NCERT की पाठ्यपुस्तक भारत का संविधान: सिद्धांत और व्यवहार के अध्याय 1 «संविधान, क्यों और कैसे?» की प्रश्नावली के दसों प्रश्न, हिंदी संस्करण की अपनी शब्दावली में, और हर प्रश्न का पूरा उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए।
1 संविधान का कौन-सा कार्य नहीं है?
प्र. इनमें कौन-सा संविधान का कार्य नहीं है?
(क) यह नागरिकों के अधिकार की गारंटी देता है।
(ख) यह शासन की विभिन्न शाखाओं की शक्तियों के अलग-अलग क्षेत्र का रेखांकन करता है।
(ग) यह सुनिश्चित करता है कि सत्ता में अच्छे लोग आयें।
(घ) यह कुछ साझे मूल्यों की अभिव्यक्ति करता है।
उत्तर: (ग)। संविधान का काम अधिकारों की गारंटी देना, शक्तियों का बँटवारा करना और साझे मूल्यों की अभिव्यक्ति करना है। पर संविधान यह तय नहीं कर सकता कि सत्ता में कौन आएगा या वह कैसा इंसान होगा, यह चुनाव में जनता के फ़ैसले पर निर्भर करता है, संविधान के दायरे में नहीं। इसलिए (ग) संविधान का कार्य नहीं है।
2 संविधान की प्रामाणिकता संसद से ज़्यादा क्यों
प्र. निम्नलिखित में कौन-सा कथन इस बात की एक बेहतर दलील है कि संविधान की प्रामाणिकता संसद से ज़्यादा है?
(क) संसद के अस्तित्व में आने से कहीं पहले संविधान बनाया जा चुका था।
(ख) संविधान के निर्माता संसद के सदस्यों से कहीं ज़्यादा बड़े नेता थे।
(ग) संविधान ही यह बताता है कि संसद कैसे बनायी जाय और इसे कौन-कौन-सी शक्तियाँ प्राप्त होंगी।
(घ) संसद, संविधान का संशोधन नहीं कर सकती।
उत्तर: (ग)। संविधान ही वह सत्ता है जो सबसे पहले संसद का गठन करती है, यह तय करती है कि संसद कैसे बनेगी और उसे कौन-सी शक्तियाँ मिलेंगी। इसीलिए संविधान की प्रामाणिकता संसद से ऊपर है, चाहे संसद उसके बाद बनी हो या पहले, और चाहे संसद संविधान में संशोधन कर सकती हो (जो कि वह कर भी सकती है)। असली कारण यह है कि संसद ख़ुद संविधान की ही देन है।
3 सही या ग़लत
प्र. बतायें कि संविधान के बारे में निम्नलिखित कथन सही हैं या ग़लत?
(क) सरकार के गठन और उसकी शक्तियों के बारे में संविधान एक लिखित दस्तावेज़ है।
(ख) संविधान सिर्फ़ लोकतांत्रिक देशों में होता है और उसकी ज़रूरत ऐसे ही देशों में होती है।
(ग) संविधान एक कानूनी दस्तावेज़ है और आदर्शों तथा मूल्यों से इसका कोई सरोकार नहीं।
(घ) संविधान एक नागरिक को नई पहचान देता है।
उत्तर:
(क) पूरी तरह सही नहीं। ज़्यादातर देशों में संविधान सरकार के गठन और शक्तियों को बताने वाला एक लिखित, संहिताबद्ध दस्तावेज़ होता है, पर कुछ देशों, जैसे इंग्लैंड, के पास ऐसा कोई एक दस्तावेज़ नहीं है; वहाँ कई दस्तावेज़ों और निर्णयों की शृंखला को मिलाकर संविधान कहा जाता है। साथ ही संविधान सिर्फ़ सरकार के गठन और शक्ति के नियम नहीं, समाज की आकांक्षाएँ, मूल्य और पहचान भी व्यक्त करता है (देखें (ग) और (घ))।
(ख) ग़लत। राजतंत्र और यहाँ तक कि एक-दलीय व्यवस्था (जैसे पुराना सोवियत संघ) के भी संविधान हो सकते हैं। हर संगठित राज्य को बुनियादी नियमों की ज़रूरत होती है, केवल लोकतांत्रिक देशों को नहीं।
(ग) ग़लत। संविधान का चौथा और पाँचवाँ काम ही यह है कि वह समाज की आकांक्षाओं और मूल्यों को अभिव्यक्त करे, जैसे भारतीय संविधान की प्रस्तावना और नीति-निर्देशक तत्व।
(घ) सही। संविधान लोगों को एक साझी राजनीतिक और नैतिक पहचान देता है, जो उसके बनने से पहले मौजूद नहीं थी।
4 भारतीय संविधान के निर्माण के बारे में सही या ग़लत
प्र. बतायें कि भारतीय संविधान के निर्माण के बारे में निम्नलिखित अनुमान सही हैं या नहीं? अपने उत्तर का कारण बतायें।
(क) संविधान-सभा में भारतीय जनता की नुमाइंदगी नहीं हुई। इसका निर्वाचन सभी नागरिकों द्वारा नहीं हुआ था।
(ख) संविधान बनाने की प्रक्रिया में कोई बड़ा फ़ैसला नहीं लिया गया क्योंकि उस समय नेताओं के बीच संविधान की बुनियादी रूपरेखा के बारे में आम सहमति थी।
(ग) संविधान में कोई मौलिकता नहीं है क्योंकि इसका अधिकांश हिस्सा दूसरे देशों से लिया गया है।
उत्तर:
(क) ग़लत। यह सच है कि सभा सार्वभौम मताधिकार से नहीं चुनी गई, सदस्य प्रांतीय विधान सभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष विधि से चुने गए थे। पर सभा को प्रतिनिधिक बनाने की गंभीर कोशिश हुई: सभी धर्मों को प्रतिनिधित्व मिला, 28 सदस्य अनुसूचित जातियों से थे। इसलिए ‘नुमाइंदगी नहीं हुई’ कहना ग़लत है, सही यह होगा कि नुमाइंदगी पूर्ण नहीं, आंशिक थी।
(ख) ग़लत। यह ग़लत है कि कोई बड़ा फ़ैसला नहीं लिया गया। संविधान सभा में केंद्रीकृत बनाम विकेंद्रित शासन, राज्य-केंद्र संबंध, न्यायपालिका की शक्तियाँ और संपत्ति के अधिकार जैसे कई गहरे मुद्दों पर तीखी बहस हुई। केवल सार्वभौम वयस्क मताधिकार लगभग बिना वाद-विवाद के पारित हुआ, बाक़ी लगभग हर मुद्दे पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ।
(ग) ग़लत। उधार लेना अंधी नक़ल नहीं था। हर प्रावधान को यह साबित करना पड़ता था कि वह भारत की समस्याओं और आशाओं के अनुरूप है। संविधान सभा ने संकुचित दृष्टिकोण छोड़कर पूरी दुनिया से सर्वोत्तम चीज़ें लीं और उन्हें अपना बना लिया, यही असली मौलिकता है।
5 तीन निष्कर्षों के दो-दो उदाहरण
प्र. भारतीय संविधान के बारे में निम्नलिखित प्रत्येक निष्कर्ष की पुष्टि में दो उदाहरण दें।
(क) संविधान का निर्माण विश्वसनीय नेताओं द्वारा हुआ। उनके लिए जनता के मन में आदर था।
(ख) संविधान ने शक्तियों का बँटवारा इस तरह किया कि इसमें उलट-फेर मुश्किल है।
(ग) संविधान जनता की आशा और आकांक्षाओं का केंद्र है।
उत्तर:
(क) 1. डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे और डॉ. बी.आर. अंबेडकर प्रारूप समिति के सभापति, दोनों को जनता का व्यापक सम्मान प्राप्त था।
2. नेहरू, पटेल और अंबेडकर आपस में कई मुद्दों पर असहमत थे, फिर भी सबने राष्ट्रहित में साथ काम किया, यही जनता के भरोसे का कारण बना।
(ख) 1. भारतीय संविधान शक्ति का क्षैतिज बँटवारा करता है, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संस्थाओं के बीच।
2. संविधान संशोधन के लिए विशेष बहुमत जैसी कठोर प्रक्रिया रखता है, ताकि कोई एक समूह आसानी से उसे पलट न सके।
(ग) 1. प्रस्तावना और मौलिक अधिकारों के ज़रिए संविधान भारत को जाति-भेद से मुक्त समाज बनाने की आकांक्षा व्यक्त करता है।
2. राज्य के नीति-निर्देशक तत्व सरकार से यह अपेक्षा करते हैं कि वह ग़रीबी और असमानता कम करने के लिए सक्रिय क़दम उठाए।
6 शक्तियों और ज़िम्मेदारियों का साफ़ निर्धारण क्यों ज़रूरी
प्र. किसी देश के लिए संविधान में शक्तियों और ज़िम्मेदारियों का साफ़-साफ़ निर्धारण क्यों ज़रूरी है? इस तरह का निर्धारण न हो, तो क्या होगा?
उत्तर:
1. साफ़ निर्धारण के बिना किसी को यह पता नहीं होगा कि निर्णय लेने की शक्ति किसके पास है, इसलिए हर संस्था अपनी मनमानी शक्ति दावा कर सकती है।
2. विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव बढ़ेगा, क्योंकि किसी की सीमा तय नहीं होगी।
3. नागरिकों को कोई भरोसा नहीं होगा कि उनके अधिकार सुरक्षित हैं, क्योंकि कोई तय नहीं कर पाएगा कि किसकी शक्ति कहाँ तक है।
4. इसीलिए संविधान का दूसरा काम यही है, यह तय करना कि निर्णय लेने की शक्ति किसके पास होगी और सरकार कैसे बनेगी। बिना इसके समाज में स्थिरता और भरोसा दोनों नहीं बन सकते।
7 शासकों की सीमा का निर्धारण क्यों ज़रूरी
प्र. शासकों की सीमा का निर्धारण करना संविधान के लिए क्यों ज़रूरी है? क्या कोई ऐसा भी संविधान हो सकता है जो नागरिकों को कोई अधिकार न दे?
उत्तर:
1. अगर सरकार पर कोई सीमा न हो, तो वह मनमाने ढंग से किसी का धर्म पालन रोक सकती है, संपत्ति छीन सकती है या मनमानी गिरफ़्तारी कर सकती है, जैसा पुस्तक के उदाहरणों में बताया गया है।
2. संविधान मौलिक अधिकारों की सूची देकर यह सुनिश्चित करता है कि सरकार कुछ सीमाओं को कभी लाँघ न सके, चाहे उसे कितना भी बड़ा जनसमर्थन क्यों न मिले।
3. सीमा के बिना ‘सरकार’ और ‘तानाशाही’ में कोई फ़र्क़ नहीं रह जाता।
क्या ऐसा संविधान हो सकता है जो कोई अधिकार न दे? सैद्धांतिक रूप से हो सकता है, पर पुस्तक के अपने तर्क से ऐसा संविधान असफल संविधान होगा। एक सफल संविधान हर व्यक्ति को उसे मानने का कोई कारण देता है, और अगर वह किसी को कोई अधिकार ही न दे, तो नागरिकों के पास उसे मानने की कोई वजह नहीं बचेगी, ऐसा संविधान अपनी निष्ठा खो देगा।
8 जापान और भारत के अनुभव का फ़र्क़
प्र. जापान का संविधान तब बना जब दूसरे विश्वयुद्ध में पराजित होने के बाद जापान अमेरिकी सेना के क़ब्ज़े में था। जापान के संविधान में ऐसा कोई प्रावधान होना असंभव था, जो अमेरिकी सेना को पसंद न हो। क्या आपको लगता है कि संविधान को इस तरह बनाने में कोई कठिनाई है? भारत में संविधान बनाने का अनुभव किस तरह इससे अलग है?
उत्तर:
कठिनाई: हाँ, कठिनाई है। पुस्तक के अपने कारक के अनुसार, संविधान को असरदार बनाने के लिए यह ज़रूरी है कि वह किसने बनाया और उन्हें कितनी सत्ता और जन-विश्वास हासिल था। अगर संविधान किसी विदेशी क़ब्ज़े वाली सेना की मर्ज़ी से बना हो, तो वह जनता की नहीं, बाहरी सत्ता की इच्छा को दर्शाता है, इसलिए उसकी वैधता कमज़ोर रहती है।
भारत का अनुभव अलग कैसे: 1. भारत का संविधान किसी विदेशी क़ब्ज़े में नहीं, बल्कि लंबे राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत पर बना।
2. इसे बनाने वाले भारतीय नेता थे, जिन्हें जनता का भारी सम्मान प्राप्त था, न कि कोई बाहरी सत्ता।
3. संविधान सभा के सदस्य आपस में कई मुद्दों पर असहमत होते हुए भी स्वतंत्र रूप से बहस कर सकते थे, कोई बाहरी शक्ति उन पर शर्तें नहीं थोप रही थी।
इसीलिए भारत का संविधान असली अर्थों में जनता का अपना दस्तावेज़ बन सका, जबकि जापान के मामले में यह सवाल हमेशा बना रहता है कि कौन-से प्रावधान वास्तव में जापानी जनता की इच्छा थे और कौन-से केवल क़ब्ज़ा करने वाली सेना की मर्ज़ी।
9 रजत का सवाल
प्र. रजत ने अपने शिक्षक से पूछा: ‘संविधान एक पचास साल पुराना दस्तावेज़ है और इस कारण पुराना पड़ चुका है। किसी ने इसको लागू करते समय मुझसे राय नहीं माँगी। यह इतनी कठिन भाषा में लिखा हुआ है कि मैं इसे समझ नहीं सकता। आप मुझे बतायें कि मैं इस दस्तावेज़ की बातों का पालन क्यों करूँ?’ अगर आप शिक्षक होते तो रजत को क्या उत्तर देते?
उत्तर:
1. पुराना होना कोई ख़ामी नहीं: भारत, दक्षिण अफ़्रीका और अमेरिका के सबसे सफल संविधान भी दशकों पुराने हैं। भारतीय संविधान को ‘जीवंत दस्तावेज़’ कहा जाता है, क्योंकि यह संशोधन के ज़रिए बदलती ज़रूरतों में ढल सकता है, इसलिए पुराना होना उसे अप्रासंगिक नहीं बनाता।
2. सहमति सीधी नहीं, अप्रत्यक्ष है: किसी भी नई पीढ़ी से सीधे राय नहीं ली जा सकती। पर संविधान सभा जन-आंदोलन की विरासत लेकर बनी थी, और भारत में कभी जनमत संग्रह नहीं हुआ, फिर भी लोगों ने संविधान के प्रावधानों पर अमल करके उसे अपनाया। यही अप्रत्यक्ष सहमति है।
3. भाषा कठिन हो सकती है, पर मूल्य नहीं बदलते: यही वजह है कि हम इस विषय को पढ़ते हैं, ताकि नागरिक अपने अधिकार और सरकार की सीमाएँ समझ सकें। भाषा की कठिनाई संविधान के मूल्यों को अमान्य नहीं करती।
4. सबसे बड़ा कारण: संविधान सबको न्यूनतम तालमेल, सुरक्षा, स्वतंत्रता और एक साझी पहचान देता है। इसके बिना समाज में हर व्यक्ति असुरक्षित होगा, इसलिए इसका पालन अपनी ही सुरक्षा के लिए ज़रूरी है।
10 हरबंस, नेहा और नाजिमा के तीन पक्ष
प्र. संविधान के क्रिया-कलाप से जुड़े अनुभवों को लेकर एक चर्चा में तीन वक्ताओं ने तीन अलग-अलग पक्ष लिए:
(क) हरबंस: भारतीय संविधान एक लोकतांत्रिक ढाँचा प्रदान करने में सफल रहा है।
(ख) नेहा: संविधान में स्वतंत्रता, समता और भाईचारा सुनिश्चित करने का विधिवत् वादा है। चूँकि ऐसा नहीं हुआ इसलिए संविधान असफल है।
(ग) नाजिमा: संविधान असफल नहीं हुआ, हमने उसे असफल बनाया।
क्या आप इनमें से किसी पक्ष से सहमत हैं, यदि हाँ, तो क्यों? यदि नहीं, तो आप अपना पक्ष बतायें।
उत्तर: यह एक खुला प्रश्न है, अपने तर्क के साथ कोई भी संतुलित पक्ष लिखा जा सकता है। एक उदाहरण उत्तर:
हरबंस से आंशिक सहमति: भारतीय संविधान ने वाक़ई एक स्थिर लोकतांत्रिक ढाँचा दिया है, नियमित चुनाव, सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण, और शक्ति का बँटवारा इसके ठोस सबूत हैं।
नेहा से असहमति: संविधान ने वादे किए, यह सही है, पर ‘वादे पूरे न होने से संविधान असफल है’ कहना जल्दबाज़ी है। संविधान अपने आप पूर्ण न्याय स्थापित नहीं करता, वह सिर्फ़ न्याय पाने के लिए ढाँचा देता है। वादे अधूरे रहना संविधान की नहीं, उसे लागू करने वाली संस्थाओं और नेताओं की कमी को दिखाता है।
नाजिमा से सहमति: यही सबसे संतुलित पक्ष है। संविधान ने अपनी तरफ़ से ढाँचा, अधिकार और संस्थाएँ दीं, पर उन्हें ईमानदारी से चलाना नागरिकों और नेताओं का काम है। जहाँ स्वतंत्रता, समता और बंधुता अधूरी रह गई, वहाँ ज़िम्मेदारी उस दस्तावेज़ की नहीं, उसे लागू करने वालों की है।
11 पाठ के बीच के प्रश्न
अध्याय के बीच में भी कई प्रश्न पूछे गए हैं: हाशिये की टिप्पणियों में, ‘खुद करें-खुद सीखें’ में, ‘कार्टून बूझें’ में, ‘कहाँ पहुँचे? क्या समझे?’ में और एक उद्धरण के नीचे। इनके उत्तर नीचे उसी क्रम में दिए गए हैं जिस क्रम में ये पुस्तक में आते हैं, प्रश्न पुस्तक के अपने शब्दों में।
प्र. यह समूह तो बहुत कुछ हमारे गाँव के लोगों जैसा है। हाँ! यह तो हमारी कालोनी जैसा ही है। क्या आपके गाँव, शहर या कालोनी में भी ऐसे ही समूह हैं?
उत्तर. हाँ। हर गाँव, शहर या कालोनी में अलग-अलग धर्म, पेशे, आय और उम्र के लोग रहते हैं, और उनमें कई बातों पर मतभेद होते हैं: ज़मीन और पानी का बँटवारा कैसे हो, सड़क या पार्क पर कितना ख़र्च हो, हर बच्चे को स्कूल भेजना ज़रूरी हो या नहीं। फिर भी वे एक-दूसरे पर निर्भर हैं और उन्हें साथ रहना है। इसलिए उन्हें भी ऐसे बुनियादी नियम चाहिए जो सबको मालूम हों और लागू किए जा सकें। यही संविधान का पहला काम है: समाज के सदस्यों में न्यूनतम समन्वय और विश्वास बनाए रखना।
प्र. पुस्तक के इस भाग में दिये गये विचार का अपनी कक्षा में प्रयोग करें। कक्षा प्रतिनिधि का चुनाव कैसे हो, वह पूरी कक्षा की ओर से कौन-से निर्णय ले सकता है, कौन-से निर्णय पूरी कक्षा से परामर्श किये बिना नहीं ले सकता, और आवश्यकता पड़े तो इन निर्णयों को कैसे बदला जाए, यह तय करें। इन सभी निर्णयों को कागज़ पर लिख लें और नोटिस बोर्ड पर लगायें। इन निर्णयों को लेने में आपको किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा? क्या विभिन्न छात्रों में इस पर मतभेद था? उन मतभेदों को आपने कैसे सुलझाया? क्या इस प्रक्रिया से पूरी कक्षा को कुछ लाभ हुआ?
उत्तर. यह कक्षा में करने की गतिविधि है, इसलिए हर कक्षा अपने निर्णय ख़ुद लेगी। एक नमूना परिणाम: कक्षा प्रतिनिधि गुप्त मतदान से चुना जाए; वह सफ़ाई की बारी तय कर सकता है और शिक्षकों से कक्षा की ओर से बात कर सकता है, पर साझा पैसे ख़र्च करने या पिकनिक तय करने के लिए पूरी कक्षा की राय लेगा; किसी निर्णय को बदलने के लिए दो-तिहाई छात्रों की सहमति चाहिए। कठिनाई अक्सर पैसे जुटाने और पिकनिक पर आती है, क्योंकि सबकी क्षमता और पसंद अलग होती है। ऐसे मतभेद चर्चा और फिर मतदान से सुलझते हैं, और यह नियम भी बनता है कि जो पैसे न दे सके उसे बाहर न किया जाए। कक्षा को लाभ यह होता है कि उसका अपना छोटा-सा ‘संविधान’ बन जाता है: सबको नियम मालूम हैं, यह भी पता है कि निर्णय कौन लेगा और प्रतिनिधि की सीमाएँ क्या हैं। संविधान ठीक यही करता है।
प्र. यूरोपीय संघ के देशों ने एक यूरोपीय संविधान बनाने की कोशिश की। उनकी कोशिश असफल हो गई। कार्टूनिस्ट ने संविधान निर्माण के उनके प्रयास को मार-पीट और झगड़े से भरी कोशिश के रूप में देखा। क्या संविधान निर्माण की प्रक्रिया हमेशा ऐसी ही होती है?
उत्तर. नहीं, हमेशा ऐसा नहीं होता। संविधान बनाते समय मतभेद होना स्वाभाविक है, क्योंकि अलग-अलग हितों और मूल्यों वाले लोगों को बुनियादी नियमों पर सहमत होना पड़ता है। पर हर बार इसका नतीजा असफलता नहीं होता। भारत की संविधान सभा में भी कई गंभीर मतभेद थे, फिर भी सदस्यों ने तर्क के साथ बहस की, पूरे राष्ट्र के हित को ध्यान में रखा और सहमति तक पहुँचे। इसीलिए भारत का संविधान बना और आज तक टिका हुआ है।
प्र. ओह! तो इसका मतलब यह कि पहले आप एक राक्षस बनाएँ और फिर खुद को उससे बचाने की चिंता करें। मैं तो यही कहूँगा कि फिर इस राक्षस जैसी सरकार को बनाया ही क्यों जाए?
उत्तर. क्योंकि समाज सरकार के बिना नहीं चल सकता। अगर नियम बनाने और लागू करने वाली कोई सत्ता न हो, तो किसी को पता नहीं होगा कि दूसरे उसके साथ क्या कर सकते हैं, और समाज में न समन्वय रहेगा न सुरक्षा। इसलिए संविधान पहले सरकार बनाता है (उसका दूसरा काम), और फिर मौलिक अधिकारों के ज़रिए उस पर सीमाएँ लगाता है कि वह नागरिकों पर क्या लागू नहीं कर सकती (उसका तीसरा काम)। मक़सद ऐसी सरकार है जो व्यवस्था बनाए रखने और जनहित के काम करने लायक़ मज़बूत हो, पर जनता को नुक़सान पहुँचाने वाला ‘राक्षस’ न बन सके।
प्र. संविधान निर्माताओं को लोगों की अलग-अलग आकांक्षाओं से जूझना पड़ा। यहाँ पर नेहरू को अनेक भावी कल्पनाओं और विचारधाराओं में संतुलन करते दिखाया गया है। क्या आप पहचान सकते हैं कि ये विभिन्न समूह क्या चाहते हैं? आपको क्या लगता है? संतुलन करने का अंतिम परिणाम क्या हुआ?
उत्तर. कार्टून में नेहरू एक संचालक (कंडक्टर) की तरह दो समूहों के सामने खड़े हैं। एक समूह, वाद्य यंत्र लिए नेताओं का, ‘जन-गण-मन’ का झंडा लिए गा रहा है; दूसरा, एक बड़ी भीड़, ‘वंदे मातरम्’ का झंडा लिए गा रही है। ये राष्ट्र की अभिव्यक्ति के अलग-अलग विचारों के प्रतीक हैं। अंतिम परिणाम में किसी एक पक्ष को पूरी तरह हराया नहीं गया, दोनों को जगह दी गई: ‘जन-गण-मन’ राष्ट्रगान बना और ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगीत के रूप में बराबर सम्मान मिला। इसी तरह संविधान निर्माताओं ने अलग-अलग आकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की।
प्र. संविधान में अच्छी बातें लिखने में क्या जाता है? लेकिन ऐसी ऊँची आकांक्षाओं और लक्ष्यों को लिखने का मतलब क्या है यदि वे लोगों के जीवन को बदल न सकें?
उत्तर. लिखना आसान है, असली बात यह है कि लिखी हुई आकांक्षाएँ क्या संभव बनाती हैं। पहला, वे सरकार को सकारात्मक लोक-कल्याणकारी कदम उठाने की सामर्थ्य देती हैं, जैसे जाति-भेद मिटाने के कदम, और इनमें से कुछ कदम कानून की मदद से लागू भी किए जा सकते हैं। दूसरा, वे ऐसे लक्ष्य तय करती हैं जिनकी कसौटी पर जनता हर सरकार को परख सकती है और कदम उठाने की माँग कर सकती है। राज्य के नीति-निर्देशक तत्व भी सरकार से लोगों की कुछ आकांक्षाएँ पूरी करने की अपेक्षा करते हैं। इसलिए ये खोखले शब्द नहीं हैं, ये एक न्यायपूर्ण समाज के लिए परिस्थितियाँ बनाते हैं, हालाँकि जीवन में असली बदलाव इस पर भी निर्भर है कि इन्हें कितनी ईमानदारी से लागू किया जाता है।
प्र. इराक में सद्दाम हुसैन की सत्ता खत्म होने पर एक नए संविधान की रचना करने में देश के विभिन्न जातीय समूहों में काफी संघर्ष दिखाई दिया। इन भिन्न-भिन्न लोगों की क्या माँगें हैं? इसमें दिखाये गये संघर्ष की यूरोपीय संघ और भारत के संबंध में पिछले कार्टून में दिखाये संघर्ष से तुलना करें।
उत्तर. कार्टून में तीन लोग शिया, सुन्नी और कुर्द हैं, जो इराक के मुख्य जातीय-धार्मिक समूह हैं। कोई कलम, कोई कागज़ और कोई इंक लेकर कहता है कि संविधान मैं लिखूँगा, जबकि बगदाद का एक अधिकारी उम्मीद करता है कि अब हम जल्दी ही संविधान बना लेंगे। हर समूह की माँग यह है कि संविधान उसी की पहचान और हितों के अनुसार बने। यूरोपीय संघ वाले कार्टून में झगड़ा सदस्य देशों के बीच था और वह कोशिश असफल रही। भारत वाले कार्टून में मतभेद असली थे, पर उन्हें संतुलन और सबको जगह देकर सुलझाया गया। इराक का संघर्ष सबसे तीखा था, क्योंकि हर समूह दूसरों को जगह देने की बजाय अपनी बात थोपना चाहता था।
प्र. नीचे भारतीय और अन्य संविधानों के कुछ प्रावधान दिये गये हैं। बताएँ कि इनमें प्रत्येक प्रावधान का क्या कार्य है।
(i) सरकार किसी भी नागरिक को किसी धर्म का पालन करने या न करने की आज्ञा नहीं दे सकती। (पुस्तक में यह उत्तर उदाहरण के रूप में पहले से छपा है: “सरकार की शक्ति या सीमा”, यानी सरकार की शक्ति पर सीमा।)
(ii) सरकार को आय और संपत्ति की असमानता को कम करने का प्रयास अवश्य करना चाहिये।
(iii) राष्ट्रपति के पास प्रधानमंत्री को नियुक्त करने की शक्ति है।
(iv) संविधान वह सर्वोच्च कानून है जिसका सभी को पालन करना पड़ता है।
(v) भारतीय नागरिकता किसी खास नस्ल, जाति या धर्म तक सीमित नहीं है।
उत्तर.
(i) सरकार की शक्तियों पर सीमा लगाना।
(ii) सरकार को ऐसी क्षमता देना जिससे वह जनता की आकांक्षाएँ पूरी कर सके और एक न्यायपूर्ण समाज के लिए उचित परिस्थितियाँ बना सके।
(iii) निर्णय लेने की शक्ति तय करना: समाज में निर्णय लेने की शक्ति किसके पास होगी और सरकार कैसे बनेगी।
(iv) समन्वय और विश्वास: बुनियादी नियमों का ऐसा समूह जो सबको मालूम हो और सब पर लागू हो।
(v) राष्ट्र की बुनियादी पहचान व्यक्त करना: भारतीय संविधान नस्ल या जातीयता को नागरिकता का आधार नहीं मानता।
प्र. लोगों को जब यह पता चलता है कि उनका संविधान न्यायपूर्ण नहीं है तो वे क्या करते हैं? ऐसे लोगों का क्या होता है जिनका संविधान केवल कागज़ पर ही होता है?
उत्तर. अगर लोगों को लगे कि उनका संविधान न्यायपूर्ण नहीं है, तो उनके पास उसे मानने का कोई कारण नहीं बचता: वे उसके प्रति निष्ठा छोड़ देते हैं, विरोध और आंदोलन करते हैं और नए या बदले हुए संविधान की माँग करते हैं, जैसे नेपाल में जन-आंदोलन ने चुनी हुई संविधान सभा की माँग उठाई। जिन लोगों का संविधान केवल कागज़ पर होता है, उनके जीवन पर उसका कोई असर नहीं पड़ता: उनके अधिकार सुरक्षित नहीं रहते, सत्ता कुछ लोगों के हाथ में रहती है, अक्सर सैनिक या अलोकप्रिय नेताओं के, और उन्हें वह सुरक्षा और आज़ादी नहीं मिलती जिसका वादा दस्तावेज़ में किया गया है।
प्र. आप इस विचार को प्रयोग में लाएँ। स्वयं अपने से यह प्रश्न पूछिये : समाज के कुछ बुनियादी नियमों में ऐसी कौन-सी चीज़ें होनी चाहिए जिनसे सभी लोगों को उन्हें मानने का एक कारण मिल सके?
उत्तर. ऐसे नियमों को हर सदस्य की स्वतंत्रता और समानता की रक्षा करनी होगी। वे सबको बुनियादी अधिकार दें, ताकि कोई स्थायी बहुमत अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न न कर सके; कानून के सामने सबको बराबर मानें और कुछ लोगों को दूसरों की क़ीमत पर सुनियोजित ढंग से विशेष सुविधा न दें; किसी छोटे समूह को अपनी शक्ति स्थायी रूप से मज़बूत करने न दें; और अलग-अलग समूहों की पहचान का सम्मान करें। अध्याय के अनुसार कोई संविधान अपने सभी नागरिकों की स्वतंत्रता और समानता की जितनी अधिक सुरक्षा करता है, उसकी सफलता की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है।
प्र. कार्टून बनाने वाले ने नये इराकी संविधान को ‘ताश के पत्तों का महल’ क्यों कहा? क्या यह वर्णन भारतीय संविधान पर लागू होगा?
उत्तर. ताश के पत्तों का महल इमारत जैसा दिखता है, पर हल्के से धक्के से गिर जाता है। कार्टूनिस्ट का इशारा है कि इराकी संविधान जातीय समूहों के तीखे संघर्ष के बीच, बिना असली आम सहमति के बना, इसलिए वह कमज़ोर था और आसानी से बिखर सकता था। यह वर्णन भारतीय संविधान पर लागू नहीं होता। इसे ऐसे नेताओं ने बनाया जिनमें समाज का अटूट विश्वास था, यह लंबे विचार-विमर्श के बाद बना और इसके पीछे राष्ट्रीय आंदोलन से मिली आम सहमति थी। यह शक्ति को सूझबूझ से बाँटता है और कठोरता व लचीलेपन में संतुलन रखता है, इसलिए यह एक ‘जीवंत दस्तावेज़’ के रूप में टिका हुआ है।
प्र. क्या आपकी कक्षा में स्वतंत्रता, समता और बंधुता के सिद्धांतों को व्यवहार में लाया जाता है? इनको एक साथ कैसे व्यवहार में ला सकते हैं? अपने साथियों के साथ चर्चा कीजिए।
उत्तर. इसका उत्तर आपकी अपनी कक्षा के अनुभव पर आधारित होगा। उदाहरण के लिए: स्वतंत्रता तब है जब हर छात्र प्रश्न पूछ सके और अपनी राय रख सके; समता तब जब जाति, धर्म, लिंग या धन के भेद के बिना सबके साथ एक जैसा व्यवहार हो; बंधुता तब जब छात्र एक-दूसरे की मदद करें। ये तीनों साथ-साथ ही चल सकते हैं, जैसा डॉ. अंबेडकर ने कहा: समताविहीन स्वतंत्रता कुछ लोगों को बाक़ी पर प्रभुता देगी, स्वतंत्रताविहीन समता व्यक्तिगत पहल को नष्ट कर देगी, और बंधुता के बिना दोनों अपना स्वाभाविक मार्ग नहीं पकड़ सकते। इसलिए कक्षा को एक साथ सबको बोलने का मौक़ा, सब पर एक जैसे नियम और आपसी सहयोग की भावना, तीनों अपनानी होंगी।
प्र. यदि भारत की संविधान सभा देश के सभी लोगों के द्वारा निर्वाचित होती तो क्या होता? क्या वह उस संविधान सभा से भिन्न होती जो बनाई गई?
उत्तर. तब उसकी वैधता और भी अधिक होती, क्योंकि हर वयस्क ने सीधे उसके सदस्य चुने होते। संभव है उसमें ज़्यादा महिलाएँ, ज़्यादा ग़रीब लोग, अलग-अलग क्षेत्रों और समूहों के ज़्यादा प्रतिनिधि, और कांग्रेस के बाहर के ज़्यादा सदस्य होते। पर उसका बुनियादी दृष्टिकोण शायद बहुत अलग नहीं होता: सभा को प्रतिनिधिक बनाने की गंभीर कोशिश पहले ही हुई थी, कांग्रेस ख़ुद लगभग हर विचारधारा को साथ लेकर चलती थी, और मुख्य सिद्धांत राष्ट्रीय आंदोलन में पहले ही गढ़े जा चुके थे, जिसे जनता का व्यापक समर्थन प्राप्त था।
प्र. यदि हमें 1937 में स्वतंत्रता मिल जाती तो क्या होता? हमें 1957 तक इंतज़ार करना पड़ता तो क्या होता? क्या तब बनाया गया संविधान हमारे वर्तमान संविधान से भिन्न होता?
उत्तर. शायद कुछ मामलों में हाँ। 1937 तक राष्ट्रीय आंदोलन ने वे सारे सिद्धांत पूरी तरह तय नहीं किए थे जो बाद में संविधान सभा में लाए गए, और 1946 का उद्देश्य-प्रस्ताव भी नहीं था, इसलिए संविधान का दृष्टिकोण कुछ सीमित हो सकता था। 1957 तक इंतज़ार करना पड़ता, तो विभाजन और उसकी हिंसा का अनुभव, जिसने निर्माताओं को ऐसी नागरिकता की ओर मोड़ा जिसमें धार्मिक पहचान का अधिकारों से कोई संबंध न हो, शायद अलग ढंग से सामने आता, और नई समस्याएँ और विचार संविधान को आकार देते। ब्योरे समय के साथ बदल सकते थे, पर आज़ादी की लड़ाई में गढ़े गए बुनियादी मूल्य शायद वही रहते।
प्र. क्या यह संविधान उधार का था? हम ऐसा संविधान क्यों नहीं बना सके जिसमें कहीं से कुछ भी उधार न लिया गया हो?
उत्तर. नहीं, यह उधार का संविधान नहीं था। निर्माताओं ने ब्रिटेन, अमेरिका, आयरलैंड, फ्रांस और कनाडा से विचार लिए, पर यह अंधी नक़ल नहीं थी: हर प्रावधान को इस आधार पर उचित सिद्ध करना था कि वह भारत की समस्याओं और आशाओं के अनुरूप है, और उसे भारत के हिसाब से ढाला गया। कुछ भी उधार न लेने का मतलब होता दूसरे देशों के प्रयोगों से मिली सीख को बिना कारण नज़रअंदाज़ करना। जैसा डॉ. अंबेडकर ने कहा, आज इस समय बनाये संविधान में यदि कुछ नया हो सकता है तो वह यह कि उसमें केवल कुछ ऐसे परिवर्तन किये जाएँ जो कमियों को दूर करें और उसे देश की आवश्यकताओं के अनुरूप बना सकें।