श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा / मेरी कल्पना का आदर्श समाज — डॉ. भीमराव आंबेडकर

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इस अध्याय में आप सीखेंगे
  • डॉ. भीमराव आंबेडकर का जीवन-परिचय और उनके भाषण “एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट” (1936) की पृष्ठभूमि बताना
  • जाति-प्रथा को केवल श्रम-विभाजन मानने के तर्क का खंडन आंबेडकर किस क्रम में करते हैं, यह समझाना
  • “श्रम-विभाजन” और “श्रमिकों का विभाजन” के बीच का भेद स्पष्ट रूप से बताना
  • जाति-प्रथा को आर्थिक दृष्टि से हानिकारक क्यों माना गया है, यह तर्क सहित लिखना
  • आंबेडकर के आदर्श-समाज के तीन आधार, स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता (भ्रातृत्व/भाईचारा), को समझाना
  • ‘दासता’ और ‘समता’ की आंबेडकर द्वारा दी गई विशेष परिभाषाओं को अपने शब्दों में लिखना
एनीहिलेशन ऑफ़ कास्टश्रम-विभाजन बनाम श्रमिक-विभाजनदासता की परिभाषास्वतंत्रता-समता-भ्रातृतानियामक सिद्धांतआदर्श समाज

1 लेखक-परिचय: बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर

डॉ. भीमराव आंबेडकर भारतीय संविधान के निर्माताओं में से एक हैं और आधुनिक भारतीय चिंतन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान के अधिकारी हैं। स्वयं दलित जाति में जन्मे आंबेडकर को बचपन से ही जाति-आधारित उत्पीड़न, शोषण और अपमान झेलना पड़ा था। उन्होंने अपना पूरा जीवन दलितों की मुक्ति और सामाजिक समता के संघर्ष के पीछे झोंक दिया।

पाठ के अनुसार वे अपने समय के सबसे सुपठित जनों में से एक थे। उन्होंने संस्कृत का धार्मिक, पौराणिक और पूरा वैदिक वाङ्मय अनुवाद के ज़रिये पढ़ा; वे इतिहास-मीमांसक, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, शिक्षाविद् तथा धर्म-दर्शन के व्याख्याता बनकर उभरे, और स्वदेश में कुछ समय उन्होंने वकालत भी की। उन्होंने अछूतों, स्त्रियों और मज़दूरों को मानवीय अधिकार व सम्मान दिलाने के लिए अथक संघर्ष किया।

चित्र 1: डॉ. भीमराव आंबेडकर, 1950 में लिया गया छायाचित्र (चित्र: Unknown author / Wikimedia Commons / Public Domain)
चित्र 1: डॉ. भीमराव आंबेडकर, 1950 में लिया गया छायाचित्र (चित्र: Unknown author / Wikimedia Commons / Public Domain)
बिंदु विवरण
जन्म 14 अप्रैल, सन् 1891, महू (मध्य प्रदेश)
निधन दिसंबर, सन् 1956, दिल्ली
शिक्षा-पथ प्राथमिक शिक्षा भारत में, बड़ौदा नरेश के प्रोत्साहन पर उच्चतर शिक्षा हेतु न्यूयॉर्क (अमेरिका), फिर लंदन
बौद्ध धर्म ग्रहण 14 अक्तूबर, सन् 1956, 5 लाख अनुयायियों के साथ
प्रमुख रचनाएँ द कास्ट्स इन इंडिया (1917, प्रथम प्रकाशित कृति), द एबोलुशन ऑफ़ प्रोविंशियल फ़ायनांस इन ब्रिटिश इंडिया (पीएच.डी. थीसिस, 1916), एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट (1936), हू आर द शूद्राज़ (1946), द अनटचेबल्स (1948), बुद्धा एंड हिज़ धम्मा (1957)
पत्रिका-संपादन मूक नायक, बहिष्कृत भारत, जनता
हिंदी संकलन “बाबा साहब आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय” नाम से 21 खंडों में, कल्याण मंत्रालय द्वारा प्रकाशित
1

बुद्ध

पाठ के अनुसार जातिवादी उत्पीड़न के कारण हिंदू समाज से मोहभंग होने के बाद वे बुद्ध के समतावादी दर्शन में आश्वस्त हुए और बौद्ध मतानुयायी बने।

2

कबीर

पाठ में आंबेडकर के चिंतन व रचनात्मकता के तीन प्रेरणा-स्रोतों (प्रेरक व्यक्तियों) में नाम।

3

ज्योतिबा फुले

पाठ में आंबेडकर के चिंतन व रचनात्मकता के तीन प्रेरणा-स्रोतों (प्रेरक व्यक्तियों) में नाम।

“मैं पढ़-लिख कर वकील बनूँगा, अछूतों के लिए नया कानून बनाऊँगा और छुआछूत को खत्म करूँगा।”

बचपन की प्रतिज्ञा (उद्धरण): विद्यालय के दिनों में एक अध्यापक के पूछने पर बालक भीमराव का उत्तर

“दासता का सबसे व्यापक व गहन रूप सामाजिक दासता है और उसके उन्मूलन के बिना कोई भी स्वतंत्रता कुछ लोगों का विशेषाधिकार रहेगी, इसलिए अधूरी होगी।”

पाठ की भूमिका का मूल विचार

2 पाठ की पृष्ठभूमि: भाषण से पुस्तिका तक

यहाँ प्रस्तुत दोनों प्रकरण आंबेडकर के विख्यात भाषण एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट (1936) के ललई सिंह यादव द्वारा किए गए हिंदी-रूपांतर “जाति-भेद का उच्छेद” से लिए गए हैं। यह भाषण मूलतः जाति-पाँति तोड़क मंडल (लाहौर) के वार्षिक सम्मेलन (सन् 1936) के अध्यक्षीय भाषण के रूप में तैयार किया गया था।

तैयारअध्यक्षीय भाषण के रूप में लिखा गया
↓
विवादक्रांतिकारी दृष्टि से आयोजकों की पूर्ण सहमति नहीं बनी
↓
स्थगनसम्मेलन ही स्थगित, भाषण पढ़ा नहीं जा सका
↓
प्रकाशनस्वतंत्र पुस्तिका के रूप में स्वयं प्रकाशित, जो लोकप्रिय हुई

पाठ के अनुसार “आज के जाति-मज़हब आधारित विषाक्त सामाजिक-राजनैतिक माहौल में इनकी प्रासंगिकता और बढ़ गई है।”

ध्यान रखें

यहाँ प्रस्तुत दोनों प्रकरण उस पुस्तिका के केवल प्रतिनिधि अंश हैं, पूरा भाषण नहीं।

3 प्रकरण 1: श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा

यह विडंबना की ही बात है कि इस युग में भी ‘जातिवाद’ के पोषकों की कमी नहीं है। इसके पोषक कई आधारों पर इसका समर्थन करते हैं। आंबेडकर सबसे पहले इसी समर्थन के एक आधार को उठाते हैं और उसका क्रमशः खंडन करते हैं।

3.1 जाति-प्रथा के समर्थकों का तर्क

तर्क, जिसका आंबेडकर खंडन करते हैं

आधुनिक सभ्य समाज ‘कार्य-कुशलता’ के लिए श्रम-विभाजन को आवश्यक मानता है, और चूँकि जाति-प्रथा भी श्रम-विभाजन का ही दूसरा रूप है, इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है।

पाठ इसे समर्थन का “एक आधार” कहता है। आंबेडकर इसे चार चरणों में क्रमशः खंडित करते हैं।

3.2 पहला खंडन: श्रम-विभाजन बनाम श्रमिकों का विभाजन

आंबेडकर की एक मूल आपत्ति यह है कि जाति-प्रथा “श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का भी रूप लिए हुए है”, यानी वह श्रम का बँटवारा ही नहीं करती, श्रम करने वाले व्यक्तियों को भी स्थायी रूप से बाँट देती है।

सरल अर्थ 1

श्रम-विभाजन का सरल अर्थ है काम और कार्यों का बँटवारा। पाठ कहता है: “श्रम विभाजन, निश्चय ही सभ्य समाज की आवश्यकता है”।

सरल अर्थ 2

श्रमिकों का विभाजन व्यक्तियों को स्वयं स्थायी, जन्म-आधारित वर्गों में बाँट देना है, चाहे वे कोई भी काम करें। पाठ के अनुसार किसी भी सभ्य समाज में श्रम विभाजन की व्यवस्था श्रमिकों का विभिन्न वर्गों में अस्वाभाविक विभाजन नहीं करती; जाति-प्रथा यह भी करती है।

श्रम-विभाजन (हर सभ्य समाज में)

  • काम का बँटवारा होता है, व्यक्ति का नहीं
  • व्यक्ति अपनी क्षमता व रुचि के अनुसार काम बदल सकता है
  • अलग-अलग काम करने वालों में ऊँच-नीच का दर्जा नहीं दिया जाता

जाति-प्रथा (श्रमिकों का विभाजन)

  • व्यक्तियों को स्वयं जन्म से स्थायी वर्गों में बाँट दिया जाता है
  • व्यक्ति अपनी इच्छा से पेशा नहीं बदल सकता
  • विभाजित वर्गों को एक-दूसरे की तुलना में ऊँच-नीच भी घोषित किया जाता है
आम ग़लती

यह मत लिखें कि “आंबेडकर श्रम-विभाजन का विरोध करते हैं।” वे श्रम-विभाजन को सभ्य समाज की आवश्यकता ही मानते हैं। उनकी आपत्ति यह है कि जाति-प्रथा श्रम-विभाजन के साथ-साथ श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन भी करती है, और उस पर ऊँच-नीच का दर्जा भी थोपती है: भारत की जाति-प्रथा में ये दोनों दोष एक साथ हैं, और पाठ के अनुसार ऊँच-नीच करार देने वाली यह बात “विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता”।

3.3 दूसरा खंडन: पेशा रुचि पर नहीं, जन्म पर आधारित

आंबेडकर आगे कहते हैं कि जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन मान भी लिया जाए, तो भी यह स्वाभाविक विभाजन नहीं है, क्योंकि यह व्यक्ति की अपनी रुचि पर आधारित नहीं है।

  • कुशल और सक्षम श्रमिक-समाज बनाने के लिए ज़रूरी है कि व्यक्ति की क्षमता इतनी विकसित हो कि वह अपना पेशा स्वयं चुन सके
  • जाति-प्रथा का सिद्धांत इसके ठीक विपरीत है: व्यक्ति के प्रशिक्षण या निजी क्षमता का कोई विचार नहीं किया जाता
  • इसके बदले माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार, गर्भधारण के समय से ही व्यक्ति का पेशा निर्धारित कर दिया जाता है

3.4 तीसरा खंडन: जीवन-भर की बाध्यता और बेरोज़गारी

जाति-प्रथा पेशे का दोषपूर्ण पूर्व-निर्धारण ही नहीं करती, बल्कि मनुष्य को जीवन-भर उसी एक पेशे में भी बाँध देती है, भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए।

  • आधुनिक युग में उद्योग-तकनीक में निरंतर, कभी-कभी अकस्मात परिवर्तन होते रहते हैं
  • ऐसे में मनुष्य को कभी-कभी अपना पेशा बदलने की ज़रूरत पड़ सकती है
  • पर हिंदू धर्म की जाति-प्रथा किसी को भी अपने पैतृक पेशे से अलग पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती, भले ही वह उसमें पारंगत क्यों न हो

“इस प्रकार पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति-प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है।”

आंबेडकर का सीधा निष्कर्ष

3.5 चौथा खंडन: आर्थिक दृष्टि से हानि

जाति का श्रम-विभाजन मनुष्य की अपनी इच्छा (स्वेच्छा) पर निर्भर नहीं रहता। इसमें व्यक्तिगत भावना या रुचि का कोई स्थान नहीं होता, ‘पूर्व लेख’ ही इसका आधार है। पाठ के अनुसार आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न उतनी बड़ी समस्या नहीं, जितनी यह कि बहुत-से लोग ‘निर्धारित’ कार्य ‘अरुचि’ के साथ केवल विवशतावश करते हैं।

कारणबहुत-से लोग ‘निर्धारित’ कार्य को ‘अरुचि’ के साथ केवल विवशतावश करते हैं
↓
परिणाम 1ऐसी स्थिति मनुष्य को दुर्भावना, टालू और कम काम करने के लिए प्रेरित करती है
↓
परिणाम 2जहाँ काम करने वालों का न दिल लगे न दिमाग़, वहाँ कोई कुशलता कैसे प्राप्त की जा सकती है, यह प्रश्न ही खड़ा होता है

“जाति-प्रथा हानिकारक प्रथा है। क्योंकि यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणारुचि व आत्म-शक्ति को दबा कर उन्हें अस्वाभाविक नियमों में जकड़ कर निष्क्रिय बना देती है।”

प्रकरण 1 का आर्थिक निष्कर्ष

परीक्षा संकेत

“जाति-प्रथा श्रम-विभाजन का ही दूसरा रूप है”: इस तर्क पर आंबेडकर के खंडन के बिंदु चार अलग-अलग बिंदुओं में लिखें: (1) श्रम-विभाजन के साथ-साथ श्रमिकों का अस्वाभाविक व ऊँच-नीच वाला विभाजन, (2) रुचि पर आधारित न होना, (3) जीवन-भर की बाध्यता व बेरोज़गारी, (4) स्वेच्छा का अभाव व आर्थिक हानि।

4 प्रकरण 2: मेरी कल्पना का आदर्श-समाज

जाति-प्रथा के खेदजनक परिणामों की नीरस गाथा सुनने के बाद स्वाभाविक प्रश्न उठता है: यदि आंबेडकर जातियों के विरुद्ध हैं, तो उनकी दृष्टि में आदर्श-समाज क्या है? आंबेडकर का उत्तर तीन आधार-स्तंभों पर टिका है।

1

स्वतंत्रता (Liberty)

जीवन, शारीरिक सुरक्षा और संपत्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ अपना पेशा चुनने की स्वतंत्रता भी।

2

समता (Equality)

असमान क्षमताओं के बावजूद, जो असमानता व्यक्ति के अपने वश में नहीं, वहाँ समान व्यवहार का सिद्धांत।

3

भ्रातृता (Fraternity)

भाईचारा, यानी सामूहिक जीवनचर्या और परस्पर श्रद्धा-सम्मान की रीति, जो लोकतंत्र का असली अर्थ है।

शब्द ध्यान से पढ़ें

आंबेडकर स्वयं अपने शब्दों में तीसरे आधार के लिए “भ्रातृता” शब्द का प्रयोग करते हैं (“…समता, भ्रातृता पर आधारित होगा”)। सामान्य हिंदी में इसे “भ्रातृत्व” या “भाईचारा” भी कहा जाता है, और पाठ की भूमिका (परिचय) में स्वयं इसके लिए “बंधुता” शब्द प्रयुक्त हुआ है। ये सब एक ही भाव के अलग-अलग नाम हैं। पाठ में तीसरे आधार के लिए ‘भ्रातृता’ शब्द प्रयुक्त है (“…समता, भ्रातृता पर आधारित होगा”), और NCERT प्रश्न 6 इसी शब्द पर आधारित है।

4.1 भ्रातृता: लोकतंत्र का असली अर्थ

आंबेडकर के अनुसार किसी भी आदर्श-समाज में इतनी गतिशीलता होनी चाहिए कि कोई भी वांछित परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे तक संचारित हो सके। ऐसे समाज के बहुविध हितों में सबका भाग होना चाहिए, और सबको उनकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए। सामाजिक जीवन में अबाध संपर्क के अनेक साधन और अवसर उपलब्ध होने चाहिए।

“दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का यही वास्तविक रूप है।”

भ्रातृता की उपमा

Learn by heartपरिभाषा 1

लोकतंत्र (Democracy) केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं है, यह मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है। इसमें अपने साथियों के प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव ज़रूरी है।

आंबेडकर स्पष्ट कहते हैं कि भाईचारे का यही दूसरा नाम लोकतंत्र है, यानी भ्रातृता और लोकतंत्र दोनों एक ही विचार के दो नाम हैं।

4.2 स्वतंत्रता: पेशा-चयन तक विस्तार

गमनागमन की स्वाधीनता, जीवन तथा शारीरिक सुरक्षा की स्वाधीनता, संपत्ति के अधिकार और जीविकोपार्जन के लिए आवश्यक औज़ार-सामग्री रखने के अधिकार पर शायद ही किसी को आपत्ति हो। पर मनुष्य की शक्ति के सक्षम और प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता, यानी अपना व्यवसाय स्वयं चुनने की स्वतंत्रता, को देने में जाति-प्रथा के समर्थक हिचकते हैं।

Learn by heartपरिभाषा 2

दासता (Slavery) केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता। इसमें वह स्थिति भी सम्मिलित है जिससे कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है, भले ही कोई कानूनी बंधन न हो।

आंबेडकर इसी परिभाषा से जाति-प्रथा पर सीधा प्रहार करते हैं: जाति-प्रथा जैसे वर्गों में जहाँ कुछ लोगों को अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशे अपनाने पड़ते हैं, वहाँ कोई क़ानूनी बंधन न होने पर भी यह स्थिति ‘दासता’ ही है।

4.3 समता: तीन आधार और एक निर्णायक भेद

पाठ के अनुसार फ्रांसीसी क्रांति के नारे में ‘समता’ शब्द ही विवाद का विषय रहा है। ‘समता’ पर आपत्ति करने वाले कहते हैं कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते, और आंबेडकर मानते हैं कि इस तर्क में वज़न है। पर वे यह भी कहते हैं कि ‘समता’ शाब्दिक अर्थ में असंभव होते हुए भी एक नियामक सिद्धांत (regulative principle) है, यानी यह हर मामले में शब्दशः सच न होकर भी व्यवहार की एक सही दिशा तय करती है।

क्रम मनुष्य की क्षमता का आधार व्यक्ति के अपने वश में?
1 शारीरिक वंश-परंपरा नहीं
2 सामाजिक उत्तराधिकार (माता-पिता की कल्याण-कामना, शिक्षा, वैज्ञानिक ज्ञानार्जन) नहीं
3 मनुष्य का अपना प्रयत्न हाँ
Learn by heartपरिभाषा 3

समता (Equality, नियामक सिद्धांत के रूप में): मनुष्यों की क्षमता तीन आधारों (शारीरिक वंश-परंपरा, सामाजिक उत्तराधिकार, अपना प्रयत्न) पर निर्भर होने से मनुष्य असमान हैं, फिर भी समाज को हर व्यक्ति के साथ यथासंभव समान व्यवहार करने के आदर्श की ओर बढ़ना चाहिए।

आंबेडकर का निर्णायक भेद यहीं है: तीसरे आधार (अपना प्रयत्न) पर असमान व्यवहार अनुचित नहीं, और हर व्यक्ति को अपनी क्षमता विकसित करने का पूरा प्रोत्साहन मिलना चाहिए। पर पहले दो आधारों (वंश-परंपरा, सामाजिक उत्तराधिकार) पर असमान व्यवहार नितांत अनुचित है, क्योंकि ये व्यक्ति के अपने वश में नहीं हैं।

इसका कारण भी पाठ देता है: उत्तम व्यवहार के हक की प्रतियोगिता में वे लोग निश्चय ही बाज़ी मार ले जाएँगे, जिन्हें उत्तम कुल, शिक्षा, पारिवारिक ख्याति, पैतृक संपदा तथा व्यवसायिक प्रतिष्ठा का लाभ प्राप्त है। ऐसे सुविधा-संपन्नों को ही ‘उत्तम व्यवहार’ का हकदार मानना निष्पक्ष निर्णय नहीं कहा जा सकता। इसलिए समाज को अपने सदस्यों को आरंभ से ही समान अवसर एवं समान व्यवहार उपलब्ध कराने चाहिए।

आम ग़लती

यह मत लिखें कि आंबेडकर के अनुसार “सभी मनुष्य वास्तव में बराबर हैं।” वे स्वयं मानते हैं कि तीन आधारों पर मनुष्य असमान हैं। उनका तर्क यह है कि जिन आधारों पर व्यक्ति का अपना नियंत्रण नहीं (वंश-परंपरा, सामाजिक उत्तराधिकार), उन पर असमान व्यवहार अनुचित है, केवल इतना ही।

आंबेडकर ‘समता’ का एक और, व्यावहारिक आधार भी देते हैं: एक राजनीतिज्ञ को बहुत बड़ी जनसंख्या से व्यवहार करना पड़ता है। उसके पास न इतना समय होता है, न इतनी जानकारी, कि वह हर व्यक्ति की अलग-अलग आवश्यकता और क्षमता के अनुसार अलग व्यवहार कर सके। साथ ही ‘मानवता’ के दृष्टिकोण से समाज को दो वर्गों व श्रेणियों में नहीं बाँटा जा सकता। इसलिए राजनीतिज्ञ के सामने एक ही व्यवहार्य सिद्धांत बचता है: सबके साथ समान व्यवहार किया जाए।

“राजनीतिज्ञ यह व्यवहार इसलिए नहीं करता कि सब लोग समान होते, बल्कि इसलिए कि वर्गीकरण एवं श्रेणीकरण संभव होता।”

समता के व्यावहारिक आधार पर, पाठ की मूल पंक्ति

“इस प्रकार ‘समता’ यद्यपि काल्पनिक जगत की वस्तु है, फिर भी राजनीतिज्ञ को सभी परिस्थितियों को दृष्टि में रखते हुए, उसके लिए यही मार्ग भी रहता है, क्योंकि यही व्यावहारिक भी है और यही उसके व्यवहार की एकमात्र कसौटी भी है।”

प्रकरण 2 का समापन-कथन

5 पाठ से जुड़े नामित संदर्भ

  • “पाठ के आसपास” में आंबेडकर के पेशे-में-लचीलेपन-के-अभाव वाले तर्क को शेखर जोशी की कहानी “गलता लोहा” से जोड़कर पुनर्विचार करने को कहा गया है
  • “इन्हें भी जानें” में आंबेडकर की पुस्तक “जातिभेद का उच्छेद” और इस विषय पर गांधी जी के साथ हुए उनके संवाद के बारे में जानने का सुझाव है
  • गांधी जी की पुस्तक “हिंद स्वराज” में दी गई आदर्श-समाज की कल्पना को भी पढ़ने का सुझाव दिया गया है

ये तीनों केवल आगे पढ़ने के सुझाव हैं, आंबेडकर के अपने तर्क का हिस्सा नहीं।

6 परीक्षा हेतु मुख्य बिंदु

3आदर्श समाज के आधार: स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता
4श्रम-विभाजन विरुद्ध जाति-प्रथा के तर्क-बिंदु
1936के सम्मेलन के लिए तैयार मूल भाषण, जो पढ़ा नहीं जा सका
परीक्षा से पहले स्वयं जाँचें
  • क्या मैं “श्रम-विभाजन” और “श्रमिकों का विभाजन” का भेद बिना देखे समझा सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं जाति-प्रथा के विरुद्ध आंबेडकर के चारों तर्क क्रम में लिख सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं ‘दासता’ की आंबेडकर द्वारा दी गई विशेष परिभाषा लिख सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं आदर्श-समाज के तीनों आधार और भ्रातृता-लोकतंत्र का संबंध बता सकता/सकती हूँ?
  • क्या मैं समता को नियामक सिद्धांत मानने के पीछे का भेद (वंश-परंपरा/उत्तराधिकार बनाम अपना प्रयत्न) समझा सकता/सकती हूँ?
त्वरित पुनरीक्षण: परीक्षा से पहले यही पढ़ें
  • यह पाठ आंबेडकर के भाषण “एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट” (1936) के हिंदी-रूपांतर “जाति-भेद का उच्छेद” के दो प्रकरण हैं, पूरा भाषण नहीं
  • यह भाषण जाति-पाँति तोड़क मंडल, लाहौर के सम्मेलन के लिए तैयार हुआ था, पर सम्मेलन स्थगित होने से पढ़ा नहीं जा सका, बाद में पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुआ
  • प्रकरण 1: जाति-प्रथा श्रम-विभाजन के साथ-साथ श्रमिकों का अस्वाभाविक और ऊँच-नीच वाला विभाजन भी है
  • पेशा रुचि पर नहीं, माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार गर्भधारण के समय से ही तय कर दिया जाता है
  • पैतृक पेशे से बंधे रहने की बाध्यता जाति-प्रथा को भारत में बेरोज़गारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनाती है
  • स्वेच्छा और रुचि के अभाव में कुशलता कैसे आए, यह प्रश्न उठता है, इसलिए जाति-प्रथा आर्थिक दृष्टि से भी हानिकारक है
  • प्रकरण 2: आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता (भ्रातृत्व/भाईचारा; पाठ की भूमिका में “बंधुता”) पर आधारित होना चाहिए
  • भ्रातृता ही लोकतंत्र का असली अर्थ है: सामूहिक जीवनचर्या और सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान की रीति
  • स्वतंत्रता का विस्तार अपना पेशा चुनने तक होना चाहिए; इससे इनकार करना ‘दासता’ है, भले ही कोई क़ानूनी बंधन न हो
  • समता एक नियामक सिद्धांत है: अपने प्रयत्न पर आधारित असमान व्यवहार उचित है, वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार पर आधारित असमान व्यवहार अनुचित है