प्रक्रमण
- कच्चे आंकड़ों को एक प्रतिनिधि संख्या में क्यों बदला जाता है, और आंकड़ों के विश्लेषण की तीन प्रमुख विधियाँ
- प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष विधि से, अवर्गीकृत और वर्गीकृत दोनों आंकड़ों के लिए माध्य कैसे ज्ञात करें
- किसी श्रेणी की माध्यिका कैसे ज्ञात करें, और वर्गीकृत आंकड़ों के लिए सूत्र से उसकी सटीक गणना कैसे करें
- बहुलक कैसे ज्ञात करें, और एक-बहुलक, द्वि-बहुलक, त्रि-बहुलक तथा बहु-बहुलक श्रेणी में अंतर कैसे करें
- सामान्य वितरण में माध्य, माध्यिका और बहुलक का संबंध कैसा होता है, और आंकड़े विषम होने पर यह संबंध कैसे बदलता है
प्रत्यक्ष विधिअप्रत्यक्ष विधिकल्पित माध्यवर्ग अंतराल
संचयी आवृत्तिएक-बहुलकद्वि-बहुलकसामान्य वितरण
धनात्मक विषमताऋणात्मक विषमता
1केंद्रीय प्रवृत्ति के माप
आंकड़ों का संगठन तथा प्रस्तुतीकरण उन्हें समझने योग्य बनाता है, यही आंकड़ों का प्रक्रमण है। आंकड़ों का वास्तविक विश्लेषण करने के लिए भूगोलवेत्ता सांख्यिकीय तकनीकों के तीन परिवारों का उपयोग करते हैं: केंद्रीय प्रवृत्ति के माप (एक मान जो पूरे समूह का सबसे अच्छा प्रतिनिधित्व करता है), प्रकीर्णन के माप (आंकड़े उस केंद्रीय मान के चारों ओर कितने फैले हैं) और संबंध के माप (वर्षा और बाढ़ जैसे दो चरों में कितना गहरा संबंध है)। इस अध्याय में केवल पहली विधि, अर्थात् केंद्रीय प्रवृत्ति के माप, को पढ़ेंगे।
केंद्रीय प्रवृत्ति के माप वे सांख्यिकीय विधियाँ हैं जिनसे किसी वितरण के केंद्र के निकट स्थित वह एकल मान ज्ञात किया जाता है जो सारे आंकड़ों के समूह का सबसे अच्छा प्रतिनिधित्व करता है। इन्हें सांख्यिकीय औसत भी कहते हैं। तीन मुख्य माप हैं: माध्य, माध्यिका तथा बहुलक।
वर्षा, ऊँचाई या जनसंख्या घनत्व जैसी विशेषताएँ स्थान-स्थान पर भिन्न होती हैं। एक प्रतिनिधि संख्या से हम बिना सारे कच्चे मान सूचीबद्ध किए एक जिले, वर्ष या क्षेत्र की दूसरे से तुलना कर सकते हैं। इसी संख्या को केंद्रीय प्रवृत्ति कहते हैं क्योंकि यह वह बिंदु है जिसके निकट व्यक्तिगत मानों के समूहित होने की प्रवृत्ति होती है।
2माध्य
माध्य () मूल्यों के किसी समूह का साधारण अंकगणितीय औसत है: यह सभी प्रेक्षणों को जोड़कर, उनकी संख्या से भाग देने पर प्राप्त होता है। माध्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विधि से, अवर्गीकृत तथा वर्गीकृत दोनों प्रकार के आंकड़ों के लिए ज्ञात किया जा सकता है।
2.1 अवर्गीकृत आंकड़ों से माध्य: प्रत्यक्ष विधि
सभी कच्चे मानों को जोड़कर प्रेक्षणों की संख्या से भाग दिया जाता है।
7 जिलों की सामान्य वर्षा (मिमी): इंदौर 979, देवास 1,083, धार 833, रतलाम 896, उज्जैन 891, मंदसौर 825, शाजापुर 977।
, तथा ।
926.29 मिमी
2.2 अवर्गीकृत आंकड़ों से माध्य: अप्रत्यक्ष विधि
प्रेक्षणों की संख्या अधिक होने पर, प्रत्येक मान से एक स्थिरांक, जिसे कल्पित माध्य कहते हैं, घटाकर मानों को छोटा कर दिया जाता है। इसी क्रिया को कूट पद्धति कहते हैं।
कल्पित माध्य लीजिए। विचलन : 179, 283, 33, 96, 91, 25, 177। ।
926.29 मिमी
माध्य दोनों विधियों से समान ही आता है, अप्रत्यक्ष विधि केवल बड़ी संख्याओं की गणना को आसान बनाती है।
2.3 वर्गीकृत आंकड़ों से माध्य: प्रत्यक्ष विधि
जब आंकड़े आवृत्ति वितरण के रूप में वर्गीकृत होते हैं, तो एकाकी मान अपनी पहचान खो देते हैं और उन्हें उनके वर्ग अंतराल के मध्य बिंदु से दर्शाया जाता है।
| वर्ग (₹/दिन) | मध्य बिंदु | ||
|---|---|---|---|
| 50-70 | 10 | 60 | 600 |
| 70-90 | 20 | 80 | 1,600 |
| 90-110 | 25 | 100 | 2,500 |
| 110-130 | 35 | 120 | 4,200 |
| 130-150 | 9 | 140 | 1,260 |
, ।
₹102.6 / दिन
2.4 वर्गीकृत आंकड़ों से माध्य: अप्रत्यक्ष विधि
कल्पित माध्य वर्ग = 90-110, अतः (इसका मध्य बिंदु)। विचलन से मान -400, -400, 0, 700, 360 मिलते हैं, अतः ।
102.6, जो प्रत्यक्ष विधि के समान ही उत्तर है।
चाहे कोई भी विधि प्रयोग करें, अंतिम माध्य सदैव समान ही आता है, यह स्वयं एक सामान्य 1 या 2 अंक का प्रश्न है (“दिखाइए कि माध्य दोनों विधियों से समान आता है”)।
3माध्यिका
माध्यिका (प्रतीक ) एक स्थितिक औसत है: आंकड़ों को बढ़ते या घटते क्रम में व्यवस्थित करने पर, यह उस पद का मान है जिसके दोनों ओर बराबर संख्या में प्रेक्षण होते हैं।
3.1 अवर्गीकृत आंकड़ों के लिए माध्यिका
ऊँचाइयाँ (मी): 8,126; 8,611; 7,817; 8,172; 8,076; 8,848; 8,598। यहाँ ।
बढ़ते क्रम में व्यवस्थित: 7,817; 8,076; 8,126; 8,172; 8,598; 8,611; 8,848।
स्थिति चौथा पद।
8,172 मीटर (व्यवस्थित श्रेणी का चौथा मान)
3.2 वर्गीकृत आंकड़ों के लिए माध्यिका
| वर्ग | संचयी आवृत्ति | |
|---|---|---|
| 50-60 | 3 | 3 |
| 60-70 | 7 | 10 |
| 70-80 | 11 | 21 |
| 80-90 (माध्यिका वर्ग) | 16 | 37 |
| 90-100 | 8 | 45 |
| 100-110 | 5 | 50 |
, अतः । यह वर्ग 80-90 में आता है, अतः , , , तथा (पिछले वर्ग की संचयी आवृत्ति)।
82.5
4बहुलक
बहुलक (प्रतीक या ) किसी वितरण में सर्वाधिक बार आने वाला मान है। इसका प्रयोग माध्य या माध्यिका की तुलना में कम होता है, और किसी श्रेणी में एक से अधिक बहुलक भी हो सकते हैं।
अवर्गीकृत आंकड़ों का बहुलक ज्ञात करने के लिए सभी मानों को बढ़ते या घटते क्रम में व्यवस्थित किया जाता है, जिससे सर्वाधिक बार आने वाला मान पहचानना आसान हो जाता है।
10 विद्यार्थियों के भूगोल के प्राप्तांक: 61, 10, 88, 37, 61, 72, 55, 61, 46, 22।
व्यवस्थित: 10, 22, 37, 46, 55, 61, 61, 61, 72, 88। मान 61 तीन बार आया है, जो किसी अन्य मान से अधिक है, अतः यही बहुलक है। कोई अन्य मान इतनी बार नहीं आता, अतः यह श्रेणी एक-बहुलक है।
10 अन्य विद्यार्थियों के प्राप्तांक: 82, 11, 57, 82, 08, 11, 82, 95, 41, 11।
व्यवस्थित: 08, 11, 11, 11, 41, 57, 82, 82, 82, 95। 11 और 82 दोनों तीन-तीन बार आते हैं, अतः यह श्रेणी द्वि-बहुलक है।
4.1 बहुलक के प्रकार
एक-बहुलक
श्रेणी में केवल एक मान की आवृत्ति सर्वाधिक होती है।
द्वि-बहुलक
दो मानों की आवृत्ति बराबर और सर्वाधिक होती है।
त्रि-बहुलक
तीन मानों की आवृत्ति बराबर और सर्वाधिक होती है।
बहु-बहुलक
कई मान बराबर, सर्वाधिक आवृत्ति के साथ दोहराए जाते हैं।
बहुलक-रहित
श्रेणी में कोई भी मान दोहराया नहीं जाता।
5माध्य, माध्यिका तथा बहुलक की तुलना
केंद्रीय प्रवृत्ति के तीनों मापों की तुलना सामान्य वितरण वक्र की सहायता से की जा सकती है: यह एक सममित, घंटाकार आवृत्ति वक्र है। बौद्धिकता, व्यक्तित्व तथा विद्यार्थियों की उपलब्धि जैसी अनेक मानवीय विशेषताओं का वितरण इसी आकार का होता है।

सामान्य वितरण सममित होने के कारण, सर्वाधिक आवृत्ति वाला मान ठीक मध्य में होता है, जिससे आधे प्रेक्षण उसके ऊपर तथा आधे नीचे होते हैं। अतः माध्य = माध्यिका = बहुलक। अति उच्च तथा अति निम्न मान दोनों ओर विरले होते हैं।
आंकड़े सममित न होकर विषम (टेढ़े-मेढ़े) होने पर तीनों माप एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं, और सदैव एक निश्चित क्रम में।


| वितरण | अक्ष पर क्रम |
|---|---|
| सामान्य (सममित) | माध्य = माध्यिका = बहुलक (तीनों एक समान) |
| धनात्मक विषमता | बहुलक < माध्यिका < माध्य |
| ऋणात्मक विषमता | माध्य < माध्यिका < बहुलक |
विद्यार्थी प्रायः भूल जाते हैं कि विषमता में कौन-सा माप सबसे अधिक खिसकता है। याद रखें: माध्य सबसे अधिक खिंचता है, क्योंकि यह लंबी पूँछ के चरम मानों सहित सभी मानों से गणना होता है। बहुलक लगभग नहीं खिसकता, क्योंकि यह केवल वक्र के शिखर का अनुसरण करता है।
- आंकड़ों के प्रक्रमण में तीन विधियाँ प्रयुक्त होती हैं: केंद्रीय प्रवृत्ति, प्रकीर्णन और संबंध; इस अध्याय में केवल केंद्रीय प्रवृत्ति पढ़ी गई है
- माध्य (अवर्गीकृत, प्रत्यक्ष) या (अप्रत्यक्ष); वर्गीकृत आंकड़ों के लिए और के स्थान पर और लिखें
- माध्यिका = वें पद का मान (अवर्गीकृत); वर्गीकृत आंकड़ों के लिए
- बहुलक = सर्वाधिक बार आने वाला मान; श्रेणी एक-बहुलक, द्वि-बहुलक, त्रि-बहुलक, बहु-बहुलक या बहुलक-रहित हो सकती है
- माध्य = माध्यिका = बहुलक केवल एक सममित, सामान्य वितरण में होता है
- धनात्मक विषमता: बहुलक < माध्यिका < माध्य। ऋणात्मक विषमता: माध्य < माध्यिका < बहुलक
- क्या मैं प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों विधियों से, अवर्गीकृत और वर्गीकृत आंकड़ों का माध्य निकाल सकता हूँ?
- क्या मैं सूत्र से चरण-दर-चरण वर्गीकृत आंकड़ों की माध्यिका ज्ञात कर सकता हूँ?
- क्या मैं पहचान सकता हूँ कि कोई श्रेणी एक-बहुलक, द्वि-बहुलक या बहुलक-रहित है?
- क्या मैं धनात्मक और ऋणात्मक विषमता में माध्य, माध्यिका, बहुलक का क्रम बता और समझा सकता हूँ?
- 1 अंकमाध्य को परिभाषित कीजिए।
- 1 अंककेंद्रीय प्रवृत्ति का माप क्या है?
- 1 अंककेंद्रीय प्रवृत्ति के तीन मापों के नाम लिखिए।
- 1 अंकमाध्यिका के लिए किस प्रतीक का प्रयोग होता है?
- 1 अंकमाध्य ज्ञात करने की अप्रत्यक्ष विधि में “कूट पद्धति” से क्या तात्पर्य है?
- 1 अंकबहुलक के उपयोग के क्या लाभ हैं?
- 1 अंककल्पित माध्य क्या है?
- 1 अंककोई वितरण द्वि-बहुलक कब कहलाता है?
- 2 अंकमाध्य ज्ञात करने की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विधि में अंतर स्पष्ट कीजिए।
- 2 अंकमाध्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, दोनों विधियों से समान ही क्यों आता है?
- 3 अंकसूत्र सहित समझाइए कि वर्गीकृत आंकड़ों की माध्यिका कैसे ज्ञात की जाती है।
- 2 अंकएक-बहुलक और बहु-बहुलक श्रेणी में क्या अंतर है?
- 3 अंकमाध्यिका को “स्थितिक औसत” क्यों कहा जाता है?
- 2 अंकसूत्र में , तथा का क्या अर्थ है, समझाइए।
- 3 अंकवितरण विषम होने पर माध्य, बहुलक की तुलना में अधिक क्यों खिंचता है?
- 2 अंक“त्रि-बहुलक” श्रेणी से क्या तात्पर्य है? अपना एक उदाहरण दीजिए।
- 5 अंकआरेखों की सहायता से सामान्य तथा विषम वितरणों में माध्य, माध्यिका तथा बहुलक की सापेक्षिक स्थितियों की व्याख्या कीजिए।
- 5 अंकमाध्य, माध्यिका तथा बहुलक की उपयोगिता पर, उनके गुण-दोषों के आधार पर टिप्पणी कीजिए।
- 5 अंककिसी उपयुक्त काल्पनिक उदाहरण की सहायता से अवर्गीकृत आंकड़ों से माध्य ज्ञात करने की प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष विधियों को समझाइए।
- 5 अंकएक उदाहरण की सहायता से बताइए कि वर्गीकृत आंकड़ों से माध्य प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष, दोनों विधियों से कैसे ज्ञात किया जाता है।
- 3 अंकप्रत्यक्ष विधि से निम्न मानों का माध्य ज्ञात कीजिए: 12, 18, 24, 30, 36।
- 3 अंकनिम्न आयु (वर्षों में) की माध्यिका ज्ञात कीजिए: 21, 25, 19, 30, 27, 23।
- 3 अंकनिम्न आंकड़ों का बहुलक ज्ञात कीजिए: 5, 8, 5, 12, 15, 8, 5, 20।
- 5 अंक5 स्टेशनों पर वर्षा (मिमी में) 620, 580, 705, 640, 655 दर्ज हुई। प्रत्यक्ष विधि से माध्य वर्षा ज्ञात कीजिए।
- 1 अंककेंद्रीय प्रवृत्ति का जो माप चरम मूल्यों से प्रभावित नहीं होता, वह है:
(क) माध्य(ख) माध्य तथा बहुलक(ग) बहुलक(घ) माध्यिका - 1 अंककेंद्रीय प्रवृत्ति का वह माप जो किसी वितरण के उभरे भाग (शिखर) से सदैव संपाती होगा, वह है:
(क) माध्यिका(ख) माध्यिका तथा बहुलक(ग) माध्य(घ) बहुलक - 1 अंकमाध्य की अप्रत्यक्ष विधि में हर मान से घटाया गया स्थिरांक कहलाता है:
(क) माध्यिका(ख) कल्पित माध्य(ग) वर्ग अंतराल(घ) संचयी आवृत्ति - 1 अंकजिस श्रेणी में तीन मानों की आवृत्ति बराबर तथा सर्वाधिक हो, वह कहलाती है:
(क) द्वि-बहुलक(ख) एक-बहुलक(ग) त्रि-बहुलक(घ) बहुलक-रहित - 1 अंक प्रेक्षणों वाली अवर्गीकृत श्रेणी की माध्यिका होती है:
(क) वें पद का मान(ख) वें पद का मान(ग) वें पद का मान(घ) वें पद का मान - 1 अंकधनात्मक विषम वितरण में अक्ष पर सही क्रम है:
(क) माध्य < माध्यिका < बहुलक(ख) बहुलक < माध्यिका < माध्य(ग) माध्यिका < बहुलक < माध्य(घ) माध्य = माध्यिका = बहुलक - 1 अंकसूत्र में पद किसे दर्शाता है?
(क) आवृत्ति(ख) वर्ग अंतराल(ग) वर्ग का मध्य बिंदु(घ) संचयी आवृत्ति - 1 अंकमाध्य, माध्यिका तथा बहुलक तीनों एक ही बिंदु पर केवल किस वितरण में संपाती होते हैं?
(क) धनात्मक विषम वितरण(ख) ऋणात्मक विषम वितरण(ग) सामान्य वितरण(घ) द्वि-बहुलक वितरण
कारण (R): माध्यिका केवल व्यवस्थित श्रेणी में किसी पद की स्थिति पर निर्भर करती है, उसके वास्तविक मान पर नहीं।
कारण (R): ऋणात्मक विषमता में वक्र की लंबी पूँछ कम मानों की ओर होती है, जिससे माध्य बहुलक के बाईं ओर खिंच जाता है।
कारण (R): जब श्रेणी में दो या अधिक मानों की आवृत्ति बराबर और सर्वाधिक होती है, तो उस श्रेणी को द्वि-बहुलक या बहु-बहुलक कहा जाता है।