भक्तिन — महादेवी वर्मा

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इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • महादेवी वर्मा का जीवन-परिचय, उनकी प्रमुख रचनाएँ और हिंदी साहित्य में उनका योगदान
  • भक्तिन के जीवन के चारों परिच्छेद, कहानी के सही क्रम में
  • भक्तिन का पूरा चरित्र-चित्रण, उसके गुण और दुर्गुण, दोनों संतुलित ढंग से
  • संस्मरणात्मक रेखाचित्र विधा की पहचान और महादेवी की भाषा-शैली
  • पाठ का केंद्रीय भाव, यानी स्त्री-अस्मिता की संघर्षपूर्ण आवाज़, को उदाहरणों सहित समझना
  • अध्याय के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर स्वयं लिखने की तैयारी
महादेवी वर्मारेखाचित्रसंस्मरणभक्तिनलछमिनस्त्री-अस्मिताअलगौझाघरजमाई

1 लेखिका परिचय: महादेवी वर्मा

महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य की उन बिरली रचनाकारों में हैं, जिनकी प्रतिष्ठा कविता और गद्य, दोनों क्षेत्रों में रही है; पाठ के अनुसार दोनों में उनकी प्रतिभा अलग-अलग स्वभाव लेकर सक्रिय हुई दिखती है। कविता में वे अपनी भीतरी वेदना और पीड़ा व्यक्त करती हैं, तो गद्य में उनका ध्यान सीधे समाज पर टिकता है।

बिंदु विवरण
जन्म सन् 1907, फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश)
निधन सन् 1987, इलाहाबाद
पहचान छायावाद के चार स्तंभों में से एक (अन्य तीन: पंत, प्रसाद, निराला)
काव्य-संग्रह दीपशिखा, यामा
निबंध-संग्रह शृंखला की कड़ियाँ (1942), आपदा, संकल्पिता, भारतीय संस्कृति के स्वर
संस्मरण / रेखाचित्र अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, पथ के साथी, मेरा परिवार
पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार (‘यामा’ के लिए, 1983), भारत भारती पुरस्कार (उ.प्र. हिंदी संस्थान), पद्मभूषण (1956)
सामाजिक कार्य नारी-शिक्षा के प्रसार हेतु प्रयाग महिला विद्यापीठ की स्थापना, महात्मा गांधी की राह पर समाज-सेवा
परीक्षा संकेत

“छायावाद के चार स्तंभ कौन थे” और “महादेवी को कौन-कौन से पुरस्कार मिले” ये दोनों तथ्य लेखिका-परिचय में सीधे दिए गए हैं। चारों नाम (महादेवी, पंत, प्रसाद, निराला) और तीनों पुरस्कार (ज्ञानपीठ, भारत भारती, पद्मभूषण) क्रम से याद रखें।

1.1 कवयित्री और गद्यकार: दो अलग स्वभाव

कविताओं में महादेवी इस लोक से परे किसी और सत्ता की ओर मुड़ती दिखती हैं, तो निबंधों और रेखाचित्रों में उनका गहरा सामाजिक सरोकार सामने आता है। उनकी शृंखला की कड़ियाँ (1942) को किताब खुद “हिंदी में स्त्री-विमर्श की भव्य प्रस्तावना” कहती है।

Learn by heartपरिभाषा 1

संस्मरणात्मक रेखाचित्र गद्य की वह विधा है, जिसमें लेखक अपने जीवन में मिले किसी वास्तविक व्यक्ति के चरित्र और अनुभवों को याद करके शब्दों में उसका सजीव खाका खींचता है। भक्तिन इसी विधा की रचना है।

किताब की भूमिका के अनुसार महादेवी के रेखाचित्रों की एक बड़ी खूबी यह है कि वे आस-पास के साधारण चरित्रों में महादेवी की मर्मभेदी और करुणामयी दृष्टि से असाधारण तत्त्व खोज लेती हैं। इसी से समाज के शोषित-पीड़ित तबके को उनकी गद्य-रचनाओं में नायक जैसा स्थान मिला, और इस विधा को ही एक उपेक्षित व्यक्ति को विषय बनाने की मान्यता मिल गई।

2 पाठ परिचय: भक्तिन किस बारे में है

भक्तिन महादेवी वर्मा का प्रसिद्ध संस्मरणात्मक रेखाचित्र है, जो संग्रह स्मृति की रेखाएँ में संकलित है। इसमें महादेवी अपनी सेविका भक्तिन के अतीत और वर्तमान का परिचय देकर उसके व्यक्तित्व का दिलचस्प खाका खींचती हैं। महादेवी के घर आने से पहले भक्तिन ने एक संघर्षशील, स्वाभिमानी और कर्मठ जीवन जिया था, पितृसत्तात्मक (पुरुष-प्रधान) और छल-छद्म भरे समाज में अपने व अपनी बेटियों के हक़ की लड़ाई लड़ी, और अंत में हारकर ही ज़िंदगी की राह बदलने का निर्णय लिया।

भक्तिन सिर्फ़ एक सेविका नहीं है। वह महादेवी के जीवन में आकर छा जाने वाली परिस्थिति बन जाती है, जिससे लेखिका के अपने व्यक्तित्व के कई अनछुए और प्रच्छन्न (छिपे हुए) पहलू भी सामने आते हैं। इसीलिए महादेवी भक्तिन को अपने व्यक्तित्व का ज़रूरी हिस्सा मानकर उसे खोना नहीं चाहतीं।

“समग्रतः इस पाठ को परिस्थितिवश अक्खड़ बनी, पर महादेवी के प्रति अनमोल आत्मीयता से भरी भक्तिन के बहाने स्त्री-अस्मिता की संघर्षपूर्ण आवाज़ के रूप में भी पढ़ा जाना चाहिए।”

पाठ की भूमिका (पुस्तक का संपादकीय परिचय); अक्खड़ = कड़क-मिज़ाज़

3 भक्तिन का नाम: लछमिन से भक्तिन तक

भक्तिन अपना असली नाम किसी को नहीं बताती। पाठ के शब्दों में, वह “किसी अंजना की पुत्री न होकर एक अनामधन्या गोपालिका की कन्या है”, और नाम है लछमिन अर्थात लक्ष्मी। जैसे लेखिका के नाम की विशालता उनके लिए दुर्वह (ढोने में कठिन) है, वैसे ही “लक्ष्मी की समृद्धि भक्तिन के कपाल की कुंचित रेखाओं में नहीं बँध सकी”; यही इस नाम की विडंबना है। पाठ यह भी कहता है कि जीवन में प्रायः सभी को अपने-अपने नाम का विरोधाभास लेकर जीना पड़ता है।

क्या आप जानते हैं?

पाठ के अनुसार भक्तिन बहुत समझदार है, क्योंकि वह अपना समृद्धि-सूचक नाम किसी को बताती नहीं। उसने अपना नाम सिर्फ़ एक बार, नौकरी माँगते समय, ईमानदारी दिखाने के लिए बताया, वह भी इस शर्त के साथ कि इसका उपयोग कभी न किया जाए।

महादेवी ने उसे “भक्तिन” नाम तब दिया, जब उन्होंने उसके गले में कंठी माला देखी। भक्तिन इस “कवित्वहीन” नाम को पाकर भी गद्गद हो उठी। लेखिका उसे “सेवक-धर्म में हनुमान जी से स्पर्द्धा करने वाली” कहती हैं, पर यह भी साफ़ करती हैं कि वह अंजना (हनुमान की माता) की पुत्री नहीं, एक अनामधन्या गोपालिका की कन्या है।

4 भक्तिन के जीवन के चार परिच्छेद

महादेवी भक्तिन के जीवन को खुद चार परिच्छेदों (भागों) में बाँटती हैं, ठीक किसी किताब के अध्यायों की तरह। यह ढाँचा पूरे पाठ की रीढ़ है, क्रम से याद रखें।

भक्तिन का जीवन
पहला परिच्छेदबचपन और विमाता की छाया
दूसरा परिच्छेदससुराल में वैवाहिक जीवन
तीसरा परिच्छेदविधवा जीवन व संपत्ति की लड़ाई
चौथा परिच्छेदमहादेवी के घर सेवा (वर्तमान)

4.1 पहला परिच्छेद: बचपन और विमाता की छाया

भक्तिन ऐतिहासिक गाँव झूँसी (गंगा किनारे, इलाहाबाद के पास, जहाँ प्राचीन प्रतिष्ठानपुरी नगरी बसी थी) के एक गाँव-प्रसिद्ध सूरमा की इकलौती बेटी थी, और विमाता (सौतेली माँ) की “किंवदंती बन जाने वाली ममता” की छाया में पली (यहाँ व्यंग्य है: विमाता की ममता किंवदंती, यानी कहावत बन चुकी थी)।

5 वर्षपिता ने हँडिया गाँव के एक संपन्न गोपालक की सबसे छोटी पुत्रवधू बनाकर विवाह किया, “शास्त्र से दो पग आगे” रहने की ख्याति के लिए
↓
9 वर्षविमाता ने गौना (विदाई की रस्म) करवा दिया, इसे “पराया धन लौटाने” का पुण्य कहकर
↓
पिता की मृत्युपिता का भक्तिन पर अगाध प्रेम था, इसी से ईर्ष्यालु और संपत्ति की रक्षा में सतर्क विमाता ने समाचार जानबूझकर देर से भेजा; सास ने अलग से, रोने-पीटने के अपशकुन से बचने के लिए, कुछ न बताया; भक्तिन जब नैहर (मायका) पहुँची, पिता जा चुके थे

पिता के गाँव न उनका कोई चिह्न बचा था, न विमाता के व्यवहार में शिष्टाचार। अपमानित भक्तिन बिना पानी पिए उलटे पाँव ससुराल लौटी, सास को खरी-खोटी सुनाकर गुस्सा शांत किया, और पति पर गहने फेंक-फेंककर पिता के वियोग की पीड़ा व्यक्त की।

4.2 दूसरा परिच्छेद: ससुराल में वैवाहिक जीवन

पाठ कहता है कि जीवन के दूसरे परिच्छेद में भी सुख की अपेक्षा दुख ही अधिक है। भक्तिन ने तीन कन्याओं को जन्म दिया, तब सास और जिठानियों (जिनके बेटे थे) ने ओठ बिचकाकर उपेक्षा प्रकट की; पाठ के व्यंग्य में, “छोटी बहू के लीक छोड़कर चलने के कारण उसे दंड मिलना आवश्यक हो गया।” किताब व्यंग्य से कहती है, “पहली कन्या के दो संस्करण और कर डाले”, यानी जैसे किताब के नए संस्करण की तरह पहली बेटी जैसी दो और बेटियाँ जन्मीं।

सास व जिठानियाँ

  • सास तीन-तीन बेटों को जन्म देकर पहले ही “पुरखिन” (घर की बुज़ुर्ग स्वामिनी) के पद पर अभिषिक्त हो चुकी थी
  • दोनों जिठानियाँ अपने बेटों के दम पर इसी पद की उम्मीदवार भर थीं, पद पा नहीं चुकी थीं
  • भात पर सफ़ेद राब और गाढ़ा दूध, बेटों को मलाई; दिन-भर बैठकर लोक-चर्चा करतीं

भक्तिन (उपेक्षित)

  • तीन बेटियों की माँ होने पर “खोटे सिक्कों की टकसाल” कही गई
  • काले गुड़ के साथ मट्ठा, बेटियों को चने-बाजरे की घुघरी
  • मट्ठा फेरना, कूटना, पीसना, राँधना, सारा काम खुद करना

इस उपेक्षा के बीच, पाठ के शब्दों में, “जिठानियाँ बात-बात पर धमाधम पीटी-कूटी जातीं; पर उसके पति ने उसे कभी उँगली भी नहीं छुआई।” पाठ यह भी कहता है कि इस दंड-विधान में कोई ऐसी धारा नहीं थी जिससे “खोटे सिक्कों की टकसाल-जैसी पत्नी” से पति को विरक्त किया जा सकता; सारी चुगली उसके पत्नी-प्रेम को बढ़ाकर ही खत्म होती थी। पति के इसी प्रेम के बल पर भक्तिन ने अलगौझा करवा ली, जिसके बाद परिश्रमी दंपति के निरंतर प्रयास से उसका हिस्सा “सोना” बन गया: हरे-भरे खेत, मोटी-ताज़ी गाय-भैंस और फलों से लदे पेड़। यानी भक्तिन के जीवन में समृद्धि के दिन भी आए।

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अलगौझा का अर्थ है परिवार के साझा घर से अलग होकर अपनी खुद की, स्वतंत्र गृहस्थी बसाना, यानी बँटवारा।

4.3 तीसरा परिच्छेद: विधवा जीवन, संपत्ति की लड़ाई और बेटी की त्रासदी

पति की मृत्यु छत्तीस वर्ष से कुछ ही अधिक आयु में हुई, तब भक्तिन खुद उनतीस वर्ष की थीं, दो छोटी बेटियों और पूरी गृहस्थी का भार अकेली उन पर आ पड़ा। भक्तिन के हरे-भरे खेत और गाय-भैंस देखकर जेठ-जिठौतों (पति के भाइयों-भतीजों) के मुँह में पानी आया, यह संपत्ति तभी हाथ आ सकती थी जब भक्तिन पुनर्विवाह करे, पर पाठ के व्यंग्य में “जन्म से खोटी भक्तिन इनके चकमे में आई ही नहीं”।

भक्तिन का स्वाभिमान, उसी के शब्दों में

“हम कुकुरी बिलारी न होयँ, हमार मन पुसाई तौ हम दूसरा के जाब नाहि त तुम्हार पचै की छाती पै होरहा भूँजब और राज करब, समुझे रहौ।” (हम कुतिया-बिल्ली नहीं हैं। हमारा मन चाहेगा तो हम दूसरे के पास जाएँगे, नहीं तो तुम लोगों की छाती पर होरहा भूँजेंगे और राज करेंगे, समझ लो।)

संपत्ति सुरक्षित रखने को भक्तिन ने गुरु से कान फुँकवाकर (दीक्षा लेकर), कंठी बाँधकर और पति के नाम पर घी से चिकने केशों को समर्पित कर “अपने कभी न टलने की घोषणा कर दी”। साथ ही छोटी लड़कियों के हाथ पीले कर उन्हें ससुराल पहुँचाया, और पति के चुने हुए बड़े दामाद को घरजमाई बनाकर रखा।

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घरजमाई उस दामाद को कहते हैं, जो विवाह के बाद अपने ससुराल में ही स्थायी रूप से रहने लगे, अपने घर वापस न जाए।

इसी परिच्छेद में भक्तिन की बड़ी बेटी किशोरावस्था में ही विधवा हो गई। संपत्ति हड़पने को बेताब बड़े जिठौत ने अपने “तीतर लड़ाने वाले साले” को विधवा बेटी से जोड़ने की साज़िश रची, वह ज़बरन बेटी की कोठरी में घुस गया, जिसे बेटी ने ख़ूब पीटकर बाहर निकाला।

पंचायत का अन्यायपूर्ण फ़ैसला
तीतरबाज़ युवक कहता था कि वह निमंत्रण पाकर भीतर गया, और युवती उसके मुख पर अपनी पाँचों उँगलियों के उभार दिखाती थी। “दूध-का-दूध पानी-का-पानी” करने के लिए पंचायत बैठी, दोनों पक्षों की बात सामने आई, और सबने समस्या का मूल कारण कलियुग को माना। फिर अपीलहीन फ़ैसला हुआ कि “चाहे उन दोनों में एक सच्चा हो चाहे दोनों झूठे; पर जब वे एक कोठरी से निकले, तब उनका पति-पत्नी के रूप में रहना ही कलियुग के दोष का परिमार्जन कर सकता है।” यानी दोषी कौन है, यह तय किए बिना ही उन्हें पति-पत्नी मान लिया गया।

पाठ कहता है कि “संबंध कुछ सुखकर नहीं हुआ”: दामाद अब निश्चिंत होकर तीतर लड़ाता था और बेटी विवश क्रोध से जलती रहती थी। इतने यत्न से सँभाले गाय-ढोर और खेती-बारी पारिवारिक द्वेष में ऐसे झुलस गए कि लगान (ज़मींदार का किराया) अदा करना भी भारी हो गया। लगान न पहुँचने पर ज़मींदार ने भक्तिन को दिन-भर धूप में खड़ा रखा, यह अपमान उसकी कर्मठता पर सबसे बड़ा कलंक बन गया, और अगले ही दिन वह कमाई के इरादे से शहर आ पहुँची, यहीं से उसके जीवन का चौथा परिच्छेद शुरू होता है।

4.4 चौथा परिच्छेद: महादेवी के घर सेवा में (वर्तमान)

पाठ के आरंभ में भक्तिन का चित्र है: “छोटे कद और दुबले शरीरवाली भक्तिन अपने पतले ओठों के कोनों में दृढ़ संकल्प और छोटी आँखों में एक विचित्र समझदारी लेकर” लेखिका के पास आई थी। वह घुटी चाँद को मोटी मैली धोती से ढाँके, आधी गृहस्थन-आधी वैरागिन के वेश में महादेवी के घर सेवा के लिए आई। खाना बनाना जानती है या नहीं पूछने पर उसने आत्मविश्वास से जवाब दिया, “ई कउन बड़ी बात आय। रोटी बनाय जानित है, दाल राँध लेइत है, साग-भाजी छँउक सकित है, अउर बाकी का रहा!” (यह कौन-सी बड़ी बात है, रोटी-दाल-सब्ज़ी सब बना लेती हूँ, बाकी क्या बचा है!)

पाक-कला विवाद: एक दिलचस्प प्रसंग

पहली बार की “एक अंगुल मोटी और गहरी काली चित्तीदार” रोटियों पर महादेवी के असंतोष जताने पर भक्तिन तुरंत सफ़ाई देती है: रोटियाँ अच्छी सेंकने के प्रयास में “कुछ अधिक खरी हो गई हैं; पर अच्छी हैं”, दूध-घी लेखिका को अच्छा नहीं लगता, शाम को दाल की जगह तरकारी बना दी जाएगी, अमचूर-लाल मिर्च की चटनी या गाँव का गुड़ भी चल सकता है, और अंत में ससुर, पितिया ससुर, अजिया सास आदि के “मौखिक प्रमाण-पत्रों” का हवाला देकर अपनी पाक-कुशलता साबित कर देती है।

भक्तिन अपने ग्रामीण खान-पान (मक्के का दलिया, बाजरे के पुए, ज्वार की खिचड़ी, महुए की लपसी) को महादेवी को क्रियात्मक रूप से सिखाती रहती है, पर खुद कभी शहर का रसगुल्ला तक नहीं अपनाया। इसीलिए किताब का यह वाक्य महत्त्वपूर्ण बन जाता है:

“इसी से आज मैं अधिक देहाती हूँ; पर उसे शहर की हवा नहीं लग पाई।”

महादेवी वर्मा, भक्तिन के प्रभाव पर

5 भक्तिन का चरित्र-चित्रण

5.1 गुण: स्वाभिमान, कर्मठता और वफ़ादारी

1

स्वाभिमानी

पुनर्विवाह के दबाव को ठुकराया, अपने बूते संपत्ति और बेटियों की रक्षा की।

2

कर्मठ

ससुराल में हर काम खुद किया; महादेवी के घर भी अपने हिस्से से बढ़कर मदद ढूँढ़ती है।

3

वफ़ादार

युद्ध के डर में भी महादेवी का साथ नहीं छोड़ा; जेल जाने पर भी साथ जाने की ज़िद।

4

सहज-बुद्धि

बिना पढ़े-लिखे भी व्यावहारिक ज्ञान में इतनी पटु कि खुद “गुरु” जैसी बन बैठती है।

5

सहानुभूति

विद्यार्थी वर्ग में से कोई कारागार जाए तो वह व्यथित होकर दिन भर सबको परेशान करती है; पाठ के अनुसार “बापू से लेकर साधारण व्यक्ति तक सबके प्रति भक्तिन की सहानुभूति एकरस मिलती है।”

पाठ के अनुसार उसके स्वभाव की विषमताओं के भीतर से स्नेह और सहानुभूति की आभा फूटती रहती है। छात्रावास की बालिकाएँ चाय बनवाने और नाश्ता चखने आती हैं, और संभवतः इन्हीं के लिए भक्तिन अपना दोनों जून का भोजन सवेरे ही बना लेती है। लेखिका के साहित्यिक बंधुओं के प्रति उसका सम्मान, उनके प्रति लेखिका के सम्मान पर निर्भर है। कवियों के बारे में उसका ज्ञान बढ़ा है, आदर-भाव नहीं: किसी के लंबे बाल और अस्त-व्यस्त वेश देखकर वह कह उठती है, “का ओहू कवित्त लिखे जानत हैं”।

युद्ध का भय बढ़ने पर भक्तिन के अपने बेटी-दामाद उसे साथ ले जाने आए, फिर भी वह महादेवी को छोड़कर नहीं गई। जब युद्ध के भय से लोगों में पलायन-वृत्ति जागी, तब भक्तिन पहली बार सेवक की विनीत मुद्रा में लेखिका से गाँव चलने का अनुरोध करने आई और वहाँ उनके रहने का पूरा प्रबंध बताने लगी। जब महादेवी ने कहा कि उनके पास वहाँ जाकर रहने के लिए रुपया नहीं है, तो भक्तिन ने राज़ खोला कि उसके पास पाँच बीसी और पाँच रुपया (बीसी = बीस का समूह, यानी 5 × 20 + 5 = 105 रुपये) गड़े हैं, और वह इसी से प्रबंध कर देगी, कंजूस मानी जाने वाली भक्तिन की यह उदारता महादेवी को चकित कर देती है।

5.2 विशेषताएँ जो उसे “पूरी तरह अच्छी” नहीं बनातीं

महादेवी खुद लिखती हैं कि “भक्तिन अच्छी है, यह कहना कठिन होगा, क्योंकि उसमें दुर्गुणों का अभाव नहीं।” वह “सत्यवादी हरिश्चंद्र नहीं बन सकती; पर ‘नरो वा कुंजरो वा’ कहने में भी विश्वास नहीं करती” (यानी गोलमोल, दो-अर्थी बात भी नहीं करती), इधर-उधर पड़े पैसे उठाकर रख लेती है, पर इसे चोरी नहीं, मालकिन का भला मानती है।

आम ग़लती से बचें

परीक्षा में भक्तिन को सीधे “बेईमान” या “झूठी” न लिखें। पाठ का असली भाव यह है कि उसके छोटे-छोटे दुर्गुण भी उसकी सेवा-भावना और मालकिन के प्रति अपनेपन से जुड़े हैं, यही जटिलता उसे एक सजीव, वास्तविक चरित्र बनाती है, कोई आदर्श मूर्ति नहीं।

शास्त्र-प्रसंग: “तीरथ गए मुँडाए सिद्ध”
महादेवी को स्त्रियों का सिर घुटाना अच्छा नहीं लगता, इसलिए उन्होंने भक्तिन को रोका। भक्तिन ने बेझिझक उत्तर दिया कि शास्त्र में ऐसा लिखा है। पूछने पर कि क्या लिखा है, भक्तिन का तुरंत जवाब था, “तीरथ गए मुँडाए सिद्ध” (यानी वह पहले ही, मानो तीर्थ करके, सिर मुँड़वाने का पुण्य कमा चुकी है)। किस शास्त्र का यह सूत्र है, यह जान पाना महादेवी के लिए संभव नहीं था, इसलिए वे चुप हो गईं, और भक्तिन का चूड़ाकर्म (सिर मुँड़वाने की रस्म) हर बृहस्पतिवार को एक दरिद्र नाई से यथाविधि होता रहा।

5.3 विद्या-प्रसंग: अनपढ़ भक्तिन, फिर भी “गुरु”

भक्तिन विद्या का महत्त्व जानती है और महादेवी की पढ़ाई पर अभिमान करके अपनी अशिक्षा की कमी पूरी करती है। जब महादेवी ने सब काम करनेवालों से अँगूठे के निशान की जगह हस्ताक्षर लेने का नियम बनाया, तो भक्तिन बड़े कष्ट में पड़ गई: एक तो उससे पढ़ने की मुसीबत नहीं उठाई जा सकती थी, दूसरे सब गाड़ीवान दाइयों के साथ बैठकर पढ़ना उसकी वयोवृद्धता का अपमान था। अतः उसने यह तर्क दिया:

“हमारे मलकिन तौ रात-दिन कितबियन माँ गड़ी रहती हैं। अब हमहूँ पढ़ै लागब तो घर-गिरिस्ती कउन देखी-सुनी।” (हमारी मालकिन तो रात-दिन किताबों में डूबी रहती हैं, अगर हम भी पढ़ने लगें तो घर-गृहस्थी कौन देखेगा।)

भक्तिन, हस्ताक्षर के नियम पर

इसका असर यह हुआ कि बिना पढ़े ही भक्तिन क्लास में इंस्पेक्टर जैसी घूम-घूमकर दूसरों की लिखावट और बुद्धि की मंदता पर टीका-टिप्पणी करने लगी, अनपढ़ होते हुए भी पढ़ने वालों की गुरु बन बैठी।

5.4 सहायता के बहाने और अतिशयोक्ति

पढ़ाई-लिखाई में सीधी मदद न दे पाना भक्तिन अपनी हीनता मानती है, इसीलिए द्वार पर बैठकर छोटे-छोटे काम बताने का आग्रह करती रहती है, कभी उत्तर-पुस्तकें बाँधकर, कभी रंग की प्याली धोकर, कभी चटाई झाड़कर। इसी आत्म-महत्त्व से वह मालकिन को असाधारण सिद्ध करने वाली अतिशयोक्तियाँ भी गढ़ लेती है, जैसे “उसकी मालकिन-जैसा काम कोई जानता ही नहीं।” किताब प्रकाशित होने पर उसकी प्रसन्नता देखते ही बनती है।

5.5 रतजगा और भ्रमण की साथी

रात में लेखन के समय हिरनी सोना, कुत्ता बसंत और बिल्ली गोधूलि सब सो जाते हैं, पर भक्तिन कोने में बैठकर पूरी रात प्रशांत भाव से जागती है, ऊँघती तक नहीं, महादेवी की नज़र भाँपकर किताब, स्याही या काग़ज़ पहुँचा देती है। भ्रमण में भी वह एकांत साथिन रही है, बदरी-केदार के पहाड़ी रास्तों में महादेवी के आगे, गाँव की पगडंडी पर पीछे, यानी हमेशा छाया के समान साथ।

5.6 सेवक-स्वामी संबंध से परे

महादेवी लिखती हैं कि उनके और भक्तिन के बीच सेवक-स्वामी का संबंध है, यह कहना कठिन है, “क्योंकि ऐसा कोई स्वामी नहीं हो सकता, जो इच्छा होने पर भी सेवक को अपनी सेवा से हटा न सके और ऐसा कोई सेवक भी नहीं सुना गया, जो स्वामी के चले जाने का आदेश पाकर अवज्ञा से हँस दे।” यानी साधारण स्वामी तो चाहने पर सेवक को हटा ही सकता है; भक्तिन का संबंध इस ढाँचे में नहीं बँधता। भक्तिन को नौकर कहना उतना ही असंगत है जितना घर में आने-जाने वाले अँधेरे-उजाले और आँगन के गुलाब और आम को सेवक मानना। पाठ के अनुसार भक्तिन का स्वतंत्र व्यक्तित्व “अपने विकास के परिचय के लिए ही” लेखिका के जीवन को घेरे हुए है।

याद रखने की तरकीब

डर से बड़ा साथ का मोल

भक्तिन कारागार (जेल) से यमलोक जैसा डरती है, पर महादेवी के जेल जाने की आशंका पर वह जेल के डर से ज़्यादा इस बात से डरती है कि उसे अकेला छोड़ दिया जाएगा। इसीलिए वह घोषणा करती है कि अन्याय होने पर वह “बड़े लाट” (गवर्नर-जनरल) तक से लड़ेगी। डर से बड़ा उसके लिए साथ का मोल है, यही इस प्रसंग की जान है।

6 भाषा-शैली

6.1 तत्सम और लोकभाषा का सम्मिश्रण

महादेवी की तत्सम शब्दावली (मर्मभेदी, करुणामयी, पितृसत्तात्मक) और भक्तिन की अवधी लोकभाषा (“तुम पचै”, “होरहा”, “जानित है”) का मेल पाठ को एक साथ गंभीर और सजीव बनाता है।

✓ ध्यान दें

  • भक्तिन के संवाद उसकी अपनी अवधी बोली में ही उद्धृत करें, बदलें नहीं
  • व्यंग्य-विनोद (जैसे “दो संस्करण”, “इंस्पेक्टर के समान”) को पहचानें और समझाएँ

✗ न करें

  • भक्तिन के संवादों को खड़ी बोली में बदलकर उद्धृत न करें, भाषा-सौंदर्य खो जाता है
  • भक्तिन के दुर्गुणों को अलग करके, उसके गुणों की अनदेखी न करें

7 पाठ का केंद्रीय भाव

भक्तिन को सिर्फ़ एक सेविका की कहानी नहीं, सामंती-पितृसत्तात्मक समाज पर एक टिप्पणी के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। बेटियाँ होने पर उपेक्षा, पंचायत का अन्यायपूर्ण फ़ैसला और ज़मींदार का अपमान, इन्हें उस समाज की सच्चाई के रूप में पढ़ा जा सकता है, जहाँ स्त्री की मर्ज़ी को अक्सर जगह नहीं मिलती थी। भक्तिन कई बार हारती है (बेटी का मामला, लगान और ज़मींदार का अपमान), फिर भी स्वाभिमान से अपनी राह चुनती है; पाठ की भूमिका इसी कारण पाठ को “स्त्री-अस्मिता की संघर्षपूर्ण आवाज़” के रूप में पढ़ने को कहती है।

4भक्तिन के जीवन के परिच्छेद (चरण)
5 वर्षआयु में भक्तिन का विवाह हुआ
105 ₹भक्तिन की गुप्त बचत (पाँच बीसी और पाँच रुपया), महादेवी के लिए पेश की गई

पाठ का अंतिम वाक्य पूरे रेखाचित्र का सार बन जाता है: “भक्तिन की कहानी अधूरी है; पर उसे खोकर मैं इसे पूरी नहीं करना चाहती।” इसका अर्थ है कि लेखिका के लिए भक्तिन का साथ कहानी के पूरा होने से अधिक मूल्यवान है, इसलिए कहानी अधूरी रहे तो भी वे उसे खोना नहीं चाहतीं।

सभी परिभाषाएँ एक जगह
संस्मरणात्मक रेखाचित्रकिसी वास्तविक व्यक्ति के जीवन और चरित्र का, लेखक की स्मृति के आधार पर खींचा गया सजीव गद्य-चित्र
अलगौझापरिवार के साझा घर से अलग होकर स्वतंत्र गृहस्थी बसाना, बँटवारा
घरजमाईविवाह के बाद पत्नी के घर में ही स्थायी रूप से बस जाने वाला दामाद

8 शब्द-छवि: पाठ की कठिन शब्दावली

पाठ के अंत में दी गई “शब्द-छवि” (ग्लॉसरी) के प्रमुख शब्द, जो भक्तिन के अवधी संवादों और लेखिका की तत्सम भाषा, दोनों को समझने में मदद करते हैं:

शब्द-छवि: प्रमुख शब्द
तुम पचैतुम लोगों से (अवधी बोली)
दुर्वहजिसे ढोना कठिन हो
राबगन्ने का पका हुआ गाढ़ा रस
नैहरमायका
विधात्रीजन्म देने वाली माँ
पुरखिनबुज़ुर्ग महिला
दुर्लंघ्यजिसे पार करना कठिन हो
कुंचितसिकुड़ी हुई
तुषारपातओले बरसाना, यानी उत्साह पर पानी फेरना
हतबुद्धिजिसकी बुद्धि या विचारने की शक्ति मारी गई हो
होरहाहरे अनाजों का आग पर भुना हुआ रूप
झूँसीगंगा के तट पर, इलाहाबाद के पास का स्थान, जहाँ प्राचीन काल में प्रतिष्ठानपुरी नगरी बसी थी
भइयहूछोटे भाई की पत्नी
जिठौतजेठ का पुत्र
अजिया ससुरपति का दादा
परीक्षा से पहले स्वयं जाँचें
  • क्या मैं महादेवी वर्मा का जीवन-परिचय, रचनाएँ और पुरस्कार बिना देखे लिख सकता हूँ?
  • क्या मैं भक्तिन के जीवन के चारों परिच्छेदों को सही क्रम में बता सकता हूँ?
  • क्या मैं पंचायत के अन्यायपूर्ण फ़ैसले की पूरी घटना समझा सकता हूँ?
  • क्या मैं भक्तिन के गुण और दुर्गुण, दोनों उदाहरण सहित लिख सकता हूँ?
  • क्या मैं समझा सकता हूँ कि भक्तिन को “नौकर” कहना असंगत क्यों है?
Quick Revision: परीक्षा से एक रात पहले यही पढ़ें
  • महादेवी वर्मा: जन्म 1907 फर्रुखाबाद, निधन 1987 इलाहाबाद; छायावाद के चार स्तंभों में से एक
  • पुरस्कार: ज्ञानपीठ (1983, ‘यामा’ हेतु), भारत भारती, पद्मभूषण (1956)
  • भक्तिन का असली नाम लछमिन; कंठी माला देखकर लेखिका ने “भक्तिन” नाम दिया
  • पहला परिच्छेद: बचपन, विमाता की उपेक्षा, 5 वर्ष में विवाह, 9 वर्ष में गौना
  • दूसरा परिच्छेद: तीन बेटियाँ, जिठानियों का भेदभाव, पति का गहरा प्रेम, अलगौझा, फिर हरे-भरे खेत और गाय-भैंस की समृद्धि
  • तीसरा परिच्छेद: छत्तीस वर्ष से कुछ अधिक आयु में पति की मृत्यु, भक्तिन उनतीस वर्ष की; पुनर्विवाह ठुकराया
  • बड़ी बेटी की त्रासदी: पंचायत बैठी, मूल कारण कलियुग माना, और बिना दोष तय किए, एक कोठरी से निकलने पर ही अपीलहीन फ़ैसले से विवाह मान लिया
  • ज़मींदार के अपमान (दिन भर कड़ी धूप में खड़ा रखना) के दूसरे ही दिन भक्तिन कमाई के विचार से शहर आई
  • चौथा परिच्छेद: महादेवी के घर सेवा, पाक-कला विवाद, हस्ताक्षर-प्रसंग में “गुरु” बनना
  • केंद्रीय भाव: भक्तिन स्त्री-अस्मिता की संघर्षपूर्ण आवाज़; अंतिम पंक्ति: “भक्तिन की कहानी अधूरी है”