इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म कब और कहाँ हुआ?
उत्तर: हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म सन् 1907 में आरत दुबे का छपरा, बलिया (उत्तर प्रदेश) में हुआ।
प्र. “शिरीष के फूल” निबंध किस संग्रह से लिया गया है और यह किस विधा की रचना है?
उत्तर: यह निबंध द्विवेदी जी के संग्रह ‘कल्पलता’ से लिया गया है, और यह एक ललित (व्यक्तिपरक/भावप्रधान) निबंध है।
प्र. निबंध के अनुसार शिरीष किस महीने की गरमी में भी फूलों से लद जाता है?
उत्तर: शिरीष जेठ (ज्येष्ठ) महीने की जलती धूप में भी नीचे से ऊपर तक फूलों से लद जाता है।
प्र. कर्णिकार और आरग्वध के लोक-प्रचलित नाम क्या हैं?
उत्तर: कर्णिकार को कनेर (या कनियार) और आरग्वध को अमलतास कहा जाता है।
प्र. शिरीष का उल्लेख किस प्राचीन ग्रंथ में मिलता है?
उत्तर: शिरीष का उल्लेख बृहत्संहिता (55.13) में, वाटिका-वृक्षों की सूची में मिलता है।
प्र. एक वनस्पतिशास्त्री ने लेखक को शिरीष के बारे में क्या बताया?
उत्तर: वनस्पतिशास्त्री ने बताया कि शिरीष उस श्रेणी का पेड़ है जो अपना रस वायुमंडल से खींचता है; लेखक का तर्क है कि इसके बिना भीषण लू में इतने कोमल तंतुजाल और केसर नहीं उग सकते।
प्र. विज्जिका देवी के अनुसार कवि कौन-कौन हुए हैं?
उत्तर: विज्जिका देवी के अनुसार एक कवि ब्रह्मा थे, दूसरे वाल्मीकि और तीसरे व्यास।
प्र. दुष्यंत शकुंतला के चित्र में क्या जोड़ना भूल गए थे?
उत्तर: दुष्यंत शकुंतला के कानों में शिरीष पुष्प देना भूल गए थे, जिसके केसर गंडस्थल तक लटके होते।
प्र. निबंध की अंतिम पंक्ति क्या है?
उत्तर: निबंध की अंतिम पंक्ति है: “मैं जब-जब शिरीष की ओर देखता हूँ तब-तब हूक उठती है, हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!”
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. लेखक शिरीष को “कालजयी अवधूत” क्यों कहते हैं?
उत्तर: जब उमस से प्राण उबल रहा हो और लू से हृदय सूख रहा हो, उस समय भी शिरीष अकेला फूलता रहता है और जीवन की अजेयता का मंत्र प्रचार करता है। किसी भी विपरीत परिस्थिति में हार न मानने के इसी गुण के कारण लेखक उसे “कालजयी अवधूत” कहते हैं।
प्र. शिरीष की तुलना कर्णिकार और आरग्वध से किस आधार पर की गई है?
उत्तर: लेखक कहते हैं कि कर्णिकार और आरग्वध भी आस-पास बहुत हैं, पर आरग्वध वसंत ऋतु के पलाश की भाँति केवल पंद्रह-बीस दिन के लिए फूलता है। इसके विपरीत शिरीष वसंत से आषाढ़ तक निश्चित रूप से, और मन रम जाए तो भरे भादों में भी, फूलता रहता है। लेखक को क्षणिक चमक की जगह यह दीर्घजीविता ज़्यादा पसंद है।
प्र. संस्कृत श्लोक के अनुसार शिरीष पुष्प की कोमलता क्या बताई गई है?
उत्तर: श्लोक कहता है: “पदं सहेत भ्रमरस्य पेलवं शिरीष पुष्पं न पुनः पतत्रिणाम्।” अर्थात कोमल शिरीष पुष्प केवल भौंरों के पदों का कोमल दबाव सह सकता है, पक्षियों का बिलकुल नहीं।
प्र. लेखक के अनुसार शिरीष के फूल और फल में क्या अंतर है?
उत्तर: शिरीष के फूल बहुत कोमल होते हैं, इसीलिए संस्कृत कवियों ने उन्हें कोमलता का प्रतीक बना दिया। पर लेखक बताते हैं कि यह भूल है: शिरीष के फल बहुत मज़बूत होते हैं और नए फूल आने पर भी अपनी जगह नहीं छोड़ते, जब तक नए फल-पत्ते उन्हें धकियाकर बाहर नहीं कर देते।
प्र. पुराने फलों की खड़खड़ाहट की तुलना लेखक किससे करते हैं?
उत्तर: लेखक पुराने फलों की खड़खड़ाहट की तुलना उन नेताओं से करते हैं जो किसी तरह ज़माने का रुख़ नहीं पहचानते और जब तक नई पौध के लोग उन्हें धक्का मारकर हटा नहीं देते, तब तक जमे रहते हैं।
प्र. तुलसीदास की पंक्ति निबंध में किस संदर्भ में उद्धृत है?
उत्तर: तुलसीदास की पंक्ति “धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना!” इस संदर्भ में आती है कि जरा और मृत्यु जगत के अतिपरिचित और अतिप्रामाणिक सत्य हैं; जो फला वह झड़ता ही है। लेखक पूछते हैं कि पुराने की अधिकार-लिप्सा समय रहते सावधान क्यों नहीं हो जाती।
प्र. लेखक के अनुसार सत्कवि होने की एकमात्र शर्त क्या है?
उत्तर: लेखक के अनुसार सत्कवि होने की एकमात्र शर्त है: योगी की अनासक्त शून्यता और प्रेमी की सरस पूर्णता का एक साथ होना, यानी सांसारिक चीज़ों से पूरा अलगाव और साथ ही जीवन-रस से भरा हृदय, दोनों एक साथ।
प्र. रवींद्रनाथ ठाकुर का सिंहद्वार वाला कथन क्या कहता है?
उत्तर: रवींद्रनाथ कहते हैं कि राजोद्यान का सिंहद्वार चाहे कितना भी ऊँचा और सुंदर हो, वह यह नहीं कहता कि उसी में सारा रास्ता समाप्त हो गया, असली गंतव्य उसके आगे है। इसी तरह फूल या पेड़ भी अपने-आप में समाप्त नहीं, वह किसी और वस्तु को दिखाने वाला इशारा है।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. “शिरीष के फूल” निबंध में शिरीष के माध्यम से लेखक कौन-सा जीवन-दर्शन प्रस्तुत करते हैं?
उत्तर: लेखक शिरीष के माध्यम से यह दर्शाते हैं कि भीषण गरमी, आँधी और लू जैसी कठिन परिस्थितियों में भी कोमल और सुंदर बने रहना, हार न मानना और लगातार आगे बढ़ते रहना जीवन का एक महान मानवीय मूल्य है। शिरीष एक साथ कोमल भी है (फूल) और कठोर भी (फल, वायुमंडल से रस खींचने की शक्ति), और यही संतुलन उसे “कालजयी अवधूत” बनाता है। लेखक का संदेश है कि कठिन समय में टिके रहने के लिए स्थिर न रहकर बदलते और आगे बढ़ते रहना ज़रूरी है।
प्र. शिरीष के फूल और फल की तुलना से लेखक पुरानी और नई पीढ़ी के द्वंद्व को कैसे समझाते हैं?
उत्तर: शिरीष के फूल कोमल होते हैं, पर उसके फल बहुत मज़बूत होते हैं और नए फूलों के निकल आने पर भी स्थान नहीं छोड़ते, जब तक नए फल-पत्ते मिलकर उन्हें धकियाकर बाहर नहीं निकाल देते। लेखक को इन्हें देखकर उन नेताओं की याद आती है जो किसी प्रकार ज़माने का रुख़ नहीं पहचानते और जब तक नई पौध के लोग उन्हें धक्का मारकर निकाल नहीं देते, तब तक जमे रहते हैं। पाठ-परिचय के अनुसार इसमें लेखक साहित्य, समाज व राजनीति में पुरानी और नई पीढ़ी के द्वंद्व को संकेतित करता है, और हम सब में नयेपन के स्वागत का साहस देखना चाहता है।
प्र. “जमे कि मरे” के माध्यम से लेखक क्या संदेश देते हैं, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: लेखक कहते हैं कि महाकालदेवता निरंतर कोड़े चला रहे हैं: जो जीर्ण और दुर्बल हैं, वे झड़ जाते हैं, और जिनमें प्राणकण थोड़ा भी ऊर्ध्वमुखी (ऊपर उठने वाला) है, वे टिक जाते हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि एक जगह जमे रहने से समय की मार से बच जाएँगे, वे भोले हैं (“मूर्ख समझते हैं … भोले हैं वे”)। असली सुरक्षा है हिलते-डुलते रहना, स्थान बदलते रहना और आगे की ओर मुँह किए रहना, तभी कोड़े की मार से बचा जा सकता है। इसीलिए लेखक कहते हैं: “जमे कि मरे!”, यानी स्थिर हो जाना मृत्यु के बराबर है।
प्र. लेखक ने सत्कवि की शर्त को कालिदास और शकुंतला-प्रसंग से कैसे स्पष्ट किया है?
उत्तर: लेखक कहते हैं कि कालिदास वज़न (गंभीरता और कोमल रस, दोनों) इसलिए साध सके क्योंकि उनमें अनासक्त योगी की स्थिर-प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय, दोनों एक साथ थे। इसका उदाहरण शकुंतला-प्रसंग है: राजा दुष्यंत ने शकुंतला का चित्र बनाया, पर उनका मन बार-बार खीझ उठता था क्योंकि कुछ छूट गया था, बाद में समझ आया कि वे शकुंतला के कानों में शिरीष पुष्प देना भूल गए थे (चित्र में मृणाल का हार ही रह गया था)। यह दिखाता है कि कालिदास सौंदर्य के बाह्य आवरण को भेदकर उसके भीतर तक पहुँच सकते थे, केवल छंद बना लेने से कोई कालिदास नहीं बन जाता।
प्र. निबंध के अंत में शिरीष और गांधीजी के बीच लेखक क्या जोड़ते हैं, स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: लेखक पूछते हैं कि हमारे देश पर जो मार-काट, अग्निदाह, लूट-पाट और खून-खच्चर का बवंडर गुज़रा (पाठ किसी घटना का नाम नहीं लेता), उसके बीच भी क्या कुछ स्थिर रह सकता था? शिरीष रह सका, और अपने देश का एक बूढ़ा (गांधीजी की ओर संकेत) भी रह सका था। दोनों ने वायुमंडल से रस खींचकर स्वयं को इतना कोमल और इतना कठोर बनाया। यह जोड़ लेखक की उस मान्यता को दिखाता है कि गांधीजी ने पाठ-परिचय के अनुसार देह-बल (शारीरिक शक्ति) के ऊपर आत्मबल का महत्त्व सिद्ध किया था।
प्र. “फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है, वह इशारा है” पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: यह पंक्ति रवींद्रनाथ के सिंहद्वार वाले कथन के बाद आती है। इसका आशय है कि कोई भी वस्तु, चाहे वह फूल हो, पेड़ हो, या राजोद्यान का सिंहद्वार, अपने-आप में अंतिम गंतव्य नहीं होती। वह किसी बड़ी, गहरी सच्चाई या मूल्य की ओर संकेत करने वाली उठी हुई अँगुली है। पाठ यह नहीं बताता कि शिरीष का इशारा किस मूल्य की ओर है; पाठक इसे जीवन की अजेयता से जोड़ सकते हैं।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. “शिरीष के फूल” निबंध का सार अपने शब्दों में आरंभ से अंत तक लिखिए।
उत्तर: निबंध की शुरुआत उन शिरीष के पेड़ों से होती है जो लेखक के आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ खड़े हैं और जेठ की भीषण गरमी में भी फूलों से लद जाते हैं। लेखक इसकी तुलना कर्णिकार और आरग्वध से करते हैं; आरग्वध पलाश की तरह केवल पंद्रह-बीस दिन फूलता है, जबकि शिरीष वसंत से आषाढ़ तक निश्चित रूप से फूलता है, और मन रमे तो भादों में भी; इसीलिए वे उसे “कालजयी अवधूत” कहते हैं। फिर वे शिरीष के ऐतिहासिक महत्त्व की बात करते हैं: बृहत्संहिता की वाटिका-वृक्ष सूची में शिरीष है, और कामसूत्र में वाटिका के छायादार वृक्षों के नीचे झूला लगाने की बात है। इसके बाद वे बताते हैं कि संस्कृत साहित्य में शिरीष का फूल कोमल माना गया है, पर उसके फल बहुत मज़बूत होते हैं और नए फूल आने पर भी जगह नहीं छोड़ते; पाठ-परिचय इसे पुरानी और नई पीढ़ी के द्वंद्व का संकेत मानता है। तुलसी की पंक्ति और महाकालदेवता के कोड़ों के ज़रिए वे जरा-मृत्यु के सत्य और गतिशील बने रहने के महत्त्व पर बल देते हैं। फिर वे सत्कवि की शर्त बताते हैं: अनासक्त योगी की स्थिर-प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय, दोनों एक साथ; कबीर शिरीष जैसे मस्त और बेपरवा थे, कालिदास में दोनों गुण थे (शकुंतला-प्रसंग सहित), और पंत व रवींद्रनाथ में अनासक्ति है। विज्जिका देवी के उस दावे (केवल ब्रह्मा, वाल्मीकि और व्यास कवि) के प्रसंग के बाद लेखक कहते हैं: “कवि बनना है मेरे दोस्तो, तो फक्कड़ बनो।” अंत में लेखक शिरीष को गांधीजी से जोड़ते हैं: दोनों ने वायुमंडल से रस खींचकर कोमलता और कठोरता एक साथ पाई, और निबंध गहरी टीस के साथ समाप्त होता है, “हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!”
प्र. “शिरीष को कालजयी अवधूत क्यों माना गया है”, पाठ के आधार पर विस्तार से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: शिरीष को कालजयी अवधूत इसलिए माना गया है क्योंकि वह भीषण गरमी, आँधी और लू में भी कोमल फूलों से लद जाता है, जबकि कम फूल ही इस प्रकार की गरमी में फूल सकने की हिम्मत करते हैं। वह वसंत से आषाढ़ तक निश्चित रूप से, और मन रम जाए तो भरे भादों में भी, फूलता रहता है, जबकि आरग्वध पलाश की भाँति केवल पंद्रह-बीस दिन के लिए फूलता है। एक वनस्पतिशास्त्री के अनुसार शिरीष वायुमंडल से अपना रस खींचता है; लेखक का तर्क है कि इसके बिना भीषण लू में सुकुमार तंतुजाल और केसर नहीं उग सकते। पाठ में शिरीष के बारे में है: “दुःख हो या सुख, वह हार नहीं मानता। न ऊधो का लेना, न माधो का देना।” जब उमस से प्राण उबलता हो और लू से हृदय सूखता हो, तब भी वह “कालजयी अवधूत की भाँति जीवन की अजेयता का मंत्र प्रचार करता रहता है”, इसीलिए उसे कालजयी (समय को जीत लेने वाला) अवधूत कहा गया है।
प्र. निबंध में आए विभिन्न उद्धरणों (कबीर, तुलसीदास, विज्जिका, रवींद्रनाथ) का संक्षेप में महत्त्व बताइए।
उत्तर: कबीर का दोहा “दिन दस फूला फूलिके खंखड़ भया पलास” क्षणिक चमक की आलोचना करता है और शिरीष की दीर्घजीविता को उभारता है। तुलसीदास की पंक्ति “जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना” जरा और मृत्यु के अतिप्रामाणिक सत्य को याद दिलाती है और शिरीष के पुराने फलों को सचेत करने का बहाना बनता है। विज्जिका देवी का श्लोक (केवल ब्रह्मा, वाल्मीकि, व्यास कवि) एक चुनौती की तरह प्रस्तुत होता है, जिससे लेखक यह संदेश निकालते हैं कि कवि बनने के लिए फक्कड़ बनना ज़रूरी है। रवींद्रनाथ का सिंहद्वार वाला कथन यह समझाता है कि कोई भी वस्तु अपने-आप में अंतिम गंतव्य नहीं होती, बल्कि किसी बड़े मूल्य की ओर इशारा करती है। ये चारों उद्धरण मिलकर निबंध के मुख्य विचार, अनासक्ति, दीर्घजीविता और जीवन के गहरे अर्थ, को कई दिशाओं से पुष्ट करते हैं।
प्र. निबंध के अंत में लेखक “आत्मबल पर देह-बल के वर्चस्व” की बात किस प्रसंग में करते हैं और इसका क्या अर्थ है?
उत्तर: निबंध के अंत में लेखक पूछते हैं कि हमारे देश के ऊपर से जो मार-काट, अग्निदाह, लूट-पाट और खून-खच्चर का बवंडर गुज़रा (पाठ किसी घटना का नाम नहीं लेता; यह देश पर बीती हिंसा का संकेत है), उसके बीच भी क्या कुछ स्थिर रह सकता था। शिरीष रह सका, और अपने देश का एक बूढ़ा (गांधीजी) भी रह सका था, क्योंकि दोनों ने वायुमंडल से रस खींचकर स्वयं को इतना कोमल और इतना कठोर बनाया। पाठ-परिचय के अनुसार गांधीजी ने देह-बल (शारीरिक शक्ति) के ऊपर आत्मबल का महत्त्व सिद्ध किया था। निबंध की अंतिम पंक्ति “हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!” लेखक की टीस है; पाठ-परिचय इसे “गांधीवादी मूल्यों के अभाव की पीड़ा” कहता है, और पाठ का प्रश्न इसे आत्मबल पर देह-बल के वर्चस्व से जोड़ता है।
5 केस स्टडी
(क) 1 अंक गद्यांश में किसकी ‘अधिकार-लिप्सा’ पर सवाल उठाया गया है?
उत्तर: गद्यांश में पुराने (शिरीष के पुराने फलों) की अधिकार-लिप्सा पर सवाल उठाया गया है।
(ख) 1 अंक गद्यांश के अनुसार जगत के दो सबसे प्रामाणिक सत्य कौन-से हैं?
उत्तर: जरा (बुढ़ापा) और मृत्यु, ये दोनों जगत के अतिपरिचित और अतिप्रामाणिक सत्य हैं।
(ग) 2 अंक गद्यांश का आशय अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: लेखक कहते हैं कि पुराने (शिरीष के फलों जैसे) को समय रहते यह समझ लेना चाहिए कि झड़ना निश्चित है, क्योंकि जरा और मृत्यु से कोई नहीं बच सकता। लेखक पूछते हैं कि पुराने की यह अधिकार-लिप्सा समय रहते सावधान क्यों नहीं हो जाती।
(क) 1 अंक गद्यांश में ‘महाकालदेवता’ किसका प्रतीक हैं?
उत्तर: महाकालदेवता समय और मृत्यु का प्रतीक हैं, जो निरंतर हर जीव और वस्तु पर अपने कोड़े (प्रभाव) चलाते रहते हैं।
(ख) 1 अंक गद्यांश के अनुसार कोड़े की मार से कौन बच जाते हैं?
उत्तर: जिनमें प्राणकण थोड़ा भी ऊर्ध्वमुखी (ऊपर उठने और आगे बढ़ने वाला) है, वे कोड़े की मार से बच जाते हैं।
(ग) 2 अंक गद्यांश के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि लेखक गतिशीलता (movement) को सुरक्षा के रूप में क्यों देखते हैं।
उत्तर: लेखक के अनुसार जो लोग यह सोचते हैं कि एक जगह जमे रहने से समय की मार से बच जाएँगे, वे भोले हैं। असली सुरक्षा गति में है: हिलते-डुलते रहना, स्थान बदलते रहना, आगे की ओर मुँह किए रहना। जो स्थिर हो जाता है, वह मृत्यु के करीब पहुँच जाता है, इसीलिए लेखक कहते हैं “जमे कि मरे”, यानी स्थिर रहना खतरे का रास्ता है।