NCERT की पाठ्यपुस्तक आरोह भाग 2 के अध्याय 13 «पहलवान की ढोलक» के अभ्यास (पाठ के साथ, पाठ के आसपास, भाषा की बात) के सभी प्रश्नों के पूरे हल। पहले ख़ुद उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 पाठ के साथ
प्र. कुश्ती के समय ढोल की आवाज़ और लुट्टन के दाँव-पेंच में क्या तालमेल था? पाठ में आए ध्वन्यात्मक शब्द और ढोल की आवाज़ आपके मन में कैसी ध्वनि पैदा करते हैं, उन्हें शब्द दीजिए।
उत्तर: ढोल की आवाज़ और लुट्टन के दाँव-पेंच में गहरा तालमेल था, मानो ढोल ही लुट्टन को हर चाल सिखा और निर्देश दे रहा हो। जब कुश्ती शुरू होती है तो ढोल “चट्-धा, गिड़-धा” (आ जा भिड़ जा) बजता है। जब चाँद सिंह लुट्टन को दबा लेता है तो ढोल “ढाक्-ढिना” (वाह पट्ठे) बजाकर हौसला देता है, और “चट्-गिड़-धा” (मत डरना) बजाकर उसे डरने से रोकता है। जब लुट्टन दाँव काटकर बाहर निकलता है तो ढोल “धाक-धिना, तिरकट-तिना” (दाँव काटो, बाहर हो जा) बजता है, और अंत में जीत पर “धा-गिड़-गिड़” (वाह बहादुर) तीन बार बजता है। पाठ में आए ये ध्वन्यात्मक शब्द (चट्-धा, गिड़-धा, ढाक्-ढिना आदि) मन में तेज़, लयबद्ध और उत्साह बढ़ाने वाली ध्वनि पैदा करते हैं, जैसे कोई अदृश्य कोच सीधे मैदान से निर्देश दे रहा हो।
प्र. कहानी के किस-किस मोड़ पर लुट्टन के जीवन में क्या-क्या परिवर्तन आए?
उत्तर: लुट्टन के जीवन में कई बड़े मोड़ आए। पहला मोड़ बचपन में आया, जब नौ वर्ष की उम्र में वह अनाथ हो गया और विधवा सास ने उसे पाला। दूसरा मोड़ श्यामनगर मेले में आया, जब उसने चाँद सिंह को हराकर राज-पहलवान का पद पाया और राजा साहब उसे “लुट्टन सिंह” कहकर पुकारने लगे, यह उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा उत्थान था। तीसरा मोड़ वृद्ध राजा साहब की मृत्यु और नए राजकुमार के आगमन के साथ आया, जब उसे दरबार से निकाल दिया गया और उसकी पंद्रह वर्षों की प्रतिष्ठा एक झटके में खत्म हो गई। चौथा मोड़ गाँव लौटने पर आया, जहाँ ग़रीबी के कारण उसका कुश्ती-स्कूल असफल हो गया। पाँचवाँ और सबसे दुखद मोड़ अकाल-महामारी में उसके दोनों पुत्रों की मृत्यु के साथ आया, और अंतिम मोड़ स्वयं उसकी अपनी मृत्यु के रूप में आया।
प्र. लुट्टन पहलवान ने ऐसा क्यों कहा होगा कि मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है?
उत्तर: लुट्टन के लिए ढोलक ही उसकी असली ताकत, अनुशासन और आत्मविश्वास का स्रोत थी। उसने अपने जीवन में देखा था कि ढोल की ललकारती आवाज़ ने ही उसकी नसों में बिजली भर दी थी और उसे बड़े-बड़े पहलवानों से लड़ने का साहस दिया था। कुश्ती के हर मैदान में ढोल की आवाज़ ही उसे दाँव-पेंच का संकेत देती और हिम्मत बँधाती थी, न कि किसी इंसानी गुरु ने। इसीलिए वह अपने पुत्रों से कहता है कि उसका असली गुरु कोई पहलवान नहीं, बल्कि यही ढोल है, क्योंकि ढोल की आवाज़ के प्रताप से ही वह पहलवान बना।
प्र. गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटों के देहांत के बावजूद लुट्टन पहलवान ढोल क्यों बजाता रहा?
उत्तर: लुट्टन के लिए ढोल बजाना सिर्फ़ एक आदत नहीं, बल्कि जीवन के प्रति उसकी जीवटता और हार न मानने का प्रतीक था। ढोल की आवाज़ मृत-गाँव में संजीवनी शक्ति जैसी भरती थी, इसमें बुखार भगाने या महामारी रोकने की असली शक्ति भले न हो, पर यह मरते हुए लोगों को बिना तकलीफ़ और बिना डर के मरने का सहारा देती थी। अपने बेटों की मृत्यु की रात भी उसने ढोल बजाई। लेखक ने उसका खयाल नहीं बताया (“चाहे जिस खयाल से ढोलक बजाता हो”); पाठ से इतना दिखता है कि वह मरते गाँव को सहारा देता रहा और अपने दुख के बीच भी ढोल नहीं छोड़ता। ढोल बजाना बंद करना उसके लिए हार मान लेने जैसा होता।
प्र. ढोलक की आवाज़ का पूरे गाँव पर क्या असर होता था?
उत्तर: ढोलक की आवाज़ का गाँव पर गहरा मनोवैज्ञानिक असर होता था। महामारी-ग्रस्त, अंधकार और सन्नाटे में डूबे गाँव में यही एक आवाज़ थी जो हर रात बिना रुके बजती रहती और मृत-सी पड़ी बस्ती में जीवन का एहसास कराती। कमज़ोर और बीमार बूढ़े-बच्चे-जवानों की आँखों के आगे भी दंगल के दृश्य नाचने लगते थे, और उनकी शक्तिहीन नसों में भी मानो बिजली दौड़ जाती थी। ढोलक की आवाज़ में महामारी को रोकने की असली शक्ति नहीं थी, पर यह लोगों को मृत्यु के डर से मुक्त कर, बिना तकलीफ़ के मरने का सहारा देती थी।
प्र. महामारी फैलने के बाद गाँव में सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य में क्या अंतर होता था?
उत्तर: महामारी के दौरान सूर्योदय और सूर्यास्त के समय गाँव का माहौल एकदम अलग होता था। दिन में सूर्य की रोशनी के साथ लोगों के चेहरों पर “कुछ प्रभा” दिखती थी, वे काँखते-कराहते हुए भी घरों से बाहर निकलकर एक-दूसरे को ढाढ़स देते थे, जैसे “जो गया सो तो चला गया, वह तुम्हारा नहीं था; वह जो है उसको तो देखो।” लेकिन सूर्यास्त होते ही जब लोग अपनी-अपनी झोंपड़ियों में घुस जाते, तो वे पूरी तरह चुप हो जाते, चूँ तक नहीं करते थे। रात में उनकी बोलने की शक्ति तक जाती रहती थी, यहाँ तक कि दम तोड़ते बेटे को अंतिम बार “बेटा” कहकर पुकारने की हिम्मत भी माताओं में नहीं बचती थी।
प्र. कुश्ती या दंगल पहले लोगों और राजाओं का प्रिय शौक हुआ करता था। पहलवानों को राजा एवं लोगों के द्वारा विशेष सम्मान दिया जाता था: (क) ऐसी स्थिति अब क्यों नहीं है? (ख) इसकी जगह अब किन खेलों ने ले ली है? (ग) कुश्ती को फिर से प्रिय खेल बनाने के लिए क्या-क्या कार्य किए जा सकते हैं?
उत्तर: (क) पाठ में इसका कारण नहीं बताया गया है; एक संभावित कारण यह है कि आधुनिकीकरण के प्रभाव से लोगों की रुचि और शासकों का संरक्षण दूसरी दिशाओं में मुड़ गया, ठीक जैसे कहानी में नए राजकुमार ने दंगल की जगह घोड़े की रेस को अपनाया। (ख) कुश्ती की जगह आज क्रिकेट, फ़ुटबॉल, बैडमिंटन, कबड्डी और अन्य आधुनिक व टेलीविज़न-अनुकूल खेलों ने ले ली है। (ग) कुश्ती को फिर से लोकप्रिय बनाने के लिए इसे स्कूल-कॉलेज पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सकता है, स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर पेशेवर लीग शुरू की जा सकती हैं, इसका सीधा प्रसारण बढ़ाया जा सकता है, और पहलवानों को अच्छी आर्थिक सुरक्षा व सम्मान देकर युवाओं को इस ओर आकर्षित किया जा सकता है।
प्र. आशय स्पष्ट करें: आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी। अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे।
उत्तर: इस पंक्ति में लेखक ने मानवीकरण अलंकार का प्रयोग करते हुए तारों को इंसानी भाव दिए हैं। इसका शाब्दिक अर्थ है कि जब कोई तारा टूटकर पृथ्वी की ओर आने की कोशिश करता है, तो रास्ते में ही उसकी चमक और ताकत ख़त्म हो जाती है, और बाकी तारे उसकी इस नाकाम कोशिश पर हँसते हैं। गहरे अर्थ में यह पंक्ति दिखाती है कि जो कोई अपनी सीमा से बड़ा कुछ करना चाहे, अक्सर रास्ते में ही उसकी शक्ति चुक जाती है, और आस-पास के लोग उसकी मदद करने के बजाय उसका मज़ाक उड़ाते हैं। यह उस निराशाजनक, निर्मम माहौल को भी दर्शाता है जो कहानी के आरंभ में महामारी-ग्रस्त गाँव की रात में छाया हुआ है।
प्र. पाठ में अनेक स्थलों पर प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। पाठ में से ऐसे अंश चुनिए और उनका आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: पाठ में मानवीकरण के कई सुंदर उदाहरण मिलते हैं। पहला: “अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी”: यहाँ रात को इंसान की तरह रोते हुए दिखाया गया है, जो गाँव के दुख को दर्शाता है। दूसरा: “निस्तब्धता करुण सिसकियों और आहों को बलपूर्वक अपने हृदय में ही दबाने की चेष्टा कर रही थी”: यहाँ सन्नाटे को भी दबी हुई सिसकियों के साथ इंसानी संघर्ष जैसा दिखाया गया है। तीसरा: “आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी”: यहाँ तारों को भावुकता, असफलता और हँसी जैसे मानवीय भाव दिए गए हैं। इन सभी अंशों का आशय यह है कि रेणु प्रकृति को केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि कहानी के भावों को गहराई से व्यक्त करने वाला एक जीवंत हिस्सा बना देते हैं।
2 पाठ के आसपास
प्र. पाठ में मलेरिया और हैज़े से पीड़ित गाँव की दयनीय स्थिति को चित्रित किया गया है। आप ऐसी किसी अन्य आपद स्थिति की कल्पना करें और लिखें कि आप ऐसी स्थिति का सामना कैसे करेंगे/करेंगी?
उत्तर: यह एक व्यक्तिगत, कल्पना-आधारित प्रश्न है, विद्यार्थी अपनी समझ से लिखें। उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र में भूकंप जैसी आपदा आए, तो सबसे पहले घबराए बिना सुरक्षित स्थान पर जाना, परिवार और पड़ोसियों की मदद करना, प्रशासन व राहत दल के निर्देशों का पालन करना और आपस में हिम्मत बँधाना ज़रूरी होगा। ठीक जैसे कहानी में पहलवान की ढोलक ने गाँव को मानसिक सहारा दिया, वैसे ही संकट के समय एक-दूसरे का साथ देना और उम्मीद न खोना सबसे ज़रूरी काम होता है।
प्र. ढोलक की थाप मृत-गाँव में संजीवनी शक्ति भरती रहती थी: कला से जीवन के संबंध को ध्यान में रखते हुए चर्चा कीजिए।
उत्तर: यह पंक्ति कला और जीवन के गहरे संबंध को दिखाती है। ढोलक की आवाज़ में महामारी को रोकने या बुखार भगाने की कोई वैज्ञानिक शक्ति नहीं थी, फिर भी वह मृत-सी पड़ी बस्ती में जीवन का एहसास कराती थी, बीमार और कमज़ोर लोगों की आँखों में भी उम्मीद जगाती थी। यह दिखाता है कि कला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि मुश्किल समय में इंसान को मानसिक शक्ति, हिम्मत और जीने की इच्छा देने का काम भी करती है। जब भौतिक साधन (दवा, इलाज) उपलब्ध न हों, तब भी कला (यहाँ ढोलक का संगीत) व्यक्ति को अंदर से जोड़े रखती है और मुश्किल घड़ी को थोड़ा सहनीय बना देती है।
प्र. चर्चा करें: कलाओं का अस्तित्व व्यवस्था का मोहताज नहीं है।
उत्तर: कहानी इस बात की पुष्टि भी करती है और इसे चुनौती भी देती है। एक ओर, लुट्टन दरबार से निकाले जाने के बाद भी, गाँव में साधनहीन होकर भी, ढोलक बजाना नहीं छोड़ता, यह दिखाता है कि सच्ची कला और कलाकार की जीवटता किसी राजदरबार या व्यवस्था की मोहताज नहीं होती, वह विपरीत परिस्थितियों में भी ज़िंदा रहती है। दूसरी ओर, कहानी यह भी दिखाती है कि बिना व्यवस्था के संरक्षण के कला का फलना-फूलना कठिन होता है, जैसे लुट्टन का कुश्ती-स्कूल ग़रीबी के कारण बंद पड़ जाता है। इसलिए यह कहना उचित होगा कि कला का मूल अस्तित्व और आत्मा व्यवस्था की मोहताज नहीं होती, पर उसका फलना-फूलना और आगे बढ़ना समाज और व्यवस्था के सहयोग पर काफ़ी हद तक निर्भर करता है।
3 भाषा की बात
प्र. हर विषय, क्षेत्र, परिवेश आदि के कुछ विशिष्ट शब्द होते हैं। पाठ में कुश्ती से जुड़ी शब्दावली का बहुतायत प्रयोग हुआ है। उन शब्दों की सूची बनाइए। साथ ही नीचे दिए गए क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाले कोई पाँच-पाँच शब्द बताइए: चिकित्सा, क्रिकेट, न्यायालय, या अपनी पसंद का कोई क्षेत्र।
उत्तर: कुश्ती से जुड़े शब्द (पाठ में से): दंगल, पहलवान, कुश्ती, दाँव-पेंच, लँगोट, मैदान, चित करना, गुरु, टायटिल, पट्ठा। चिकित्सा से जुड़े पाँच शब्द: रोगी, निदान, इंजेक्शन, दवाई, ऑपरेशन। क्रिकेट से जुड़े पाँच शब्द: बल्लेबाज़, गेंदबाज़, विकेट, छक्का, अंपायर। न्यायालय से जुड़े पाँच शब्द: न्यायाधीश, वकील, गवाह, फ़ैसला, सुनवाई।
प्र. पाठ में अनेक अंश ऐसे हैं जो भाषा के विशिष्ट प्रयोगों की बानगी प्रस्तुत करते हैं। भाषा का विशिष्ट प्रयोग न केवल भाषाई सर्जनात्मकता को बढ़ावा देता है बल्कि कथ्य को भी प्रभावी बनाता है। यदि उन शब्दों, वाक्यांशों के स्थान पर किन्हीं अन्य का प्रयोग किया जाए तो संभवतः वह अर्थगत चमत्कार और भाषिक सौंदर्य उद्घाटित न हो सके। कुछ प्रयोग इस प्रकार हैं: (क) फिर बाज़ की तरह उस पर टूट पड़ा। (ख) राजा साहब की स्नेह-दृष्टि ने उसकी प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए। (ग) पहलवान की स्त्री भी दो पहलवानों को पैदा करके स्वर्ग सिधार गई थी। इन विशिष्ट भाषा-प्रयोगों का प्रयोग करते हुए एक अनुच्छेद लिखिए।
उत्तर: मेरे गाँव में एक पुराना कुश्ती-गुरु रहते थे। जब कोई नौजवान अखाड़े में उनसे उलझने की हिम्मत करता, तो वे फिर बाज़ की तरह उस पर टूट पड़ते और पल भर में उसे धूल चटा देते। गाँव वालों का कहना था कि वर्षों की मेहनत और उनके गुरु की स्नेह-दृष्टि ने ही उनकी प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए थे। दुख की बात यह रही कि पिछले साल उनकी पत्नी, जिसने दो होनहार बेटों को जन्म देकर उन्हें भी कुश्ती सिखाई थी, बीमारी से स्वर्ग सिधार गई। उसके जाने के बाद भी वे रोज़ शाम अखाड़े में उतरते हैं, मानो उनकी हिम्मत आज भी उतनी ही अजेय हो जितनी जवानी में थी।
प्र. जैसे क्रिकेट की कमेंट्री की जाती है वैसे ही इसमें कुश्ती की कमेंट्री की गई है? आपको दोनों में क्या समानता और अंतर दिखाई पड़ता है?
उत्तर: हाँ, इस पाठ में कुश्ती की कमेंट्री जैसा ही तेज़, चित्रात्मक और उत्साह बढ़ाने वाला वर्णन मिलता है, जैसे क्रिकेट कमेंट्री में हर गेंद और शॉट का लाइव विवरण दिया जाता है। समानता यह है कि दोनों में भाषा तेज़, संक्षिप्त और नाटकीय होती है, ताकि सुनने या पढ़ने वाले को लगे जैसे वह घटना खुद अपनी आँखों के सामने देख रहा है, जैसे इस पाठ में ढोलक के बोल (“चट्-धा, गिड़-धा”, “उठाकर पटक दे”) हर पल का हाल बताते हैं। अंतर यह है कि क्रिकेट कमेंट्री सीधे बोले गए शब्दों में होती है, जबकि यहाँ कमेंट्री का काम इंसानी आवाज़ की जगह ढोलक के ध्वन्यात्मक बोल करते हैं, यानी लेखक ने संगीत और ध्वनि के ज़रिए एक अनूठी, अधिक काव्यात्मक कमेंट्री-शैली रची है, जो सामान्य कमेंट्री से कहीं अधिक भावनात्मक और सांस्कृतिक गहराई लिए हुए है।