1 हमें संसद क्यों चाहिए?

अगर सरकार का काम मंत्री ही करते हैं, तो फिर 543 सांसदों को चुनने की ज़रूरत क्या है? इसी सवाल से यह अध्याय शुरू होता है, और इसका जवाब पूरे चैप्टर में फैला हुआ है।
विधायिका (Legislature) सरकार का वह अंग है जो जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों से बनता है, कानून बनाता है और कार्यपालिका को जनता के प्रति जवाबदेह बनाए रखता है।
- विधायिका सिर्फ़ कानून बनाने वाली संस्था नहीं है, कानून बनाना उसके कई कामों में से एक काम है
- यह सभी लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रियाओं का केंद्र है
- सदन में बहस, बहिर्गमन (वाकआउट, यानी विरोध जताकर सदन से बाहर चले जाना), विरोध, प्रदर्शन, सर्वसम्मति और सहयोग, सब कुछ चलता रहता है
- यह हंगामा बेकार नहीं है, इसके ज़रिए ही बहुत ज़रूरी काम पूरे होते हैं
- सच्चा लोकतंत्र एक प्रभावी और सचमुच प्रतिनिधित्व करने वाली विधायिका के बिना सोचा ही नहीं जा सकता
- विधायिका जनता को यह मौक़ा देती है कि वह अपने प्रतिनिधियों से हिसाब माँग सके, यही प्रतिनिधिक लोकतंत्र की असली बुनियाद है
1.1 पर एक शिकायत भी है : “संसद का ह्रास हो गया है”
- ज़्यादातर लोकतंत्रों में विधायिका अपना महत्त्व कार्यपालिका के मुक़ाबले खोती जा रही है
- भारत में भी नीति की पहल मंत्रिमंडल करता है, शासन का एजेंडा वही तय करता है और वही उसे लागू करता है
- इसी वजह से कुछ आलोचक कहते हैं कि संसद का ह्रास हो गया है, यानी उसकी ताक़त घट गई है
कितना भी ताक़तवर मंत्रिमंडल हो, उसे लोक सभा में बहुमत बनाए रखना ही पड़ता है, और नेता को संसद के सामने खड़े होकर जवाब देना पड़ता है।
यही संसद की लोकतांत्रिक शक्ति है
- संसद देश का सबसे खुला और सबसे लोकतांत्रिक बहस का मंच मानी जाती है
- अपनी बनावट की वजह से यह सरकार के सभी अंगों में सबसे ज़्यादा प्रतिनिध्यात्मक है, यानी देश के सबसे ज़्यादा तरह के लोग यहीं पहुँचते हैं
- सबसे बड़ी बात, सरकार को चुनने और हटाने की शक्ति इसी के पास है
“संसद के ह्रास” वाली बहस पर 4 या 6 अंक का प्रश्न बार-बार आता है। उत्तर में दोनों पक्ष लिखें : पहले घटते महत्त्व के कारण, फिर वे तीन बातें जो आज भी संसद को शक्तिशाली बनाती हैं (बहुमत बनाए रखना, बहस का मंच, सरकार को हटाने की शक्ति)।
1.2 दो सच्ची घटनाएँ जो बताती हैं कि संसद काम करती है
तीनों मामलों में सरकार के पास बहुमत था, फिर भी उसे झुकना पड़ा। यही संसद का कार्यपालिका पर नियंत्रण है।
2 संसद में दो सदन क्यों?

- राष्ट्रीय स्तर की विधायिका को संसद कहते हैं, राज्य स्तर की विधायिका को राज्य विधायिका
- भारत की संसद में दो सदन हैं : राज्य सभा (Council of States) और लोक सभा (House of the People)
द्वि-सदनीय विधायिका (Bicameral Legislature) वह विधायिका है जिसमें दो सदन होते हैं। जिसमें केवल एक सदन हो, उसे एक-सदनीय (Unicameral) विधायिका कहते हैं।
- संविधान ने राज्यों को छूट दी है कि वे एक सदन रखें या दो
- अभी सिर्फ़ छह राज्यों में द्वि-सदनीय विधायिका है
राज्य में दूसरे सदन का नाम विधान परिषद् होता है और पहले सदन का नाम विधान सभा।

2.1 दो सदन रखने के दो कारण
हर हिस्से को जगह मिले
बड़े और बहुत विविधता वाले देश आम तौर पर दो सदन रखते हैं, ताकि समाज के हर वर्ग और देश के हर भौगोलिक हिस्से को प्रतिनिधित्व मिल सके।
हर फ़ैसले पर दोबारा विचार
एक सदन का हर फ़ैसला दूसरे सदन के पास जाता है, इसलिए हर विधेयक और हर नीति पर दो बार चर्चा होती है। एक सदन जल्दबाज़ी में फ़ैसला कर भी ले, तो दूसरा सदन उसे रोककर फिर से सोच सकता है।
उच्च सदन पुनरीक्षण करने वाली संस्था का उपयोगी काम कर सकता है, उसके विचारों का महत्त्व हो, भले ही उसके वोटों का न हो।
पूर्णिमा बनर्जी, संविधान सभा वाद-विवाद, खंड 9, पृष्ठ 33, 30 जुलाई 1949
जर्मनी के दो सदन बुंदेस्टैग (फेडरल एसेंबली) और बुंदेसरैट (फेडरल कौंसिल) कहलाते हैं। बुंदेसरैट की 69 सीटें जर्मनी के 16 संघीय राज्यों में जनसंख्या के अनुपात में बँटी हैं। ख़ास बात यह है कि इसके सदस्य चुने नहीं जाते, उन्हें राज्य सरकारें नियुक्त करती हैं और वे राज्य सरकार के निर्देश पर एक टीम की तरह वोट देते हैं। जिन विषयों में संघीय नियम लागू कराने की ज़िम्मेदारी राज्यों पर है, उन पर बुंदेसरैट की मंज़ूरी ज़रूरी है और वह ऐसे विधेयकों पर वीटो भी कर सकती है।
3 राज्य सभा
- राज्य सभा भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है
- यह अप्रत्यक्ष रूप से चुनी जाती है, यानी जनता इसे सीधे नहीं चुनती
3.1 सीटें कैसे बँटती हैं : भारत ने अमेरिका का रास्ता क्यों नहीं चुना
दूसरे सदन में प्रतिनिधित्व देने के दो तरीक़े हो सकते हैं।
समान प्रतिनिधित्व (अमेरिका)
- देश के हर हिस्से को बराबर सीटें, चाहे वह छोटा हो या बड़ा
- अमेरिका की सीनेट में हर राज्य को बराबर प्रतिनिधित्व मिलता है
- फ़ायदा : सभी राज्य बराबर माने जाते हैं
- नुक़सान : बहुत छोटे राज्य को भी उतनी ही सीटें, जितनी बहुत बड़े राज्य को
जनसंख्या के अनुपात में (भारत)
- जिस राज्य की आबादी ज़्यादा, उसे सीटें ज़्यादा
- हर राज्य की सीटों की संख्या संविधान की चौथी अनुसूची में तय है
- उत्तर प्रदेश की 31 सीटें, सिक्किम की 1 सीट
- संविधान निर्माता यही बेमेल हालत रोकना चाहते थे
पुस्तक ख़ुद एक सवाल उठाती है : अगर भारत अमेरिका वाला तरीक़ा अपनाता, तो 1998.12 लाख आबादी वाले उत्तर प्रदेश को उतनी ही सीटें मिलतीं जितनी 6.10 लाख आबादी वाले सिक्किम को।
3.2 कार्यकाल और स्थायी सदन
- राज्य सभा के सदस्य 6 वर्ष के लिए चुने जाते हैं
- वे दुबारा चुने जा सकते हैं
- सभी सदस्यों का कार्यकाल एक साथ ख़त्म नहीं होता
- हर दो साल पर एक तिहाई सदस्य रिटायर होते हैं और उन्हीं एक तिहाई सीटों पर चुनाव होता है
- इसी वजह से राज्य सभा कभी पूरी तरह भंग नहीं होती, इसे स्थायी सदन कहते हैं
स्थायी सदन (Permanent House) वह सदन है जो कभी पूरी तरह भंग नहीं होता, क्योंकि उसके सभी सदस्य एक साथ सेवानिवृत्त नहीं होते। भारत में राज्य सभा स्थायी सदन है।
स्थायी सदन का फ़ायदा ज़रूर लिखें, यही असली अंक वाला हिस्सा है : लोक सभा भंग हो जाए और नए चुनाव अभी होने बाक़ी हों, तब भी राज्य सभा की बैठक बुलाकर ज़रूरी काम निपटाया जा सकता है।
3.3 मनोनीत सदस्य
- चुने हुए सदस्यों के अलावा राज्य सभा में 12 मनोनीत सदस्य भी होते हैं
- इन्हें राष्ट्रपति मनोनीत करते हैं, यानी बिना चुनाव के नियुक्त करते हैं
- ये वे लोग होते हैं जिन्होंने साहित्य, विज्ञान, कला और समाजसेवा में विशेष योगदान दिया हो
छात्र अक्सर लिख देते हैं कि मनोनीत सदस्य लोक सभा में भी होते हैं। नहीं। यहाँ बात केवल राज्य सभा के 12 मनोनीत सदस्यों की है, और वे इन्हीं चार क्षेत्रों से आते हैं। “खेल” इस सूची में नहीं है, खिलाड़ियों को समाजसेवा या कला के आधार पर लिया जाता रहा है।
4 लोक सभा
- लोक सभा और राज्यों की विधान सभाएँ जनता सीधे चुनती है
- चुनाव के लिए पूरे देश को लगभग बराबर आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों में बाँट दिया जाता है
- हर क्षेत्र से एक प्रतिनिधि चुना जाता है
- चुनाव सार्वभौम वयस्क मताधिकार से होता है, यानी हर वयस्क नागरिक को वोट का अधिकार है और हर वोट की क़ीमत बराबर है
- अभी 543 निर्वाचन क्षेत्र हैं
- यह संख्या 1971 की जनगणना के बाद से नहीं बदली है
निर्वाचन क्षेत्र (Constituency) देश या राज्य का वह भौगोलिक हिस्सा है जिसकी आबादी लगभग बराबर रखी जाती है और जहाँ से एक प्रतिनिधि चुना जाता है।
4.1 कार्यकाल
- लोक सभा 5 वर्ष के लिए चुनी जाती है, और यह अधिकतम समय है
- पाँच साल पूरे होने से पहले भी लोक सभा भंग हो सकती है, दो हालात में :
- कोई दल या गठबंधन सरकार न बना पा रहा हो
- प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को लोक सभा भंग करके नए चुनाव कराने की सलाह दे
“लोक सभा और राज्य सभा में अंतर” 4 अंक का सबसे आम प्रश्न है। नीचे वाली तालिका ही उसका पूरा उत्तर है, इसे बिंदुवार याद कर लें।
| आधार | लोक सभा | राज्य सभा |
|---|---|---|
| दूसरा नाम | जनता का सदन (House of the People) | राज्यों का सदन (Council of States) |
| किसका प्रतिनिधित्व | पूरे देश की जनता का | भारत के राज्यों का |
| चुनाव | प्रत्यक्ष, जनता द्वारा | अप्रत्यक्ष, विधायकों द्वारा |
| कार्यकाल | 5 वर्ष, पहले भी भंग हो सकती है | सदस्य 6 वर्ष के लिए, सदन कभी भंग नहीं |
| मनोनीत सदस्य | नहीं | 12, राष्ट्रपति द्वारा |
| धन विधेयक | केवल यहीं प्रस्तुत हो सकता है | न ला सकती, न अस्वीकार कर सकती |
| मंत्रिपरिषद् किसके प्रति उत्तरदायी | लोक सभा के प्रति | किसी के प्रति नहीं |
5 संसद क्या करती है?
कानून बनाना संसद का सबसे मशहूर काम है, पर अकेला काम नहीं। पुस्तक संसद के आठ कार्य गिनाती है।
5.1 आठों कार्य, थोड़ा खुलकर
- विधायी कार्य : संसद देश के लिए कानून बनाती है। पर सच यह है कि संसद अक्सर सिर्फ़ मंज़ूरी देने का काम करती है। विधेयक का असली मसौदा संबंधित मंत्री की देखरेख में नौकरशाही तैयार करती है, और विधेयक में क्या रहेगा और कब आएगा, यह मंत्रिमंडल तय करता है। मंत्रिमंडल की मंज़ूरी के बिना कोई बड़ा विधेयक संसद में नहीं आता। मंत्री के अलावा दूसरे सदस्य भी विधेयक ला सकते हैं, पर सरकार के समर्थन के बिना उनके पास होने की गुंजाइश नहीं रहती।
- कार्यपालिका पर नियंत्रण : शायद यही संसद का सबसे अहम काम है, कि कार्यपालिका अपनी हद न लाँघे और जनता के प्रति ज़िम्मेदार बनी रहे। इस पर पूरा एक हिस्सा आगे है।
- वित्तीय कार्य : सरकार हर काम में पैसा खर्च करती है और वह पैसा कर से आता है। लोकतंत्र में कर लगाने और पैसा खर्च करने, दोनों पर विधायिका का नियंत्रण होता है। सरकार कोई नया कर लगाना चाहे तो उसे लोक सभा की मंज़ूरी लेनी पड़ती है। सरकार को यह भी हिसाब देना पड़ता है कि उसने पैसा कहाँ खर्च किया और अब कहाँ से जुटाना चाहती है। यह काम बजट और वार्षिक वित्तीय वक्तव्य के ज़रिए होता है।
- प्रतिनिधित्व : संसद देश के अलग-अलग क्षेत्रों, सामाजिक समूहों, आर्थिक वर्गों और धार्मिक समुदायों के अलग-अलग विचारों का प्रतिनिधित्व करती है।
- विचार-विमर्श (बहस) : संसद देश का सबसे ऊँचा बहस का मंच है। चर्चा की शक्ति पर कोई सीमा नहीं है। सदस्य बिना डर के किसी भी विषय पर बोल सकते हैं। यही चर्चाएँ लोकतांत्रिक निर्णय प्रक्रिया की आत्मा हैं।
- संविधायी कार्य : संविधान में संशोधन पर चर्चा और उसे पारित करने की शक्ति संसद के पास है। इस मामले में दोनों सदनों की शक्ति बराबर है। हर संविधान संशोधन को दोनों सदनों के विशेष बहुमत से पारित होना पड़ता है।
- निर्वाचन कार्य : संसद भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव करती है।
- न्यायिक कार्य : राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने के प्रस्तावों पर विचार करना संसद का न्यायिक कार्य है।
मंत्रिपरिषद् प्रधानमंत्री समेत सभी मंत्रियों का पूरा समूह है। मंत्रिमंडल उसी के भीतर वरिष्ठ मंत्रियों का छोटा समूह है, जो असली नीतिगत फ़ैसले लेता है। इसीलिए विधेयक लाने की मंज़ूरी मंत्रिमंडल देता है, पर अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाए तो इस्तीफ़ा पूरी मंत्रिपरिषद् को देना पड़ता है।
विशेष बहुमत (Special Majority) वह बहुमत है जिसमें दो शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए : सदन के कुल सदस्यों का बहुमत, और मतदान में हिस्सा लेने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई समर्थन। साधारण बहुमत में सिर्फ़ उपस्थित सदस्यों का आधे से ज़्यादा होना काफ़ी है।
न्यायिक कार्य का मतलब यह नहीं कि संसद मुक़दमा चलाती है या सज़ा देती है। संसद केवल हटाने के प्रस्ताव पर विचार करती है, फ़ैसला सुनाना अदालत का काम है।
6 दोनों सदनों की शक्तियाँ
द्वि-सदनीय व्यवस्था में दोनों सदन बराबर नहीं होते। पुस्तक दोनों की शक्तियाँ अलग-अलग गिनाती है।
6.1 पुस्तक की अपनी दो सूचियाँ
लोक सभा की शक्तियाँ
- संघ सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बनाती है, धन विधेयक और सामान्य विधेयक दोनों प्रस्तुत और पारित करती है
- कर-प्रस्तावों, बजट और वार्षिक वित्तीय वक्तव्यों को स्वीकृति देती है
- प्रश्न, पूरक प्रश्न, संकल्प, प्रस्ताव और अविश्वास प्रस्ताव के ज़रिए कार्यपालिका को नियंत्रित करती है
- संविधान में संशोधन करती है
- आपात्काल की घोषणा को स्वीकृति देती है
- राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव करती है, और उन्हें तथा उच्च व सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटा सकती है
- समितियों और आयोगों का गठन करती है और उनकी रिपोर्ट पर विचार करती है
राज्य सभा की शक्तियाँ
- सामान्य विधेयकों पर विचार कर उन्हें पारित करती है और धन विधेयकों में संशोधन का सुझाव देती है
- संवैधानिक संशोधनों को पारित करती है
- प्रश्न पूछकर तथा संकल्प और प्रस्ताव लाकर कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है
- राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में भाग लेती है और न्यायाधीशों को हटा सकती है, तथा उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव केवल राज्य सभा में ही लाया जा सकता है
- संसद को राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार दे सकती है
संविधान विषयों को तीन सूचियों में बाँटता है। संघ सूची के विषयों पर केवल संसद कानून बनाती है, राज्य सूची के विषयों पर केवल राज्य विधायिका, और समवर्ती सूची के विषयों पर दोनों कानून बना सकते हैं।
6.2 राज्य सभा की विशेष शक्तियाँ
- राज्य सभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था है, इसलिए इसका मक़सद राज्यों की शक्तियों की रक्षा करना है
- इसी वजह से राज्यों को छूने वाला हर मुद्दा उसकी सहमति और मंज़ूरी के लिए भेजा जाता है
- अगर केंद्र सरकार राष्ट्रहित में राज्य सूची के किसी विषय को संघ सूची या समवर्ती सूची में ले जाना चाहे, तो राज्य सभा की स्वीकृति ज़रूरी है
- इस प्रावधान से राज्य सभा की ताक़त बढ़ती है
अनुभव यह बताता है कि राज्य सभा के सदस्य अपने राज्य से ज़्यादा अपने-अपने दल का प्रतिनिधित्व करते हैं। यानी काग़ज़ पर राज्य सभा राज्यों का सदन है, व्यवहार में वह भी दलीय राजनीति से चलती है। 4 और 6 अंक के उत्तरों में यह वाक्य ज़रूर जोड़ें।
6.3 लोक सभा की विशेष शक्तियाँ
- धन विधेयक केवल लोक सभा में प्रस्तुत हो सकता है, और उसे संशोधित या अस्वीकार करने का अधिकार भी उसी के पास है
- मंत्रिपरिषद् केवल लोक सभा के प्रति उत्तरदायी है, राज्य सभा के प्रति नहीं
- इसलिए राज्य सभा सरकार की आलोचना तो कर सकती है, पर उसे हटा नहीं सकती
राज्य सभा को जनता नहीं, विधायक चुनते हैं। हमारे संविधान की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम शक्ति जनता के पास है। इसी तर्क से सरकार को हटाने और पैसे पर नियंत्रण रखने की सबसे बड़ी शक्तियाँ उन्हीं प्रतिनिधियों के पास होनी चाहिए जिन्हें जनता ने सीधे चुना है। इसीलिए संविधान ने राज्य सभा को ये दो शक्तियाँ नहीं दीं।
बाक़ी सब मामलों में, यानी सामान्य विधेयक पारित करने, संविधान संशोधन, राष्ट्रपति पर महाभियोग और उपराष्ट्रपति को हटाने में, दोनों सदनों की शक्तियाँ बराबर हैं।
महाभियोग (Impeachment) वह संवैधानिक प्रक्रिया है जिससे संसद राष्ट्रपति को संविधान के उल्लंघन के आरोप में उसका कार्यकाल पूरा होने से पहले पद से हटा सकती है।
7 संसद कानून कैसे बनाती है?
विधेयक (Bill) प्रस्तावित कानून का प्रारूप है, यानी वह मसौदा जो अभी कानून बना नहीं है। संसद के दोनों सदनों से पारित होने और राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के बाद वही विधेयक कानून बन जाता है।
7.1 विधेयकों के प्रकार
| प्रकार | पहचान | ख़ास बात |
|---|---|---|
| सरकारी विधेयक | मंत्री प्रस्तुत करता है | पास होने की पूरी संभावना, सरकार का समर्थन साथ है |
| निजी विधेयक (गैर-सरकारी सदस्य का विधेयक) | मंत्री के अलावा कोई सदस्य लाता है | सरकार के समर्थन बिना पास होना लगभग असंभव |
| धन विधेयक | कर, सरकारी खर्च और उधार से जुड़ा | केवल लोक सभा में प्रस्तुत हो सकता है |
| सामान्य विधेयक (गैर-धन विधेयक) | बाक़ी सभी विषय | किसी भी सदन में प्रस्तुत हो सकता है |
| साधारण विधेयक | आम कानून बनाने के लिए | साधारण बहुमत से पारित |
| संविधान संशोधन विधेयक | संविधान बदलने के लिए | दोनों सदनों का विशेष बहुमत ज़रूरी |
7.2 विधेयक आने से पहले की राजनीति
विधेयक संसद में पहुँचने से बहुत पहले उस पर राजनीति शुरू हो जाती है।
- कोई राजनीतिक दल सरकार पर दबाव डाल सकता है कि वह अपना चुनावी वादा पूरा करे या अगले चुनाव में फ़ायदा उठाए
- हित समूह, मीडिया और नागरिक मंच भी किसी कानून के लिए सरकार को मना सकते हैं
- विधेयक तैयार करते समय कई बातें तौली जाती हैं : कानून लागू करने में कितना संसाधन लगेगा, कितना समर्थन या विरोध होगा, और सत्ताधारी दल की चुनावी संभावनाओं पर क्या असर पड़ेगा
- गठबंधन की राजनीति में तो विधेयक को गठबंधन के सभी साथियों को स्वीकार्य होना पड़ता है
कानून बनाना केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, यह एक राजनीतिक कार्रवाई भी है।
इस पूरे हिस्से की एक पंक्ति में बात
- मंत्रिमंडल जब कानून के पीछे की नीति को मंज़ूरी दे देता है, तब मसौदा लिखने का काम शुरू होता है
- मसौदा संबंधित मंत्रालय तैयार करता है, उदाहरण के लिए लड़कियों की विवाह-आयु 18 से बढ़ाकर 21 करने वाला विधेयक विधि मंत्रालय तैयार करेगा और महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय भी इसमें शामिल रहेगा
7.3 विधेयक की यात्रा : तीन चरण
धन विधेयक पर 14 दिन का नियम लगभग हर साल पूछा जाता है। राज्य सभा धन विधेयक को या तो मंज़ूर कर सकती है या उसमें बदलाव का सुझाव दे सकती है, अस्वीकार नहीं कर सकती। अगर वह 14 दिन में कुछ न करे, तो विधेयक पारित मान लिया जाता है। और राज्य सभा के सुझाए संशोधन मानना या न मानना, यह लोक सभा पर निर्भर है।
धन विधेयकों के बारे में विशेष प्रक्रिया : धन विधेयक राज्य सभा में प्रस्तुत नहीं किया जाएगा।
8 संसद कार्यपालिका को कैसे नियंत्रित करती है?
- संसदीय लोकतंत्र में कार्यपालिका उसी दल या गठबंधन से बनती है जिसे लोक सभा में बहुमत हासिल हो
- इसलिए बहुमत के बल पर मनमानी करना कार्यपालिका के लिए मुश्किल नहीं होता
- ऐसी हालत में संसदीय लोकतंत्र मंत्रिमंडल की तानाशाही में बदल सकता है, जहाँ मंत्रिमंडल आगे-आगे चलता है और सदन बस पीछे-पीछे चलता है
- यह तभी रुकता है जब संसद सक्रिय और सचेत रहे
8.1 संसदीय विशेषाधिकार
संसदीय विशेषाधिकार (Parliamentary Privilege) वह सुरक्षा है जिसके कारण सदन में कही गई किसी बात के लिए किसी सदस्य के विरुद्ध कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती। विशेषाधिकार के हनन के मामले में अंतिम निर्णय सदन के अध्यक्ष का होता है।
इस सुरक्षा का मक़सद साफ़ है : सांसद और विधायक तभी अपनी जनता का ठीक से प्रतिनिधित्व कर पाएँगे और कार्यपालिका पर असरदार नियंत्रण रख पाएँगे, जब वे बिना डर के बोल सकें।

8.2 नियंत्रण के चार साधन
विचार-विमर्श और बहस
कानून बनाते समय और सदन की आम चर्चाओं में सदस्य सरकार की नीति और उसे लागू करने के तरीक़े, दोनों पर सवाल उठा सकते हैं।
कानूनों की स्वीकृति या अस्वीकृति
कोई विधेयक संसद की मंज़ूरी के बिना कानून नहीं बन सकता, इसलिए मंज़ूरी अपने आप में एक नियंत्रण है।
वित्तीय नियंत्रण
सरकार को पैसा तभी मिलता है जब संसद बजट मंज़ूर करे, इसलिए खर्च और नीति दोनों पर पकड़ बनी रहती है।
अविश्वास प्रस्ताव
यह सबसे बड़ा हथियार है, इसके पास होते ही पूरी सरकार को इस्तीफ़ा देना पड़ता है।
8.3 बहस के भीतर के औज़ार : प्रश्नकाल और शून्यकाल
| आधार | प्रश्नकाल | शून्यकाल |
|---|---|---|
| कब | अधिवेशन के दौरान हर दिन | प्रश्नकाल के तुरंत बाद |
| क्या होता है | सदस्य तीखे सवाल पूछते हैं, मंत्रियों को जवाब देना पड़ता है | सदस्य कोई भी ज़रूरी मुद्दा उठा सकते हैं |
| मंत्री का जवाब | देना ही पड़ता है | देना बाध्यकारी नहीं है |
| महत्त्व | कार्यपालिका और प्रशासन पर निगरानी का सबसे प्रभावी तरीक़ा | वे मुद्दे सामने आते हैं जो तय एजेंडे में नहीं थे |
- प्रश्नकाल में सदस्यों की सबसे ज़्यादा उपस्थिति दर्ज होती है
- ज़्यादातर सवाल जनहित के विषयों पर होते हैं : मूल्यवृद्धि, अनाज की उपलब्धता, कमज़ोर वर्गों पर अत्याचार, दंगे और कालाबाज़ारी
- इससे सदस्यों को सरकार की आलोचना करने और अपने क्षेत्र की समस्याएँ उठाने का मौक़ा मिलता है
- इसके अलावा आधे घंटे की चर्चा और स्थगन-प्रस्ताव भी नियंत्रण के साधन हैं
प्रश्नकाल में बहस इतनी गरम हो जाती है कि सदस्य आवाज़ ऊँची करते हैं, सदन के बीचोंबीच (वेल में) आ जाते हैं या विरोध में बाहर चले जाते हैं। इससे विधायी समय की काफ़ी हानि होती है। पर यह भी याद रखना चाहिए कि इनमें से कई काम सरकार से रियायत लेने की राजनीतिक तकनीक हैं, और इसी दबाव से कार्यपालिका की जवाबदेही निकलती है।
8.4 कानूनों की स्वीकृति : यह अपने आप नहीं मिल जाती
- जिस सरकार के पीछे अनुशासित बहुमत हो, उसे मंज़ूरी लेने में दिक़्क़त नहीं होती
- फिर भी मंज़ूरी को तयशुदा नहीं माना जा सकता, वह सत्ताधारी दल, गठबंधन साथियों और विपक्ष के बीच कड़ी मोलभाव और बातचीत का नतीजा होती है
- अगर सरकार के पास लोक सभा में बहुमत हो पर राज्य सभा में न हो, तो उसे दोनों सदनों की मंज़ूरी पाने के लिए बड़ी रियायतें देनी पड़ती हैं
8.5 वित्तीय नियंत्रण
- सरकार के कार्यक्रमों के लिए पैसा बजट के ज़रिए मंज़ूर होता है
- बजट तैयार करना और विधायिका की मंज़ूरी के लिए पेश करना सरकार की संवैधानिक बाध्यता है
- विधायिका चाहे तो सरकार को पैसा देने से इनकार भी कर सकती है, हालाँकि ऐसा कम ही होता है क्योंकि सरकार के पास आम तौर पर बहुमत रहता है
- पैसा मंज़ूर करने से पहले लोक सभा यह पूछ सकती है कि सरकार को यह पैसा किन कामों के लिए चाहिए
- यह नियंत्रक-महालेखा परीक्षक (CAG) और लोक-लेखा समिति की रिपोर्ट के आधार पर पैसे के दुरुपयोग के मामलों की जाँच भी कर सकती है
- नियंत्रण सिर्फ़ पाई-पाई का हिसाब रखने के लिए नहीं है, बजट में सरकार की नीति झलकती है, इसलिए वित्त पर नियंत्रण के ज़रिए विधायिका असल में नीति पर नियंत्रण रखती है
नियंत्रक-महालेखा परीक्षक (CAG) वह संवैधानिक अधिकारी है जो सरकार के सारे खर्च की जाँच करता है और अपनी रिपोर्ट संसद को देता है, ताकि संसद देख सके कि पैसा उसी काम में लगा या नहीं जिसके लिए मंज़ूर हुआ था।
8.6 अविश्वास प्रस्ताव
अविश्वास प्रस्ताव (No Confidence Motion) लोक सभा में लाया जाने वाला वह प्रस्ताव है जिसमें कहा जाता है कि सदन को अब मंत्रिपरिषद् पर विश्वास नहीं रहा। यह पारित हो जाए तो पूरी मंत्रिपरिषद् को इस्तीफ़ा देना पड़ता है।
- यही वह सबसे शक्तिशाली हथियार है जिससे संसद कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करती है
- पर जब तक सरकार के पीछे बहुमत वाला दल या गठबंधन खड़ा है, तब तक सदन की यह शक्ति असली से ज़्यादा काल्पनिक है
- 1989 के बाद कई सरकारों को सदन का विश्वास खोने पर इस्तीफ़ा देना पड़ा
- इन सब सरकारों ने विश्वास इसलिए खोया क्योंकि वे अपने गठबंधन साथियों का समर्थन बनाए नहीं रख सकीं
8.7 नियंत्रण कब असरदार होता है, और आज उसमें क्या गिरावट आई है
✓ नियंत्रण तभी असरदार होता है जब
- सदन के पास पर्याप्त समय हो
- सदस्य चर्चा में सचमुच दिलचस्पी लें और भाग लें
- सरकार और विपक्ष दोनों में समझौते की इच्छा हो
✗ पर पिछले दो दशकों में
- लोक सभा और विधान सभाओं के अधिवेशन कम हुए हैं
- बहस पर लगने वाला समय घटा है
- गणपूर्ति यानी कोरम तक पूरा नहीं होता, जितने सदस्यों की मौजूदगी ज़रूरी है उतने भी नहीं आते
- विपक्ष अधिवेशन का बहिष्कार कर देता है, जिससे सदन चर्चा के ज़रिए नियंत्रण रखने की अपनी शक्ति ही खो देता है
9 संसदीय समितियाँ क्या करती हैं?
- संसद केवल अधिवेशन के दौरान बैठती है, इसलिए उसके पास समय बहुत सीमित है
- कानून बनाने के लिए विषय का गहरा अध्ययन चाहिए, और उसमें ध्यान और समय दोनों लगते हैं
- इसके अलावा और भी बड़े काम हैं : विभिन्न मंत्रालयों की अनुदान माँगों का अध्ययन, यानी किस मंत्रालय को कितना पैसा चाहिए इसकी जाँच, विभागों के खर्च की जाँच, और भ्रष्टाचार के मामलों की पड़ताल
- यही सब काम संसदीय समितियाँ करती हैं
| स्थायी समितियाँ | संयुक्त संसदीय समितियाँ (JPC) | |
|---|---|---|
| कब से | 1983 से यह प्रणाली विकसित हुई | ज़रूरत पड़ने पर गठित होती हैं |
| कितनी | विभागों से जुड़ी लगभग 20 | निश्चित संख्या नहीं |
| सदस्य | संसद के सदस्य | दोनों सदनों के सदस्य मिलाकर |
| काम | विभागों के कामकाज, उनके बजट, खर्च और उनसे जुड़े विधेयकों की देखरेख | किसी एक विधेयक पर संयुक्त चर्चा, या वित्तीय अनियमितताओं की जाँच |
9.1 समितियों का असर
- इस व्यवस्था ने संसद का कार्यभार काफ़ी हल्का कर दिया है
- अनेक महत्त्वपूर्ण विधेयक समितियों को भेजे गए, और संसद ने उनमें छिट-पुट बदलाव करके मंज़ूरी दे दी
- कानूनी नज़रिए से देखें तो संसद की मंज़ूरी के बिना न बजट पास हो सकता है, न कोई विधेयक कानून बन सकता है
- पर सच यह भी है कि संसद समितियों के सुझावों को शायद ही कभी नामंज़ूर करती है
“संसदीय समितियों की व्यवस्था का क्या असर पड़ा है” यह पुस्तक की अपनी प्रश्नावली का प्रश्न 10 है, इसलिए इसके आने की संभावना बहुत ज़्यादा है। उत्तर में दोनों बातें लिखें : कार्यभार हल्का हुआ और जाँच गहरी हुई, पर असली फ़ैसला समितियों के हाथ खिसक जाने से संसद की भूमिका मुहर लगाने तक सिमट गई।
10 संसद स्वयं को कैसे नियंत्रित करती है?
- संसद बहस का मंच है, और बहस के ज़रिए ही वह अपने सारे ज़रूरी काम पूरे करती है
- इसलिए चर्चा का सार्थक और अनुशासित होना ज़रूरी है, ताकि कार्यवाही आसानी से चले और सदन की गरिमा बनी रहे
- संविधान में इसके लिए कुछ प्रावधान बनाए गए हैं
- सदन का अध्यक्ष यानी पीठासीन अधिकारी कार्यवाही चलाने के मामले में सर्वोच्च अधिकारी होता है
10.1 दलबदल निरोधक कानून
अध्यक्ष के हाथ में सदस्यों के व्यवहार पर नियंत्रण का एक और तरीक़ा है, और वह है दलबदल निरोधक कानून।
- विधायिका के ज़्यादातर सदस्य किसी न किसी दल के टिकट पर चुने जाते हैं
- सवाल यह था कि चुने जाने के बाद अगर वे अपनी पार्टी छोड़ दें तो क्या हो
- आज़ादी के काफ़ी समय बाद तक यह समस्या बनी रही
- आख़िरकार दलों में आम सहमति बनी कि जो सदस्य एक दल के टिकट पर चुना गया है, उसे दूसरे दल में जाने से रोका जाना चाहिए
- इसके लिए 1985 में संविधान का 52वाँ संशोधन किया गया, इसे ही दलबदल निरोधक कानून कहते हैं
- बाद में 91वें संविधान संशोधन से इसमें फिर बदलाव किया गया
दलबदल (Defection) तब माना जाता है जब कोई सदस्य इनमें से कोई एक काम करे : दल के नेतृत्व के आदेश के बावजूद सदन में उपस्थित न हो, दल के निर्देश के विरुद्ध मतदान करे, या स्वेच्छा से दल की सदस्यता छोड़ दे।
बीस साल का अनुभव बताता है कि यह कानून दलबदल रोकने में सफल नहीं हुआ। उल्टा इसने दल के प्रधान नेताओं और सदन के अध्यक्षों को सदस्यों पर अतिरिक्त शक्ति दे दी। यानी नतीजा दोधारी रहा, और 4 अंक के उत्तर में यही दोनों बातें चाहिए।
विधायिका की प्रकृति ऐसी है कि उस पर बंधन केवल प्रक्रिया के हैं। सार में उस पर कोई बंधन नहीं, संसद या विधायिका की संप्रभुता पर कोई सीमा नहीं बाँधी गई है।
एन. वी. गाडगिल, संविधान सभा वाद-विवाद, खंड 11, पृष्ठ 659, 18 नवंबर 1949
11 निष्कर्ष
- संसद की कार्यवाही देखिए तो सदन इंद्रधनुष जैसा दिखता है, देश के अलग-अलग क्षेत्रों की रंग-बिरंगी वेशभूषा एक साथ
- सदस्य अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं और अलग-अलग जाति, धर्म तथा संप्रदाय से आते हैं
- वे अक्सर एक-दूसरे का कड़ा विरोध करते हैं, और कई बार लगता है कि देश का समय और पैसा बर्बाद हो रहा है
- पर इसी अध्याय में हमने देखा कि यही सांसद कार्यपालिका को प्रभावी ढंग से नियंत्रित भी करते हैं
- यही समाज के अलग-अलग वर्गों के हितों की अभिव्यक्ति भी करते हैं
- अपनी इसी बनावट की वजह से संसद सरकार के सभी अंगों में सबसे ज़्यादा प्रतिनिध्यात्मक है
- अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के सदस्यों की मौजूदगी ही उसे जनता की अपेक्षाओं के प्रति संवेदनशील बनाती है
- विधायिका कानून बनाने के साथ-साथ कार्यपालिका को जवाबदेह रखती है, यही उसका सबसे अहम काम है
- भारत की संसद द्वि-सदनीय है, और अभी 6 राज्यों में ही दो सदन हैं
- राज्य सभा राज्यों का, अप्रत्यक्ष रूप से चुना हुआ स्थायी सदन है, 6 वर्ष कार्यकाल और 12 मनोनीत सदस्य
- लोक सभा जनता द्वारा सीधे चुनी जाती है, 543 सीटें और अधिकतम 5 वर्ष
- संसद के आठ कार्य हैं : विधायी, नियंत्रण, वित्तीय, प्रतिनिधित्व, बहस, संविधायी, निर्वाचन और न्यायिक
- धन विधेयक और सरकार को हटाने की शक्ति केवल लोक सभा के पास है, बाक़ी लगभग सब में दोनों सदन बराबर
- राज्य सूची का विषय संघ सूची में ले जाने के लिए राज्य सभा की मंज़ूरी चाहिए, यही उसकी विशेष शक्ति है
- विधेयक तीन चरणों से गुज़रता है, गतिरोध पर संयुक्त अधिवेशन, और अंत में राष्ट्रपति की स्वीकृति
- नियंत्रण के चार साधन : बहस, कानूनों की स्वीकृति, वित्तीय नियंत्रण और अविश्वास प्रस्ताव
- 1983 से बनी लगभग 20 स्थायी समितियाँ असली जाँच करती हैं, इसीलिए इन्हें लघु विधायिका कहते हैं
- 1985 का 52वाँ संशोधन दलबदल तो नहीं रोक पाया, पर दल के नेताओं की ताक़त ज़रूर बढ़ा गया
- क्या मैं बिना देखे लोक सभा और राज्य सभा के छह अंतर लिख सकता हूँ?
- क्या मैं संसद के आठों कार्य नाम सहित गिना सकता हूँ?
- क्या मैं विधेयक के कानून बनने की पूरी यात्रा क्रम से लिख सकता हूँ, संयुक्त अधिवेशन और 14 दिन के नियम सहित?
- क्या मैं प्रश्नकाल और शून्यकाल का फ़र्क़ एक वाक्य में बता सकता हूँ?
- क्या मुझे राज्य सभा की वह विशेष शक्ति याद है जो लोक सभा के पास नहीं है?
- क्या मैं दलबदल की तीनों शर्तें और इस कानून का दोधारी नतीजा लिख सकता हूँ?