कक्षा 11 राजनीति विज्ञान अध्याय 1 संविधान, क्यों और कैसे के नोट्स (Constitution Notes) हिंदी में

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अध्याय का नक्शा : पूरा चैप्टर एक नज़र में
1 · हमें संविधान की क्या आवश्यकता है?पाँच काम: तालमेल, निर्णय-शक्ति, सीमाएँ, आकांक्षाएँ और पहचान
2 · संविधान की सत्ताकब कोई संविधान सचमुच असरदार बनता है, तीन कारक
संविधान
3 · भारतीय संविधान कैसे बना?संविधान सभा, कैबिनेट मिशन, विचार-विमर्श और उद्देश्य-प्रस्ताव
4 · उधार लिए गए प्रावधान, फिर भी अपनी सोचदूसरे देशों से क्या लिया, और भारत ने उसे अपना क्यों बनाया
5 · निष्कर्षक्यों यह संविधान काग़ज़ पर नहीं रहा, जीवंत हक़ीक़त बना
संविधानसंविधान सभाकैबिनेट मिशनउद्देश्य-प्रस्तावसार्वजनिक विवेकमौलिक अधिकारनीति-निर्देशक तत्वजीवंत दस्तावेज़सार्वभौम वयस्क मताधिकार

1 हमें संविधान की क्या आवश्यकता है?

संविधान क्या है? यह समाज के लिए क्या करता है? रोज़मर्रा की ज़िंदगी से इसका क्या रिश्ता है? इन सवालों का जवाब उतना मुश्किल नहीं जितना लगता है। पुस्तक इसे एक विचार-प्रयोग से समझाती है।

सोचकर देखिए

ख़ुद को एक बड़े समूह का सदस्य मान लीजिए। इस समूह में कोई हिंदू है, कोई मुसलमान, कोई ईसाई, और कोई किसी धर्म को नहीं मानता। किसी का पेशा अलग है, किसी की योग्यता, किसी का शौक़। कोई अमीर है कोई ग़रीब, कोई बूढ़ा कोई जवान। इतने अलग-अलग लोगों के बीच विवाद तय हैं: संपत्ति कितनी रखी जाए, स्कूल भेजना ज़रूरी हो या माँ-बाप पर छोड़ दिया जाए, सुरक्षा पर कितना ख़र्च हो या पार्क पर। फिर भी इस समूह को साथ रहना है, एक-दूसरे पर निर्भर रहना है। ऐसे में यह समूह शांति से कैसे रह पाएगा?

1.1 संविधान का पहला काम : तालमेल और भरोसा

  • अगर समूह के सदस्य कुछ बुनियादी नियमों पर सहमत हो जाएँ, तो साथ रहना मुमकिन है
  • बिना नियमों के हर व्यक्ति असुरक्षित रहेगा, क्योंकि उसे पता ही नहीं होगा कि दूसरे उसके साथ क्या कर सकते हैं
  • नियम सार्वजनिक रूप से घोषित होने चाहिए और सबको मालूम होने चाहिए, तभी न्यूनतम तालमेल बन पाता है
  • पर सिर्फ़ जान लेना काफ़ी नहीं, नियम लागू करने योग्य (enforceable) भी होने चाहिए
  • अगर नागरिकों को यह भरोसा न हो कि बाक़ी लोग भी नियम मानेंगे, तो उनके पास ख़ुद नियम मानने की कोई वजह नहीं बचती
  • कानूनी रूप से लागू होने का मतलब है कि हर किसी को यह यक़ीन मिलता है: नियम न मानने पर सज़ा होगी
रट लेंपरिभाषा 1

संविधान (Constitution) बुनियादी नियमों का वह समूह है जिसके अनुसार किसी राज्य का गठन और शासन होता है। इसका पहला काम समाज के सदस्यों के बीच न्यूनतम तालमेल के लिए बुनियादी नियमों का ऐसा समूह देना है, जो सार्वजनिक रूप से घोषित हो और लागू करने योग्य भी हो।

1.2 दूसरा काम : निर्णय-निर्माण शक्ति की विशिष्टताएँ

बुनियादी नियम क्या हों, यह तय करने से पहले एक और सवाल उठता है : यह तय कौन करेगा?

  • राजतंत्र में राजा तय करता है, पुराने सोवियत संघ जैसे संविधानों में एक ही दल के पास यह शक्ति थी
  • लोकतांत्रिक संविधानों में मोटे तौर पर जनता तय करती है
  • पर यह भी आसान नहीं : क्या हर मामले पर सीधा मतदान हो, जैसे प्राचीन यूनान में होता था? या जनता अपने प्रतिनिधि चुने?
  • अगर प्रतिनिधि चुनने हों, तो वे कैसे चुने जाएँ और कितने हों?
  • भारत के संविधान में साफ़ लिखा है कि ज़्यादातर मामलों में संसद कानून और नीतियाँ तय करती है, और यह भी लिखा है कि संसद ख़ुद किस तरह संगठित होगी
परीक्षा संकेत

यह वह जगह है जहाँ छात्र अक्सर सीधे “जनता तय करती है” लिखकर रुक जाते हैं। पूरे अंक तभी मिलते हैं जब आप बताएँ कि तय करने की प्रक्रिया ख़ुद संविधान में लिखी होती है, यानी संसद के अस्तित्व में आने से पहले ही उसे यह अधिकार देने वाला एक कानून होना चाहिए, और वह कानून ही संविधान है।

रट लेंपरिभाषा 2

संविधान का दूसरा काम यह तय करना है कि समाज में निर्णय लेने की शक्ति किसके पास होगी, और सरकार कैसे बनेगी। यह वह सत्ता है जो सबसे पहले सरकार का ही गठन करती है।

1.3 तीसरा काम : सरकार की शक्तियों पर सीमाएँ

तय हो गया कि कौन निर्णय लेगा, पर यह काफ़ी नहीं। मान लीजिए वही सत्ता ऐसे कानून बना दे जो साफ़ अन्यायपूर्ण हों।

  • जैसे कोई धर्म पालन करने से रोक दे, या किसी ख़ास रंग के कपड़े पहनने पर पाबंदी लगा दे
  • या किसी समूह (जाति, धर्म) को हमेशा दूसरों की सेवा करने पर मजबूर करे और संपत्ति रखने का हक़ न दे
  • या सरकार मनमाने ढंग से किसी को गिरफ़्तार कर ले, या त्वचा के रंग के आधार पर कुएँ से पानी लेने से रोक दे
  • ऐसे कानून भले ही सही प्रक्रिया से पास हों, फिर भी अन्यायपूर्ण होंगे
रट लेंपरिभाषा 3

संविधान का तीसरा काम सरकार पर कुछ सीमाएँ लगाना है, जिन्हें सरकार कभी लाँघ नहीं सकती। सबसे आम तरीक़ा है मौलिक अधिकारों की सूची देना, जो हर नागरिक को मिलते हैं और जिनका उल्लंघन कोई सरकार नहीं कर सकती।

  • नागरिकों को मनमानी गिरफ़्तारी से बचाव मिलता है
  • भाषण, अंतःकरण, संगठन और व्यापार करने की स्वतंत्रता जैसी बुनियादी आज़ादियाँ मिलती हैं
  • पर व्यवहार में राष्ट्रीय आपात्काल के समय ये अधिकार सीमित किए जा सकते हैं, और किन हालात में यह होगा, यह भी संविधान ही तय करता है

1.4 चौथा काम : समाज की आकांक्षाएँ और लक्ष्य

  • ज़्यादातर पुराने संविधान सिर्फ़ शक्ति बाँटने और सरकार पर सीमा लगाने तक सीमित थे
  • बीसवीं सदी के कई संविधान, और भारतीय संविधान इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, सरकार को कुछ सकारात्मक काम करने की क्षमता भी देते हैं
  • गहरी असमानता वाले समाजों को केवल सीमा नहीं, सरकार को सक्षम और सशक्त भी बनाना पड़ता है, ताकि वह असमानता दूर कर सके
दो उदाहरण

भारत जाति-भेद से मुक्त समाज चाहता है, इसलिए सरकार को इसके लिए ज़रूरी क़दम उठाने की ताक़त मिली है। दक्षिण अफ़्रीका में नस्ली भेदभाव का लंबा इतिहास था, इसलिए वहाँ का नया संविधान सरकार को नस्ली भेदभाव ख़त्म करने में सक्षम बनाता है।

  • संविधान निर्माताओं का विचार था कि हर व्यक्ति को न्यूनतम गरिमा और आत्म-सम्मान के लिए ज़रूरी चीज़ें मिलनी चाहिए, यानी कम से कम भौतिक सुख और शिक्षा
  • इस विचार का समर्थन संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकार और राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों से मिलता है

दक्षिण अफ़्रीका का संविधान

  • पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा
  • अनुचित भेदभाव से सुरक्षा
  • सभी को आवास और स्वास्थ्य सेवा

इंडोनेशिया का संविधान

  • राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था स्थापित करना
  • ग़रीब और अनाथ बच्चों की देखभाल
  • सरकार पर यह ज़िम्मेदारी संविधान ही डालता है

1.5 पाँचवाँ काम : राष्ट्र की बुनियादी पहचान

  • शायद सबसे अहम काम : संविधान किसी जनसमूह की बुनियादी पहचान को अभिव्यक्त करता है
  • लोग एक सामूहिक इकाई के रूप में तभी बनते हैं जब वे शासन के कुछ बुनियादी नियमों पर सहमत होते हैं, यानी राजनीतिक पहचान संविधान से बनती है
  • संविधान यह भी तय करता है कि व्यक्ति क्या कर सकता है और क्या नहीं, यानी यह एक नैतिक पहचान भी देता है
  • दुनिया भर के संविधान कई बुनियादी राजनीतिक और नैतिक मूल्य साझा भी करते हैं
दो देशों का फ़र्क़

जर्मनी की राष्ट्रीय पहचान ‘जर्मन नस्ल’ के आधार पर बनी थी, और संविधान ने इस पहचान को अभिव्यक्ति दी। भारतीय संविधान इसके ठीक उलट है, यह नस्ल या जातीयता को नागरिकता का आधार नहीं मानता। यह फ़र्क़ परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है, इसे इसी तरह याद रखें: जर्मनी नस्ल पर, भारत नस्ल के बिना।

केंद्र सरकार और देश के विभिन्न क्षेत्रों के बीच का संबंध भी उस देश की राष्ट्रीय पहचान बनाता है।

संविधान के पाँच काम
1 · तालमेलबुनियादी नियम, सबको ज्ञात, लागू करने योग्य
2 · निर्णय-शक्तितय कौन करेगा, सरकार कैसे बनेगी
3 · सीमाएँमौलिक अधिकारों से सरकार पर लगाम
4 · आकांक्षाएँसरकार को सकारात्मक काम की क्षमता
5 · पहचानराजनीतिक और नैतिक पहचान दोनों

2 संविधान की सत्ता

ऊपर संविधान के काम गिनाए गए। पर तीन और सवाल बनते हैं : संविधान क्या है? यह कितना प्रभावी है? क्या यह न्यायपूर्ण है?

  • ज़्यादातर देशों में ‘संविधान’ एक ही संहिताबद्ध दस्तावेज़ है, जिसमें राज्य की बनावट और नियमों के बारे में अनुच्छेद होते हैं
  • ब्रिटेन इसका अपवाद है : वहाँ कोई एक दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि कई दस्तावेज़ों और निर्णयों की एक शृंखला को मिलाकर संविधान कहा जाता है
  • पर कई देशों का संविधान केवल काग़ज़ पर रह जाता है, असली सवाल यह है : संविधान कितना प्रभावी है?

पुस्तक तीन कारक बताती है जो एक संविधान को असरदार और सम्मान के योग्य बनाते हैं।

2.1 कारक 1 : संविधान को प्रचलन में लाने का तरीक़ा

  • यानी संविधान किसने बनाया और उनके पास कितनी सत्ता थी
  • सैनिक नेताओं या अलोकप्रिय नेताओं के बनाए संविधान अक्सर निष्क्रिय रह जाते हैं
  • सबसे सफल संविधान, जैसे भारत, दक्षिण अफ़्रीका और अमेरिका के, जन-आंदोलनों के बाद बने
  • भारत का संविधान औपचारिक रूप से दिसंबर 1946 से नवंबर 1949 के बीच बना, पर इसकी जड़ें लंबे राष्ट्रीय आंदोलन में थीं
  • वैधता इससे मिली कि निर्माता जन-विश्वास वाले लोग थे, जिनमें बातचीत करने और समाज के बड़े हिस्से का सम्मान पाने की क्षमता थी
  • उन्होंने जनता को यह भी यक़ीन दिलाया कि संविधान उनकी निजी सत्ता बढ़ाने का औज़ार नहीं है
  • कुछ देशों ने अपने संविधान पर पूरा जनमत संग्रह (referendum) कराया, जिसमें सारी जनता मतदान करती है
  • भारत का संविधान कभी जनमत संग्रह से नहीं गुज़रा, फिर भी उसे भारी जन-सत्ता मिली, क्योंकि लोगों ने उसके प्रावधानों पर अमल करके उसे अपना लिया
रट लेंपरिभाषा 4

जनमत संग्रह (Referendum) वह प्रक्रिया है जिसमें किसी संविधान या कानून की वांछनीयता पर देश की पूरी जनता सीधे मतदान करती है।

नेपाल के संविधान-निर्माण का विवाद

1948 से नेपाल में पाँच संविधान बन चुके हैं: 1948, 1951, 1959, 1962 और 1990। पर ये सभी नेपाल-नरेश द्वारा ‘प्रदान’ किए गए थे। 1990 के संविधान से बहु-दलीय लोकतंत्र शुरू हुआ, पर राजा के पास अंतिम शक्तियाँ बनी रहीं। राजा ने अक्तूबर 2002 में समस्त शक्तियाँ अपने हाथ में ले लीं, जिसके बाद जन-आंदोलन तेज़ हुआ। नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) जनता द्वारा चुनी गई संविधान सभा के संघर्ष में सबसे आगे थी। 2008 में नेपाल ने राजतंत्र ख़त्म कर दिया और लोकतांत्रिक गणराज्य बना, और 2015 में नया संविधान अपनाया।

2.2 कारक 2 : संविधान के मौलिक प्रावधान

  • एक सफल संविधान की पहचान यह है कि वह समाज के हर व्यक्ति को उसे मानने का कोई न कोई कारण देता है
  • जो संविधान स्थायी बहुमत को अल्पसंख्यक समूहों के उत्पीड़न की छूट दे, वह अल्पसंख्यकों को उसे मानने का कोई कारण नहीं देगा
  • जो संविधान कुछ लोगों को सुनियोजित ढंग से ज़्यादा सुविधा दे, या छोटे समूहों की शक्ति मज़बूत करे, वह अपनी जनता की निष्ठा खो देता है
  • अगर कोई समूह महसूस करे कि उसकी ‘पहचान’ दबाई जा रही है, तो उसके पास संविधान मानने का कोई कारण नहीं बचता
  • कोई भी संविधान अपने आप पूर्ण न्याय स्थापित नहीं करता, पर उसे लोगों को यह यक़ीन दिलाना पड़ता है कि वह न्याय पाने का ढाँचा देता है
  • संविधान जितना ज़्यादा हर सदस्य की स्वतंत्रता और समानता की रक्षा करे, उतना ही सफल होने की संभावना ज़्यादा

2.3 कारक 3 : संस्थाओं की संतुलित रूपरेखा

  • संविधान अक्सर जनता से नहीं, बल्कि अपनी ही शक्ति बढ़ाने वाले छोटे समूहों से पलट दिए जाते हैं
  • बुद्धिमानी से बनाए गए संविधान समाज में शक्ति का इस तरह बिखराव करते हैं कि कोई एक संस्था शक्ति पर एकाधिकार न पा सके
  • भारतीय संविधान शक्ति का क्षैतिज बँटवारा करता है : विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, और निर्वाचन आयोग जैसे स्वतंत्र संवैधानिक निकायों के बीच
  • इससे अगर एक संस्था संविधान को पलटना चाहे, तो बाक़ी संस्थाएँ उसे रोक सकती हैं, इसे अवरोध और संतुलन (checks and balances) कहते हैं
रट लेंपरिभाषा 5

अवरोध और संतुलन (Checks and Balances) वह व्यवस्था है जिसमें सरकार की अलग-अलग संस्थाएँ एक-दूसरे की शक्तियों पर निगरानी रखती हैं, ताकि कोई एक संस्था बाक़ी संस्थाओं से ज़्यादा ताक़तवर होकर संविधान को पलट न सके।

चित्र 2 · भारत में शक्ति का क्षैतिज बँटवारा : कोई एक संस्था संविधान को पलट न सके, इसलिए शक्ति चार जगह बाँटी गई है
चित्र 2 · भारत में शक्ति का क्षैतिज बँटवारा : कोई एक संस्था संविधान को पलट न सके, इसलिए शक्ति चार जगह बाँटी गई है
  • बुद्धिमान संस्थागत डिज़ाइन की दूसरी शर्त : संविधान को कुछ मूल्यों, नियमों और प्रक्रियाओं को स्थायी मानना पड़ता है, पर साथ ही बदलती ज़रूरतों के हिसाब से ढलने की गुंजाइश भी रखनी पड़ती है
  • बहुत कठोर संविधान बदलाव के दबाव में टूट सकता है; बहुत लचीला संविधान लोगों को सुरक्षा, अनुमान लगाने की क्षमता या पहचान कुछ नहीं देता
  • सफल संविधान बुनियादी मूल्यों को बचाने और नई परिस्थितियों में ढालने के बीच सही संतुलन बनाते हैं
  • इसी वजह से भारतीय संविधान को ‘जीवंत दस्तावेज़’ कहा जाता है
रट लेंपरिभाषा 6

‘जीवंत दस्तावेज़’ (Living Document) उस संविधान को कहते हैं जो अपने बुनियादी मूल्यों को बनाए रखते हुए भी संशोधन के ज़रिए बदलती परिस्थितियों के अनुसार ढल सकता है। भारतीय संविधान की यही ख़ासियत उसे लंबे समय तक जनता का सम्मान दिलाए रखती है।

परीक्षा संकेत

संविधान की सत्ता जाँचने के लिए पुस्तक तीन प्रश्न देती है, इन्हें क्रम से याद रखें: (1) संविधान बनाने वाले विश्वसनीय थे? (2) क्या शक्ति समझदारी से बाँटी गई ताकि कोई एक समूह उसे पलट न सके? (3) क्या संविधान जनता की आशाओं और आकांक्षाओं का केंद्र है? तीनों प्रश्न ऊपर के तीन कारकों से सीधे जुड़े हैं।

3 भारतीय संविधान कैसे बना?

चित्र 1 · संविधान सभा की एक बैठक, 1950 · चित्र: अज्ञात / Wikimedia Commons / Public Domain
चित्र 1 · संविधान सभा की एक बैठक, 1950 · चित्र: अज्ञात / Wikimedia Commons / Public Domain
  • औपचारिक रूप से भारत के संविधान को संविधान सभा ने बनाया, जो अविभाजित भारत के लिए चुनी गई थी
  • पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई, और विभाजित भारत की संविधान सभा के रूप में 14 अगस्त 1947 को इसने फिर बैठक की
  • सदस्य अप्रत्यक्ष विधि से चुने गए, प्रांतीय विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा
  • ये प्रांतीय विधान सभाएँ भारत शासन अधिनियम, 1935 के तहत बनी थीं

3.1 कैबिनेट मिशन की योजना

संविधान सभा की रचना ब्रिटिश मंत्रिमंडल की एक समिति, कैबिनेट मिशन, की योजना के अनुसार हुई।

1

सीटों का अनुपात

हर प्रांत और हर देशी रियासत को उसकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें मिलीं, लगभग 10 लाख की आबादी पर एक सीट। प्रांतों को 292 सदस्य चुनने थे, देशी रियासतों को कम से कम 93 सीटें मिलीं।

2

समुदायों में बँटवारा

हर प्रांत की सीटें तीन प्रमुख समुदायों में बँटी थीं: मुसलमान, सिख और सामान्य, उनकी जनसंख्या के अनुपात में।

3

चुनाव का तरीक़ा

प्रांतीय विधान सभा में हर समुदाय के सदस्यों ने समानुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमण मत पद्धति से अपने प्रतिनिधि चुने।

4

देशी रियासतें

देशी रियासतों के प्रतिनिधियों के चुनाव का तरीक़ा परामर्श से तय होना था, न कि किसी तय फ़ॉर्मूले से।

रट लेंपरिभाषा 7

समानुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) वह चुनाव पद्धति है जिसमें हर समुदाय या दल को उतने ही प्रतिनिधि मिलते हैं जितना उसका जनसंख्या या मत में हिस्सा है, न कि विजेता को सारी सीट मिल जाना।

अपने राजनीतिक लोकतंत्र को हमें सामाजिक लोकतंत्र का रूप भी देना चाहिए। राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिक नहीं सकता, जब तक उसका आधार सामाजिक लोकतंत्र न हो। स्वतंत्रता, समता और बंधुता को अलग-अलग नहीं समझा जा सकता, इनमें से किसी एक को दूसरे से अलग करना लोकतंत्र के मक़सद को ही हरा देना है।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर, संविधान सभा वाद-विवाद, खंड 11, पृष्ठ 979, 25 नवंबर 1949

रट लेंपरिभाषा 8

सामाजिक लोकतंत्र (Social Democracy) जीवन का वह तरीक़ा है जो स्वतंत्रता, समता और बंधुता को जीवन के बुनियादी सिद्धांतों के रूप में स्वीकार करता है, न कि केवल वोट देने के अधिकार तक सीमित लोकतंत्र। अंबेडकर के अनुसार बिना समता के स्वतंत्रता कुछ लोगों का बाक़ी सब पर वर्चस्व बना देगी, और बिना स्वतंत्रता के समता व्यक्ति की पहल ख़त्म कर देगी।

3.2 संविधान सभा का स्वरूप

  • 3 जून 1947 की विभाजन योजना के बाद पाकिस्तान के क्षेत्रों से चुने सदस्य संविधान सभा के सदस्य नहीं रहे
  • सदस्यों की संख्या घटकर 299 रह गई
  • संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत (adopt) किया गया
तीन तारीख़ों का फ़र्क़, ध्यान से याद रखें

यह तीनों तारीख़ें अलग-अलग हैं, और परीक्षा में इन्हें गड्डमड्ड करना सबसे आम ग़लती है:

तारीख़ क्या हुआ
26 नवंबर 1949 संविधान अंगीकृत (adopt) किया गया
24 जनवरी 1950 284 सदस्य उपस्थित होकर अंतिम रूप से पारित संविधान पर हस्ताक्षर करते हैं
26 जनवरी 1950 संविधान लागू (enforce) हुआ, इसी दिन गणतंत्र दिवस मनाया जाता है
  • यह सब उपमहाद्वीप में विभाजन की भीषण हिंसा की पृष्ठभूमि में हुआ
  • फिर भी निर्माताओं ने भारी दबाव में न सिर्फ़ संविधान लिखा, बल्कि हिंसा से सही सबक़ भी लिया
  • नतीजा : नागरिकता की एक नई अवधारणा, जिसमें अल्पसंख्यक सुरक्षित हों, और धार्मिक पहचान का नागरिकता के अधिकारों से कोई संबंध न हो
  • सभा सार्वभौम मताधिकार से नहीं चुनी गई थी, फिर भी उसे प्रतिनिधिक बनाने की गंभीर कोशिश हुई
  • सभी धर्मों को प्रतिनिधित्व मिला, और सभा में 28 सदस्य अनुसूचित जातियों से थे
  • विभाजन के बाद कांग्रेस के पास सभा की 82 प्रतिशत सीटें थीं, पर कांग्रेस ख़ुद इतनी विविध पार्टी थी कि उसमें लगभग हर विचार की जगह थी

3.3 विचार-विमर्श का सिद्धांत

  • संविधान सभा की सत्ता सिर्फ़ इसलिए नहीं आई कि वह प्रतिनिधिक थी, बल्कि उन प्रक्रियाओं और मूल्यों से आई जो सदस्य अपनी बहसों में लाए
  • हर सदस्य ने पूरे राष्ट्र के हित को ध्यान में रखकर विचार-विमर्श किया, अपने निजी हित को नहीं
  • मतभेद अक्सर होते थे, पर वे सिद्धांत के मतभेद थे, निजी स्वार्थ के नहीं
किन मुद्दों पर बहस हुई

भारत को केंद्रीकृत सरकार अपनानी चाहिए या विकेंद्रित? राज्यों और केंद्र के संबंध कैसे हों? न्यायपालिका की शक्तियाँ क्या हों? संपत्ति के अधिकार की रक्षा हो या नहीं? आधुनिक राज्य की नींव में आने वाला लगभग हर मुद्दा बड़ी गहराई से चर्चा में आया।

परीक्षा संकेत

सिर्फ़ एक प्रावधान बिना किसी बहस के पारित हुआ: सार्वभौम वयस्क मताधिकार, यानी हर वयस्क नागरिक को धर्म, जाति, शिक्षा, लिंग या आय की परवाह किए बिना वोट का अधिकार। यह तथ्य अक्सर 1 या 2 अंक के प्रश्न में पूछा जाता है, इसे सटीक रूप से याद रखें।

रट लेंपरिभाषा 9

सार्वजनिक विवेक (Public Reason) वह व्यवहार है जिसमें कोई सदस्य अपनी बात के पक्ष में सिर्फ़ अपने हित की नहीं, बल्कि सिद्धांत पर आधारित तर्क देता है, ताकि दूसरे सदस्य भी उससे सहमत हो सकें। संविधान सभा के सदस्यों ने अपनी बहसों में इसी सिद्धांत का पालन किया।

दूसरों के सामने कारण रखने की यह आदत ही संकीर्ण निजी स्वार्थ से ऊपर उठाती है। संविधान सभा की ये बहसें फ्रांसीसी और अमेरिकी क्रांति जितनी ही महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं।

3.4 कार्यविधि

  • संविधान सभा की 8 मुख्य कमेटियाँ थीं, हर विषय के लिए अलग
  • इनकी अध्यक्षता आम तौर पर जवाहरलाल नेहरू, राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल या बी.आर. अंबेडकर करते थे
  • डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे, और डॉ. बी.आर. अंबेडकर प्रारूप समिति के सभापति; दोनों पद अलग हैं
  • ये चारों आपस में हर बात पर सहमत नहीं थे : अंबेडकर कांग्रेस और गांधी के कड़े आलोचक थे, पटेल और नेहरू कई मुद्दों पर असहमत थे
  • फिर भी सबने साथ मिलकर काम किया
  • इन्हीं आठ कमेटियों में से एक थी प्रारूप समिति (Drafting Committee), जिसका काम संविधान के अनुच्छेदों का असली मसौदा (ड्राफ़्ट) लिखना था; इसके सभापति (अध्यक्ष) डॉ. बी.आर. अंबेडकर थे
  • हर कमेटी संविधान के कुछ प्रावधानों का मसौदा तैयार करती, फिर पूरी सभा में उस पर बहस होती
  • ज़्यादातर आम राय बनाने की कोशिश होती थी, कुछ प्रावधानों पर मत विभाजन से भी फ़ैसला हुआ
  • हर तर्क, सवाल या शंका का लिखित रूप में जवाब दिया गया
  • सभा 166 दिन तक बैठी, कुल अवधि 2 वर्ष और 11 महीने
  • इसके सत्र प्रेस और आम जनता, दोनों के लिए खुले थे

जिस दिन डॉ. अंबेडकर को प्रारूप समिति में शामिल करके उसका सभापति बनाया गया, वह इस सभा के सबसे सही निर्णयों में से एक था।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद, संविधान सभा वाद-विवाद, खंड 11, पृष्ठ 994, 26 नवंबर 1949

3.5 राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत

  • कोई भी संविधान सिर्फ़ अपनी संविधान सभा के दम पर नहीं बनता
  • भारत की संविधान सभा इतनी विविध थी कि वह तभी काम कर पाती अगर उसके पीछे संविधान में डाले जाने वाले सिद्धांतों पर पहले से आम सहमति होती
  • ये सिद्धांत दशकों की लंबी आज़ादी की लड़ाई में गढ़े गए थे
  • संविधान सभा ने इन सिद्धांतों को ठोस रूप और आकार दिया
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उद्देश्य-प्रस्ताव (Objectives Resolution) वह प्रस्ताव है जो 1946 में नेहरू ने संविधान सभा के सामने रखा और जिसने सभा के लक्ष्य तय किए। इसमें राष्ट्रीय आंदोलन से आई आकांक्षाएँ और मूल्य संक्षेप में समाए हुए हैं।

1

स्वतंत्र, संप्रभु गणराज्य

भारत एक स्वतंत्र, संप्रभु गणराज्य होगा।

2

भारत एक संघ होगा

ब्रिटिश शासन वाले भारतीय क्षेत्र, देशी रियासतें, और वे बाहरी क्षेत्र जो संघ का अंग बनना चाहें, सब मिलकर संघ बनाएँगे।

3

इकाइयों की स्वायत्तता

संघ की इकाइयाँ स्वायत्त होंगी और वे सभी शक्तियाँ रखेंगी जो संघीय सरकार को नहीं दी गईं।

4

सत्ता का स्रोत जनता

संप्रभु और स्वतंत्र भारत तथा उसके संविधान की सारी शक्ति और सत्ता का स्रोत जनता है।

5

न्याय और स्वतंत्रता की गारंटी

सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय; कानून के सामने समानता; भाषण, अभिव्यक्ति, धर्म और व्यवसाय की स्वतंत्रता की गारंटी।

6

अल्पसंख्यकों की सुरक्षा

अल्पसंख्यकों, पिछड़े व जनजातीय क्षेत्रों, दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों को समुचित सुरक्षा।

7

क्षेत्रीय अखंडता

गणराज्य की क्षेत्रीय अखंडता और स्थल, जल तथा आकाश में उसके संप्रभु अधिकारों की रक्षा।

8

विश्व शांति में योगदान

देश विश्व-शांति और मानव-कल्याण के लिए स्वेच्छापूर्वक योगदान करेगा।

इसी प्रस्ताव के आधार पर संविधान ने पाँच बुनियादी प्रतिबद्धताओं को संस्थागत रूप दिया: समानता, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, संप्रभुता और एक विश्व-बंधुता वाली पहचान।

3.6 संस्थागत व्यवस्था

  • संविधान का प्रभावी होना संस्थाओं की संतुलित व्यवस्था पर भी निर्भर करता है
  • संविधान सभा ने कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच सही संतुलन खोजने में काफ़ी समय लगाया
  • नतीजा : संसदीय स्वरूप और संघीय व्यवस्था, जो विधायिका-कार्यपालिका के बीच और केंद्र-राज्यों के बीच शक्ति बाँटती है

4 उधार लिए गए प्रावधान, फिर भी अपनी सोच

  • संविधान निर्माताओं ने सही संतुलन खोजते हुए दूसरे देशों के अनुभवों से सीखने में कोई संकोच नहीं किया
  • उन्होंने कई प्रावधान अलग-अलग संविधानों से लिए
  • पर यह अंधी नक़ल नहीं थी : हर प्रावधान को यह साबित करना पड़ता था कि वह भारत की समस्याओं और आशाओं के अनुरूप है
देश क्या लिया गया
ब्रिटेन सर्वाधिक मत के आधार पर जीत (First Past the Post), संसदीय स्वरूप, कानून के शासन का विचार, विधायिका में अध्यक्ष का पद, कानून बनाने की प्रक्रिया
अमेरिका मौलिक अधिकारों की सूची, न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति, न्यायपालिका की स्वतंत्रता
आयरलैंड राज्य के नीति-निर्देशक तत्व
फ़्रांस स्वतंत्रता, समता और बंधुता के सिद्धांत
कनाडा अर्ध-संघीय व्यवस्था (मज़बूत केंद्र वाली संघीय व्यवस्था), अवशिष्ट शक्तियों का विचार
रट लेंपरिभाषा 11

न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) वह शक्ति है जिससे न्यायपालिका किसी कानून या सरकारी आदेश की जाँच करके यह तय कर सकती है कि वह संविधान के अनुरूप है या नहीं, और अगर नहीं तो उसे रद्द कर सकती है। यह शक्ति अमेरिकी संविधान से ली गई है।

इतिहास के इस पड़ाव पर बने संविधान में जो नया हो सकता है, वह केवल यह है कि उसमें कमियाँ दूर करने और देश की ज़रूरतों के अनुरूप बनाने वाले बदलाव किए जाएँ।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर, संविधान सभा वाद-विवाद, खंड 7, पृष्ठ 37, 4 नवंबर 1948

भारत को एक ऐसी संविधान सभा मिलना बड़े सौभाग्य की बात थी, जिसने संकुचित दृष्टिकोण छोड़कर पूरी दुनिया से सर्वोत्तम चीज़ें लीं और उन्हें अपना बना लिया।

5 निष्कर्ष

  • यह संविधान निर्माताओं की बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता को श्रद्धांजलि है कि उन्होंने देश को एक ऐसा दस्तावेज़ दिया जिसमें बुनियादी मूल्य और जनता की सबसे बड़ी आकांक्षाएँ, दोनों समाए हुए हैं
  • यही वजह है कि यह बारीकी से गढ़ा गया दस्तावेज़ न सिर्फ़ बचा रहा, बल्कि एक जीवंत हक़ीक़त बन गया, जबकि कई और संविधान उसी काग़ज़ के साथ ख़त्म हो गए जिस पर वे लिखे गए थे
  • भारत का संविधान एक अनोखा दस्तावेज़ बना, जो आगे चलकर दूसरे कई संविधानों के लिए, ख़ासकर दक्षिण अफ़्रीका के लिए, एक आदर्श बना
  • लगभग तीन साल तक चली इस लंबी खोज का मक़सद सही संतुलन बनाना था, ताकि संविधान से बनी संस्थाएँ अस्थायी जुगाड़ न रहकर लंबे समय तक भारत की जनता की आकांक्षाओं को सँभाल सकें
झटपट दोहराव : परीक्षा से एक रात पहले यही पढ़ें
  • संविधान के पाँच काम : तालमेल और भरोसा, निर्णय-शक्ति की विशिष्टता, सरकार पर सीमाएँ, समाज की आकांक्षाएँ, और राष्ट्र की बुनियादी पहचान
  • ब्रिटेन के पास कोई एक संहिताबद्ध संविधान-दस्तावेज़ नहीं है, दस्तावेज़ों और निर्णयों की एक शृंखला है
  • संविधान को असरदार बनाने वाले तीन कारक : प्रचलन में लाने का तरीक़ा, मौलिक प्रावधान, और संस्थाओं की संतुलित रूपरेखा
  • भारत, दक्षिण अफ़्रीका और अमेरिका के संविधान जन-आंदोलनों के बाद बने, भारत ने जनमत संग्रह कभी नहीं कराया
  • संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946, विभाजित भारत के लिए 14 अगस्त 1947 को दोबारा बैठक
  • कैबिनेट मिशन योजना: लगभग 10 लाख की आबादी पर एक सीट, प्रांतों से 292 और रियासतों से न्यूनतम 93 सदस्य
  • 26 नवंबर 1949 को संविधान अंगीकृत, 24 जनवरी 1950 को 284 सदस्यों के हस्ताक्षर, 26 जनवरी 1950 को लागू
  • सार्वभौम वयस्क मताधिकार अकेला ऐसा प्रावधान था जो बिना बहस पारित हुआ
  • संविधान सभा की 8 मुख्य कमेटियाँ, 166 दिन, 2 वर्ष 11 महीने की कुल अवधि
  • उद्देश्य-प्रस्ताव नेहरू ने 1946 में रखा, इससे समानता, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, संप्रभुता की प्रतिबद्धता आई
  • ब्रिटेन, अमेरिका, आयरलैंड, फ़्रांस और कनाडा से प्रावधान उधार लिए गए, पर हर प्रावधान भारत की ज़रूरत के हिसाब से जाँचा गया
  • भारतीय संविधान को ‘जीवंत दस्तावेज़’ कहा जाता है, क्योंकि यह बुनियादी मूल्य बचाकर भी बदलती ज़रूरतों में ढल सकता है
परीक्षा से पहले ख़ुद को जाँचें
  • क्या मैं संविधान के पाँचों काम बिना देखे नाम सहित लिख सकता हूँ?
  • क्या मुझे संविधान की सत्ता जाँचने के तीनों प्रश्न और तीनों कारक याद हैं?
  • क्या मैं संविधान अंगीकृत होने, हस्ताक्षर होने और लागू होने की तीनों तारीख़ें अलग-अलग बता सकता हूँ?
  • क्या मुझे कैबिनेट मिशन योजना के चारों बिंदु याद हैं?
  • क्या मैं कम से कम तीन देशों के नाम बता सकता हूँ जिनसे भारत ने प्रावधान उधार लिए?
  • क्या मैं समझा सकता हूँ कि भारतीय संविधान को ‘जीवंत दस्तावेज़’ क्यों कहा जाता है?