शिरीष के फूल — आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

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इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन-परिचय और उनकी निबंध-शैली की पहचान
  • “शिरीष के फूल” निबंध को क्रम में समझना: शिरीष के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहते हैं
  • “कालजयी अवधूत” प्रतीक का सही और पूरा अर्थ अपने शब्दों में समझाना, बिना उसे कमज़ोर या उलटा समझे
  • निबंध में आए संस्कृत श्लोक, कबीर और तुलसीदास के दोहों तथा विज्जिका व रवींद्रनाथ के उद्धरणों का आशय बताना
  • निबंध के अंत में गांधीजी से जुड़ाव और आत्मबल-देह-बल के द्वंद्व को स्पष्ट करना
  • ललित निबंध की भाषा-शैली की विशेषताएँ पहचानना
कालजयी अवधूतजिजीविषाअनासक्तिकल्पलताललित निबंधआत्मबल बनाम देह-बल

1 लेखक-परिचय: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

द्विवेदी जी ने निबंध को सिर्फ़ विचार बताने का साधन नहीं, एक सर्जनात्मक (creative) साहित्य-विधा बना दिया। उनके निबंध गहरी विद्वत्ता से भरे होते हुए भी बोझिल नहीं लगते, क्योंकि वे विद्वत्ता को सहज बोध और आत्मीय (personal) शैली में ढालकर पेश करते हैं।

बिंदु विवरण
जन्म सन् 1907, आरत दुबे का छपरा, बलिया (उत्तर प्रदेश)
मृत्यु सन् 1979, दिल्ली में
निबंध-संग्रह अशोक के फूल, कल्पलता (इसी से यह पाठ लिया गया है), विचार और वितर्क, कुटज, विचार-प्रवाह, आलोक पर्व, प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद
उपन्यास बाणभट्ट की आत्मकथा, चारुचंद्रलेख, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा
आलोचना-साहित्येतिहास सूर साहित्य, कबीर, मध्यकालीन बोध का स्वरूप, नाथ संप्रदाय, कालिदास की लालित्य-योजना, हिंदी साहित्य का आदिकाल, हिंदी साहित्य की भूमिका, हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास
ग्रंथ-संपादन संदेश रासक, पृथ्वीराजरासो, नाथ-सिद्धों की बानियाँ; विश्व भारती (शांतिनिकेतन) पत्रिका का संपादन
पुरस्कार व सम्मान साहित्य अकादेमी पुरस्कार (‘आलोक पर्व’ पर), भारत सरकार का ‘पद्मभूषण’, लखनऊ विश्वविद्यालय की डी. लिट्.
ललित निबंध (सामान्य परिचय; पाठ यह परिभाषा नहीं देता)

ललित निबंध सामान्यतः वह निबंध-विधा है जिसमें लेखक किसी साधारण-सी दिखने वाली वस्तु या दृश्य (जैसे एक पेड़) से शुरू करके अपने निजी विचार, भावनाएँ और जीवन-दर्शन को आत्मीय, कहानी जैसी शैली में व्यक्त करता है। पाठ स्वयं इस निबंध को “ललित निबंध” कहता है और द्विवेदी जी के निबंधों को “व्यक्तित्व-व्यंजना और आत्मपरक शैली से युक्त” बताता है।

क्या आप जानते हैं?

पाठ के अभ्यास में द्विवेदी जी के और वनस्पति-केंद्रित निबंध गिनाए गए हैं: कुटज, आम फिर बौरा गए, अशोक के फूल, देवदारु आदि। पाठ-परिचय के अनुसार वे मानवतावादी साहित्यकार व समीक्षक के रूप में प्रतिष्ठित हैं, और उनके उपन्यास जात-पाँत, मज़हबों में विभाजन और स्त्री के दलन की पीड़ा को सबसे बड़े सांस्कृतिक संकट के रूप में पहचानते हैं।

2 पाठ-परिचय: निबंध किस बारे में है

लेखक जहाँ बैठकर लिख रहे हैं उसके आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ खड़े शिरीष के पेड़ों को देखकर एक गहरी बात तक पहुँचते हैं। पाठ-परिचय के अनुसार निबंध मनुष्य की अजेय जिजीविषा और तुमुल कोलाहल-कलह के बीच धैर्यपूर्वक, लोक के साथ चिंतारत, कर्तव्यशील बने रहने को एक महान मानवीय मूल्य के रूप में स्थापित करता है। पाठ-परिचय यह भी कहता है कि लेखक “अशोक के फूल” के भूल जाने की तरह ही शिरीष को नज़रअंदाज़ किए जाने की साहित्यिक घटना से आहत है, और पुरानी पीढ़ी व हम सब में “नयेपन के स्वागत का साहस” देखना चाहता है। इसी विचार को समझाने के लिए वे शिरीष को “कालजयी अवधूत” (समय को जीत लेने वाला संन्यासी) कहते हैं।

परीक्षा संकेत

“शिरीष को कालजयी अवधूत क्यों कहा गया है?” निबंध का एक केंद्रीय प्रश्न है (पाठ के अभ्यास का पहला प्रश्न)। नीचे धारा 3 का पूरा तर्क क्रम में याद रखें, सिर्फ़ “शिरीष गरमी में फूलता है” कहकर मत रुक जाएँ।

आम ग़लती

शिरीष को केवल “कोमलता” का प्रतीक समझना अधूरा अर्थ है। लेखक बार-बार दिखाते हैं कि शिरीष एक साथ कोमल भी है और कठोर भी: फूल कोमल हैं पर फल मज़बूत, वातावरण भीषण गरम है पर पेड़ फिर भी रस खींच लेता है। पाठ अंत में गांधीजी के बारे में भी कहता है कि वे “वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर” हो सके थे।

3 निबंध का सार: क्रम में

3.1 शिरीष का परिचय: जेठ की जलती धूप में फूलना

  • जेठ (ज्येष्ठ) की जलती धूप में, जब धरती अग्निकुंड जैसी तपती है, शिरीष नीचे से ऊपर तक फूलों से लद जाता है
  • तुलना कर्णिकार (कनेर) और आरग्वध (अमलतास) से: लेखक कहते हैं कि वे भी आस-पास बहुत हैं, पर शिरीष के साथ आरग्वध की तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि आरग्वध वसंत ऋतु के पलाश की भाँति केवल पंद्रह-बीस दिन के लिए फूलता है
  • कबीर का दोहा: “दिन दस फूला फूलिके खंखड़ भया पलास!”, यानी दस दिन फूलकर फिर सूखी लकड़ी बनना कबीर को पसंद नहीं था; लेखक भी कहते हैं “ऐसे दुमदारों से तो लँडूरे भले”
  • शिरीष इसके ठीक उलट है: वसंत से आषाढ़ तक लगातार फूलता है, और मन रमे तो भरे भादों में भी
चित्र 1: शिरीष (Albizia lebbeck) का फूल, लोक में जिसे "सिरिस" भी कहा जाता है (चित्र: Debjit Mukherjee / Wikimedia Commons / CC BY-SA 4.0)
चित्र 1: शिरीष (Albizia lebbeck) का फूल, लोक में जिसे “सिरिस” भी कहा जाता है (चित्र: Debjit Mukherjee / Wikimedia Commons / CC BY-SA 4.0)

3.2 कालजयी अवधूत: शिरीष जीवन की अजेयता का मंत्र

Learn by heartपरिभाषा 2

अवधूत वह संन्यासी जो सांसारिक बंधनों और विषय-वासनाओं से पूरी तरह ऊपर उठ चुका है: सुख-दुख उसे विचलित नहीं कर पाते। जिजीविषा का अर्थ है जीने की गहरी इच्छा-शक्ति।

उमस से प्राण उबल रहा हो या लू से हृदय सूख रहा हो, तब भी शिरीष अकेला फूलता रहता है, इसीलिए वह “कालजयी अवधूत की भाँति जीवन की अजेयता का मंत्र प्रचार करता रहता है”: कितनी भी कठिन परिस्थिति क्यों न हो, जीवन को हराया नहीं जा सकता।

3.3 शिरीष का ऐतिहासिक-सांस्कृतिक महत्त्व

  • पुराना भारतीय रईस अपनी वाटिका (बगीचे) की चहारदीवारी के पास शिरीष जैसे मंगल-जनक वृक्ष लगाता था (संदर्भ: बृहत्संहिता 55.13); अशोक, अरिष्ट, पुन्नाग और शिरीष से घिरी वाटिका मनोहर दिखती होगी
  • वात्स्यायन के ‘कामसूत्र’ में लिखा है: वाटिका के सघन छायादार वृक्षों की छाया में झूला (प्रेंखा दोला) लगाया जाना चाहिए; यद्यपि पुराने कवि बकुल (मौलसिरी) के पेड़ में ऐसी दोलाओं को लगा देखना चाहते थे, पर लेखक कहते हैं “शिरीष भी क्या बुरा है!”; कामसूत्र शिरीष का नाम नहीं लेता, केवल छायादार वृक्षों के नीचे झूले की बात करता है
  • लेखक हास्य से कहते हैं: शिरीष की डाल कमज़ोर है, पर झूलने वालियों का वज़न भी तो कम होता है, सिवाय “तुंदिल (मोटे पेट वाले) नरपतियों” के

3.4 फूल की कोमलता बनाम फल की कठोरता: पुरानी-नई पीढ़ी का द्वंद्व

संस्कृत साहित्य में शिरीष का फूल बहुत कोमल माना गया, कालिदास ने यह बात प्रचारित की होगी (लेखक का अनुमान):

“पदं सहेत भ्रमरस्य पेलवं शिरीष पुष्पं न पुनः पतत्रिणाम्॥”

अर्थ: कोमल शिरीष पुष्प केवल भौंरों के पदों का कोमल दबाव सह सकता है, पक्षियों का बिलकुल नहीं

पर लेखक कहते हैं, यह भूल है कि शिरीष का सब-कुछ कोमल है: उसके फल बहुत मज़बूत होते हैं, नए फूल आने पर भी अपनी जगह नहीं छोड़ते, जब तक नए फल-पत्ते धकियाकर उन्हें बाहर नहीं निकाल देते।

चित्र 2: शिरीष के पुराने, मज़बूत फल (फलियाँ): यही फल हैं जो नए फूल आने पर भी जगह नहीं छोड़ते (चित्र: J.M.Garg / Wikimedia Commons / CC BY-SA 3.0)
चित्र 2: शिरीष के पुराने, मज़बूत फल (फलियाँ): यही फल हैं जो नए फूल आने पर भी जगह नहीं छोड़ते (चित्र: J.M.Garg / Wikimedia Commons / CC BY-SA 3.0)

शिरीष का फूल

  • बहुत कोमल, केवल भौंरों के पदों का कोमल दबाव सहे
  • संस्कृत कवियों का प्रिय विषय

शिरीष का फल

  • बहुत मज़बूत
  • नए फूलों के निकल आने पर भी स्थान नहीं छोड़ता

लेखक इस खड़खड़ाहट की तुलना उन नेताओं से करते हैं जो ज़माने का रुख़ नहीं पहचानते और जब तक नई पौध धक्का मारकर हटा नहीं देती, तब तक जमे रहते हैं। पाठ-परिचय के अनुसार इसमें लेखक साहित्य, समाज व राजनीति में पुरानी और नई पीढ़ी के द्वंद्व को संकेतित करता है, और पुराने फलों की खड़खड़ाहट को “अधिकार-लिप्सु” कहता है।

परीक्षा संकेत

इस द्वंद्व को पाठ में फूल-बनाम-फल की तुलना और नेताओं के उदाहरण से समझा जा सकता है; उत्तर में दोनों लिखें।

3.5 जरा और मृत्यु: महाकालदेवता के कोड़े

पुराने फल समय रहते सावधान क्यों नहीं होते, जब जरा (बुढ़ापा) और मृत्यु “जगत के अतिपरिचित और अतिप्रामाणिक सत्य” हैं? तुलसीदास की पंक्ति:

“धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना!”

तुलसीदास, निबंध में उद्धृत

महाकालदेवता निरंतर कोड़े चला रहे हैं (सपासप, यानी जल्दी-जल्दी): जीर्ण-दुर्बल झड़ जाते हैं, जिनमें प्राणकण थोड़ा भी ऊर्ध्वमुखी है, वे टिकते हैं।

Memory Trick

हिलो, बदलो, आगे बढ़ो

लेखक का संदेश: “हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो। जमे कि मरे!”

3.6 अवधूत ही सरस रचना करता है: कबीर, कालिदास और विज्जिका

शिरीष अद्भुत अवधूत है: “दुःख हो या सुख, वह हार नहीं मानता। न ऊधो का लेना, न माधो का देना”; और वायुमंडल से रस खींचता है (एक वनस्पतिशास्त्री का कथन), तभी लू में भी सुकुमार तंतुजाल-केसर उगा पाता है।

  • अवधूतों के मुँह से ही सबसे सरस रचनाएँ निकलती हैं: कबीर शिरीष जैसे मस्त-बेपरवा पर सरस-मादक थे
  • कालिदास भी अनासक्त योगी रहे होंगे: ‘मेघदूत’ ऐसे ही उन्मुक्त हृदय से उपजा होगा
  • विज्जिका देवी (कर्णाट-राज की प्रिया) का कथन: कवि केवल तीन, ब्रह्मा, वाल्मीकि, व्यास, कोई और दावा करे तो वे अपना बायाँ चरण उसके सिर पर रखेंगी; संदेश: कवि बनना है तो फक्कड़ बनो
Learn by heartपरिभाषा 3

सत्कवि होने की एकमात्र शर्त (पाठ-परिचय के अनुसार): “योगी की अनासक्त शून्यता और प्रेमी की सरस पूर्णता” का एक साथ होना, यानी सांसारिक अलगाव और जीवन-रस से भरा हृदय, दोनों एक साथ।

3.7 कालिदास की अनासक्ति: शकुंतला-प्रसंग और कृषीवल की उपमा

कालिदास “वज़न” इसलिए साध सके क्योंकि उनमें अनासक्त योगी की स्थिर-प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय, दोनों एक साथ थे: “वयमपि कवयः कवयः कवयस्ते कालिदासाद्या!” (हम भी कवि हैं, पर कालिदास जैसे अलग ही श्रेणी के हैं, एक पुराने सहृदय का कथन)। लेखक व्यंग्य से कहते हैं, “मैं भी छंद बना लेता हूँ, तुक जोड़ लेता हूँ”; कवि होने से क्या होता है, असली बात अनासक्ति है।

उदाहरण

राजा दुष्यंत ने शकुंतला का चित्र बनाया, पर मन बार-बार खीझ उठता था। बाद में समझ आया: वे शकुंतला के कानों में शिरीष पुष्प (जिसके केसर गंडस्थल तक लटके थे) देना भूल गए थे; चित्र में शरच्चंद्र की किरणों-सा कोमल और शुभ्र मृणाल का हार ही रह गया था।

आशय: कालिदास सौंदर्य के बाह्य आवरण को भेदकर उसके भीतर तक पहुँच सकते थे।

वे दुख-सुख में भाव-रस उस अनासक्त कृषीवल की तरह खींचते थे जो निर्दलित ईक्षुदंड (गन्ने के तने) से रस निकालता है। यही अनासक्ति सुमित्रानंदन पंत और रवींद्रनाथ ठाकुर में भी है:

“राजोद्यान का सिंहद्वार कितना ही अभ्रभेदी (गगनचुंबी) क्यों न हो, उसकी शिल्पकला कितनी ही सुंदर क्यों न हो, वह यह नहीं कहता कि हममें आकर ही सारा रास्ता समाप्त हो गया। असल गंतव्य स्थान उसे अतिक्रम करने के बाद ही है, यही बताना उसका कर्तव्य है।”

रवींद्रनाथ ठाकुर, निबंध में उद्धृत

इसी से लेखक कहते हैं: फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है, वह किसी और वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई अँगुली है, वह इशारा है।

3.8 समापन: शिरीष और गांधीजी

इस चिलकती धूप में शिरीष इतना सरस कैसे बना रहता है? हमारे देश पर गुज़रे मार-काट, अग्निदाह, लूट-पाट और खून-खच्चर के बवंडर (पाठ किसी घटना का नाम नहीं लेता) के बीच भी क्या कुछ स्थिर रह सकता था?

निबंध का केंद्रीय जोड़
शिरीष रह सका → अपने देश का एक बूढ़ा (गांधीजी) भी रह सका
दोनों ने वायुमंडल से रस खींचकर स्वयं को इतना कोमल और इतना कठोर बनाया
चित्र 3: महात्मा गांधी, 1931: निबंध के अंत में लेखक जिस "इतिहास-विभूति" को शिरीष से जोड़ते हैं, वे गांधीजी ही हैं (चित्र: Elliott & Fry / Wikimedia Commons / Public Domain)
चित्र 3: महात्मा गांधी, 1931: निबंध के अंत में लेखक जिस “इतिहास-विभूति” को शिरीष से जोड़ते हैं, वे गांधीजी ही हैं (चित्र: Elliott & Fry / Wikimedia Commons / Public Domain)

“मैं जब-जब शिरीष की ओर देखता हूँ तब-तब हूक उठती है, हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!”

निबंध की अंतिम पंक्ति

Learn by heartपरिभाषा 4

पाठ के अभ्यास-प्रश्न के अनुसार “हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!” कहकर लेखक ने आत्मबल पर देह-बल (शारीरिक शक्ति) के वर्चस्व की ओर संकेत किया है; पाठ-परिचय इसे “गांधीवादी मूल्यों के अभाव की पीड़ा” कहता है।

4 निबंध की संरचना (शिल्प)

लेखक स्वयं कहते हैं कि निबंध का शिल्प इसी में चर्चित इक्षुदंड जैसा है: सांस्कृतिक संदर्भों की भड़कीली खोल के भीतर सहज भावधारा का मधुरस।

चरण 1शिरीष पुष्प की कोमल सुंदरता का वर्णन
↓
चरण 2उसका इतिहास (संस्कृत साहित्य, बृहत्संहिता, कामसूत्र)
↓
चरण 3मध्यकालीन जीवन और सामंती वैभव-विलास का खोखलापन
↓
चरण 4अवधूत और सत्कवि के दर्शन तक पहुँचना
↓
परिणामगांधीजी से जुड़ाव, गहरी टीस के साथ समापन

5 निबंध में आए अन्य वृक्ष

1

अशोक

बहुचर्चित सदाबहार वृक्ष, वानस्पतिक नाम सराका इंडिका। वसंत में लाल फूलों के गुच्छे, कामदेव के पाँच पुष्पवाणों में से एक।

2

अरिष्ट (रीठा)

चमकीले हरे पत्तों वाला वृक्ष, फल का चूर्ण बाल-कपड़े धोने में प्रयुक्त, तने पर काँटे।

3

आरग्वध (अमलतास)

भीषण गरमी में ठूँठ जैसा होकर भी पीले फूलों के गुच्छे देता है, फल डेढ़ फुट के बेलनाकार।

4

पुन्नाग

एक बड़ा सदाबहार पेड़, अशोक-अरिष्ट-शिरीष के साथ वाटिका-वृक्षों में गिना जाता है।

5

बकुल (मौलसिरी)

पुराने कवि बकुल के पेड़ में झूले लगे देखना चाहते थे; लेखक कहते हैं, “पर शिरीष भी क्या बुरा है!”

6

शिरीष (सिरिस)

पाठ के “इन्हें भी जानें” के अनुसार आकार में विशाल होता है पर पत्ते बहुत छोटे-छोटे होते हैं; इसके फूलों में पंखुड़ियों की जगह रेशे-रेशे होते हैं।

6 भाषा-शैली की विशेषताएँ

  • आत्मपरक और संवादात्मक शैली: द्विवेदी जी पाठक से सीधे बात करते-से लगते हैं (“मेरा अनुमान है”, “मैं जानता हूँ”)
  • संस्कृत, लोकोक्ति और दोहों का सहज मिश्रण: संस्कृत श्लोक, कबीर-तुलसीदास के दोहे और रवींद्रनाथ का कथन बिना बोझिलता के आते हैं, व्यापक पांडित्य को सहजता से पेश करने का प्रमाण
  • हास्य-व्यंग्य का पुट: गंभीर विषय में भी हल्का हास्य, जैसे “तुंदिल नरपतियों” की टिप्पणी या “ऐसे दुमदारों से तो लँडूरे भले” जैसी व्यंग्योक्ति
शब्द-छवि: सभी कठिन शब्द एक साथ
कर्णिकारकनेर (या कनियार) नामक फूल
आरग्वधअमलतास नामक फूल
खंखड़ठूँठ, सूखा हुआ
निर्घातबिना आघात या बाधा के
अवधूतसांसारिक बंधनों व विषय-वासनाओं से ऊपर उठा हुआ संन्यासी
लँडूरेपूँछ-विहीन
हिल्लोललहर
अरिष्ठरीठा नामक वृक्ष
पुन्नागएक बड़ा सदाबहार पेड़
घनमसृणघना और चिकना, गहरा मुलायम
परिवेष्टितघिरा हुआ, ढँका हुआ
दोलाझूला
बकुलमौलसिरी का पेड़
तुंदिलतोंद वाला, मोटे पेट वाला
मर्मरितपत्तों की खड़खड़ाहट या सरसराहट से युक्त
ऊर्ध्वमुखीऊपर उठने/बढ़ने की दिशा में
दुरंतजिसका विनाश होना मुश्किल है
हज़रतश्रीमान (यहाँ व्यंग्यात्मक स्वर में)
अनासक्तविषय-भोग से ऊपर उठा हुआ, निर्लिप्त
अनाविलस्वच्छ, निर्मल
कर्णाटप्राचीन काल का कर्नाटक राज्य
स्थिर-प्रज्ञताअविचल बुद्धि की अवस्था
विदग्धअच्छी तरह से तपा हुआ
कार्पण्यकृपणता
गंडस्थलगाल
कृषीवलकिसान
निर्दलितभलीभाँति निचोड़ा/कुचला हुआ
ईक्षुदंडईख (गन्ने) का तना
अभ्रभेदीगगनचुंबी, बहुत ऊँचा
सपासपध्वन्यात्मक शब्द, कोड़े पड़ने की आवाज़ के लिए, यहाँ “जल्दी-जल्दी” अर्थ में

7 परीक्षा हेतु मुख्य बिंदु

4पेड़ बृहत्संहिता की वाटिका-सूची में (अशोक, अरिष्ट, पुन्नाग, शिरीष)
3नामी उद्धरण: कबीर, तुलसीदास और विज्जिका के कथन
2गुण एक साथ ज़रूरी: अनासक्त योगी की प्रज्ञता + विदग्ध प्रेमी का हृदय
त्वरित पुनरीक्षण: परीक्षा से पहले यही पढ़ें
  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी (1907-1979) के संग्रह कल्पलता से लिया गया ललित निबंध
  • शिरीष जेठ की भीषण गरमी में भी फूलों से लदा रहता है, वसंत से आषाढ़ तक, और मन रम जाए तो भरे भादों तक; इसीलिए “कालजयी अवधूत”
  • बृहत्संहिता (55.13) की वाटिका-वृक्ष सूची में शिरीष है; कामसूत्र में वाटिका के सघन छायादार वृक्षों के नीचे झूला लगाने की बात है (शिरीष का नाम नहीं)
  • फूल कोमल पर फल कठोर; पाठ-परिचय के अनुसार इसमें पुरानी और नई पीढ़ी के द्वंद्व का संकेत है
  • तुलसी की पंक्ति और महाकालदेवता के कोड़े: हिलते-डुलते रहो, जमे कि मरे
  • सत्कवि की शर्त: अनासक्त योगी की स्थिर-प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय, एक साथ (कालिदास इसके उदाहरण; कबीर शिरीष जैसे मस्त और बेपरवा)
  • शकुंतला-प्रसंग और रवींद्रनाथ का सिंहद्वार-उद्धरण: फूल या पेड़ अपने-आप में समाप्त नहीं, वह इशारा है
  • अंत गांधीजी से जुड़ता है: दोनों वायुमंडल से रस खींचकर कोमल-कठोर बने, अंतिम पंक्ति “हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!” (पाठ के प्रश्न के अनुसार आत्मबल पर देह-बल के वर्चस्व का संकेत)