Class 12 Geography Chapter 14 Notes in Hindi: भारत के संदर्भ में नियोजन और सततपोषणीय विकास

अध्याय मानचित्र: सब कुछ कैसे जुड़ा है
1 · भारत में नियोजनखंडीय बनाम प्रादेशिक नियोजन; नीति आयोग (2015) ने योजना आयोग का स्थान लिया
2 · लक्ष्य क्षेत्र नियोजनपर्वतीय क्षेत्र विकास और सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम
3 · केस अध्ययन: समन्वित जनजातीय विकास परियोजना, भरमौरहिमाचल प्रदेश के गद्दी समुदाय के लिए एक लक्ष्य-क्षेत्र योजना
नियोजन और
सततपोषणीय
विकास
4 · विकास और सततपोषणीय विकासGNP वृद्धि से लेकर ब्रंटलैंड रिपोर्ट (1987) तक
5 · केस अध्ययन: इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्रराजस्थान का मरुस्थल बदला, पर एक कीमत पर
6 · सततपोषणीय विकास को बढ़ावा देने के उपायनहर कमान क्षेत्र को सतत बनाए रखने के सात उपाय
इस अध्याय में आप क्या सीखेंगे
  • खंडीय और प्रादेशिक नियोजन में अंतर, और योजना आयोग की जगह नीति आयोग क्यों आया
  • लक्ष्य क्षेत्र और लक्ष्य समूह नियोजन क्या हैं, पर्वतीय क्षेत्र और सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रमों के साथ
  • समन्वित जनजातीय विकास परियोजना के तहत भरमौर जनजातीय क्षेत्र का विकास कैसे हुआ
  • “विकास” का विचार शुद्ध आर्थिक वृद्धि से सततपोषणीय विकास तक कैसे बढ़ा
  • इंदिरा गांधी नहर की कहानी: इसने मरुस्थल को कैसे बदला, और इससे पैदा हुई पर्यावरणीय समस्याएँ
  • इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र को सतत बनाए रखने के लिए ज़रूरी सात उपाय
खंडीय नियोजनप्रादेशिक नियोजननीति आयोगलक्ष्य क्षेत्रलक्ष्य समूहपर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रमसूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रमआई-टी-डी-पीगद्दीसततपोषणीय विकासब्रंटलैंड रिपोर्टइंदिरा गांधी नहरजलाक्रांततामृदा लवणता

1 भारत में नियोजन

नियोजन का अर्थ है किसी समस्या के बारे में सोच-विचार करना, एक योजना या कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करना, और फिर लक्ष्य प्राप्त करने के लिए क्रियाओं को क्रियान्वित करना। इस अध्याय में इसका प्रयोग विशेष रूप से आर्थिक विकास नियोजन के लिए किया गया है, जो एक सोची-समझी प्रक्रिया है, न कि सुधार और पुनर्निर्माण की पुरानी “तीर-तुक्का” (हिट-एंड-ट्रायल) पद्धति।

याद रखेंपरिभाषा 1

नियोजन सोचने, एक योजना या कार्यक्रम तैयार करने और लक्ष्य प्राप्ति के लिए क्रियाओं को क्रियान्वित करने की प्रक्रिया है, यहाँ लक्ष्य है आर्थिक विकास।

नियोजन के दो व्यापक उपागम होते हैं:

खंडीय नियोजन

  • अर्थव्यवस्था के किसी एक सेक्टर (खंड) के विकास के लिए कार्यक्रम बनाना और लागू करना
  • उदाहरण सेक्टर: कृषि, सिंचाई, विनिर्माण, ऊर्जा, निर्माण, परिवहन, संचार, सामाजिक अवसंरचना और सेवाएँ

प्रादेशिक नियोजन

  • विकास कभी भी स्थान पर एक समान नहीं होता: कुछ क्षेत्र तेज़ी से विकसित होते हैं, कुछ पिछड़ जाते हैं
  • नियोजक एक स्थानिक दृष्टिकोण अपनाते हैं और इस प्रादेशिक असंतुलन को कम करने के लिए योजनाएँ बनाते हैं

1.1 योजना आयोग से नीति आयोग तक

स्वतंत्रता के बाद भारत ने केंद्रीकृत नियोजन अपनाया। धीरे-धीरे यह विकेंद्रीकृत, बहुस्तरीय नियोजन की ओर बढ़ा, जिसमें योजना निर्माण की ज़िम्मेदारी केंद्र, राज्य और जिला स्तर पर बाँटी गई। इसकी ज़िम्मेदारी योजना आयोग की थी।

परीक्षा संकेत

इस भाग से सबसे संभावित एक-पंक्ति तथ्य: 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग का स्थान नीति आयोग (नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) ने ले लिया। नीति आयोग का काम है आर्थिक नीति निर्माण में राज्यों की भागीदारी सुनिश्चित करना और केंद्र व राज्य सरकारों को युक्तिगत तथा तकनीकी सलाह देना।

2 लक्ष्य क्षेत्र नियोजन

लगभग डेढ़ दशक के नियोजन अनुभव से यह पता चला कि आर्थिक विकास में क्षेत्रीय असंतुलन और बढ़ता ही जा रहा था। कभी-कभी संसाधनों से भरपूर क्षेत्र भी पिछड़ा रह जाता है, क्योंकि विकास के लिए संसाधनों के साथ-साथ तकनीक और निवेश भी चाहिए। इसे ठीक करने के लिए योजना आयोग ने दो नए उपागम प्रस्तुत किए: लक्ष्य क्षेत्र उपागम और लक्ष्य समूह उपागम।

याद रखेंपरिभाषा 2

लक्ष्य क्षेत्र नियोजन किसी विशेष पिछड़े क्षेत्र पर विकास कार्यक्रमों को केंद्रित करता है। लक्ष्य समूह नियोजन किसी विशेष पिछड़े लोगों के समूह पर कार्यक्रमों को केंद्रित करता है, चाहे वे कहीं भी रहते हों।

उपागम किस पर लक्षित अध्याय में दिए उदाहरण
लक्ष्य क्षेत्र पिछड़ा क्षेत्र कमान क्षेत्र विकास कार्यक्रम, सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम, मरुस्थल विकास कार्यक्रम, पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम
लक्ष्य समूह पिछड़ा लोगों का समूह लघु कृषक विकास संस्था (SFDA), सीमांत किसान विकास संस्था (MFDA)

आठवीं पंचवर्षीय योजना में पर्वतीय क्षेत्रों, उत्तर-पूर्वी राज्यों, जनजातीय क्षेत्रों और अन्य पिछड़े क्षेत्रों में अवसंरचना विकसित करने के लिए विशिष्ट क्षेत्र कार्यक्रम बनाए गए।

2.1 पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम

पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में शुरू हुआ यह कार्यक्रम 15 पर्वतीय जिलों में लागू हुआ: उत्तर प्रदेश (अब उत्तराखंड) के सभी पर्वतीय जिले, असम की मिकिर पहाड़ी और उत्तरी कछार की पहाड़ियाँ, पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग जिला, और तमिलनाडु का नीलगिरी जिला। 1981 में पिछड़े क्षेत्रों पर राष्ट्रीय समिति ने सिफ़ारिश की कि 600 मीटर से अधिक ऊँचाई वाला और जनजातीय उप-योजना में शामिल न होने वाला कोई भी पर्वतीय क्षेत्र पिछड़ा पर्वतीय क्षेत्र माना जाए।

ये कार्यक्रम बागवानी, रोपण कृषि, पशुपालन, मुर्गी पालन, वानिकी तथा लघु एवं ग्रामीण उद्योगों का विकास करके पर्वतीय क्षेत्रों के अपने ही संसाधनों का उपयोग करने के उद्देश्य से बनाए गए।

2.2 सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP)

यह कार्यक्रम चौथी पंचवर्षीय योजना में सूखा संभावी क्षेत्रों के लोगों को रोज़गार देने और उत्पादक संपत्तियाँ बनाने के उद्देश्य से शुरू हुआ। शुरुआत में इसमें श्रम-प्रधान सिविल निर्माण कार्यों पर बल था, बाद में यह सिंचाई परियोजनाओं, भूमि विकास, वनीकरण, चरागाह विकास और बुनियादी ग्रामीण अवसंरचना यानी बिजली, सड़क, बाज़ार और ऋण सुविधाओं की ओर मुड़ गया।

पिछड़े क्षेत्रों के विकास की राष्ट्रीय समिति की समीक्षा में पाया गया कि यह कार्यक्रम केवल कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों तक ही सीमित रह गया था। बढ़ती जनसंख्या लोगों को सीमांत भूमि पर धकेल रही है, जिससे पारिस्थितिकीय निम्नीकरण हो रहा है, इसलिए समीक्षा में सूखा संभावी क्षेत्रों में वैकल्पिक रोज़गार और सूक्ष्म-स्तर पर समन्वित जल-संभर विकास उपागम अपनाने की बात कही गई, ताकि जल, मिट्टी, पौधों तथा मानव व पशु जनसंख्या के बीच संतुलन फिर से स्थापित हो सके।

सूखा संभावी क्षेत्रों की पहचान कैसे हुई
योजना आयोग (1967): 67 जिले  →  सिंचाई आयोग (1972): 30% सिंचित-क्षेत्र मापदंड
इन दोनों ने मिलकर तय किया कि भारत में कौन-से जिले सूखा संभावी माने जाएँ।

मोटे तौर पर, भारत का सूखा संभावी क्षेत्र राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र, आंध्र प्रदेश के रायलसीमा और तेलंगाना पठार, कर्नाटक पठार, और तमिलनाडु के आंतरिक उच्च भूमि क्षेत्रों के शुष्क और अर्ध-शुष्क भागों में फैला है। पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान इसी पेटी में होते हुए भी सिंचाई के प्रसार के कारण काफ़ी हद तक सूखे से बचे रहते हैं।

3 केस अध्ययन: समन्वित जनजातीय विकास परियोजना, भरमौर

भरमौर एक जीवंत उदाहरण है लक्ष्य-क्षेत्र नियोजन का: एक वास्तविक जनजातीय क्षेत्र, जिसे एक वास्तविक योजना के तहत विकसित किया गया।

तथ्य विवरण
स्थान भरमौर और होली तहसील, चंबा जिला, हिमाचल प्रदेश
अक्षांश-देशांतर / क्षेत्रफल 32°11′ उत्तर-32°41′ उत्तर, 76°22′ पूर्व-76°53′ पूर्व; लगभग 1,818 वर्ग किमी; समुद्र तल से 1,500-3,700 मीटर ऊँचाई
घिरा हुआ है पीर पंजाल (उत्तर में) और धौलाधार (दक्षिण में), जो रोहतांग दर्रे के पास मिलती हैं
अपवाह रावी नदी और उसकी सहायक नदियाँ बुढ़ील और टुंडेन, जो क्षेत्र को चार भागों में बाँटती हैं: होली, खणी, कुगती, तुंदाह
जलवायु औसत तापमान जनवरी में 4°C, जुलाई में 26°C; सर्दियों में कड़ाके की ठंड और बर्फबारी
अधिसूचित जनजातीय क्षेत्र 21 नवंबर 1975 से
लोग गद्दी जनजाति, जो ऋतु-प्रवास (transhumance) करते हैं और गद्दीयाली भाषा बोलते हैं
2011 जनगणना जनसंख्या 39,113; घनत्व 21 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी; हिमाचल प्रदेश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में से एक
अर्थव्यवस्था जीविका कृषि और भेड़-बकरी पालन

गद्दियों को अनुसूचित जनजातियों में शामिल किए जाने के बाद 1970 के दशक में यहाँ विकास शुरू हुआ। पाँचवीं पंचवर्षीय योजना के तहत 1974 में एक जनजातीय उप-योजना शुरू की गई, और भरमौर हिमाचल प्रदेश की पाँच समन्वित जनजातीय विकास परियोजनाओं (आई-टी-डी-पी) में से एक बना। इस योजना में परिवहन व संचार, कृषि व उससे जुड़ी क्रियाओं, तथा सामाजिक व सामुदायिक सेवाओं को सर्वाधिक प्राथमिकता दी गई।

परीक्षा संकेत

“भरमौर में आई-टी-डी-पी के सामाजिक लाभ” वाला 30-शब्दों का प्रश्न सीधे किताब से पूछा जाता है। तीन तथ्यों से उत्तर दें: साक्षरता तेज़ी से बढ़ी, स्त्री साक्षरता 1971 में 1.88% से बढ़कर 2011 में 65% हुई, और बाल-विवाह में कमी आई।

आई-टी-डी-पी से क्या मिला

  • अवसंरचना: विद्यालय, स्वास्थ्य सुविधाएँ, पेयजल, सड़कें, संचार, विद्युत
  • साक्षरता में तेज़ वृद्धि; स्त्री साक्षरता 1.88% (1971) → 65% (2011)
  • साक्षरता में लिंग अंतर घटा; बाल-विवाह में कमी
  • 20वीं सदी के अंतिम तीन दशकों में दालों और नकदी फ़सलों की खेती बढ़ी

अभी क्या बाकी है

  • लाभ मुख्यतः रावी नदी के किनारे बसे होली और खणी के गाँवों तक सीमित रहा
  • तुंदाह और कुगती के दूरदराज़ गाँव अभी भी पर्याप्त अवसंरचना से वंचित हैं
  • खेती अभी भी परंपरागत तकनीकों से होती है
  • पशुचारण घट रहा है: अब केवल लगभग हर दस में से एक परिवार ही ऋतु-प्रवास करता है

फिर भी गद्दी जनजाति बहुत गतिशील बनी हुई है: इनका एक बड़ा हिस्सा हर शरद ऋतु में मज़दूरी से आजीविका कमाने के लिए कांगड़ा और आसपास के क्षेत्रों में प्रवास करता है।

4 विकास और सततपोषणीय विकास

“विकास” शब्द समाज की स्थिति और उसमें आने वाले परिवर्तन, दोनों को बताता है। मानव इतिहास के अधिकांश समय यह स्थिति समाज और उसके जैव-भौतिक पर्यावरण के बीच अंतःक्रिया से तय होती रही है, जो समाज की तकनीक के स्तर और उसकी संस्थाओं पर निर्भर करती है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बादविकास = आर्थिक वृद्धि, जिसे बढ़ते सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) और प्रति व्यक्ति आय/उपभोग से मापा जाता था
1970 के दशक मेंअसमान वितरण के कारण उच्च वृद्धि वाले देशों में भी गरीबी बढ़ी, इसलिए परिभाषा में “पुनर्वितरण के साथ वृद्धि” और “वृद्धि और समानता” जैसे वाक्यांश जुड़े
1980 के दशक तकविकास एक बहु-आयामी संकल्पना बन गया: कल्याण, जीवन स्तर, स्वास्थ्य, शिक्षा, समान अवसर, राजनीतिक व नागरिक अधिकार, समाज के सभी लोगों के लिए
1960 के दशक के अंत सेपश्चिमी दुनिया में बढ़ती पर्यावरणीय जागरूकता से “सततपोषणीय विकास” का विचार जन्मा
याद रखेंपरिभाषा 3

सततपोषणीय विकास वह विकास है “जिसमें भविष्य में आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकता-पूर्ति को प्रभावित किए बिना वर्तमान पीढ़ी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करती है”, यह परिभाषा ब्रंटलैंड रिपोर्ट (1987) ने दी है।

दो पुस्तकों ने पर्यावरण को लेकर विश्व-व्यापी चिंता बढ़ाई: एहरलिच की द पॉपुलेशन बम (1968) और मीडोस व अन्य की द लिमिट्स टू ग्रोथ (1972)। बढ़ती वैश्विक चिंता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व पर्यावरण और विकास आयोग (WCED) की स्थापना की, जिसकी अध्यक्ष नॉर्वे की प्रधानमंत्री गरो हरलेम ब्रंटलैंड थीं। इसकी 1987 की रिपोर्ट, जिसे ब्रंटलैंड रिपोर्ट कहा जाता है, का शीर्षक था अवर कॉमन फ़्यूचर

याद रखने की तरकीब

“1968 की समस्या-पुस्तकें, 1987 की समाधान-रिपोर्ट।”

एहरलिच (1968) और मीडोस (1972) ने समस्या बताई; ब्रंटलैंड रिपोर्ट (1987) ने जवाब दिया: सततपोषणीय विकास की वह परिभाषा जो आज भी उपयोग होती है।

सततपोषणीय विकास विकास के पारिस्थितिकीय, सामाजिक और आर्थिक पहलुओं का एक साथ ध्यान रखता है। यह संसाधनों का संरक्षण करता है ताकि भविष्य की पीढ़ियाँ भी उनका उपयोग कर सकें, और पूरी मानवजाति को एक साझे भविष्य के रूप में देखता है।

5 केस अध्ययन: इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र

इंदिरा गांधी नहर, जिसे पहले राजस्थान नहर कहा जाता था, भारत के सबसे बड़े नहर तंत्रों में से एक है और अध्याय का अपना उदाहरण है सततपोषणीय विकास के, जिसमें इसके लाभ और इसकी कीमत दोनों दिखते हैं।

1948कँवर सेन द्वारा संकल्पित
31 मार्च 1958परियोजना का शुभारंभ
1960 के दशक के आरंभ मेंचरण-I कमान क्षेत्र में सिंचाई शुरू
1980 के दशक के मध्य मेंचरण-II कमान क्षेत्र में सिंचाई शुरू

यह नहर पंजाब में हरिके बाँध से निकलती है और राजस्थान के थार मरुस्थल (मरुस्थली) से होकर पाकिस्तान सीमा के लगभग समानांतर, औसतन 40 किमी की दूरी पर बहती है। इसकी कुल नियोजित लंबाई 9,060 किमी है, जो 19.63 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य कमान क्षेत्र को सिंचाई सुविधा देती है, इसका लगभग 70% प्रवाह प्रणाली से और शेष लिफ़्ट प्रणाली से (सभी लिफ़्ट नहरें मुख्य नहर के बाएँ किनारे से निकलती हैं; दाएँ किनारे की नहरें प्रवाह नहरें हैं)।

चित्र 1: इंदिरा गांधी नहर का चरण-II, चरण-I के कृषि योग्य क्षेत्र से दोगुने से भी अधिक क्षेत्र को सींचता है, पर यह क्षेत्र कहीं अधिक कठोर मरुस्थली भूभाग है, जहाँ बालू के टिब्बे खिसकते हैं और गर्मियों में तापमान 50°C तक पहुँच जाता है।
चित्र 1: इंदिरा गांधी नहर का चरण-II, चरण-I के कृषि योग्य क्षेत्र से दोगुने से भी अधिक क्षेत्र को सींचता है, पर यह क्षेत्र कहीं अधिक कठोर मरुस्थली भूभाग है, जहाँ बालू के टिब्बे खिसकते हैं और गर्मियों में तापमान 50°C तक पहुँच जाता है।
चरण-I चरण-II
जिले गंगानगर, हनुमानगढ़, उत्तरी बीकानेर बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, नागौर, चुरू
भूभाग हल्का ऊबड़-खाबड़ खिसकते बालू टिब्बों वाला मरुस्थल; गर्मियों में 50°C तक
कमान क्षेत्र 5.53 लाख हेक्टेयर 14.10 लाख हेक्टेयर
सिंचाई का आरंभ 1960 के दशक के आरंभ में 1980 के दशक के मध्य में

नहर सिंचाई ने इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी, अर्थव्यवस्था और समाज को बदल दिया, अच्छे और बुरे, दोनों तरह से।

सकारात्मक प्रभाव

  • मृदा नमी लंबे समय तक उपलब्ध रही
  • वनीकरण और चरागाह विकास कार्यक्रमों से भूमि हरी-भरी हुई
  • वायु अपरदन और नहरी बालू निक्षेप में कमी
  • कृषि क्षेत्र और फ़सल सघनता में वृद्धि

नकारात्मक प्रभाव

  • सघन सिंचाई और अत्यधिक जल-उपयोग से जलाक्रांतता (waterlogging)
  • और मृदा लवणता
  • दोनों इस क्षेत्र में कृषि की दीर्घकालिक सततपोषणता को खतरे में डालते हैं
आम ग़लती

छात्र अक्सर इस केस अध्ययन में केवल “सिंचाई से फ़सल उत्पादन बढ़ा” लिखकर रुक जाते हैं। किताब का असली बिंदु है सततपोषणता: सघन सिंचाई से शुरुआत में कृषि और पशुधन उत्पादकता में तेज़ वृद्धि हुई, लेकिन उसी सघन सिंचाई ने जलाक्रांतता और मृदा लवणता भी पैदा की, यानी लाभ और समस्या, दोनों का कारण एक ही है।

मृदा नमी, जो कभी यहाँ फ़सलों के लिए सीमाकारी कारक थी, अब कम नहीं है, इसलिए चना, बाजरा और ज्वार जैसी परंपरागत फ़सलों का स्थान अब पानी की अधिक माँग वाली फ़सलों: गेहूँ, कपास, मूँगफली और चावल, ने ले लिया है।

6 सततपोषणीय विकास को बढ़ावा देने के उपाय

विद्वानों ने इंदिरा गांधी नहर परियोजना की पारिस्थितिकीय सततपोषणता पर सवाल उठाए हैं, और पिछले चार दशकों में हुए विकास ने, अपने निम्नीकृत भौतिक पर्यावरण के साथ, इन सवालों को काफ़ी हद तक सही साबित किया है। किताब में इस कमान क्षेत्र में सततपोषणीय विकास को बढ़ावा देने के सात उपाय सुझाए गए हैं; इनमें से पाँच सीधे पारिस्थितिकीय संतुलन बहाल करने पर केंद्रित हैं।

1

जल प्रबंधन नीति

कठोरता से लागू करना: चरण-I में रक्षण सिंचाई, चरण-II में विस्तारित सिंचाई और चरागाह विकास

2

शस्य प्रतिरूप

जल-सघन फ़सलों से बचना; खट्टे फलों जैसी बागाती फ़सलों को बढ़ावा देना

3

कमान क्षेत्र विकास कार्यक्रम

नालों की पक्की परत, भूमि विकास व समतलन, और वारबंदी (एक आउटलेट के कमान क्षेत्र में नहर के जल का समान वितरण) से बहते जल की क्षति कम करना

4

पुनरूद्धार

जलाक्रांतता और मृदा लवणता से प्रभावित क्षेत्रों का पुनरूद्धार

5

पारितंत्र-विकास

वनीकरण, रक्षक मेखला रोपण और चरागाह विकास, विशेषकर चरण-II के भंगुर पर्यावरण में आवश्यक

6

सामाजिक सततपोषणता

निर्धन आर्थिक स्थिति वाले भूआवंटियों को पर्याप्त वित्तीय व संस्थागत सहायता

7

आर्थिक सततपोषणता

केवल कृषि व पशुपालन से आगे विविधीकरण; मूल गाँवों, कृषि-सेवा केंद्रों और मंडी कस्बों के बीच प्रकार्यात्मक संबंध बनाना

याद रखेंपरिभाषा 4

वारबंदी एक आउटलेट के कमान क्षेत्र में सभी उपयोगकर्ताओं के बीच नहर के जल के समान वितरण की व्यवस्था है, ताकि नहर के किनारे किसी भी किसान को उसके उचित हिस्से से कम या ज़्यादा पानी न मिले।

क्या आप जानते हैं?

इंदिरा गांधी नहर की सात सततपोषणता उपायों में से पाँच, अधिक फ़सल उगाने के बारे में नहीं बल्कि पारिस्थितिकी बहाल करने के बारे में हैं। यह सीधा संकेत है कि नहर की अपनी सफलता ने ही वह समस्या पैदा की, जिसे अब ये उपाय ठीक कर रहे हैं।

सभी परिभाषाएँ एक जगह
नियोजनसोचने, एक योजना तैयार करने और लक्ष्य प्राप्ति के लिए क्रियाओं को क्रियान्वित करने की प्रक्रिया, यहाँ लक्ष्य है आर्थिक विकास
खंडीय नियोजनअर्थव्यवस्था के किसी एक सेक्टर के विकास के लिए कार्यक्रम
प्रादेशिक नियोजनक्षेत्रों के बीच असंतुलन कम करने के उद्देश्य से स्थानिक दृष्टिकोण वाली योजनाएँ
लक्ष्य क्षेत्र नियोजनकिसी विशेष पिछड़े क्षेत्र पर केंद्रित कार्यक्रम
लक्ष्य समूह नियोजनकिसी विशेष पिछड़े समूह पर केंद्रित कार्यक्रम
सततपोषणीय विकासवह विकास जो भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकता-पूर्ति की क्षमता को प्रभावित किए बिना वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करे (ब्रंटलैंड रिपोर्ट, 1987)
वारबंदीएक आउटलेट के कमान क्षेत्र में सभी उपयोगकर्ताओं के बीच नहर के जल का समान वितरण
त्वरित पुनरावलोकन: परीक्षा से एक रात पहले यह पढ़ें
  • 1 जनवरी 2015 को नीति आयोग ने योजना आयोग का स्थान लिया
  • दो नियोजन उपागम: खंडीय (सेक्टर के अनुसार) और प्रादेशिक (स्थानिक, क्षेत्रीय असंतुलन कम करने के लिए)
  • लक्ष्य क्षेत्र कार्यक्रम: कमान क्षेत्र विकास, सूखा संभावी क्षेत्र, मरुस्थल विकास, पर्वतीय क्षेत्र विकास; लक्ष्य समूह: SFDA, MFDA
  • पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम: 5वीं पंचवर्षीय योजना, 15 जिले, पिछड़ा पर्वतीय क्षेत्र = 600 मीटर से अधिक (1981 का मापदंड)
  • सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम: 4थी पंचवर्षीय योजना; 67 जिले (योजना आयोग, 1967); 30% सिंचाई मापदंड (सिंचाई आयोग, 1972)
  • भरमौर आई-टी-डी-पी: गद्दी जनजाति, चंबा जिला हिमाचल प्रदेश, जनजातीय उप-योजना 1974 से, 5वीं पंचवर्षीय योजना; स्त्री साक्षरता 1.88% (1971) से 65% (2011)
  • विकास GNP वृद्धि (द्वितीय विश्व युद्ध के बाद) से पुनर्वितरण व समानता (1970 का दशक) होते हुए बहु-आयामी कल्याण (1980 का दशक) तक बढ़ा
  • सततपोषणीय विकास को ब्रंटलैंड रिपोर्ट, “अवर कॉमन फ़्यूचर” (1987) ने परिभाषित किया, अध्यक्ष गरो हरलेम ब्रंटलैंड
  • इंदिरा गांधी नहर: कँवर सेन द्वारा संकल्पित (1948), 1958 में शुभारंभ, हरिके बाँध से; 9,060 किमी, 19.63 लाख हेक्टेयर कमान क्षेत्र
  • नहर सिंचाई ने मरुस्थल बदला पर जलाक्रांतता और मृदा लवणता भी पैदा की; 7 उपाय सुझाए गए, इनमें से 5 पारिस्थितिकीय हैं
परीक्षा से पहले स्वयं जाँचें
  • क्या मैं खंडीय और प्रादेशिक नियोजन का अंतर समझा सकता हूँ?
  • क्या मैं चारों लक्ष्य-क्षेत्र कार्यक्रम और दोनों लक्ष्य-समूह संस्थाओं के नाम बता सकता हूँ?
  • क्या मैं ब्रंटलैंड रिपोर्ट की सततपोषणीय विकास की परिभाषा शब्दशः बता सकता हूँ?
  • क्या मैं इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र में सततपोषणीय विकास के सातों उपाय गिना सकता हूँ?
बहुविकल्पीय प्रश्न
  1. 1 अंकप्रादेशिक नियोजन का संबंध है:
    (क) अर्थव्यवस्था के विभिन्न सेक्टरों का विकास(ख) क्षेत्र-विशेष का विकास उपागम
    (ग) परिवहन तंत्र में क्षेत्रीय अंतर(घ) ग्रामीण क्षेत्रों का विकास
  2. 1 अंकआई-टी-डी-पी किसे कहते हैं?
    (क) समन्वित पर्यटन विकास कार्यक्रम(ख) समन्वित यात्रा विकास कार्यक्रम
    (ग) समन्वित जनजातीय विकास कार्यक्रम(घ) समन्वित परिवहन विकास कार्यक्रम
  3. 1 अंकइंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र में सततपोषणीय विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारक कौन-सा है?
    (क) कृषि विकास(ख) पारितंत्र-विकास
    (ग) परिवहन विकास(घ) भूमि उपनिवेशन
  4. 1 अंकयोजना आयोग का स्थान नीति आयोग ने कब लिया?
    (क) 26 जनवरी 2015(ख) 15 अगस्त 2014
    (ग) 1 जनवरी 2015(घ) 1 अप्रैल 2015
  5. 1 अंकपर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम किस पंचवर्षीय योजना में शुरू हुआ?
    (क) चौथी पंचवर्षीय योजना(ख) पाँचवीं पंचवर्षीय योजना
    (ग) आठवीं पंचवर्षीय योजना(घ) छठी पंचवर्षीय योजना
  6. 1 अंकइंदिरा गांधी नहर पहले किस नाम से जानी जाती थी?
    (क) गंगा नहर(ख) राजस्थान नहर
    (ग) सतलुज नहर(घ) थार नहर
  7. 1 अंकब्रंटलैंड रिपोर्ट का शीर्षक क्या है?
    (क) द पॉपुलेशन बम(ख) द लिमिट्स टू ग्रोथ
    (ग) अवर कॉमन फ़्यूचर(घ) स्टेट ऑफ द वर्ल्ड
  8. 1 अंकभरमौर की गद्दी जनजाति किसके लिए सबसे जानी जाती है?
    (क) स्थानांतरी कृषि(ख) ऋतु-प्रवास (transhumance)
    (ग) सोपान कृषि(घ) बागाती कृषि
  9. 1 अंकइस अध्याय में वर्णित वारबंदी का अर्थ है:
    (क) वनीकरण की एक विधि(ख) कमान क्षेत्र में नहर के जल का समान वितरण
    (ग) एक जनजातीय भूमि-बंदोबस्त योजना(घ) मृदा-परीक्षण की तकनीक
  10. 1 अंकSFDA और MFDA किसके उदाहरण हैं?
    (क) लक्ष्य क्षेत्र कार्यक्रम(ख) लक्ष्य समूह कार्यक्रम
    (ग) खंडीय कार्यक्रम(घ) नदी-घाटी परियोजनाएँ
अभिकथन (A): सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम की रणनीति सूक्ष्म-स्तर पर समन्वित जल-संभर विकास की ओर मुड़ी।
कारण (R): बढ़ती जनसंख्या का दबाव लोगों को सीमांत भूमि पर धकेल रहा था, जिससे पारिस्थितिकीय निम्नीकरण हो रहा था, जिसे केवल जल-संभर स्तर का उपागम ही उलट सकता था।
अभिकथन (A): नहर सिंचाई ने इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र को पूरी तरह सततपोषणीय बना दिया है।
कारण (R): सघन सिंचाई और अत्यधिक जल-उपयोग से इस क्षेत्र में जलाक्रांतता और मृदा लवणता पैदा हुई है।
अभिकथन (A): 1980 के दशक तक “विकास” एक बहु-आयामी संकल्पना बन चुका था।
कारण (R): 1970 के दशक के अनुभव ने दिखाया कि यदि लाभ असमान रूप से बँटें तो अकेली आर्थिक वृद्धि भी गरीबी बढ़ा सकती है।
लघु उत्तरीय प्रश्न (2-3 अंक)
  1. 2 अंकभरमौर जनजातीय क्षेत्र में आई-टी-डी-पी के सामाजिक लाभ क्या हैं?
  2. 2 अंकसततपोषणीय विकास की संकल्पना को परिभाषित करें।
  3. 2 अंकइंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र पर सिंचाई के सकारात्मक प्रभाव क्या हैं?
  4. 2 अंकखंडीय नियोजन और प्रादेशिक नियोजन में अंतर बताएँ।
  5. 2 अंकलक्ष्य क्षेत्र नियोजन और लक्ष्य समूह नियोजन में एक-एक उदाहरण देते हुए अंतर बताएँ।
  6. 3 अंकनीति आयोग की स्थापना कब और क्यों हुई?
  7. 2 अंकभारत के सूखा संभावी जिलों की पहचान किन मापदंडों और किसके द्वारा की गई?
  8. 3 अंकपिछड़े क्षेत्रों के विकास की राष्ट्रीय समिति ने सूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम के शुरुआती उपागम को संकीर्ण क्यों पाया?
  9. 2 अंकवारबंदी क्या है, और यह किस समस्या को हल करने में मदद करती है?
  10. 3 अंकइंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र की सात सततपोषणता उपायों में से केवल पाँच ही पारिस्थितिकीय संतुलन बहाल करने पर केंद्रित क्यों हैं?
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (4-6 अंक)
  1. 6 अंकसूखा संभावी क्षेत्र कार्यक्रम पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें। यह कार्यक्रम भारत में शुष्क भूमि कृषि के विकास में कैसे सहायक है?
  2. 6 अंकइंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र में सततपोषणीय विकास को बढ़ावा देने के उपाय सुझाएँ।
  3. 5 अंकभरमौर क्षेत्र में समन्वित जनजातीय विकास परियोजना का वर्णन करें: इसकी पृष्ठभूमि, इसकी उपलब्धियाँ और अभी बाकी बचीं कमियाँ।
  4. 5 अंकद्वितीय विश्व युद्ध के तुरंत बाद से 1980 के दशक तक “विकास” के अर्थ में आए बदलाव को क्रमबद्ध करें।
  5. 5 अंकइंदिरा गांधी नहर की वृद्धि और भूगोल का वर्णन करें, इसके दोनों निर्माण चरणों सहित।
  6. 4 अंकपर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम क्या है? यह कहाँ लागू हुआ और इसका उद्देश्य क्या था?
  7. 4 अंकसततपोषणीय विकास का विचार कैसे उभरा, और ब्रंटलैंड रिपोर्ट ने इसे कैसे परिभाषित किया?
  8. 4 अंकबताएँ कि इंदिरा गांधी नहर कमान क्षेत्र में सघन सिंचाई ने कैसे लाभ और पर्यावरणीय समस्याएँ, दोनों पैदा कीं।
उत्तर कुंजी
MCQ 1-10(ख) (ग) (ख) (ग) (ख) (ख) (ग) (ख) (ख) (ख)
अभिकथन-कारण 1(क)। दोनों सत्य हैं, R, A की व्याख्या करता है: सीमांत भूमि पर जनसंख्या का दबाव ही वह कारण था जिससे कार्यक्रम जल-संभर स्तर की पुनर्स्थापना की ओर मुड़ा।
अभिकथन-कारण 2(घ)। A असत्य है: सघन सिंचाई ने जलाक्रांतता और मृदा लवणता पैदा की है, जो सततपोषणता को पूरा करने के बजाय उसे खतरे में डालती हैं; R अपने आप में सत्य है।
अभिकथन-कारण 3(क)। दोनों सत्य हैं, R, A की व्याख्या करता है: 1970 के दशक में वृद्धि के बावजूद बढ़ती गरीबी के अनुभव ने ही विकास को बहु-आयामी बनने पर मजबूर किया।
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