- अधिकारों का घोषणापत्र क्या है, और भारतीय संविधान में यह क्यों है
- संविधान के भाग 3 में दर्ज छह मौलिक अधिकार, और हर एक असल में क्या गारंटी देता है
- न्यायपालिका अधिकारों की रक्षा कैसे करती है, और वे पाँच विशेष आदेश (रिट) जो वह जारी कर सकती है
- राज्य के नीति-निर्देशक तत्व क्या हैं, और वे मौलिक अधिकारों से कैसे अलग हैं
- संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार क्यों नहीं है
1 अधिकार क्यों ज़रूरी हैं
संविधान सिर्फ़ यह नहीं बताता कि सरकार कैसे बनी है। वह सरकार की शक्तियों पर सीमा भी लगाता है, ताकि हर व्यक्ति को कुछ अधिकार मिल सकें। संविधान के भाग 3 में इन्हें सूचीबद्ध किया गया है, और इन्हें मौलिक अधिकार कहते हैं। इस अध्याय के दो असली मामले दिखाते हैं कि सिर्फ़ अधिकार लिख देना काफ़ी नहीं है।
1982 के एशियाई खेलों से पहले सरकार ने ठेकेदारों को फ़्लाईओवर और स्टेडियम बनाने का काम सौंपा। ठेकेदारों ने देश भर से हज़ारों गरीब मज़दूरों को काम पर रखा और उन्हें सरकार की तय न्यूनतम मज़दूरी से भी कम दिया। समाज वैज्ञानिकों की एक टीम ने यह देखा और सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की। उनकी दलील थी कि न्यूनतम मज़दूरी से कम देना बेगार यानी बिना भुगतान की मज़दूरी है, जो शोषण के विरुद्ध मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। न्यायालय ने यह मान लिया और सरकार को आदेश दिया कि मज़दूरों को उनकी बकाया मज़दूरी दी जाए।
मचल लालुँग को 23 साल की उम्र में असम के मोरीगाँव जिले के चुबुरी गाँव से गंभीर चोट पहुँचाने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया। उसे मुकदमे के लिए मानसिक रूप से अस्वस्थ पाया गया और तेजपुर के एक अस्पताल भेज दिया गया। डॉक्टरों ने 1967 और 1996 में, यानी दो बार, लिख कर बताया कि वह मुकदमे के लायक़ स्वस्थ है, पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। वह 54 साल तक”न्यायिक हिरासत” में रहा और जुलाई 2005 में 77 साल की उम्र में तब रिहा हुआ, जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक टीम ने राज्य के बंदियों का निरीक्षण किया। उसके मुकदमे की एक बार भी सुनवाई नहीं हुई।
संविधान हर नागरिक को जीवन के अधिकार के तहत निष्पक्ष और जल्दी सुनवाई का अधिकार देता है। मचल लालुँग का मामला दिखाता है कि कागज़ पर मौजूद अधिकार व्यवहार में न मिले तो क्या होता है। मज़दूरों का मामला ठीक उल्टा दिखाता है: उनका अधिकार अदालत में चुनौती दिया जा सका, इसीलिए वह असल में लागू हुआ। यानी सिर्फ़ कागज़ पर लिखा अधिकार काफ़ी नहीं, अधिकार तभी मायने रखता है जब उसे अदालत में साबित कर बचाया जा सके, और यही इस पूरे अध्याय की सबसे ज़रूरी बात है।
2 अधिकारों का घोषणापत्र
अधिकारों का घोषणापत्र नागरिकों के उन अधिकारों की सूची है जिसे संविधान ख़ुद सूचीबद्ध करता है और सुरक्षित रखता है। यह सरकार को इन अधिकारों के विरुद्ध काम करने से रोकता है, और उल्लंघन होने पर उपचार की गारंटी देता है।
ज़्यादातर लोकतांत्रिक देश नागरिकों के अधिकार संविधान में ही लिख देते हैं, और इसकी वजह सीधी है: जो अधिकार कहीं लिखा ही नहीं, उसे सरकार चुपचाप नज़रअंदाज़ कर सकती है। किसी व्यक्ति के अधिकार को किसी अन्य व्यक्ति या निजी संगठन से ख़तरा हो सकता है, तब उसे सरकार की सुरक्षा चाहिए होती है। पर सरकार के अंग भी, यानी विधायिका, कार्यपालिका, नौकरशाही या न्यायपालिका, अपने काम के दौरान किसी के अधिकार का हनन कर सकते हैं। संविधान का घोषणापत्र नागरिकों को दोनों तरफ़ से सुरक्षा देता है।
अधिकारों के घोषणापत्र को उस वारंटी कार्ड की तरह सोचिए जो टी.वी. या पंखा खरीदने पर मिलता है: यह बताता है कि आपको क्या मिलना ही चाहिए, और वादा टूटने पर यही आपका सबूत है।
दक्षिण अफ़्रीका का संविधान दिसंबर 1996 में लागू हुआ, उस समय जब रंगभेद ख़त्म होने के बाद भी देश गृहयुद्ध के ख़तरे से जूझ रहा था। यह अपने घोषणापत्र को”दक्षिण अफ़्रीका में प्रजातंत्र की आधारशिला” कहता है, और नस्ल, लिंग, गर्भधारण, वैवाहिक स्थिति, जातीय या सामाजिक मूल, रंग, आयु, अपंगता, धर्म, अंतरात्मा, आस्था, संस्कृति, भाषा और जन्म के आधार पर भेदभाव को वर्जित करता है। इसे एक विशेष संवैधानिक न्यायालय लागू करता है, और यह शायद दुनिया के किसी भी संविधान से ज़्यादा अधिकार अपने नागरिकों को देता है: गरिमा, निजता, श्रम-संबंधी उचित व्यवहार, स्वस्थ पर्यावरण, समुचित आवास, स्वास्थ्य-भोजन-पानी-सामाजिक सुरक्षा, बाल-अधिकार, बुनियादी और उच्च शिक्षा, सांस्कृतिक-धार्मिक-भाषाई समुदायों का अधिकार, और सूचना का अधिकार।
- भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों और दक्षिण अफ़्रीका के घोषणापत्र में साझी बातें कौन-सी हैं, सूची बनाइए
- कौन-से अधिकार दक्षिण अफ़्रीका में हैं पर भारत में स्पष्ट रूप से नहीं
- दक्षिण अफ़्रीका में स्पष्ट रूप से लिखे गए पर भारतीय संविधान में सिर्फ़ निहित माने जाने वाले अधिकार कौन-से हैं
3 अधिकार”मौलिक” कब बनता है
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतीय नेताओं ने माँग की थी कि अंग्रेज़ शासक जनता के अधिकारों का सम्मान करें। 1928 में ही मोतीलाल नेहरू समिति ने अधिकारों के एक घोषणापत्र की माँग उठाई थी। इसीलिए जब आज़ादी के बाद संविधान बन रहा था, तब अधिकारों को शामिल करने पर लगभग किसी की असहमति नहीं थी, बहस सिर्फ़ इस पर थी कि किन्हें विशेष दर्जा दिया जाए।
संविधान कुछ अधिकारों को अलग से सूचीबद्ध कर, अतिरिक्त सुरक्षा देकर उन्हें मौलिक अधिकार कहता है।”मौलिक” शब्द से ही इशारा मिलता है: ये अधिकार इतने ज़रूरी हैं कि संविधान इन्हें अलग सूची में रखता है और यह सुनिश्चित करता है कि सरकार भी इनका उल्लंघन न कर सके।
3.1 मौलिक अधिकार साधारण कानूनी अधिकारों से कैसे अलग हैं
साधारण कानूनी अधिकार
- साधारण कानून से सुरक्षित और लागू होते हैं
- विधायिका सामान्य कानून बनाने की प्रक्रिया से इन्हें बदल सकती है
मौलिक अधिकार
- संविधान ख़ुद इनकी गारंटी और सुरक्षा करता है
- सिर्फ़ संविधान में संशोधन करके ही इन्हें बदला जा सकता है
- सरकार का कोई भी अंग इनके विरुद्ध काम नहीं कर सकता; न्यायपालिका ऐसे किसी भी काम को अवैध घोषित कर सकती है
छात्र अक्सर लिख देते हैं कि मौलिक अधिकार”असीमित” होते हैं। ऐसा नहीं है। सरकार मौलिक अधिकारों के प्रयोग पर औचित्यपूर्ण प्रतिबंध लगा सकती है। इन्हें ख़ास बनाने वाली बात यह नहीं कि ये पूर्ण हैं, बल्कि यह कि इन्हें सिर्फ़ संविधान संशोधन से ही छीना जा सकता है।
4 छह मौलिक अधिकार
संविधान के भाग 3 में मौलिक अधिकारों को छह वर्गों में बाँटा गया है। नीचे हर अधिकार अपने आप में अलग चीज़ है, इसलिए हर एक को अलग से याद रखिए, पिछले वाले के अंदर की एक बात मानकर नहीं।
4.1 समता का अधिकार
दो स्थितियाँ सोचिए, दोनों काल्पनिक हैं पर असल में होती रहती हैं। एक दुकानदार स्वदेश कुमार को सुंदर कप में चाय देता है, पर उसके दोस्त को कुल्हड़ में, क्योंकि वह दलित है। एक टी.वी. चैनल चार महिला समाचार-वाचकों को 45 साल की उम्र होने पर हटा देता है, जबकि उसी उम्र के दो पुरुष समाचार-वाचकों पर यह पाबंदी नहीं लगाई जाती। दोनों साफ़ भेदभाव हैं, एक जाति के आधार पर, दूसरा लिंग के आधार पर, और समता का अधिकार ठीक ऐसे ही भेदभाव को रोकने के लिए है।
- कानून के समक्ष समानता और कानूनों का समान संरक्षण
- धर्म, मूलवंश (नस्ल), जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध, जिसमें दुकानों, होटलों, कुओं, तालाबों, स्नानघाटों (नहाने के घाटों) और सड़कों में समान प्रवेश शामिल है
- सरकारी नौकरियों में अवसर की समानता
- छूआछूत का अंत, जो भारतीय समाज में असमानता का सबसे भद्दा रूप रहा है
- उपाधियों का अंत (अंग्रेज़ों के ज़माने जैसी वंशानुगत पदवियाँ अब नहीं दी जातीं), सिवाय सेना या शिक्षा में उत्कृष्टता के लिए राज्य के अपने सम्मान के
राज्य को यह छूट है कि वह ऐसे पिछड़े वर्गों के लिए नियुक्तियाँ या पद आरक्षित करे, जिनका राज्य की सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। सीधी भाषा में: आरक्षण देखने में असमान बर्ताव लगता है, पर संविधान ख़ुद कहता है कि जिन समूहों को इतिहास में पीछे रखा गया, उनके लिए वाक़ई समान अवसर बनाने के लिए यह ज़रूरी है, इसीलिए यह समता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है।
ओडिशा के पुरी जिले के दलित समुदाय के सदस्य हादिबंधु का एक पोस्टकार्ड मिलता है। इसमें लिखा है कि उनके समुदाय के पुरुषों ने वह रिवाज़ मानने से इनकार किया जिसमें उन्हें ऊँची जाति के विवाह-मेहमानों के पैर धोने पड़ते थे। बदले में उनकी समुदाय की चार महिलाओं को पीटा गया, और एक को निर्वस्त्र कर घुमाया गया। क्या इसमें मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है? सरकार को क्या आदेश दिया जाना चाहिए?
4.2 स्वतंत्रता का अधिकार
समता और स्वतंत्रता किसी भी लोकतंत्र के लिए सबसे ज़रूरी अधिकार हैं, और एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती। स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि जो मन में आए वही किया जाए। हर व्यक्ति की स्वतंत्रता की एक ही सीमा है: उससे किसी और की स्वतंत्रता को नुकसान न पहुँचे और कानून-व्यवस्था न बिगड़े।
- भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
- बिना हथियार के शांतिपूर्ण ढंग से जमा होने की स्वतंत्रता
- संगठन या संघ बनाने की स्वतंत्रता
- भारत में कहीं भी आने-जाने और बसने की स्वतंत्रता
- कोई भी पेशा, व्यापार या व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता
- अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण
- जीवन और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार
- शिक्षा का अधिकार
- कुछ मामलों में गिरफ़्तारी और हिरासत से संरक्षण
“किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक (शारीरिक) स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।”
जीवन और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार इनमें सबसे पहला है। किसी नागरिक को कानून की तय प्रक्रिया के बिना जीवन से वंचित नहीं किया जा सकता, और बिना कारण बताए किसी को गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता। गिरफ़्तार होने पर व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील से बचाव का अधिकार है, और पुलिस को उसे 24 घंटे के अंदर निकटतम न्यायाधीश के सामने पेश करना ज़रूरी है। न्यायाधीश ही तय करता है, पुलिस नहीं, कि गिरफ़्तारी सही थी या नहीं। सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसलों ने इस अधिकार को सिर्फ़ जीवित रहने की गारंटी से कहीं आगे बढ़ाया है: अब इसमें गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार और आश्रय तथा आजीविका का अधिकार भी शामिल है, क्योंकि आजीविका के बिना कोई असल में जी ही नहीं सकता।
निवारक नज़रबंदी का मतलब है किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के सिर्फ़ इस आशंका पर गिरफ़्तार कर लेना कि वह भविष्य में कोई ग़ैर-कानूनी काम कर सकता है। यह अधिकतम तीन महीने तक चल सकती है, उसके बाद मामला समीक्षा के लिए एक सलाहकार बोर्ड के पास जाता है।
निवारक नज़रबंदी असामाजिक तत्वों के विरुद्ध एक कारगर हथियार लगती है, पर सरकारों ने इसका इस्तेमाल आम आलोचकों के विरुद्ध भी किया है। इसीलिए दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार और सरकार की निवारक नज़रबंदी की शक्ति के बीच एक असली, परीक्षा में पूछा जाने वाला टकराव है।
ऊपर लिखी बाक़ी स्वतंत्रताएँ भी असीमित नहीं हैं। भाषण की स्वतंत्रता पर लोक-व्यवस्था, शांति और नैतिकता के आधार पर प्रतिबंध लगते हैं। सभा करने की स्वतंत्रता शांतिपूर्ण और बिना हथियार होनी चाहिए, और सरकार किसी क्षेत्र में पाँच या ज़्यादा लोगों की सभा को ग़ैर-कानूनी घोषित कर सकती है। ऐसी शक्ति का दुरुपयोग आसान है: प्रशासन सरकार की किसी नीति के विरुद्ध वाजिब विरोध-प्रदर्शन को भी अनुमति देने से मना कर सकता है। ख़ुद संविधान सभा में भी कुछ सदस्यों ने अधिकारों पर लगी पाबंदियों पर असंतोष जताया था।
“मुझे लगता है कि इनमें से कई मौलिक अधिकार एक सिपाही के नज़रिए से बनाए गए हैं। हर अनुच्छेद के बाद एक ऐसा उपबंध है जो उस अधिकार को लगभग पूरी तरह वापस ले लेता है।”
सोमनाथ लाहिड़ी, संविधान सभा के वाद-विवाद, खंड III, पृष्ठ 404, 29 अप्रैल 1947
4.3 अभियुक्तों के अधिकार
हम अक्सर मान लेते हैं कि जिस पर भी आरोप लगे वह दोषी है, पर संविधान ऐसा नहीं मानता: जब तक न्यायालय किसी को दोषी न ठहराए, तब तक उसे निर्दोष ही माना जाता है। निष्पक्ष मुकदमे के लिए संविधान तीन अधिकारों की व्यवस्था करता है:
- एक ही अपराध के लिए एक से ज़्यादा बार सज़ा नहीं मिलेगी
- कोई कानून किसी काम को पिछली तारीख़ से अपराध घोषित नहीं कर सकता
- किसी को ख़ुद अपने विरुद्ध गवाही देने के लिए नहीं कहा जा सकता
4.4 शोषण के विरुद्ध अधिकार
भारत में करोड़ों गरीब और वंचित लोगों को ऐतिहासिक रूप से दो जुड़े हुए तरह के शोषण झेलने पड़े हैं: बिना भुगतान की बेगार या जबरन मज़दूरी, और इंसानों की खरीद-फ़रोख़्त, यानी उन्हें ग़ुलाम की तरह इस्तेमाल करना। संविधान दोनों पर पाबंदी लगाता है। पहले ज़मींदार और साहूकार बंधुआ मज़दूरी करवाते थे, और आज भी, ख़ासकर भट्ठों के काम में, कुछ बंधुआ मज़दूरी बची हुई है, पर अब यह अपराध है और कानूनन दंडनीय है।
जबरन मज़दूरी नहीं
बेगार, किसी भी तरह की जबरन या बंधुआ मज़दूरी, और इंसानों की खरीद-फ़रोख़्त पर पाबंदी।
ख़तरनाक बाल-मज़दूरी नहीं
14 साल से कम उम्र के बच्चों को कारखाने, खदान या किसी ख़तरनाक काम में नहीं लगाया जा सकता।
बाल-मज़दूरी को ग़ैर-कानूनी बनाने और शिक्षा को बच्चों का मौलिक अधिकार बनाने के बाद यह अधिकार और भी मज़बूत हुआ है।
4.5 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
इतिहास में कई शासकों ने अपनी प्रजा को अपनी मर्ज़ी का धर्म मानने से रोका, या उनसे शासक के धर्म में जबरन धर्मांतरण करवाया। लोकतंत्र इसके ठीक उलट, धार्मिक स्वतंत्रता को अपने बुनियादी सिद्धांतों में गिनता है। भारतीय संविधान हर व्यक्ति को कोई भी धर्म मानने या न मानने का अधिकार देता है।
अंतःकरण (मन की आस्था) की स्वतंत्रता
कोई भी धर्म मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने की, या कोई धर्म न मानने की आज़ादी।
धार्मिक मामलों के प्रबंधन की आज़ादी
धार्मिक समूह लोक-व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य की सीमा में अपने मामले ख़ुद संभाल सकते हैं।
किसी धर्म के लिए कर नहीं
किसी ख़ास धर्म को बढ़ावा देने वाला कर देने के लिए किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता।
धार्मिक शिक्षा में आज़ादी
कुछ शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या उपासना में शामिल होने, या न होने, की आज़ादी।
यह स्वतंत्रता असीमित नहीं है: सरकार लोक-व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर इस पर प्रतिबंध लगा सकती है, इसीलिए सती प्रथा, बहु-विवाह और मानव-बलि जैसी कुप्रथाओं पर पाबंदी को धर्म में हस्तक्षेप नहीं माना जाता। धर्म के प्रचार के अधिकार में दूसरों को धर्म-परिवर्तन के लिए मनाना शामिल है, पर संविधान जबरन धर्मांतरण की इजाज़त नहीं देता। यह सिर्फ़ अपने धर्म के बारे में सूचना फैलाने का अधिकार देता है।
भारत का कोई राजकीय धर्म नहीं है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, न्यायाधीश या कोई भी सार्वजनिक पद पाने के लिए किसी ख़ास धर्म का होना ज़रूरी नहीं है। सरकारी संस्थाएँ न किसी धर्म का प्रचार करती हैं, न धार्मिक शिक्षा देती हैं, न किसी धर्म के लोगों को तरजीह देती हैं। यही प्रावधान भारत में धर्मनिरपेक्षता को जीवित रखते हैं।
4.6 सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार
भारतीय समाज की बात करते ही मन में विविधता की तस्वीर उभरती है। यह कोई एक-जैसा समाज नहीं है, और ऐसे विविधता भरे समाज में कुछ समुदाय संख्या में छोटे भी होंगे। एक अल्पसंख्यक वह समूह है जिसकी अपनी भाषा या धर्म है, और जो किसी क्षेत्र या पूरे देश में संख्या के हिसाब से किसी अन्य समूह से छोटा है, चाहे धार्मिक हो या भाषाई।
- अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को सुरक्षित रखने और विकसित करने का अधिकार
- धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान खोलने का अधिकार
- किसी शिक्षण संस्थान को अल्पसंख्यक-प्रबंधित होने के आधार पर सरकारी अनुदान में भेदभाव नहीं
“बहुसंख्यकों पर एक गंभीर उत्तरदायित्व है कि अल्पसंख्यक सुरक्षित महसूस करें। केवल एक धर्मनिरपेक्ष शासन में ही अल्पसंख्यक सुरक्षित रहेंगे।”
सरदार हुकुम सिंह, संविधान सभा के वाद-विवाद, खंड VIII, पृष्ठ 322, 26 मई 1949
5 संवैधानिक उपचारों का अधिकार
अधिकारों की सूची तब तक बेकार है जब तक उन्हें लागू करवाने का कोई रास्ता न हो। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने संवैधानिक उपचारों के अधिकार को “संविधान का हृदय और आत्मा” कहा था, क्योंकि यही वह अधिकार है जो बाक़ी हर अधिकार को असरदार बनाता है: कोई भी नागरिक अपने उल्लंघन किए गए मौलिक अधिकार को वापस पाने के लिए सीधे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है। ये न्यायालय पाँच तरह के विशेष आदेश जारी कर सकते हैं, जिन्हें रिट कहते हैं।

| रिट | क्या करती है |
|---|---|
| बंदी प्रत्यक्षीकरण | गिरफ़्तार व्यक्ति को न्यायालय के सामने पेश करने का आदेश; गिरफ़्तारी ग़ैर-कानूनी हो तो रिहाई का आदेश भी दे सकती है |
| परमादेश | जब कोई सार्वजनिक पदाधिकारी अपना कानूनी कर्त्तव्य नहीं निभा रहा और इससे किसी का अधिकार प्रभावित हो रहा हो |
| निषेध आदेश | ऊपर की अदालत निचली अदालत को अपने अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाकर सुनवाई करने से रोकती है |
| अधिकार पृच्छा | किसी ऐसे व्यक्ति को पद पर काम करने से रोकती है जिसका उस पद पर कानूनी हक़ नहीं है |
| उत्प्रेषण | किसी लंबित मामले को निचली अदालत या अधिकारी से लेकर ऊपर की अदालत को भेज देती है |
न्यायपालिका के अलावा भी बाद में अधिकारों की रक्षा के लिए कई संस्थाएँ बनाई गईं, जैसे राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग।
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (PUCL) और पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (PUDR) जैसी संस्थाएँ पहले से अधिकारों के हनन पर चौकसी कर रही थीं, इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने 1993 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना की। इसमें सर्वोच्च न्यायालय के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश, और मानवाधिकारों में ज्ञान या अनुभव रखने वाले दो अन्य सदस्य होते हैं।
यह अपनी पहल पर या किसी पीड़ित की याचिका पर मानवाधिकार हनन की शिकायतों की जाँच करता है, जेलों में जाकर बंदियों की स्थिति देखता है, और मानवाधिकार के क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देता है। हर साल इसे हज़ारों शिकायतें मिलती हैं, ज़्यादातर हिरासत में मृत्यु, हिरासत में बलात्कार, लोगों के गायब होने, पुलिस की ज़्यादतियों और महिलाओं से दुर्व्यवहार से जुड़ी, और पंजाब में युवकों के गायब होने तथा गुजरात दंगों की जाँच में इसका दख़ल ख़ासा असरदार रहा है।
छात्र अक्सर सोचते हैं कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग दोषी को सज़ा दे सकता है। ऐसा नहीं है। इसके पास मुकदमा चलाने की शक्ति नहीं है, यह सिर्फ़ सरकार या न्यायालय से कार्रवाई की सिफ़ारिश कर सकता है।
6 राज्य के नीति-निर्देशक तत्व
राज्य के नीति-निर्देशक तत्व संविधान में लिखे गए सरकार के लिए दिशा-निर्देश हैं, पर ये वाद योग्य नहीं हैं: कोई भी नागरिक इन्हें लागू करवाने के लिए अदालत नहीं जा सकता।
संविधान बनाने वालों को पता था कि आज़ाद भारत के सामने बड़ी चुनौतियाँ होंगी, सबसे बड़ी थी सब नागरिकों के बीच समानता और कल्याण लाना। वे चाहते थे कि सरकार को इसकी दिशा मिले, पर भावी सरकारों को किसी ख़ास फ़ैसले से कानूनी रूप से बाँधना नहीं चाहते थे। इसीलिए नीति-निर्देशक तत्वों को नैतिक मार्गदर्शन के तौर पर संविधान में लिखा गया, इस भरोसे पर कि जनता का दबाव और कर्त्तव्य की भावना सरकार को इन्हें गंभीरता से लेने पर मजबूर करेगी, भले ही कोई अदालत इन्हें लागू न करवा सके।
6.1 नीति-निर्देशक तत्वों में क्या है
लक्ष्य और उद्देश्य
समाज को कुल मिलाकर किस दिशा में जाना चाहिए।
मौलिक अधिकारों के अलावा मिलने वाले अधिकार
व्यक्तियों को मिलने वाली अतिरिक्त गारंटी।
सरकार को अपनानी चाहिए ऐसी नीतियाँ
कानून बनाने और शासन चलाने की दिशा।
| लक्ष्य | ऐसे अधिकार जो वाद योग्य नहीं | नीतियाँ |
|---|---|---|
| जनता का कल्याण | सबके लिए समुचित जीविका | समान नागरिक संहिता (सभी धर्मों के लिए विवाह-संपत्ति जैसे मामलों में एक जैसा कानून) |
| सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय | स्त्री-पुरुष को समान काम की समान मज़दूरी | शराब पीने पर प्रतिबंध |
| जीवन-स्तर ऊँचा उठाना | आर्थिक शोषण के विरुद्ध अधिकार | कुटीर उद्योगों को बढ़ावा |
| साधनों का समान वितरण | काम का अधिकार | उपयोगी पशुओं के वध पर रोक |
| अंतर्राष्ट्रीय शांति | छह वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देख-रेख और शिक्षा | ग्राम पंचायतों को प्रोत्साहन |
समय-समय पर सरकार ने नीति-निर्देशक तत्वों को असल में लागू करने की कोशिश की है: ज़मींदारी उन्मूलन कानून (बड़े ज़मींदारों की ज़मीन ख़त्म कर किसानों को देना), बैंकों का राष्ट्रीयकरण, फ़ैक्ट्री-अधिनियम, न्यूनतम मज़दूरी, कुटीर-लघु उद्योगों को बढ़ावा, अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षण, शिक्षा का अधिकार, पूरे देश में पंचायती-राज, रोज़गार गारंटी योजना के तहत सीमित दिनों के लिए काम का अधिकार, और स्कूली बच्चों के लिए दोपहर के भोजन की योजना।
1976 के 42वें संशोधन से संविधान में नागरिकों के दस मौलिक कर्त्तव्यों की एक सूची जोड़ी गई, जैसे संविधान का पालन करना, देश की रक्षा करना, नागरिकों में भाईचारा बढ़ाना और पर्यावरण की रक्षा करना। पर संविधान यह नहीं बताता कि इन्हें कैसे लागू करवाया जाए, और सबसे ज़रूरी बात, यह मौलिक अधिकारों को इन कर्त्तव्यों की शर्त पर नहीं टिकाता। कर्त्तव्यों को जोड़ने से मौलिक अधिकारों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया।
7 जब अधिकार और नीति-निर्देशक तत्व टकराते हैं
मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक कहे जा सकते हैं: मौलिक अधिकार सरकार को कुछ काम करने से रोकते हैं, जबकि नीति-निर्देशक तत्व सरकार को कुछ काम करने के लिए प्रेरित करते हैं। मौलिक अधिकार मुख्यतः व्यक्ति की रक्षा करते हैं, नीति-निर्देशक तत्व पूरे समाज के हित की बात करते हैं। ज़्यादातर समय दोनों एक ही दिशा में चलते हैं, पर कभी-कभी किसी नीति-निर्देशक तत्व को लागू करना किसी नागरिक के मौलिक अधिकार से टकरा सकता है, और भारतीय इतिहास में सबसे स्पष्ट उदाहरण संपत्ति का अधिकार है।
सरकार का पक्ष था कि नीति-निर्देशक तत्वों को लागू करने के लिए संसद संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, भले ही इससे किसी मौलिक अधिकार पर असर पड़े; इसके पीछे यह सोच थी कि अधिकार कभी-कभी जन-कल्याण के रास्ते में आ सकते हैं। अदालतों की राय इसके उलट थी: मौलिक अधिकार इतने महत्वपूर्ण हैं कि नीति-निर्देशक तत्वों को लागू करने के लिए भी इन्हें सीमित नहीं किया जा सकता।
मूल ढाँचे का सिद्धांत सर्वोच्च न्यायालय का वह फ़ैसला है जिसके अनुसार संविधान की कुछ बुनियादी विशेषताएँ इतनी मूल हैं कि संसद संविधान में चाहे जो भी संशोधन करे, इन्हें नहीं बदल सकती।
संसद संविधान में कितना संशोधन कर सकती है, इस लंबे विवाद को आख़िरकार सर्वोच्च न्यायालय के केशवानन्द भारती मुकदमे के फ़ैसले ने सुलझाया, जिसमें कहा गया कि संविधान की कुछ”मूल-ढाँचागत” विशेषताएँ हैं जिन्हें संसद बदल नहीं सकती। यह अध्याय इसका सिर्फ़ नाम बताता है; अध्याय 9,”संविधान: एक जीवंत दस्तावेज़”, इसे विस्तार से समझाता है।
- दक्षिण अफ़्रीका के घोषणापत्र और भारत के नीति-निर्देशक तत्वों की तुलना करें: दोनों सूचियों में कौन-सी बातें साझी हैं?
- दक्षिण अफ़्रीका ने इन बातों को घोषणापत्र के अंदर ही क्यों रखा, अलग सूची में क्यों नहीं?
- अगर आपको किसी नए देश के लिए संविधान लिखना हो, तो क्या आप ऐसे दिशा-निर्देशों को अदालत से लागू करवाने योग्य बनाएंगे या नहीं? कारण बताइए
8 निष्कर्ष
अधिकारों में स्वतंत्रता और समानता दोनों शामिल हैं, यह विचार महाराष्ट्र के क्रांतिकारी समाज सुधारक ज्योतिबा राव फुले (1827-1890) के लेखन में सबसे पहले मिलता है। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान यह विचार और साफ़ हुआ और संवैधानिक अधिकारों का रूप लेने लगा, और आज़ाद भारत के संविधान ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मौलिक अधिकारों की सूची बनाई। 1950 से न्यायपालिका अधिकारों की एक अहम रक्षक रही है, और न्यायिक व्याख्याओं ने इनका दायरा लगातार बढ़ाया है। अधिकार सरकार और प्रशासन के काम पर असली सीमा लगाते हैं, और यही देश में लोकतांत्रिक शासन सुनिश्चित करता है।
- अधिकारों का घोषणापत्र संविधान के अंदर ही नागरिकों के अधिकार सूचीबद्ध और सुरक्षित करता है
- भारत में छह मौलिक अधिकार हैं: समता, स्वतंत्रता, शोषण के विरुद्ध, धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक-शैक्षिक अधिकार, संवैधानिक उपचार
- अनुच्छेद 21 जीवन और दैहिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है; गिरफ़्तारी के बाद 24 घंटे में न्यायाधीश के सामने पेशी ज़रूरी
- निवारक नज़रबंदी: अधिकतम 3 महीने, फिर सलाहकार बोर्ड की समीक्षा
- संवैधानिक उपचारों का अधिकार 5 रिट से काम करता है: बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेध आदेश, अधिकार पृच्छा, उत्प्रेषण
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (1993) जाँच और सिफ़ारिश कर सकता है, मुकदमा नहीं चला सकता
- नीति-निर्देशक तत्व नीति की दिशा देते हैं, पर अदालत से लागू नहीं करवाए जा सकते
- 42वें संशोधन (1976) ने 10 मौलिक कर्त्तव्य जोड़े, अधिकारों को इनकी शर्त पर नहीं बाँधा
- संपत्ति का अधिकार 1978 (44वें संशोधन) तक मौलिक अधिकार था, अब अनुच्छेद 300 (क) के तहत साधारण अधिकार है
- केशवानन्द भारती मुकदमा: संसद संविधान का मूल ढाँचा नहीं बदल सकती
- क्या मैं बिना देखे सभी छह मौलिक अधिकारों के नाम बता सकता हूँ?
- क्या मैं मौलिक अधिकार और साधारण कानूनी अधिकार का फ़र्क़ समझा सकता हूँ?
- क्या मैं सभी पाँच रिट के नाम और उनका काम बता सकता हूँ?
- क्या मैं समझा सकता हूँ कि नीति-निर्देशक तत्व अदालत से क्यों लागू नहीं करवाए जा सकते, पर मौलिक अधिकार क्यों करवाए जा सकते हैं?
- क्या मैं संपत्ति के अधिकार की कहानी मौलिक अधिकार से अनुच्छेद 300 (क) तक, दोनों साल याद रखते हुए, बता सकता हूँ?