कक्षा 11 राजनीति विज्ञान अध्याय 5 विधायिका महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले ख़ुद उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. विधायिका किसे कहते हैं?

उत्तर: विधायिका सरकार का वह अंग है जो जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों से बनता है, कानून बनाता है और कार्यपालिका को जनता के प्रति जवाबदेह बनाए रखता है।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. द्वि-सदनीय विधायिका का क्या अर्थ है?

उत्तर: जिस विधायिका में दो सदन होते हैं, उसे द्वि-सदनीय विधायिका कहते हैं। भारत की संसद में राज्य सभा और लोक सभा, दो सदन हैं।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. राज्य सभा को स्थायी सदन क्यों कहा जाता है?

उत्तर: क्योंकि इसके सभी सदस्य एक साथ सेवानिवृत्त नहीं होते। हर दो वर्ष पर केवल एक तिहाई सदस्य बदलते हैं, इसलिए यह सदन कभी पूरी तरह भंग नहीं होता।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. धन विधेयक कहाँ प्रस्तुत किया जा सकता है?

उत्तर: धन विधेयक केवल लोक सभा में प्रस्तुत किया जा सकता है। वहाँ पारित होने के बाद ही वह राज्य सभा में भेजा जाता है।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. संसदीय समितियों को लघु विधायिका क्यों कहा जाता है?

उत्तर: क्योंकि इन समितियों में संसद के सभी दलों को प्रतिनिधित्व मिलता है और विधेयकों पर असली विस्तृत चर्चा यहीं होती है, इसलिए वे छोटी संसद जैसी लगती हैं।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. संसदीय विशेषाधिकार क्या है?

उत्तर: यह वह सुरक्षा है जिसके कारण सदन में कही गई किसी बात के लिए किसी सदस्य के विरुद्ध कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती। इसके हनन पर अंतिम निर्णय सदन का अध्यक्ष लेता है।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. दलबदल निरोधक कानून किस संविधान संशोधन से और किस वर्ष आया?

उत्तर: यह 1985 में संविधान के 52वें संशोधन से आया। बाद में 91वें संविधान संशोधन से इसमें फिर बदलाव किया गया।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. शून्यकाल क्या है?

उत्तर: शून्यकाल वह समय है जिसमें सदस्य कोई भी ज़रूरी मुद्दा उठा सकते हैं, चाहे वह दिन के तय एजेंडे में न हो। इसमें मंत्रियों का उत्तर देना बाध्यकारी नहीं होता।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. प्रश्नकाल और शून्यकाल में दो अंतर लिखिए।

उत्तर: 1. प्रश्नकाल में सदस्य मंत्रियों से तय प्रश्न पूछते हैं और मंत्रियों को जवाब देना ही पड़ता है, जबकि शून्यकाल में मंत्री का उत्तर देना बाध्यकारी नहीं है।
2. प्रश्नकाल का विषय पहले से सूचित होता है, जबकि शून्यकाल में सदस्य कोई भी मुद्दा तुरंत उठा सकते हैं।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. राज्य सभा में सीटें किस आधार पर बँटी हैं, और भारत ने अमेरिका वाली व्यवस्था क्यों नहीं अपनाई?

उत्तर: भारत में राज्य सभा की सीटें राज्य की जनसंख्या के अनुपात में बँटी हैं और यह संख्या संविधान की चौथी अनुसूची में तय है। अमेरिका में हर राज्य को सीनेट में बराबर सीटें मिलती हैं। भारत ने वह रास्ता इसलिए नहीं चुना क्योंकि तब 1998.12 लाख आबादी वाले उत्तर प्रदेश को उतनी ही सीटें मिलतीं जितनी 6.10 लाख आबादी वाले सिक्किम को, और संविधान निर्माता यही विसंगति रोकना चाहते थे।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. लोक सभा पाँच वर्ष पूरे होने से पहले किन दो स्थितियों में भंग की जा सकती है?

उत्तर: 1. जब कोई दल या गठबंधन सरकार बनाने की स्थिति में न हो।
2. जब प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को लोक सभा भंग करके नए चुनाव कराने की सलाह दें।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. राज्य सभा के मनोनीत सदस्य कौन होते हैं और उन्हें कौन मनोनीत करता है?

उत्तर: राज्य सभा में 12 मनोनीत सदस्य होते हैं, जिन्हें राष्ट्रपति मनोनीत करते हैं। ये वे लोग होते हैं जिन्होंने साहित्य, विज्ञान, कला और समाजसेवा के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया हो।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. संयुक्त अधिवेशन क्यों बुलाया जाता है, और अब तक उसका नतीजा क्या रहा है?

उत्तर: जब किसी विधेयक पर दोनों सदनों में असहमति हो जाए और गतिरोध बन जाए, तब उसे सुलझाने के लिए संसद का संयुक्त अधिवेशन बुलाया जाता है। भारत में जितनी बार ऐसा हुआ है, फ़ैसला हमेशा लोक सभा के पक्ष में ही गया है, क्योंकि उसके सदस्य संख्या में बहुत अधिक होते हैं।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. धन विधेयक के मामले में राज्य सभा की शक्ति किस तरह सीमित है?

उत्तर: राज्य सभा धन विधेयक न तो प्रस्तुत कर सकती है और न अस्वीकार कर सकती है। वह केवल संशोधन का सुझाव दे सकती है, और उसे मानना या न मानना लोक सभा पर निर्भर है। अगर राज्य सभा 14 दिन में कोई कार्रवाई न करे तो विधेयक पारित मान लिया जाता है।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. दलबदल किसे कहते हैं?

उत्तर: दलबदल तब माना जाता है जब कोई सदस्य इनमें से कोई एक काम करे:
1. दल के नेतृत्व के आदेश के बावजूद सदन में उपस्थित न हो,
2. दल के निर्देश के विरुद्ध सदन में मतदान करे,
3. स्वेच्छा से अपने दल की सदस्यता छोड़ दे।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. स्थायी समिति और संयुक्त संसदीय समिति में दो अंतर लिखिए।

उत्तर: 1. स्थायी समितियाँ 1983 से चली आ रही स्थायी व्यवस्था हैं और विभागों से जुड़ी लगभग 20 समितियाँ हैं, जबकि संयुक्त संसदीय समिति किसी ख़ास काम के लिए बनाई जाती है।
2. संयुक्त संसदीय समिति में संसद के दोनों सदनों के सदस्य होते हैं और वह किसी एक विधेयक पर संयुक्त चर्चा या वित्तीय अनियमितता की जाँच के लिए बनती है।

प्रश्न 9 (2 अंक)

प्र. जर्मनी की द्वि-सदनीय व्यवस्था की तीन ख़ास बातें लिखिए।

उत्तर: 1. जर्मनी के दो सदन बुंदेस्टैग (फेडरल एसेंबली) और बुंदेसरैट (फेडरल कौंसिल) कहलाते हैं।
2. बुंदेसरैट की 69 सीटें 16 संघीय राज्यों में जनसंख्या के अनुपात में बँटी हैं, और इसके सदस्य चुने नहीं जाते, उन्हें राज्य सरकारें नियुक्त करती हैं।
3. वे राज्य सरकार के निर्देश पर एक टीम की तरह वोट देते हैं, और जिन विषयों में संघीय नियम लागू कराने की ज़िम्मेदारी राज्यों पर है, उन पर बुंदेसरैट वीटो भी कर सकती है।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. लोक सभा और राज्य सभा में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: 1. चुनाव: लोक सभा को जनता सीधे चुनती है, राज्य सभा को विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य चुनते हैं।
2. प्रतिनिधित्व: लोक सभा पूरे देश की जनता का और राज्य सभा भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है।
3. कार्यकाल: लोक सभा 5 वर्ष के लिए चुनी जाती है और पहले भी भंग हो सकती है, जबकि राज्य सभा के सदस्य 6 वर्ष के लिए चुने जाते हैं और सदन कभी भंग नहीं होता।
4. मनोनयन: राज्य सभा में 12 मनोनीत सदस्य होते हैं, लोक सभा में कोई नहीं।
5. धन विधेयक: यह केवल लोक सभा में आ सकता है, राज्य सभा उसे अस्वीकार नहीं कर सकती।
6. उत्तरदायित्व: मंत्रिपरिषद् केवल लोक सभा के प्रति उत्तरदायी है, इसलिए सरकार को हटाने की शक्ति भी उसी के पास है।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. संसद के कोई चार कार्य समझाइए।

उत्तर: 1. विधायी कार्य: संसद देश के लिए कानून बनाती है, हालाँकि विधेयक का मसौदा नौकरशाही बनाती है और उसका विषय व समय मंत्रिमंडल तय करता है।
2. वित्तीय कार्य: सरकार कोई नया कर नहीं लगा सकती और बजट के बिना पैसा खर्च नहीं कर सकती। बजट तथा वार्षिक वित्तीय वक्तव्य पर संसद की मंज़ूरी ज़रूरी है।
3. कार्यपालिका पर नियंत्रण: प्रश्नकाल, बहस, वित्तीय नियंत्रण और अविश्वास प्रस्ताव के ज़रिए संसद सरकार को जवाबदेह रखती है।
4. विचार-विमर्श: संसद देश का सर्वोच्च बहस मंच है, जहाँ सदस्य बिना डर के किसी भी विषय पर बोल सकते हैं और यही चर्चाएँ लोकतांत्रिक निर्णय की आत्मा हैं।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. लोक सभा कार्यपालिका को राज्य सभा की तुलना में अधिक प्रभावी ढंग से क्यों नियंत्रित कर सकती है?

उत्तर: 1. मंत्रिपरिषद् केवल लोक सभा के प्रति उत्तरदायी है, राज्य सभा के प्रति नहीं।
2. अविश्वास प्रस्ताव केवल लोक सभा में लाया जा सकता है, और वह पारित होते ही पूरी सरकार को इस्तीफ़ा देना पड़ता है। राज्य सभा सरकार की आलोचना तो कर सकती है, उसे हटा नहीं सकती।
3. धन विधेयक और बजट पर अंतिम शक्ति लोक सभा के पास है, यानी सरकार का खर्च उसी की मंज़ूरी से चलता है।
4. इसकी असली वजह यह है कि लोक सभा को जनता सीधे चुनती है। हमारे लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास है, इसलिए सरकार हटाने और वित्त पर नियंत्रण की शक्तियाँ जनता के सीधे चुने प्रतिनिधियों को ही दी गईं।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. राज्य सभा की विशेष शक्तियाँ लिखिए।

उत्तर: 1. राज्य सभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था है, इसलिए राज्यों को प्रभावित करने वाला हर मुद्दा उसकी सहमति के लिए भेजा जाता है।
2. अगर संसद राष्ट्रहित में राज्य सूची के किसी विषय को संघ सूची या समवर्ती सूची में ले जाना चाहे, तो राज्य सभा की स्वीकृति ज़रूरी है।
3. राज्य सभा संसद को राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार दे सकती है।
4. उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव केवल राज्य सभा में ही लाया जा सकता है।
पर पुस्तक यह भी कहती है कि अनुभव के आधार पर राज्य सभा के सदस्य अपने राज्य से ज़्यादा अपने दल का प्रतिनिधित्व करते हैं।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. संसदीय समितियों की व्यवस्था का संसद के विधायी कामकाज पर क्या असर पड़ा है?

उत्तर: 1. संसद केवल अधिवेशन के दौरान बैठती है और उसके पास समय बहुत कम होता है, इसलिए समितियों ने उसका कार्यभार काफ़ी हल्का कर दिया है।
2. विधेयकों की गहरी जाँच अब समितियों में होती है, साथ ही अनुदान माँगों का अध्ययन, विभागों के खर्च की जाँच और भ्रष्टाचार के मामलों की पड़ताल भी वहीं होती है।
3. अनेक महत्त्वपूर्ण विधेयक समितियों को भेजे गए और संसद ने उनमें छिट-पुट बदलाव करके मंज़ूरी दे दी।
4. इसका दूसरा पहलू यह है कि असली फ़ैसला समितियों के हाथ खिसक गया। कानूनी रूप से संसद की मंज़ूरी के बिना न बजट पास होता है, न विधेयक कानून बनता है, पर व्यवहार में संसद समितियों के सुझाव शायद ही कभी नामंज़ूर करती है।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. दलबदल निरोधक कानून के अच्छे और बुरे, दोनों नतीजे बताइए।

उत्तर: अच्छे नतीजे:
1. एक दल के टिकट पर चुने गए सदस्य का दूसरे दल में चले जाना अब कानूनी रूप से रोका गया है।
2. दलबदल साबित होने पर सदस्य की सदन की सदस्यता समाप्त हो जाती है और वह मंत्री जैसे किसी राजनीतिक पद के लिए भी अयोग्य हो जाता है, यानी दलबदल की क़ीमत बढ़ गई।
बुरे नतीजे:
3. बीस वर्षों का अनुभव बताता है कि यह कानून दलबदल रोकने में सफल नहीं हुआ।
4. इसने दल के प्रधान नेताओं और सदन के अध्यक्षों को सदस्यों पर अतिरिक्त शक्ति दे दी, जिससे सांसद अपनी राय से मतदान करने के बजाय दल के निर्देश पर चलने को मजबूर हो गए।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. संसद में दो सदन रखने के पक्ष में तर्क दीजिए।

उत्तर: 1. भारत जैसे बड़े और बहुत विविधता वाले देश में दो सदन होने से समाज के हर वर्ग और देश के हर भौगोलिक हिस्से को प्रतिनिधित्व मिल पाता है।
2. दूसरा सदन हर फ़ैसले पर दोबारा विचार संभव बनाता है, क्योंकि एक सदन का हर विधेयक दूसरे सदन में भी जाता है।
3. इससे जल्दबाज़ी में लिया गया फ़ैसला रुक सकता है, क्योंकि दूसरा सदन उस पर फिर से चर्चा करता है।
4. संघीय ढाँचे में दूसरा सदन राज्यों की आवाज़ बनता है, जैसे भारत में राज्य सभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है और राज्य सूची से जुड़े मामलों में उसकी सहमति ज़रूरी होती है।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. एक विधेयक के कानून बनने की पूरी प्रक्रिया समझाइए।

उत्तर: 1. विधेयक का अर्थ: विधेयक प्रस्तावित कानून का प्रारूप है। मंत्री जो विधेयक लाए वह सरकारी विधेयक और कोई दूसरा सदस्य जो लाए वह निजी विधेयक कहलाता है।
2. तैयारी: पहले मंत्रिमंडल कानून के पीछे की नीति को मंज़ूरी देता है, फिर संबंधित मंत्रालय मसौदा तैयार करता है। लड़कियों की विवाह-आयु 18 से 21 करने वाला विधेयक विधि मंत्रालय तैयार करेगा और महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय भी उसमें शामिल रहेगा।
3. पहला चरण, प्रस्तुतीकरण: विधेयक लोक सभा या राज्य सभा में प्रस्तुत किया जाता है। धन विधेयक केवल लोक सभा में आ सकता है।
4. दूसरा चरण, समिति: विधेयक पर विस्तृत चर्चा संसदीय समिति में होती है और समिति अपनी सिफ़ारिश सदन को भेजती है। इन्हीं समितियों को लघु विधायिका कहा जाता है।
5. तीसरा चरण, मतदान: सदन में विधेयक पर मतदान होता है। पारित होने पर वह दूसरे सदन में जाता है, जहाँ यही प्रक्रिया दोहराई जाती है।
6. गतिरोध: दोनों सदन सहमत न हों तो संयुक्त अधिवेशन बुलाया जाता है, और अब तक फ़ैसला हमेशा लोक सभा के पक्ष में गया है। धन विधेयक पर राज्य सभा 14 दिन में कार्रवाई न करे तो वह पारित मान लिया जाता है।
7. राष्ट्रपति की स्वीकृति: दोनों सदनों से पारित विधेयक राष्ट्रपति के पास जाता है और उनकी स्वीकृति मिलते ही कानून बन जाता है।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. संसद कार्यपालिका पर नियंत्रण किन साधनों से रखती है? विस्तार से लिखिए।

उत्तर: पृष्ठभूमि: कार्यपालिका उसी दल या गठबंधन से बनती है जिसे लोक सभा में बहुमत हो, इसलिए ख़तरा रहता है कि संसदीय लोकतंत्र मंत्रिमंडल की तानाशाही में बदल जाए। संसद यह चार साधनों से रोकती है।
1. विचार-विमर्श और बहस: प्रश्नकाल हर दिन आता है और उसमें मंत्रियों को तीखे सवालों के जवाब देने पड़ते हैं, यही निगरानी का सबसे प्रभावी तरीक़ा है और इसी में सबसे अधिक उपस्थिति दर्ज होती है। शून्यकाल में सदस्य कोई भी मुद्दा उठा सकते हैं, हालाँकि मंत्री का उत्तर देना बाध्यकारी नहीं। इनके अलावा आधे घंटे की चर्चा और स्थगन-प्रस्ताव भी हैं।
2. कानूनों की स्वीकृति या अस्वीकृति: कोई विधेयक संसद की मंज़ूरी के बिना कानून नहीं बन सकता। 1977 में जनता पार्टी और 2000 में राजग सरकार के पास लोक सभा में बहुमत था पर राज्य सभा में नहीं, इसलिए उन्हें बड़ी रियायतें देनी पड़ीं। लोकपाल विधेयक कानून नहीं बन सका और 2002 का आतंकवाद निरोधक विधेयक राज्य सभा ने अस्वीकार कर दिया।
3. वित्तीय नियंत्रण: बजट पेश करना सरकार की संवैधानिक बाध्यता है। लोक सभा पैसा देने से पहले उसका कारण पूछ सकती है और नियंत्रक-महालेखा परीक्षक तथा लोक-लेखा समिति की रिपोर्ट के आधार पर दुरुपयोग की जाँच कर सकती है। बजट में सरकार की नीति झलकती है, इसलिए वित्त पर नियंत्रण असल में नीति पर नियंत्रण है।
4. अविश्वास प्रस्ताव: यह सबसे शक्तिशाली हथियार है। बहुमत रहते यह शक्ति काल्पनिक रहती है, पर 1989 के बाद कई सरकारें सदन का विश्वास खोकर गिरीं, क्योंकि वे गठबंधन साथियों का समर्थन बनाए नहीं रख सकीं।
सीमाएँ: नियंत्रण तभी असरदार होता है जब सदन के पास पर्याप्त समय हो, सदस्य चर्चा में भाग लें और समझौते की इच्छा हो। पिछले दो दशकों में अधिवेशन और बहस का समय घटा है, गणपूर्ति नहीं होती और विपक्ष के बहिष्कार से सदन अपनी यह शक्ति खो देता है।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. क्या सचमुच संसद का ह्रास हो गया है? इस कथन के पक्ष और विपक्ष में तर्क दीजिए।

उत्तर: ह्रास के पक्ष में तर्क:
1. नीति की पहल मंत्रिमंडल करता है, शासन का एजेंडा वही तय करता है और वही उसे लागू करता है।
2. विधेयक का मसौदा नौकरशाही बनाती है और मंत्रिमंडल की मंज़ूरी के बिना कोई बड़ा विधेयक संसद में आता ही नहीं, इसलिए संसद अक्सर सिर्फ़ मुहर लगाने का काम करती है।
3. पिछले दो दशकों में अधिवेशन कम हुए हैं और बहस पर लगने वाला समय घटा है।
4. गणपूर्ति तक पूरी नहीं होती और विपक्ष अधिवेशन का बहिष्कार कर देता है, जिससे चर्चा के ज़रिए नियंत्रण की शक्ति ही ख़त्म हो जाती है।
5. असली जाँच अब समितियों में होती है और संसद उनके सुझाव शायद ही कभी नामंज़ूर करती है।
ह्रास के विपक्ष में तर्क:
6. कितना भी ताक़तवर मंत्रिमंडल हो, उसे लोक सभा में बहुमत बनाए रखना ही पड़ता है और नेता को संसद के सामने जवाब देना पड़ता है।
7. सरकार को चुनने और हटाने की शक्ति आज भी संसद के पास है, और 1989 के बाद कई सरकारें सदन में विश्वास खोकर गिरी हैं, जो सदन की जीवंतता का ही सबूत है।
8. दबाव में सरकार को फ़ैसले वापस लेने पड़े हैं, जैसे 1998 और 2002 में उर्वरक की बढ़ी क़ीमत।
9. संसद देश का सबसे खुला बहस मंच है और अपनी बनावट की वजह से सरकार के सभी अंगों में सबसे प्रतिनिध्यात्मक है।
निष्कर्ष: संसद की भूमिका बदली ज़रूर है, पर उसकी लोकतांत्रिक शक्ति ख़त्म नहीं हुई। कमी संस्था में कम और उसे चलाने के तरीक़े में ज़्यादा है।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. अगर अधिकांश महत्त्वपूर्ण विधेयक मंत्री ही लाते हैं और बहुमत वाला दल उन्हें पारित करा देता है, तो कानून बनाने में संसद की भूमिका क्या बचती है?

उत्तर: 1. मंज़ूरी अपने आप नहीं मिल जाती: कोई विधेयक संसद की मंज़ूरी के बिना कानून नहीं बन सकता, और यह मंज़ूरी सत्ताधारी दल, गठबंधन साथियों और विपक्ष के बीच कड़ी मोलभाव का नतीजा होती है।
2. दूसरा सदन एक असली रुकावट है: सरकार के पास लोक सभा में बहुमत हो पर राज्य सभा में न हो, तो उसे बड़ी रियायतें देनी पड़ती हैं। 1977 और 2000 में ऐसा ही हुआ, और 2002 का आतंकवाद निरोधक विधेयक राज्य सभा ने अस्वीकार कर दिया।
3. समितियों में असली जाँच होती है: विधेयक पर विस्तृत चर्चा संसदीय समिति में होती है, जिसमें सभी दलों को प्रतिनिधित्व मिलता है, और वहाँ विधेयक में बदलाव होते हैं।
4. बहस से जनता तक बात पहुँचती है: सदन में विधेयक पर बहस देश को बताती है कि कानून किस बात के लिए बन रहा है, और इसी दबाव में सरकार कई बार अपने प्रस्ताव वापस लेती है, जैसे उर्वरक की क़ीमत।
5. गठबंधन की राजनीति में विधेयक को सभी साथी दलों को स्वीकार्य होना पड़ता है, इसलिए बहुमत होते हुए भी सरकार मनमानी नहीं कर सकती।
6. निष्कर्ष: संसद विधेयक लिखती भले न हो, पर उसे रोक सकती है, बदल सकती है और उस पर सरकार से हिसाब माँग सकती है। इसीलिए कानून बनाना सिर्फ़ कानूनी प्रक्रिया नहीं, एक राजनीतिक कार्रवाई भी है।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
राज्य सभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था है और उसका उद्देश्य राज्यों की शक्तियों का संरक्षण करना है। इसलिए राज्यों के हितों को प्रभावित करने वाला हर मुद्दा उसकी सहमति और स्वीकृति के लिए भेजा जाता है। यदि केंद्र सरकार राष्ट्रहित में राज्य सूची के किसी विषय को, जिस पर केवल राज्य की विधान सभा कानून बना सकती है, संघीय सूची या समवर्ती सूची में हस्तांतरित करना चाहे, तो उसमें राज्य सभा की स्वीकृति आवश्यक है। इस प्रावधान से राज्य सभा की शक्ति बढ़ती है। लेकिन अनुभव के आधार पर यही लगता है कि राज्य सभा के सदस्य अपने राज्यों से अधिक अपने-अपने दलों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

(क) 1 अंक राज्य सभा किसका प्रतिनिधित्व करती है?
उत्तर: राज्य सभा भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है और उसका उद्देश्य राज्यों की शक्तियों का संरक्षण करना है।

(ख) 2 अंक गद्यांश में राज्य सभा की जिस विशेष शक्ति की बात है, वह क्या है?
उत्तर: अगर केंद्र सरकार राज्य सूची के किसी विषय को संघ सूची या समवर्ती सूची में ले जाना चाहे, तो उसके लिए राज्य सभा की स्वीकृति ज़रूरी है। यह शक्ति लोक सभा के पास नहीं है।

(ग) 3 अंक गद्यांश के आख़िरी वाक्य में जो आलोचना की गई है, उसका क्या अर्थ है और उससे क्या समस्या पैदा होती है?
उत्तर: आलोचना यह है कि व्यवहार में राज्य सभा के सदस्य अपने राज्य के हित से ज़्यादा अपने राजनीतिक दल की लाइन पर चलते हैं। इससे समस्या यह पैदा होती है कि जिस काम के लिए राज्य सभा बनाई गई थी, यानी राज्यों की आवाज़ केंद्र तक पहुँचाना, वही अधूरा रह जाता है। सदन काग़ज़ पर राज्यों का सदन बना रहता है, पर उसमें बहस दलीय राजनीति के हिसाब से होती है।

केस स्टडी
संसद केवल अधिवेशन के दौरान बैठती है, इसलिए उसके पास समय बहुत सीमित होता है। कानून बनाने के लिए विषय का गहरा अध्ययन ज़रूरी है, और उसमें ध्यान तथा समय दोनों लगते हैं। इसके अलावा मंत्रालयों की अनुदान माँगों का अध्ययन, विभागों के खर्च की जाँच और भ्रष्टाचार के मामलों की पड़ताल जैसे काम भी हैं। यही सब संसदीय समितियाँ करती हैं। 1983 से भारत में विभागों से जुड़ी स्थायी समितियों की प्रणाली विकसित हुई है। इस व्यवस्था ने संसद का कार्यभार हल्का कर दिया है और अनेक महत्त्वपूर्ण विधेयक समितियों को भेजे गए हैं।

(क) 1 अंक विभागों से जुड़ी स्थायी समितियों की प्रणाली किस वर्ष से विकसित हुई?
उत्तर: 1983 से।

(ख) 2 अंक संसद को समितियों की ज़रूरत क्यों पड़ती है?
उत्तर: संसद केवल अधिवेशन के दौरान बैठती है, इसलिए उसके पास समय बहुत कम है। कानून बनाने और खर्च की जाँच जैसे कामों में गहरे अध्ययन की ज़रूरत होती है, जो पूरे सदन में संभव नहीं, इसलिए यह काम समितियों को सौंपा जाता है।

(ग) 3 अंक समितियों की व्यवस्था का एक फ़ायदा और एक ख़तरा बताइए।
उत्तर: फ़ायदा: संसद का कार्यभार हल्का हुआ और विधेयकों तथा खर्च की जाँच गहराई से होने लगी, और चूँकि समितियों में सभी दलों को प्रतिनिधित्व मिलता है, इसलिए इन्हें लघु विधायिका कहा जाता है।
ख़तरा: असली फ़ैसला समितियों के हाथ खिसक जाता है। कानूनी रूप से संसद की मंज़ूरी ज़रूरी है, पर व्यवहार में संसद समितियों के सुझावों को शायद ही कभी नामंज़ूर करती है, जिससे उसकी अपनी भूमिका मुहर लगाने तक सिमट जाती है।