इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले ख़ुद उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. अधिकारों का घोषणापत्र क्या है?
उत्तर: अधिकारों का घोषणापत्र नागरिकों के उन अधिकारों की सूची है जिसे संविधान ख़ुद सूचीबद्ध करता है, सुरक्षित रखता है और उल्लंघन पर उपचार की गारंटी देता है।
प्र. मौलिक अधिकार संविधान के किस भाग में सूचीबद्ध हैं?
उत्तर: संविधान के भाग 3 में मौलिक अधिकार सूचीबद्ध हैं।
प्र. गिरफ़्तार व्यक्ति को कितने घंटे के भीतर न्यायाधीश के सामने पेश करना ज़रूरी है?
उत्तर: 24 घंटे के भीतर।
प्र. निवारक नज़रबंदी बिना समीक्षा के अधिकतम कितने समय तक चल सकती है?
उत्तर: अधिकतम तीन महीने तक, उसके बाद मामला सलाहकार बोर्ड के पास जाता है।
प्र. किस उम्र से कम के बच्चे को ख़तरनाक काम में लगाना वर्जित है?
उत्तर: 14 साल से कम उम्र के बच्चे को।
प्र. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना कब हुई थी, और यह किस पृष्ठभूमि में बना?
उत्तर: इसकी स्थापना 1993 में हुई, PUCL और PUDR जैसी स्वतंत्र संस्थाओं द्वारा अधिकार-हनन पर पहले से चौकसी करने की पृष्ठभूमि में।
प्र. संपत्ति का अधिकार आज किस अनुच्छेद के तहत है?
उत्तर: अनुच्छेद 300(क) के तहत, एक साधारण कानूनी अधिकार के रूप में।
प्र. 42वें संशोधन ने कुल कितने मौलिक कर्त्तव्य जोड़े?
उत्तर: कुल दस मौलिक कर्त्तव्य।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. ज़्यादातर लोकतांत्रिक देश नागरिकों के अधिकार संविधान में ही क्यों लिखते हैं?
उत्तर: क्योंकि जो अधिकार कहीं लिखा ही नहीं, उसे सरकार चुपचाप नज़रअंदाज़ कर सकती है। संविधान में अधिकार लिखने से सरकार उनके विरुद्ध काम नहीं कर सकती, और उल्लंघन होने पर उपचार की गारंटी मिलती है।
प्र. मौलिक अधिकार साधारण कानूनी अधिकारों से कैसे अलग हैं?
उत्तर: साधारण कानूनी अधिकार साधारण कानून से सुरक्षित और लागू होते हैं और विधायिका इन्हें सामान्य कानून बनाने की प्रक्रिया से बदल सकती है। मौलिक अधिकारों की गारंटी और सुरक्षा ख़ुद संविधान करता है, और इन्हें सिर्फ़ संविधान संशोधन से ही बदला जा सकता है।
प्र. संविधान का अनुच्छेद 16(4) क्या कहता है?
उत्तर: यह कहता है कि राज्य पर्याप्त प्रतिनिधित्व न रखने वाले पिछड़े वर्गों के लिए नियुक्तियाँ या पद आरक्षित कर सकता है, इसलिए आरक्षण जैसी नीति को समता के अधिकार का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।
प्र. गिरफ़्तारी के तुरंत बाद व्यक्ति को कौन-सी सुरक्षा मिलती है?
उत्तर: उसे गिरफ़्तारी का कारण बताना ज़रूरी है, उसे अपनी पसंद के वकील का अधिकार है, और पुलिस को उसे 24 घंटे के भीतर निकटतम न्यायाधीश के सामने पेश करना होता है, जो अकेला यह तय करता है कि गिरफ़्तारी सही थी या नहीं।
प्र. शोषण के विरुद्ध अधिकार किन दो बातों पर रोक लगाता है?
उत्तर: यह बेगार यानी बिना भुगतान की जबरन मज़दूरी पर, और इंसानों की खरीद-फ़रोख़्त पर रोक लगाता है। साथ ही 14 साल से कम उम्र के बच्चों को ख़तरनाक काम में लगाने पर भी रोक है।
प्र. सरकार धार्मिक स्वतंत्रता पर कौन-से प्रतिबंध लगा सकती है?
उत्तर: सरकार लोक-व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगा सकती है। इसी आधार पर सती प्रथा, बहु-विवाह और मानव-बलि जैसी कुप्रथाओं पर पाबंदी लगी, बिना इसे धर्म में हस्तक्षेप माने।
प्र. संविधान अल्पसंख्यक की परिभाषा कैसे देता है?
उत्तर: अल्पसंख्यक वह समूह है जिसकी अपनी एक साझी भाषा या धर्म है, और जो किसी क्षेत्र में या पूरे देश में संख्या के हिसाब से अन्य समूहों से छोटा है।
प्र. रिट क्या है, और इसे कौन जारी कर सकता है?
उत्तर: रिट एक विशेष आदेश है जो उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय किसी नागरिक के मौलिक अधिकार को लागू करवाने के लिए जारी कर सकता है, जैसे ग़ैर-कानूनी ढंग से गिरफ़्तार व्यक्ति की रिहाई का आदेश देना।
प्र. नीति-निर्देशक तत्वों को ‘वाद योग्य नहीं’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि इन्हें अदालत से लागू नहीं करवाया जा सकता: सरकार किसी नीति-निर्देशक तत्व को लागू न करे तो नागरिक अदालत से सरकार को उसे लागू करने का आदेश देने की माँग नहीं कर सकता।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार को समझाइए, और सर्वोच्च न्यायालय ने इसका दायरा कैसे बढ़ाया है।
उत्तर: 1. अनुच्छेद 21 कहता है कि किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा वंचित नहीं किया जा सकता।
2. इसका अर्थ है कि किसी नागरिक को बिना कारण बताए गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता, और हर गिरफ़्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील का अधिकार है।
3. पुलिस को उसे 24 घंटे के भीतर निकटतम न्यायाधीश के सामने पेश करना ज़रूरी है, और गिरफ़्तारी सही थी या नहीं, यह पुलिस नहीं बल्कि न्यायाधीश तय करता है।
4. सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसलों ने इस अधिकार को सिर्फ़ जीवित रहने की गारंटी से कहीं आगे बढ़ाया है: अब इसमें शोषण-मुक्त और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी शामिल है।
5. न्यायालय ने यह भी माना है कि जीवन के अधिकार में आश्रय और आजीविका का अधिकार भी शामिल है, क्योंकि आजीविका के बिना कोई असल में जी नहीं सकता।
6. यानी यह अधिकार सिर्फ़ जीवित रहने के बारे में नहीं, बल्कि गरिमा के साथ जीने के बारे में है, और न्यायालय लगातार इसका दायरा बढ़ाता रहा है।
प्र. निवारक नज़रबंदी क्या है, और यह विवादास्पद क्यों है?
उत्तर: 1. निवारक नज़रबंदी का मतलब है किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के सिर्फ़ इस आशंका पर गिरफ़्तार कर लेना कि वह भविष्य में कोई ग़ैर-कानूनी काम कर सकता है।
2. यह अधिकतम तीन महीने तक चल सकती है, उसके बाद मामला समीक्षा के लिए एक सलाहकार बोर्ड के पास जाता है।
3. देखने में यह असामाजिक तत्वों के विरुद्ध एक कारगर हथियार लगती है।
4. पर सरकारों ने इसका इस्तेमाल अक्सर आम आलोचकों और विरोध करने वालों के विरुद्ध भी किया है, न कि सिर्फ़ असली ख़तरों के विरुद्ध।
5. इससे दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 21) और सरकार की निवारक नज़रबंदी की शक्ति के बीच एक असली टकराव पैदा होता है।
6. बहुत लोगों का मानना है कि इस कानून में ऐसे सुरक्षात्मक उपाय होने चाहिए जिससे इसका दुरुपयोग न हो सके।
प्र. उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जो कोई भी चार रिट जारी कर सकते हैं, उन्हें समझाइए।
उत्तर: 1. बंदी प्रत्यक्षीकरण: गिरफ़्तार व्यक्ति को न्यायालय के सामने पेश करने का आदेश देती है, और गिरफ़्तारी ग़ैर-कानूनी हो तो रिहाई का आदेश भी दे सकती है।
2. परमादेश: तब जारी की जाती है जब कोई सार्वजनिक पदाधिकारी अपना कानूनी कर्त्तव्य नहीं निभा रहा और इससे किसी के अधिकार को नुकसान हो रहा है।
3. निषेध आदेश: ऊपर की अदालत निचली अदालत को अपने अधिकार-क्षेत्र से बाहर जाकर सुनवाई करने से रोकने के लिए जारी करती है।
4. अधिकार पृच्छा: किसी ऐसे व्यक्ति को पद पर काम करने से रोकती है जिसका उस पद पर कोई कानूनी हक़ नहीं है।
5. (पाँचवीं, उत्प्रेषण, किसी लंबित मामले को निचली अदालत या अधिकारी से लेकर ऊपर की अदालत को हस्तांतरित करती है, अगर पाँचवीं रिट की जगह चाहिए तो।)
प्र. राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों में कौन-सी तीन तरह की बातें होती हैं? हर एक का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर: 1. वे लक्ष्य और उद्देश्य जो एक समाज के रूप में हमें अपनाने चाहिए, जैसे जनता का कल्याण और जीवन-स्तर ऊँचा उठाना।
2. वे अधिकार जो नागरिकों को मौलिक अधिकारों के अलावा मिलने चाहिए, जैसे काम का अधिकार और समान काम की समान मज़दूरी।
3. वे नीतियाँ जिन्हें सरकार को अपनाना चाहिए, जैसे समान नागरिक संहिता और ग्राम पंचायतों को प्रोत्साहन।
4. ये तीनों मिलकर सरकार की नीति को दिशा देते हैं, भले ही कोई अदालत सरकार को इन्हें मानने पर मजबूर न कर सके।
प्र. संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार से साधारण कानूनी अधिकार कैसे बना, समझाइए।
उत्तर: 1. शुरुआत में संविधान ने संपत्ति ‘अर्जित करने, रखने और सुरक्षित रखने’ का मौलिक अधिकार दिया था, हालाँकि सरकार जन-कल्याण के लिए संपत्ति ले सकती थी।
2. 1950 से सरकार ने संपत्ति के अधिकार को सीमित करने वाले कई कानून बनाए, शुरुआत ज़मींदारी उन्मूलन कानून से हुई।
3. ज़मींदारों ने इसे अपने मौलिक अधिकार के उल्लंघन के तौर पर चुनौती दी, जिससे कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हुई।
4. 1973 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संपत्ति का अधिकार संविधान के ‘मूल ढाँचे’ का हिस्सा नहीं है, इसलिए संसद इसे संशोधन से सीमित कर सकती है।
5. 1978 में 44वें संशोधन ने संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से पूरी तरह हटाकर अनुच्छेद 300(क) के तहत एक साधारण कानूनी अधिकार बना दिया।
प्र. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की संरचना और कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: 1. आयोग में सर्वोच्च न्यायालय का एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय का एक पूर्व न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय का एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश, और मानवाधिकारों में ज्ञान या अनुभव रखने वाले दो अन्य सदस्य होते हैं।
2. यह अपनी पहल पर या किसी पीड़ित की याचिका पर मानवाधिकार हनन की शिकायतों की जाँच करता है।
3. यह जेलों में जाकर बंदियों की स्थिति देखता है, और मानवाधिकार के क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देता है।
4. इसे हर साल हज़ारों शिकायतें मिलती हैं, ज़्यादातर हिरासत में मृत्यु, हिरासत में बलात्कार, लोगों के गायब होने और पुलिस की ज़्यादतियों से जुड़ी।
5. इसके पास मुकदमा चलाने की शक्ति नहीं है, यह सिर्फ़ सरकार या न्यायालय को कार्रवाई की सिफ़ारिश कर सकता है।
प्र. मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक कैसे हैं?
उत्तर: 1. मौलिक अधिकार सरकार को कुछ काम करने से रोकते हैं, जैसे नागरिकों के साथ भेदभाव करना।
2. नीति-निर्देशक तत्व सरकार को कुछ काम करने के लिए प्रेरित करते हैं, जैसे जीवन-स्तर ऊँचा उठाना।
3. मौलिक अधिकार मुख्यतः व्यक्ति की रक्षा करते हैं, जबकि नीति-निर्देशक तत्व पूरे समाज के हित की बात करते हैं।
4. ज़्यादातर समय एक का पालन दूसरे को हासिल करने में मदद करता है, इसलिए दोनों एक-दूसरे के विरुद्ध नहीं, बल्कि साथ काम करने के लिए बनाए गए हैं।
5. संपत्ति के अधिकार का मामला दिखाता है कि फिर भी कभी-कभी दोनों टकरा सकते हैं, और संविधान ने संशोधन और अदालती फ़ैसलों से इस टकराव को कैसे सुलझाया।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. इस अध्याय में उद्धृत सोमनाथ लाहिड़ी के संविधान सभा के वक्तव्य को पढ़िए। क्या आप उनसे सहमत हैं? अपने उत्तर के कारण बताइए।
उत्तर: 1. लाहिड़ी ने कहा था कि कई मौलिक अधिकार एक सिपाही के नज़रिए से बनाए गए हैं, बहुत कम अधिकार दिए गए हैं और लगभग हर अनुच्छेद के बाद एक ऐसा उपबंध है जो उस अधिकार को लगभग पूरी तरह वापस ले लेता है।
2. इसमें सच्चाई है: भाषण की स्वतंत्रता पर लोक-व्यवस्था और नैतिकता के आधार पर पाबंदी है, सभा की स्वतंत्रता पर पाँच या ज़्यादा लोगों को ग़ैर-कानूनी घोषित करने की शक्ति है, और निवारक नज़रबंदी बिना मुकदमे के तीन महीने तक हिरासत की इजाज़त देती है।
3. मचल लालुँग का 54 साल हिरासत में रहना, और इस अध्याय में बताया गया निवारक नज़रबंदी का दुरुपयोग, दोनों दिखाते हैं कि असली आपातस्थिति के लिए बनाई गई पाबंदियाँ आम लोगों के विरुद्ध भी इस्तेमाल हो सकती हैं।
4. दूसरी ओर, बिना किसी पाबंदी के अधिकार किसी एक व्यक्ति की स्वतंत्रता को हर किसी की स्वतंत्रता के लिए ख़तरा बना देगा, और यही वजह है कि अध्याय स्वतंत्रता को दूसरों की स्वतंत्रता को नुकसान पहुँचाए बिना परिभाषित करता है।
5. इसलिए एक संतुलित जवाब यह है कि लाहिड़ी पाबंदियों के व्यापक और दुरुपयोग-योग्य होने के बारे में सही थे, पर यह कहना ग़लत होगा कि इससे अधिकार बेमानी हो गए: संवैधानिक उपचारों के अधिकार और 1950 से न्यायपालिका के फ़ैसलों ने पाबंदियों को अधिकार निगलने नहीं दिया, बल्कि अधिकारों को बार-बार बढ़ाया है।
6. लाहिड़ी के वक्तव्य से सबसे ज़रूरी सबक़ यह है कि पाबंदियाँ हटाने से ज़्यादा, उनके दुरुपयोग पर सतर्क रहना ज़रूरी है, और यही सतर्कता, जैसा अध्याय कहता है, दुरुपयोग को दुर्लभ बनाती है।
प्र. आपकी राय में कौन-सा मौलिक अधिकार सबसे महत्वपूर्ण है? इसके प्रावधानों को संक्षेप में लिखें और बताएँ कि यह सबसे महत्वपूर्ण क्यों है।
उत्तर: 1. संवैधानिक उपचारों के अधिकार (अनुच्छेद 32) का दावा सबसे मज़बूत है, जिसे डॉ. अंबेडकर ने ख़ुद संविधान का हृदय और आत्मा कहा था।
2. यह किसी भी नागरिक को अपने मौलिक अधिकार के उल्लंघन पर सीधे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जाने देता है, और अदालत बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेध आदेश, अधिकार पृच्छा और उत्प्रेषण, इन पाँच रिट में से कोई भी जारी कर सकती है।
3. यह सबसे ज़रूरी इसलिए है क्योंकि हर दूसरे मौलिक अधिकार की असली ताक़त इसी पर निर्भर करती है: मचल लालुँग का 54 साल हिरासत में रहना दिखाता है कि बिना लागू करवाने के रास्ते के एक अधिकार का क्या हश्र होता है, जबकि एशियाई खेलों के मज़दूरों का मामला दिखाता है कि जब अधिकार लागू हो सके तो क्या होता है।
4. बाक़ी हर मौलिक अधिकार एक ख़ास तरह के नुकसान से बचाता है, यह अधिकार बाक़ी सबको असली बनाने की क्षमता की रक्षा करता है, इसीलिए इसे खोना किसी और एक अधिकार को खोने से कहीं ज़्यादा नुकसानदायक होगा।
5. इसीलिए हर मौलिक अधिकार अपनी जगह ज़रूरी होते हुए भी, संवैधानिक उपचारों का अधिकार वही है जो बाक़ी सबको दाँत देता है, और यही वजह है कि इसे सबसे महत्वपूर्ण कहा जाना चाहिए।
प्र. गरीबों के बीच काम करने वाला एक कार्यकर्त्ता कहता है कि गरीबों को मौलिक अधिकारों की नहीं, बल्कि नीति-निर्देशक तत्वों को कानूनी तौर पर बाध्यकारी बनाने की ज़रूरत है। क्या आप इससे सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण बताइए।
उत्तर: 1. कार्यकर्त्ता की बात में दम है: एक गरीब, अनपढ़ व्यक्ति के लिए उच्च न्यायालय में मुकदमा लड़ना आसान नहीं, जबकि काम के अधिकार जैसा नीति-निर्देशक तत्व अगर लागू करवाया जा सके तो उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी सीधे बदल जाएगी।
2. पर मौलिक अधिकार भी गरीबों के लिए बेकार नहीं हैं। इसी अध्याय के एशियाई खेलों के मज़दूरों के मामले में, शोषण के विरुद्ध उनके मौलिक अधिकार को अदालत में चुनौती दिए जाने पर उन्हें उनकी बकाया मज़दूरी मिल गई।
3. कई नीति-निर्देशक तत्व, जैसे शिक्षा का अधिकार, पंचायती राज, रोज़गार गारंटी और मिड-डे मील योजना, वाद योग्य बनाए बिना ही साधारण कानून और राजनीतिक दबाव से लागू हो चुके हैं।
4. हर नीति-निर्देशक तत्व को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाना अदालतों पर ऐसे नीतिगत फ़ैसलों का बोझ डाल सकता है जो असल में सरकार का काम है, जैसे जीवन-स्तर कितनी तेज़ी से बढ़ाना है।
5. एक ज़्यादा संतुलित जवाब यह है कि गरीबों को दोनों चाहिए: मौलिक अधिकार जो सीधे शोषण से बचाते हैं, और नीति-निर्देशक तत्व जो सरकार को कल्याणकारी क़दमों की ओर धकेलते हैं, चाहे अदालत का आदेश न हो।
6. इसलिए कार्यकर्त्ता सही है कि कानूनी रूप से बाध्यकारी नीति-निर्देशक तत्व गरीबों की बहुत मदद करेंगे, पर यह कहना ग़लत होगा कि मौलिक अधिकारों की ज़रूरत ही नहीं: मज़दूरों का मामला दिखाता है कि जब मौलिक अधिकार असल में लागू हो सके, तो वह कितना कुछ कर सकता है।
प्र. मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्वों के बीच संपत्ति के अधिकार को लेकर हुए लंबे कानूनी-राजनीतिक विवाद को समझाइए, और यह आख़िरकार कैसे सुलझा।
उत्तर: 1. मूल संविधान ने संपत्ति ‘अर्जित करने, रखने और सुरक्षित रखने’ का मौलिक अधिकार दिया था, पर सरकार जन-कल्याण के लिए संपत्ति ले सकती थी।
2. जब सरकार ने 1950 से ज़मींदारी उन्मूलन कानून बनाने शुरू किए, तो ज़मींदारों ने इसे अपने मौलिक अधिकार के उल्लंघन के तौर पर चुनौती दी।
3. इससे मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्वों के सामाजिक-आर्थिक न्याय के लक्ष्य के बीच एक असली टकराव पैदा हुआ, क्योंकि सरकार का मानना था कि भूमि सुधार बड़े जन-कल्याण के लिए ज़रूरी है।
4. सरकार का पक्ष था कि नीति-निर्देशक तत्वों को लागू करने के लिए संसद संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, भले ही किसी मौलिक अधिकार पर असर पड़े, जबकि अदालतें मानती थीं कि मौलिक अधिकार इतने महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें इस तरह सीमित नहीं किया जा सकता।
5. 1973 में केशवानन्द भारती मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, पर उसके ‘मूल ढाँचे’ को नष्ट करने वाला संशोधन नहीं कर सकती, और अलग से यह भी कहा कि संपत्ति का अधिकार इस मूल ढाँचे का हिस्सा नहीं है।
6. इससे 1978 में 44वें संशोधन के ज़रिए संसद को संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से पूरी तरह हटाकर अनुच्छेद 300(क) के तहत एक साधारण कानूनी अधिकार बनाने का रास्ता मिला, जिससे दशकों पुराना यह विवाद आख़िरकार सुलझ गया।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक इस मामले में सबसे सीधे तौर पर कौन-सा मौलिक अधिकार जुड़ा है?
उत्तर: समता का अधिकार, विशेषतः छूआछूत का अंत और जाति के आधार पर भेदभाव का निषेध।
(ख) 2 अंक क्या इस मामले में मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है? संक्षेप में समझाइए।
उत्तर: हाँ। किसी समुदाय को अपमानजनक परंपरागत काम करने के लिए मजबूर करना, और इनकार करने पर हिंसा करना, जाति के आधार पर भेदभाव है और समता के अधिकार द्वारा दी गई समान प्रतिष्ठा और गरिमा से इनकार है।
(ग) 3 अंक जज के तौर पर आप सरकार को क्या आदेश देंगे?
उत्तर: सरकार को हमलावरों के विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज करने, पीड़ित महिलाओं को चिकित्सा और कानूनी सहायता देने का आदेश दिया जाना चाहिए, और यह स्पष्ट करना चाहिए कि कोई भी रिवाज़ किसी जाति को दूसरी जाति के लिए अपमानजनक सेवा करने पर मजबूर नहीं कर सकता, क्योंकि संविधान छूआछूत को समाप्त करता है और सरकार का दायित्व है कि इसे लागू करे।
(क) 1 अंक बेघर लोगों की तरफ़ से याचिका किस अधिकार के तहत दायर की जाएगी?
उत्तर: संवैधानिक उपचारों का अधिकार, जिसके तहत नागरिक सीधे सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है।
(ख) 2 अंक गद्यांश के अनुसार बेघर लोगों के कौन-से मौलिक अधिकार से इनकार हो रहा है?
उत्तर: अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार (क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने आश्रय को जीवन के अधिकार का हिस्सा माना है), और असल में उनकी अन्य सुविधाओं तक पहुँच भी बाधित होती है, क्योंकि ‘निवास के प्रमाण’ के बिना राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और चिकित्सा सहायता नहीं मिल पाती।
(ग) 4 अंक दिए गए तथ्यों के आधार पर आप सर्वोच्च न्यायालय से किस तरह का आदेश देने की माँग करेंगे?
उत्तर: 1. राज्य सरकारों को निर्देश कि रात्रि-आश्रयों की संख्या काफ़ी बढ़ाई जाए, ख़ासकर जाड़े के मौसम में।
2. बेघर आवेदकों के लिए राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र में ‘निवास के प्रमाण’ की शर्त को आसान बनाया जाए या हटाया जाए, क्योंकि जिसके पास कोई पता ही नहीं, उससे पते का प्रमाण माँगना ही व्यर्थ है।
3. बेघर व्यक्तियों को बिना राशन कार्ड के भी ज़रूरतमंद मरीज़ के तौर पर सरकारी आपातकालीन चिकित्सा सहायता का पात्र माना जाए।
4. सर्वोच्च न्यायालय समय-समय पर सरकार से रिपोर्ट लेकर इन आदेशों के असल पालन की निगरानी करे, ताकि आदेश केवल कागज़ पर न रह जाएँ।