NCERT की पाठ्यपुस्तक भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार के अध्याय 2 «भारतीय संविधान में अधिकार» की प्रश्नावली के दसों प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
1 सही या ग़लत बताइए
प्र. निम्नलिखित प्रत्येक कथन के बारे में बताएँ कि वह सही है या ग़लत:
(क) अधिकार-पत्र में किसी देश की जनता को हासिल अधिकारों का वर्णन रहता है।
(ख) अधिकार-पत्र व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
(ग) विश्व के हर देश में अधिकार-पत्र होता है।
उत्तर:
(क) सही। अधिकारों का घोषणापत्र ठीक यही है: वह सूची जिसमें संविधान किसी देश की जनता के अधिकार सूचीबद्ध और सुरक्षित करता है।
(ख) सही। व्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना, समानता के साथ, घोषणापत्र का मुख्य उद्देश्य है।
(ग) ग़लत। हर देश का लिखित अधिकार-पत्र नहीं होता; कुछ लोकतंत्र परंपरा और साधारण कानून से भी अधिकारों की रक्षा करते हैं।
2 मौलिक अधिकारों का सबसे सटीक वर्णन
प्र. निम्नलिखित में कौन मौलिक अधिकारों का सबसे सटीक वर्णन है?
(क) किसी व्यक्ति को प्राप्त समस्त अधिकार
(ख) कानून द्वारा नागरिक को प्रदत्त समस्त अधिकार
(ग) संविधान द्वारा प्रदत्त और सुरक्षित समस्त अधिकार
(घ) संविधान द्वारा प्रदत्त वे अधिकार जिन पर कभी प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता
उत्तर: (ग)। मौलिक अधिकार वही हैं जिन्हें संविधान ख़ुद सूचीबद्ध कर सुरक्षित रखता है। विकल्प (क) बहुत व्यापक है, क्योंकि हर वह अधिकार जो व्यक्ति को “मिलना चाहिए” वह मौलिक अधिकार नहीं होता। विकल्प (ख) साधारण कानूनी अधिकार का वर्णन है, जिसे विधायिका साधारण कानून से बदल सकती है, मौलिक अधिकार को नहीं, जिसे सिर्फ़ संशोधन से बदला जा सकता है। विकल्प (घ) ग़लत है क्योंकि मौलिक अधिकार असीमित नहीं हैं, सरकार इन पर औचित्यपूर्ण प्रतिबंध लगा सकती है।
3 कौन-सा मौलिक अधिकार, कैसे
प्र. निम्नलिखित स्थितियों को पढ़ें। प्रत्येक स्थिति के बारे में बताएँ कि किस मौलिक अधिकार का उपयोग या उल्लंघन हो रहा है और कैसे?
(क) राष्ट्रीय एयरलाइन के चालक-परिचालक दल के ऐसे पुरुषों को जिनका वजन ज़्यादा है, नौकरी में तरक्की दी गई लेकिन उनकी ऐसी महिला सहकर्मियों को, जिनका वजन बढ़ गया था, दंडित किया गया।
(ख) एक निर्देशक एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाता है जिसमें सरकारी नीतियों की आलोचना है।
(ग) एक बड़े बाँध के कारण विस्थापित हुए लोग अपने पुनर्वास की माँग करते हुए रैली निकालते हैं।
(घ) आंध्र-सोसायटी आंध्र प्रदेश के बाहर तेलुगु माध्यम के विद्यालय चलाती है।
उत्तर:
(क) यह समता के अधिकार का उल्लंघन है, विशेषतः लिंग के आधार पर भेदभाव के निषेध का। पुरुषों पर लागू नियम को महिलाओं पर सख़्ती से लागू करना ठीक वैसा ही भेदभाव है जिसे रोकने के लिए यह अधिकार बना है।
(ख) यह स्वतंत्रता के अधिकार का वैध प्रयोग है, विशेषतः भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का। डॉक्यूमेंट्री के ज़रिए सरकारी नीति की आलोचना अभिव्यक्ति का ही एक रूप है, जिसे संविधान लोक-व्यवस्था जैसी औचित्यपूर्ण सीमाओं के अलावा सुरक्षित रखता है।
(ग) यह स्वतंत्रता के अधिकार का वैध प्रयोग है, विशेषतः शांतिपूर्ण सभा की स्वतंत्रता का। पुनर्वास की माँग करती रैली शांतिपूर्ण विरोध है, जिसे संविधान तब तक सुरक्षित रखता है जब तक वह शांतिपूर्ण और बिना हथियार के हो।
(घ) यह सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार का वैध प्रयोग है। एक भाषाई समुदाय (आंध्र प्रदेश के बाहर तेलुगु-भाषी अल्पसंख्यक) को अपनी भाषा सुरक्षित रखने और उसे पढ़ाने के लिए अपने शिक्षण संस्थान खोलने का अधिकार है।
4 सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की सही व्याख्या
प्र. निम्नलिखित में कौन सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों की सही व्याख्या है?
(क) शैक्षिक-संस्था खोलने वाले अल्पसंख्यक वर्ग के ही बच्चे इस संस्थान में पढ़ाई कर सकते हैं।
(ख) सरकारी विद्यालयों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अल्पसंख्यक-वर्ग के बच्चों को उनकी संस्कृति और धर्म-विश्वासों से परिचित कराया जाए।
(ग) भाषाई और धार्मिक-अल्पसंख्यक अपने बच्चों के लिए विद्यालय खोल सकते हैं और उनके लिए इन विद्यालयों को आरक्षित कर सकते हैं।
(घ) भाषाई और धार्मिक-अल्पसंख्यक यह माँग कर सकते हैं कि उनके बच्चे उनके द्वारा संचालित शैक्षणिक-संस्थाओं के अतिरिक्त किसी अन्य संस्थान में नहीं पढ़ेंगे।
उत्तर: (ग)। सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा और संस्कृति सुरक्षित रखने के लिए अपने शिक्षण संस्थान खोलने की अनुमति देते हैं। विकल्प (क) ग़लत है क्योंकि अल्पसंख्यक-प्रबंधित संस्थान सिर्फ़ अपने समुदाय के बच्चों तक सीमित नहीं होता। विकल्प (ख) ग़लत है क्योंकि सरकारी संस्थाओं को धर्म के मामले में निष्पक्ष रहना होता है, वे किसी अल्पसंख्यक की मान्यताएँ सिखाने के लिए बाध्य नहीं हैं। विकल्प (घ) ग़लत है क्योंकि अल्पसंख्यकों को अपने स्कूल खोलने का अधिकार है, पर बच्चों को हर दूसरे संस्थान से बाहर रखने पर ज़ोर देने का अधिकार नहीं।
5 उल्लंघन और उसका कारण
प्र. इनमें कौन मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और क्यों?
(क) न्यूनतम देय मज़दूरी नहीं देना।
(ख) किसी पुस्तक पर प्रतिबंध लगाना।
(ग) 9 बजे रात के बाद लाऊड-स्पीकर बजाने पर रोक लगाना।
(घ) भाषण तैयार करना।
उत्तर:
(क) उल्लंघन है। न्यूनतम मज़दूरी से कम देना बेगार है, जो शोषण के विरुद्ध अधिकार का उल्लंघन करता है, ठीक वैसे जैसे इसी अध्याय में एशियाई खेलों के मज़दूरों के मामले में हुआ।
(ख) कारण पर निर्भर करता है। किसी पुस्तक पर प्रतिबंध लगाना स्वतंत्रता के अधिकार (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) का उल्लंघन है, जब तक वह लोक-व्यवस्था या नैतिकता जैसी औचित्यपूर्ण सीमा के तहत न हो; बिना कारण की मनमानी पाबंदी उल्लंघन होगी।
(ग) उल्लंघन नहीं है। यह भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लोक-व्यवस्था और रात में दूसरे नागरिकों की शांति के हित में लगी एक औचित्यपूर्ण पाबंदी है, जिसकी संविधान इजाज़त देता है।
(घ) उल्लंघन नहीं है। भाषण तैयार करना ख़ुद स्वतंत्रता के अधिकार (भाषण की स्वतंत्रता) का प्रयोग है, किसी के अधिकार का उल्लंघन नहीं, जब तक उसकी सामग्री हिंसा भड़काने जैसी किसी औचित्यपूर्ण सीमा को न तोड़े।
6 गरीबों को क्या चाहिए: मौलिक अधिकार या नीति-निर्देशक तत्व?
प्र. गरीबों के बीच काम कर रहे एक कार्यकर्त्ता का कहना है कि गरीबों को मौलिक अधिकारों की ज़रूरत नहीं है। उनके लिए ज़रूरी यह है कि नीति-निर्देशक सिद्धांतों को कानूनी तौर पर बाध्यकारी बना दिया जाए। क्या आप इससे सहमत हैं? अपने उत्तर का कारण बताएँ।
उत्तर: पूरी तरह नहीं। कार्यकर्त्ता की बात में दम है: काम के अधिकार जैसा नीति-निर्देशक तत्व अगर कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाया जाए तो किसी गरीब व्यक्ति की ज़िंदगी सीधे बदल जाएगी, जबकि किसी अमूर्त कानूनी गारंटी के लिए अदालत में मुकदमा लड़ना उसके लिए आसान नहीं। पर मौलिक अधिकार भी गरीबों के लिए बेकार नहीं हैं: इसी अध्याय के एशियाई खेलों के मज़दूरों के मामले में, शोषण के विरुद्ध उनके मौलिक अधिकार को अदालत में चुनौती दिए जाने पर उन्हें उनकी बकाया मज़दूरी मिल गई। कई नीति-निर्देशक तत्व, जैसे शिक्षा का अधिकार, पंचायती राज और मिड-डे मील योजना, वाद योग्य बनाए बिना ही साधारण कानून और राजनीतिक दबाव से लागू हो चुके हैं। एक संतुलित निष्कर्ष यह है कि गरीबों को दोनों चाहिए: मौलिक अधिकार जो सीधे शोषण से बचाते हैं, और नीति-निर्देशक तत्व जो सरकार को कल्याणकारी क़दमों की ओर धकेलते हैं।
7 झाड़ू लगाने के काम में मजबूर जातियाँ
प्र. अनेक रिपोर्टों से पता चलता है कि जो जातियाँ पहले झाड़ू देने के काम में लगी थीं उन्हें अब भी मज़बूरन यही काम करना पड़ रहा है। जो लोग अधिकार-पद पर बैठे हैं वे इन्हें कोई और काम नहीं देते। इनके बच्चों को पढ़ाई-लिखाई करने पर हतोत्साहित किया जाता है। इस उदाहरण में किस मौलिक-अधिकार का उल्लंघन हो रहा है?
उत्तर: इसमें एक से ज़्यादा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। पहला, समता का अधिकार टूटता है: सिर्फ़ जाति के आधार पर किसी को कोई और काम न देना ठीक वही जातिगत भेदभाव है जिसे यह अधिकार रोकता है, और यह छूआछूत के अंत से भी गहरा जुड़ा है। दूसरा, अगर उन्हें अपनी मर्ज़ी के विरुद्ध यह काम करने पर मजबूर किया जाता है, तो शोषण के विरुद्ध अधिकार का भी उल्लंघन होता है, क्योंकि जाति से जुड़ा जबरन या अपमानजनक काम भी एक तरह का शोषण है। तीसरा, बच्चों को पढ़ाई से हतोत्साहित करना शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन है, और साथ ही समता के अधिकार को भी कमज़ोर करता है, क्योंकि इससे अगली पीढ़ी भी उसी स्थिति में फँसी रह जाती है।
8 भूखमरी और भारतीय खाद्य निगम
प्र. एक मानवाधिकार-समूह ने अपनी याचिका में अदालत का ध्यान देश में मौजूद भूखमरी की स्थिति की तरफ खींचा। भारतीय खाद्य-निगम के गोदामों में 5 करोड़ टन से ज़्यादा अनाज भरा हुआ था। शोध से पता चलता है कि अधिकांश राशन-कार्डधारी यह नहीं जानते कि उचित-मूल्य की दुकानों से कितनी मात्रा में वे अनाज खरीद सकते हैं। मानवाधिकार समूह ने अपनी याचिका में अदालत से निवेदन किया कि वह सरकार को सार्वजनिक-वितरण-प्रणाली में सुधार करने का आदेश दे।
(क) इस मामले में कौन-कौन से अधिकार शामिल हैं? ये अधिकार आपस में किस तरह जुड़े हैं?
(ख) क्या ये अधिकार जीवन के अधिकार का एक अंग हैं?
उत्तर:
(क) इसमें संवैधानिक उपचारों का अधिकार (समूह का अदालत जाना), सूचना पाने का अधिकार (राशन-कार्डधारियों को अपने हक़ की मात्रा न पता होना), और भोजन का अधिकार (जो निहित रूप से इसमें शामिल है) जुड़े हैं। ये आपस में इस तरह जुड़े हैं कि सूचना का अधिकार बाक़ी अधिकारों को असल में इस्तेमाल करने योग्य बनाता है: जिस राशन-कार्डधारी को अपना हक़ ही पता नहीं, वह उसकी माँग नहीं कर सकता, इसलिए समुचित भोजन का अधिकार सिर्फ़ अनाज की कमी से नहीं, बल्कि सूचना और वितरण-व्यवस्था की कमी से भी छिन जाता है, और अदालत की शक्ति ही इन सबको जोड़कर एक उपचार दे सकती है।
(ख) हाँ। सर्वोच्च न्यायालय पहले ही अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार में आश्रय और आजीविका का अधिकार शामिल कर चुका है, इस तर्क पर कि आजीविका के साधनों के बिना कोई असल में जी नहीं सकता। समुचित भोजन तक पहुँच पर भी यही तर्क लागू होता है: बिना पर्याप्त भोजन के कोई व्यक्ति गरिमा के साथ, या बिल्कुल भी, नहीं जी सकता, इसलिए भूखमरी के विरुद्ध अधिकार जीवन के अधिकार का ही स्वाभाविक विस्तार है, जिसे अदालतें पहले ही मान चुकी हैं।
9 सोमनाथ लाहिड़ी का वक्तव्य
प्र. इस अध्याय में उद्धृत सोमनाथ लाहिड़ी द्वारा संविधान-सभा में दिए गए वक्तव्य को पढ़ें। क्या आप उनके कथन से सहमत हैं? यदि हाँ तो इसकी पुष्टि में कुछ उदाहरण दें। यदि नहीं तो उनके कथन के विरुद्ध तर्क प्रस्तुत करें।
उत्तर: एक संतुलित उत्तर न तो पूरी तरह सहमत होता है, न पूरी तरह असहमत। लाहिड़ी ने कहा था कि मौलिक अधिकार एक सिपाही के नज़रिए से बनाए गए हैं, बहुत कम अधिकार दिए गए हैं और लगभग हर अनुच्छेद के बाद एक ऐसा उपबंध है जो उस अधिकार को लगभग पूरी तरह वापस ले लेता है। इसमें सच्चाई है: भाषण की स्वतंत्रता पर लोक-व्यवस्था और नैतिकता के आधार पर पाबंदी है, सभा की स्वतंत्रता पर पाँच या ज़्यादा लोगों को ग़ैर-कानूनी घोषित करने की शक्ति है, और निवारक नज़रबंदी बिना मुकदमे के तीन महीने तक हिरासत की इजाज़त देती है, जिसका अध्याय ख़ुद कहता है कि सरकार ने अक्सर दुरुपयोग किया है। पर इसके उलट भी दलील है: बिना किसी पाबंदी वाला अधिकार एक व्यक्ति की स्वतंत्रता को हर किसी की स्वतंत्रता के लिए ख़तरा बना देगा, इसीलिए अध्याय स्वतंत्रता को दूसरों की स्वतंत्रता को नुकसान पहुँचाए बिना परिभाषित करता है। इसलिए सही निष्कर्ष यह है कि लाहिड़ी पाबंदियों के व्यापक होने के बारे में सही थे, पर यह कहना ग़लत होगा कि इससे अधिकार बेमानी हो गए: संवैधानिक उपचारों के अधिकार और 1950 से न्यायपालिका के फ़ैसलों ने बार-बार अधिकारों को बढ़ाया है, न कि पाबंदियों को उन्हें निगलने दिया है।
10 सबसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार
प्र. आपके अनुसार कौन-सा मौलिक अधिकार सबसे महत्वपूर्ण है? इसके प्रावधानों को संक्षेप में लिखें और तर्क देकर बताएँ कि यह क्यों महत्वपूर्ण है।
उत्तर: संवैधानिक उपचारों के अधिकार (अनुच्छेद 32) का दावा सबसे मज़बूत है, जिसे डॉ. अंबेडकर ने ख़ुद “संविधान का हृदय और आत्मा” कहा था। यह किसी भी नागरिक को अपने मौलिक अधिकार के उल्लंघन पर सीधे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जाने देता है, और अदालत बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेध आदेश, अधिकार पृच्छा और उत्प्रेषण, इन पाँच रिट में से कोई भी जारी कर सकती है। यह सबसे ज़रूरी इसलिए है क्योंकि हर दूसरे मौलिक अधिकार की असली ताक़त इसी पर निर्भर करती है: मचल लालुँग का 54 साल हिरासत में रहना दिखाता है कि बिना लागू करवाने के रास्ते के एक अधिकार का क्या हश्र होता है, जबकि एशियाई खेलों के मज़दूरों का मामला दिखाता है कि जब अधिकार लागू हो सके तो क्या होता है। बाक़ी हर मौलिक अधिकार एक ख़ास तरह के नुकसान से बचाता है, पर यह अधिकार बाक़ी सबको असली बनाने की क्षमता की रक्षा करता है, इसीलिए इसे खोना किसी और एक अधिकार को खोने से कहीं ज़्यादा नुकसानदायक होगा।
11 पाठ के बीच के प्रश्न
अध्याय के बीच में भी कई प्रश्न पूछे गए हैं: हाशिये की टिप्पणियों में, ‘कहाँ पहुँचे? क्या समझे?’ में, ‘आप एक न्यायाधीश हैं’ में, एक फोटो के नीचे, ‘खुद करें-खुद सीखें’ में और संपत्ति के अधिकार वाले बॉक्स में। इनके उत्तर नीचे उसी क्रम में दिए गए हैं जिस क्रम में ये पुस्तक में आते हैं, प्रश्न पुस्तक के अपने शब्दों में।
प्र. अगर लालुँग धनी और ताकतवर होता तब क्या होता? यदि निर्माण करने वाले ठेकेदार के साथ काम करने वाले लोग इंजीनियर होते तो क्या होता? क्या उनके साथ भी अधिकारों का इसी तरह से हनन होता?
उत्तर. शायद नहीं। धनी और ताकतवर व्यक्ति के पास वकील और प्रभाव होते; उसका मुकदमा अदालत में उठाया जाता और वह 54 साल तक हिरासत में भुला नहीं दिया जाता। इंजीनियर पढ़े-लिखे, संगठित और बेहतर वेतन वाले होते हैं, इसलिए ठेकेदार उन्हें आसानी से न्यूनतम मज़दूरी से कम नहीं दे पाता। दोनों उदाहरण दिखाते हैं कि अधिकारों का हनन सबसे ज़्यादा गरीब, अनपढ़ और कमज़ोर लोगों का होता है, जो अपने अधिकार नहीं जानते या अदालत तक नहीं पहुँच पाते। इसीलिए अध्याय अधिकारों को केवल सूचीबद्ध करने पर नहीं, उन्हें असल में लागू करने पर ज़ोर देता है।
प्र. मैं समझ गया! अधिकारों का घोषणापत्र उस ‘वारंटी कार्ड’ की तरह है जो हमें टी.वी. या पंखा खरीदने पर मिलता है। है न?
उत्तर. हाँ, एक हद तक। वारंटी कार्ड बताता है कि ख़रीदार को क्या मिलना चाहिए, और वादा टूटने पर उपचार माँगने का आधार देता है। अधिकारों का घोषणापत्र भी संविधान द्वारा दिए गए अधिकार गिनाता है, सरकार को उनके विरुद्ध काम करने से रोकता है और उल्लंघन होने पर उपचार सुनिश्चित करता है। फ़र्क़ यह है कि घोषणापत्र किसी विक्रेता का निजी वादा नहीं, बल्कि सर्वोच्च कानून है, जो सरकार के हर अंग पर लागू होता है और जिसे अदालतें लागू करवाती हैं।
प्र. भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों की तुलना दक्षिण अफ्रीका के संविधान में दिये गये अधिकारों के घोषणापत्र से करें। उन अधिकारों की एक सूची बनायें जो (i) दोनों संविधानों में पाये जाते हों; (ii) दक्षिण अफ्रीका में हों पर भारत में नहीं; (iii) दक्षिण अफ्रीका के संविधान में स्पष्ट रूप से दिये गये हों पर भारतीय संविधान में निहित माने जाते हैं।
उत्तर.
(i) दोनों में: समानता और भेदभाव से सुरक्षा; धर्म, आस्था और अंतरात्मा की स्वतंत्रता; सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई समुदायों के अधिकार; बच्चों के अधिकार (भारत में ख़तरनाक कामों में बाल-मज़दूरी पर रोक और शिक्षा का अधिकार); बुनियादी शिक्षा का अधिकार; और अधिकारों को लागू करवाने वाली अदालत।
(ii) दक्षिण अफ्रीका में हैं पर भारत में मौलिक अधिकार के रूप में नहीं: समुचित आवास का अधिकार; स्वास्थ्य सेवा, भोजन, पानी और सामाजिक सुरक्षा का अधिकार; श्रम-संबंधी उचित व्यवहार का अधिकार; स्वस्थ पर्यावरण और उसके संरक्षण का अधिकार; उच्च शिक्षा का अधिकार। (इनमें से कुछ भारत में केवल नीति-निर्देशक तत्वों में हैं।)
(iii) दक्षिण अफ्रीका में स्पष्ट, भारत में निहित: गरिमा का अधिकार और निजता का अधिकार, जिन्हें भारतीय अदालतों ने जीवन और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार में शामिल माना है, और सूचना का अधिकार, जो भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से निकलता है।
प्र. निम्न दो स्थितियों पर विचार करें (स्वदेश कुमार के दलित मित्र को कुल्हड़ में चाय देना; समाचार पढ़ने वाले दस सदस्यों में से केवल चार महिलाओं को 45 वर्ष की उम्र पार करने पर समाचार पढ़ने से रोकना, जबकि उसी उम्र के दो पुरुषों पर यह प्रतिबंध नहीं)। क्या आपको उनमें मौलिक अधिकारों का उल्लंघन दिखाई देता है? आपकी राय में क्या ऐसा भेदभाव उचित है?
उत्तर. हाँ, दोनों में समता के अधिकार का उल्लंघन है, और ऐसा भेदभाव बिल्कुल उचित नहीं है। पहली स्थिति में होटल जैसे सार्वजनिक स्थान पर जाति के आधार पर भेदभाव है; संविधान ऐसे भेदभाव को वर्जित करता है और छुआछूत को समाप्त करता है। दूसरी स्थिति में रोज़गार में लिंग के आधार पर भेदभाव है: उम्र का एक ही नियम महिलाओं पर लगाया गया, पुरुषों पर नहीं। ऐसा भेदभाव समान प्रतिष्ठा और सम्मान से इनकार है, जिसे सुनिश्चित करने के लिए ही समता का अधिकार है।
प्र. क्या ऐसी बातें हमारे देश में होती हैं? या ये सब केवल काल्पनिक हैं?
उत्तर. ऐसी बातें सचमुच होती हैं। पुस्तक ख़ुद कहती है कि ये स्थितियाँ काल्पनिक हैं “पर ऐसी बातें होती रहती हैं और आगे भी हो सकती हैं”। खाना-पानी देने में जाति के आधार पर भेदभाव, अलग बर्तन, मंदिरों और कुओं में प्रवेश से रोकना देश के कुछ हिस्सों में आज भी सामने आता है, और महिलाओं को काम की जगह पर आज भी असमान बर्ताव झेलना पड़ता है। इसीलिए समता का अधिकार भेदभाव को वर्जित करता है और छुआछूत को समाप्त करता है, और इसे लागू करना इतना ज़रूरी है।
प्र. क्या आपने अपने संविधान की प्रस्तावना पढ़ी है? यह समानता को कैसे परिभाषित करती है?
उत्तर. हाँ। प्रस्तावना में समानता के बारे में दो बातों का उल्लेख है: प्रतिष्ठा की समानता और अवसर की समानता। अवसर की समानता का अर्थ है कि समाज के सभी वर्गों को समान अवसर मिलें; और क्योंकि भारतीय समाज में अनेक सामाजिक विषमताएँ हैं, संविधान सरकार को बच्चों, महिलाओं तथा सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की बेहतरी के लिए विशेष योजनाएँ व निर्णय लागू करने की छूट भी देता है। अनुच्छेद 16 (4) साफ़ कहता है कि आरक्षण जैसी नीति समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं है, क्योंकि अवसर की समानता को पूरा करने के लिए यह ज़रूरी है।
प्र. आपको ओडिशा के पुरी जिले के ‘दलित समुदाय के एक सदस्य’ हादिबंधु से एक पोस्टकार्ड मिलता है। उसके समुदाय के पुरुषों ने उच्च जातियों के विवाहोत्सव में दूल्हे और मेहमानों के पैर धोने की प्रथा का पालन करने से इंकार कर दिया; इसके बदले उस समुदाय की चार महिलाओं को पीटा गया और उन्हें निर्वस्त्र करके घुमाया गया। यह मानते हुए कि तथ्य सही हैं, आपको निर्णय करना है कि क्या इस घटना में मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है? आप इसमें सरकार को क्या करने का आदेश देंगे?
उत्तर. हाँ, उल्लंघन हुआ है। दलितों को अपमानजनक परंपरागत सेवा के लिए मजबूर करना छुआछूत का ही रूप है, जिसे समता का अधिकार समाप्त करता है, और यह जाति के आधार पर भेदभाव भी है। हिंसक बदला जीवन और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का, जिसमें गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल है, उल्लंघन है, और लोगों से उनकी मर्ज़ी के विरुद्ध ऐसा काम करवाना शोषण भी है। न्यायाधीश के रूप में मैं सरकार को आदेश दूँगा कि महिलाओं पर हमला करने वालों पर मुकदमा दर्ज कर उन्हें दंड दिलाए, पीड़ितों को सुरक्षा, इलाज और मुआवज़ा दे, यह सुनिश्चित करे कि उस क्षेत्र में किसी से ऐसा परंपरागत काम ज़बरदस्ती न करवाया जाए, और की गई कार्रवाई की रिपोर्ट अदालत को दे।
प्र. क्या इसका मतलब यह है कि कुछ ऐसे मामले भी हो सकते हैं जिनमें कानून एक आदमी की ज़िंदगी ले सकता है? यह तो अजीब बात है। क्या आपको कोई ऐसा मामला याद आता है?
उत्तर. हाँ। अनुच्छेद 21 कहता है कि किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही” वंचित किया जा सकता है। यानी कानून ख़ुद एक प्रक्रिया तय कर सकता है जिसके तहत जीवन लिया जा सकता है। सबसे साफ़ उदाहरण मृत्युदंड है: हत्या जैसे गंभीर अपराध में दोषी पाए गए व्यक्ति को पूरी और निष्पक्ष सुनवाई तथा सभी अपीलें पूरी होने के बाद अदालत मृत्युदंड दे सकती है। संविधान जिस बात को वर्जित करता है, वह है ऐसी प्रक्रिया के बिना मनमाने ढंग से जीवन लेना।
प्र. क्या आप मानते हैं कि निम्न परिस्थितियाँ स्वतंत्रता के अधिकार पर प्रतिबंधों की माँग करती हैं? अपने उत्तर के समर्थन में तर्क दें।
(क) शहर में सांप्रदायिक दंगों के बाद लोग शांति मार्च के लिए एकत्र हुए हैं।
(ख) दलितों को मंदिर में प्रवेश की मनाही है। मंदिर में जबर्दस्ती प्रवेश के लिए एक जलूस का आयोजन किया जा रहा है।
(ग) सैकड़ों आदिवासियों ने सड़क जाम कर दिया है। वे माँग कर रहे हैं कि कोई कारखाना बनाने के लिए ली गई उनकी जमीन वापस की जाए।
(घ) किसी जाति की पंचायत की बैठक यह तय करने के लिए बुलाई गई कि जाति से बाहर विवाह करने के लिए एक नवदंपत्ति को क्या दंड दिया जाए।
उत्तर.
(क) नहीं। शांति मार्च बिना हथियार का शांतिपूर्ण जमावड़ा है, जो स्वतंत्रता के अधिकार से सुरक्षित है। यह सद्भाव लौटाने में मदद करता है, इसलिए इसकी अनुमति होनी चाहिए; हाँ, लोक-व्यवस्था के लिए पुलिस इसका रास्ता और समय तय कर सकती है।
(ख) दलितों की माँग न्यायपूर्ण है, क्योंकि मंदिर में प्रवेश से रोकना छुआछूत है, जो समाप्त की जा चुकी है। पर ‘जबर्दस्ती’ प्रवेश के लिए जलूस से हिंसा हो सकती है, इसलिए लोक-व्यवस्था के हित में जलूस के तरीक़े पर उचित प्रतिबंध लग सकते हैं, और सरकार को ख़ुद यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दलितों को प्रवेश मिले।
(ग) आंशिक रूप से। आदिवासियों को अपनी ज़मीन के लिए जमा होने और विरोध करने का अधिकार है। पर लंबे समय तक सड़क जाम करने से दूसरों की आने-जाने की स्वतंत्रता प्रभावित होती है, इसलिए जाम पर उचित प्रतिबंध लग सकता है, और सरकार को उनकी माँग सुननी चाहिए।
(घ) हाँ, यहाँ प्रतिबंध ज़रूरी है। जाति पंचायत को किसी को दंड देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है, और जाति से बाहर विवाह करने पर दंड देना दंपत्ति के जीवन और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। बैठक रोकी जानी चाहिए और दंपत्ति को सुरक्षा मिलनी चाहिए।
प्र. इस फोटो में आप को किस मौलिक अधिकार का उल्लंघन दिखाई देता है?
उत्तर. फोटो में एक छोटा बच्चा स्कूल में होने की बजाय काम कर रहा है। इसमें शोषण के विरुद्ध अधिकार का उल्लंघन दिखता है, जो 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को ख़तरनाक कामों में लगाने और बंधुआ मज़दूरी पर रोक लगाता है, और शिक्षा के अधिकार का भी, जो बच्चों का मौलिक अधिकार है। साथ ही यह बच्चे के गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार से भी इनकार है।
प्र. अपने गाँव या शहर में होने वाली सार्वजनिक धार्मिक गतिविधियों की सूची बनाएँ। इनमें से कौन-कौन-सी गतिविधियाँ धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का प्रयोग दिखलाती हैं? इस पर चर्चा करें कि यदि आपके क्षेत्र में लोगों को यह अधिकार नहीं होता, तो क्या होता?
उत्तर. सूची आपके क्षेत्र पर निर्भर करेगी। एक नमूना सूची: त्योहारों के जुलूस, मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे में प्रार्थना, धार्मिक मेले, सामूहिक भंडारे या लंगर, प्रवचन और कीर्तन, और धार्मिक पाठशालाएँ। ये सब धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का प्रयोग हैं: अपने धर्म को मानने, उसका पालन और प्रचार करने तथा धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता, जो लोक-व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य की सीमा में है। अगर यह अधिकार न होता, तो सरकार या कोई प्रभावशाली समूह कुछ समुदायों की पूजा या त्योहारों पर रोक लगा सकता था, लोगों को एक राजकीय धर्म मानने पर मजबूर कर सकता था या दूसरे धर्म मानने वालों को सता सकता था, जैसा पहले के शासक करते थे। अल्पसंख्यक असुरक्षित महसूस करते, और क्षेत्र की शांति और धर्मनिरपेक्षता को नुकसान पहुँचता।
प्र. मैं अपने मुहल्ले में तो अल्पसंख्यक हूँ पर शहर में बहुसंख्यक। भाषा के हिसाब से तो अल्पसंख्यक हूँ लेकिन धर्म के लिहाज से मैं बहुसंख्यक हूँ। क्या हम सभी अल्पसंख्यक नहीं हैं?
उत्तर. एक तरह से, हाँ। अल्पसंख्यक होना स्थायी नहीं है: यह इस पर निर्भर करता है कि हम किस क्षेत्र (मुहल्ला, राज्य या पूरा देश) की बात कर रहे हैं और किस आधार (धर्म या भाषा) पर देख रहे हैं। अध्याय के अनुसार अल्पसंख्यक वे समूह हैं जिनकी साझी भाषा या धर्म है और जो देश के किसी हिस्से में या पूरे देश में किसी दूसरे समूह से संख्या में कम हैं। चूँकि लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी आधार पर कहीं न कहीं संख्या में कम है, इसलिए अल्पसंख्यकों के अपनी भाषा, संस्कृति और लिपि को बचाने और अपने शिक्षण संस्थान चलाने के अधिकार असल में लगभग सभी की रक्षा करते हैं। इसी कारण संविधान विविधता को हमारी मज़बूती मानता है।
प्र. ऐसा अनुमान है कि भारत में लगभग 30 लाख लोग शहरों में बेघर हैं। इनमें से पाँच प्रतिशत लोगों के लिए रात में सोने की जगह भी नहीं है। इनमें सैकड़ों बूढ़े और बीमार बेघर लोगों की जाड़े में शीतलहर से मृत्यु हो जाती है। ‘निवास का प्रमाण’ न दे पाने के कारण उन्हें राशन कार्ड या मतदाता पहचान पत्र नहीं मिल पाते, और ज़रूरतमंद मरीजों के रूप में सरकारी मदद भी नहीं मिल पाती। इनमें बड़ी संख्या में दिहाड़ी मज़दूर हैं जिन्हें बहुत कम मज़दूरी मिलती है। आप इन तथ्यों के आधार पर ‘संवैधानिक उपचारों के अधिकार’ के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को एक याचिका भेजें, जिसमें यह उल्लेख हो: (क) इन बेघर लोगों के कौन-से मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो रहा है? (ख) आप सर्वोच्च न्यायालय से किस प्रकार का आदेश देने की प्रार्थना करेंगे?
उत्तर.
(क) जीवन और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार गरिमा के साथ जीने और आश्रय तथा आजीविका का अधिकार शामिल है; आश्रय के अभाव में ठंड से मरते लोग इसी अधिकार से वंचित हैं। समता का अधिकार भी, क्योंकि ‘निवास का प्रमाण’ न होने से उन्हें राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और चिकित्सा सहायता पाने में असमान बर्ताव झेलना पड़ता है और वे मतदान से भी वंचित रह जाते हैं। कम मज़दूरी पाने वाले दिहाड़ी मज़दूर होने से वे शोषण के शिकार भी हो सकते हैं।
(ख) याचिका में सर्वोच्च न्यायालय से प्रार्थना होगी कि वह सरकार को आदेश दे: हर शहर में, ख़ासकर सर्दियों के लिए, बुनियादी सुविधाओं वाले पर्याप्त रैन-बसेरे बनाए; स्थायी पते की शर्त के बिना बेघरों को राशन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र दे; बेघर मरीज़ों का मुफ़्त इलाज करे; उन्हें कम से कम न्यूनतम मज़दूरी मिलना सुनिश्चित करे; और उठाए गए क़दमों की नियमित रिपोर्ट अदालत को दे।
प्र. मुझे बताओ कि संविधान में अच्छी-अच्छी बातें कहने का क्या मतलब यदि उसे किसी न्यायालय में लागू ही नहीं किया जा सकता?
उत्तर. नीति-निर्देशक तत्व अदालत से लागू नहीं करवाए जा सकते, पर वे बेमतलब नहीं हैं। संविधान निर्माताओं का मानना था कि इनके पीछे की नैतिक शक्ति सरकार को इन्हें गंभीरता से लेने के लिए बाध्य करेगी, और जनता भी सरकारों को इन्हें लागू करने के लिए उत्तरदायी ठहराएगी। ऐसा हुआ भी: सरकारों ने इन्हें लागू करने के लिए ज़मींदारी उन्मूलन कानून बनाए, बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, न्यूनतम मज़दूरी तय की, और शिक्षा का अधिकार, पंचायती राज, रोज़गार गारंटी कार्यक्रम और दोपहर के भोजन की योजना जैसे क़दम उठाए। ये ऐसे लक्ष्य भी तय करते हैं जिनकी कसौटी पर हर सरकार को परखा जा सकता है।
प्र. आपकी राय में ‘संपत्ति के अधिकार’ को मौलिक अधिकार से कानूनी अधिकार बनाने से क्या फर्क पड़ता है?
उत्तर. मौलिक अधिकार के रूप में संपत्ति के अधिकार की रक्षा ख़ुद संविधान करता था: इसे केवल संविधान संशोधन से बदला जा सकता था, और इसके उल्लंघन पर व्यक्ति संवैधानिक उपचारों के अधिकार के तहत सीधे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जा सकता था। अनुच्छेद 300 (क) के तहत कानूनी अधिकार बनने के बाद इसकी रक्षा केवल साधारण कानून से होती है: किसी को कानून के अधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता, पर संसद या राज्य की विधायिका साधारण कानून से इसे नियंत्रित या सीमित कर सकती है, और इसके उल्लंघन पर व्यक्ति संवैधानिक उपचारों के अधिकार के तहत सीधे सर्वोच्च न्यायालय नहीं जा सकता; उपचार अब सामान्य कानूनी प्रक्रिया से मिलता है, जैसे दीवानी मुकदमा या उच्च न्यायालय में याचिका। इस बदलाव से सरकार के लिए जन-कल्याण के लिए ज़मीन लेना और भूमि-सुधार जैसे क़दम उठाना आसान हो गया।
प्र. दक्षिण अफ्रीका के संविधान में अधिकारों के घोषणापत्र और भारतीय संविधान में दिए नीति-निर्देशक तत्वों को पढ़ें। दोनों सूचियों में आपको कौन-सी बातें एक समान लगती हैं? दक्षिण अफ्रीका के संविधान ने इन्हें अधिकारों के घोषणापत्र में क्यों रखा? यदि आपको एक नए राष्ट्र के लिए संविधान बनाना हो, तो उसके लिए आप क्या सुझाएँगे?
उत्तर. समान बातें: समुचित जीविका और सामाजिक सुरक्षा, श्रम-संबंधी उचित व्यवहार (भारत में स्त्री-पुरुष को समान काम की समान मज़दूरी और आर्थिक शोषण के विरुद्ध अधिकार), काम का अधिकार, प्रारंभिक बाल्यावस्था की देख-रेख और शिक्षा, स्वास्थ्य, और पर्यावरण की सुरक्षा। दक्षिण अफ्रीका ने इन्हें घोषणापत्र में इसलिए रखा क्योंकि उसका नया संविधान रंगभेद के बाद बना, जब अश्वेत बहुसंख्यकों को लंबे समय तक आवास, भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा से वंचित रखा गया था; इन गहरी असमानताओं को मिटाने के लिए निर्माता चाहते थे कि ये अधिकार केवल लक्ष्य न रहें, बल्कि एक विशेष संवैधानिक न्यायालय इन्हें लागू करवा सके। नए राष्ट्र के लिए मेरा सुझाव होगा कि भोजन, बुनियादी शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य और आश्रय जैसी सबसे बुनियादी ज़रूरतों को लागू करवाने योग्य अधिकारों में रखा जाए, और बाक़ी कल्याणकारी लक्ष्यों को नीति-निर्देशक तत्वों में, ताकि लोगों को न्यूनतम गारंटी मिले और सरकार के पास योजना बनाने का लचीलापन भी बना रहे।