इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म कब और कहाँ हुआ?
उत्तर: फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म 4 मार्च, सन् 1921 को औराही हिंगना (ज़िला पूर्णिया, अब अररिया), बिहार में हुआ।
प्र. “पहलवान की ढोलक” किस विधा की रचना है और किस पाठ्यपुस्तक में संकलित है?
उत्तर: यह एक कहानी है, जो NCERT की पाठ्यपुस्तक आरोह भाग 2 के गद्य खंड में संकलित है।
प्र. लुट्टन किस उम्र में अनाथ हुआ?
उत्तर: लुट्टन नौ वर्ष की उम्र में अनाथ हो गया था।
प्र. चाँद सिंह को किस उपाधि से जाना जाता था?
उत्तर: चाँद सिंह को “शेर के बच्चे” की उपाधि से जाना जाता था।
प्र. लुट्टन को कुश्ती जीतने पर राजा साहब ने क्या दिया?
उत्तर: राजा साहब ने उसे “लुट्टन सिंह” कहकर पुकारा और राज-पहलवान का पद देकर हमेशा के लिए दरबार में रख लिया।
प्र. राजा साहब ने जाति-विवाद पर क्या उत्तर दिया?
उत्तर: राजा साहब ने कहा, “उसने क्षत्रिय का काम किया है।”
प्र. लुट्टन ने अपने पुत्रों को क्या शिक्षा दी?
उत्तर: लुट्टन ने उन्हें ढोलक की आवाज़ पर पूरा ध्यान देने की शिक्षा दी और कहा, “मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है।”
प्र. नए राजकुमार के आने पर दंगल की जगह किसने ले ली?
उत्तर: नए राजकुमार के आने पर दंगल का स्थान घोड़े की रेस ने ले लिया।
प्र. पहलवान की अंतिम इच्छा क्या थी?
उत्तर: उसकी अंतिम इच्छा थी कि चिता पर उसे चित नहीं, पेट के बल सुलाया जाए, और चिता सुलगाने के समय ढोलक बजाई जाए।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. काला खाँ के बारे में क्या अफ़वाह थी और लुट्टन ने उसे कैसे तोड़ा?
उत्तर: यह मशहूर था कि काला खाँ “आ-ली” कहकर हमला करते ही अपने प्रतिद्वंद्वी को लकवा मार जाता है। लुट्टन ने उसे कुश्ती में हराकर यह अफ़वाह झूठी साबित कर दी।
प्र. गाँव में अकाल किस क्रम में आया?
उत्तर: पहले अनावृष्टि (बारिश न होना) हुई, इससे अन्न की कमी हुई, और अंत में मलेरिया और हैज़ा फैल गया, जिसने गाँव को तबाह कर दिया।
प्र. राजकुमार और मैनेजर ने पहलवान के भोजन-खर्च पर क्या प्रतिक्रिया दी, और इसका क्या परिणाम हुआ?
उत्तर: राजकुमार ने कहा “टैरिबुल!” और नए मैनेजर ने कहा “हौरिबुल!”: इसके तुरंत बाद पहलवान को साफ़ जवाब मिल गया कि दरबार में अब उसकी ज़रूरत नहीं, और उसे बिना गिड़गिड़ाने का मौका दिए ही निकाल दिया गया।
प्र. लुट्टन के परिवार के बारे में बताइए।
उत्तर: लुट्टन की सास और पत्नी दोनों की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी; उसके दो पुत्र थे, जिनका पालन-पोषण दरबार से हो रहा था और जिन्हें वह स्वयं कुश्ती व ढोलक की शिक्षा देता था।
प्र. पहलवान के दोनों पुत्रों की मृत्यु कैसे हुई?
उत्तर: पहलवान के दोनों बेटे महामारी के दिनों में क्रूर काल की चपेट में आकर असह्य वेदना में छटपटाते हुए मर गए; अंतिम समय उन्होंने पिता से कहा था, “बाबा! उठा पटक दो वाला ताल बजाओ!”
प्र. लुट्टन ने अपने पुत्रों की मृत्यु के बाद क्या किया?
उत्तर: उसने राजा की दी हुई रेशमी जाँघिया पहनी, शरीर पर मिट्टी मली, थोड़ी कसरत की, और फिर दोनों पुत्रों को कंधों पर लादकर नदी में बहा आया।
प्र. “भारत” पर “इंडिया” के छा जाने से पाठ में क्या तात्पर्य है?
उत्तर: इसका तात्पर्य है कि पुरानी परंपरागत लोक-व्यवस्था के स्थान पर सभ्यता के नाम पर एकदम नई व्यवस्था थोप (आरोपित कर) दी जाती है, जिसमें लोक-कला और लोक-कलाकार (जैसे लुट्टन) अप्रासंगिक और बेकार समझ लिए जाते हैं।
प्र. रेणु की भाषा-शैली की कोई एक विशेषता उदाहरण सहित बताइए।
उत्तर: रेणु ने आंचलिक बोली और ध्वन्यात्मक शब्दों का सुंदर प्रयोग किया है, जैसे ढोलक के बोल “चट्-धा, गिड़-धा” (आ जा भिड़ जा): इससे कहानी सजीव और संगीतमय बन गई है।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. “पहलवान की ढोलक” कहानी में ढोलक की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: ढोलक इस कहानी में केवल एक वाद्य-यंत्र नहीं, बल्कि पूरी कहानी की जान है। यह महामारी-ग्रस्त गाँव को हिम्मत देती है, कुश्ती के हर दाँव-पेंच को अपने बोलों से बताती है, लुट्टन के लिए “गुरु” का काम करती है और उसकी असली ताकत का स्रोत है। बेटों की मृत्यु के अंतिम, सबसे दर्दनाक क्षण में भी सिर्फ़ ढोलक ही उनका सहारा बनती है। अंत में ढोलक की आवाज़ का बंद होना ही पहलवान की अपनी मृत्यु का संकेत बन जाता है, इस तरह ढोलक कला और कलाकार की जीवटता का प्रतीक बन जाती है।
प्र. लुट्टन सिंह के चरित्र की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर: लुट्टन मेहनती और जीवट वाला व्यक्ति है: नौ वर्ष की उम्र में अनाथ होकर भी वह नियमित कसरत से जवानी में गाँव में सबसे अच्छा पहलवान समझा जाने लगा। वह निडर है: राजा साहब के मना करने पर भी कुश्ती लड़ने की ज़िद करता है, और इसके लिए गिड़गिड़ाता भी है। जाति के सवाल पर राजा साहब ने उसकी बहादुरी को आधार बनाकर उसका पक्ष लिया (“उसने क्षत्रिय का काम किया है”)। वह ढोलक को अपना गुरु मानता है और नियमित कसरत व ढोलक-अभ्यास करता है। कठिन समय (दरबार से निकाले जाने, अकाल, पुत्रों की मृत्यु) में भी वह ढोलक बजाना नहीं छोड़ता। पाठ यह भी बताता है कि बल और शरीर बढ़ने के साथ उसकी बुद्धि बच्चों की बुद्धि के बराबर ही रह गई थी।
प्र. कहानी में जाति-व्यवस्था पर क्या टिप्पणी की गई है?
उत्तर: राज-पंडितों की आपत्ति (“हुज़ूर! जाति का … सिंह!”) जाति-आधारित सोच को दिखाती है। राजा साहब का उत्तर (“उसने क्षत्रिय का काम किया है”) बहादुरी को जन्म से नहीं, काम से जोड़ता है। मैनेजर साहब (स्वयं क्षत्रिय) भी कहते हैं, “हाँ सरकार, यह अन्याय है!”, पर उनकी इस टिप्पणी का आशय पाठ में साफ़ नहीं कहा गया है। इस तरह कहानी को जाति-आधारित भेदभाव पर एक परोक्ष टिप्पणी के रूप में पढ़ा जा सकता है।
प्र. राजा साहब और नए राजकुमार के शासन में क्या अंतर था?
उत्तर: राजा साहब के समय दंगल-कुश्ती को पूरा सम्मान और संरक्षण मिलता था, राजा साहब ने लुट्टन की बहादुरी को “उसने क्षत्रिय का काम किया है” कहकर सराहा और ढोलक-कुश्ती जैसी लोक-कला दरबार का सम्मानित हिस्सा थी। नए राजकुमार के आते ही यह सब बदल गया: दंगल की जगह घोड़े की रेस जैसा नया शौक आया; पहलवान और उसके बेटों का भोजन-खर्च फ़िज़ूल (“टैरिबुल”) माना गया; और अंततः लोक-कलाकार को ही दरबार से बाहर कर दिया गया। यह पुरानी और नई व्यवस्था के मूल्यों का सीधा टकराव दिखाता है।
प्र. गाँव की महामारी-ग्रस्त स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर: महामारी के दौरान गाँव की हालत बेहद दयनीय हो जाती है। दिन में गाँव वाले एक-दूसरे को ढाढ़स देते हैं, पर सूर्यास्त होते ही पूरी तरह चुप हो जाते हैं, यहाँ तक कि उनकी बोलने की शक्ति भी जाती रहती है। दम तोड़ते हुए बेटे को अंतिम बार “बेटा” कहकर पुकारने की हिम्मत भी माताओं में नहीं बचती। रोज़ दो-तीन लाशें उठने लगती हैं और घर के घर खाली पड़ जाते हैं। इस भयानक सन्नाटे के बीच सिर्फ़ पहलवान की ढोलक बजती रहती है; पाठ के अनुसार उसे सुनकर मरते समय उन्हें तकलीफ़ नहीं होती थी और वे मृत्यु से नहीं डरते थे।
प्र. कहानी का शीर्षक “पहलवान की ढोलक” कितना सार्थक है, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: शीर्षक पूरी तरह सार्थक है, क्योंकि ढोलक ही कहानी की असली जान है। यह हर भावना और घटना को व्यक्त करती है: महामारी में गाँव को हिम्मत देना, कुश्ती में दाँव-पेंच बताना, लुट्टन का “गुरु” बनना, और बेटों की मृत्यु के अंतिम क्षणों में भी सहारा बनना। इसीलिए जब ढोलक बजनी बंद होती है, वही पहलवान की मृत्यु का संकेत बन जाता है। ढोलक इस तरह कला और कलाकार की जीवटता का प्रतीक बन जाती है, इसीलिए शीर्षक “पहलवान की ढोलक” ही सबसे उपयुक्त है, केवल “पहलवान” या “लुट्टन सिंह” नहीं।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. “पहलवान की ढोलक” कहानी को अपने शब्दों में आरंभ से अंत तक सुनाइए।
उत्तर: कहानी की शुरुआत एक महामारी-ग्रस्त गाँव की अमावस्या रात से होती है, जहाँ सिर्फ़ पहलवान की ढोलक की आवाज़ सन्नाटे को तोड़ती है। लुट्टन नौ वर्ष की उम्र में अनाथ हुआ और अपनी विधवा सास की देखरेख में पला और जवानी में गाँव में सबसे अच्छा पहलवान समझा जाने लगा। श्यामनगर मेले में उसने पंजाबी पहलवान चाँद सिंह (“शेर के बच्चे”) को चुनौती दी और राजा साहब के मना करने पर भी अड़ा रहा। कुश्ती में उसने चाँद सिंह को हरा दिया और दौड़कर राजा साहब को गोद में उठा लिया; राजा साहब ने उसे “लुट्टन सिंह” कहकर राज-पहलवान का पद दिया, और जाति-विवाद पर कहा, “उसने क्षत्रिय का काम किया है।” इसके बाद उसने काला खाँ जैसे नामी पहलवानों को हराकर पंद्रह वर्ष तक अजेय रहकर ख्याति पाई। उसकी सास-पत्नी की मृत्यु पहले ही हो चुकी थी, और वह अपने दो पुत्रों को ढोलक व कुश्ती की शिक्षा देता रहा। वृद्ध राजा साहब की मृत्यु के बाद नए राजकुमार ने सत्ता संभाली, दंगल का स्थान घोड़े की रेस ने लिया, और पहलवान का भोजन-खर्च सुनकर राजकुमार ने “टैरिबुल” कहा; पहलवान को साफ़ जवाब मिल गया। पहलवान गाँव लौटकर कुश्ती सिखाने की कोशिश करता रहा, पर गाँव के ग़रीब बच्चे कुश्ती नहीं सीख पाए। इसी दौरान गाँव पर अकाल और महामारी की मार पड़ी, जिसमें उसके दोनों पुत्रों की मृत्यु हो गई; उसने उन्हें नदी में प्रवाहित किया। कुछ दिनों बाद पहलवान की भी मृत्यु हो गई, और एक शिष्य ने आँसू पोंछते हुए उसकी अंतिम इच्छा बताई: चिता पर उसे चित नहीं, पेट के बल सुलाया जाए, और चिता सुलगाने के समय ढोलक बजाई जाए।
प्र. कहानी के आधार पर स्पष्ट करें कि यह “व्यवस्था के बदलने के साथ लोक-कला और कलाकार के अप्रासंगिक होने की कहानी” कैसे है।
उत्तर: राजा साहब के समय लुट्टन जैसे लोक-कलाकार को पूरा सम्मान मिलता था: दंगल-कुश्ती दरबार की शान थी, और राजा साहब ने उसकी बहादुरी को “उसने क्षत्रिय का काम किया है” कहकर सराहा। नए राजकुमार के विलायत से लौटने पर यह पूरी व्यवस्था बदल गई: दंगल का स्थान घोड़े की रेस ने ले लिया, और पहलवान का भोजन-खर्च सुनकर “टैरिबुल!”/”हौरिबुल!” कहा गया; पहलवान को साफ़ जवाब मिल गया। यह केवल एक व्यक्ति की नौकरी जाने की घटना नहीं, बल्कि पूरी पुरानी सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था के, सभ्यता के नाम पर, एकदम नई व्यवस्था से बदल दिए जाने का प्रतीक है, यही “भारत” पर “इंडिया” के छा जाने की समस्या है। इसी बदलाव में लुट्टन लोक-कलाकार के आसन से उठाकर पेट भरने के लिए हाय-तौबा करने वाली निरीहता की ज़मीन पर पटक दिया जाता है, और गाँव लौटकर भी वह ग़रीबी के कारण अपनी कला आगे नहीं बढ़ा पाता। कहानी का अंत यह प्रश्न छोड़ता है कि यह “पोल” पुरानी व्यवस्था की है या नई की; नई व्यवस्था में लोक-कला और उसके कलाकार को संरक्षण नहीं मिलता, यह बदलाव कहानी में साफ़ दिखता है। पाठ यह भी पूछता है कि क्या कला की प्रासंगिकता व्यवस्था की मुखापेक्षी है अथवा उसका कोई स्वतंत्र मूल्य भी है।
प्र. रेणु की आंचलिक लेखन-शैली की विशेषताओं को इस कहानी के आधार पर विस्तार से समझाइए।
उत्तर: रेणु हिंदी में आंचलिक उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं (आंचलिक उपन्यासों पर विमर्श उनके ‘मैला आँचल’ से ही प्रारंभ हुआ), और यह कहानी उनकी शैली की सभी विशेषताओं को दिखाती है। पहली विशेषता है ध्वन्यात्मक शब्दों का प्रयोग: ढोलक के बोल (“चट्-धा, गिड़-धा”, “धा-गिड़-गिड़” आदि) आवाज़ की हूबहू नकल करते हैं और गद्य में संगीत जैसा प्रभाव पैदा करते हैं। दूसरी विशेषता है आंचलिक और टूटी-फूटी बोली का प्रयोग, जैसे लुट्टन का “होल इंडिया” कहना, जो पात्र के चरित्र को उजागर करता है। तीसरी विशेषता है मानवीकरण, जैसे टूटते तारे और रात को इंसानी भाव दिए जाने वाला वर्णन। चौथी विशेषता है गाँव के जीवन और लोक-संस्कृति (दंगल, ढोलक, मेला) का सजीव और यथार्थवादी चित्रण, पाठ के अनुसार रेणु की रचनाओं में अंचल कच्चे और अनगढ़ रूप में आता है। इन सबके ज़रिए रेणु लोक-जीवन और अंचल को कहानी के केंद्र में ला खड़ा करते हैं, जो आंचलिक साहित्य की मूल पहचान है।
प्र. लुट्टन पहलवान के जीवन में आए उतार-चढ़ावों का वर्णन कीजिए और बताइए कि उसने विपरीत परिस्थितियों का सामना कैसे किया।
उत्तर: लुट्टन का जीवन उतार-चढ़ावों से भरा रहा। बचपन में नौ वर्ष की उम्र में अनाथ होना उसका पहला बड़ा संकट था, जिसे उसने विधवा सास की मदद और खुद की मेहनत से पार किया। जवानी में श्यामनगर मेले में चाँद सिंह को हराकर उसने सबसे ऊँचा उत्थान (राज-पहलवान का पद) पाया, जो पंद्रह वर्ष तक बना रहा। लेकिन वृद्ध राजा साहब की मृत्यु और नए राजकुमार के आगमन के साथ उसका पतन शुरू हुआ, उसे दरबार से निकाल दिया गया। गाँव लौटकर उसने कुश्ती सिखाना शुरू किया, पर ग़रीब किसान-मज़दूरों के बच्चे कुश्ती का खर्च नहीं उठा सके और उसका स्कूल धीरे-धीरे खाली हो गया। सबसे बड़ा संकट अकाल-महामारी में उसके दोनों पुत्रों की मृत्यु था, जो किसी भी पिता के लिए सबसे कठिन समय होता। हर बार लुट्टन ने हार मानने के बजाय अपनी ढोलक का सहारा लिया, चाहे कुश्ती का मैदान हो या पुत्रों की मृत्यु की रात, वह हमेशा ढोलक बजाकर अपनी और दूसरों की हिम्मत बनाए रखता रहा, और अंत में अपनी मृत्यु तक अपने आत्म-सम्मान (कभी “चित” न होने) को बनाए रखा। यही उसकी सबसे बड़ी जीवटता है।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक गद्यांश में किसे मानवीय भाव (भावुकता, असफलता पर हँसी) दिए गए हैं?
उत्तर: टूटकर पृथ्वी की ओर जाने वाले भावुक तारे को, और उसकी असफलता पर हँसने वाले अन्य तारों को भी मानवीय भाव दिए गए हैं।
(ख) 1 अंक गद्यांश में प्रयुक्त अलंकार/शैली का नाम बताइए।
उत्तर: इस गद्यांश में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग हुआ है, जिसमें तारों को इंसानी भाव दिए गए हैं।
(ग) 2 अंक गद्यांश का आशय अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: गद्यांश में कहा गया है कि जब कोई तारा टूटकर पृथ्वी की ओर आने की कोशिश करता है, तो रास्ते में ही उसकी रोशनी और ताकत खत्म हो जाती है, और बाकी तारे उसकी इस कोशिश या नाकामी पर हँसते हैं। इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि जो कोई कुछ अच्छा या साहसी करना चाहता है, कई बार रास्ते में ही उसकी शक्ति चुक जाती है, और आस-पास के लोग मदद करने के बजाय उसका मज़ाक उड़ाते हैं।
(क) 1 अंक गद्यांश किस समय की स्थिति का वर्णन करता है?
उत्तर: यह गद्यांश महामारी (मलेरिया-हैजा) से पीड़ित गाँव में रात के समय की स्थिति का वर्णन करता है।
(ख) 1 अंक गद्यांश के अनुसार सूर्यास्त होते ही गाँव वालों के व्यवहार में क्या बदलाव आता था?
उत्तर: वे अपनी-अपनी झोंपड़ियों में घुसकर चूँ भी नहीं करते थे; उनकी बोलने की शक्ति तक जाती रहती थी।
(ग) 2 अंक गद्यांश के आधार पर बताइए कि महामारी ने गाँव वालों को भावनात्मक रूप से कैसे तोड़ दिया था।
उत्तर: महामारी ने गाँव वालों को इतना बेबस कर दिया था कि रात में उनकी बोलने की शक्ति तक जाती रहती थी। यहाँ तक कि दम तोड़ते हुए अपने ही बेटे को अंतिम बार “बेटा” कहकर पुकारने की हिम्मत भी माताओं में नहीं बचती थी। यह दिखाता है कि लगातार मौतों और डर ने लोगों की भावनाओं को इतना कुंद कर दिया था कि वे अपने सबसे प्रियजनों के प्रति भी खुलकर शोक व्यक्त नहीं कर पाते थे।