कक्षा 11 राजनीति विज्ञान अध्याय 4 कार्यपालिका शॉर्ट नोट्स (Short Notes) हिंदी में

परीक्षा से ठीक पहले के दोहराव के लिए इस अध्याय का निचोड़: परिभाषाएँ, संख्याएँ, तारीख़ें और तुलना की तालिकाएँ। विस्तार से पढ़ने के लिए पूरे नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।

1 कार्यपालिका के प्रकार, एक नज़र में

प्रकार पहचान उदाहरण
अध्यक्षात्मक राष्ट्रपति देश का प्रधान + सरकार का प्रधान, दोनों अमेरिका, ब्राज़ील
संसदीय राष्ट्रपति/सम्राट औपचारिक, PM+मंत्रिमंडल असली शक्ति भारत, ब्रिटेन, जापान, जर्मनी
अर्द्ध-अध्यक्षात्मक राष्ट्रपति और PM दोनों के पास असली शक्ति फ्रांस, रूस, श्रीलंका

2 याद रखने लायक़ संख्याएँ

15%91वें संशोधन (2003) से मंत्रिपरिषद् के आकार की सीमा
5 वर्षराष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति, दोनों का कार्यकाल
6 महीनेबिना सांसद बने मंत्री बनने पर चुनाव जीतने की समय-सीमा
संख्या / तारीख़ किसकी
अनुच्छेद 74(1) मंत्रिपरिषद् की सलाह राष्ट्रपति पर बाध्यकारी
1986 पोस्ट ऑफिस विधेयक: पॉकेट वीटो का उदाहरण (जैल सिंह → वेंकटरमण)
1989 नई गठबंधन सरकार ने विधेयक दोबारा पेश नहीं किया
मार्च 1998 राष्ट्रपति नारायणन ने वाजपेयी से समर्थन-पत्र माँगे, 10 दिन में विश्वास मत
1919 / 1935 भारत को संसदीय व्यवस्था चलाने का पिछला अनुभव देने वाले अधिनियम

3 परिभाषाएँ, ठीक जैसी लिखनी हैं

सारी परिभाषाएँ एक जगह
कार्यपालिकासरकार का वह अंग जो विधायिका के बनाए क़ानूनों-नीतियों को लागू करता है और प्रशासन चलाता है
राजनीतिक कार्यपालिकासरकार का प्रधान और मंत्री, चुनाव के साथ बदलते हैं
स्थायी कार्यपालिकानौकरशाही, सरकार बदलने पर भी बनी रहती है
पॉकेट वीटोराष्ट्रपति द्वारा विधेयक पर कोई फ़ैसला न लेकर उसे अनिश्चित काल तक लंबित रखना
कार्यवाहक राष्ट्रपतिराष्ट्रपति पद ख़ाली होने पर नए राष्ट्रपति के चुनाव तक उपराष्ट्रपति यह भूमिका निभाता है
सामूहिक उत्तरदायित्वपूरी मंत्रिपरिषद् लोक सभा के प्रति सामूहिक रूप से जवाबदेह, एक मंत्री पर अविश्वास पूरी परिषद् को गिराता है
नौकरशाहीसिविल सेवकों का वह तंत्र जो नीति बनाने में मदद करता है और प्रशासन चलाता है, राजनीतिक रूप से तटस्थ रहने की अपेक्षा

4 राष्ट्रपति के तीन विवेकाधिकार

1. सलाह पर पुनर्विचारराष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् की सलाह एक बार लौटा सकता है, दोबारा आए तो माननी पड़ती है
2. वीटो / पॉकेट वीटोधन विधेयक छोड़कर बाक़ी विधेयक लौटा सकता है, कोई समय-सीमा तय नहीं
3. प्रधानमंत्री चुनने में विवेकजब चुनाव में किसी को स्पष्ट बहुमत न मिले

5 प्रधानमंत्री और गठबंधन युग

5.1 गठबंधन युग (1989 के बाद) के चार असर

पहले (स्पष्ट बहुमत)

  • राष्ट्रपति की भूमिका सीमित
  • प्रधानमंत्री का मंत्री-चयन स्वतंत्र

गठबंधन युग में

  • राष्ट्रपति की भूमिका बढ़ी, ज़्यादा सलाह-मशविरा ज़रूरी
  • मंत्री-चयन और नीति-निर्माण, दोनों पर पाबंदी/समझौता
आख़िरी दोहराव
  • भारत ने अध्यक्षात्मक की जगह संसदीय व्यवस्था चुनी: पिछला अनुभव, व्यक्ति-पूजा का ख़तरा टालना, विधायिका के प्रति नियमित जवाबदेही
  • अनुच्छेद 74(1): राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् की बाध्यकारी सलाह पर काम करता है, पुनर्विचार माँग सकता है
  • 1986 पोस्ट ऑफिस विधेयक: पॉकेट वीटो का असली उदाहरण; मार्च 1998: प्रधानमंत्री चुनने में विवेक का उदाहरण
  • उपराष्ट्रपति: राज्य सभा का पदेन सभापति, ज़रूरत पड़ने पर कार्यवाहक राष्ट्रपति (जैसे बी.डी. जत्ती)
  • 91वाँ संशोधन (2003): मंत्रिपरिषद् का आकार सदन के 15% से ज़्यादा नहीं
  • बेगम एजाज़ रसूल का स्विस-पद्धति सुझाव अपनाया नहीं गया; भारत में मंत्री प्रधानमंत्री ख़ुद चुनता है
  • नौकरशाही: UPSC/राज्य लोक सेवा आयोग से भर्ती, IAS-IPS पर केंद्र का अनुशासनात्मक नियंत्रण, SC-ST-महिला-OBC-EWS आरक्षण