- उमाशंकर जोशी का जीवन-परिचय, उनकी प्रमुख रचनाएँ और भारतीय साहित्य में उनका योगदान
- ‘छोटा मेरा खेत’ कविता में रचना-प्रक्रिया को कृषि-रूपक से समझाने की पूरी युक्ति
- ‘बगुलों के पंख’ कविता में सौंदर्य के चित्रात्मक वर्णन और कवि के मन पर उसके प्रभाव से सौंदर्य-बोध कराने की युक्ति
- रूपक अलंकार और बिंब में अंतर पहचानना, दोनों कविताओं से उदाहरण देना
- दोनों कविताओं की आवृत्ति (पहली पंक्ति या उसके भाव की अंत में पुनरावृत्ति) शैली को समझना
- अध्याय के सभी अभ्यास प्रश्नों के उत्तर स्वयं लिखने की तैयारी
1 कवि परिचय: उमाशंकर जोशी

उमाशंकर जोशी मूलतः गुजराती भाषा के कवि थे, पर उनका साहित्यिक योगदान गुजराती की सीमा लाँघकर पूरे भारतीय साहित्य के लिए महत्त्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने बीसवीं सदी की गुजराती कविता और साहित्य को एक नयी भंगिमा (मुद्रा/अंदाज़) और नया स्वर दिया। यहाँ पढ़ी जाने वाली दोनों कविताएँ मूलतः गुजराती में लिखी गई थीं, हिंदी में इनका रूपांतरण रघुवीर चौधरी और भोलाभाई पटेल ने किया है।
दोनों कविताओं का हिंदी रूपांतरण रघुवीर चौधरी और भोलाभाई पटेल ने किया है, यह नाम याद रखें।
1.1 परंपरा का ज्ञान और अनुवाद-कार्य
पाठ के अनुसार जोशी जी को परंपरा का गहरा ज्ञान था। उन्होंने कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतलम् और भवभूति के उत्तररामचरित, दोनों संस्कृत के क्लासिक नाटकों का गुजराती में अनुवाद किया। ऐसे अनुवाद गुजराती साहित्य की अभिव्यक्ति-क्षमता को बढ़ाने वाले थे।
1.2 काव्य-शैली की विशेषता
बतौर कवि उमाशंकर जी ने गुजराती कविता को प्रकृति से जोड़ा, आम ज़िंदगी के अनुभव से परिचित कराया और उसे एक नयी शैली दी। जीवन के सामान्य प्रसंगों पर सामान्य बोलचाल की भाषा में कविता लिखने वाले भारतीय आधुनिकतावादी कवियों में वे अन्यतम (सबसे आगे) माने जाते हैं। कविता के साथ-साथ साहित्य की दूसरी विधाओं में भी, खासकर साहित्य-आलोचना में, उनका योगदान बहुमूल्य है। निबंधकार के रूप में भी वे गुजराती साहित्य में बेजोड़ माने जाते हैं।
1.3 प्रमुख रचनाएँ (विधावार)
जोशी जी उन साहित्यिक व्यक्तित्वों में हैं जिनका भारत की आज़ादी की लड़ाई से रिश्ता रहा। आज़ादी की लड़ाई के दौरान वे जेल भी गए थे।
2 कविता 1: छोटा मेरा खेत
यह कविता खेती के रूपक में कवि-कर्म (रचना-प्रक्रिया) के हर चरण को बाँधने की कोशिश के रूप में पढ़ी जा सकती है। कागज़ का पन्ना, जिस पर रचना शब्दबद्ध होती है, कवि को एक चौकोर खेत की तरह लगता है।
रूपक अलंकार वह अलंकार है जिसमें उपमेय (जिसकी उपमा दी जा रही है) पर उपमान (जिससे उपमा दी जा रही है) का इस प्रकार आरोप कर दिया जाता है कि दोनों में कोई भेद ही न रहे, यानी “यह वही है” कह दिया जाता है, “यह उसके जैसा है” नहीं। ‘छोटा मेरा खेत’ में कागज़ के पन्ने को सीधे “खेत” कह दिया गया है, “खेत जैसा पन्ना” नहीं, यही रूपक है।
छोटा मेरा खेत चौकोना
कागज़ का एक पन्ना,
कोई अंधड़ कहीं से आया
क्षण का बीज वहाँ बोया गया।
कल्पना के रसायनों को पी
बीज गल गया निःशेष;
शब्द के अंकुर फूटे,
पल्लव-पुष्पों से नमित हुआ विशेष।
झूमने लगे फल,
रस अलौकिक,
अमृत धाराएँ फूटतीं
रोपाई क्षण की,
कटाई अनंतता की
लुटते रहने से जरा भी नहीं कम होती।
रस का अक्षय पात्र सदा का
छोटा मेरा खेत चौकोना।
2.1 कृषि-रूपक: रचना-प्रक्रिया के चार चरण
पूरी कविता रचना-प्रक्रिया (कवि-कर्म) को खेती के एक चक्र की तरह दिखाती है। हर कृषि-शब्द के पीछे रचना-प्रक्रिया का एक ठोस चरण छिपा है:
2.2 अंतरा-वार सरल भावार्थ
खेत, अंधड़ और बीज
कागज़ का चौकोर पन्ना ही कवि का खेत है। कोई अंधड़ (पाठ के अनुसार आशय भावनात्मक आँधी से) कहीं से आता है और उसके प्रभाव से किसी क्षण उस खेत में बीज बोया जाता है। पाठ के अनुसार यह बीज-रचना विचार और अभिव्यक्ति का हो सकता है। “क्षण का बीज” से संकेत मिलता है कि बीज एक क्षण में बोया जाता है।
बीज का गलना, अंकुर का फूटना
कल्पना रूपी रसायन को पीकर बीज पूरी तरह गल जाता है (निःशेष = बिना कुछ बचे)। इसी से शब्दों के अंकुर फूटते हैं, और रचना पल्लव-पुष्पों (कोमल पत्तों-फूलों) से विशेष रूप से लद जाती है।
फल, रस और अक्षयपात्र
फल झूमने लगते हैं, उनमें से अलौकिक (जो सांसारिक न हो) रस फूटता है। “रोपाई क्षण की” (बोना पल-भर में हुआ) पर “कटाई अनंतता की” (कटाई, यानी पढ़ा जाना, अनंत काल तक चलता है)। पाठ के अनुसार उत्तम साहित्य कालजयी होता है और असंख्य पाठकों द्वारा असंख्य बार पढ़ा जाता है; यही उत्तम साहित्य की विशेषता है: “लुटते रहने से जरा भी नहीं कम होती”।
पहली पंक्ति की वापसी
कविता के अंत में “छोटा मेरा खेत चौकोना” फिर से आता है। “रस का अक्षय पात्र सदा का”: खेत (कागज़ का पन्ना) सदा के लिए रस का अक्षय (कभी न चुकने वाला) पात्र है। पहली पंक्ति की वापसी से कविता गोलाकार लगती है।
अक्षयपात्र का शाब्दिक अर्थ है वह पात्र (बर्तन) जो कभी खाली न हो, जिसमें से लगातार निकालने पर भी सामग्री कम न हो (महाभारत की कथा से जुड़ा प्रचलित प्रतीक; पाठ की पंक्ति “रस का अक्षय पात्र सदा का” में यह रूपक अलंकार है)। यहाँ कवि साहित्य के रस को अक्षयपात्र कहते हैं; पाठ के अनुसार “खेत में पैदा होने वाला अन्न कुछ समय के बाद समाप्त हो जाता है, किंतु साहित्य का रस कभी चुकता नहीं।”
पाठ अन्न और रस में फ़र्क़ करता है: खेत में पैदा होने वाला अन्न कुछ समय बाद समाप्त हो जाता है, पर साहित्य का रस कभी नहीं चुकता।
3 कविता 2: बगुलों के पंख
यह एक सुंदर दृश्य की कविता है। सौंदर्य का अपेक्षित प्रभाव उत्पन्न करने के लिए कवियों ने कई युक्तियाँ अपनाई हैं, जिनमें सबसे प्रचलित है: सौंदर्य के ब्यौरों का चित्रात्मक वर्णन करने के साथ-साथ अपने मन पर पड़ने वाले उसके प्रभाव का भी वर्णन करना। वस्तुगत (जो बाहर दिखे) और आत्मगत (जो भीतर महसूस हो) के इस संयोग की युक्ति पाठक को मूल सौंदर्य के काफ़ी निकट ले जाती है। जोशी जी की इस कविता में ठीक यही हुआ है।
बिंब शब्दों के माध्यम से बनाया गया वह चित्र है जो किसी दृश्य, ध्वनि, रंग, गंध या स्पर्श को पाठक की इंद्रियों में सीधे साकार कर देता है, मानो पाठक स्वयं वह दृश्य देख या अनुभव कर रहा हो। ‘बगुलों के पंख’ में कजरारे बादल, पाँती-बँधे सफ़ेद बगुले और साँझ की सतेज श्वेत काया का वर्णन एक ऐसा ही दृश्य-बिंब रचता है। (पाठ के ‘कविता के आसपास’ प्रश्न 1 में भी बिंब की यही बात कही गई है: जब कवि दृश्यों, चित्रों, ध्वनि-योजना अथवा रूप-रस-गंध को हमारे ऐन्द्रिक अनुभवों में साकार कर देता है।)
नभ में पाँती-बँधे बगुलों के पंख,
चुराए लिए जातीं वे मेरी आँखें।
कजरारे बादलों की छाई नभ छाया,
तैरती साँझ की सतेज श्वेत काया।
हौले हौले जाती मुझे बाँध निज माया से।
उसे कोई तनिक रोक रक्खो।
वह तो चुराए लिए जाती मेरी आँखें
नभ में पाँती-बँधी बगुलों की पाँखें।
3.1 पंक्ति-वार सरल भावार्थ
3.2 दृश्य के ब्यौरे और कवि पर प्रभाव
कजरारे बादल
- रंग: गहरा काला
- आकाश में पृष्ठभूमि की तरह छाए हुए
- इन्हीं के ऊपर बगुले उड़ते दिखते हैं
श्वेत बगुले व साँझ की काया
- रंग: चमकीला सफ़ेद
- काले बादलों के ऊपर तैरते-से प्रतीत होते हैं
- कवि की आँखें “चुराए लिए जाती” हैं, उसे अपनी माया में बाँधते हैं
‘बगुलों के पंख’ पर उत्तर में काले बादलों की पृष्ठभूमि, श्वेत बगुलों का दृश्य और उसका कवि पर प्रभाव, तीनों लिखें। पाठ की युक्ति यही है: सौंदर्य के ब्यौरों का चित्रात्मक वर्णन और मन पर उसके प्रभाव का वर्णन (वस्तुगत और आत्मगत का संयोग)।
4 दोनों कविताओं की तुलना
छोटा मेरा खेत
- 4 अंतरे, विस्तृत कृषि-रूपक पर आधारित
- केंद्रीय भाव: रचना-प्रक्रिया की व्याख्या, साहित्य का रस अक्षय है
- प्रमुख अलंकार: रूपक अलंकार
बगुलों के पंख
- 1 अंतरा, 8 पंक्तियों की छोटी दृश्य-कविता
- केंद्रीय भाव: प्राकृतिक सौंदर्य का मोहक प्रभाव
- प्रमुख तकनीक: दृश्य-बिंब (सौंदर्य का चित्रात्मक वर्णन और कवि के मन पर उसका प्रभाव)
दोनों कविताओं में एक साझा तकनीक भी है: आवृत्ति (पुनरावृत्ति) : दोनों कविताएँ अपनी पहली पंक्ति (या भाव) को अंत में दोहराकर समाप्त होती हैं, जिससे रचना गोलाकार (चक्रीय) प्रतीत होती है, मानो बात वहीं लौट आई हो जहाँ से शुरू हुई थी।
खेत में मुख्यतः रूपक, बगुलों में मुख्यतः बिंब
“छोटा मेरा खेत” का मुख्य अलंकार रूपक है (कागज़ को सीधे खेत कह दिया गया); “बगुलों के पंख” का मुख्य काव्य-गुण दृश्य-बिंब है (सौंदर्य का चित्रात्मक वर्णन)। ध्यान रहे, “छोटा मेरा खेत” में भी “झूमने लगे फल” जैसी दृश्य-पंक्तियाँ (बिंब) हैं।
पाठ का ‘कला की बात’ अभ्यास पूछता है कि ‘बगुलों के पंख’ पढ़ने पर मन में कैसे चित्र उभरते हैं, और उन्हें किसी अन्य कला-माध्यम (जैसे चित्र, संगीत, नृत्य) में व्यक्त करने को कहता है।
5 शब्दार्थ (कठिन शब्द)
NCERT का यह पाठ अपनी ओर से कोई शब्दार्थ सूची नहीं देता। नीचे दोनों कविताओं के कठिन शब्दों के अर्थ दिए गए हैं:
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| चौकोना | चौकोर, चार बराबर भुजाओं वाला |
| अंधड़ | तेज़ आँधी (पाठ के अनुसार यहाँ आशय भावनात्मक आँधी से) |
| निःशेष | पूरी तरह, बिना कुछ बचे हुए |
| पल्लव-पुष्प | कोमल पत्ते और फूल |
| नमित | झुका हुआ, लदा हुआ (भार से) |
| अलौकिक | जो सांसारिक/लौकिक न हो, दिव्य |
| अक्षय | जो कभी क्षय (कम) न हो, कभी न चुकने वाला |
| नभ | आकाश |
| पाँती-बँधे | पंक्ति में बँधे हुए, कतारबद्ध |
| कजरारे | काजल जैसे काले |
| सतेज | तेजयुक्त, चमकीला |
| श्वेत काया | सफ़ेद शरीर/रूप |
| हौले हौले | धीरे-धीरे |
| निज माया | अपना मोहजाल/सम्मोहन |
| तनिक | थोड़ा, ज़रा-सा |
| पाँखें | पंख (काव्यात्मक रूप) |
- क्या मैं उमाशंकर जोशी का जन्म-निधन वर्ष और दोनों अनुवादकों के नाम बिना देखे लिख सकता हूँ?
- क्या मैं ‘छोटा मेरा खेत’ के कृषि-रूपक की पूरी शब्दावली (खेत, अंधड़, बीज, अंकुर, फल) समझा सकता हूँ?
- क्या मैं ‘रस का अक्षय पात्र’ का अर्थ अपने शब्दों में लिख सकता हूँ?
- क्या मैं ‘बगुलों के पंख’ का दृश्य-बिंब और कवि पर उसका प्रभाव समझा सकता हूँ?
- क्या मैं रूपक और बिंब में अंतर करते हुए दोनों कविताओं से एक-एक उदाहरण दे सकता हूँ?
- उमाशंकर जोशी: जन्म 1911, निधन 1988, गुजराती कवि; अनुवादक: रघुवीर चौधरी और भोलाभाई पटेल
- जोशी ने कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतलम् व भवभूति के उत्तररामचरित का गुजराती अनुवाद किया; 1947 से ‘संस्कृति’ पत्रिका का संपादन
- छोटा मेरा खेत: रूपक, खेत=कागज़, अंधड़=भावनात्मक आँधी, बीज=विचार, अंकुर=शब्द, फल/रस=रचना; रस कभी नहीं चुकता (अक्षयपात्र)
- बगुलों के पंख: दृश्य-बिंब, कजरारे बादलों पर उड़ते सफ़ेद बगुले, साँझ की सतेज श्वेत काया जैसे; कवि उसी में अटका रह जाता है और इस माया से बचने की गुहार लगाता है
- दोनों कविताएँ पहली पंक्ति (या उसके भाव) की अंत में पुनरावृत्ति (आवृत्ति) से गोलाकार संरचना बनाती हैं