NCERT की पाठ्यपुस्तक आरोह भाग 2 के अध्याय 14 «शिरीष के फूल» के अभ्यास (पाठ के साथ, पाठ के आसपास, भाषा की बात) के सभी प्रश्नों के पूरे हल। पहले ख़ुद उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 पाठ के साथ
प्र. लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत (संन्यासी) की तरह क्यों माना है?
उत्तर: शिरीष जेठ की भीषण गरमी में, जब धरती अग्निकुंड जैसी तप रही होती है, तब भी नीचे से ऊपर तक फूलों से लद जाता है, और वसंत से आषाढ़ तक, और मन रम जाए तो भरे भादों में भी, फूलता रहता है, जबकि कम फूल ही इस प्रकार की गरमी में फूलने की हिम्मत करते हैं। एक वनस्पतिशास्त्री के अनुसार यह वायुमंडल से अपना रस खींचता है; लेखक का तर्क है कि इसके बिना भीषण लू में इतने कोमल तंतुजाल और सुकुमार केसर नहीं उग सकते। अवधूत की तरह शिरीष सुख और दुख दोनों में हार नहीं मानता (“दुःख हो या सुख, वह हार नहीं मानता”), वह किसी भी बाहरी कठिनाई से प्रभावित हुए बिना जीवन की अजेयता का मंत्र प्रचार करता रहता है। इसीलिए लेखक उसे कालजयी (समय को जीत लेने वाला) अवधूत मानते हैं।
प्र. हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार की कठोरता भी कभी-कभी ज़रूरी हो जाती है, प्रस्तुत पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।
उत्तर: शिरीष इसका सबसे अच्छा उदाहरण है: उसके फूल बहुत कोमल होते हैं, पर उसके फल बहुत मज़बूत और दृढ़ होते हैं, जो नए फूल आने पर भी अपनी जगह नहीं छोड़ते, जब तक नई पौध उन्हें बाहर नहीं निकाल देती। इसी तरह शिरीष वायुमंडल से रस खींचकर स्वयं को कोमल भी बनाता है और कठोर भी। निबंध के अंत में लेखक इसे गांधीजी से जोड़ते हैं: पाठ के अनुसार गांधीजी वायुमंडल से रस खींचकर इतने कोमल और इतने कठोर हो सके थे; पाठ में वर्णित मार-काट और उथल-पुथल के बीच भी वे स्थिर रहे। इस तरह पाठ सिखाता है कि कठिन समय में कोमलता को बचाए रखने के लिए भीतर से एक दृढ़, कठोर संकल्प भी उतना ही ज़रूरी है।
प्र. द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से कोलाहल व संघर्ष से भरी जीवन-स्थितियों में अविचल रहकर जिजीविषु बने रहने की सीख दी है। स्पष्ट करें।
उत्तर: लेखक बताते हैं कि हमारे देश के ऊपर से मार-काट, अग्निदाह, लूट-पाट और खून-खच्चर का जो बवंडर गुज़रा, उसके बीच भी शिरीष स्थिर रह सका, क्योंकि वह लगातार वायुमंडल से रस खींचता रहा, न रुका, न हारा। महाकालदेवता के कोड़ों से बचने का भी यही तरीका बताया गया है: हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो, जो स्थिर होकर जम जाता है, वही मृत्यु के करीब पहुँचता है। इसी तरह लेखक कहना चाहते हैं कि जीवन के कोलाहल, संघर्ष और अराजकता के बीच भी हार न मानकर, निरंतर गतिशील और सक्रिय रहते हुए, धैर्यपूर्वक आगे बढ़ते रहना ही असली जिजीविषा (जीने की इच्छा-शक्ति) है।
प्र. “हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!” ऐसा कहकर लेखक ने आत्मबल पर देह-बल के वर्चस्व की वर्तमान सभ्यता के संकट की ओर संकेत किया है। कैसे?
उत्तर: निबंध के अंत में लेखक शिरीष की तुलना गांधीजी से करते हैं, जिन्होंने पाठ-परिचय के अनुसार देह-बल (शारीरिक शक्ति) के ऊपर आत्मबल का महत्त्व सिद्ध किया था। लेखक कहते हैं कि शिरीष रह सका, और अपने देश का वह बूढ़ा (गांधीजी) भी रह सका था, दोनों वायुमंडल से रस खींचकर कोमल और कठोर दोनों बन सके। “हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!” कहकर लेखक गहरी टीस व्यक्त करते हैं। पाठ-परिचय इसे “गांधीवादी मूल्यों के अभाव की पीड़ा” कहता है; लेखक की इस टीस से संकेत मिलता है कि आत्मबल की जगह देह-बल का वर्चस्व बढ़ा है। यह पाठ के संकेत पर आधारित व्याख्या है।
प्र. कवि (साहित्यकार) के लिए अनासक्त योगी की स्थिर प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय, एक साथ आवश्यक है। ऐसा विचार प्रस्तुत कर लेखक ने साहित्य-कर्म के लिए बहुत ऊँचा मानदंड निर्धारित किया है। विस्तारपूर्वक समझाएँ।
उत्तर: लेखक के अनुसार सच्चा कवि (सत्कवि) बनने के लिए दो विपरीत लगने वाले गुणों का एक साथ होना ज़रूरी है: पहला, अनासक्त योगी की स्थिर-प्रज्ञता, यानी सांसारिक चीज़ों से पूरा अलगाव और अविचल बुद्धि; दूसरा, विदग्ध प्रेमी का हृदय, यानी जीवन-रस, संवेदना और सौंदर्य-बोध से भरा हुआ मन। लेखक कालिदास का उदाहरण देते हैं: वे अनासक्त योगी की तरह निर्लिप्त रहकर भी शकुंतला जैसे प्रसंग में इतनी बारीक संवेदनशीलता दिखा सके कि शिरीष पुष्प जैसी छोटी-सी बात भी उनसे छूटी नहीं। यह मानदंड बहुत ऊँचा इसलिए है क्योंकि केवल छंद बना लेने या तुक जोड़ लेने से कोई कवि नहीं बन जाता, जैसा एक सहृदय ने भी कहा था कि हम भी कवि हैं, पर कालिदास जैसे कवि अलग ही श्रेणी के हैं। इस तरह लेखक साहित्य-कर्म के लिए ऊँचा मानदंड रखते हैं: स्थिर-प्रज्ञता और विदग्ध हृदय दोनों एक साथ।
प्र. सर्वग्रासी काल की मार से बचते हुए वही दीर्घजीवी हो सकता है, जिसने अपने व्यवहार में जड़ता छोड़कर नित बदल रही स्थितियों में निरंतर अपनी गतिशीलता बनाए रखी है। पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।
उत्तर: लेखक कहते हैं कि महाकालदेवता निरंतर कोड़े चला रहे हैं: जो जीर्ण और दुर्बल हैं, वे झड़ जाते हैं, और जिनमें प्राणकण थोड़ा भी ऊर्ध्वमुखी (ऊपर उठने वाला) है, वे टिक जाते हैं। जो लोग एक जगह जमे रहने से समय की मार से बचने की उम्मीद रखते हैं, वे मूर्ख और भोले हैं। असली सुरक्षा गतिशीलता में है, हिलते-डुलते रहना, स्थान बदलते रहना, आगे की ओर मुँह किए रहना, तभी कोड़े की मार से बचा जा सकता है। शिरीष के पुराने फल इसी जड़ता के प्रतीक हैं, जो नए फल-पत्ते आने पर भी अपनी जगह जमे रहते हैं और अंततः धकियाकर बाहर निकाल दिए जाते हैं, जबकि शिरीष स्वयं (वायुमंडल से लगातार नया रस खींचकर) निरंतर गतिशील और जीवंत बना रहता है। इसीलिए लेखक कहते हैं: “जमे कि मरे!”
प्र. आशय स्पष्ट कीजिए:
क) दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरंतर चल रहा है। मूर्ख समझते हैं कि जहाँ बने हैं, वहीं देर तक बने रहें तो कालदेवता की आँख बचा पाएँगे। भोले हैं वे। हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो। जमे कि मरे।
ख) जो कवि अनासक्त नहीं रह सका, जो फक्कड़ नहीं बन सका, जो किए-कराए का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया, वह भी क्या कवि है? मैं कहता हूँ कवि बनना है मेरे दोस्तो, तो फक्कड़ बनो।
ग) फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई अँगुली है। वह इशारा है।
उत्तर: क) इसका आशय है कि जीवन-शक्ति (प्राणधारा) और मृत्यु/समय (कालाग्नि) के बीच सतत संघर्ष चलता रहता है। जो लोग यह सोचते हैं कि एक ही जगह टिके रहने से समय की मार से बच जाएँगे, वे मूर्ख हैं, क्योंकि असली सुरक्षा बदलते और आगे बढ़ते रहने में है, स्थिर हो जाना मृत्यु के बराबर है। ख) इसका आशय है कि जो कवि सांसारिक मोह-माया और हिसाब-किताब में उलझ जाता है और मस्त-बेपरवा (फक्कड़) नहीं बन पाता, वह सच्चा कवि नहीं कहला सकता। सच्चा कवि बनने के लिए शिरीष जैसी अनासक्त और बेपरवा मस्ती अपनानी ज़रूरी है। ग) इसका आशय है कि कोई भी वस्तु, फूल हो या पेड़, अपने-आप में अंतिम गंतव्य नहीं होती, बल्कि वह किसी बड़ी, गहरी सच्चाई या मूल्य की ओर संकेत करने वाला माध्यम मात्र होती है, ठीक वैसे ही जैसे राजोद्यान का सिंहद्वार स्वयं गंतव्य न होकर आगे के रास्ते की ओर इशारा करता है।
2 पाठ के आसपास
प्र. शिरीष के पुष्प को शीतपुष्प भी कहा जाता है। ज्येष्ठ माह की प्रचंड गरमी में फूलने वाले फूल को शीतपुष्प संज्ञा किस आधार पर दी गई होगी?
उत्तर: शिरीष के फूल को “शीतपुष्प” (ठंडक देने वाला फूल) इसलिए कहा जाता होगा क्योंकि यह ज्येष्ठ (जेठ) की सबसे प्रचंड गरमी में भी, जब बाकी सब कुछ झुलस रहा होता है, अपनी कोमलता और ताज़गी बनाए रखता है, मानो वह अपने भीतर एक अलग, शीतल संसार समेटे हो। इसकी उपस्थिति ही गरमी के बीच राहत और सुकून का एहसास देती है, इसीलिए भले ही इसका फूलना गरमी के मौसम में हो, इसे “शीत” (ठंडक) से जोड़ा गया होगा।
प्र. कोमल और कठोर दोनों भाव किस प्रकार गांधीजी के व्यक्तित्व की विशेषता बन गए।
उत्तर: गांधीजी अपने स्वभाव और व्यवहार में अत्यंत कोमल थे, अहिंसा, करुणा, क्षमा और प्रेम उनके जीवन-दर्शन का आधार थे। परंतु अपने सिद्धांतों और आत्मबल में वे उतने ही कठोर और अडिग थे, चाहे कितनी भी हिंसा, विरोध या दबाव आया हो, उन्होंने कभी अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया। पाठ में वर्णित मार-काट, अग्निदाह और लूट-पाट के बवंडर के बीच भी वे स्थिर रह सके। इस तरह बाहरी कोमलता और भीतरी दृढ़ता का यह अनोखा संगम ही गांधीजी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता बन गया, ठीक वैसे ही जैसे शिरीष फूल में कोमल फूल और मज़बूत फल एक साथ पाए जाते हैं।
प्र. आजकल अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारतीय फूलों की बहुत माँग है। बहुत से किसान साग-सब्ज़ी व अन्न उत्पादन छोड़ फूलों की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसी मुद्दे को विषय बनाते हुए वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन करें।
उत्तर: यह एक कक्षा-गतिविधि है, विद्यार्थी शिक्षक के मार्गदर्शन में इसे स्वयं आयोजित करें। पक्ष में तर्क: फूलों की खेती से किसानों को अधिक आय, विदेशी मुद्रा अर्जन और रोज़गार के नए अवसर मिलते हैं। विपक्ष में तर्क: खाद्यान्न और सब्ज़ी उत्पादन घटने से खाद्य सुरक्षा को ख़तरा हो सकता है, और फूलों की खेती छोटे व सीमांत किसानों के लिए जोखिम भरी भी हो सकती है। दोनों पक्षों के तर्क सुनकर संतुलित निष्कर्ष निकाला जाए।
प्र. हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने इस पाठ की तरह ही वनस्पतियों के संदर्भ में कई व्यक्तित्व-व्यंजक ललित निबंध और भी लिखे हैं, कुटज, आम फिर बौरा गए, अशोक के फूल, देवदारु आदि। शिक्षक की सहायता से इन्हें ढूँढ़िए और पढ़िए।
उत्तर: यह एक स्वाध्याय-गतिविधि है। विद्यार्थी अपने शिक्षक या पुस्तकालय की सहायता से द्विवेदी जी के इन निबंधों को खोजकर पढ़ें, और देखें कि लेखक हर निबंध में एक अलग पेड़-पौधे के बहाने मनुष्य और समाज की कौन-सी गहरी बात कहते हैं।
प्र. द्विवेदी जी की वनस्पतियों में ऐसी रुचि का क्या कारण हो सकता है? आज साहित्यिक रचना-फलक पर प्रकृति की उपस्थिति न्यून से न्यून होती जा रही है। तब ऐसी रचनाओं का महत्त्व बढ़ गया है। प्रकृति के प्रति आपका दृष्टिकोण रुचिपूर्ण है या उपेक्षामय? इसका मूल्यांकन करें।
उत्तर: द्विवेदी जी की वनस्पतियों में गहरी रुचि का कारण यह हो सकता है कि वे प्रकृति में मानव-जीवन, समाज और दर्शन के गहरे रूपक देखते थे: एक साधारण पेड़ भी उनके लिए मानवीय गुणों (सहनशीलता, अनासक्ति, जिजीविषा) को समझाने का माध्यम बन जाता था। आज के तेज़ी से शहरीकृत होते जीवन में जब साहित्य से प्रकृति का चित्रण घटता जा रहा है, ऐसी रचनाएँ हमें प्रकृति से पुनः जोड़ने और उसमें छिपे जीवन-मूल्यों को पहचानने में मदद करती हैं, इसलिए इनका महत्त्व और बढ़ जाता है। (शेष उत्तर विद्यार्थी अपने व्यक्तिगत अनुभव और दृष्टिकोण के आधार पर स्वयं लिखें।)
3 भाषा की बात
प्र. “दस दिन फूले और फिर खंखड़-खंखड़” इस लोकोक्ति से मिलते-जुलते कई वाक्यांश पाठ में हैं। उन्हें छाँटकर लिखें।
उत्तर: पाठ में इस लोकोक्ति से मिलते-जुलते भाव वाले कुछ वाक्यांश इस प्रकार हैं:
- “दिन दस फूला फूलिके खंखड़ भया पलास!” (कबीर की पंक्ति)
- “ऐसे दुमदारों से तो लँडूरे भले”
- “वह पंद्रह-बीस दिन के लिए फूलता है, वसंत ऋतु के पलाश की भाँति” (आरग्वध के बारे में)
- “यह भी क्या कि दस दिन फूले और फिर खंखड़-के-खंखड़”
- “धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना!” (जो फला, वह झड़ता ही है)
- “जमे कि मरे!” (स्थिर हो जाना अंत के समान है)