इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म कब और कहाँ हुआ?
उत्तर: डॉ. भीमराव आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, सन् 1891 को महू (मध्य प्रदेश) में हुआ।
प्र. आंबेडकर के चिंतन के तीन प्रमुख प्रेरक व्यक्ति कौन थे?
उत्तर: आंबेडकर के चिंतन व रचनात्मकता के तीन प्रमुख प्रेरक व्यक्ति बुद्ध, कबीर और ज्योतिबा फुले थे।
प्र. प्रस्तुत पाठ आंबेडकर के किस भाषण से लिया गया है?
उत्तर: प्रस्तुत पाठ आंबेडकर के भाषण ‘एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ (1936) के ललई सिंह यादव द्वारा किए गए हिंदी-रूपांतर ‘जाति-भेद का उच्छेद’ से लिया गया है।
प्र. आंबेडकर के अनुसार आदर्श-समाज के तीन आधार क्या हैं?
उत्तर: आंबेडकर के अनुसार आदर्श-समाज स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता, तीन आधारों पर टिका होना चाहिए।
प्र. आंबेडकर के अनुसार भाईचारे का दूसरा नाम क्या है?
उत्तर: आंबेडकर के अनुसार भाईचारे का दूसरा नाम लोकतंत्र है, क्योंकि लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति है।
प्र. जाति-प्रथा के समर्थक इसे उचित ठहराने के लिए कौन-सा मुख्य तर्क देते हैं?
उत्तर: समर्थकों का तर्क है कि आधुनिक सभ्य समाज कार्य-कुशलता के लिए श्रम-विभाजन को आवश्यक मानता है, और जाति-प्रथा भी उसी का एक रूप है, इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. ‘श्रम-विभाजन’ और ‘श्रमिकों का विभाजन’ में क्या अंतर है?
उत्तर: श्रम-विभाजन काम और कार्यों का बँटवारा है, जो हर सभ्य समाज की आवश्यकता है और दोषपूर्ण नहीं। श्रमिकों का विभाजन व्यक्तियों को स्वयं स्थायी, जन्म-आधारित वर्गों में बाँट देना है, जो जाति-प्रथा करती है, और यह साधारण श्रम-विभाजन से आगे की बात है।
प्र. भारत की जाति-प्रथा की वह कौन-सी विशेषता है जो विश्व में कहीं और नहीं पाई जाती?
उत्तर: भारत की जाति-प्रथा विभाजित वर्गों को अस्वाभाविक ढंग से बाँटने के अतिरिक्त उन्हें एक-दूसरे की तुलना में ऊँच-नीच भी घोषित करती है। यह ऊँच-नीच का क्रम (सोपानीकरण) पाठ के अनुसार “विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता”।
प्र. आंबेडकर के अनुसार जाति-प्रथा में व्यक्ति का पेशा किस आधार पर तय होता है?
उत्तर: जाति-प्रथा में व्यक्ति के प्रशिक्षण या निजी क्षमता का कोई विचार नहीं किया जाता। इसके बदले माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार, गर्भधारण के समय से ही व्यक्ति का पेशा निर्धारित कर दिया जाता है।
प्र. आंबेडकर ‘दासता’ की परिभाषा को कैसे विस्तृत करते हैं?
उत्तर: आंबेडकर के अनुसार ‘दासता’ केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता। इसमें वह स्थिति भी सम्मिलित है जिससे कुछ व्यक्तियों को दूसरों द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है, भले ही कोई क़ानूनी बंधन न हो।
प्र. मनुष्य की क्षमता किन तीन आधारों पर निर्भर करती है?
उत्तर: मनुष्य की क्षमता तीन आधारों पर निर्भर करती है: (1) शारीरिक वंश-परंपरा, (2) सामाजिक उत्तराधिकार (माता-पिता की कल्याण-कामना, शिक्षा, वैज्ञानिक ज्ञानार्जन), (3) मनुष्य का अपना प्रयत्न।
प्र. आंबेडकर के भाषण के साथ सम्मेलन में क्या हुआ था?
उत्तर: यह भाषण जाति-पाँति तोड़क मंडल, लाहौर के सन् 1936 के वार्षिक सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण के रूप में तैयार हुआ था, पर इसकी क्रांतिकारी दृष्टि से आयोजकों की पूर्ण सहमति न बनने के कारण सम्मेलन ही स्थगित हो गया और भाषण पढ़ा नहीं जा सका।
प्र. भ्रातृता की व्याख्या में आंबेडकर किस उपमा का प्रयोग करते हैं?
उत्तर: आंबेडकर भाईचारे की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का यही वास्तविक रूप है, यानी समाज के सभी सदस्यों के बीच इतना घुला-मिला संबंध होना चाहिए कि वे अलग करने योग्य ही न रहें।
प्र. आंबेडकर ‘समता’ का व्यावहारिक/राजनीतिक आधार क्या देते हैं?
उत्तर: राजनीतिज्ञ को बहुत बड़ी जनसंख्या से व्यवहार करना पड़ता है, जिसके पास इतना समय या जानकारी नहीं होती कि हर व्यक्ति की अलग आवश्यकता के अनुसार अलग व्यवहार कर सके। साथ ही ‘मानवता’ के दृष्टिकोण से समाज दो वर्गों व श्रेणियों में नहीं बाँटा जा सकता। इसलिए उसका व्यवहार्य सिद्धांत यही होता है कि सब मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाए; पाठ के शब्दों में, “राजनीतिज्ञ यह व्यवहार इसलिए नहीं करता कि सब लोग समान होते, बल्कि इसलिए कि वर्गीकरण एवं श्रेणीकरण संभव होता।”
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं?
उत्तर: आंबेडकर चार क्रमिक तर्क देते हैं। पहला, जाति-प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का भी रूप लिए हुए है: वह श्रमिकों को भी स्थायी, अस्वाभाविक वर्गों में बाँटती है, और उन वर्गों को ऊँच-नीच भी घोषित करती है, जो विश्व में कहीं और नहीं मिलता। दूसरा, यह विभाजन व्यक्ति की रुचि पर नहीं, बल्कि माता-पिता के सामाजिक स्तर के अनुसार गर्भधारण के समय से ही तय पेशे पर आधारित है। तीसरा, यह व्यक्ति को जीवन-भर उसी पेशे में बाँध देती है, भले ही वह भूखों मर जाए, और पेशा-परिवर्तन की अनुमति न देकर भारत में बेरोज़गारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है। चौथा, यह मनुष्य की स्वेच्छा और रुचि को दबाकर आर्थिक दृष्टि से भी हानिकारक साबित होती है।
प्र. जाति प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी व भुखमरी का भी एक कारण कैसे बनती रही है? क्या यह स्थिति आज भी है?
उत्तर: जाति-प्रथा किसी व्यक्ति को उसके पैतृक पेशे से अलग पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती, भले ही वह उसमें पारंगत क्यों न हो। आधुनिक युग में उद्योग-तकनीक में निरंतर और कभी-कभी अकस्मात परिवर्तन होते रहते हैं, जिससे पेशा बदलने की ज़रूरत पड़ती है। पर पेशा बदलने की स्वतंत्रता न होने पर भूखों मरने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। इस तरह पेशा-परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति-प्रथा भारत में बेरोज़गारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है। आज की स्थिति पर पाठ स्वयं कहता है कि “आधुनिक युग में यह स्थिति प्रायः आती है”। (पाठ से बाहर का संदर्भ: आज कानूनी रूप से पेशा-चयन की स्वतंत्रता है।) फिर भी सामाजिक स्तर पर जातिगत पूर्वाग्रह और सीमित अवसर आज भी कुछ हद तक यह असर बनाए रखते हैं।
प्र. लेखक के मत से ‘दासता’ की व्यापक परिभाषा क्या है?
उत्तर: आंबेडकर के अनुसार ‘दासता’ केवल कानूनी पराधीनता तक सीमित नहीं है। इसमें वह स्थिति भी शामिल है जिसमें कुछ व्यक्तियों को दूसरों द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है, भले ही उन पर कोई क़ानूनी बंधन न हो। जाति-प्रथा जैसे वर्गों में जहाँ लोगों को अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशे अपनाने पड़ते हैं, वह स्थिति भी इसी व्यापक अर्थ में ‘दासता’ है, भले ही उस पर कोई क़ानूनी बंधन न हो।
प्र. शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद आंबेडकर ‘समता’ को एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह क्यों करते हैं? इसके पीछे उनके क्या तर्क हैं?
उत्तर: आंबेडकर मानते हैं कि मनुष्य शारीरिक वंश-परंपरा, सामाजिक उत्तराधिकार और अपने प्रयत्न, तीन आधारों पर असमान हैं। पर वे भेद करते हैं: व्यक्ति के अपने प्रयत्न पर आधारित असमान व्यवहार अनुचित नहीं, क्योंकि यह उसके अपने वश में है। पर वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार जैसे आधार व्यक्ति के वश में नहीं हैं, इसलिए इन पर असमान व्यवहार नितांत अनुचित है। उत्तम कुल, शिक्षा, पारिवारिक ख्याति, पैतृक संपदा और व्यवसायिक प्रतिष्ठा वाले ही ‘उत्तम व्यवहार’ की प्रतियोगिता में बाज़ी मार ले जाएँगे, इसलिए समाज को सदस्यों को आरंभ से ही समान अवसर एवं समान व्यवहार देना चाहिए। साथ ही, राजनीतिज्ञ के पास इतना समय या जानकारी नहीं होती कि हर व्यक्ति की अलग-अलग क्षमता के अनुसार अलग व्यवहार कर सके, और ‘मानवता’ के दृष्टिकोण से समाज दो वर्गों व श्रेणियों में नहीं बाँटा जा सकता; इसलिए सबके साथ समान व्यवहार ही व्यवहार्य सिद्धांत है। इसीलिए ‘समता’ शाब्दिक रूप से असंभव होते हुए भी एक नियामक सिद्धांत के रूप में अपनाने योग्य है।
प्र. आंबेडकर के अनुसार स्वतंत्रता का दायरा जीवन और संपत्ति की सुरक्षा तक ही सीमित क्यों नहीं रहना चाहिए?
उत्तर: आंबेडकर मानते हैं कि गमनागमन, जीवन-शारीरिक सुरक्षा और संपत्ति के अधिकार जैसी स्वतंत्रताओं पर शायद ही किसी को आपत्ति हो। पर वे तर्क देते हैं कि मनुष्य की शक्ति के सक्षम और प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता, यानी अपना व्यवसाय स्वयं चुनने की स्वतंत्रता भी उतनी ही ज़रूरी है। इस स्वतंत्रता से इनकार करना व्यक्ति को ‘दासता’ में जकड़ना है, क्योंकि ‘दासता’ का अर्थ केवल कानूनी पराधीनता नहीं, बल्कि दूसरों द्वारा निर्धारित व्यवहार का पालन करने की विवशता भी है। जाति-प्रथा के पोषक यह स्वतंत्रता देने के लिए जल्दी तैयार नहीं होंगे, क्योंकि इसका अर्थ होगा अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता।
प्र. आंबेडकर के अनुसार जाति-प्रथा आर्थिक दृष्टि से किस प्रकार हानिकारक है?
उत्तर: जाति का श्रम-विभाजन मनुष्य की अपनी इच्छा (स्वेच्छा) पर निर्भर नहीं रहता, इसमें व्यक्तिगत भावना या रुचि का कोई स्थान नहीं होता, ‘पूर्व लेख’ ही इसका आधार है। इससे बहुत-से लोग ‘निर्धारित’ कार्य को ‘अरुचि’ के साथ केवल विवशतावश करते हैं, जो दुर्भावना और टालू काम की प्रवृत्ति बढ़ाता है। जहाँ काम करने वालों का न दिल लगे न दिमाग़, वहाँ कुशलता प्राप्त करना कठिन है (पाठ का प्रश्न: “कोई कुशलता कैसे प्राप्त की जा सकती है”)। इसीलिए जाति-प्रथा आर्थिक दृष्टि से हानिकारक है, क्योंकि यह मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणा-रुचि और आत्म-शक्ति को दबाकर उसे निष्क्रिय बना देती है।
प्र. ‘भ्रातृता’ और ‘लोकतंत्र’ के बीच आंबेडकर क्या संबंध बताते हैं?
उत्तर: आंबेडकर के अनुसार आदर्श-समाज में इतनी गतिशीलता होनी चाहिए कि कोई भी वांछित परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे तक संचारित हो सके, समाज के हितों में सबका भाग हो और सामाजिक जीवन में अबाध संपर्क के साधन उपलब्ध हों। यही भाईचारे का वास्तविक रूप है, जिसकी तुलना वे दूध-पानी के मिश्रण से करते हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि इसी भाईचारे का दूसरा नाम लोकतंत्र है, क्योंकि लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति नहीं, बल्कि सामूहिक जीवनचर्या की रीति और समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है, जिसमें साथियों के प्रति श्रद्धा-सम्मान का भाव ज़रूरी है।
प्र. आंबेडकर ने अपना भाषण जाति-पाँति तोड़क मंडल के सम्मेलन के लिए तैयार किया था, पर वह वहाँ पढ़ा नहीं जा सका, ऐसा क्यों हुआ, और बाद में क्या हुआ?
उत्तर: यह भाषण जाति-पाँति तोड़क मंडल (लाहौर) के सन् 1936 के वार्षिक सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण के रूप में तैयार किया गया था। पर भाषण की क्रांतिकारी दृष्टि से सम्मेलन के आयोजकों की पूर्ण सहमति नहीं बन पाई, जिसके कारण सम्मेलन ही स्थगित हो गया और भाषण पढ़ा नहीं जा सका। बाद में आंबेडकर ने इसे स्वतंत्र पुस्तिका के रूप में स्वयं प्रकाशित और वितरित किया, जो पर्याप्त लोकप्रिय हुई। यहाँ प्रस्तुत दोनों प्रकरण उसी पुस्तिका के प्रतिनिधि अंश हैं।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. सही में आंबेडकर ने भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के तहत जातिवाद का उन्मूलन चाहा है, जिसकी प्रतिष्ठा के लिए भौतिक स्थितियों और जीवन-सुविधाओं का तर्क दिया है। क्या इससे आप सहमत हैं?
उत्तर: हाँ, यह कहना उचित है। आंबेडकर जातिवाद के विरुद्ध केवल भावनात्मक अपील नहीं करते, बल्कि ठोस भौतिक तर्क भी देते हैं: जाति-प्रथा श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन करती है, पेशा जन्म-आधारित तय करके व्यक्ति की क्षमता को कुंठित करती है, पेशा-परिवर्तन रोककर बेरोज़गारी बढ़ाती है, और रुचि-विहीन बाध्य श्रम से आर्थिक उत्पादकता घटाती है। साथ ही वे ‘दासता’ और ‘समता’ की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि ‘मानवता’ के दृष्टिकोण से समाज दो वर्गों व श्रेणियों में नहीं बाँटा जा सकता। इस तरह उनका तर्क भावनात्मक न्याय और भौतिक व्यावहारिकता, दोनों को जोड़ता है, जो उनके तर्क को अधिक ठोस व प्रभावी बनाता है, इसलिए इस कथन से सहमत हुआ जा सकता है।
प्र. आदर्श समाज के तीन तत्त्वों में से एक ‘भ्रातृता’ को रखकर लेखक ने अपने आदर्श समाज में स्त्रियों को भी सम्मिलित किया है अथवा नहीं? आप इस ‘भ्रातृता’ शब्द से कहाँ तक सहमत हैं? यदि नहीं तो आप क्या शब्द उचित समझेंगे/समझेंगी?
उत्तर: आंबेडकर ‘भ्रातृता’ (भाईचारे) का वास्तविक रूप दूध-पानी के मिश्रण जैसा बताते हैं, भाईचारे को लोकतंत्र का दूसरा नाम बताते हैं, और लोकतंत्र को सामूहिक जीवनचर्या की रीति कहते हैं। यह शब्द ‘भाई’ से जुड़ा होने पर भी समाज के हर सदस्य की भागीदारी की बात करता है (“ऐसे समाज के बहुविधि हितों में सबका भाग होना चाहिए”)। पाठ में स्त्रियों का अलग से उल्लेख नहीं है; उन्हें इसमें मानना ‘सबका’ शब्द की व्याख्या है, लेखक की स्पष्ट घोषणा नहीं। फिर भी, आज की भाषा-संवेदनशीलता को देखते हुए ‘भ्रातृता’ शब्द में लिंग-विशिष्टता का आभास होना स्वाभाविक है। पाठ की भूमिका (परिचय) में इसी भाव के लिए ‘बंधुता’ शब्द पहले से मौजूद है, जो एक स्वाभाविक व अधिक समावेशी विकल्प है; इसके अतिरिक्त ‘सामाजिक सौहार्द’ जैसा शब्द भी उचित हो सकता है, जो अर्थ को बिना बदले लिंग-निरपेक्षता को और स्पष्ट करता है।
प्र. आंबेडकर ने जाति प्रथा के भीतर पेशे के मामले में लचीलापन न होने की जो बात की है, उसे स्पष्ट कीजिए। क्या यह समस्या आज के भारत में पूरी तरह समाप्त हो चुकी है?
उत्तर: आंबेडकर के अनुसार जाति-प्रथा व्यक्ति को जीवन-भर पैतृक पेशे में बाँध देती है, भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए। आधुनिक युग में उद्योग-तकनीक में निरंतर बदलाव के कारण पेशा बदलने की ज़रूरत पड़ सकती है, पर जाति-प्रथा इसकी अनुमति नहीं देती, भले ही व्यक्ति नए पेशे में पारंगत हो। इस तरह पेशा-परिवर्तन पर रोक जाति-प्रथा को भारत में बेरोज़गारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनाती है। आज के बारे में पाठ स्वयं कहता है कि “आधुनिक युग में यह स्थिति प्रायः आती है”, इसलिए इसे पूरी तरह समाप्त मानना उचित नहीं। (पाठ से बाहर का संदर्भ: आज संविधान पेशा-चयन की क़ानूनी स्वतंत्रता देता है।)
प्र. आंबेडकर के आदर्श-समाज की संकल्पना (स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता) का वर्णन करते हुए बताइए कि यह जाति-प्रथा की व्यवस्था से किस प्रकार मौलिक रूप से भिन्न है।
उत्तर: आंबेडकर का आदर्श-समाज स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता, तीन आधार-स्तंभों पर टिका है। स्वतंत्रता में वे जीवन, संपत्ति की सुरक्षा से आगे बढ़कर अपना पेशा स्वयं चुनने की स्वतंत्रता को शामिल करते हैं। समता में वे मानते हैं कि मनुष्य वंश-परंपरा, सामाजिक उत्तराधिकार और अपने प्रयत्न में असमान होते हुए भी, जिन आधारों पर व्यक्ति का नियंत्रण नहीं, वहाँ समान व्यवहार होना चाहिए। भ्रातृता में वे सामूहिक जीवनचर्या, अबाध संपर्क और परस्पर सम्मान की रीति को लोकतंत्र का असली अर्थ बताते हैं। यह जाति-प्रथा से मौलिक रूप से भिन्न है, क्योंकि जाति-प्रथा व्यक्ति की पेशा-स्वतंत्रता छीनती है, वंश-परंपरा के आधार पर स्थायी असमान दर्जा देती है, और विभाजित वर्गों को ऊँच-नीच करार देती है। इस प्रकार जाति-प्रथा इन तीनों आधारों के ठीक विपरीत है, और ‘अबाध संपर्क’ के आदर्श से भी उलट है।