1 कार्यपालिका क्या है?
आपके स्कूल के प्रशासन का ज़िम्मा किसके पास है? कोई भी बड़ा फ़ैसला वहाँ कौन लेता है? किसी भी संगठन में कोई न कोई पदाधिकारी फ़ैसले लेता है और उन्हें लागू करवाता है। यही काम सरकार में भी होता है, बस स्तर बहुत बड़ा हो जाता है।
सरकार के मुख्यतः तीन अंग होते हैं: विधायिका (जो क़ानून बनाती है), कार्यपालिका (जो उन्हें लागू करती है) और न्यायपालिका (जो क़ानूनों की व्याख्या करती है और विवाद सुलझाती है)। संसदीय व्यवस्था में विधायिका और कार्यपालिका आपस में गुँथी होती हैं, क्योंकि कार्यपालिका उन्हीं जनप्रतिनिधियों में से बनती है और उन्हीं के प्रति जवाबदेह रहती है, यही इस अध्याय का मुख्य विषय है।
कार्यपालिका (Executive) सरकार का वह अंग है जो विधायिका द्वारा बनाए गए क़ानूनों और नीतियों को लागू करने और प्रशासन चलाने का काम मुख्य रूप से करता है। कार्यपालिका सिर्फ़ राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रियों तक सीमित नहीं, इसमें पूरा प्रशासनिक तंत्र (सिविल सेवक) भी शामिल है।
1.1 दो तरह की कार्यपालिका
राजनीतिक कार्यपालिका
- सरकार का प्रधान और उसके मंत्री
- सरकार की नीतियों की पूरी ज़िम्मेदारी इन्हीं की
- चुनाव के ज़रिए बदलते रहते हैं
स्थायी कार्यपालिका
- रोज़मर्रा के प्रशासन के लिए ज़िम्मेदार अधिकारी
- इन्हें नौकरशाही (Bureaucracy) कहा जाता है
- सरकार बदलने पर भी वही बने रहते हैं
2 कार्यपालिका के अलग-अलग प्रकार
हर देश की कार्यपालिका एक जैसी नहीं होती। अमेरिका के राष्ट्रपति और भारत के राष्ट्रपति की शक्तियाँ बहुत अलग हैं, भले ही दोनों का पद-नाम एक ही हो।
| देश | व्यवस्था | देश का प्रधान | सरकार का प्रधान |
|---|---|---|---|
| अमेरिका | अध्यक्षात्मक | राष्ट्रपति | राष्ट्रपति ख़ुद |
| कनाडा | संसदीय, संवैधानिक राजतंत्र | महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय (औपचारिक) | प्रधानमंत्री |
| ब्रिटेन | संसदीय, संवैधानिक राजतंत्र | सम्राट/सम्राज्ञी (औपचारिक) | प्रधानमंत्री |
| फ्रांस | अर्द्ध-अध्यक्षात्मक | राष्ट्रपति | प्रधानमंत्री (राष्ट्रपति नियुक्त करता है, हटा नहीं सकता) |
| जापान | संसदीय | सम्राट (औपचारिक) | प्रधानमंत्री |
| इटली | संसदीय | राष्ट्रपति (औपचारिक) | प्रधानमंत्री |
| रूस | अर्द्ध-अध्यक्षात्मक | राष्ट्रपति | प्रधानमंत्री (राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त) |
| जर्मनी | संसदीय | राष्ट्रपति (औपचारिक) | चांसलर |
1978 में श्रीलंका के संविधान में संशोधन करके कार्यकारी राष्ट्रपति पद्धति लागू की गई। यहाँ राष्ट्रपति सीधे जनता द्वारा चुना जाता है, लोक सभा में बहुमत वाले दल से प्रधानमंत्री चुनता है, और प्रधानमंत्री तथा मंत्रियों को हटा भी सकता है। राष्ट्रपति देश का प्रधान, सेनाध्यक्ष और सरकार का प्रधान, तीनों एक साथ है। कार्यकाल 6 वर्ष का है, और कम से कम दो-तिहाई सांसदों के प्रस्ताव से ही हटाया जा सकता है। इसके अलावा, अगर आधे से ज़्यादा सांसद प्रस्ताव लाएँ, तो स्पीकर मामले को सर्वोच्च न्यायालय के पास जाँच के लिए भेज सकता है।
यह मत मान लीजिए कि जिस देश में राष्ट्रपति हो वहाँ अध्यक्षात्मक व्यवस्था ही होगी। भारत, जर्मनी, इटली में भी राष्ट्रपति है, पर वहाँ प्रधानमंत्री ही असली सरकार का प्रधान है। व्यवस्था का प्रकार पद के नाम से नहीं, बल्कि असली शक्ति किसके पास है इससे तय होता है।
3 भारत में संसदीय कार्यपालिका
- संविधान लिखे जाने से पहले ही भारत को 1919 और 1935 के अधिनियमों से संसदीय व्यवस्था चलाने का अनुभव था
- इस अनुभव ने दिखाया कि संसदीय व्यवस्था में कार्यपालिका को जनप्रतिनिधि असरदार ढंग से नियंत्रित कर सकते हैं
- अध्यक्षात्मक व्यवस्था में राष्ट्रपति ही सारी कार्यपालिका शक्ति का स्रोत बन जाता है, जिससे व्यक्ति-पूजा (personality cult) का ख़तरा रहता है
- इसीलिए संविधान निर्माताओं ने केंद्र और राज्य, दोनों स्तर पर संसदीय व्यवस्था अपनाई
- केंद्र में: राष्ट्रपति (औपचारिक प्रमुख), प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद् (असली शासन चलाते हैं)
- राज्य में: राज्यपाल, मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद्
- संघ की कार्यपालिका शक्ति औपचारिक रूप से राष्ट्रपति में है, पर व्यवहार में राष्ट्रपति यह शक्ति मंत्रिपरिषद् के ज़रिए इस्तेमाल करता है
- राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष है; जनता सीधे राष्ट्रपति को नहीं चुनती, चुनाव अप्रत्यक्ष होता है, निर्वाचित विधायकों और सांसदों द्वारा, समानुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत पद्धति से
- राष्ट्रपति को सिर्फ़ महाभियोग की प्रक्रिया से हटाया जा सकता है, जिसके लिए विशेष बहुमत चाहिए; महाभियोग का इकलौता आधार है संविधान का उल्लंघन
अनुच्छेद 74(1) कहता है : राष्ट्रपति की सहायता और सलाह के लिए एक मंत्रिपरिषद् होगी, जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होगा, और राष्ट्रपति अपने कार्यों में उस सलाह के अनुसार काम करेगा। शर्त यह है कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् से उस सलाह पर पुनर्विचार करने के लिए कह सकता है, पर पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह मानने के लिए वह बाध्य है।
“करेगा” (shall) शब्द ही दिखाता है कि सलाह राष्ट्रपति पर बाध्यकारी है। इस पर विवाद हुआ था, इसलिए एक संशोधन से साफ़ किया गया कि मंत्रिपरिषद् की सलाह बाध्यकारी है, और बाद के एक और संशोधन से तय हुआ कि राष्ट्रपति पुनर्विचार माँग तो सकता है, पर पुनर्विचार के बाद आई सलाह माननी ही पड़ेगी।
हमने राष्ट्रपति को कोई असली शक्ति नहीं दी, पर उसके पद को गरिमा और अधिकार का पद बनाया है। संविधान न तो असली कार्यपालिका बनाना चाहता है, न महज़ एक शोभा का पुतला, बल्कि एक ऐसा प्रमुख जो न शासन करे न राज करे, वह एक महान शोभा का पुतला बनाना चाहता है।
जवाहरलाल नेहरू, संविधान सभा वाद-विवाद, खंड 6, पृष्ठ 734

औपचारिक रूप से राष्ट्रपति के पास कार्यपालिका, विधायी, न्यायिक और आपातकालीन शक्तियों की बड़ी सूची है, पर संसदीय व्यवस्था में ये शक्तियाँ असल में मंत्रिपरिषद् की सलाह पर ही इस्तेमाल होती हैं। लोक सभा में बहुमत वाले प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद् ही असली कार्यपालिका हैं, ज़्यादातर मामलों में राष्ट्रपति को उनकी सलाह माननी पड़ती है।
4 राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्तियाँ
क्या इसका मतलब यह है कि राष्ट्रपति किसी भी परिस्थिति में अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं करता? यह ग़लत निष्कर्ष होगा। कम से कम तीन मौक़ों पर राष्ट्रपति अपना विवेक इस्तेमाल करता है।
4.1 तीन विवेकाधीन शक्तियाँ
सलाह लौटाना
राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् की सलाह लौटाकर उस पर पुनर्विचार माँग सकता है, अगर उसे लगे कि सलाह में कोई क़ानूनी कमी है या देश के हित में नहीं है। पुनर्विचार के बाद वही सलाह दुबारा आए तो राष्ट्रपति को माननी पड़ती है, पर यह अनुरोध अपने आप में बड़ा असर रखता है।
वीटो की शक्ति (निषेधाधिकार)
धन विधेयक को छोड़कर बाक़ी हर विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए जाता है। राष्ट्रपति उसे पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है, पर संसद दोबारा वही विधेयक पारित करके भेजे तो स्वीकृति देनी ही पड़ती है।
प्रधानमंत्री चुनने में विवेक
जब चुनाव के बाद लोक सभा में किसी को स्पष्ट बहुमत न मिले और दो-तीन नेता बहुमत का दावा करें, तब राष्ट्रपति को अपने विवेक से तय करना पड़ता है कि किसे प्रधानमंत्री बनाया जाए।
पॉकेट वीटो वह अनौपचारिक शक्ति है जो राष्ट्रपति को इसलिए मिल जाती है क्योंकि संविधान में यह तय नहीं है कि किसी विधेयक को पुनर्विचार के लिए कितने समय में लौटाना है। राष्ट्रपति विधेयक को बिना किसी समय-सीमा के लंबित रख सकता है, यानी अपनी जेब में डाल सकता है।
1986 में संसद ने भारतीय पोस्ट ऑफिस (संशोधन) विधेयक पारित किया, जिसकी आलोचना हुई क्योंकि यह प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित करता था। तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने उस पर कोई फ़ैसला नहीं लिया। उनका कार्यकाल ख़त्म होने के बाद अगले राष्ट्रपति वेंकटरमण ने विधेयक पुनर्विचार के लिए संसद को लौटा दिया। तब तक सरकार बदल चुकी थी, 1989 में एक नई गठबंधन सरकार आ गई थी, और उसने यह विधेयक दोबारा संसद में पेश ही नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि विधेयक कभी क़ानून नहीं बन सका।
मार्च 1998 के चुनाव में किसी भी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। भाजपा और उसके सहयोगी दलों को 251 सीटें मिलीं, बहुमत से 21 कम। राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने गठबंधन के नेता अटल बिहारी वाजपेयी से संबंधित दलों के समर्थन-पत्र माँगे, और यहीं नहीं रुके, वाजपेयी को शपथ लेने के 10 दिन के भीतर विश्वास मत हासिल करने की सलाह भी दी।
- 1989 के बाद राष्ट्रपति पद का महत्त्व काफ़ी बढ़ गया है, क्योंकि 1989 से 1998 तक हुए चार आम चुनावों में किसी को भी लोक सभा में स्पष्ट बहुमत नहीं मिला
- राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्ति राजनीतिक हालात से जुड़ी है, जब सरकारें अस्थिर हों और गठबंधन सत्ता में हों तो राष्ट्रपति की भूमिका बढ़ जाती है
- ज़्यादातर समय राष्ट्रपति एक औपचारिक शक्ति-धारक और देश का प्रतीकात्मक प्रमुख ही रहता है
संसदीय व्यवस्था में मंत्रिपरिषद् लोक सभा के बहुमत पर टिकी होती है, यानी वह कभी भी गिर सकती है। ऐसे में एक ऐसा देश का प्रधान चाहिए जिसका कार्यकाल तय हो, जो नई प्रधानमंत्री की नियुक्ति कर सके, और जो पूरे देश का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व करे। जब किसी दल को बहुमत न मिले, तब प्रधानमंत्री चुनने की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी भी राष्ट्रपति की ही होती है।

5 उपराष्ट्रपति
- उपराष्ट्रपति का कार्यकाल भी 5 वर्ष है, चुनाव-विधि राष्ट्रपति जैसी ही है
- एक फ़र्क़ है : उपराष्ट्रपति के चुनाव-मंडल में राज्य विधान सभाओं के सदस्य शामिल नहीं होते
- उपराष्ट्रपति को राज्य सभा एक प्रस्ताव पास करके हटा सकती है, अगर लोक सभा भी उससे सहमत हो
- उपराष्ट्रपति राज्य सभा का पदेन सभापति होता है
राष्ट्रपति का पद मृत्यु, त्यागपत्र, महाभियोग से हटाए जाने या किसी और वजह से ख़ाली हो जाए, तो उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति बन जाता है, जब तक नया राष्ट्रपति नहीं चुन लिया जाता।
राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की मृत्यु होने पर, नया राष्ट्रपति चुने जाने तक बी.डी. जत्ती ने कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में काम किया।
6 प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद्
भारत की राजनीति की चर्चा प्रधानमंत्री के पद का ज़िक्र किए बिना शायद ही कभी पूरी होती है। इसकी वजह साफ़ है : राष्ट्रपति सिर्फ़ मंत्रिपरिषद् की सलाह पर अपनी शक्ति इस्तेमाल करता है, और मंत्रिपरिषद् का प्रधान प्रधानमंत्री ही होता है। इसीलिए प्रधानमंत्री सरकार का सबसे महत्त्वपूर्ण पदाधिकारी बन जाता है।
- प्रधानमंत्री बने रहने के लिए लोक सभा में बहुमत का समर्थन ज़रूरी है, यह समर्थन खोते ही पद चला जाता है
- आज़ादी के बाद लंबे समय तक कांग्रेस का बहुमत रहा और उसका नेता ही प्रधानमंत्री बनता रहा
- 1989 के बाद कई बार किसी दल को अकेले बहुमत नहीं मिला, तब कई दलों ने मिलकर गठबंधन बनाया जिसे बहुमत हासिल हो
- राष्ट्रपति औपचारिक रूप से उसी नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है जिसे बहुमत का समर्थन हो
6.1 मंत्रिपरिषद् का गठन और आकार
- प्रधानमंत्री ही तय करता है कि मंत्रिपरिषद् में कौन-कौन मंत्री होंगे, और उन्हें विभाग (पोर्टफ़ोलियो) बाँटता है
- वरिष्ठता और राजनीतिक महत्त्व के हिसाब से मंत्रियों को मंत्रिमंडल का मंत्री, राज्यमंत्री या उपमंत्री का दर्जा मिलता है
- राज्यों में मुख्यमंत्री भी अपनी पार्टी या गठबंधन से इसी तरह मंत्री चुनते हैं
- प्रधानमंत्री और सभी मंत्रियों का संसद सदस्य होना ज़रूरी है; अगर कोई बिना सांसद हुए मंत्री या प्रधानमंत्री बनता है, तो उसे 6 महीने के भीतर संसद का चुनाव जीतना पड़ता है
मंत्रिपरिषद् में सभी दर्जों के मंत्री, यानी मंत्रिमंडल का मंत्री, राज्यमंत्री और उपमंत्री, सब शामिल होते हैं, यह आकार में बड़ी होती है और शायद ही कभी पूरी की पूरी एक साथ बैठती है। मंत्रिमंडल इसका छोटा और असली फ़ैसले लेने वाला हिस्सा है, इसमें सिर्फ़ सबसे वरिष्ठ मंत्री होते हैं, और यही नियमित रूप से बैठकर बड़ी नीतियाँ तय करता है।
स्विस पद्धति, जिसमें विधायिका एक तय अवधि के लिए कार्यपालिका चुनती है, प्रांतों के लिए सबसे अच्छी सरकार का रूप है। एकल संक्रमणीय मत पद्धति कार्यपालिका की नियुक्ति के लिए सबसे अच्छी प्रणाली है, क्योंकि इसमें सभी हितों का प्रतिनिधित्व होगा और विधायिका में किसी भी दल को यह महसूस नहीं होगा कि उसे प्रतिनिधित्व नहीं मिला।
बेगम एजाज़ रसूल, संविधान सभा वाद-विवाद, खंड 4, पृष्ठ 631, 17 जुलाई 1947
यह सुझाव अपनाया नहीं गया, भारत में मंत्रियों का चयन प्रधानमंत्री ही करता है, विधायिका सीधे नहीं चुनती।
91वें संविधान संशोधन (2003) से पहले मंत्रिपरिषद् का आकार समय और परिस्थिति के हिसाब से तय होता था, जिससे मंत्रिपरिषद् बहुत बड़ी हो जाती थी। अब यह संशोधन तय करता है कि मंत्रिपरिषद् का आकार लोक सभा (या राज्यों में विधानसभा) के कुल सदस्यों के 15 प्रतिशत से ज़्यादा नहीं हो सकता।
6.2 सामूहिक उत्तरदायित्व
सामूहिक उत्तरदायित्व का मतलब है कि पूरी मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से लोक सभा के प्रति ज़िम्मेदार है। जो मंत्रिपरिषद् लोक सभा का विश्वास खो दे, उसे इस्तीफ़ा देना पड़ता है। यह सिद्धांत मंत्रिमंडल की एकजुटता पर आधारित है, इसीलिए किसी एक मंत्री के विरुद्ध लाया गया अविश्वास प्रस्ताव भी पूरी मंत्रिपरिषद् को गिरा देता है।
- अगर कोई मंत्री किसी नीति या फ़ैसले से असहमत हो, तो उसे या तो वह फ़ैसला मानना पड़ता है या इस्तीफ़ा देना पड़ता है
- सामूहिक उत्तरदायित्व के तहत तय हुई नीति को मानना हर मंत्री के लिए बाध्यकारी है
6.3 प्रधानमंत्री का महत्त्व और शक्ति के स्रोत
- मंत्रिपरिषद् प्रधानमंत्री के बिना अस्तित्व में नहीं आ सकती, प्रधानमंत्री के शपथ लेने के बाद ही मंत्रिपरिषद् बनती है
- प्रधानमंत्री की मृत्यु या त्यागपत्र से पूरी मंत्रिपरिषद् अपने आप भंग हो जाती है, पर किसी और मंत्री की मृत्यु या इस्तीफ़े से केवल वही एक पद ख़ाली होता है
- प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद् को राष्ट्रपति और संसद, दोनों से जोड़ने वाली कड़ी है; प्रशासन से जुड़े सभी फ़ैसले और विधेयक-प्रस्ताव राष्ट्रपति तक पहुँचाना प्रधानमंत्री का संवैधानिक दायित्व है
प्रधानमंत्री, सरकार का ‘लिंचपिन’ यानी धुरी है।
पं. जवाहरलाल नेहरू
6.4 गठबंधन युग का असर
1977 के बाद से ही भारत में दलीय राजनीति ज़्यादा प्रतिस्पर्धी हो चली थी, कांग्रेस का लंबे समय से चला आ रहा एकतरफ़ा दबदबा टूटने लगा था। 1989 के बाद से भारत ने कई गठबंधन सरकारें देखी हैं, और इनमें से कई पूरा कार्यकाल पूरा नहीं कर पाईं। इसका प्रधानमंत्री पद पर चार तरह का असर पड़ा है।
राष्ट्रपति की भूमिका बढ़ी
प्रधानमंत्री चुनने में राष्ट्रपति का विवेक ज़्यादा इस्तेमाल होने लगा
ज़्यादा सलाह-मशविरा ज़रूरी
गठबंधन के साझेदारों से लगातार बातचीत करनी पड़ती है, जिससे प्रधानमंत्री का अधिकार घटा
मंत्री चुनने पर पाबंदी
मंत्री और उनके विभाग चुनने की प्रधानमंत्री की छूट भी सीमित हुई
नीति-निर्माण में समझौता
नीतियाँ और कार्यक्रम अब सिर्फ़ प्रधानमंत्री तय नहीं करता, सहयोगी दलों से बातचीत और समझौते के बाद बनते हैं
राज्य स्तर पर भी वैसी ही व्यवस्था है, फ़र्क़ इतना है कि केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपाल के पास मुख्यमंत्री के मुक़ाबले अपने विवेक का इस्तेमाल करने की गुंजाइश ज़्यादा होती है।
7 स्थायी कार्यपालिका : नौकरशाही
मंत्रियों के फ़ैसलों को लागू कौन करता है? कार्यपालिका में प्रधानमंत्री, मंत्री और एक बहुत बड़ा संगठन, नौकरशाही या प्रशासनिक तंत्र, शामिल है। सैन्य सेवा से अलग दिखाने के लिए इसे सिविल सेवा कहा जाता है।
- प्रशिक्षित और कुशल अधिकारी, जो सरकार के स्थायी कर्मचारी होते हैं, नीति बनाने और लागू करने दोनों में मंत्रियों की मदद करते हैं
- लोकतंत्र में विधायिका प्रशासन पर नियंत्रण रखती है; प्रशासनिक अधिकारी विधायिका की अपनाई नीतियों के विरुद्ध काम नहीं कर सकते
- मंत्रियों की ज़िम्मेदारी है कि प्रशासन पर राजनीतिक नियंत्रण बना रहे
- नौकरशाही से राजनीतिक रूप से तटस्थ रहने की अपेक्षा होती है, यानी वह नीतिगत मुद्दों पर कोई राजनीतिक पक्ष नहीं लेती
- सरकार बदलने पर भी, नई सरकार की नई नीतियाँ बनाने और लागू करने में ईमानदारी और कुशलता से मदद करना नौकरशाही की ज़िम्मेदारी है
भारत की नौकरशाही में अखिल भारतीय सेवाएँ, राज्य सेवाएँ, स्थानीय निकायों के कर्मचारी और सार्वजनिक उपक्रमों का तकनीकी-प्रबंधकीय स्टाफ़ शामिल है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) केंद्र सरकार के लिए सिविल सेवकों की भर्ती करता है, राज्यों के लिए अलग-अलग लोक सेवा आयोग हैं।
- लोक सेवा आयोग के सदस्य एक तय कार्यकाल के लिए नियुक्त होते हैं
- उन्हें हटाने या निलंबित करने से पहले सुप्रीम कोर्ट के किसी जज से गहन जाँच करानी ज़रूरी है
सिविल सेवा में योग्यता के साथ-साथ आरक्षण भी है। संविधान ने शुरू में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण दिया, और बाद में महिलाओं, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (EWS) के लिए भी आरक्षण जोड़ा गया, ताकि नौकरशाही समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व कर सके।
7.1 IAS-IPS बनाम राज्य लोक सेवा
IAS और IPS
- राज्यों की उच्च नौकरशाही की रीढ़ हैं
- केंद्र सरकार इन्हें भर्ती और नियुक्त करती है
- किसी ख़ास राज्य में काम करते हैं, केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर भी जा सकते हैं
- सिर्फ़ केंद्र सरकार इनके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है
राज्य लोक सेवा
- राज्य लोक सेवा आयोगों के ज़रिए भर्ती
- राज्य सरकार के अधीन काम करते हैं
ज़िले का सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकारी, कलेक्टर, आमतौर पर एक IAS अधिकारी ही होता है। चूँकि IAS और IPS अधिकारियों पर सिर्फ़ केंद्र सरकार अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है, इससे राज्यों के प्रशासन पर केंद्र सरकार की पकड़ मज़बूत होती है, इस बारे में संघवाद वाले अध्याय में विस्तार से पढ़ेंगे।
- नौकरशाही कल्याणकारी नीतियों को जनता तक पहुँचाने का माध्यम है, पर अक्सर लोग सरकारी अधिकारी से डरते हैं और उसे असंवेदनशील पाते हैं
- नौकरशाही पर लोकतांत्रिक रूप से चुनी सरकार का नियंत्रण होना चाहिए, पर बहुत ज़्यादा राजनीतिक दख़ल भी नौकरशाही को नेताओं का औज़ार बना सकता है
- कई लोग मानते हैं कि सिविल सेवकों को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाने के पर्याप्त प्रावधान नहीं हैं, और नौकरशाही की नागरिकों के प्रति जवाबदेही भी पर्याप्त नहीं
- उम्मीद है कि सूचना का अधिकार (RTI) जैसे उपाय नौकरशाही को थोड़ा और उत्तरदायी और जवाबदेह बना सकते हैं
8 निष्कर्ष
- आधुनिक कार्यपालिका सरकार का एक बहुत शक्तिशाली अंग है, अक्सर बाक़ी अंगों से ज़्यादा शक्ति उसी के पास होती है
- इसी वजह से कार्यपालिका पर लोकतांत्रिक नियंत्रण की ज़रूरत भी उतनी ही बड़ी है
- संविधान निर्माताओं ने दूरदर्शिता दिखाते हुए संसदीय कार्यपालिका चुनी, ताकि कार्यपालिका नियमित निगरानी और नियंत्रण में रहे
- नियमित चुनाव, शक्तियों पर संवैधानिक सीमाएँ और लोकतांत्रिक राजनीति, इन सबने मिलकर सुनिश्चित किया है कि कार्यपालिका जनता के प्रति असंवेदनशील न हो सके
- राजनीतिक कार्यपालिका (सरकार का प्रधान+मंत्री) बनाम स्थायी कार्यपालिका (नौकरशाही)
- तीन प्रकार: अध्यक्षात्मक (अमेरिका), संसदीय (भारत, ब्रिटेन, जर्मनी), अर्द्ध-अध्यक्षात्मक (फ्रांस, रूस, श्रीलंका)
- भारत ने व्यक्ति-पूजा से बचने के लिए संसदीय व्यवस्था चुनी; अनुच्छेद 74 से मंत्रिपरिषद् की सलाह राष्ट्रपति पर बाध्यकारी
- राष्ट्रपति की तीन विवेकाधीन शक्तियाँ: सलाह पर पुनर्विचार माँगना, वीटो/पॉकेट वीटो, प्रधानमंत्री चुनने में विवेक (जब बहुमत साफ़ न हो)
- 1986 पोस्ट ऑफिस विधेयक पॉकेट वीटो का असली उदाहरण; 1998 नारायणन-वाजपेयी विवेक का उदाहरण
- उपराष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष, राज्य सभा का पदेन सभापति, राष्ट्रपति पद ख़ाली होने पर कार्यवाहक राष्ट्रपति (जैसे बी.डी. जत्ती)
- 91वें संशोधन (2003) से मंत्रिपरिषद् का आकार सदन के 15% सदस्यों से ज़्यादा नहीं हो सकता
- सामूहिक उत्तरदायित्व: पूरी मंत्रिपरिषद् लोक सभा के प्रति ज़िम्मेदार, एक मंत्री पर अविश्वास भी सबको गिरा देता है
- गठबंधन युग (1989 के बाद) ने राष्ट्रपति की भूमिका बढ़ाई और प्रधानमंत्री की स्वतंत्रता घटाई
- नौकरशाही: UPSC केंद्र की भर्ती करता है; IAS/IPS पर सिर्फ़ केंद्र अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकता है; आरक्षण अब SC, ST, महिला, OBC, EWS सबके लिए
- क्या मैं अध्यक्षात्मक, संसदीय और अर्द्ध-अध्यक्षात्मक व्यवस्था में फ़र्क़ बता सकता हूँ, हर एक का एक उदाहरण देश सहित?
- क्या मुझे राष्ट्रपति की तीनों विवेकाधीन शक्तियाँ और उनके असली उदाहरण याद हैं?
- क्या मैं पॉकेट वीटो को 1986 के उदाहरण से समझा सकता हूँ?
- क्या मुझे 91वें संशोधन का 15% वाला नियम याद है?
- क्या मैं सामूहिक उत्तरदायित्व की परिभाषा और उसका असर दोनों लिख सकता हूँ?
- क्या मैं IAS/IPS पर केंद्र के नियंत्रण की बात समझा सकता हूँ?