- जैनेन्द्र कुमार का जीवन-परिचय और उनकी प्रमुख रचनाएँ बता पाएँगे
- निबंध के प्रसंगों को क्रम से समझा पाएँगे कि पैसा और बाज़ार आदमी को कैसे अपने वश में करते हैं
- “बाज़ार का जादू” और “जेब” व “मन” की स्थितियों को अपने शब्दों में समझा पाएँगे
- “मन खाली न होना” और “मन बंद रखना” के फ़र्क़ को स्पष्ट कर पाएँगे
- भगत जी के चरित्र से निबंध की पूरी सीख को उदाहरण सहित जोड़ पाएँगे
- निबंध के अंतिम निष्कर्ष “वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है” को तर्क सहित समझा पाएँगे
1लेखक परिचय: जैनेन्द्र कुमार
जैनेन्द्र कुमार का जन्म सन् 1905 में अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ था और उनका निधन 24 दिसंबर सन् 1988 को हुआ। किताब के अनुसार वे हिंदी में प्रेमचंद के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण कथाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिन्होंने अपने उपन्यासों और कहानियों के ज़रिए हिंदी में एक सशक्त मनोवैज्ञानिक कथा-धारा (यानी पात्रों के मन के भीतर झाँकने वाली कहानी-शैली) की शुरुआत की।
| श्रेणी | रचनाएँ / विवरण |
|---|---|
| प्रमुख उपन्यास | परख, अनाम स्वामी, सुनीता, त्यागपत्र (1937 में इसी उपन्यास ने उन्हें मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार के रूप में प्रभूत प्रतिष्ठा दिलाई), कल्याणी, जयवर्द्धन, मुक्तिबोध |
| प्रमुख कहानी-संग्रह | वातायन, एक रात, दो चिड़िया, फाँसी, नीलम देश की राजकन्या, पाज़ेब |
| प्रसिद्ध कहानियाँ | खेल, पाज़ेब, नीलम देश की राजकन्या, अपना-अपना भाग्य, तत्सत |
| विचार-प्रधान निबंध-संग्रह | प्रस्तुत प्रश्न, जड़ की बात, पूर्वोदय, साहित्य का श्रेय और प्रेय, सोच-विचार, समय और हम |
| प्रमुख पुरस्कार | साहित्य अकादेमी पुरस्कार, भारत-भारती सम्मान; भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित |
जैनेन्द्र कुमार केवल कथाकार ही नहीं, बल्कि एक गंभीर चिंतक भी थे। समाज, राजनीति, अर्थनीति और दर्शन से जुड़े गहन प्रश्नों को उन्होंने बहुत सरल और अनौपचारिक शैली में लिखा, और यही सरलता बाज़ार दर्शन में भी दिखती है, जहाँ एक गहरी दार्शनिक बात रोज़मर्रा के किस्सों से समझाई गई है। किताब यह भी कहती है कि उन्होंने गांधीवादी चिंतन-दृष्टि को बहुत गहराई से आत्मसात किया था।
2निबंध का परिचय
बाज़ार दर्शन जैनेन्द्र कुमार का एक महत्त्वपूर्ण निबंध है, जिसमें गहरी वैचारिकता (सोच की गहराई) और साहित्यिक लालित्य (भाषा की सुंदरता) का दुर्लभ संयोग मिलता है। किताब के अनुसार, हिंदी में उपभोक्तावाद और बाज़ारवाद पर व्यापक चर्चा “पिछले एक-डेढ़ दशक पहले ही” शुरू हुई, जबकि जैनेन्द्र का यह निबंध कई दशक पहले लिखा गया, फिर भी आज तक इस विषय की मूल बात समझाने में बेजोड़ माना जाता है।
अगर हम अपनी आवश्यकताओं (ज़रूरतों) को ठीक-ठीक समझकर बाज़ार का उपयोग करें, तो उसका लाभ उठा सकते हैं। लेकिन अगर हम ज़रूरत तय किए बिना बाज़ार की चमक-दमक में फँस गए, तो वह असंतोष, तृष्णा (लालच) और ईर्ष्या से घायल करके हमें सदा के लिए बेकार बना सकता है।
निबंध की शैली कहीं दार्शनिक है तो कहीं किस्सागो (कहानी सुनाने वाले) जैसी: लेखक अपने निजी अनुभवों और परिचितों के क़िस्सों के ज़रिए इस गहरी बात को समझाते हैं। इसी क्रम में वे केवल बाज़ार का पोषण करने वाले अर्थशास्त्र को अनीतिशास्त्र कहते हैं: यह निबंध का एक मुख्य निष्कर्ष है, जो आगे विस्तार से आता है।
3निबंध के चार पड़ाव: दो मित्रों के अनुभव से बाज़ार का असर
पूरे निबंध में लेखक के कुल केवल दो मित्रों का ज़िक्र है, किसी का नाम नहीं दिया गया। पहले मित्र की एक ही लंबी बातचीत तीन चरणों में आगे बढ़ती है; उसके बीच-बीच में लेखक का अपना चिंतन है; उसके बाद एक बिलकुल दूसरे, अलग मित्र का अनुभव आता है। (किस्सों की गिनती पाठ में नहीं है; समझने के लिए हमने इन्हें पड़ाव 1 से 4 कहा है।) हर पड़ाव एक नयी बात जोड़ता है, इसलिए इन्हें क्रम में समझना ज़रूरी है।
3.1 पड़ाव 1, पहला मित्र: पत्नी की “महिमा” या असली कारण?
लेखक का एक मित्र एक मामूली चीज़ लेने बाज़ार गया, पर लौटा तो उसके पास बहुत सारे बंडल थे। पूछने पर मित्र ने कहा: “यह जो साथ थीं” यानी पत्नी का साथ होना ही इतना सामान आने का कारण था। लेखक इसे सीधे झूठा नहीं कहते: वे मानते हैं कि आदिकाल से इस विषय में पति से पत्नी की प्रमुखता प्रमाणित है। वे कहते हैं, “यह व्यक्तित्व का प्रश्न नहीं, स्त्रीत्व का प्रश्न है। स्त्री माया न जोड़े, तो क्या मैं जोड़ूँ?” (माया = धन-संपत्ति, सामान)। पर तुरंत असली बात भी साफ़ कर देते हैं: “इस बात में पत्नी की ओट ली जाती है।”
पत्नी का साथ होना एक ओट (बहाना/आड़) मात्र है। असली “महिमा” पत्नी की नहीं, बल्कि एक और तत्त्व की है: मनीबैग यानी पैसे की गरमी या एनर्जी की। यही निबंध का पहला बड़ा मोड़ है: ज़्यादा ख़रीदारी का असली कारण पत्नी नहीं, पैसा है।
3.2 “पैसा पावर है”, पर सिद्ध होने के लिए सामान चाहिए
निबंध कहता है, “पैसा पावर है। पर उसके सबूत में आस-पास माल-टाल न जमा हो तो क्या वह खाक पावर है!” यानी पैसे की पावर का सबूत आस-पास का माल-टाल है। फिर निबंध कुछ संयमी (आत्म-नियंत्रित) लोगों की भी बात करता है, जो फ़िज़ूल सामान को फ़िज़ूल समझते हैं, पैसा बहाते नहीं, बुद्धि और संयम से उसे जोड़ते जाते हैं, और खुद पैसे के जुड़ा होने पर उनका मन गर्व से भरा फूला रहता है।
पर्चेज़िंग पावर (ख़रीदने की शक्ति): पैसे का असली रस इसके प्रयोग में है, केवल उसके होने या जमा रखने में नहीं। आगे के प्रसंग में यह निष्कर्ष लेखक का है (मित्र का नहीं): “मैंने तब तय माना कि और पैसा होता और सामान आता। वह सामान ज़रूरत की तरफ़ देखकर नहीं आया, अपनी ‘पर्चेज़िंग पावर’ के अनुपात में आया है।” यह पंक्ति शब्दशः याद रखें।
3.3 पड़ाव 2, वही (पहला) मित्र आगे: ज़रूरत नहीं, पर्चेज़िंग पावर के अनुपात में सामान
लेखक के “यह कितना सामान ले आए!” कहने पर मित्र ने मनीबैग फैलाकर कहा, “सब उड़ गया, अब जो रेल-टिकट के लिए भी बचा हो!” इससे लेखक ने तय माना कि सामान ज़रूरत की तरफ़ देखकर नहीं, पर्चेज़िंग पावर के अनुपात में आया। इसी बिंदु पर लेखक एक और ज़रूरी तत्त्व जोड़ते हैं जिसे भूलना नहीं चाहिए: केवल पैसा नहीं, बल्कि बाज़ार का भी “इस करतब में बहुत-कुछ हाथ है”।
3.4 पड़ाव 3, वही (पहला) मित्र आगे: “बाज़ार है कि शैतान का जाल है?”
यही मित्र आगे कहते हैं, “कुछ न पूछो। बाज़ार है कि शैतान का जाल है? ऐसा सजा-सजाकर माल रखते हैं कि बेहया ही हो जो न फँसे।” लेखक मन में इसे आगे बढ़ाते हैं कि बाज़ार आमंत्रित करता है, “आओ मुझे लूटो और लूटो”, और इस आमंत्रण की खूबी यह है कि इसमें आग्रह नहीं है।
निबंध के अनुसार “आग्रह तिरस्कार जगाता है” (आग्रह = ज़ोर देना, तिरस्कार = नापसंदगी), “लेकिन ऊँचे बाज़ार का आमंत्रण मूक होता है और उससे चाह जगती है।”
चाह मतलब अभाव: बाज़ार के चौक में खड़े होकर आदमी को लगने लगता है कि उसके अपने पास जो है वह “परिमित” (सीमित) है, जबकि बाज़ार में जो है वह “अतुलित” (जिसकी तुलना न हो सके, यानी असीम) है। जो व्यक्ति अपने-आप को नहीं जानता, यह चौक उसे कामना से विकल (बेचैन), यहाँ तक कि पागल बना सकता है, और इसका नतीजा है असंतोष, तृष्णा और ईर्ष्या, जो व्यक्ति को सदा के लिए बेकार बना सकते हैं।
3.5 पड़ाव 4, एक बिलकुल दूसरे, अलग मित्र: बिना कुछ लिए लौटा
ये मित्र दोपहर से पहले बाज़ार गए और शाम को लौटे, पर खाली हाथ। पूछने पर बताया कि उन्हें सब कुछ लेने का मन हो रहा था, पर कुछ भी लेने का मतलब था बाकी सब कुछ छोड़ देना, और वे कुछ भी छोड़ना नहीं चाहते थे। इसी उलझन में वे कुछ भी नहीं ख़रीद सके।
यदि ठीक-ठीक पता न हो कि क्या चाहिए, तो सब ओर की चाह घेर लेगी और परिणाम त्रास (कष्ट) ही होगा: न गति (प्रगति) होगी, न कर्म (सार्थक काम)। लेखक यह बात दूसरे मित्र के प्रसंग पर कहते हैं।
4केंद्रीय रूपक: बाज़ार का जादू
इन प्रसंगों के बाद लेखक एक रूपक रखते हैं:
“बाज़ार में एक जादू है। वह जादू आँख की राह काम करता है। वह रूप का जादू है”, “पर जैसे चुंबक का जादू लोहे पर ही चलता है, वैसे ही इस जादू की भी मर्यादा (सीमा) है।”

यह जादू किस हालत में चलता है, इसे निबंध जेब (पैसे) और मन की स्थिति से जोड़कर समझाता है।
| जेब की स्थिति | मन की स्थिति | परिणाम |
|---|---|---|
| भरी | खाली | “जादू का असर खूब होता है”: “फिर वह मन किसकी मानने वाला है!” “यह भी लूँ, वह भी लूँ” वाली हालत बन जाती है |
| खाली | भरा नहीं (यानी वह भी खाली-जैसा) | “तो भी जादू चल जाएगा”: मन खाली है तो बाज़ार की अनेकानेक चीज़ों का निमंत्रण उस तक पहुँच जाएगा |
“जादू की सवारी” उतरते ही पता चलता है कि फ़ैंसी (दिखावटी) चीज़ों की बहुतायत असल में आराम में मदद नहीं करती, बल्कि खलल (गड़बड़ी) डालती है। थोड़ी देर के लिए स्वाभिमान को सेंक ज़रूर मिल जाता है, पर यह असल में अभिमान की गिल्टी (अहंकार की गाँठ) को ही खुराक देना है। जकड़ चाहे रेशमी डोरी की ही क्यों न हो: वह जकड़ ही रहती है, कम नहीं होती।
5जादू से बचने का उपाय
निबंध का हल बहुत सीधा है: “बाज़ार जाओ तो खाली मन न हो। मन खाली हो, तब बाज़ार न जाओ।”
लू में जाना हो तो पानी पीकर जाना चाहिए
पानी भीतर हो तो लू (गर्म हवा) का असर व्यर्थ हो जाता है। ठीक वैसे ही, मन अगर किसी लक्ष्य/ज़रूरत से भरा हो, तो बाज़ार भी बस “फैला-का-फैला” रह जाएगा: वह घाव नहीं दे पाएगा, बल्कि कुछ आनंद ही देगा।
बाज़ार की असली कृतार्थता (सार्थकता) है: आवश्यकता के समय काम आना।
निबंध की केंद्रीय सीख
6ज़रूरी स्पष्टीकरण: “मन खाली न होना” का मतलब “मन बंद रखना” नहीं
निबंध यहाँ ख़ुद एक संभावित ग़लतफ़हमी को रोकता है।
“मन खाली नहीं रहना चाहिए” का मतलब यह बिलकुल नहीं है कि मन को बंद कर लिया जाए। निबंध साफ़ कहता है: जो मन बंद हो जाएगा, वह शून्य हो जाएगा, और शून्य होने का अधिकार केवल परमात्मा का है, जो सदा से संपूर्ण है। बाक़ी सब, यानी हर मनुष्य, अपूर्ण है। निबंध यह भी कहता है: “ठाठ देकर मन को बंद कर रखना जड़ता है।”
निबंध एक संस्कृत वाक्यांश का ज़िक्र करता है:
‘इच्छानिरोधस्तपः’: यानी इच्छाओं को रोकना ही तप है। निबंध के अनुसार अगर इसका मतलब यह लिया जाए कि सब इच्छाओं को पूरी तरह दबा दिया जाए, तो यह झूठ है: ऐसे तप की राह रेगिस्तान (सूखेपन) की ओर जाती है, मोक्ष की राह नहीं।
लेखक तर्क देते हैं कि लोभ को “जीतना” इच्छा को दबाकर या नकार कर नहीं होता, यह असल में लोभ की ही जीत और आदमी की हार है। आँख फोड़ लेने से लोभनीय चीज़ दिखनी भले बंद हो जाए, पर लोभ मिटता नहीं। आँख बंद करके भी हम सपने देखते हैं, और वे सपने चैन भंग करते ही हैं। ऐसा ज़बरदस्ती मन बंद करना “हठ-ही-हठ है, योग नहीं है”, और “इससे मन कृश भले हो जाए और पीला और अशक्त जैसे विद्वान का ज्ञान। वह मुक्त ऐसे नहीं होता।” (कृश = कमज़ोर)
निबंध का तर्क: हम में पूर्णता होती तो हम परमात्मा से अभिन्न होकर महाशून्य ही न बन जाते? हम अपूर्ण हैं, और इसी अपूर्णता से हमारा अस्तित्व है। सच्चा ज्ञान इस अपूर्णता के बोध को गहरा करता है, और सच्चा कर्म इसी अपूर्णता की स्वीकृति के साथ होता है। सही उपाय वह है जो बलात् मन को रोकने को न कहे, बल्कि मन को भी सुने, क्योंकि वह अप्रयोजनीय रूप में हमें नहीं मिला है; “हाँ, मनमानेपन की छूट मन को न हो, क्योंकि वह अखिल (समूचे अस्तित्व) का अंग है, खुद कुल नहीं है।”
7भगत जी: निबंध का आदर्श चरित्र
अपनी बात को जीवंत उदाहरण से साबित करने के लिए लेखक अपने पड़ोस के भगत जी का प्रसंग लाते हैं, जो चूरन बेचते हैं।
भगत जी वर्षों से चूरन बेच रहे हैं, पर उन्होंने कभी एक दिन में छह आने (पुराने ज़माने की एक छोटी मुद्रा-इकाई) से ज़्यादा नहीं कमाए। उनका चूरन आस-पास मशहूर है और वे ख़ुद भी लोकप्रिय हैं: व्यवसाय का गुर पकड़ लेते तो मालामाल हो सकते थे, पर वे ऐसा नहीं करते। न थोक बेचते हैं, न पेशगी ऑर्डर लेते हैं। जैसे ही छह आने पूरे होते हैं, बचा हुआ चूरन बच्चों को मुफ़्त बाँट देते हैं। कभी कोई उन्हें छह आने से आगे पच्चीसवाँ पैसा तक न दे सका।
लेखक का निष्कर्ष: “इतना मुझे निश्चय मालूम होता है कि इन चूरनवाले भगत जी पर बाज़ार का जादू नहीं चल सकता।”
लेखक पाठकों को सचेत करते हैं कि वे कहीं यह भूल न कर बैठें कि लेखक स्वयं चूरन बेचता है: ऐसी “हलकी बात” सोचना भी उचित नहीं। इसके तुरंत बाद लेखक साहस के साथ कहते हैं कि वे किसी भी पाठक के सामने चूरनवाले भगत जी को “श्रेष्ठ” बताने की हिम्मत रखते हैं: फिर भी वे स्वीकार करते हैं कि इस “अपदार्थ” (जिसका अस्तित्व न हो, यानी समाज में महत्त्वहीन समझे जाने वाले) व्यक्ति के पास वह चीज़ है जो “हम में से बहुत कम को” मिली है: चारों ओर माल बिछा होने पर भी उनका मन अडिग रहता है। “पैसा उससे आगे होकर भीख तक माँगता है कि मुझे लो”, पर उनके मन में पैसे के लिए कोई दया नहीं: वे निर्मम होकर पैसे को उसके “आहत गर्व” में ही छोड़ देते हैं।
7.1 लेखक का अपना कंट्रास्ट: मोटर वाला प्रसंग
भगत जी के अडिग मन के ठीक उलट, लेखक स्वयं अपना एक अनुभव बताते हैं। पैदल चलते हुए उनके पास से धूल उड़ाती एक मोटर (कार) निकल जाती है: यह उन्हें एक तीखे व्यंग्य जैसा चुभता है, और वे सोचने लगते हैं: “हाय, ये ही माँ-बाप रह गए थे…क्यों न मैं मोटरवालों के यहाँ हुआ!” इतनी शक्ति है इस व्यंग्य में कि यह “ज़रा में” लेखक को “अपने सगों के प्रति कृतघ्न” (एहसान न मानने वाला) कर सकता है।
भगत जी
- मन अडिग: पैसे की व्यंग्य-शक्ति बेअसर
- माल के प्रति अप्रीति नहीं, बल्कि आशीर्वाद-जैसा भाव
- ज़रूरत (जीरा-नमक) भर लेकर संतुष्ट लौटते हैं
लेखक स्वयं (मोटर प्रसंग में)
- एक मोटर की चमक-दमक से मन विचलित हो जाता है
- पैसे/वैभव की व्यंग्य-शक्ति का सीधा शिकार बनते हैं
- ज़रा में अपने सगों के प्रति भी कृतघ्न हो सकते हैं
इससे लेखक एक गहरी बात निकालते हैं। जो असली बल भगत जी में है, उसे लोग “स्पिरिचुअल”, “आत्मिक”, “धार्मिक” या “नैतिक” कहते हैं, पर लेखक शब्द के चुनाव पर नहीं अटकते। वे स्पष्ट कहते हैं:
“जहाँ तृष्णा है, बटोर रखने की स्पृहा है, वहाँ उस बल का बीज नहीं है।” (स्पृहा = इच्छा) उल्टे, संचय (जमा करने) की तृष्णा और वैभव की चाह असल में व्यक्ति की निर्बलता साबित करती है, यानी “निर्बल ही धन की ओर झुकता है”। यह मनुष्य पर धन की, और चेतन (सजीव प्राणी) पर जड़ (निर्जीव वस्तु) की, विजय है।
7.2 भगत जी: बाज़ार-चौक की सजीव मुलाक़ात
एक बार लेखक भगत जी से बाज़ार-चौक में मिलते हैं। भगत जी की आँखें बंद नहीं हैं, और वे बाज़ार को कोसते हुए भी नहीं दीखते, और यह पिछले तर्क (“मन बंद न करना”) का जीवंत सबूत है। वे हर किसी को हँसकर पहचानते और अभिवादन करते हैं, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि भीड़ में उनकी आँखें किसी और से कम खुली थीं। पर वे न भौंचक्के हैं, न पसोपेश में, न कहीं खोए-से खड़े। भरे-पूरे चौक के प्रति उनके मन में कोई अप्रीति (नापसंदगी) नहीं, बल्कि मानो आशीर्वाद जैसा भाव है: “विद्रोह नहीं, प्रसन्नता ही भीतर है, क्योंकि कोई रिक्त भीतर नहीं है” (उनका मन खाली नहीं है)।
बड़े-बड़े फैंसी स्टोर बस पड़े रह जाते हैं। भगत जी सिर्फ़ एक छोटी पंसारी की दुकान पर रुकते हैं, जहाँ ज़रूरत की चीज़ें (जीरा, काला नमक) मिलती हैं। ज़रूरत भर जीरा मिलते ही बाकी पूरा चौक उनके लिए लगभग “नहीं के बराबर” हो जाता है, फिर भी बचे हुए वैभव के प्रति उनके मन में कोई द्वेष नहीं, बल्कि वे उसका भला ही चाहते हैं।
8निबंध का निष्कर्ष
निबंध के अंत में लेखक अपनी पूरी बात को एक साफ़ निष्कर्ष में समेटते हैं:
बाज़ारूपन: निबंध का शब्द (“वे लोग बाज़ार का बाज़ारूपन बढ़ाते हैं। जिसका मतलब है कि कपट बढ़ाते हैं।”), यानी बाज़ार का वह बढ़ा हुआ, कपटपूर्ण और शोषक रूप जो तब पैदा होता है जब लोग बिना ज़रूरत जाने, केवल पर्चेज़िंग पावर के गर्व में ख़रीदारी करते हैं।
“ऐसे बाज़ार मानवता के लिए विडंबना हैं, और जो ऐसे बाज़ार का पोषण करता है, जो उसका शास्त्र बना हुआ है: वह अर्थशास्त्र सरासर औंधा है, वह मायावी शास्त्र है, वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है।”
निबंध की अंतिम पंक्ति, शब्दशः याद रखें
अनीतिशास्त्र: निबंध की अंतिम पंक्ति का शब्द। एक ऐसा अर्थशास्त्र जो केवल कपटपूर्ण, शोषक बाज़ार का पोषण करता है, यानी नीति (नैतिकता) का शास्त्र नहीं, बल्कि अनीति (अनैतिकता) का शास्त्र बन जाता है।
9शब्द-छवि: पाठ के कठिन शब्द
- जैनेन्द्र कुमार (1905-1988): प्रेमचंद के बाद हिंदी के महत्त्वपूर्ण कथाकार, त्यागपत्र (1937) प्रसिद्ध उपन्यास, पद्मभूषण सम्मानित
- पहले मित्र के प्रसंग में लेखक का निष्कर्ष: सामान ज़रूरत की तरफ़ देखकर नहीं, पर्चेज़िंग पावर के अनुपात में आया
- आग्रह तिरस्कार जगाता है; ऊँचे बाज़ार का आमंत्रण मूक होता है और उससे चाह जगती है: चाह मतलब अभाव
- बाज़ार का जादू “आँख की राह” काम करता है: चुंबक की तरह इसकी भी मर्यादा है
- जेब भरी + मन खाली = जादू का असर खूब होता है; जेब खाली पर मन भरा न हो, तो भी जादू चल जाएगा
- उपाय: बाज़ार जाओ तो मन खाली न हो, पानी पीकर लू में जाने वाली उपमा याद रखें
- “मन खाली न होना” का मतलब “मन बंद रखना” नहीं: मन बंद करना हठ-योग है, सच्ची मुक्ति नहीं
- भगत जी: किसी दिन छह आने से ज़्यादा नहीं कमाए, बाकी चूरन मुफ़्त, बाज़ार का जादू उन पर नहीं चलता
- निर्बल ही धन की ओर झुकता है: तृष्णा में असली बल का बीज नहीं होता
- अंतिम निष्कर्ष: बाज़ारूपन बढ़ने से कपट और शोषण बढ़ता है, ऐसे बाज़ार का पोषण करने वाले अर्थशास्त्र के लिए अंतिम पंक्ति: “वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है”
- क्या मैं बिना देखे जैनेन्द्र कुमार का जीवन-परिचय बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं निबंध के प्रसंगों को सही क्रम में समझा सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं “जेब” और “मन” की दोनों स्थितियों को लिख सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं “मन खाली न होना” और “मन बंद रखना” का फ़र्क़ स्पष्ट कर सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं निबंध की अंतिम पंक्ति (“वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है”) शब्दशः लिख सकता/सकती हूँ?