NCERT की पाठ्यपुस्तक आरोह भाग 2 के अध्याय 10 «भक्तिन» के अभ्यास (पाठ के साथ, पाठ के आसपास, भाषा की बात) के सभी प्रश्नों के पूरे हल। पहले ख़ुद उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 पाठ के साथ
प्र. भक्तिन अपना वास्तविक नाम लोगों से क्यों छुपाती थी? भक्तिन को यह नाम किसने और क्यों दिया होगा?
उत्तर: भक्तिन का असली नाम लछमिन, यानी लक्ष्मी है, जो धन-समृद्धि की देवी का नाम है। पाठ कहता है कि “लक्ष्मी की समृद्धि भक्तिन के कपाल की कुंचित रेखाओं में नहीं बँध सकी”। भक्तिन के जीवन में समृद्धि के दिन भी आए (हरे-भरे खेत, मोटी-ताज़ी गाय-भैंस, फलों से लदे पेड़), पर बाद में उसके जीवन में दुख और संघर्ष अधिक रहे। पाठ के अनुसार भक्तिन बहुत समझदार है, इसलिए वह अपना समृद्धि-सूचक नाम किसी को नहीं बताती। उसने यह नाम केवल एक बार बताया, जब वह महादेवी के यहाँ नौकरी माँगने आई थी, अपनी ईमानदारी दिखाने के लिए, और वह भी इस शर्त के साथ कि इसका उपयोग कभी न किया जाए। “भक्तिन” नाम स्वयं लेखिका महादेवी वर्मा ने दिया, जब उन्होंने उसके गले में कंठी माला देखी। इस “कवित्वहीन” नाम को पाकर भी भक्तिन गद्गद (बहुत प्रसन्न) हो उठी थी।
प्र. दो कन्या-रत्न पैदा करने पर भक्तिन पुत्र-महिमा में अंधी अपनी जिठानियों द्वारा घृणा व उपेक्षा का शिकार बनी। ऐसी घटनाओं से ही अकसर यह धारणा चलती है कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है। क्या इससे आप सहमत हैं?
उत्तर: यह पूरी तरह से सहमत होने वाली बात नहीं है। जिठानियों का व्यवहार निश्चित रूप से क्रूर और अनुचित था, पर इसकी जड़ में पितृसत्तात्मक सोच है, न कि स्त्रियों का आपसी स्वभाव। जिस समाज में पुत्र को ही वंश और सम्मान का आधार माना जाता है, वहाँ स्त्रियाँ स्वयं भी इसी सोच में ढल जाती हैं और दूसरी स्त्रियों को उसी पैमाने पर आँकने लगती हैं। जिठानियाँ खुद भी इसी व्यवस्था की उपज हैं, जिसमें पुत्र जन्म देकर ही घर में ऊँचा पद (“पुरखिन”) मिलता है, जिसकी वे भी अपने बेटों के दम पर उम्मीदवार भर थीं (सास इस पद पर पहले ही पहुँच चुकी थी)। इसलिए असली दोषी पितृसत्तात्मक मानसिकता है, जो स्त्रियों को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर देती है, स्त्री का स्वभाव नहीं।
प्र. भक्तिन की बेटी पर पंचायत द्वारा ज़बरन पति थोपा जाना एक दुर्घटना भर नहीं, बल्कि विवाह के संदर्भ में स्त्री के मानवाधिकार (विवाह करें या न करें अथवा किससे करें) इसकी स्वतंत्रता को कुचलते रहने की सदियों से चली आ रही सामाजिक परंपरा का प्रतीक है। कैसे?
उत्तर: इस घटना में एक युवक ज़बरन भक्तिन की विधवा बेटी की कोठरी में घुस गया, जिसे बेटी ने पीटकर बाहर निकाला। पंचायत बैठी और दोनों पक्षों की बात सामने आई, पर उसने समस्या का मूल कारण कलियुग को माना और यह तय किए बिना कि दोषी कौन है (“चाहे उन दोनों में एक सच्चा हो चाहे दोनों झूठे”), केवल इस आधार पर दोनों को पति-पत्नी मान लिया कि वे एक कोठरी से साथ निकले। इसमें बेटी की अपनी इच्छा, सहमति या पसंद का कोई मूल्य नहीं था। यह किसी एक पंचायत की भूल नहीं, बल्कि उस सामाजिक परंपरा का प्रतीक है, जिसमें स्त्री के विवाह-संबंधी निर्णय अक्सर परिवार, समाज या पंचायत जैसी बाहरी शक्तियाँ लेती आई हैं और स्त्री की अपनी सहमति को उसमें जगह नहीं मिलती। आज भी बाल-विवाह, ज़बरन विवाह और “इज़्ज़त” के नाम पर लिए गए ऐसे फ़ैसले इसी परंपरा की कड़ियाँ हैं।
प्र. “भक्तिन अच्छी है, यह कहना कठिन होगा, क्योंकि उसमें दुर्गुणों का अभाव नहीं” लेखिका ने ऐसा क्यों कहा होगा?
उत्तर: लेखिका ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि भक्तिन को वे किसी आदर्श, दोषरहित मूर्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक सच्चे, सजीव मनुष्य के रूप में चित्रित करना चाहती हैं। भक्तिन सत्यवादी हरिश्चंद्र जैसी पूरी तरह सच बोलने वाली नहीं है, इधर-उधर पड़े पैसे उठाकर रख लेती है, और शास्त्र के प्रश्नों को अपनी सुविधा के अनुसार सुलझा लेती है। पर ये सभी छोटे दुर्गुण भी उसकी सेवा-भावना और मालकिन के प्रति सच्चे अपनेपन से ही जुड़े हैं। लेखिका के इस ईमानदार मूल्यांकन से भक्तिन का चरित्र और भी विश्वसनीय और मानवीय बन जाता है, वह किसी कहानी की काल्पनिक नायिका नहीं, बल्कि एक वास्तविक व्यक्ति लगती है।
प्र. भक्तिन द्वारा शास्त्र के प्रश्न को सुविधा से सुलझा लेने का क्या उदाहरण लेखिका ने दिया है?
उत्तर: महादेवी को स्त्रियों का सिर घुटाना अच्छा नहीं लगता था, इसलिए उन्होंने भक्तिन को ऐसा करने से रोका। भक्तिन ने बिना किसी झिझक के उत्तर दिया कि “शास्त्र में लिखा है” कि ऐसा करना चाहिए। जब महादेवी ने पूछा कि आख़िर क्या लिखा है, तो भक्तिन ने तुरंत जवाब दिया, “तीरथ गए मुँडाए सिद्ध।” यह किस शास्त्र का सूत्र है, यह जान पाना महादेवी के लिए भी संभव नहीं हो सका। महादेवी हारकर मौन हो गईं। इस तरह भक्तिन ने इसी अस्पष्ट शास्त्र-वाक्य के सहारे अपनी बात मनवा ली, और हर बृहस्पतिवार उसका चूड़ाकर्म (सिर मुँडवाना) चलता रहा।
प्र. भक्तिन के आ जाने से महादेवी अधिक देहाती कैसे हो गईं?
उत्तर: भक्तिन ने अपने ग्रामीण खान-पान, जैसे मकई का दलिया, बाजरे के तिल लगे पुए, ज्वार की भुनी खिचड़ी और महुए की लपसी, महादेवी को बार-बार बनाकर खिलाए और इन्हें बेहतरीन बताती रही। धीरे-धीरे महादेवी को भी ये ग्रामीण स्वाद पसंद आने लगे और वे इनकी अभ्यस्त हो गईं। इसके उलट भक्तिन खुद कभी शहरी स्वाद, जैसे रसगुल्ला, नहीं अपना पाई। इसीलिए महादेवी खुद स्वीकार करती हैं, “इसी से आज मैं अधिक देहाती हूँ; पर उसे शहर की हवा नहीं लग पाई।”
2 पाठ के आसपास
प्र. ‘आलो-आँधारि’ की नायिका और लेखिका बेबी हालदार और भक्तिन के व्यक्तित्व में आप क्या समानता देखते हैं?
उत्तर: यह एक खुला, विद्यार्थी की अपनी राय पर आधारित प्रश्न है, विद्यार्थी ‘आलो-आँधारि’ पढ़कर अपने विचार लिखें। सामान्य समानता यह देखी जा सकती है कि बेबी हालदार और भक्तिन, दोनों ही ग़रीब, संघर्षपूर्ण पृष्ठभूमि से आती हैं और घरेलू सेविका के रूप में काम करती हैं। दोनों ही अपने कठिन जीवन के बावजूद स्वाभिमान और आत्मबल नहीं खोतीं, दोनों ही समाज में हाशिये पर पड़ी उन स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिनकी आवाज़ आमतौर पर सुनी नहीं जाती, पर जो अपनी शर्तों पर जीना नहीं छोड़तीं।
प्र. भक्तिन की बेटी के मामले में जिस तरह का फ़ैसला पंचायत ने सुनाया, वह आज भी कोई हैरतअंगेज़ बात नहीं है। अख़बारों या टी.वी. समाचारों में आनेवाली किसी ऐसी ही घटना को भक्तिन के उस प्रसंग के साथ रखकर उस पर चर्चा करें।
उत्तर: यह एक खुला चर्चा-आधारित प्रश्न है। विद्यार्थी किसी ऐसी वास्तविक ख़बर का उदाहरण दें, जिसमें पंचायत, “खाप” या समाज ने किसी स्त्री की सहमति के बिना ही उसके वैवाहिक भविष्य पर फ़ैसला सुनाया हो, जैसे किसी लड़की-लड़के को साथ देखे जाने मात्र पर विवाह के लिए बाध्य करना, या किसी के मान-सम्मान के नाम पर स्त्री की इच्छा को नज़रअंदाज़ करना। भक्तिन की बेटी के प्रसंग की तरह ही आज भी अनेक मामलों में स्त्री का अपना पक्ष सुने बिना उस पर फ़ैसला थोप दिया जाता है, यह दिखाता है कि यह समस्या समय के साथ पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
प्र. पाँच वर्ष की वय में ब्याही जानेवाली लड़कियों में सिर्फ़ भक्तिन नहीं है, बल्कि आज भी हज़ारों अभागिनियाँ हैं। बाल-विवाह और उम्र के अनमेलपन वाले विवाह की अपने आस-पास हो रही घटनाओं पर दोस्तों के साथ परिचर्चा करें।
उत्तर: यह एक खुला, कक्षा-चर्चा आधारित प्रश्न है। विद्यार्थी अपने आस-पास के क्षेत्र में हुए या सुने गए बाल-विवाह के उदाहरणों पर चर्चा करें, साथ ही यह भी विचार करें कि बाल-विवाह प्रतिषेध अधिनियम जैसे कानूनों के बावजूद यह प्रथा कुछ क्षेत्रों में अब भी क्यों जारी है, इसके पीछे कौन-सी सामाजिक-आर्थिक मजबूरियाँ (ग़रीबी, शिक्षा की कमी, रूढ़िवादी परंपराएँ) काम करती हैं, और इसे रोकने के लिए क्या किया जा सकता है।
प्र. महादेवी जी इस पाठ में हिरनी सोना, कुत्ता बसंत, बिल्ली गोधूलि आदि के माध्यम से पशु-पक्षी को मानवीय संवेदना से उकेरने वाली लेखिका के रूप में उभरती हैं। उन्होंने अपने घर में और भी कई पशु-पक्षी पाल रखे थे तथा उन पर रेखाचित्र भी लिखे हैं। शिक्षक की सहायता से उन्हें ढूँढ़कर पढ़ें (जो ‘मेरा परिवार’ नाम से प्रकाशित है)।
उत्तर: यह एक स्वाध्याय-आधारित (शिक्षक की सहायता से करने वाला) प्रश्न है। विद्यार्थी महादेवी वर्मा की पुस्तक ‘मेरा परिवार’ पढ़ें, जिसमें उन्होंने अपने पाले हुए विभिन्न पशु-पक्षियों पर आधारित संस्मरणात्मक रेखाचित्र लिखे हैं। पाठ में हिरनी सोना, कुत्ता बसंत और बिल्ली गोधूलि का उल्लेख इसी संवेदनशील दृष्टि की एक झलक है, जहाँ महादेवी पशु-पक्षियों को भी अपने परिवार का ही हिस्सा मानती हैं।
3 भाषा की बात
प्र. नीचे दिए गए विशिष्ट भाषा-प्रयोगों के उदाहरणों को ध्यान से पढ़िए और इनकी अर्थ-छवि स्पष्ट कीजिए: (क) पहली कन्या के दो संस्करण और कर डाले (ख) खोटे सिक्कों की टकसाल जैसी पत्नी (ग) अस्पष्ट पुनरावृत्तियाँ और स्पष्ट सहानुभूतिपूर्ण
उत्तर (क): इसका अर्थ है कि भक्तिन ने पहली बेटी जैसी दिखने वाली दो और बेटियाँ जन्मीं। “संस्करण” शब्द किताब के प्रकाशन से जुड़ा है, यहाँ इसे व्यंग्यात्मक ढंग से प्रयोग करके यह दिखाया गया है कि जैसे कोई किताब बार-बार छपे, वैसे ही भक्तिन के घर एक जैसी दिखने वाली बेटियाँ जन्म ले रही थीं, जिसे परिवार वाले पसंद नहीं करते थे।
उत्तर (ख): “टकसाल” वह जगह होती है जहाँ सिक्के ढाले जाते हैं, और अच्छे सिक्के वहाँ से निकलने की उम्मीद की जाती है। “खोटे सिक्कों की टकसाल जैसी पत्नी” कहकर यह व्यंग्य किया गया है कि भक्तिन से केवल पुत्रियाँ ही जन्म ले रही थीं (जिन्हें उस समय के समाज में “खोटा सिक्का” यानी कम मूल्यवान माना जाता था), मानो वह पुत्र-रूपी “खरे सिक्के” नहीं बना पा रही। पर पाठ यह भी कहता है कि इस दंड-विधान में ऐसी कोई धारा नहीं थी जिससे ऐसी पत्नी से पति को विरक्त किया जा सकता; पति का प्रेम बना रहा।
उत्तर (ग): जब भक्तिन नैहर पहुँचती है, तो गाँव वाले “हाय लछमिन अब आई” जैसी बातें अस्पष्ट रूप से दोहराते हैं (जिससे उसे कुछ अनहोनी होने का आभास मिलता है), साथ ही उनकी दृष्टि में स्पष्ट सहानुभूति भी झलकती है। यह पंक्ति उस पल के मिले-जुले माहौल, अस्पष्ट संकेत और स्पष्ट संवेदना, दोनों को एक साथ व्यक्त करती है।
प्र. ‘बहनोई’ शब्द ‘बहन (स्त्री-) + ओई’ से बना है। इस शब्द में हिंदी भाषा की एक अनन्य विशेषता प्रकट हुई है, पुंलिंग शब्दों में स्त्री-प्रत्यय जोड़कर स्त्रीलिंग शब्द बनने की प्रक्रिया तो कई भाषाओं में दिखती है, पर स्त्रीलिंग शब्द में पुं-प्रत्यय जोड़कर पुंलिंग शब्द बनाने की घटना प्रायः अन्य भाषाओं में नहीं दिखती। ऐसे कुछ और शब्द और उनमें लगे पुं-प्रत्ययों की हिंदी तथा अन्य भाषाओं में खोज करें।
उत्तर: यह एक स्वाध्याय-आधारित शोध-प्रश्न है। इसी प्रकार ‘ननदोई’ (ननद + ओई, यानी ननद का पति) में भी वही पुं-प्रत्यय ‘ओई’ है। विद्यार्थी अपने शिक्षक और परिवार के बड़ों की सहायता से अपनी बोली और आस-पास बोली जाने वाली अन्य भाषाओं में ऐसे शब्दों की खोज करें और कक्षा में साझा करें।
प्र. पाठ में आए लोकभाषा के इन संवादों को समझकर इन्हें खड़ी बोली हिंदी में ढालकर प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर (क): “ई कउन बड़ी बात आय। रोटी बनाय जानित है, दाल राँध लेइत है, साग-भाजी छँउक सकित है, अउर बाकी का रहा।” खड़ी बोली में: यह कौन-सी बड़ी बात है। रोटी बनाना जानती हूँ, दाल पका लेती हूँ, सब्ज़ी छौंक सकती हूँ, और बाकी क्या ही बचा है।
उत्तर (ख): “हमारे मालकिन तौ रात-दिन कितबियन माँ गड़ी रहती हैं। अब हमहूँ पढ़ै लागब तो घर-गिरिस्ती कउन देखी-सुनी।” खड़ी बोली में: हमारी मालकिन तो रात-दिन किताबों में डूबी रहती हैं। अगर अब मैं भी पढ़ने लगूँ, तो घर-गृहस्थी कौन देखेगा।
उत्तर (ग): “ऊ बिचरिअउ तौ रात-दिन काम माँ झुकी रहती हैं, अउर तुम पचै घूमती-फिरती हौ, चलौ तनिक हाथ बटाय लेउ।” खड़ी बोली में: वह बेचारी तो रात-दिन काम में झुकी रहती है, और तुम लोग घूमती-फिरती हो, चलो थोड़ा हाथ बँटा दो।
उत्तर (घ): “तब ऊ कुच्छौ करिहैं-धरिहैं ना, बस गली-गली गाउत-बजाउत फिरिहैं।” खड़ी बोली में: तब वह कुछ करेगा-धरेगा नहीं, बस गली-गली गाता-बजाता फिरेगा।
उत्तर (ङ): “तुम पचै का का बताई, यहै पचास बरिस से संग रहित है।” खड़ी बोली में: तुम लोगों को क्या-क्या बताऊँ, यही पचास वर्षों से साथ है।
उत्तर (च): “हम कुकुरी बिलारी न होयँ, हमार मन पुसाई तौ हम दूसरा के जाब नाहिं त तुम्हार पचै की छाती पै होरहा भूँजब और राज करब, समुझे रहौ।” खड़ी बोली में: हम कुतिया-बिल्ली नहीं हैं। हमारा मन चाहेगा तो हम दूसरे के पास जाएँगे, नहीं तो तुम लोगों की छाती पर होरहा भूँजेंगे और राज करेंगे, समझ लो।
प्र. भक्तिन पाठ में ‘पहली कन्या के दो संस्करण’ जैसे प्रयोग लेखिका के खास भाषाई संस्कार की पहचान कराते हैं, साथ ही ये कथ्य को संप्रेषणीय बनाने में भी मददगार हैं। वर्तमान हिंदी में भी कुछ अन्य प्रकार की शब्दावली समाहित हुई है। बताएँ कि इनमें किन विशेष प्रकार की शब्दावली का प्रयोग हुआ है, और इनका प्रयोग करते हुए स्वयं कुछ वाक्य बनाएँ।
उत्तर: पाठ में दिए गए उदाहरण-वाक्यों में क्रमशः कंप्यूटर/तकनीकी शब्दावली (“वायरस से भरा हुआ है”, “सिस्टम को हैंग कर देता है”), खेल (क्रिकेट/फुटबॉल) की शब्दावली (“इनस्वींगर”, “फ़ाउल”, “रेड कार्ड”, “पवेलियन”) और फ़िल्मी/बोलचाल की मुहावरेदार शब्दावली (“टेंसन नई लेने का”, “हैडमास्टर है”) का प्रयोग हुआ है। इसी तरह विद्यार्थी अपने वाक्य बना सकते हैं, जैसे: “उसकी बैटरी ‘लो’ हो चुकी है, अब वह किसी काम का ‘रिस्पॉन्स’ नहीं देता” (तकनीकी शब्दावली), या “पहले ओवर में ही उसने ‘सिक्सर’ मार दिया, विरोधी टीम अब ‘बैकफ़ुट’ पर है” (खेल शब्दावली)। इस तरह के प्रयोग भाषा को समृद्ध बनाते हैं, क्योंकि ये रोज़मर्रा के जीवन से जुड़ी शब्दावली को नए, रोचक अंदाज़ में साहित्यिक भाषा में पिरो देते हैं।