NCERT की पाठ्यपुस्तक भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार के अध्याय 1 «संविधान, क्यों और कैसे?» की प्रश्नावली के दसों प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
1 संविधान का कौन-सा कार्य नहीं है?
प्र. इनमें कौन-सा संविधान का कार्य नहीं है?
(क) यह नागरिकों के अधिकार की गारंटी देता है।
(ख) यह शासन की विभिन्न शाखाओं की शक्तियों के अलग-अलग क्षेत्र का रेखांकन करता है।
(ग) यह सुनिश्चित करता है कि सत्ता में अच्छे लोग आयें।
(घ) यह कुछ साझे मूल्यों की अभिव्यक्ति करता है।
उत्तर: (ग)। संविधान का काम अधिकारों की गारंटी देना, शक्तियों का बँटवारा करना और साझे मूल्यों की अभिव्यक्ति करना है। पर संविधान यह तय नहीं कर सकता कि सत्ता में कौन आएगा या वह कैसा इंसान होगा, यह चुनाव में जनता के फ़ैसले पर निर्भर करता है, संविधान के दायरे में नहीं। इसलिए (ग) संविधान का कार्य नहीं है।
2 संविधान की प्रामाणिकता संसद से ज़्यादा क्यों
प्र. निम्नलिखित में कौन-सा कथन इस बात की एक बेहतर दलील है कि संविधान की प्रामाणिकता संसद से ज़्यादा है?
(क) संसद के अस्तित्व में आने से कहीं पहले संविधान बनाया जा चुका था।
(ख) संविधान के निर्माता संसद के सदस्यों से कहीं ज़्यादा बड़े नेता थे।
(ग) संविधान ही यह बताता है कि संसद कैसे बनायी जाय और इसे कौन-कौन-सी शक्तियाँ प्राप्त होंगी।
(घ) संसद, संविधान का संशोधन नहीं कर सकती।
उत्तर: (ग)। संविधान ही वह सत्ता है जो सबसे पहले संसद का गठन करती है, यह तय करती है कि संसद कैसे बनेगी और उसे कौन-सी शक्तियाँ मिलेंगी। इसीलिए संविधान की प्रामाणिकता संसद से ऊपर है, चाहे संसद उसके बाद बनी हो या पहले, और चाहे संसद संविधान में संशोधन कर सकती हो (जो कि वह कर भी सकती है)। असली कारण यह है कि संसद ख़ुद संविधान की ही देन है।
3 सही या ग़लत
प्र. बतायें कि संविधान के बारे में निम्नलिखित कथन सही हैं या ग़लत?
(क) सरकार के गठन और उसकी शक्तियों के बारे में संविधान एक लिखित दस्तावेज़ है।
(ख) संविधान सिर्फ़ लोकतांत्रिक देशों में होता है और उसकी ज़रूरत ऐसे ही देशों में होती है।
(ग) संविधान एक कानूनी दस्तावेज़ है और आदर्शों तथा मूल्यों से इसका कोई सरोकार नहीं।
(घ) संविधान एक नागरिक को नई पहचान देता है।
उत्तर:
(क) सही। ज़्यादातर देशों में संविधान सरकार के गठन और शक्तियों को बताने वाला एक लिखित, संहिताबद्ध दस्तावेज़ होता है (ब्रिटेन जैसे कुछ अपवाद ज़रूर हैं)।
(ख) ग़लत। राजतंत्र और यहाँ तक कि एक-दलीय व्यवस्था (जैसे पुराना सोवियत संघ) के भी संविधान हो सकते हैं। हर संगठित राज्य को बुनियादी नियमों की ज़रूरत होती है, केवल लोकतांत्रिक देशों को नहीं।
(ग) ग़लत। संविधान का चौथा और पाँचवाँ काम ही यह है कि वह समाज की आकांक्षाओं और मूल्यों को अभिव्यक्त करे, जैसे भारतीय संविधान की प्रस्तावना और नीति-निर्देशक तत्व।
(घ) सही। संविधान लोगों को एक साझी राजनीतिक और नैतिक पहचान देता है, जो उसके बनने से पहले मौजूद नहीं थी।
4 भारतीय संविधान के निर्माण के बारे में सही या ग़लत
प्र. बतायें कि भारतीय संविधान के निर्माण के बारे में निम्नलिखित अनुमान सही हैं या नहीं? अपने उत्तर का कारण बतायें।
(क) संविधान-सभा में भारतीय जनता की नुमाइंदगी नहीं हुई। इसका निर्वाचन सभी नागरिकों द्वारा नहीं हुआ था।
(ख) संविधान बनाने की प्रक्रिया में कोई बड़ा फ़ैसला नहीं लिया गया क्योंकि उस समय नेताओं के बीच संविधान की बुनियादी रूपरेखा के बारे में आम सहमति थी।
(ग) संविधान में कोई मौलिकता नहीं है क्योंकि इसका अधिकांश हिस्सा दूसरे देशों से लिया गया है।
उत्तर:
(क) आंशिक रूप से सही, पर पूरी तरह नहीं। यह सच है कि सभा सार्वभौम मताधिकार से नहीं चुनी गई, सदस्य प्रांतीय विधान सभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष विधि से चुने गए थे। पर सभा को प्रतिनिधिक बनाने की गंभीर कोशिश हुई: सभी धर्मों को प्रतिनिधित्व मिला, 28 सदस्य अनुसूचित जातियों से थे। इसलिए ‘नुमाइंदगी नहीं हुई’ कहना ग़लत है, सही यह होगा कि नुमाइंदगी पूर्ण नहीं, आंशिक थी।
(ख) ग़लत। यह ग़लत है कि कोई बड़ा फ़ैसला नहीं लिया गया। संविधान सभा में केंद्रीकृत बनाम विकेंद्रित शासन, राज्य-केंद्र संबंध, न्यायपालिका की शक्तियाँ और संपत्ति के अधिकार जैसे कई गहरे मुद्दों पर तीखी बहस हुई। केवल सार्वभौम वयस्क मताधिकार बिना बहस पारित हुआ, बाक़ी लगभग हर मुद्दे पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ।
(ग) ग़लत। उधार लेना अंधी नक़ल नहीं था। हर प्रावधान को यह साबित करना पड़ता था कि वह भारत की समस्याओं और आशाओं के अनुरूप है। संविधान सभा ने संकुचित दृष्टिकोण छोड़कर पूरी दुनिया से सर्वोत्तम चीज़ें लीं और उन्हें अपना बना लिया, यही असली मौलिकता है।
5 तीन निष्कर्षों के दो-दो उदाहरण
प्र. भारतीय संविधान के बारे में निम्नलिखित प्रत्येक निष्कर्ष की पुष्टि में दो उदाहरण दें।
(क) संविधान का निर्माण विश्वसनीय नेताओं द्वारा हुआ। उनके लिए जनता के मन में आदर था।
(ख) संविधान ने शक्तियों का बँटवारा इस तरह किया कि इसमें उलट-फेर मुश्किल है।
(ग) संविधान जनता की आशा और आकांक्षाओं का केंद्र है।
उत्तर:
(क) 1. डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे और डॉ. बी.आर. अंबेडकर प्रारूप समिति के सभापति, दोनों को जनता का व्यापक सम्मान प्राप्त था।
2. नेहरू, पटेल और अंबेडकर आपस में कई मुद्दों पर असहमत थे, फिर भी सबने राष्ट्रहित में साथ काम किया, यही जनता के भरोसे का कारण बना।
(ख) 1. भारतीय संविधान शक्ति का क्षैतिज बँटवारा करता है, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संस्थाओं के बीच।
2. संविधान संशोधन के लिए विशेष बहुमत जैसी कठोर प्रक्रिया रखता है, ताकि कोई एक समूह आसानी से उसे पलट न सके।
(ग) 1. प्रस्तावना और मौलिक अधिकारों के ज़रिए संविधान भारत को जाति-भेद से मुक्त समाज बनाने की आकांक्षा व्यक्त करता है।
2. राज्य के नीति-निर्देशक तत्व सरकार से यह अपेक्षा करते हैं कि वह ग़रीबी और असमानता कम करने के लिए सक्रिय क़दम उठाए।
6 शक्तियों और ज़िम्मेदारियों का साफ़ निर्धारण क्यों ज़रूरी
प्र. किसी देश के लिए संविधान में शक्तियों और ज़िम्मेदारियों का साफ़-साफ़ निर्धारण क्यों ज़रूरी है? इस तरह का निर्धारण न हो, तो क्या होगा?
उत्तर:
1. साफ़ निर्धारण के बिना किसी को यह पता नहीं होगा कि निर्णय लेने की शक्ति किसके पास है, इसलिए हर संस्था अपनी मनमानी शक्ति दावा कर सकती है।
2. विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव बढ़ेगा, क्योंकि किसी की सीमा तय नहीं होगी।
3. नागरिकों को कोई भरोसा नहीं होगा कि उनके अधिकार सुरक्षित हैं, क्योंकि कोई तय नहीं कर पाएगा कि किसकी शक्ति कहाँ तक है।
4. इसीलिए संविधान का दूसरा काम यही है, यह तय करना कि निर्णय लेने की शक्ति किसके पास होगी और सरकार कैसे बनेगी। बिना इसके समाज में स्थिरता और भरोसा दोनों नहीं बन सकते।
7 शासकों की सीमा का निर्धारण क्यों ज़रूरी
प्र. शासकों की सीमा का निर्धारण करना संविधान के लिए क्यों ज़रूरी है? क्या कोई ऐसा भी संविधान हो सकता है जो नागरिकों को कोई अधिकार न दे?
उत्तर:
1. अगर सरकार पर कोई सीमा न हो, तो वह मनमाने ढंग से किसी का धर्म पालन रोक सकती है, संपत्ति छीन सकती है या मनमानी गिरफ़्तारी कर सकती है, जैसा पुस्तक के उदाहरणों में बताया गया है।
2. संविधान मौलिक अधिकारों की सूची देकर यह सुनिश्चित करता है कि सरकार कुछ सीमाओं को कभी लाँघ न सके, चाहे उसे कितना भी बड़ा जनसमर्थन क्यों न मिले।
3. सीमा के बिना ‘सरकार’ और ‘तानाशाही’ में कोई फ़र्क़ नहीं रह जाता।
क्या ऐसा संविधान हो सकता है जो कोई अधिकार न दे? सैद्धांतिक रूप से हो सकता है, पर पुस्तक के अपने तर्क से ऐसा संविधान असफल संविधान होगा। एक सफल संविधान हर व्यक्ति को उसे मानने का कोई कारण देता है, और अगर वह किसी को कोई अधिकार ही न दे, तो नागरिकों के पास उसे मानने की कोई वजह नहीं बचेगी, ऐसा संविधान अपनी निष्ठा खो देगा।
8 जापान और भारत के अनुभव का फ़र्क़
प्र. जापान का संविधान तब बना जब दूसरे विश्वयुद्ध में पराजित होने के बाद जापान अमेरिकी सेना के क़ब्ज़े में था। जापान के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान होना असंभव था, जो अमेरिकी सेना को पसंद न हो। क्या आपको लगता है कि संविधान को इस तरह बनाने में कोई कठिनाई है? भारत में संविधान बनाने का अनुभव किस तरह इससे अलग है?
उत्तर:
कठिनाई: हाँ, कठिनाई है। पुस्तक के अपने कारक के अनुसार, संविधान को असरदार बनाने के लिए यह ज़रूरी है कि वह किसने बनाया और उन्हें कितनी सत्ता और जन-विश्वास हासिल था। अगर संविधान किसी विदेशी क़ब्ज़े वाली सेना की मर्ज़ी से बना हो, तो वह जनता की नहीं, बाहरी सत्ता की इच्छा को दर्शाता है, इसलिए उसकी वैधता कमज़ोर रहती है।
भारत का अनुभव अलग कैसे: 1. भारत का संविधान किसी विदेशी क़ब्ज़े में नहीं, बल्कि लंबे राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत पर बना।
2. इसे बनाने वाले भारतीय नेता थे, जिन्हें जनता का भारी सम्मान प्राप्त था, न कि कोई बाहरी सत्ता।
3. संविधान सभा के सदस्य आपस में कई मुद्दों पर असहमत होते हुए भी स्वतंत्र रूप से बहस कर सकते थे, कोई बाहरी शक्ति उन पर शर्तें नहीं थोप रही थी।
इसीलिए भारत का संविधान असली अर्थों में जनता का अपना दस्तावेज़ बन सका, जबकि जापान के मामले में यह सवाल हमेशा बना रहता है कि कौन-से प्रावधान वास्तव में जापानी जनता की इच्छा थे और कौन-से केवल क़ब्ज़ा करने वाली सेना की मर्ज़ी।
9 रजत का सवाल
प्र. रजत ने अपने शिक्षक से पूछा: ‘संविधान एक पचास साल पुराना दस्तावेज़ है और इस कारण पुराना पड़ चुका है। किसी ने इसको लागू करते समय मुझसे राय नहीं माँगी। यह इतनी कठिन भाषा में लिखा हुआ है कि मैं इसे समझ नहीं सकता। आप मुझे बतायें कि मैं इस दस्तावेज़ की बातों का पालन क्यों करूँ?’ अगर आप शिक्षक होते तो रजत को क्या उत्तर देते?
उत्तर:
1. पुराना होना कोई ख़ामी नहीं: भारत, दक्षिण अफ़्रीका और अमेरिका के सबसे सफल संविधान भी दशकों पुराने हैं। भारतीय संविधान को ‘जीवंत दस्तावेज़’ कहा जाता है, क्योंकि यह संशोधन के ज़रिए बदलती ज़रूरतों में ढल सकता है, इसलिए पुराना होना उसे अप्रासंगिक नहीं बनाता।
2. सहमति सीधी नहीं, अप्रत्यक्ष है: किसी भी नई पीढ़ी से सीधे राय नहीं ली जा सकती। पर संविधान सभा जन-आंदोलन की विरासत लेकर बनी थी, और भारत में कभी जनमत संग्रह नहीं हुआ, फिर भी लोगों ने संविधान के प्रावधानों पर अमल करके उसे अपनाया। यही अप्रत्यक्ष सहमति है।
3. भाषा कठिन हो सकती है, पर मूल्य नहीं बदलते: यही वजह है कि हम इस विषय को पढ़ते हैं, ताकि नागरिक अपने अधिकार और सरकार की सीमाएँ समझ सकें। भाषा की कठिनाई संविधान के मूल्यों को अमान्य नहीं करती।
4. सबसे बड़ा कारण: संविधान सबको न्यूनतम तालमेल, सुरक्षा, स्वतंत्रता और एक साझी पहचान देता है। इसके बिना समाज में हर व्यक्ति असुरक्षित होगा, इसलिए इसका पालन अपनी ही सुरक्षा के लिए ज़रूरी है।
10 हरबंस, नेहा और नाजिमा के तीन पक्ष
प्र. संविधान के क्रिया-कलाप से जुड़े अनुभवों को लेकर एक चर्चा में तीन वक्ताओं ने तीन अलग-अलग पक्ष लिए:
(क) हरबंस: भारतीय संविधान एक लोकतांत्रिक ढाँचा प्रदान करने में सफल रहा है।
(ख) नेहा: संविधान में स्वतंत्रता, समता और भाईचारा सुनिश्चित करने का विधिवत् वादा है। चूँकि ऐसा नहीं हुआ इसलिए संविधान असफल है।
(ग) नाजिमा: संविधान असफल नहीं हुआ, हमने उसे असफल बनाया।
क्या आप इनमें से किसी पक्ष से सहमत हैं, यदि हाँ, तो क्यों? यदि नहीं, तो आप अपना पक्ष बतायें।
उत्तर: यह एक खुला प्रश्न है, अपने तर्क के साथ कोई भी संतुलित पक्ष लिखा जा सकता है। एक उदाहरण उत्तर:
हरबंस से आंशिक सहमति: भारतीय संविधान ने वाक़ई एक स्थिर लोकतांत्रिक ढाँचा दिया है, नियमित चुनाव, सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण, और शक्ति का बँटवारा इसके ठोस सबूत हैं।
नेहा से असहमति: संविधान ने वादे किए, यह सही है, पर ‘वादे पूरे न होने से संविधान असफल है’ कहना जल्दबाज़ी है। संविधान अपने आप पूर्ण न्याय स्थापित नहीं करता, वह सिर्फ़ न्याय पाने के लिए ढाँचा देता है। वादे अधूरे रहना संविधान की नहीं, उसे लागू करने वाली संस्थाओं और नेताओं की कमी को दिखाता है।
नाजिमा से सहमति: यही सबसे संतुलित पक्ष है। संविधान ने अपनी तरफ़ से ढाँचा, अधिकार और संस्थाएँ दीं, पर उन्हें ईमानदारी से चलाना नागरिकों और नेताओं का काम है। जहाँ स्वतंत्रता, समता और बंधुता अधूरी रह गई, वहाँ ज़िम्मेदारी उस दस्तावेज़ की नहीं, उसे लागू करने वालों की है।