाव इज़राइल जैसी PR प्रणाली से होता, तो सीटें वोट के प्रतिशत के हिसाब से बँटतीं, यानी AIADMK और DMK के बीच का फ़ासला असली नतीजे से बहुत कम होता, और PMK (5.32% वोट) जैसी पार्टियों को भी कुछ सीटें मिल जातीं, जो FPTP में शून्य पर रह गईं। असली नतीजे में INC को 6.42% वोट पर सिर्फ़ 8 सीटें मिलीं, जबकि PMK, भाजपा (2.84%) और DMDK (2.39%) को एक भी सीट नहीं मिली।
4 निर्वाचन क्षेत्रों का आरक्षण
- FPTP में जिस समुदाय या जाति का दबदबा हो, वह लगभग हर जगह जीत सकता है
- भारत में जाति-आधारित भेदभाव का लंबा इतिहास रहा है, इसलिए यह समस्या और गंभीर हो जाती है
- वंचित सामाजिक समूहों को न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व देने की ज़रूरत संविधान निर्माताओं को भी महसूस हुई
आज़ादी से पहले अंग्रेज़ी सरकार ने पृथक निर्वाचन-मंडल (Separate Electorate) की व्यवस्था शुरू की थी, जिसमें किसी समुदाय के प्रतिनिधि को सिर्फ़ उसी समुदाय के मतदाता चुनते थे। संविधान सभा के अनेक सदस्यों को इस पर शंका थी; उनका विचार था कि यह व्यवस्था हमारे उद्देश्यों को पूरा नहीं करेगी।
पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था भारत के लिए अभिशाप रही है, इसने देश की अपूरणीय क्षति की है। … पृथक निर्वाचन मंडल ने हमारी प्रगति को रोक दिया है। … हम (मुसलमान) राष्ट्र में मिल जाना चाहते हैं … ख़ुदा के वास्ते मुस्लिम समुदाय के लिए किसी प्रकार के आरक्षण पर विचार न करें …
तजम्मुल हुसैन, संविधान सभा के वाद-विवाद, खंड 8, पृष्ठ 333, 26 मई 1949
इसकी जगह संविधान ने आरक्षित चुनाव-क्षेत्र (Reserved Constituency) की व्यवस्था अपनाई।
आरक्षित चुनाव-क्षेत्र में उस क्षेत्र के सभी मतदाता वोट डाल सकते हैं, पर उम्मीदवार सिर्फ़ उसी समुदाय या सामाजिक वर्ग से होना चाहिए जिसके लिए वह सीट आरक्षित है। पृथक निर्वाचन-मंडल के उलट, यहाँ मतदाता किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं होता।
… लेकिन मैं भारत के आदिवासियों की ओर से कुछ कहना चाहता हूँ। … ब्रिटिश सरकार, प्रमुख राजनैतिक दलों और हर प्रबुद्ध भारतीय नागरिक को धन्यवाद कि उनके ही कारण हमें अब तक ऐसे अलग-थलग करके रखा गया था। जैसे किसी को चिड़ियाघर में रखा जाता है। … हम आपके साथ घुलने-मिलने को तैयार हैं और इसी कारण … हमने व्यवस्थापिकाओं में सीटों के आरक्षण की माँग पर ज़ोर दिया है। … हमने पृथक प्रतिनिधित्व की माँग नहीं की है। … 1935 के अधिनियम के अंतर्गत, पूरे भारत की सभी विधान सभाओं में 1585 में कुल 24 विधायक आदिवासी थे, … और केंद्र में तो एक भी नहीं था।
जयपाल सिंह, संविधान सभा के वाद-विवाद, खंड 5, पृष्ठ 226, 27 अगस्त 1947
4.2 SC-ST आरक्षण, और परिसीमन आयोग का काम
- यह आरक्षण लोक सभा और राज्य विधान सभाओं, दोनों में मिलता है
- पहले सिर्फ़ 10 वर्ष के लिए बनाया गया था, पर लगातार संविधान संशोधनों से इसे बढ़ाया गया है; अवधि ख़त्म होने पर संसद इसे और आगे बढ़ाने का निर्णय ले सकती है
- आरक्षित सीटों की संख्या हर समुदाय की आबादी में हिस्से के अनुपात में तय होती है
परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) एक स्वतंत्र संस्था है, जिसे राष्ट्रपति नियुक्त करते हैं और जो निर्वाचन आयोग के साथ मिलकर देश भर के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ तय करती है। यही आयोग यह भी तय करता है कि कौन-सी सीट किस समुदाय के लिए आरक्षित होगी।
ST सीटें कैसे तय होती हैं
- सबसे ज़्यादा अनुसूचित जनजाति आबादी वाले क्षेत्र चुने जाते हैं
SC सीटें कैसे तय होती हैं
- ज़्यादा अनुसूचित जाति आबादी वाले क्षेत्र चुने जाते हैं, पर उन्हें राज्य के अलग-अलग हिस्सों में फैलाया भी जाता है, क्योंकि अनुसूचित जातियों का विखराव पूरे देश में समरूप है
हर बार जब परिसीमन की प्रक्रिया दोहराई जाती है, तो कौन-सी सीट आरक्षित रहेगी यह बदल (रोटेट) भी सकता है।
भारत की आबादी में मुसलमान 14.2% हैं, पर लोक सभा में मुसलमान सांसदों की संख्या सामान्यतः 6% से थोड़ा कम रही है, यानी जनसंख्या में उनके अनुपात के आधे से भी कम। यही स्थिति अधिकतर राज्य विधान सभाओं में भी है। किताब तीन छात्रों के तीन अलग निष्कर्ष रखती है और पूछती है कि आप किससे सहमत हैं:
- हिलाल यह FPTP प्रणाली के अन्यायपूर्ण होने को दिखाता है, हमें समानुपातिक प्रतिनिधित्व अपनाना चाहिए था
- आरिफ़ यह SC-ST आरक्षण के औचित्य को बताता है, मुसलमानों को भी वैसा ही आरक्षण मिलना चाहिए
- सबा सभी मुसलमानों को एक जैसा मानना ग़लत है, मुसलमान महिलाओं को इससे कुछ नहीं मिलेगा, उनके लिए अलग आरक्षण चाहिए
यही वह बहस है जिसकी वजह से संविधान ने आरक्षण SC-ST तक सीमित रखा और धार्मिक अल्पसंख्यकों तक नहीं बढ़ाया। 4 या 6 अंक के प्रश्न में तीनों नज़रिए लिखकर अपना पक्ष तर्क सहित रखें।
4.3 महिलाओं के लिए आरक्षण
- संविधान अन्य वंचित समूहों, जैसे महिलाओं, के लिए SC-ST जैसा सीधा आरक्षण नहीं देता
- बरसों से माँग रही है कि लोक सभा और विधान सभाओं में कम से कम एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हों
- स्थानीय निकायों (पंचायत और नगर निकाय) में यह आरक्षण पहले से लागू है
अब लोक सभा और विधान सभाओं के लिए भी ऐसा ही एक प्रावधान नारी शक्ति वंदन अधिनियम (Women’s Reservation Act, 2023) के ज़रिए किया जा चुका है। यह एक हाल का और महत्त्वपूर्ण अपडेट है, इसे नाम सहित याद रखें।
किसी भी चुनाव प्रणाली की असली परीक्षा यही है कि क्या वह स्वतंत्र और निष्पक्ष है।
5.1 सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise) का मतलब है कि देश के सभी वयस्क नागरिकों को मत देने का अधिकार है, चाहे उनकी शिक्षा, संपत्ति, जाति या लिंग कुछ भी हो। कई देशों में नागरिकों को, ख़ासकर महिलाओं को, यह अधिकार पाने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी।
- यह अधिकार समानता और भेदभाव-रहित होने के उसी सिद्धांत से जुड़ा है, जो अधिकारों वाले अध्याय में पढ़ा गया
- 1989 के संविधान संशोधन से मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई
- चुनाव लड़ने का अधिकार भी सभी नागरिकों को है, पर लोक सभा या विधान सभा चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार की न्यूनतम आयु 25 वर्ष होनी चाहिए
- जिस व्यक्ति को किसी अपराध में 2 वर्ष या उससे अधिक की सज़ा हुई हो, वह चुनाव लड़ने के अयोग्य है
- पर चुनाव लड़ने पर आय, शिक्षा, वर्ग या लिंग की कोई पाबंदी नहीं है
6 स्वतंत्र निर्वाचन आयोग
संविधान का अनुच्छेद 324(1) कहता है: “इस संविधान के अधीन संसद और प्रत्येक राज्य के विधान मंडल के लिए कराये जाने वाले सभी निर्वाचनों के लिए तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों के लिए निर्वाचक नामावली तैयार कराने का और उन सभी निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण एक आयोग में निहित होगा (जिसे इस संविधान में निर्वाचन आयोग कहा गया है)।”
इसमें दो अलग ज़िम्मेदारियाँ हैं, इन्हें आपस में न मिलाएँ: एक, निर्वाचक नामावली तैयार कराना; दूसरा, उन चुनावों के संचालन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसी व्याख्या का समर्थन किया है।
- हर राज्य में एक मुख्य निर्वाचन अधिकारी निर्वाचन आयोग की सहायता करता है
- निर्वाचन आयोग पंचायत और नगर निकाय के चुनाव नहीं देखता, वह काम राज्य निर्वाचन आयुक्तों का है, जो निर्वाचन आयोग से स्वतंत्र रूप से काम करते हैं
6.1 एक-सदस्यीय से बहु-सदस्यीय आयोग तक
मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) निर्वाचन आयोग की अध्यक्षता करते हैं, पर उनके पास बाक़ी चुनाव आयुक्तों से ज़्यादा शक्ति नहीं होती, सभी फ़ैसले एक सामूहिक निकाय के रूप में लिए जाते हैं।
CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, पर मंत्रिपरिषद् की सलाह पर। इसलिए यह आशंका बनी रहती है कि सत्ताधारी दल अपने पक्ष वाले व्यक्ति को नियुक्त कर सकता है। इस चिंता को दूर करने के लिए सुझाव दिया गया है कि नियुक्ति में विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश से परामर्श अनिवार्य किया जाए।
- CEC और चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल 6 वर्ष, या 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो
- CEC को हटाने के लिए दोनों सदनों को विशेष बहुमत से सिफ़ारिश करनी पड़ती है, वही विशेष बहुमत जो राष्ट्रपति पर महाभियोग के लिए भी चाहिए
- बाक़ी चुनाव आयुक्तों को राष्ट्रपति सीधे हटा सकते हैं
विशेष बहुमत (Special Majority) का मतलब है सदन के कुल सदस्यों का साधारण बहुमत, और साथ ही उपस्थित व मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत। यह शर्त इस किताब में कम से कम तीन जगह आती है; किताब ख़ुद सिर्फ़ एक जगह बताती है, अगले अध्याय (कार्यपालिका) में राष्ट्रपति पर महाभियोग, और बाक़ी दो ढूँढ़ना छात्र पर छोड़ देती है।
6.2 निर्वाचन आयोग के काम
मतदाता-सूची
अद्यतन और त्रुटि-रहित मतदाता-सूची तैयार कराना
चुनाव कार्यक्रम
चुनाव की अधिघोषणा, नामांकन प्रक्रिया शुरू करने की तिथि, मतदान की तिथि, मतगणना की तिथि और चुनाव परिणामों की घोषणा तय करना
निष्पक्षता की रक्षा
चुनाव टालना या रद्द करना, पुनर्मतदान या पुनर्गणना का आदेश देना, आदर्श आचार-संहिता लागू करना
दलों की मान्यता
राजनीतिक दलों को मान्यता देना और चुनाव-चिह्न आवंटित करना
निर्वाचन आयोग का अपना स्टाफ़ बहुत सीमित है, इसलिए चुनाव के दौरान यह प्रशासनिक अधिकारियों की मदद से काम करता है, और उस समय उन अधिकारियों पर आयोग का पूरा नियंत्रण होता है, यहाँ तक कि उनके तबादले रोकना या करना भी।

6.3 निर्वाचन आयोग के दो बड़े इम्तिहान
यह आम धारणा है कि 25 वर्ष पहले के मुक़ाबले आज निर्वाचन आयोग ज़्यादा स्वतंत्र और प्रभावी है। इसकी वजह संविधान में उसकी शक्तियाँ या संवैधानिक सुरक्षा बढ़ना नहीं, बल्कि पहले से मौजूद शक्तियों का ज़्यादा प्रभावशाली इस्तेमाल है। इसीलिए किताब कहती है कि हर सुधार के लिए क़ानूनी या संवैधानिक परिवर्तन ज़रूरी नहीं।
कोई भी चुनाव प्रणाली पूरी तरह दोषरहित नहीं होती। पिछले 72 वर्षों के अनुभव से निर्वाचन आयोग, राजनीतिक दलों, स्वतंत्र समूहों और विद्वानों ने कई सुधारों के सुझाव दिए हैं।
7.1 सुझाव और उनकी सीमाएँ
✓ प्रमुख सुझाव
- FPTP से हटकर समानुपातिक प्रतिनिधित्व के किसी रूप को अपनाना
- संसद और विधान सभाओं में कम से कम एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए तय करना
- चुनाव में पैसे की भूमिका पर सख़्त नियंत्रण, चुनाव का ख़र्च सरकार एक विशेष कोष से उठाए
- आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों पर रोक, भले ही अपील अदालत में लंबित हो
- प्रचार में जाति और धर्म की अपील पर पूरी पाबंदी
- राजनीतिक दलों के कामकाज को पारदर्शी और लोकतांत्रिक बनाने के लिए क़ानून
✗ सीमाएँ
- इन सुझावों पर कोई आम सहमति नहीं है
- क़ानून बदलने की भी एक सीमा होती है, असली बदलाव इस पर निर्भर करता है कि उम्मीदवार, दल और मतदाता लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा की भावना का सम्मान करें या नहीं
क़ानूनी सुधारों के अलावा दो और तरीक़े हैं जिनसे चुनाव जनता की उम्मीदों के मुताबिक़ बन सकते हैं: जनता की ख़ुद सक्रिय भागीदारी, और स्वतंत्र संगठनों तथा संस्थाओं का निगरानी की भूमिका निभाना।
8 निष्कर्ष
प्रतिनिधिक लोकतंत्र वाले देशों में चुनाव और उनका प्रतिनिध्यात्मक स्वरूप ही लोकतंत्र को असरदार और भरोसेमंद बनाते हैं। भारत के चुनाव तंत्र की सफलता पाँच बातों से आँकी जा सकती है।
- मतदाताओं को न सिर्फ़ अपने प्रतिनिधि चुनने की, बल्कि राज्य और केंद्र दोनों स्तर पर सरकारें शांतिपूर्ण ढंग से बदलने की आज़ादी मिली है
- मतदाताओं ने लगातार चुनाव प्रक्रिया में गहरी दिलचस्पी ली है, चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों और दलों की संख्या बढ़ती जा रही है
- व्यवस्था समावेशी साबित हुई है, प्रतिनिधियों की सामाजिक पृष्ठभूमि धीरे-धीरे बदली है, हालाँकि महिला प्रतिनिधियों की संख्या अभी संतोषजनक नहीं बढ़ी
- देश के ज़्यादातर हिस्सों में चुनाव नतीजे धाँधली या गड़बड़ियों से सीधे प्रभावित नहीं होते, भले ही ऐसी कोशिशें होती रहती हों
- चुनाव अब हमारे लोकतांत्रिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं, कोई भी सरकार जनादेश की अनदेखी करने की कल्पना तक नहीं कर सकती
इन्हीं वजहों से भारत की चुनाव व्यवस्था को देश-विदेश में सम्मान मिला है। मतदाता का आत्मविश्वास बढ़ा है और निर्वाचन आयोग का कद भी।
पुस्तक के अंत में एक प्रतिज्ञा छपी है, जिसे भारत के नागरिक लोकतंत्र में अपनी आस्था दिखाने के लिए लेते हैं: वे स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव की गरिमा बनाए रखने, और धर्म, जाति, समुदाय, भाषा या किसी भी प्रलोभन से प्रभावित हुए बिना निर्भीक होकर मतदान करने की शपथ लेते हैं।
- प्रत्यक्ष लोकतंत्र में जनता ख़ुद फ़ैसले लेती है, अप्रत्यक्ष में प्रतिनिधियों के ज़रिए
- संविधान के पाँच सवाल: कौन वोट दे, कौन लड़े, कौन देखरेख करे, प्रतिनिधि कैसे चुनें, गिनती कैसे हो
- FPTP में सबसे ज़्यादा वोट पाने वाला जीतता है, बहुमत ज़रूरी नहीं; 1984 में काँग्रेस को 48% वोट पर 80%+ सीटें मिलीं
- PR में हर पार्टी को उसके वोट-प्रतिशत के बराबर सीटें मिलती हैं, जैसे इज़राइल में
- राज्य सभा में STV से चुनाव होता है, कोटा = (कुल वोट/(सीटें+1))+1
- भारत ने FPTP चुना: सादगी, साफ़ पसंद, जवाबदेही और स्थिर सरकार के लिए
- पृथक निर्वाचन-मंडल ख़ारिज किया गया, इसकी जगह आरक्षित चुनाव-क्षेत्र अपनाए गए
- 84 सीटें SC के लिए, 47 ST के लिए, 2030 तक बढ़ाई गई व्यवस्था; परिसीमन आयोग तय करता है कौन-सी सीट आरक्षित होगी
- नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 से लोक सभा और विधान सभाओं में भी महिला आरक्षण का प्रावधान
- सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार: मतदान की उम्र 1989 से 18 वर्ष; चुनाव लड़ने की न्यूनतम उम्र 25 वर्ष
- अनुच्छेद 324 से निर्वाचन आयोग बना; आयोग एक-सदस्यीय या बहु-सदस्यीय हो सकता है, 1993 से बहु-सदस्यीय बना हुआ है; CEC को हटाने के लिए विशेष बहुमत चाहिए
- 1991 राजीव गांधी की हत्या और 2002 गुजरात हिंसा, दोनों बार निर्वाचन आयोग ने चुनाव टाले
- चुनाव सुधार के सुझाव: PR की ओर बढ़ना, महिला आरक्षण, पैसे पर नियंत्रण, आपराधिक उम्मीदवारों पर रोक
- क्या मैं FPTP और PR के बीच छह अंतर बिना देखे लिख सकता हूँ?
- क्या मुझे 1984 के उदाहरण के आँकड़े याद हैं?
- क्या मैं STV का कोटा फ़ॉर्मूला और राजस्थान का उदाहरण लगा सकता हूँ?
- क्या मैं पृथक निर्वाचन-मंडल और आरक्षित चुनाव-क्षेत्र का फ़र्क़ बता सकता हूँ?
- क्या मुझे SC और ST की आरक्षित सीटों की संख्या और परिसीमन आयोग का तरीक़ा याद है?
- क्या मैं निर्वाचन आयोग की बनावट, कार्यकाल और CEC हटाने की प्रक्रिया समझा सकता हूँ?