कक्षा 12 हिंदी अध्याय 11 बाज़ार दर्शन शॉर्ट नोट्स

परीक्षा से ठीक पहले के दोहराव के लिए इस अध्याय का निचोड़: लेखक परिचय, निबंध का सार, प्रमुख पंक्तियाँ और परिभाषाएँ एक जगह। विस्तार से पढ़ने के लिए पूरे नोट्स अलग से उपलब्ध हैं।

1 लेखक परिचय एक नज़र में

बिंदु विवरण
जन्म सन् 1905, अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)
निधन सन् 1988 (24 दिसंबर)
प्रमुख उपन्यास त्यागपत्र (1937), परख, सुनीता, कल्याणी
प्रमुख कहानी तत्सत, खेल, पाज़ेब
प्रमुख पुरस्कार साहित्य अकादेमी पुरस्कार, भारत-भारती सम्मान, पद्मभूषण
अन्य पहचान हिंदी में प्रेमचंद के बाद महत्त्वपूर्ण कथाकार माने जाते हैं; गांधीवादी चिंतन-दृष्टि से प्रभावित

2 निबंध का सार, चरण-दर-चरण

तर्क-श्रृंखला, एक नज़र में
  • पहला मित्र (पत्नी वाला प्रसंग): ज़्यादा ख़रीद का असली कारण पत्नी नहीं, पैसे की गरमी (मनीबैग)
  • वही मित्र (“सब उड़ गया”): लेखक का निष्कर्ष, इस किस्से में सामान ज़रूरत से नहीं, पर्चेज़िंग पावर के अनुपात में आया
  • वही मित्र (“बाज़ार है कि शैतान का जाल है?”): आग्रह तिरस्कार जगाता है; ऊँचे बाज़ार का आमंत्रण मूक होता है और चाह जगाता है; चाह मतलब अभाव
  • दूसरा मित्र (खाली हाथ): स्पष्ट ज़रूरत न होने पर बाज़ार से पूरी तरह खाली हाथ लौटना पड़ सकता है
  • केंद्रीय रूपक: बाज़ार का जादू आँख की राह काम करता है, चुंबक जैसे इसकी भी मर्यादा है
  • जेब भरी + मन खाली = जादू का असर खूब होता है
  • उपाय: बाज़ार जाओ तो मन खाली न हो (लू में पानी पीकर जाने वाली उपमा)
  • स्पष्टीकरण: मन खाली न होना ≠ मन बंद रखना; मन बंद करना हठ-योग है, मुक्ति नहीं
  • भगत जी: छह आने की दैनिक सीमा (कभी इससे ज़्यादा नहीं कमाए), बाकी चूरन मुफ़्त, बाज़ार का जादू बेअसर
  • निष्कर्ष: पर्चेज़िंग पावर के गर्व में ख़रीद → बाज़ारूपन → सद्भाव की घटी → शोषण → “वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है”
Learn by heartपरिभाषा 1

पर्चेज़िंग पावर: ख़रीदने की शक्ति। पैसे का असली रस इसके प्रयोग में है, केवल होने में नहीं।

Learn by heartपरिभाषा 2

बाज़ार का जादू: “वह जादू आँख की राह काम करता है। वह रूप का जादू है”: चुंबक की तरह इसकी भी मर्यादा है।

Learn by heartपरिभाषा 3

बाज़ारूपन: निबंध का शब्द (“बाज़ारूपन बढ़ाते हैं। जिसका मतलब है कि कपट बढ़ाते हैं”): कपटपूर्ण, शोषक बाज़ार-व्यवहार, जो पर्चेज़िंग पावर के गर्व में बिना ज़रूरत जाने ख़रीदने से बढ़ता है।

3 जेब और मन: एक नज़र में

जेब मन परिणाम
भरी खाली जादू का असर खूब होता है
खाली भरा नहीं तो भी जादू चल जाएगा
अचानक भर जाए खाली “फिर वह मन किसकी मानने वाला है!”

4 भगत जी: एक नज़र में

भगत जी

  • किसी दिन छह आने से ज़्यादा नहीं कमाए
  • बाकी चूरन बच्चों को मुफ़्त
  • माल बिछा होने पर भी मन अडिग
  • बाज़ार-चौक में खुली आँख, प्रसन्न मन से चलते हैं

लेखक स्वयं (मोटर प्रसंग)

  • धूल उड़ाती मोटर देखकर मन विचलित
  • ज़रा में अपने सगों के प्रति कृतघ्न हो सकते हैं
  • पैसे/वैभव की व्यंग्य-शक्ति का शिकार

“वह अर्थशास्त्र सरासर औंधा है, वह मायावी शास्त्र है, वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है।”

निबंध की अंतिम पंक्ति

शब्द-छवि: एक नज़र में
पर्चेज़िंग पावरखरीदने की शक्ति
असबाबसामान
दरकारज़रूरत
परिमितसीमित
अतुलितजिसकी तुलना न की जा सके
पेशगीअग्रिम राशि
नाचीज़महत्त्वहीन
अपदार्थजिसका अस्तित्व न हो
दारुणभयंकर
अकिंचित्करअर्थहीन
स्पृहाइच्छा
पसोपेशअसमंजस
परीक्षा से पहले यही पढ़ें
  • जैनेन्द्र कुमार (1905-1988): त्यागपत्र (1937), पद्मभूषण सम्मानित
  • पहले मित्र के प्रसंग में लेखक का निष्कर्ष: सामान ज़रूरत से नहीं, पर्चेज़िंग पावर के अनुपात में आया
  • ऊँचे बाज़ार का आमंत्रण मूक होता है और चाह जगाता है: चाह मतलब अभाव
  • जेब भरी + मन खाली = जादू का असर खूब होता है
  • मन खाली न होना ≠ मन बंद रखना: मन बंद करना हठ-योग है, मुक्ति नहीं
  • भगत जी पर बाज़ार का जादू नहीं चलता: छह आने की सीमा, बाकी मुफ़्त
  • निर्बल ही धन की ओर झुकता है: तृष्णा में असली बल का बीज नहीं
  • अंतिम पंक्ति: “वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है”