कक्षा 12 हिंदी अध्याय 11 बाज़ार दर्शन महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. जैनेन्द्र कुमार का जन्म कब और कहाँ हुआ?

उत्तर: जैनेन्द्र कुमार का जन्म सन् 1905 में अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. जैनेन्द्र कुमार को कौन-कौन से प्रमुख पुरस्कार मिले?

उत्तर: उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार, भारत-भारती सम्मान मिला और भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. ‘पर्चेज़िंग पावर’ से क्या तात्पर्य है?

उत्तर: ‘पर्चेज़िंग पावर’ से तात्पर्य है ख़रीदने की शक्ति।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. भगत जी प्रतिदिन अधिकतम कितना कमाते थे?

उत्तर: भगत जी प्रतिदिन अधिकतम छह आने कमाते थे, इससे ज़्यादा कभी नहीं।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. ‘बाज़ार दर्शन’ निबंध की अंतिम पंक्ति में ऐसे बाज़ार का पोषण करने वाले अर्थशास्त्र को क्या कहा गया है?

उत्तर: “वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है।”

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. निबंध के अनुसार ‘चाह’ का क्या मतलब है?

उत्तर: निबंध के अनुसार ‘चाह मतलब अभाव’ है, यानी जो चाहा जा रहा है वही न होने का एहसास।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. भगत जी बाज़ार-चौक में किस दुकान पर रुकते थे?

उत्तर: भगत जी केवल एक छोटी पंसारी की दुकान पर रुकते थे, जहाँ जीरा और काला नमक जैसी ज़रूरत की चीज़ें मिलती थीं।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. जैनेन्द्र कुमार का कौन-सा प्रसिद्ध उपन्यास 1937 में प्रकाशित हुआ?

उत्तर: उनका उपन्यास ‘त्यागपत्र’ 1937 में प्रकाशित हुआ।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. निबंध के अनुसार आग्रह और ऊँचे बाज़ार के मूक आमंत्रण का असर अलग-अलग कैसे होता है?

उत्तर: निबंध के अनुसार “आग्रह तिरस्कार जगाता है” (तिरस्कार = नापसंदगी), “लेकिन ऊँचे बाज़ार का आमंत्रण मूक होता है और उससे चाह जगती है।” चाह मतलब अभाव: चौक बाज़ार में खड़े होकर आदमी को लगता है कि उसके पास काफ़ी नहीं है, और चाहिए।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. ‘जेब भरी और मन खाली’ की हालत में निबंध के अनुसार बाज़ार का जादू कैसा असर करता है?

उत्तर: इस हालत में जादू का असर खूब होता है: “फिर वह मन किसकी मानने वाला है!” मालूम होता है यह भी लूँ, वह भी लूँ; सभी सामान ज़रूरी और आराम बढ़ाने वाला लगता है।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. निबंध के अनुसार ‘बाज़ार की असली कृतार्थता’ क्या है?

उत्तर: बाज़ार की असली कृतार्थता (सार्थकता) है आवश्यकता के समय काम आना। निबंध कहता है कि मन लक्ष्य से भरा हो तो “बाज़ार तुमसे कृतार्थ होगा, क्योंकि तुम कुछ-न-कुछ सच्चा लाभ उसे दोगे।”

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. ‘इच्छानिरोधस्तपः’ का निबंध में क्या नकारात्मक अर्थ बताया गया है, और लेखक उसे झूठ क्यों कहते हैं?

उत्तर: इसका नकारात्मक अर्थ है सभी इच्छाओं को पूरी तरह दबा देना ही तप है। लेखक इसे झूठ कहते हैं क्योंकि ऐसा तप केवल रेगिस्तान (सूखेपन) की राह दिखाता है, मोक्ष की राह नहीं, और मन को बंद करने की कोशिश “हठ-ही-हठ है, योग नहीं है”।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. भगत जी अपने चूरन के व्यापार में क्या असामान्य नियम अपनाते हैं?

उत्तर: वे कभी एक दिन में छह आने से ज़्यादा नहीं कमाते, न थोक बेचते हैं, न पेशगी ऑर्डर लेते हैं, और छह आने पूरे होते ही बाकी चूरन बच्चों को मुफ़्त बाँट देते हैं।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. लेखक अपने मोटर वाले प्रसंग से क्या दिखाना चाहते हैं?

उत्तर: लेखक दिखाना चाहते हैं कि पैसे/वैभव की व्यंग्य-शक्ति साधारण मन पर कितना गहरा असर करती है, यहाँ तक कि वह व्यंग्य ज़रा में उन्हें ‘अपने सगों के प्रति कृतघ्न’ कर सकता है, यह भगत जी के अडिग मन से एक तीखा कंट्रास्ट है।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. ‘निर्बल ही धन की ओर झुकता है’ इस पंक्ति का क्या अर्थ है?

उत्तर: इसका अर्थ है कि संचय (जमा करने) की तृष्णा और वैभव की चाह असल में व्यक्ति की कमज़ोरी को दिखाती है, असली बल वहाँ नहीं होता जहाँ तृष्णा हो, बल्कि तृष्णा स्वयं मनुष्य की निर्बलता का प्रमाण है।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. बाज़ार का जादू चुंबक की तरह कैसे काम करता है?

उत्तर: जैसे चुंबक का जादू लोहे पर ही चलता है, वैसे ही बाज़ार के जादू की भी एक मर्यादा (सीमा) है। यह उस व्यक्ति पर असर करता है जिसका मन खाली है, और भगत जी जैसे अडिग मन पर नहीं चलता।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. निबंध के आरंभ के प्रसंगों के आधार पर स्पष्ट करें कि पैसा और बाज़ार आदमी की ख़रीद को कैसे प्रभावित करते हैं।

उत्तर: निबंध दो मित्रों के प्रसंगों से शुरू होता है। पहले मित्र ज़्यादा सामान लाने का कारण पत्नी को बताते हैं, पर लेखक कहते हैं कि इसमें पत्नी की ओट ली जाती है; मूल में मनीबैग, यानी पैसे की गरमी है। फिर वही मित्र मनीबैग फैलाकर कहते हैं, ‘सब उड़ गया, अब जो रेल-टिकट के लिए भी बचा हो!’, और लेखक तय मानते हैं कि सामान ज़रूरत की तरफ़ देखकर नहीं, बल्कि पर्चेज़िंग पावर के अनुपात में आया। फिर वही मित्र कहते हैं, ‘बाज़ार है कि शैतान का जाल है?’ दूसरे, अलग मित्र यह तय न कर पाने से कि क्या चाहिए, खाली हाथ लौटते हैं। लेखक के अनुसार बिना ठीक पता हो कि क्या चाहिए, बाज़ार जाने का परिणाम ‘त्रास ही होगा, गति नहीं होगी, न कर्म’।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. ‘मन खाली न होना’ और ‘मन बंद रखना’ में क्या अंतर है? निबंध के आधार पर स्पष्ट करें।

उत्तर: ‘मन खाली न होना’ का मतलब है मन में स्पष्ट लक्ष्य/ज़रूरत का होना, ताकि बाज़ार का जादू बेअसर रहे। ‘मन बंद रखना’ इससे बिलकुल अलग है, इसका मतलब है इच्छाओं को ज़बरदस्ती दबा देना या आँखें मूँद लेना, जो निबंध के अनुसार हठ-योग है, सच्ची मुक्ति नहीं। मन बंद हो जाए तो वह शून्य हो जाएगा, और शून्य होने का अधिकार केवल परमात्मा का है, मनुष्य सदा अपूर्ण है। इसलिए सही उपाय मन को दबाना नहीं, बल्कि उसे किसी सच्चे लक्ष्य से भरना है।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. भगत जी के चरित्र से निबंध क्या सिखाना चाहता है? उदाहरण सहित स्पष्ट करें।

उत्तर: भगत जी का चरित्र दिखाता है कि बाज़ार में रहते हुए भी उससे प्रभावित न होना संभव है, बशर्ते मन स्पष्ट और संतुष्ट हो। वे वर्षों से चूरन बेचते हैं पर किसी भी दिन छह आने से ज़्यादा नहीं कमाते, और छह आने पूरे होते ही बाकी चूरन बच्चों को मुफ़्त बाँट देते हैं। “पैसा उससे आगे होकर भीख तक माँगता है कि मुझे लो”, पर उनका मन अडिग रहता है। बाज़ार-चौक में भी वे खुली आँखों से, प्रसन्न मन से चलते हैं और केवल ज़रूरत की चीज़ जीरा-नमक लेकर लौट आते हैं। लेखक कहते हैं, “इन चूरनवाले भगत जी पर बाज़ार का जादू नहीं चल सकता।” और आगे निष्कर्ष निकालते हैं कि बाज़ार को सार्थकता वही देता है जो जानता है कि वह क्या चाहता है।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. ‘जेब’ और ‘मन’ की दोनों स्थितियों को निबंध के अनुसार समझाएँ।

उत्तर: पहली स्थिति: जेब भरी हो और मन खाली हो, तब “जादू का असर खूब होता है”: मन किसकी मानेगा, हर चीज़ ज़रूरी लगने लगती है, हालाँकि जादू उतरने पर पता चलता है कि फ़ैंसी चीज़ों की बहुतायत आराम में मदद नहीं देती, बल्कि खलल ही डालती है। दूसरी स्थिति: जेब खाली हो पर मन भरा न हो, “तो भी जादू चल जाएगा”, क्योंकि मन खाली है तो बाज़ार की अनेकानेक चीज़ों का निमंत्रण उस तक पहुँच जाता है।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. ‘बाज़ार दर्शन’ निबंध का अंतिम निष्कर्ष क्या है? ‘बाज़ारूपन’ से लेकर ‘अनीतिशास्त्र’ तक की तर्क-श्रृंखला स्पष्ट करें।

उत्तर: निबंध का निष्कर्ष है कि बाज़ार को सार्थकता वही व्यक्ति देता है जो जानता है कि वह क्या चाहता है। जो नहीं जानते, वे अपनी पर्चेज़िंग पावर के गर्व में बाज़ार को केवल एक शैतानी, व्यंग्य की शक्ति देते हैं, इससे बाज़ार का ‘बाज़ारूपन’ बढ़ता है, यानी कपट बढ़ता है। कपट बढ़ने से लोगों में आपसी सद्भाव घटता है, वे भाई-भाई, सुहृद, पड़ोसी नहीं रहकर केवल गाहक-बेचक रह जाते हैं। ऐसे बाज़ार में ज़रूरतों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि शोषण होता है। इसलिए जो अर्थशास्त्र केवल ऐसे शोषक बाज़ार का पोषण करता है, उसके लिए निबंध की अंतिम पंक्ति है: “वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है।”

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. भगत जी की बाज़ार-चौक में हुई मुलाक़ात के आधार पर स्पष्ट करें कि वे बाज़ार को कैसे देखते और उपयोग करते हैं।

उत्तर: भगत जी बाज़ार-चौक में खुली आँख, तुष्ट और मग्न होकर चलते हैं, उनकी आँखें किसी से कम खुली नहीं होतीं और वे हर किसी को हँसकर पहचानते हैं। बड़े-बड़े स्टोर उनके लिए बस पड़े रह जाते हैं, वे केवल एक छोटी पंसारी की दुकान पर रुककर ज़रूरत भर जीरा-नमक लेते हैं। ज़रूरत पूरी होते ही बाकी पूरा चौक उनके लिए ‘नहीं के बराबर’ हो जाता है, फिर भी वे बचे हुए वैभव का बुरा नहीं, बल्कि भला ही चाहते हैं। इस तरह भगत जी बाज़ार का उपयोग बिलकुल वैसे ही करते हैं जैसा निबंध सुझाता है, स्पष्ट ज़रूरत के साथ, बिना लालच के।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. ‘बाज़ार दर्शन’ निबंध के आधार पर बाज़ार के जादू से बचने के उपाय की पूरी व्याख्या कीजिए।

उत्तर: निबंध के अनुसार बाज़ार के जादू से बचने का सीधा उपाय है: ‘बाज़ार जाओ तो खाली मन न हो। मन खाली हो, तब बाज़ार न जाओ।’ इसे समझाने के लिए लेखक एक उपमा देते हैं: जैसे लू में जाना हो तो पानी पीकर जाना चाहिए, पानी भीतर हो तो लू का असर व्यर्थ हो जाता है, वैसे ही मन अगर किसी लक्ष्य या ज़रूरत से भरा हो, तो बाज़ार भी बस फैला-का-फैला रह जाएगा, वह घाव नहीं देगा, बल्कि आनंद ही देगा। लेकिन लेखक तुरंत यह भी स्पष्ट करते हैं कि ‘मन खाली न होना’ का मतलब मन को ज़बरदस्ती बंद कर लेना नहीं है, क्योंकि मन बंद करना शून्य होने की कोशिश है, और शून्य होने का अधिकार केवल परमात्मा का है, मनुष्य सदा अपूर्ण है। सच्चा उपाय वह है जो बलात् मन को रोकने को न कहे, मन को भी सुने; “हाँ, मनमानेपन की छूट मन को न हो, क्योंकि वह अखिल का अंग है, खुद कुल नहीं है।” भगत जी इसी उपाय का जीता-जागता उदाहरण हैं, वे बाज़ार से न भागते हैं, न उसमें डूब जाते हैं, बल्कि स्पष्ट ज़रूरत के साथ बाज़ार का उपयोग करते हैं।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. जैनेन्द्र कुमार के जीवन-परिचय और उनकी साहित्यिक उपलब्धियों का विस्तार से वर्णन कीजिए।

उत्तर: जैनेन्द्र कुमार का जन्म सन् 1905 में अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ और निधन 24 दिसंबर सन् 1988 को हुआ। किताब के अनुसार वे हिंदी में प्रेमचंद के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण कथाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिन्होंने अपने उपन्यासों और कहानियों के ज़रिए एक सशक्त मनोवैज्ञानिक कथा-धारा की शुरुआत की। उनके प्रमुख उपन्यास हैं परख, अनाम स्वामी, सुनीता, त्यागपत्र (1937, जिसने उन्हें मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार के रूप में प्रभूत प्रतिष्ठा दिलाई), कल्याणी, जयवर्द्धन और मुक्तिबोध। प्रमुख कहानी-संग्रहों में वातायन, एक रात, दो चिड़िया, फाँसी, नीलम देश की राजकन्या और पाज़ेब शामिल हैं, और तत्सत जैसी कहानी को भी कालजयी माना जाता है। इसके अलावा वे विचार-प्रधान निबंध भी लिखते थे: प्रस्तुत प्रश्न, जड़ की बात, पूर्वोदय, साहित्य का श्रेय और प्रेय, सोच-विचार, समय और हम इनमें प्रमुख हैं। उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार, भारत-भारती सम्मान मिला और भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। किताब यह भी बताती है कि वे गांधीवादी चिंतन-दृष्टि से गहराई से प्रभावित थे, जो उनके निबंधों की सरल पर गंभीर शैली में स्पष्ट झलकती है।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. निबंध में भगत जी के दो प्रसंगों (चूरन बेचने की आदत, और बाज़ार-चौक की मुलाक़ात) के आधार पर उनके चरित्र का पूर्ण विश्लेषण कीजिए।

उत्तर: पहले प्रसंग में भगत जी वर्षों से चूरन बेचते हैं, पर कभी एक दिन में छह आने से ज़्यादा नहीं कमाते। न थोक बेचते हैं, न पेशगी ऑर्डर लेते हैं, और सीमा पूरी होते ही बाकी चूरन बच्चों को मुफ़्त बाँट देते हैं। लेखक निष्कर्ष निकालते हैं कि ‘बाज़ार का जादू उन पर नहीं चल सकता’, क्योंकि माल बिछे रहने पर भी, और पैसा उनसे आगे होकर ‘भीख तक माँगता है कि मुझे लो’ तब भी, उनका मन अडिग रहता है, वे निर्मम होकर पैसे को उसके ‘आहत गर्व’ में छोड़ देते हैं। दूसरे प्रसंग में, बाज़ार-चौक की मुलाक़ात में, भगत जी की आँखें बंद नहीं हैं, वे बाज़ार को कोसते भी नहीं, बल्कि हर किसी को हँसकर पहचानते और अभिवादन करते हैं। भरे-पूरे चौक के प्रति उनके मन में कोई अप्रीति नहीं, बल्कि प्रसन्नता है, क्योंकि उनके भीतर कोई रिक्तता नहीं है। बड़े स्टोर बस पड़े रह जाते हैं, वे केवल एक छोटी पंसारी की दुकान से ज़रूरत भर जीरा-नमक लेते हैं और शेष वैभव का भला ही चाहते हैं। दोनों प्रसंग मिलकर भगत जी को निबंध का आदर्श चरित्र बनाते हैं, एक ऐसा व्यक्ति जो न बाज़ार से भागता है, न उसमें डूबता है, बल्कि स्पष्ट मन और सीमित ज़रूरत के साथ उसका उपयोग करता है।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. ‘बाज़ार दर्शन’ निबंध की पूरी तर्क-श्रृंखला को आरंभ (किस्सों) से अंत (निष्कर्ष) तक चरण-दर-चरण समझाइए।

उत्तर: निबंध दो मित्रों के प्रसंगों से शुरू होता है: पहले मित्र की बात से लेखक दिखाते हैं कि ज़्यादा ख़रीद में पत्नी की ओट ली जाती है, मूल में पैसे की गरमी है; उसी मित्र के ‘सब उड़ गया’ कहने पर लेखक तय मानते हैं कि सामान ज़रूरत से नहीं, पर्चेज़िंग पावर के अनुपात में आया; फिर लेखक का चिंतन बताता है कि आग्रह तिरस्कार जगाता है, जबकि ऊँचे बाज़ार का मूक आमंत्रण ‘चाह’ यानी ‘अभाव’ जगाता है; दूसरे मित्र का प्रसंग दिखाता है कि स्पष्ट ज़रूरत के बिना बाज़ार जाना पूर्ण असमंजस में समाप्त हो सकता है। इसके बाद लेखक केंद्रीय रूपक रखते हैं: बाज़ार में एक जादू है जो आँख की राह काम करता है, चुंबक की तरह इसकी भी मर्यादा है, और जेब भरी व मन खाली हो तो जादू का असर खूब होता है। इसका उपाय है मन को खाली न रखना, लेकिन लेखक तुरंत स्पष्ट करते हैं कि इसका मतलब मन बंद करना नहीं है, क्योंकि शून्य होने का अधिकार केवल परमात्मा का है। इस पूरे सिद्धांत को जीवंत बनाने के लिए भगत जी का उदाहरण आता है, जिन पर बाज़ार का जादू नहीं चलता। अंत में निबंध निष्कर्ष निकालता है कि बाज़ार को सार्थकता वही देता है जो जानता है कि उसे क्या चाहिए; बाक़ी लोग बाज़ारूपन (कपट) बढ़ाते हैं, जिससे सद्भाव घटता है और शोषण बढ़ता है, इसलिए ऐसे बाज़ार का पोषण करने वाले अर्थशास्त्र के बारे में अंतिम पंक्ति है: “वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है।”

5 केस स्टडी

केस स्टडी
बाज़ार में एक जादू है। वह जादू आँख की राह काम करता है। वह रूप का जादू है पर जैसे चुंबक का जादू लोहे पर ही चलता है, वैसे ही इस जादू की भी मर्यादा है। जेब भरी हो, और मन खाली हो, ऐसी हालत में जादू का असर खूब होता है। जेब खाली पर मन भरा न हो, तो भी जादू चल जाएगा।

(क) 1 अंक गद्यांश के अनुसार बाज़ार का जादू किस राह काम करता है?
उत्तर: गद्यांश के अनुसार बाज़ार का जादू आँख की राह काम करता है, यह रूप का जादू है।

(ख) 1 अंक गद्यांश में जादू की किस चीज़ से तुलना की गई है?
उत्तर: गद्यांश में बाज़ार के जादू की तुलना चुंबक से की गई है, जो केवल लोहे पर ही चलता है।

(ग) 2 अंक गद्यांश के आधार पर स्पष्ट करें कि जेब और मन की स्थिति जादू के असर को कैसे तय करती है।
उत्तर: गद्यांश के अनुसार जेब भरी हो और मन खाली हो, “ऐसी हालत में जादू का असर खूब होता है”। जेब खाली होने पर भी अगर मन भरा न हो, “तो भी जादू चल जाएगा”। यानी जादू के चलने में मन की स्थिति निर्णायक है।

केस स्टडी
भाँति-भाँति के बढ़िया माल से चौक भरा पड़ा है। उस सबके प्रति अप्रीति इस भगत के मन में नहीं है। जैसे उस समूचे माल के प्रति भी उनके मन में आशीर्वाद हो सकता है। विद्रोह नहीं, प्रसन्नता ही भीतर है, क्योंकि कोई रिक्त भीतर नहीं है। देखता हूँ कि खुली आँख, तुष्ट और मग्न, वह चौक-बाज़ार में से चलते चले जाते हैं। राह में बड़े-बड़े फैंसी स्टोर पड़ते हैं, पर पड़े रह जाते हैं। कहीं भगत नहीं रुकते। रुकते हैं तो एक छोटी पंसारी की दुकान पर रुकते हैं।

(क) 1 अंक गद्यांश के अनुसार भरे-पूरे चौक के प्रति भगत जी के मन में क्या भाव है?
उत्तर: गद्यांश के अनुसार भगत जी के मन में विद्रोह नहीं, बल्कि प्रसन्नता है, क्योंकि उनके भीतर कोई रिक्तता नहीं है।

(ख) 1 अंक गद्यांश के अनुसार राह में पड़ने वाले बड़े-बड़े फैंसी स्टोर भगत जी के सामने कैसे रह जाते हैं?
उत्तर: “पड़े रह जाते हैं”, यानी भगत जी उनमें नहीं रुकते।

(ग) 2 अंक गद्यांश के आधार पर स्पष्ट करें कि भगत जी बाज़ार में किस तरह चलते और व्यवहार करते हैं।
उत्तर: गद्यांश के अनुसार भगत जी खुली आँख, तुष्ट और मग्न होकर चौक-बाज़ार में से चलते चले जाते हैं। वे बड़े फैंसी स्टोरों को छोड़कर केवल एक छोटी पंसारी की दुकान पर रुकते हैं, जहाँ उन्हें अपनी ज़रूरत की चीज़ें मिलती हैं।