पहलवान की ढोलक — फणीश्वर नाथ रेणु

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इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • फणीश्वर नाथ रेणु का जीवन-परिचय और उनकी आंचलिक लेखन-शैली की पहचान
  • “पहलवान की ढोलक” कहानी को आरंभ से अंत तक क्रम में समझना और सुनाना
  • ढोलक के अलग-अलग बोलों का अर्थ और कहानी में उनकी भूमिका बताना
  • कहानी के सभी पात्रों को पहचानना और उनकी भूमिका समझाना
  • शीर्षक “पहलवान की ढोलक” की सार्थकता और कहानी के गहरे संदेश (कला बनाम व्यवस्था) को अपने शब्दों में लिखना
  • रेणु की आंचलिक भाषा-शैली, ध्वन्यात्मक शब्दों और मानवीकरण के उदाहरण पहचानना
आंचलिक उपन्यासकारमैला आँचललुट्टन सिंह पहलवानध्वन्यात्मक शब्दमानवीकरणभारत बनाम इंडिया

1 लेखक-परिचय: फणीश्वर नाथ रेणु

फणीश्वर नाथ रेणु हिंदी साहित्य में आंचलिक (क्षेत्रीय/देहाती परिवेश पर आधारित) उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं; पाठ के अनुसार हिंदी में आंचलिक उपन्यासों पर विमर्श उनके ‘मैला आँचल’ से ही प्रारंभ हुआ। “आंचलिक” का मतलब है किसी खास इलाके (अंचल) की भाषा, लोक-संस्कृति और लोक-जीवन को कहानी के केंद्र में रखना; पाठ के अनुसार रेणु ने “नायक की जगह अंचल को ही नायक बना डाला”। रेणु की रचनाओं में अंचल “कच्चे और अनगढ़ रूप में” आता है।

आंचलिकता (पाठ के अनुसार)

पाठ के अनुसार आंचलिकता की अवधारणा ने कथा-साहित्य में गाँव की भाषा-संस्कृति और वहाँ के लोक जीवन को केंद्र में ला खड़ा किया।

बिंदु विवरण
जन्म 4 मार्च, सन् 1921, औराही हिंगना (ज़िला पूर्णिया, अब अररिया), बिहार
मृत्यु 11 अप्रैल, सन् 1977, पटना
प्रमुख उपन्यास मैला आँचल, परती परिकथा, दीर्घतपा, जुलूस, कितने चौराहे
प्रमुख कहानी-संग्रह ठुमरी, अग्निखोर, आदिम रात्रि की महक, एक श्रावणी दोपहरी की धूप
संस्मरण ऋणजल धनजल, वनतुलसी की गंध, श्रुत-अश्रुत पूर्व
रिपोर्ताज नेपाली क्रांति कथा
समग्र संकलन रेणु रचनावली (पाँच खंडों में)
क्या आप जानते हैं?

1954 में प्रकाशित रेणु के बहुचर्चित उपन्यास मैला आँचल से हिंदी जगत में आंचलिक उपन्यासों पर विमर्श प्रारंभ हुआ। पाठ-परिचय के अनुसार रेणु की रचनाएँ इस अवधारणा को भी पुष्ट करती हैं कि भाषा की सार्थकता “बोली के साहचर्य में ही है”: यानी भाषा तभी सजीव लगती है जब वह अपनी बोली से जुड़ी हो।

2 पाठ-परिचय: कहानी किस बारे में है

“पहलवान की ढोलक” गद्य खंड की कहानी है, जो रेणु की प्रतिनिधि (सबसे प्रतिनिधित्व करने वाली) कहानियों में गिनी जाती है, पाठ के अनुसार यह कहानी रेणु की समस्त विशेषताओं को एक साथ अभिव्यक्त करती है। यह सिर्फ़ एक पहलवान की कहानी नहीं, बल्कि व्यवस्था के बदलने के साथ लोक-कला और उसके कलाकार के अप्रासंगिक (irrelevant) हो जाने की कहानी है।

परीक्षा संकेत

यह पाठ का केंद्रीय भाव है: इसे शब्दशः याद करने की बजाय अपने शब्दों में समझें और लिखने का अभ्यास करें।

राजा साहब की जगह नए राजकुमार का आना केवल एक व्यक्ति की सत्ता बदलना नहीं है, बल्कि पुरानी परंपरागत व्यवस्था के पूरी तरह उलट जाने और सभ्यता के नाम पर एकदम नई व्यवस्था के आरोपित हो जाने का प्रतीक है: यही “भारत” पर “इंडिया” के छा जाने की समस्या है।

पाठ की भूमिका का मूल भाव (हमारे शब्दों में सार)

इसी बदलाव में लुट्टन पहलवान लोक-कलाकार के आसन से उठाकर पेट भरने के लिए हाय-तौबा करने वाली निरीहता (लाचारी) की ज़मीन पर पटक दिया जाता है। कहानी के अंत में जब भूख और महामारी उसकी भरी-पूरी पहलवानी को “फटे ढोल की पोल” में बदल देते हैं, तो यह कहानी हमारे सामने कई सवाल छोड़ जाती है: क्या कला की अहमियत सिर्फ़ उस व्यवस्था पर निर्भर है जो उसे पालती है, या कला का कोई अपना, स्वतंत्र मूल्य भी होता है?

3 कहानी का सार: घटनाक्रम में

3.1 रात का वातावरण: महामारी-ग्रस्त गाँव

कहानी की शुरुआत जाड़े की एक अमावस्या की रात से होती है। गाँव मलेरिया और हैज़े से पीड़ित है, चारों ओर अंधकार और सन्नाटा है। सियारों का क्रंदन और पेचक (उल्लू) की डरावनी आवाज़ कभी-कभी निस्तब्धता को भंग करती थी, पर रात की भीषणता को ललकारती सिर्फ़ पहलवान की ढोलक थी, जो संध्या से प्रातःकाल तक एक ही गति से बजती रहती थी। पाठ के शब्दों में, “यही आवाज़ मृत-गाँव में संजीवनी शक्ति भरती रहती थी।”

3.2 लुट्टन सिंह पहलवान: बचपन

  • लुट्टन के माता-पिता उसे नौ वर्ष की उम्र में ही अनाथ बनाकर चल बसे
  • सौभाग्यवश उसकी शादी हो चुकी थी, वरना वह भी माँ-बाप का अनुसरण करता; विधवा सास ने उसे पाल-पोसकर बड़ा किया
  • बचपन में वह गाय चराता, धारोष्ण (दुहते ही, बिना उबाला) दूध पीता और नियमित कसरत करता था
  • गाँव के लोग उसकी सास को तरह-तरह की तकलीफ़ दिया करते थे; पाठ के अनुसार लुट्टन के सिर पर कसरत की धुन लोगों से बदला लेने के लिए ही सवार हुई थी
  • जवानी में कदम रखते ही वह गाँव में सबसे अच्छा पहलवान समझा जाने लगा

3.3 श्यामनगर मेला: चाँद सिंह को चुनौती

  • एक बार लुट्टन “दंगल” देखने श्यामनगर के मेले में गया
  • वहाँ पंजाब से आया पहलवान चाँद सिंह (“शेर के बच्चे” की उपाधि प्राप्त) कुश्ती लड़ रहा था: उसके गुरु बादल सिंह भी साथ थे
  • जवानी के जोश और ढोल की ललकारती आवाज़ में बहककर लुट्टन ने बिना सोचे-समझे चाँद सिंह को चुनौती दे दी
  • राजा साहब ने पहले उसे दस रुपये देकर मना करने की कोशिश की: “जाओ, मेला देखकर घर जाओ”
  • पर लुट्टन अड़ गया: “नहीं सरकार, लड़ेंगे… हुकुम हो सरकार!” आख़िर राजा साहब को आज्ञा देनी ही पड़ी

4 ढोलक की भाषा: कुश्ती के दौरान बोल-दर-बोल

पाठ के अनुसार रेणु वैसे गिने-चुने कथाकारों में से हैं जिन्होंने गद्य में भी संगीत पैदा कर दिया है: ढोलक की उठती-गिरती आवाज़ को शब्दों में ऐसे पिरोया है कि वह खुद एक पात्र जैसी लगने लगती है। कुश्ती के हर मोड़ पर ढोलक की आवाज़ बदलती है और मानो लुट्टन को निर्देश देती है:

ढोलक का बोल कहानी में दिया गया अर्थ प्रसंग (कब बजा)
चट्-धा, गिड़-धा आ जा भिड़ जा, आ जा भिड़ जा कुश्ती शुरू होने से पहले और आम दिनों की स्थायी धुन
चटाक्-चट्-धा उठाकर पटक दे कुश्ती के बीच में; बाद में बेटों की अंतिम रात भी यही बोल बजा
ढाक्-ढिना वाह पट्ठे चाँद सिंह ने लुट्टन को कस कर दबाया, तब ढोल हौसला देता है
चट्-गिड़-धा मत डरना चाँद लुट्टन की गर्दन पर केहुनी डालकर “चित” करने की कोशिश कर रहा था
धाक-धिना, तिरकट-तिना दाँव काटो, बाहर हो जा लुट्टन दाँव काटकर आक्रमण से बाहर निकलता है
धिना-धिना, धिक-धिना चित करो, चित करो लुट्टन आख़िरी ज़ोर लगाकर चाँद को ज़मीन पर पटकता है
धा-गिड़-गिड़ वाह बहादुर लुट्टन की जीत पर, तीन बार दोहराया गया
परीक्षा संकेत

“ढोल की आवाज़ और लुट्टन के दाँव-पेंच में तालमेल” (पाठ का अभ्यास-प्रश्न): ऊपर की तालिका ढोलक के बोलों को कुश्ती के क्रम में दिखाती है; इसे क्रम से पढ़ें।

5 जीत, पुरस्कार और जाति-विवाद

  • लुट्टन ने अंततः चाँद सिंह को हरा दिया; दर्शकों ने जय-जयकार की। विजयी लुट्टन ने सबसे पहले दौड़कर ढोलों को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया, फिर दौड़कर राजा साहब को गोद में उठा लिया; राजा साहब के कीमती कपड़े मिट्टी में सन गए
  • राजा साहब ने उसे छाती से लगाकर गद्गद होकर कहा: “जीते रहो, बहादुर! तुमने मिट्टी की लाज रख ली!”
  • राजा साहब ने उसे पुरस्कृत करने के साथ-साथ अपने दरबार में राज-पहलवान के रूप में हमेशा के लिए रख लिया, और उसे “लुट्टन सिंह” कहकर पुकारने लगे
  • इस पर राज-पंडितों ने मुँह बिचकाते हुए आपत्ति जताई: “हुज़ूर! जाति का … सिंह!” (आपत्ति इन्हीं शब्दों में है; पाठ लुट्टन की जाति नहीं बताता); दरबार के मैनेजर साहब (स्वयं क्षत्रिय) ने भी कहा, “हाँ सरकार, यह अन्याय है!”
  • राजा साहब ने मुस्कुराते हुए सिर्फ़ इतना ही कहा: “उसने क्षत्रिय का काम किया है।” इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि बहादुरी जाति से नहीं, काम से आँकी गई
Learn by heartमहत्वपूर्ण उद्धरण

राजा साहब का उत्तर: “उसने क्षत्रिय का काम किया है।” यह राज-पंडितों की आपत्ति (“जाति का … सिंह”) का उत्तर है। एक पढ़त यह है कि यह जाति-आधारित सोच के सामने बहादुरी को कर्म से जोड़ता है।

6 ख्याति के पंद्रह वर्ष और परिवार

  • “उसी दिन से” (चाँद सिंह को हराने के दिन से) लुट्टन सिंह पहलवान की कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई; पौष्टिक भोजन, व्यायाम और राजा साहब की स्नेह-दृष्टि ने उसकी प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए; कुछ वर्षों में उसने सभी नामी पहलवानों को हराया
  • काला खाँ नाम के एक पहलवान के बारे में मशहूर था कि वह “आ-ली” कहकर हमला करते ही प्रतिद्वंद्वी को लकवा मार जाता था: लुट्टन ने उसे भी पटककर यह भ्रम तोड़ दिया
  • उसके बाद से वह राज-दरबार का “दर्शनीय ‘जीव'” ही रहा: मेलों में घुटने तक लंबा चोगा पहने मतवाले हाथी की तरह झूमता; हलवाई के बुलाने पर बच्चों की-सी हँसी हँसकर कहता, “अरे तनी-मनी काहे! ले आव डेढ़ सेर!”, और दो सेर रसगुल्ला उदरस्थ कर जाता। पाठ के अनुसार बल और शरीर की वृद्धि के साथ उसकी बुद्धि घटकर बच्चों की बुद्धि के बराबर ही रह गई थी। दंगल में ढोल सुनते ही वह शरीर का प्रदर्शन करने लगता, और बूढ़े राजा साहब देख-देखकर मुस्कुराते रहते
  • यों ही पंद्रह वर्ष बीत गए; पहलवान अजेय रहा। वह दंगल में अपने दोनों पुत्रों को लेकर उतरता था
  • इसी बीच उसकी सास और पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी; उसके दो पुत्र थे, जिनका पालन-पोषण दरबार से हो रहा था
  • पहलवान रोज़ सुबह ढोलक बजा-बजाकर दोनों बेटों से कसरत करवाता और उन्हें सिखाता: “ढोलक की आवाज़ पर पूरा ध्यान देना। हाँ, मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है, समझे! ढोल की आवाज़ के प्रताप से ही मैं पहलवान हुआ।”
Learn by heartपरिभाषा 2

“मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है”: लुट्टन स्वयं कहता है कि “ढोल की आवाज़ के प्रताप से ही मैं पहलवान हुआ”। इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि ढोलक उसके लिए सिर्फ़ वाद्य नहीं, उसकी शक्ति और आत्मविश्वास का स्रोत है, और शीर्षक की सार्थकता भी यहीं से समझी जा सकती है।

7 पतन की शुरुआत: व्यवस्था बदलती है

यहाँ से कहानी का मोड़ आता है।

चरण 1वृद्ध राजा साहब की मृत्यु हो जाती है
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चरण 2नया राजकुमार विलायत (विदेश) से लौटकर राज्य अपने हाथ में ले लेता है
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चरण 3पुरानी व्यवस्था में ढील खत्म; कई बदलाव होते हैं: दंगल की जगह घोड़े की रेस ले लेती है
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चरण 4पहलवान और उसके दोनों बेटों का दैनिक भोजन-खर्च सुनकर राजकुमार कहता है “टैरिबुल!”, नया मैनेजर कहता है “हौरिबुल!”
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परिणामपहलवान को साफ़ जवाब मिल जाता है: दरबार में अब उसकी ज़रूरत नहीं; उसे बिना गिड़गिड़ाने का मौका दिए ही निकाल दिया जाता है

राजा साहब का समय

  • दंगल-कुश्ती को सम्मान और संरक्षण मिलता था
  • राजा साहब ने लुट्टन की बहादुरी को “उसने क्षत्रिय का काम किया है” कहकर सराहा
  • लोक-कला (ढोलक, कुश्ती) दरबार का हिस्सा थी

नए राजकुमार का समय

  • दंगल का स्थान घोड़े की रेस ने लिया
  • पहलवान का खर्च फ़िज़ूल माना गया (“टैरिबुल”)
  • लोक-कलाकार दरबार से बाहर कर दिया गया
आम ग़लती

बहुत छात्र इसे सिर्फ़ “पहलवान की नौकरी चली गई” जैसी सामान्य घटना समझ लेते हैं। पाठ की भूमिका के अनुसार यह पुरानी व्यवस्था के उलट जाने और सभ्यता के नाम पर एकदम नई व्यवस्था के आरोपित हो जाने का प्रतीक है: उत्तर में इस अर्थ को भी लिखें, सिर्फ़ घटना मत बताएँ।

7.1 गाँव वापसी और अकाल की मार

  • पहलवान अपने दोनों पुत्रों के साथ ढोलक कंधे पर लटकाकर गाँव लौट आता है
  • गाँव वालों ने उसके लिए एक झोंपड़ी बनवा दी; वह नौजवानों और चरवाहों को कुश्ती सिखाने लगा
  • पर गाँव के ग़रीब किसान-मज़दूरों के बच्चे भला क्या खाकर कुश्ती सीखते: धीरे-धीरे स्कूल खाली पड़ने लगा
  • अंत में पहलवान सिर्फ़ अपने दोनों पुत्रों को ही ढोलक बजा-बजाकर सिखाता रहा; दोनों बेटे मज़दूरी करके गुज़ारा चलाते
अकाल का क्रम
अनावृष्टि (बारिश न होना) → अन्न की कमी → मलेरिया और हैज़ा
यही क्रम कहानी के आरंभ में दिखाए गए महामारी-ग्रस्त गाँव तक ले जाता है; पढ़ने वाले को लग सकता है कि कहानी का अंत उसके शुरुआती दृश्य की याद दिलाता है

गाँव में रोज़ दो-तीन लाशें उठने लगीं। दिन में लोग एक-दूसरे को ढाढ़स देते, पर सूर्यास्त होते ही वे चुप हो जाते और उनकी बोलने की शक्ति भी जाती रहती: यहाँ तक कि दम तोड़ते बेटे को आख़िरी बार “बेटा” कहकर पुकारने की हिम्मत भी माताओं में नहीं बचती थी। इस भयानक सन्नाटे को सिर्फ़ पहलवान की ढोलक ही चुनौती देती रहती: भले ही उसमें बुखार भगाने या महामारी रोकने की शक्ति न हो, पर वह मरते हुए लोगों को बिना तकलीफ़ के, बिना डर के मरने का सहारा ज़रूर देती थी।

7.2 दोनों पुत्रों की मृत्यु

  • पहलवान के दोनों बेटे क्रूर काल (मृत्यु) की चपेट में आ गए; असह्य वेदना में छटपटाते हुए उन्होंने आख़िरी बार कहा: “बाबा! उठा पटक दो वाला ताल बजाओ!”
  • पहलवान ने सारी रात ढोलक पीटी और बीच-बीच में “मारो बहादुर!” कहकर उन्हें उत्साहित भी किया
  • सुबह उसने देखा कि दोनों बच्चे ज़मीन पर मृत पड़े हैं; एक लंबी साँस लेकर बस इतना कहा: “दोनों बहादुर गिर पड़े!”
  • उसी दिन पहलवान ने राजा की दी हुई रेशमी जाँघिया पहनी, शरीर पर मिट्टी मली, थोड़ी कसरत की: और फिर दोनों पुत्रों को कंधों पर लादकर नदी में बहा आया
  • उस रात फिर से ढोलक की आवाज़ सुनाई पड़ी: गाँव वालों की हिम्मत दुगुनी बढ़ गई

7.3 पहलवान की स्वयं की मृत्यु

  • चार-पाँच दिनों बाद एक रात ढोलक की आवाज़ नहीं आई
  • अगली सुबह पहलवान के कुछ बहादुर पर रुग्ण (कमज़ोर, बीमार) शिष्यों ने जाकर देखा: पहलवान की लाश “चित” (पीठ के बल) पड़ी थी
  • एक शिष्य ने आँसू पोंछते हुए बताया कि गुरुजी कहा करते थे: मरने पर चिता पर उन्हें चित नहीं, पेट के बल सुलाया जाए (“मैं ज़िंदगी में कभी चित नहीं हुआ”), और चिता सुलगाने के समय ढोलक बजाई जाए

“गुरु जी कहा करते थे कि जब मैं मर जाऊँ तो चिता पर मुझे चित नहीं, पेट के बल सुलाना। मैं ज़िंदगी में कभी चित नहीं हुआ। और चिता सुलगाने के समय ढोलक बजा देना।”

पहलवान की अंतिम इच्छा (शिष्य द्वारा बताई गई बात)। कहानी का आख़िरी वाक्य: “वह आगे बोल नहीं सका।”

8 पात्र-परिचय

1

लुट्टन सिंह पहलवान

कहानी का नायक, जीवट का प्रतीक।

2

चाँद सिंह (“शेर के बच्चे”)

पंजाब का घमंडी पहलवान, लुट्टन का पहला बड़ा प्रतिद्वंद्वी।

3

काला खाँ

लकवे की अफ़वाह वाला पहलवान, लुट्टन ने भ्रम तोड़ा।

4

राजा साहब (राजा श्यामानंद)

श्यामनगर के वृद्ध राजा, लुट्टन को संरक्षण देने वाले।

5

नया राजकुमार

विलायत से लौटा उत्तराधिकारी; खर्च सुनकर “टैरिबुल!” कहता है, जिसके बाद पहलवान को साफ़ जवाब मिल जाता है।

6

दोनों पुत्र

लुट्टन के दो गठीले बेटे; दंगल में पिता के साथ उतरते थे, काल की चपेट में मारे गए। अंतिम माँग: “बाबा! उठा पटक दो वाला ताल बजाओ!”

7

मैनेजर साहब

राजा साहब के क्षत्रिय मैनेजर; राज-पंडितों की आपत्ति पर कहते हैं, “हाँ सरकार, यह अन्याय है!”

8

बादल सिंह

चाँद सिंह का गुरु पहलवान: “वहीं दफ़ना दे, बहादुर!”

9

नया मैनेजर

राजकुमार के साथ खर्च सुनकर “हौरिबुल!” कहता है।

9 शीर्षक की सार्थकता

कहानी का शीर्षक “पहलवान की ढोलक” बहुत सोच-समझकर रखा गया है। ढोलक सिर्फ़ एक वाद्य-यंत्र नहीं, बल्कि पूरी कहानी की जान है:

  • ढोलक की आवाज़ ही महामारी-ग्रस्त गाँव को हिम्मत देती है
  • ढोलक की भाषा (बोल) ही कुश्ती के हर दाँव-पेंच को बताती है
  • ढोलक ही लुट्टन का “गुरु” है: उसकी ताकत और अनुशासन का स्रोत
  • बेटों की मृत्यु के समय भी सिर्फ़ ढोलक ही उनका सहारा बनती है
  • ढोलक की आवाज़ का बंद होना ही पहलवान की मृत्यु का संकेत बन जाता है

इसलिए ढोलक लोक-कला और लोक-कलाकार की जीवटता (जीवन-शक्ति) का प्रतीक बन जाती है: जब तक ढोलक बजती है, कला और कलाकार दोनों ज़िंदा हैं।

चित्र 1: पारंपरिक ढोलक, वही वाद्य जो कहानी में लुट्टन पहलवान का "गुरु" बनता है (चित्र: Sangram Keshari Senapati / Wikimedia Commons / CC BY-SA 4.0)
चित्र 1: पारंपरिक ढोलक, वही वाद्य जो कहानी में लुट्टन पहलवान का “गुरु” बनता है (चित्र: Sangram Keshari Senapati / Wikimedia Commons / CC BY-SA 4.0)
चित्र 2: पारंपरिक भारतीय कुश्ती (पहलवानी/दंगल) का एक दृश्य, प्रतीकात्मक चित्र (चित्र: Nikhilmore nimo / Wikimedia Commons / CC BY-SA 4.0)
चित्र 2: पारंपरिक भारतीय कुश्ती (पहलवानी/दंगल) का एक दृश्य, प्रतीकात्मक चित्र (चित्र: Nikhilmore nimo / Wikimedia Commons / CC BY-SA 4.0)

10 भाषा-शैली की विशेषताएँ

10.1 आंचलिकता और ध्वन्यात्मक शब्द

रेणु ने कहानी में गाँव की बोली और मुहावरों का खुलकर प्रयोग किया है: जैसे “होल इंडिया” (लुट्टन का मज़ाकिया अंग्रेज़ी-मिश्रित दावा), “टायटिल”; राजकुमार और नए मैनेजर के “टैरिबुल”, “हौरिबुल” जैसे अंग्रेज़ी शब्द भी पात्रों की पहचान उभारते हैं। ढोलक के बोल (चट्-धा, गिड़-धा आदि) भी ध्वन्यात्मक (आवाज़ की नकल करने वाले) शब्दों का सबसे बड़ा उदाहरण हैं।

10.2 मानवीकरण (Personification)

पाठ में प्रकृति और निर्जीव चीज़ों को मानवीय भाव दिए गए हैं। सबसे प्रसिद्ध उदाहरण:

उदाहरण

“आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी। अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे।”

आशय: यहाँ तारों को इंसानों जैसे भाव (भावुकता, हँसी, असफलता) दिए गए हैं। इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है कि टूटता तारा उस व्यक्ति जैसा है जो कुछ अच्छा करना चाहता है पर रास्ते में ही उसकी शक्ति ख़त्म हो जाती है; पाठ स्वयं यह तुलना नहीं करता।

इसी तरह “अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी” और “निस्तब्धता करुण सिसकियों और आहों को बलपूर्वक अपने हृदय में ही दबाने की चेष्टा कर रही थी” जैसी पंक्तियों में भी रात और सन्नाटे को इंसानी भावनाएँ दी गई हैं।

10.3 भाषा के विशिष्ट प्रयोग (उपमा, मुहावरा, सम्मानजनक कथन)

वाक्यांश

  1. फिर बाज़ की तरह उस पर टूट पड़ा (उपमा)
  2. प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए (मुहावरा)
  3. स्वर्ग सिधार गई (मृत्यु का सम्मानजनक कथन)

अर्थ

  1. अचानक और तेज़ी से हमला करना
  2. शोहरत को और बढ़ा देना
  3. मृत्यु हो जाना (सम्मानजनक ढंग से कहना)

11 परीक्षा हेतु मुख्य बिंदु

15वर्ष तक पहलवान अजेय रहा
2पुत्र, दोनों काल की चपेट में मृत
7प्रमुख ढोलक-बोल कहानी में
परीक्षा से पहले स्वयं जाँचें
  • क्या मैं रेणु का जन्म-मृत्यु और आंचलिक पहचान बिना देखे बता सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं कहानी को शुरू से अंत तक क्रम में सुना सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं ढोलक के कम-से-कम 4 बोल और उनका अर्थ लिख सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं “व्यवस्था बदलने पर लोक-कला अप्रासंगिक होना” को अपने शब्दों में समझा सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं मानवीकरण का कम-से-कम एक उदाहरण और उसका आशय लिख सकता/सकती हूँ?
त्वरित पुनरीक्षण: परीक्षा से पहले यही पढ़ें
  • फणीश्वर नाथ रेणु हिंदी के प्रतिष्ठित आंचलिक उपन्यासकार हैं; आंचलिक उपन्यासों पर विमर्श मैला आँचल (1954) से ही प्रारंभ हुआ, यह उनका बहुचर्चित उपन्यास है
  • कहानी व्यवस्था बदलने पर लोक-कला और कलाकार के अप्रासंगिक होने की कहानी है: “भारत” पर “इंडिया” के छा जाने का प्रतीक
  • लुट्टन सिंह नौ वर्ष की उम्र में अनाथ हुआ; जवानी में गाँव में सबसे अच्छा पहलवान समझा जाने लगा
  • श्यामनगर मेले में चाँद सिंह को हराकर राज-पहलवान बना, राजा साहब उसे “लुट्टन सिंह” कहकर पुकारने लगे, और उसी दिन से उसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई; राजा ने जाति-विवाद पर कहा “उसने क्षत्रिय का काम किया है”
  • ढोलक के बोल कुश्ती के हर दाँव को बताते हैं: चट्-धा गिड़-धा से लेकर धा-गिड़-गिड़ तक
  • “मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है”: ढोलक ही लुट्टन की असली ताकत का स्रोत है
  • नए राजकुमार के आने पर दंगल का स्थान घोड़े की रेस ने लिया; खर्च सुनकर “टैरिबुल!”/”हौरिबुल!” के बाद पहलवान को साफ़ जवाब मिल गया
  • गाँव लौटकर अकाल-महामारी (अनावृष्टि → अन्न की कमी → मलेरिया-हैज़ा) में दोनों पुत्रों को खोया, पर ढोलक बजाना नहीं छोड़ा
  • अंत में पहलवान की भी मृत्यु हो गई; उसकी अंतिम इच्छा थी: चिता पर उसे चित नहीं, पेट के बल सुलाया जाए, और चिता सुलगाते समय ढोलक बजाई जाए
  • शीर्षक की सार्थकता: ढोलक ही कहानी की जान है, कला और कलाकार की जीवटता का प्रतीक