कक्षा 12 हिंदी अध्याय 11 बाज़ार दर्शन NCERT समाधान

NCERT की पाठ्यपुस्तक आरोह भाग 2 के अध्याय 11 «बाज़ार दर्शन» के अभ्यास (पाठ के साथ, पाठ के आसपास, आपसदारी, विज्ञापन की दुनिया, भाषा की बात, चर्चा करें) के सभी प्रश्नों के पूरे हल। पहले ख़ुद उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 पाठ के साथ

प्रश्न 1

प्र. बाज़ार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या असर पड़ता है?

उत्तर: बाज़ार का जादू चढ़ने पर मनुष्य को लगता है कि उसे हर चीज़ चाहिए, सभी सामान ज़रूरी और आराम बढ़ाने वाला मालूम होता है, भले ही उसकी वास्तविक ज़रूरत न हो। इससे उसमें असंतोष, तृष्णा और ईर्ष्या जाग सकती है, और यदि वह अपने-आप को न पहचानता हो तो यह जादू उसे कामना से विकल, यहाँ तक कि पागल भी बना सकता है। जब यह जादू उतरता है, तब उसे पता चलता है कि इतनी सारी चीज़ों की बहुतायत आराम में मदद नहीं करती, बल्कि खलल ही डालती है। कुछ देर के लिए स्वाभिमान को सेंक ज़रूर मिल जाता है, पर असल में यह अभिमान की गिल्टी को खुराक देना है। जकड़ चाहे रेशमी डोरी की ही क्यों न हो, वह जकड़ ही रहती है, कम नहीं होती।

प्रश्न 2

प्र. बाज़ार में भगत जी के व्यक्तित्व का कौन-सा सशक्त पहलू उभरकर आता है? क्या आपकी नज़र में उनका आचरण समाज में शांति-स्थापित करने में मददगार हो सकता है?

उत्तर: भगत जी के व्यक्तित्व का सबसे सशक्त पहलू है उनका संतोष और अडिग मन। वे बाज़ार में रहते हुए भी उससे प्रभावित नहीं होते, किसी भी दिन छह आने से ज़्यादा नहीं कमाते और बाकी चूरन बच्चों को मुफ़्त बाँट देते हैं। पैसा और वैभव उनके मन पर कोई असर नहीं डाल पाते, और वे बाज़ार-चौक में भी खुली आँख, प्रसन्न और संतुष्ट होकर चलते हैं। हाँ, उनका यह आचरण समाज में शांति स्थापित करने में निश्चय ही मददगार हो सकता है, क्योंकि जब लोग ज़रूरत से ज़्यादा पाने की होड़ छोड़ देते हैं, तो आपसी ईर्ष्या, ठगी और शोषण की गुंजाइश ही कम हो जाती है, ठीक वैसे ही जैसे निबंध के अंत में कहा गया है कि जो पर्चेज़िंग पावर के गर्व में ख़रीदते हैं, वे बाज़ार का बाज़ारूपन, यानी कपट, बढ़ाते हैं।

प्रश्न 3

प्र. ‘बाज़ारूपन’ से क्या तात्पर्य है? किस प्रकार के व्यक्ति बाज़ार को सार्थकता प्रदान करते हैं अथवा बाज़ार की सार्थकता किसमें है?

उत्तर: ‘बाज़ारूपन’ से तात्पर्य है बाज़ार का वह कपटपूर्ण, शोषक रूप, जो तब पैदा होता है जब लोग बिना ज़रूरत जाने केवल अपनी पर्चेज़िंग पावर के गर्व में ख़रीदारी करते हैं। ऐसे व्यक्ति बाज़ार को केवल एक शैतानी, व्यंग्य की शक्ति देते हैं, न वे बाज़ार से सच्चा लाभ उठा पाते हैं, न बाज़ार को सच्चा लाभ दे पाते हैं। निबंध के अनुसार बाज़ार को सार्थकता वही व्यक्ति देता है जो जानता है कि उसे क्या चाहिए, यानी जो स्पष्ट ज़रूरत के साथ बाज़ार में जाता है, ठीक भगत जी की तरह। बाज़ार की असली सार्थकता (कृतार्थता) है आवश्यकता के समय काम आना, यानी ज़रूरतों का ईमानदार आदान-प्रदान, न कि केवल गर्व और दिखावे की ख़रीद।

प्रश्न 4

प्र. बाज़ार किसी का लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र नहीं देखता; वह देखता है सिर्फ़ उसकी क्रय शक्ति को। इस रूप में वह एक प्रकार से सामाजिक समता की भी रचना कर रहा है। आप इससे कहाँ तक सहमत हैं?

उत्तर: यह बात एक सीमा तक सही है, बाज़ार वास्तव में लेन-देन के समय ग्राहक का लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र देखे बिना उसे केवल एक क्रेता (ख़रीदार) के रूप में देखता है, इस दृष्टि से वह भेदभाव-रहित दिखता है। परंतु यह समता सतही है, क्योंकि बाज़ार में असली अंतर पैसे की ताक़त, यानी पर्चेज़िंग पावर से पैदा होता है, जिसके पास पैसा ज़्यादा है वही बाज़ार में ज़्यादा सम्मान और सुविधा पाता है, बाकी वंचित रह जाते हैं। इसलिए बाज़ार पारंपरिक भेदभावों को भले ही न देखे, वह धन-आधारित एक नयी असमानता ज़रूर पैदा कर देता है, इसलिए इसे पूरी तरह सामाजिक समता की रचना कहना उचित नहीं होगा।

प्रश्न 5

प्र. आप अपने तथा समाज से कुछ ऐसे प्रसंग का उल्लेख करें: (क) जब पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत हुआ। (ख) जब पैसे की शक्ति काम नहीं आई।

उत्तर: यह एक विचारणीय, अनुभव-आधारित प्रश्न है, विद्यार्थी अपने स्वयं के जीवन से उदाहरण लिखें। (क) जैसे निबंध में लेखक धूल उड़ाती मोटर देखकर अपने-आप को वंचित महसूस करते हैं, उसी तरह किसी महँगे स्कूल, गैजेट या आयोजन के सामने साधारण साधनों वाला व्यक्ति भी अक्सर पैसे को शक्ति के रूप में महसूस करता है। (ख) इसके विपरीत, गंभीर बीमारी, किसी अपने की मृत्यु के समय, या सच्चे स्नेह और भरोसे की ज़रूरत के क्षणों में पैसा अक्सर बेकार साबित होता है, वहाँ केवल अपनों का साथ और सच्ची देखभाल ही काम आती है, ठीक वैसे ही जैसे भगत जी के पास पैसे से ज़्यादा मूल्यवान चीज़ है, जिसे पैसा ख़रीद नहीं सकता।

2 पाठ के आसपास

प्रश्न 1

प्र. बाज़ार दर्शन पाठ में बाज़ार जाने या न जाने के संदर्भ में मन की कई स्थितियों का ज़िक्र आया है। आप इन स्थितियों से जुड़े अपने अनुभवों का वर्णन कीजिए: (क) मन खाली हो (ख) मन खाली न हो (ग) मन बंद हो (घ) मन में नकार हो।

उत्तर: (क) मन खाली हो: जब बिना किसी स्पष्ट ज़रूरत के केवल घूमने या समय बिताने बाज़ार जाया जाता है, तब अक्सर देखी हर आकर्षक चीज़ ज़रूरी लगने लगती है और अनावश्यक ख़रीद हो जाती है। (ख) मन खाली न हो: जब किसी निश्चित चीज़ (जैसे कोई किताब या ज़रूरी सामान) की सूची लेकर बाज़ार जाया जाता है, तब बाकी सारी चमक-दमक बेअसर रह जाती है और केवल ज़रूरत की चीज़ ख़रीदकर लौटा जाता है। (ग) मन बंद हो: जब कोई ज़बरदस्ती अपनी सारी इच्छाओं को दबाकर, आँखें मूँदकर बाज़ार जाने से ही बचता रहे, यह भी सुखी नहीं रखता, क्योंकि निबंध के अनुसार ऐसा मन कृश और अशक्त हो जाता है। (घ) मन में नकार हो: जब मन में हर चीज़ के प्रति एक नकारात्मक, विद्रोही भाव रहे (“यह भी बेकार, वह भी बेकार”), तब भी असली संतोष नहीं मिलता, क्योंकि यह भी निबंध के अनुसार लोभ की ही एक और शक्ल है, लोभ पर सच्ची जीत नहीं।

प्रश्न 2

प्र. बाज़ार दर्शन पाठ में किस प्रकार के ग्राहकों की बात हुई है? आप स्वयं को किस श्रेणी का ग्राहक मानते/मानती हैं?

उत्तर: पाठ में चार तरह के ग्राहकों की बात हुई है: पहला वह संयमी ग्राहक जो फ़िजूल सामान को फ़िजूल समझता है, पैसा बहाता नहीं और बुद्धि-संयम से उसे जोड़ता जाता है; दूसरा वह जो बिना सोचे-समझे, केवल बाज़ार के जादू में फँसकर अनावश्यक सामान ख़रीद लेता है (जैसे लेखक के पहले मित्र); तीसरा वह जो पूरी तरह असमंजस में पड़कर कुछ भी तय नहीं कर पाता और खाली हाथ लौट आता है (दूसरे मित्र); और चौथा वह जो स्पष्ट ज़रूरत जानकर, बिना बाज़ार के जादू में फँसे, ठीक-ठीक अपनी ज़रूरत की चीज़ ख़रीदकर संतुष्ट होकर लौटता है, जैसे भगत जी। यह एक व्यक्तिगत मूल्यांकन का प्रश्न है, विद्यार्थी ईमानदारी से अपनी श्रेणी बताएँ, आदर्श उत्तर चौथी श्रेणी (भगत जी जैसा ग्राहक) बनने की दिशा में सोचना है।

प्रश्न 3

प्र. आप बाज़ार की भिन्न-भिन्न प्रकार की संस्कृति से अवश्य परिचित होंगे। मॉल की संस्कृति और सामान्य बाज़ार और हाट की संस्कृति में आप क्या अंतर पाते हैं? पर्चेज़िंग पावर आपको किस तरह के बाज़ार में नज़र आती है?

उत्तर: मॉल की संस्कृति में सजी-धजी, वातानुकूलित दुकानें, ब्रांडेड सामान और चमक-दमक भरा वातावरण होता है, जहाँ ग्राहक की भावनाओं को लुभाकर उसकी पर्चेज़िंग पावर का पूरा उपयोग करने की कोशिश की जाती है। इसके विपरीत सामान्य बाज़ार और हाट में सीधा, अनौपचारिक लेन-देन होता है, जहाँ मोलभाव की गुंजाइश रहती है और ग्राहक अपनी वास्तविक ज़रूरत के हिसाब से ख़रीदारी करता है। पर्चेज़िंग पावर का दिखावा मॉल जैसी जगहों में कहीं ज़्यादा साफ़ नज़र आता है, क्योंकि वहाँ चीज़ों की क़ीमत और प्रस्तुति दोनों ही ग्राहक को “यह भी लूँ, वह भी लूँ” वाली मनोदशा में डालने के लिए बनाई जाती हैं, ठीक निबंध में बताए गए बाज़ार के जादू की तरह।

प्रश्न 4

प्र. लेखक ने पाठ में संकेत किया है कि कभी-कभी बाज़ार में आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर: हाँ, यह विचार सही है। निबंध के अनुसार जब बाज़ार में ज़रूरतों का ईमानदार आदान-प्रदान न होकर कपट बढ़ जाता है, तब आवश्यकता ही शोषण का ज़रिया बन जाती है, जैसे एक की हानि में दूसरे का लाभ दीखने लगता है और निष्कपट व्यक्ति कपट का शिकार होता है। उदाहरण के लिए, जब किसी की सचमुच ज़रूरी दवा या आवश्यक वस्तु की माँग का फ़ायदा उठाकर विक्रेता उसकी अधिक क़ीमत वसूलता है, तब वह ज़रूरत ही शोषण का माध्यम बन जाती है। निबंध के शब्दों में, जब बाज़ार में आवश्यकताओं का आदान-प्रदान न होकर शोषण होने लगता है, “तब कपट सफल होता है, निष्कपट शिकार होता है।”

प्रश्न 5

प्र. स्त्री माया न जोड़े यहाँ माया शब्द किस ओर संकेत कर रहा है? स्त्रियों द्वारा माया जोड़ना प्रकृति प्रदत्त नहीं, बल्कि परिस्थितिवश है। वे कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जो स्त्री को माया जोड़ने के लिए विवश कर देती हैं?

उत्तर: यहाँ ‘माया’ शब्द धन-संपत्ति, गहने और भौतिक साधनों के संचय (जमा करने) की ओर संकेत करता है। पाठ के प्रारंभ में लेखक इसे “स्त्रीत्व का प्रश्न” कहते हैं, पर तुरंत कहते हैं कि “इस बात में पत्नी की ओट ली जाती है”, और मूल में “मनीबैग, अर्थात पैसे की गरमी” को असली तत्त्व मानते हैं। स्त्रियाँ माया क्यों जोड़ती हैं, इसका कोई कारण पाठ नहीं देता; नीचे का उत्तर विद्यार्थी का अपना तर्क है: यह किसी स्त्री के स्वभाव का सहज गुण नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों का परिणाम माना जा सकता है। जिन परिस्थितियों में स्त्री को आर्थिक रूप से पुरुष पर निर्भर रहना पड़ता है, संपत्ति व निर्णयों में उसका बराबर का हक़ नहीं होता, और भविष्य की असुरक्षा (जैसे विधवा होने या घरेलू संकट) का भय बना रहता है, उन परिस्थितियों में स्त्री कुछ धन या गहने अपने पास संचित रखने के लिए विवश हो जाती है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर वह स्वयं की या परिवार की सहायता कर सके। यह उसकी सुरक्षा की ज़रूरत से उपजा व्यवहार है, कोई सहज या जन्मजात गुण नहीं।

3 आपसदारी

प्रश्न 1

प्र. ज़रूरत-भर जीरा वहाँ से ले लिया कि फिर सारा चौक उनके लिए आसानी से नहीं के बराबर हो जाता है, भगत जी की इस संतुष्ट निस्पृहता की कबीर की इस सूक्ति से तुलना कीजिए: “चाह गई चिंता गई मनुआँ बेपरवाह, जाके कछु न चाहिए सोइ सहंसाह।”

उत्तर: कबीर की यह सूक्ति और भगत जी का चरित्र दोनों एक ही सत्य को अलग-अलग ढंग से कहते हैं, जिसकी कोई चाह (इच्छा) नहीं है, वही असली सम्राट (सहंसाह) है। भगत जी को जब ज़रूरत भर जीरा-नमक मिल जाता है, तो बाकी पूरा चौक उनके लिए “नहीं के बराबर” हो जाता है, यानी उन्हें उससे आगे कुछ भी चाहिए नहीं होता। जैसे कबीर कहते हैं कि जब चाह चली जाती है, तब चिंता भी चली जाती है और मन बेपरवाह (निश्चिंत) हो जाता है, ठीक वैसे ही भगत जी बाज़ार के अपार वैभव के बीच भी पूर्णतः निश्चिंत और संतुष्ट बने रहते हैं। दोनों ही यह सिखाते हैं कि सच्चा सुख वस्तुओं के संचय में नहीं, बल्कि इच्छाओं की सीमा जानने में है।

प्रश्न 2

प्र. विजयदान देथा की कहानी ‘दुविधा’ (जिस पर ‘पहेली’ फ़िल्म बनी है) के अंश को पढ़ कर आप देखेंगे/देखेंगी कि भगत जी की संतुष्ट जीवन-दृष्टि की तरह ही गड़रिए की जीवन-दृष्टि है, इससे आपके भीतर क्या भाव जगते हैं?

उत्तर: गड़रिया क़ीमती अँगूठी लेने से इनकार कर देता है, क्योंकि उसे उस अँगूठी की न ज़रूरत है, न उसके पास पहनने का कोई अवसर, “मैंने तो अटका काम निकाल दिया”, यह कहकर वह अपनी मदद को किसी बदले की उम्मीद से मुक्त रखता है। यह भाव ठीक भगत जी जैसा ही है, दोनों ही व्यक्ति अपनी सीमित ज़रूरतों से संतुष्ट हैं और उनसे परे के वैभव को कोई आकर्षण नहीं समझते। इस अंश को पढ़कर मन में यह भाव जगता है कि सच्चा संतोष बाहरी वैभव या धन-संपत्ति में नहीं, बल्कि अपनी ज़रूरतों को पहचानने और उनसे आगे लालच न करने में है, यही दोनों पाठों की साझा सीख है।

प्रश्न 3

प्र. बाज़ार पर आधारित लेख नकली सामान पर नकेल ज़रूरी का अंश पढ़िए और नीचे दिए गए बिंदुओं पर कक्षा में चर्चा कीजिए। (क) नकली सामान के खिलाफ़ जागरूकता के लिए आप क्या कर सकते हैं? (ख) उपभोक्ताओं के हित को मद्देनज़र रखते हुए सामान बनाने वाली कंपनियों का क्या नैतिक दायित्व है? (ग) ब्रांडेड वस्तु को खरीदने के पीछे छिपी मानसिकता को उजागर कीजिए?

उत्तर: (क) विद्यार्थी स्कूल-कॉलेज में जागरूकता अभियान चला सकते हैं, सामान ख़रीदते समय निर्माण तिथि और अवधि-समाप्ति तिथि ज़रूर जाँचें, और आस-पड़ोस के लोगों को नकली सामान पहचानने के तरीक़े बता सकते हैं। (ख) कंपनियों का नैतिक दायित्व है कि वे हर उत्पाद पर स्पष्ट निर्माण तिथि, अवधि-समाप्ति तिथि और सही जानकारी अंकित करें, विज्ञापन पर जितना ख़र्च करती हैं उतनी ही गंभीरता से उपभोक्ता-जागरूकता में भी निवेश करें, और गाँव-देहात के अनजान उपभोक्ताओं का अनुचित लाभ न उठाएँ। (ग) ब्रांडेड वस्तु ख़रीदने के पीछे अक्सर सामाजिक प्रतिष्ठा दिखाने, दूसरों से बेहतर दिखने और पर्चेज़िंग पावर का प्रदर्शन करने की मानसिकता छिपी होती है, यह ठीक निबंध के “पैसे की व्यंग्य-शक्ति” वाले प्रसंग से जुड़ता है, जहाँ मोटर का वैभव देखकर लेखक स्वयं को ‘वंचित’ होने की विडंबना में महसूस करता है।

प्रश्न 4

प्र. प्रेमचंद की कहानी ईदगाह के हामिद और उसके दोस्तों का बाज़ार से क्या संबंध बनता है? विचार करें।

उत्तर: ईदगाह कहानी में हामिद के दोस्त मेले में मिठाई, खिलौने और झूले जैसी लुभावनी चीज़ों में मगन होकर अपनी पर्चेज़िंग पावर (चाहे कुछ ही पैसे क्यों न हों) उन पर ख़र्च कर देते हैं, ठीक वैसे ही जैसे ‘बाज़ार दर्शन’ में बताया गया बाज़ार का जादू आँख की राह काम करके तुरंत की चाह जगा देता है। पर हामिद इससे अलग है, वह अपनी दादी अमीना के रोटी सेंकते समय तवे से हाथ जल जाने की तकलीफ़ याद रखकर (उनके पास चिमटा ही नहीं है), अपनी सीमित ज़रूरत (दादी के लिए चिमटा) को पहचानता है और उसी के अनुसार ख़रीदारी करता है। यह ठीक भगत जी जैसी ही मनःस्थिति है, हामिद का मन खाली नहीं है, वह जानता है कि उसे क्या चाहिए, इसलिए बाज़ार का जादू उस पर असर नहीं कर पाता।

4 विज्ञापन की दुनिया

प्रश्न 1

प्र. आपने समाचारपत्रों, टी.वी. आदि पर अनेक प्रकार के विज्ञापन देखे होंगे जिनमें ग्राहकों को हर तरीके से लुभाने का प्रयास किया जाता है। नीचे लिखे बिंदुओं के संदर्भ में किसी एक विज्ञापन की समीक्षा कीजिए और यह भी लिखिए कि आपको विज्ञापन की किस बात ने सामान खरीदने के लिए प्रेरित किया: (1) विज्ञापन में सम्मिलित चित्र और विषय-वस्तु (2) विज्ञापन में आए पात्र व उनका औचित्य (3) विज्ञापन की भाषा।

उत्तर: यह एक व्यक्तिगत अनुभव-आधारित प्रश्न है, विद्यार्थी अपनी पसंद का कोई एक विज्ञापन चुनकर लिखें। उदाहरण के लिए, किसी साबुन के विज्ञापन में चमकती त्वचा और ख़ुशहाल परिवार के दृश्य दिखाकर (चित्र व विषय-वस्तु) एक सफल, प्रसन्न व्यक्ति को मॉडल (पात्र) बनाया जाता है, ताकि दर्शक उससे जुड़ाव महसूस करे, और भाषा में “नयापन”, “बेहतरीन” जैसे लुभावने शब्दों का प्रयोग होता है। ऐसे विज्ञापन अक्सर उत्पाद की वास्तविक ज़रूरत से ज़्यादा भावनात्मक आकर्षण से ख़रीद के लिए प्रेरित करते हैं, ठीक निबंध में बताए गए बाज़ार के “रूप के जादू” की तरह।

प्रश्न 2

प्र. अपने सामान की बिक्री को बढ़ाने के लिए आज किन-किन तरीकों का प्रयोग किया जा रहा है? उदाहरण सहित उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए। आप स्वयं किस तकनीक या तौर-तरीके का प्रयोग करना चाहेंगे जिससे बिक्री भी अच्छी हो और उपभोक्ता गुमराह भी न हो।

उत्तर: आज बिक्री बढ़ाने के लिए छूट (डिस्काउंट) और सेल ऑफ़र, सोशल मीडिया पर प्रभावशाली व्यक्तियों (इन्फ़्लुएंसर) के ज़रिए प्रचार, आकर्षक पैकेजिंग और सीमित समय की स्कीमों जैसे तरीक़े अपनाए जाते हैं। कुछ कंपनियाँ अतिशयोक्तिपूर्ण दावे करके ग्राहक को गुमराह भी करती हैं। मैं स्वयं ऐसी तकनीक अपनाना चाहूँगा/चाहूँगी जिसमें उत्पाद की सही और पूरी जानकारी स्पष्ट रूप से दी जाए, ग्राहक की वास्तविक समीक्षाओं को सामने रखा जाए और गुणवत्ता पर ज़ोर दिया जाए, ताकि बिक्री ईमानदारी से बढ़े, न कि झूठे लालच से, ठीक वैसे ही जैसे निबंध के अनुसार बाज़ार की असली सार्थकता आवश्यकता के समय ईमानदार काम आने में है, न कि छल में।

5 भाषा की बात

प्रश्न 1

प्र. विभिन्न परिस्थितियों में भाषा का प्रयोग भी अपना रूप बदलता रहता है, कभी औपचारिक रूप में आती है तो कभी अनौपचारिक रूप में। पाठ में से दोनों प्रकार के तीन-तीन उदाहरण छाँटकर लिखिए।

उत्तर: औपचारिक भाषा के उदाहरण: (1) “पैसा पावर है।” (2) “बाज़ार को सार्थकता भी वही मनुष्य देता है जो जानता है कि वह क्या चाहता है।” (3) “वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है।” अनौपचारिक भाषा के उदाहरण: (1) “यह क्या?” (2) “यह जो साथ थीं।” (3) “खूब!”: ये संवाद रोज़मर्रा की बोलचाल जैसे सहज हैं, जबकि पहले वाले वाक्य निबंध की गंभीर, विचार-प्रधान शैली दिखाते हैं।

प्रश्न 2

प्र. पाठ में अनेक वाक्य ऐसे हैं, जहाँ लेखक अपनी बात कहता है, कुछ वाक्य ऐसे हैं जहाँ वह पाठक-वर्ग को संबोधित करता है। सीधे तौर पर पाठक को संबोधित करने वाले पाँच वाक्यों को छाँटिए और सोचिए कि ऐसे संबोधन पाठक से रचना पढ़वा लेने में मददगार होते हैं?

उत्तर: पाठक को संबोधित करने वाले वाक्य: (1) “कहीं आप भूल न कर बैठिएगा।” (2) “जी नहीं, ऐसी हलकी बात भी न सोचिएगा।” (3) “पैसे को देखने के लिए बैंक-हिसाब देखिए।” (सीधा आदेशसूचक संबोधन) (4) “यहाँ एक अंतर चीन्ह लेना बहुत ज़रूरी है।” (5) “उस बल को नाम जो दो।” हाँ, ऐसे संबोधन निश्चय ही पाठक को रचना से जोड़े रखने में मददगार होते हैं, क्योंकि इनसे निबंध एक औपचारिक भाषण जैसा न लगकर सीधे पाठक से हो रही बातचीत जैसा लगता है, जिससे पाठक अधिक ध्यान और रुचि से पढ़ता है।

प्रश्न 3

प्र. नीचे दिए गए वाक्यों को पढ़िए: (क) पैसा पावर है। (ख) पैसे की उस पर्चेज़िंग पावर के प्रयोग में ही पावर का रस है। (ग) मित्र ने सामने मनीबैग फैला दिया। (घ) पेशगी ऑर्डर कोई नहीं लेते। इन वाक्यों की संरचना हिंदी भाषा की है लेकिन वाक्यों में एकाध शब्द अंग्रेज़ी भाषा के आए हैं। इस तरह के प्रयोग को कोड मिक्सिंग कहते हैं। अब तक आपने जो पाठ पढ़े उसमें से ऐसे कोई पाँच उदाहरण चुनकर लिखिए। यह भी बताइए कि आगत शब्दों की जगह उनके हिंदी पर्यायों का ही प्रयोग किया जाए तो संप्रेषणीयता पर क्या प्रभाव पड़ता है।

उत्तर: पाठ से कोड मिक्सिंग के पाँच उदाहरण: (1) “पैसा पावर है।” (2) “पर्चेज़िंग पावर।” (3) “मनीबैग फैला दिया।” (4) “पेशगी ऑर्डर कोई नहीं लेते।” (5) “लोग स्पिरिचुअल कहते हैं।” (यहाँ ‘पावर’, ‘ऑर्डर’, ‘मनीबैग’, ‘स्पिरिचुअल’ जैसे शब्द अंग्रेज़ी मूल के हैं जो हिंदी वाक्य-रचना में घुल-मिल गए हैं)। यदि इन आगत (उधार लिए) शब्दों की जगह हिंदी पर्याय (‘शक्ति’, ‘आदेश’ आदि) रखे जाएँ, तो वाक्य व्याकरणिक रूप से तो सही रहेंगे, पर उनका सहज, बोलचाल वाला असर कुछ कम हो सकता है, क्योंकि ‘पावर’ जैसे शब्द आज की भाषा में इतने घुल-मिल चुके हैं कि उनका प्रयोग वाक्य को अधिक स्वाभाविक और प्रभावशाली बनाता है।

प्रश्न 4

प्र. नीचे दिए गए वाक्यों के रेखांकित अंश पर ध्यान देते हुए उन्हें पढ़िए: (क) निर्बल ही धन की ओर झुकता है। (ख) लोग संयमी भी होते हैं। (ग) सभी कुछ तो लेने को जी होता था। इन वाक्यों के रेखांकित अंश ‘ही’, ‘भी’, ‘तो’ निपात हैं जो अर्थ पर बल देने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। आप निपात (ही, भी, तो) का प्रयोग करते हुए तीन-तीन वाक्य बनाइए। साथ ही ऐसे दो वाक्यों का भी निर्माण कीजिए जिसमें ये तीनों निपात एक साथ आते हों।

उत्तर: ‘ही’ के वाक्य: (1) वही व्यक्ति बाज़ार को सार्थकता देता है। (2) भगत जी ही ऐसे व्यक्ति हैं जिन पर बाज़ार का जादू नहीं चलता। (3) आज ही यह चूरन बिक गया। ‘भी’ के वाक्य: (1) संयमी लोग भी बाज़ार में जाते हैं। (2) पैसा भी एक तरह की शक्ति है। (3) मन भरा न हो तो जेब खाली होने पर भी जादू चल जाता है। ‘तो’ के वाक्य: (1) मैं बाज़ार जाऊँ तो सूची साथ रखूँ। (2) कुछ लेने का मन तो हुआ, पर लिया कुछ नहीं। (3) जेब खाली हो तो भी जादू चल जाता है। तीनों निपात एक साथ: (1) यह चीज़ तो मुझे भी चाहिए ही थी। (2) उसे भी यह बात तो पता ही थी।

6 चर्चा करें

प्रश्न 1

प्र. पर्चेज़िंग पावर से क्या अभिप्राय है? बाज़ार की चकाचौंध से दूर पर्चेज़िंग पावर का सकारात्मक उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है: (क) सामाजिक विकास के कार्यों में (ख) ग्रामीण आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में?

उत्तर: पर्चेज़िंग पावर से अभिप्राय है ख़रीदने की शक्ति, यानी किसी व्यक्ति के पास मौजूद पैसे से सामान या सेवाएँ ख़रीदने की क्षमता। (क) सामाजिक विकास के कार्यों में, यदि लोग अपनी पर्चेज़िंग पावर का एक हिस्सा शिक्षा, स्वास्थ्य-सेवा या ग़रीबों की मदद के लिए दान करें, तो यह शक्ति समाज के लिए सकारात्मक बदलाव ला सकती है। (ख) ग्रामीण आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में, यदि शहरी उपभोक्ता स्थानीय व ग्रामीण हस्तशिल्प, हथकरघा और कृषि-उत्पाद सीधे किसानों व कारीगरों से ख़रीदें, तो उनकी पर्चेज़िंग पावर बिचौलियों के बजाय सीधे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूत करेगी। इस तरह पर्चेज़िंग पावर का उपयोग निबंध की सीख के अनुसार, स्पष्ट और सच्ची ज़रूरत को समझकर किया जाए, तो वह व्यक्तिगत लाभ से आगे बढ़कर समाज के लिए भी लाभकारी बन सकती है।