- धर्मवीर भारती का जीवन-परिचय और उनकी प्रमुख रचनाएँ बता पाएँगे
- इंदर सेना और मेढक-मंडली: एक ही टोली के दो नामों का अर्थ और कारण समझा पाएँगे
- पानी माँगने के पूरे अनुष्ठान को क्रम से बता पाएँगे, और उस समय के सूखे की भयावहता से जोड़ पाएँगे
- बालक धर्मवीर के तर्क और जीजी के विश्वास के टकराव को अपने शब्दों में समझा पाएँगे
- जीजी के त्याग, दान और बुवाई वाले तर्क शब्दशः लिख पाएँगे
- संस्मरण के अंतिम सामाजिक प्रश्न (गगरी फूटी की फूटी) को उदाहरण सहित समझा पाएँगे
1लेखक परिचय: धर्मवीर भारती
धर्मवीर भारती का जन्म सन् 1926 में इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ, निधन सन् 1997 में। पाठ के अनुसार वे आज़ादी के बाद के हिंदी साहित्यकारों में विशिष्ट स्थान रखते हैं। उनकी कविताएँ, कहानियाँ, उपन्यास, निबंध, गीतिनाट्य और रिपोर्ताज हिंदी साहित्य की उपलब्धियाँ हैं, और वे मूल रूप से व्यक्ति स्वातंत्र्य, मानवीय संकट एवं रोमानी चेतना के रचनाकार हैं।
| श्रेणी | रचनाएँ |
|---|---|
| काव्य / कविता-संग्रह | कनुप्रिया, सात गीत वर्ष, ठंडा लोहा |
| कहानी-संग्रह | बंद गली का आखिरी मकान |
| उपन्यास | सूरज का सातवाँ घोड़ा (हिंदी फ़िल्म भी बन चुकी है), गुनाहों का देवता (उनका सबसे लोकप्रिय, सरस और भावप्रवण प्रेम-कथा वाला उपन्यास) |
| गीतिनाट्य | अंधा युग: आज़ादी के बाद गिरते जीवन-मूल्यों, अनास्था, मोहभंग और विश्वयुद्धों से उपजे डर की अभिव्यक्ति; गीतिसाहित्य के श्रेष्ठ गीतिनाट्यों में गिना जाता है |
| निबंध-संग्रह | पश्यंती, कहनी-अनकहनी, मानव मूल्य और साहित्य, ठेले पर हिमालय |
| अन्य गद्य | निबंध और रिपोर्ताज भी लिखे |
| प्रमुख सम्मान | पद्मश्री, व्यास सम्मान एवं साहित्य के कई अन्य राष्ट्रीय पुरस्कार |
धर्मवीर भारती लंबे समय तक हिंदी की साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग के संपादक रहे (अब बंद)। उनके गद्य लेखन की खासियत बड़ी बात को सीधी बातचीत की शैली में कहना है, और यही सहज शैली इस संस्मरण में भी दीखती है।
2संस्मरण की भूमिका: विश्वास बनाम विज्ञान
काले मेघा पानी दे लोक-प्रचलित विश्वास और विज्ञान के द्वंद्व (टकराव) का चित्रण है। भूमिका के शब्दों में, “विज्ञान का अपना तर्क है और विश्वास का अपना सामर्थ्य।” बारिश न होने पर विज्ञान हल नहीं दे पाता, तो समाज अपनी अशिक्षा-बेबसी के बीच भी कोई-न-कोई उपाय ढूँढ़ लेता है, जैसे इंदर सेना का यह अनुष्ठान।
पाठ की भूमिका इस द्वंद्व को इन बिंदुओं में रखती है:
- किशोर लेखक इंदर सेना पर पानी फेंकने को भीषण सूखे में पानी की निर्मम बरबादी मानता है। भूमिका के अनुसार इसे किशोर मन का वितर्क नहीं, वैज्ञानिक तर्क ही कहना चाहिए।
- इतने लंबे समय तक विज्ञान की पढ़ाई और विज्ञान के आविष्कारों से सुख-सुविधाएँ पाने के बावजूद जनमानस में ऐसी वैज्ञानिक दृष्टि का न जनम पाना अफ़सोसनाक है।
- जो विश्वास प्रत्यक्ष रूप से जानलेवा हों, या नस्ल-जाति, मज़हब और लिंग के आधार पर किसी समुदाय के लिए अपमानजनक हों, उन्हें अंधविश्वास कहकर जल्दी से जल्दी दूर करना ही एकमात्र कर्तव्य है।
- पर जो विश्वास विज्ञानसम्मत न होकर भी इस तरह हानिकर न हों, उनके साथ भी वैसा ही बर्ताव क्या उचित है? ऐसा करने में हमारे सांस्कृतिक मन के खाली-खाली हो जाने का खतरा है।
- विश्वास की भी एक रचनात्मक भूमिका हो सकती है: आपातकाल में निराशा दूर करना, अधीरता को थामना, या बँटी हुई जन-चेतना को जोड़ना।
- जीजी की संतुष्टि और अपने प्रति उनका सद्भाव बचाए रखने के लिए लेखक बचपन में उन तमाम रीति-रिवाजों को, ऊपरी तौर पर ही सही, अपनाने को बाध्य रहता था।
भूमिका के अनुसार बारिश के लिए किए जाने वाले इन भोले प्रयत्नों की कोटि पर “लेखक ने कोई निर्णय नहीं दिया है”। पर पानी की बरबादी के प्रश्न पर भूमिका बालक के तर्क को “वैज्ञानिक तर्क” कहती है, और हानिकर अंधविश्वासों को दूर करना कर्तव्य मानती है। अंत में भूमिका खुला प्रश्न रखती है: “विज्ञान का सत्य बड़ा है या सहज प्रेम का रस? या दोनों?”
3इंदर सेना और मेढक-मंडली: एक टोली, दो नाम
गाँव के लड़कों की एक टोली सूखे के दिनों में द्वार-द्वार पानी माँगते हुए निकलती थी। इसी टोली के दो बिलकुल अलग नाम थे।
इंदर सेना
- टोली का अपना नाम: वह घर-घर यही कहकर पुकारती थी, “पानी दे मैया, इंदर सेना आई है”
- पाठ कहता है कि दोनों नाम “बिलकुल एक-दूसरे के विपरीत” थे
मेढक-मंडली
- यह नाम वे लोग देते जो टोली के नंग-धड़ंग शरीर, उछलकूद, शोर-शराबे और गली में होने वाले कीचड़ काँदो से चिढ़ते थे
- “उनकी अगवानी गालियों से होती थी” (अगवानी = स्वागत)
इंदर सेना: गाँव के दस-बारह से सोलह-अठारह बरस तक के लड़कों की एक टोली, जो भीषण सूखे में साँवला-नंगा बदन और केवल जाँघिया या लंगोटी पहने, द्वार-द्वार बादलों से और घर वालों से पानी माँगती थी। इसी टोली को उससे चिढ़ने वाले लोग मेढक-मंडली कहते थे।
4अनुष्ठान का पूरा क्रम
इंदर सेना का अनुष्ठान एक तय क्रम में चलता था:
काले मेघा पानी दे
गगरी फूटी बैल पियासा
पानी दे, गुड़धानी दे
काले मेघा पानी दे।
5सूखे की भयावहता: अनुष्ठान का असली कारण
यह टोली किसी उत्सव के लिए नहीं, बल्कि एक सचमुच के संकट में निकलती थी। जेठ के दसतपा (तपते दस दिन) बीत जाते और आषाढ़ का पहला पखवारा (पंद्रह दिन) भी बीत चुका होता, पर क्षितिज पर बादल की एक रेख तक नहीं दीखती थी।

पूजा-पाठ और कथा-विधान जैसे सारे उपाय आज़माकर जब लोग हार जाते, तभी अंतिम उपाय के रूप में इंदर सेना निकलती। वर्षा के बादलों के स्वामी इंद्र माने जाते हैं, इसलिए यह टोली उन्हीं से पानी दिलवाने की उम्मीद में निकलती थी।
6कथावाचक बालक धर्मवीर: तर्कशील विरोध
कथावाचक (बालक धर्मवीर) स्वयं भी मेढक-मंडली के लड़कों जितनी ही उम्र का था, पर उस पर बचपन के आर्यसमाजी संस्कार थे।
कुमार-सुधार सभा: समाज-सुधार की एक सभा, जो “कायम हुई थी” और जिसमें बालक धर्मवीर को उपमंत्री (डिप्टी सेक्रेटरी) बना दिया गया था, और अंधविश्वासों के विरुद्ध “तरकस में तीर रखकर” घूमने जैसा उत्साह रखता था।
इसी सुधारवादी नज़रिए से बालक इंदर सेना पर पानी फेंकने को पाखंड और अंधविश्वास, और पानी की निर्मम बरबादी मानता था। उसके तर्क पाठ के शब्दों में: “कौन कहता है इन्हें इंद्र की सेना? अगर इंद्र महाराज से ये पानी दिलवा सकते हैं तो खुद अपने लिए पानी क्यों नहीं माँग लेते?” और “ऐसे ही अंधविश्वासों के कारण हम अंग्रेज़ों से पिछड़ गए और गुलाम बन गए।” यही तर्क आगे जीजी के साथ उसकी नोकझोंक की जड़ बनता है।
7जीजी: कौन थीं?
जीजी रिश्ते में बालक धर्मवीर की कोई नहीं थीं, और उम्र में उसकी माँ से भी बड़ी थीं। अपने ख़ुद के लड़के-बहू सबको छोड़कर उनके प्राण बालक में ही बसते थे। जीजी ही उन तमाम रीति-रिवाजों, तीज-त्योहारों और पूजा-अनुष्ठानों की “खान” (भंडार) थीं, जिन्हें बालक अंधविश्वास कहकर जड़ से उखाड़ फेंकना चाहता था।
पर जीजी का कोई भी पूजा-विधान या त्योहार बालक के बिना पूरा नहीं होता था, क्योंकि हर अनुष्ठान का पुण्य वे केवल उसे देना चाहती थीं।
| त्योहार | बालक की भूमिका |
|---|---|
| दीवाली | गोबर और कौड़ियों से गोवर्धन और सतिया (स्वस्तिक चिह्न) बनाना |
| जन्माष्टमी | आठ दिन तक झाँकी सजाना और पँजीरी बाँटना |
| हर-छठ (पूर्वी उत्तर प्रदेश का पर्व, जन्माष्टमी से दो दिन पहले) | छोटी रंगीन कुल्हियों में भुना चना, मटर, अरवा चावल और गेहूँ (भूजा) भरना |
8अवज्ञा का प्रसंग: एक बार का इनकार
इस बार बालक ने इंदर सेना पर पानी फेंकने से साफ़ इनकार कर दिया। जब जीजी स्वयं बाल्टी भरकर पानी ले गईं, उनके बूढ़े पाँव डगमगा रहे थे और हाथ काँप रहे थे, तब भी बालक अलग मुँह फुलाए खड़ा रहा। शाम को जीजी की दी हुई लड्डू-मठरी भी उसने हाथ से खिसका दी और मुँह फेरकर बैठ गया, बोला तक नहीं। जीजी पहले तमतमाईं, पर ज़्यादा देर गुस्सा टिक नहीं पाया, फिर वे पास आकर बालक का सिर अपनी गोद में ले बैठ गईं।
9जीजी के तीन तर्क: अंधविश्वास नहीं, अर्घ्य है
9.1 पहला तर्क: यह अंधविश्वास नहीं, अर्घ्य है
“देख भइया रूठ मत। मेरी बात सुन। यह सब अंधविश्वास नहीं है। हम इन्हें पानी नहीं देंगे तो इंद्र भगवान हमें पानी कैसे देंगे?”
जीजी आगे कहती हैं कि यह पानी की बरबादी नहीं, बल्कि पानी का अर्घ्य चढ़ाना है: जो चीज़ मनुष्य पाना चाहता है, उसे पहले देना ही होगा, तभी वह पाई जा सकती है। इसीलिए ऋषि-मुनियों ने दान को सबसे ऊँचा स्थान दिया है।
9.2 दूसरा तर्क: त्याग और दान में फ़र्क़
इस पर बालक पलटकर कहता है: “ऋषि-मुनियों को काहे बदनाम करती हो जीजी? क्या उन्होंने कहा था कि जब आदमी बूँद-बूँद पानी को तरसे तब पानी कीचड़ में बहाओ।” जीजी कुछ देर चुप रहीं, फिर मठरी उसके मुँह में डालती हुई दान और त्याग का असली फ़र्क़ समझाती हैं:
“देख बिना त्याग के दान नहीं होता। अगर तेरे पास लाखों-करोड़ों रुपये हैं और उसमें से तू दो-चार रुपये किसी को दे दे तो यह क्या त्याग हुआ। त्याग तो वह होता है कि जो चीज़ तेरे पास भी कम है, जिसकी तुझको भी ज़रूरत है तो अपनी ज़रूरत पीछे रख कर दूसरे के कल्याण के लिए उसे दे तो त्याग तो वह होता है, दान तो वह होता है, उसी का फल मिलता है।”
दान नहीं: “यह क्या त्याग हुआ?”
- लाखों-करोड़ों में से दो-चार रुपये देना
असली त्याग और दान
- जो चीज़ अपने पास भी कम है, जिसकी अपने को भी ज़रूरत है, उसे अपनी ज़रूरत पीछे रखकर दूसरे के कल्याण के लिए देना
- यही सच्चा फल देने वाला दान है
9.3 तीसरा तर्क: बुवाई की उपमा (बीज बनाम फ़सल)
बालक कहता है, “फल-वल कुछ नहीं मिलता सब ढकोसला है।” वह ऊपर से ज़िद पर अड़ा रहता है, पर भीतर कहीं उसके तर्कों का किला पस्त होने लगता है। तब जीजी, जिन्होंने गाँव के मदरसे का भी मुँह नहीं देखा था, अपने अनुभव से एक और उपमा देती हैं: खेती की उपमा।
10जीजी और गांधी जी: यथा राजा तथा प्रजा
जीजी आगे कहती हैं कि “यथा राजा तथा प्रजा” (जैसा राजा, वैसी प्रजा) अकेला सच नहीं है, “सच यह भी है कि यथा प्रजा तथा राजा” (जैसी प्रजा, वैसा राजा), और “यही तो गांधी जी महाराज कहते हैं।” पाठ के अनुसार जीजी का एक लड़का राष्ट्रीय आंदोलन में पुलिस की लाठी खा चुका था, “तब से” जीजी गांधी महाराज की बात अकसर करने लगी थीं।
11उपसंहार: पचास साल बाद का चिंतन
वयस्क होकर लिख रहे लेखक बताते हैं कि जीजी की ये बातें आज, पचास से ज़्यादा बरस बाद भी, ज्यों की त्यों उनके मन पर दर्ज हैं। वे आज के भारत को देखकर सोचते हैं: माँगें हर क्षेत्र में बड़ी-बड़ी हैं, पर त्याग का कहीं नाम-निशान नहीं। अपना स्वार्थ ही आज एकमात्र लक्ष्य रह गया है। हम चटखारे लेकर इसके या उसके भ्रष्टाचार की बातें करते हैं, “पर क्या कभी हमने जाँचा है कि अपने स्तर पर अपने दायरे में हम उसी भ्रष्टाचार के अंग तो नहीं बन रहे हैं?”
“काले मेघा दल के दल उमड़ते हैं, पानी झमाझम बरसता है, पर गगरी फूटी की फूटी रह जाती है, बैल पियासे के पियासे रह जाते हैं? आखिर कब बदलेगी यह स्थिति?”
संस्मरण की अंतिम पंक्तियाँ, शब्दशः याद रखें
“गगरी फूटी की फूटी रह जाती है” पाठ में लेखक का प्रश्न है: बादल दल के दल उमड़ते हैं, पानी झमाझम बरसता है, फिर भी “बैल पियासे के पियासे” रहते हैं। ठीक पहले लेखक कहते हैं कि माँगें हर क्षेत्र में बड़ी-बड़ी हैं पर त्याग का कहीं नाम-निशान नहीं, यानी पाठ इसे त्याग के अभाव से जोड़ता है; और अंत में बात प्रश्न के रूप में खुली छोड़ता है: “आखिर कब बदलेगी यह स्थिति?” इसके प्रतीकार्थ (जैसे गगरी = टूटी व्यवस्था, प्यासा बैल = ज़रूरतमंद) को एक संभव पढ़त के रूप में लिखा जा सकता है; पाठ स्वयं इसका अर्थ नहीं बताता।
12शब्द-छवि: पाठ के कठिन शब्द
- धर्मवीर भारती (1926-1997): गुनाहों का देवता, सूरज का सातवाँ घोड़ा, अंधा युग (गीतिनाट्य); धर्मयुग के संपादक रहे
- एक ही टोली के दो नाम, “बिलकुल एक-दूसरे के विपरीत”: इंदर सेना (टोली का अपना नाम) और मेढक-मंडली (चिढ़ने वालों का नाम)
- खेलगीत: “काले मेघा पानी दे, गगरी फूटी बैल पियासा, पानी दे गुड़धानी दे, काले मेघा पानी दे”
- अनुष्ठान भीषण सूखे (जेठ-आषाढ़) में, सारे उपाय विफल होने पर, अंतिम उपाय के रूप में होता था
- बालक धर्मवीर (कुमार-सुधार सभा का उपमंत्री) इसे अंधविश्वास और पानी की बरबादी मानता था
- जीजी रिश्ते में कोई नहीं, उम्र में लेखक की माँ से भी बड़ी; बचपन में सबसे ज़्यादा प्यार उन्हीं से मिला; उनका कोई पूजा-विधान या त्योहार बालक के बिना पूरा नहीं होता (जैसे दीवाली, जन्माष्टमी, हर-छठ)
- जीजी के तीन तर्क: अर्घ्य, सच्चा त्याग-दान, बुवाई की उपमा
- जीजी “यथा प्रजा तथा राजा” को गांधी जी की बात बताती थीं; उनका एक बेटा आंदोलन में पुलिस की लाठी खा चुका था, तब से वे गांधी महाराज की बात अकसर करती थीं
- अंतिम प्रश्न: बादल बरसते हैं, फिर भी “गगरी फूटी की फूटी” और “बैल पियासे के पियासे” रह जाते हैं; त्याग का कहीं नाम-निशान नहीं; “आखिर कब बदलेगी यह स्थिति?”
- भूमिका के अनुसार लेखक इंदर सेना के अनुष्ठान पर कोई निर्णय नहीं देते; पर पानी की निर्मम बरबादी के प्रश्न पर भूमिका बालक के तर्क को “वैज्ञानिक तर्क” कहती है, और हानिकर अंधविश्वास को दूर करना कर्तव्य मानती है