NCERT की पाठ्यपुस्तक भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार के अध्याय 4 «कार्यपालिका» की प्रश्नावली के दसों प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
1 संसदीय कार्यपालिका का अर्थ
प्र. संसदीय कार्यपालिका का अर्थ होता है:
(क) जहाँ संसद हो वहाँ कार्यपालिका का होना
(ख) संसद द्वारा निर्वाचित कार्यपालिका
(ग) जहाँ संसद कार्यपालिका के रूप में काम करती है
(घ) ऐसी कार्यपालिका जो संसद के बहुमत के समर्थन पर निर्भर हो
उत्तर: (घ)। संसदीय व्यवस्था की पहचान यही है कि कार्यपालिका (प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद्) तभी तक पद पर रहती है जब तक उसे विधायिका (लोक सभा) के बहुमत का समर्थन प्राप्त है। संसद ख़ुद कार्यपालिका नहीं बनती और न ही कार्यपालिका सिर्फ़ संसद के अस्तित्व से जुड़ी होती है, यह सीधे बहुमत के समर्थन पर निर्भर करती है।
2 अमित-शमा-राजेश की बहस
प्र. निम्नलिखित संवाद पढ़ें। आप किस तर्क से सहमत हैं और क्यों?
अमित: संविधान के प्रावधानों को देखने से लगता है कि राष्ट्रपति का काम सिर्फ़ ठप्पा मारना है।
शमा: राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की नियुक्ति करता है। इस कारण उसे प्रधानमंत्री को हटाने का भी अधिकार होना चाहिए।
राजेश: हमें राष्ट्रपति की ज़रूरत नहीं। चुनाव के बाद, संसद बैठक बुलाकर एक नेता चुन सकती है जो प्रधानमंत्री बने।
उत्तर:
1. अमित का तर्क आंशिक रूप से सही है। रोज़मर्रा के फ़ैसलों में राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् की बाध्यकारी सलाह पर ही काम करता है, इस अर्थ में वह ज़्यादातर औपचारिक प्रमुख है। पर यह पूरी तरह सही नहीं, क्योंकि राष्ट्रपति के पास सलाह पर पुनर्विचार माँगने, वीटो/पॉकेट वीटो और प्रधानमंत्री चुनने के विशेषाधिकार जैसी वास्तविक शक्तियाँ भी हैं, जो साफ़ बहुमत न होने पर बेहद महत्वपूर्ण साबित होती हैं।
2. शमा का तर्क ग़लत है। प्रधानमंत्री को नियुक्त करने और हटाने की शक्तियाँ एक जैसी नहीं हैं। प्रधानमंत्री तभी तक पद पर रहता है जब तक लोक सभा का बहुमत उसके साथ है, राष्ट्रपति उसे मनमाने ढंग से बर्ख़ास्त नहीं कर सकते, वरना संसदीय व्यवस्था की जवाबदेही ख़त्म हो जाएगी।
3. राजेश का तर्क भी कमज़ोर है। राष्ट्रपति सिर्फ़ प्रधानमंत्री चुनने के लिए नहीं है, वह एक स्थायी, निर्वाचन-प्रक्रिया से बना संवैधानिक प्रमुख है जो सरकार गिरने पर भी बना रहता है, विदेशी मामलों और आपात स्थितियों में देश का प्रतीक होता है, और प्रधानमंत्री चुनने में विवेक का इस्तेमाल भी करता है जब कोई स्पष्ट बहुमत नहीं होता।
3 सुमेलन: सेवाओं के प्रकार
प्र. निम्नलिखित को सुमेलित करें:
(क) भारतीय विदेश सेवा : (ii) भारत के लिए विदेशों में कार्यरत
(ख) प्रादेशिक लोक सेवा : (i) जिसमें बहाली हो उसी प्रदेश में काम करती है
(ग) अखिल भारतीय सेवाएँ : (iii) जिस प्रदेश में भेजा जाए उसमें काम करती है, प्रतिनियुक्ति पर केंद्र में भी जा सकती है
(घ) केंद्रीय सेवाएँ : (iv) केंद्रीय सरकार के दफ़्तरों में काम करती हैं, जो राजधानी में या देश में कहीं और होते हैं
उत्तर: (क)-(ii), (ख)-(i), (ग)-(iii), (घ)-(iv)। भारतीय विदेश सेवा विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व करती है; प्रादेशिक लोक सेवा जिस राज्य में भर्ती हुई उसी में काम करती है; अखिल भारतीय सेवाएँ (आईएएस, आईपीएस) किसी भी राज्य में भेजी जा सकती हैं और केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर भी जा सकती हैं; केंद्रीय सेवाएँ सीधे केंद्र सरकार के दफ़्तरों में काम करती हैं।
4 समाचार से मंत्रालय पहचानें
प्र. उस मंत्रालय की पहचान करें जिसने निम्नलिखित समाचार को जारी किया होगा। यह मंत्रालय प्रदेश की सरकार का है या केंद्र सरकार का, और क्यों?
(क) तमिलनाडु पाठ्यपुस्तक निगम कक्षा 7, 10 और 11 की नई पुस्तकें जारी करेगा।
(ख) तिरुवल्लुर-चेन्नई खंड में लौह-अयस्क निर्यातकों की सुविधा के लिए नई रेल लूप लाइन बिछाई जाएगी।
(ग) रमयमपेट मंडल में किसानों की आत्महत्या की घटनाओं की जाँच में पाया गया कि वे फ़सल के नुक़सान से आर्थिक समस्या झेल रहे थे।
उत्तर:
(क) राज्य सरकार का शिक्षा मंत्रालय। पाठ्यपुस्तक तैयार करना और स्कूली शिक्षा चलाना राज्य सूची/समवर्ती सूची का विषय है, तमिलनाडु सरकार का अपना निगम इसे संभालता है।
(ख) केंद्र सरकार का रेल मंत्रालय। रेलवे संघ सूची का विषय है, नई लाइन बिछाने का फ़ैसला और उसका क्रियान्वयन केंद्र सरकार के रेल मंत्रालय के अधीन आता है।
(ग) राज्य सरकार का कृषि मंत्रालय (या राजस्व विभाग)। खेती, फ़सल-नुक़सान और किसान-कल्याण मुख्यतः राज्य का विषय है, ज़िला/मंडल-स्तर की समिति राज्य सरकार के अधीन काम करती है।
5 प्रधानमंत्री की नियुक्ति में राष्ट्रपति किसे चुनता है
प्र. प्रधानमंत्री की नियुक्ति करने में राष्ट्रपति:
(क) लोक सभा के सबसे बड़े दल के नेता को चुनता है।
(ख) लोक सभा में बहुमत अर्जित करने वाले गठबंधन-दलों में सबसे बड़े दल के नेता को चुनता है।
(ग) राज्य सभा के सबसे बड़े दल के नेता को चुनता है।
(घ) गठबंधन अथवा उस दल के नेता को चुनता है जिसे लोक सभा के बहुमत का समर्थन प्राप्त हो।
उत्तर: (घ)। असली मापदंड लोक सभा का बहुमत-समर्थन है, न कि सिर्फ़ सबसे बड़ा दल होना। कई बार सबसे बड़ा दल अकेले बहुमत में नहीं होता, ऐसे में जिस दल या गठबंधन को बहुमत का समर्थन हासिल है, उसी के नेता को राष्ट्रपति प्रधानमंत्री नियुक्त करता है।
6 आलोक-शेखर-बॉबी की बहस
प्र. इस चर्चा को पढ़कर बताएँ कि कौन-सा कथन भारत पर सबसे ज़्यादा लागू होता है:
आलोक: प्रधानमंत्री राजा के समान है, वह हर बात का फ़ैसला करता है।
शेखर: प्रधानमंत्री सिर्फ़ ‘बराबरी के सदस्यों में प्रथम’ है, उसे कोई विशेष अधिकार प्राप्त नहीं।
बॉबी: प्रधानमंत्री को दल और समर्थक सदस्यों का ध्यान रखना पड़ता है, पर कुल मिलाकर नीति-निर्माण और मंत्रियों के चयन में उसकी बहुत ज़्यादा चलती है।
उत्तर: बॉबी का कथन भारत पर सबसे ज़्यादा लागू होता है। आलोक का कथन ग़लत है, क्योंकि प्रधानमंत्री राजा जैसा निरंकुश नहीं, वह और उसकी मंत्रिपरिषद् लोक सभा के प्रति जवाबदेह हैं और लोक सभा में बहुमत का समर्थन रहने तक ही पद पर रहते हैं। शेखर का कथन भी अधूरा है, क्योंकि व्यवहार में प्रधानमंत्री बाक़ी मंत्रियों से कहीं ज़्यादा शक्तिशाली होता है, मंत्रिपरिषद् की बैठकों की अध्यक्षता करता है, मंत्रियों के विभाग तय करता है और नीति की दिशा तय करता है। बॉबी सही संतुलन बताता है, प्रधानमंत्री को दल और गठबंधन सहयोगियों को साथ लेकर चलना पड़ता है, पर आख़िरकार नीति-निर्माण और मंत्री-चयन में उसकी राय ही सबसे ज़्यादा मायने रखती है।
7 मंत्रिमंडल की सलाह राष्ट्रपति पर बाध्यकारी
प्र. क्या मंत्रिमंडल की सलाह राष्ट्रपति को हर हाल में माननी पड़ती है? आप क्या सोचते हैं? (अधिकतम 100 शब्द)
उत्तर: लगभग हर हाल में, हाँ। अनुच्छेद 74(1) के अनुसार मंत्रिपरिषद् राष्ट्रपति को सलाह देगी और राष्ट्रपति उस सलाह के अनुसार काम करेगा। राष्ट्रपति एक बार सलाह को पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है, पर पुनर्विचार के बाद वही सलाह दोबारा आए तो उसे मानना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है। इसमें दो व्यावहारिक छूट हैं: पहला, संविधान में राष्ट्रपति के फ़ैसले की कोई समय-सीमा तय नहीं है, इसलिए वह किसी विधेयक पर अनिश्चित काल तक कोई फ़ैसला न लेकर अनौपचारिक ‘पॉकेट वीटो’ का इस्तेमाल कर सकता है, जैसा 1986 के पोस्ट ऑफिस विधेयक में हुआ। दूसरा, जब लोक सभा में किसी को स्पष्ट बहुमत न मिले, तब प्रधानमंत्री चुनने में राष्ट्रपति को अपने विवेक का इस्तेमाल करना पड़ता है, क्योंकि उस वक़्त कोई तयशुदा मंत्रिपरिषद् सलाह देने के लिए मौजूद ही नहीं होती।
8 कार्यपालिका को नियंत्रित करना ज़रूरी क्यों
प्र. संसदीय-व्यवस्था ने कार्यपालिका को नियंत्रण में रखने के लिए विधायिका को बहुत-से अधिकार दिए हैं। कार्यपालिका को नियंत्रित करना इतना ज़रूरी क्यों है? आप क्या सोचते हैं?
उत्तर:
1. कार्यपालिका के पास प्रशासन, नौकरशाही, पुलिस और सुरक्षा-बलों जैसे राज्य के सबसे ताक़तवर औज़ार होते हैं, बिना नियंत्रण के इनका दुरुपयोग नागरिकों की स्वतंत्रता के लिए ख़तरा बन सकता है।
2. निर्वाचित प्रतिनिधियों की जनता के प्रति सीधी जवाबदेही होती है, विधायिका द्वारा नियंत्रण यह सुनिश्चित करता है कि कार्यपालिका जनता की इच्छा के विरुद्ध मनमाने ढंग से काम न करे।
3. अविश्वास प्रस्ताव, प्रश्नकाल, संसदीय समितियाँ जैसे उपकरण कार्यपालिका को लगातार जवाबदेह बनाए रखते हैं, जिससे नीति-निर्माण में पारदर्शिता और संतुलन बना रहता है।
4. बिना नियंत्रण के कार्यपालिका, ख़ासकर स्थायी नौकरशाही, समय के साथ इतनी शक्तिशाली हो सकती है कि वह जनता के प्रति असंवेदनशील बन जाए, इसलिए यह नियंत्रण लोकतंत्र की सेहत के लिए ज़रूरी है।
9 स्वायत्त एजेंसियाँ: जन-हितैषी? कार्यकुशल?
प्र. कहा जाता है कि प्रशासनिक-तंत्र के कामकाज में बहुत ज़्यादा राजनीतिक हस्तक्षेप होता है। सुझाव है कि ज़्यादा से ज़्यादा स्वायत्त एजेंसियाँ बननी चाहिए जिन्हें मंत्रियों को जवाब न देना पड़े।
(क) क्या इससे प्रशासन ज़्यादा जन-हितैषी होगा?
(ख) क्या इससे प्रशासन की कार्यकुशलता बढ़ेगी?
(ग) क्या लोकतंत्र का अर्थ यह होता है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों का प्रशासन पर पूर्ण नियंत्रण हो?
उत्तर:
(क) ज़रूरी नहीं। स्वायत्त एजेंसियाँ राजनीतिक दबाव से तो बच सकती हैं, पर वे जनता के प्रति सीधे जवाबदेह नहीं रहतीं, इसलिए जन-हितैषी होने की गारंटी नहीं। जवाबदेही की कमी उन्हें मनमाना भी बना सकती है।
(ख) कुछ हद तक हाँ, विशेषज्ञता वाले, तकनीकी क्षेत्रों (जैसे केंद्रीय बैंक, नियामक संस्थाएँ) में राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त फ़ैसले बेहतर और तेज़ हो सकते हैं, पर हर क्षेत्र में यह लागू करना उचित नहीं।
(ग) नहीं, यह ज़रूरी नहीं कि निर्वाचित प्रतिनिधियों का प्रशासन पर हर छोटी बात में पूर्ण नियंत्रण हो, लोकतंत्र का असली मतलब है जवाबदेही और पारदर्शिता, जो चुनी हुई सरकार की निगरानी और सार्वजनिक जाँच, दोनों से बनती है, ज़रूरत संतुलन की है, न कि हर एजेंसी को मंत्रियों के सीधे नियंत्रण में रखने या पूरी तरह स्वतंत्र छोड़ने की।
10 निर्वाचित प्रशासन: निबंध
प्र. “नियुक्ति आधारित प्रशासन की जगह निर्वाचन आधारित प्रशासन होना चाहिए”, इस विषय पर 200 शब्दों में एक लेख लिखो।
उत्तर: यह प्रस्ताव आकर्षक लगता है, पर व्यावहारिक रूप से समस्याओं से भरा है।
पक्ष में तर्क: निर्वाचित अधिकारी सीधे जनता के प्रति जवाबदेह होंगे, उन्हें बार-बार जनता का सामना करना पड़ेगा, जिससे मनमानी की गुंजाइश कम होगी। यह विचार लोकतंत्र के मूल सिद्धांत, यानी जनता की सीधी भागीदारी, से मेल खाता प्रतीत होता है।
विपक्ष में तर्क: 1. प्रशासन के लिए तकनीकी दक्षता, विशेषज्ञता और अनुभव चाहिए, जो प्रतियोगी परीक्षा से चुने गए अधिकारियों में योग्यता के आधार पर सुनिश्चित होती है, चुनाव में यह गारंटी नहीं रहती। 2. निर्वाचित अधिकारी बार-बार चुनाव में उलझे रहेंगे, दीर्घकालिक और अलोकप्रिय पर ज़रूरी नीतिगत फ़ैसले लेने से बचेंगे। 3. निरंतरता ख़त्म होगी, हर चुनाव के बाद प्रशासनिक अनुभव और संस्थागत स्मृति का नुक़सान होगा। 4. निर्वाचित अधिकारी राजनीतिक दलों के प्रति निष्ठा दिखाने के दबाव में आ सकते हैं, जिससे तटस्थता ख़त्म हो सकती है।
निष्कर्ष: बेहतर रास्ता यही है कि नियुक्ति-आधारित, योग्यता पर चुनी गई स्थायी नौकरशाही बनी रहे, पर उसे निर्वाचित प्रतिनिधियों और सूचना के अधिकार जैसे उपकरणों के ज़रिए ज़्यादा पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाए, प्रशासन को पूरी तरह निर्वाचन-आधारित बनाना व्यवहार्य नहीं है।
11 पाठ के बीच के प्रश्न
अध्याय के बीच में भी कई प्रश्न पूछे गए हैं: अध्याय की शुरुआत में, हाशिये की टिप्पणियों में, ‘खुद करें-खुद सीखें’ में, श्रीलंका वाले बॉक्स में, ‘कहाँ पहुँचे? क्या समझे?’ में और ‘कार्टून बूझें’ में। इनके उत्तर नीचे उसी क्रम में दिए गए हैं जिस क्रम में ये पुस्तक में आते हैं, प्रश्न पुस्तक के अपने शब्दों में।
प्र. आपके स्कूल के प्रशासन का प्रमुख कौन है? किसी स्कूल या विश्वविद्यालय में महत्त्वपूर्ण निर्णय कौन लेता है?
उत्तर. स्कूल में प्रशासन के प्रमुख प्रधानाचार्य होते हैं, जो आम तौर पर प्रबंध समिति, स्कूल बोर्ड या शिक्षा विभाग के अधीन काम करते हैं। समय-सारणी, प्रवेश, शुल्क और अनुशासन जैसे महत्त्वपूर्ण निर्णय प्रधानाचार्य प्रबंध समिति के साथ लेते हैं; विश्वविद्यालय में कुलपति, कार्यकारी परिषद् और विद्वत परिषद्। फिर शिक्षक और कार्यालय के कर्मचारी इन निर्णयों को रोज़ लागू करते हैं। इससे किसी भी कार्यपालिका के दो हिस्से दिखते हैं: नीतिगत निर्णय लेने वाले और उन्हें लागू करने वाले।
प्र. मुझे याद है कोई कह रहा था कि लोकतंत्र में कार्यपालिका जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। क्या यह बड़ी कंपनियों के बड़े अधिकारियों के लिए भी सही है? क्या उन्हें हम मुख्य कार्यपालिका अधिकारी नहीं कहते? वे किसके प्रति उत्तरदायी हैं?
उत्तर. उसी तरह नहीं। लोकतांत्रिक सरकार की कार्यपालिका जनता के प्रति उत्तरदायी होती है, विधायिका में बैठे जनप्रतिनिधियों के ज़रिए और समय-समय पर होने वाले चुनावों के ज़रिए। किसी कंपनी का मुख्य कार्यपालिका अधिकारी कंपनी के निदेशक मंडल के प्रति, और उसके ज़रिए कंपनी के मालिक शेयरधारकों के प्रति उत्तरदायी होता है; उसे देश के कानूनों और नियामकों का पालन भी करना होता है। आम नागरिक वोट देकर किसी मुख्य कार्यपालिका अधिकारी को नहीं हटा सकते, जबकि सरकार को हटा सकते हैं।
प्र. सार्क सम्मेलन या जी-7 देशों की बैठक की एक फोटो प्राप्त करें और उन लोगों की सूची बनाएँ जिन्होंने उसमें भाग लिया। क्या आप सोच सकते हैं कि क्यों उन्हीं लोगों ने भाग लिया, अन्य लोगों ने क्यों नहीं?
उत्तर. सूची आपकी फोटो पर निर्भर करेगी। ऐसी फोटो में हर सदस्य देश की सरकार का प्रमुख दिखेगा: जैसे भारत के प्रधानमंत्री, अमेरिका या फ्रांस के राष्ट्रपति, ब्रिटेन, जापान या इटली के प्रधानमंत्री, और जर्मनी के चांसलर। ये लोग इसलिए भाग लेते हैं क्योंकि शिखर सम्मेलन में सरकारों की ओर से फ़ैसले लिए जाते हैं, इसलिए हर देश अपनी वास्तविक कार्यपालिका के प्रमुख को भेजता है। अध्यक्षात्मक व्यवस्था में वह राष्ट्रपति होता है; संसदीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री या चांसलर, न कि भारत के राष्ट्रपति, ब्रिटेन के राजा या जापान के सम्राट जैसा औपचारिक राष्ट्र-प्रधान। इस तरह फोटो से पता चलता है कि किस देश में किस प्रकार की कार्यपालिका है।
प्र. श्रीलंका के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की स्थिति भारत से कैसे भिन्न है? भारत और श्रीलंका के राष्ट्रपति के महाभियोग में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका की तुलना करें।
उत्तर. श्रीलंका में राष्ट्रपति को जनता सीधे छः वर्ष के लिए चुनती है; वह राज्य का प्रधान, सशस्त्र सेनाओं का प्रधान सेनापति और सरकार का प्रधान भी है, प्रधानमंत्री को चुनता है और प्रधानमंत्री तथा मंत्रियों को हटा भी सकता है। इसलिए वहाँ प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के अधीन है। भारत में राष्ट्रपति अप्रत्यक्ष रूप से पाँच वर्ष के लिए चुना जाता है, केवल औपचारिक प्रधान है, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद् की सलाह पर काम करता है, और लोकसभा में बहुमत वाले प्रधानमंत्री को बर्खास्त नहीं कर सकता; वास्तविक सरकार का प्रधान प्रधानमंत्री है। महाभियोग में: श्रीलंका में यदि प्रस्ताव संसद के कम से कम आधे सदस्यों द्वारा पास हो और अध्यक्ष संतुष्ट हो कि आरोपों में दम है, तो अध्यक्ष मामला सर्वोच्च न्यायालय को भेज सकता है, यानी वहाँ न्यायालय की भूमिका है। भारत में सर्वोच्च न्यायालय की कोई भूमिका नहीं है: राष्ट्रपति को केवल संसद विशेष बहुमत वाली महाभियोग प्रक्रिया से हटा सकती है, और इसका एकमात्र आधार संविधान का उल्लंघन है।
प्र. नेहा: यह तो बहुत सरल है। जिस देश में राष्ट्रपति है वहाँ अध्यक्षात्मक कार्यपालिका और जिस देश में प्रधानमंत्री है वहाँ संसदीय कार्यपालिका है। आप नेहा को कैसे समझाएँगे कि ऐसा हमेशा सच नहीं होता?
उत्तर. राष्ट्रपति होने से कार्यपालिका अध्यक्षात्मक नहीं हो जाती, और प्रधानमंत्री होने से संसदीय नहीं। भारत में राष्ट्रपति है, पर कार्यपालिका संसदीय है, क्योंकि राष्ट्रपति केवल औपचारिक प्रधान है और लोकसभा के प्रति उत्तरदायी प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद् ही वास्तविक कार्यपालिका हैं; जर्मनी और इटली भी ऐसे ही हैं। फ्रांस, रूस और श्रीलंका में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों हैं, फिर भी वहाँ अर्द्ध-अध्यक्षात्मक व्यवस्था है जिसमें राष्ट्रपति के पास महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ होती हैं। असली कसौटी यह है कि वास्तविक शक्ति कहाँ है और कार्यपालिका किसके प्रति उत्तरदायी है, पद का नाम नहीं।
प्र. क्या हमारे देश में बहुत मजबूत प्रधानमंत्री नहीं हुए? क्या इसका मतलब यह है कि संसदीय व्यवस्था में भी किसी एक व्यक्ति की प्रधानता जारी रह सकती है? तब तो जनता और विधायिका को लगातार सचेत रहने की ज़रूरत है।
उत्तर. हाँ। जब किसी एक दल को लोकसभा में भारी बहुमत मिलता है, तब प्रधानमंत्री की स्थिति निर्विवाद हो जाती है, और मंत्रिपरिषद् पर नियंत्रण, नौकरशाही पर अधिकार, मीडिया तक पहुँच और चुनाव में व्यक्तित्व के प्रक्षेपण जैसी शक्तियाँ संसदीय व्यवस्था में भी किसी एक व्यक्ति की प्रधानता बना सकती हैं। यह व्यवस्था इस ख़तरे को घटाती है, पर पूरी तरह ख़त्म नहीं करती: प्रधानमंत्री फिर भी बहुमत के समर्थन पर निर्भर और संसद के प्रति उत्तरदायी रहता है। इसीलिए जनता, विधायिका, विपक्ष, मीडिया और अन्य संस्थाओं को लगातार सचेत रहना होता है।
प्र. मैं यहाँ कहने भर को बैठा दिया गया हूँ या मैं सचमुच के सवाल भी पूछ रहा हूँ? क्या इस पुस्तक के लेखकों ने मुझे अपने मनचाहे सवाल पूछने की शक्ति दी है या मैं वही सवाल पूछ रहा हूँ जो उनके मन में उठ रहे हैं?
उत्तर. हाशिये का यह पात्र अपनी ही स्थिति पर मज़ाक कर रहा है, और यह मज़ाक बगल में बताई गई राष्ट्रपति की स्थिति से मेल खाता है। राष्ट्रपति की तरह यह पात्र अपने नाम से बोलता दिखता है, पर उसके शब्द कोई और (पुस्तक के लेखक) लिखते हैं, ठीक वैसे जैसे राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद् की सलाह पर काम करता है। फिर भी यह पात्र केवल नाममात्र का नहीं है: इसके सवाल छात्रों को सोचने पर मजबूर करते हैं, वैसे ही जैसे राष्ट्रपति को सूचना पाने का अधिकार है, वह सलाह पर पुनर्विचार के लिए कह सकता है और उसके पास कुछ विशेषाधिकार हैं। आपके अपने सवाल तो असली हैं: अध्याय के बारे में आप जो चाहें पूछ सकते हैं।
प्र. राष्ट्रपति के लिए किताबों में स्त्रीलिंग और पुल्लिंग दोनों का प्रयोग किया जाता है। क्या कभी कोई महिला भी राष्ट्रपति हुई है?
उत्तर. हाँ। प्रतिभा पाटिल 2007 में भारत की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं और 2012 तक इस पद पर रहीं। द्रौपदी मुर्मू 2022 में राष्ट्रपति बनीं; वे इस पद पर पहुँचने वाली अनुसूचित जनजाति की पहली व्यक्ति भी हैं।
प्र. कल्पना करें कि प्रधानमंत्री किसी राज्य में इस आधार पर राष्ट्रपति शासन लगाना चाहता है कि वहाँ की सरकार दलितों पर अत्याचार रोकने में विफल रही है। राष्ट्रपति का कहना है कि राष्ट्रपति शासन का अपवाद स्वरूप ही प्रयोग करना चाहिए। इस स्थिति में राष्ट्रपति के पास निम्नलिखित में से कौन विकल्प है? (क) वह प्रधानमंत्री को बताए कि राष्ट्रपति शासन की घोषणा करने वाले आदेश पर वह हस्ताक्षर नहीं करेगा। (ख) प्रधानमंत्री को बर्खास्त कर दे। (ग) वह प्रधानमंत्री से वहाँ केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल भेजने को कहे। (घ) एक प्रेस वक्तव्य दे कि क्यों प्रधानमंत्री गलत है। (ङ) इस संबंध में प्रधानमंत्री से बातचीत करे और उसे ऐसा करने से रोके परंतु यदि प्रधानमंत्री दृढ़ रहे तब उस पर हस्ताक्षर कर दे।
उत्तर. राष्ट्रपति के पास विकल्प (ङ) है। राष्ट्रपति को सूचना पाने और अपने विचार रखने का अधिकार है, और वह मंत्रिपरिषद् से सलाह पर पुनर्विचार करने को कह सकता है, पर पुनर्विचार के बाद आई सलाह उसे माननी पड़ती है (अनुच्छेद 74(1))। इसलिए (क) संभव नहीं, राष्ट्रपति हमेशा के लिए हस्ताक्षर से इनकार नहीं कर सकता; (ख) संभव नहीं, लोकसभा में बहुमत रहने तक प्रधानमंत्री पद पर बना रहता है; (ग) राष्ट्रपति का अपना फ़ैसला नहीं हो सकता, वह अपने आप सरकार के कामों का निर्देश नहीं दे सकता, हालाँकि बातचीत में ऐसा सुझाव दे सकता है; और (घ) उचित नहीं, क्योंकि राष्ट्रपति उस सरकार का सार्वजनिक विरोध नहीं करता जिसकी सलाह मानने को वह बाध्य है।
प्र. भारत के प्रधानमंत्री पद का उल्लेख किए बिना भारतीय सरकार या राजनीति की कोई चर्चा नहीं हो सकती। क्या आप सोच सकते हैं कि ऐसा क्यों?
उत्तर. क्योंकि प्रधानमंत्री सरकार का सबसे महत्त्वपूर्ण पदाधिकारी है। राष्ट्रपति केवल मंत्रिपरिषद् की सलाह पर अपनी शक्तियों का प्रयोग करता है, और मंत्रिपरिषद् का प्रधान प्रधानमंत्री है। प्रधानमंत्री को लोकसभा में बहुमत का समर्थन होता है, वह मंत्रियों को चुनता है और मंत्रालय बाँटता है, मंत्रिपरिषद् तथा राष्ट्रपति और संसद के बीच सेतु का काम करता है, सभी महत्त्वपूर्ण फ़ैसलों में शामिल रहता है, नौकरशाही पर नियंत्रण रखता है और विदेशों में देश का प्रतिनिधित्व करता है। इसीलिए पंडित नेहरू ने प्रधानमंत्री को सरकार की केंद्रीय धुरी कहा।
प्र. लोग मंत्री बनना क्यों चाहते हैं? इस कार्टून में शायद यह बताया गया है कि लोग सुख-सुविधा उठाने के लिए मंत्री बनना चाहते हैं। लेकिन तब किन्हीं खास मंत्रालयों को पाने के लिए होड़ क्यों मची रहती है?
उत्तर. सुख-सुविधा और प्रतिष्ठा एक कारण है, पर अकेला नहीं। मंत्री विभागों का नेतृत्व करते हैं और ऐसे फ़ैसले लेते हैं जिनका असर पूरे देश पर पड़ता है, इसलिए मंत्री-पद असली शक्ति, नीतियों और संसाधनों पर प्रभाव, और अपने क्षेत्र, दल या सामाजिक वर्ग की सेवा का मौक़ा देता है। गृह, वित्त, रक्षा या रेल जैसे कुछ मंत्रालयों के पास दूसरों से कहीं बड़ा बजट और ज़्यादा महत्त्वपूर्ण फ़ैसले होते हैं, और उनसे ज़्यादा पहचान और प्रभाव मिलता है। इसलिए इन्हें पाने की होड़ रहती है, ख़ासकर गठबंधन सरकारों में, जहाँ सहयोगी दल महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों के लिए मोल-भाव करते हैं।
प्र. क्या कोई आदमी ताकतवर होने के चलते प्रधानमंत्री बनता है या प्रधानमंत्री बनने के बाद वह ताकतवर हो जाता है?
उत्तर. दोनों बातें सही हैं। कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री इसलिए बनता है क्योंकि उसके पास पहले से शक्ति होती है: लोकसभा में बहुमत का समर्थन, आम तौर पर सबसे बड़े दल या गठबंधन के नेता के रूप में। पद पर आने के बाद उसकी शक्ति और बढ़ जाती है: मंत्रिपरिषद् पर नियंत्रण, लोकसभा का नेतृत्व, नौकरशाही पर अधिकार, मीडिया तक पहुँच और विदेशों में राष्ट्रीय नेता की छवि। पर वह वास्तव में कितनी शक्ति का प्रयोग करता है, यह राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर है: एक दल के बहुमत में प्रधानमंत्री बहुत मज़बूत होता है, गठबंधन में उसे एक मध्यस्थ की भूमिका निभानी पड़ती है।
प्र. मुख्यमंत्री विश्वासमत जीतकर भी खुश नहीं हैं। वे कह रहे हैं कि विश्वासमत जीतने के बावजूद उनकी परेशानियाँ बरकरार हैं। क्या आप सोच सकते हैं, वे ऐसा क्यों कह रहे हैं?
उत्तर. विश्वासमत जीतने से केवल यह साबित होता है कि आज सरकार के पास बहुमत है। गठबंधन में यह बहुमत कई सहयोगी दलों और निर्दलीय सदस्यों पर टिका होता है, जिनमें से हर एक की मंत्री-पद, मंत्रालय और नीतियों को लेकर माँगें होती हैं। सबको साथ रखने के लिए मुख्यमंत्री को लगातार बातचीत और समझौते करने पड़ते हैं, और समर्थन कभी भी वापस लिया जा सकता है। इसलिए परेशानियाँ बनी रहती हैं: मुख्यमंत्री को एक नेता से ज़्यादा एक मध्यस्थ की भूमिका निभानी पड़ती है।
प्र. मान लीजिए कि प्रधानमंत्री को मंत्रिपरिषद् का गठन करना है। वह क्या करेगा/करेगी? (क) विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों का चयन। (ख) केवल अपनी पार्टी के लोगों का चयन। (ग) केवल व्यक्तिगत रूप से निष्ठावान और विश्वसनीय लोगों का चयन। (घ) केवल सरकार के समर्थकों का चयन। (ङ) मंत्री बनने की होड़ में शामिल व्यक्तियों की राजनीतिक ताकत का अंदाज़ा लगाकर ही उनका चयन।
उत्तर. व्यवहार में प्रधानमंत्री (ङ) करता है, और साथ में (घ) भी। सभी मंत्रियों का संसद सदस्य होना (या छः महीने में बन जाना) ज़रूरी है और उन्हें सरकार का समर्थक होना ही चाहिए, इसलिए प्रधानमंत्री सरकार के समर्थकों में से चुनता है और हर दावेदार की राजनीतिक हैसियत तौलता है: वरिष्ठता, उसके पीछे का समर्थन, वह किस क्षेत्र और सामाजिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, और गठबंधन में सहयोगी दलों की माँगें। (ख) गठबंधन में संभव नहीं, जहाँ सहयोगियों को पद देने पड़ते हैं। विशेषज्ञता (क) और निष्ठा (ग) का भी ध्यान रखा जा सकता है, पर ये चयन का मुख्य आधार नहीं होते।
प्र. हाँ, मुझे मालूम है कि अधिकारी लोगों की मदद के लिए हैं, लेकिन लोग सदा इन अधिकारियों से डरे रहते हैं और अधिकारियों का व्यवहार भी शासकों जैसा होता है।
उत्तर. अध्याय भी मानता है कि यह आम अनुभव है: नौकरशाही अक्सर इतनी शक्तिशाली होती है कि लोग किसी सरकारी अधिकारी के पास जाने से डरते हैं, और इसे आम नागरिकों की माँगों के प्रति संवेदनहीन माना जाता है। अध्याय के सुझाए उपाय हैं: लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार नौकरशाही पर नियंत्रण रखे, पर इतना ज़्यादा राजनीतिक हस्तक्षेप न हो कि नौकरशाही नेताओं के हाथ का औज़ार बन जाए, और नौकरशाही को नागरिकों के प्रति जवाबदेह बनाया जाए। सूचना के अधिकार जैसे उपाय नौकरशाही को कुछ ज़्यादा संवेदनशील और जवाबदेह बना सकते हैं।