इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।
1 1 अंक के प्रश्न
प्र. “बादल राग” कविता के कवि का नाम और उनका जन्म-मृत्यु काल बताइए।
उत्तर: “बादल राग” कविता के कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं। उनका जन्म सन् 1899 में महिषादल (बंगाल) में और निधन सन् 1961 में इलाहाबाद में हुआ।
प्र. “बादल राग” कविता मूलतः किस काव्य-संग्रह का अंश है और उसमें कुल कितने खंड हैं?
उत्तर: “बादल राग” कविता निराला के काव्य-संग्रह “अनामिका” में छह खंडों में प्रकाशित है। पाठ्यपुस्तक में उसका केवल छठा खंड लिया गया है।
प्र. कवि ने बादल को “रण-तरी” क्यों कहा है?
उत्तर: कवि ने बादल को “रण-तरी” (युद्ध की नौका) कहा है: “यह तेरी रण-तरी / भरी आकांक्षाओं से”। पाठ के अनुसार किसान-मज़दूर की आकांक्षाएँ बादल को नव-निर्माण के राग के रूप में पुकार रही हैं, और बादल क्रांति का संदेश लेकर आता है; इसलिए वह आकांक्षाओं से भरी युद्ध की नौका जैसा है।
प्र. निराला किस काव्यधारा के कवि माने जाते हैं और उन्होंने किस बंधन को तोड़ा?
उत्तर: निराला छायावाद के कवि माने जाते हैं और उन्होंने मुक्त छंद अपनाकर परंपरागत छंद-बंधन को तोड़ा।
प्र. “अट्टालिका नहीं है रे, आतंक-भवन” पंक्ति में कवि किसकी ओर संकेत कर रहा है?
उत्तर: इस पंक्ति में कवि धनिकों की ऊँची अट्टालिकाओं (महलों) की ओर संकेत करता है: ये अट्टालिकाएँ नहीं, वास्तव में ‘आतंक-भवन’ हैं, पाठ की भूमिका के अनुसार इस पंक्ति में वंचितों की पक्षधरता की अनुगूँज स्पष्ट है।
प्र. “शस्य अपार” का अर्थ बताइए।
उत्तर: “शस्य अपार” का अर्थ है असीम हरियाली (पाठ की शब्द-छवि: शस्य = हरा)।
2 2 अंक के प्रश्न
प्र. “अस्थिर सुख पर दुख की छाया” पंक्ति में दुख की छाया किसे कहा गया है और क्यों?
उत्तर: यहाँ दुख की छाया से संकेत बादल की ओर माना जाता है। संसार का सुख अस्थिर है, और उस पर बादल दुख की छाया की तरह तिरता है, क्योंकि वह वर्षा के साथ गर्जन और वज्रपात भी लाता है। पाठ के अनुसार “बादल के भीतर सृजन और ध्वंस की ताकत एक साथ समाहित है।”
प्र. “अशनि-पात से शापित उन्नत शत-शत वीर” पंक्ति में किसकी ओर संकेत किया गया है?
उत्तर: यह पंक्ति अशनि-पात (वज्रपात) से शापित, क्षत-विक्षत उन सैकड़ों उन्नत, “गगन-स्पर्शी”, “स्पर्द्धा-धीर” वीरों की ओर संकेत करती है। पाठ की भूमिका इन्हें बादल ही बताती है: “गगन स्पर्शी, स्पर्द्धा-धीर ये बादल दरअसल वीरों का एक प्रमत्त दल दिखाई देते हैं।” यानी बादल वज्रपात से आहत होकर भी हिम्मत नहीं हारते। (कुछ व्याख्याएँ इन्हें ऊँचे वृक्ष या समाज के बड़े लोग भी मानती हैं; यह एक व्याख्या है, पाठ का कथन नहीं।)
प्र. “विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते” पंक्ति में विप्लव-रव से क्या तात्पर्य है? छोटे ही शोभा क्यों पाते हैं?
उत्तर: “विप्लव-रव” का अर्थ है क्रांति का शोर/गर्जना। छोटे पौधे ही इससे शोभा पाते हैं, क्योंकि वे हँसते हैं, हिल-खिलकर हाथ हिलाते हुए बादल को बुलाते हैं और “शस्य अपार” पाते हैं। पाठ कहता है: “क्रांति हमेशा वंचितों का प्रतिनिधित्व करती है— इस अर्थ में भी छोटे को देखा जा सकता है।”
प्र. बादलों के आगमन से प्रकृति में होने वाले किन-किन परिवर्तनों को कविता रेखांकित करती है?
उत्तर: पाठ के अनुसार बादल गरमी से तपी-झुलसी, रूखी-सूखी धरती पर आते हैं। कविता के अनुसार बार-बार गर्जन और मूसलधार वर्षण होता है, संसार हृदय थाम लेता है; सोए अंकुर नवजीवन की आशा से सिर ऊँचा कर ताकते हैं; अशनि-पात से गगन-स्पर्शी वीर क्षत-विक्षत होते हैं (पाठ की भूमिका इन्हें बादलों का “प्रमत्त दल” बताती है); छोटे पौधे हँसते, हाथ हिलाकर बादल को बुलाते हैं और अपार हरियाली (शस्य अपार) छाती है; क्षुद्र प्रफुल्ल जलज से सदा नीर छलकता है।
प्र. “रुद्ध कोष है, क्षुब्ध तोष” पंक्ति का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस पंक्ति का भावार्थ है कि अमीर वर्ग का धन-भंडार (कोष) तो रुका/बंद पड़ा है, फिर भी उनका संतोष (तोष) क्षुब्ध यानी अशांत रहता है: आगे की पंक्तियों के अनुसार ये धनी वज्र-गर्जन से काँपते हैं और त्रस्त-नयन मुख ढाँपते हैं।
प्र. पद 3 में अकाल-पीड़ित कृषक की दशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर: पद 3 में कृषक की दशा अत्यंत दयनीय बताई गई है: उसका शरीर जीर्ण (जर्जर) और शीर्ण (क्षीण) हो गया है, उसका सार (सत्व) चूस लिया गया है और अब केवल हाड़-मात्र ही उसका आधार बचा है। फिर भी वह अधीर होकर बादल को बुलाता है। (पाठ की भूमिका इस दशा को अकाल की चिंता से जोड़ती है।)
प्र. कविता में धनिकों की “अट्टालिका” और छोटों (कमल, शिशु) के बीच क्या अंतर दिखाया गया है?
उत्तर: अट्टालिकाएँ (महल) वास्तव में ‘आतंक-भवन’ कही गई हैं, और धनी, जिनका कोष रुद्ध (रुका हुआ, बंद) है फिर भी तोष क्षुब्ध है, वज्र-गर्जन से काँपते हैं। दूसरी ओर छोटे प्रफुल्ल कमलों (क्षुद्र प्रफुल्ल जलज) से सदा नीर छलकता है और रोग-शोक में भी शिशु का सुकुमार शरीर हँसता है। पाठ के अनुसार इन पंक्तियों में वंचितों की पक्षधरता की अनुगूँज स्पष्ट है।
प्र. “समीर-सागर” बिंब की विशेषता बताइए।
उत्तर: समीर-सागर (हवा का सागर) निराला की कविता का एक विराट और व्यंजक बिंब है, जिससे कविता की शुरुआत होती है। यह इतना व्यापक बिंब है कि इसमें निराला का पूरा काव्य-व्यक्तित्व उमड़ता-घुमड़ता दिखाई देता है: बादल इसी असीम आकाश-सागर पर तैरता हुआ आता है।
3 4 अंक के प्रश्न
प्र. पद 1 की व्याख्या करते हुए स्पष्ट कीजिए कि बादल के प्रति कवि का दृष्टिकोण क्या है।
उत्तर: पद 1 में बादल हवा के सागर पर तैरता हुआ आता है; अस्थिर सुख पर दुख की छाया तिरती है और जग के दग्ध (तप्त) हृदय पर क्रांति की बाढ़-सी माया छा रही है। कवि बादल को “रण-तरी” कहकर उसे आकांक्षाओं से भरी युद्ध की नौका कहता है, जिसकी गर्जन-भेरी सुनकर धरती के गर्भ में सोए अंकुर सिर उठाकर नवजीवन की आशा में ताकते हैं। बादल बार-बार गरजता-बरसता है, जिससे संसार हृदय थाम लेता है; वज्रपात से गगन-स्पर्शी वीर (पाठ की भूमिका में बादलों का ही “प्रमत्त दल”) क्षत-विक्षत होते हैं, पर छोटे पौधे हिल-खिलकर हाथ हिलाते हुए बादल का स्वागत करते हैं: “विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते”। इस तरह कवि का दृष्टिकोण स्पष्ट है: बादल के भीतर सृजन और ध्वंस दोनों की ताकत है, और पाठ के अनुसार क्रांति वंचितों का प्रतिनिधित्व करती है; इसी अर्थ में कवि छोटों को बादल का स्वागत करते दिखाता है।
प्र. बादल किसान और मज़दूर के लिए अलग-अलग किस रूप में महत्वपूर्ण है?
उत्तर: पाठ के अनुसार बादल किसान के लिए उल्लास एवं निर्माण का अग्रदूत है: गरमी से तपी, रूखी-सूखी धरती पर वर्षा लाने वाला, अकाल की चिंता से व्याकुल किसान की आशा। वहीं मज़दूर के संदर्भ में बादल क्रांति और बदलाव का अग्रदूत है; पाठ के अनुसार क्रांति हमेशा वंचितों का प्रतिनिधित्व करती है। इस तरह एक ही बादल दो वर्गों की अलग-अलग आकांक्षाओं (जीविका की आशा और सामाजिक बदलाव) को एक साथ पूरा करने वाला बन जाता है।
प्र. “बादल राग” कविता की तुलना कालिदास के “मेघदूत” से करते हुए स्पष्ट कीजिए कि निराला का बिंब कैसे अलग है।
उत्तर: कालिदास के “मेघदूत” में मेघ (बादल) को यक्ष अपनी प्रियतमा तक संदेश पहुँचाने वाला दूत/संदेशवाहक बनाते हैं: वहाँ बादल प्रेम और विरह की भावना का माध्यम है। निराला के “बादल राग” में बादल का बिंब पूरी तरह अलग है: यहाँ बादल क्रांति और नव-निर्माण का प्रतीक है, प्रेम-संदेशवाहक नहीं। निराला का बादल विनाश (वज्रपात, गर्जन-तर्जन) और सृजन (सोए अंकुरों का जागना, शस्य अपार) दोनों शक्तियाँ एक साथ समेटे है, और पाठ के अनुसार यह लघुमानव की खुशहाली का राग बन गई है।
प्र. कविता में मानवीकरण अलंकार के उदाहरण देते हुए उसका प्रभाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: कविता में प्रकृति की वस्तुओं पर मनुष्य जैसे भाव-क्रियाएँ आरोपित की गई हैं: छोटे पौधे “हँसते हैं”, “हिल-हिल खिल-खिल हाथ हिलाते, तुझे बुलाते” हैं; अंकुर “ऊँचा कर सिर ताक रहे हैं”; शिशु “रोग-शोक में भी हँसता है”। इस मानवीकरण से निर्जीव प्रकृति सजीव और भावुक बन जाती है, पाठक बादल, पौधों और अंकुरों के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ पाता है, और क्रांति की पूरी प्रक्रिया एक जीवंत नाटक की तरह आँखों के सामने घटित होती दिखती है।
प्र. “क्रांति हमेशा वंचितों का प्रतिनिधित्व करती है”: इस कथन को कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: कविता में यह भाव कई जगह उभरता है। “विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते” पंक्ति बताती है कि क्रांति की गर्जना से छोटे पौधे शोभा पाते हैं; पाठ कहता है कि “इस अर्थ में भी छोटे को देखा जा सकता है”। इसी तरह “अट्टालिका नहीं है रे, आतंक-भवन” पंक्ति भी वंचितों की पक्षधरता दिखाती है: अट्टालिका वास्तव में “आतंक-भवन” है, जबकि क्षुद्र प्रफुल्ल जलज से सदा नीर छलकता है। तीसरे पद में अकाल-पीड़ित कृषक बादल को “ऐ विप्लव के वीर” कहकर पुकारता है: यानी क्रांति (बादल) वंचित कृषक के लिए आशा का स्रोत है। इस तरह पूरी कविता क्रांति को लघुमानव (आम आदमी) के पक्ष में खड़ी शक्ति के रूप में चित्रित करती है।
प्र. कविता में प्रयुक्त सायास (जानबूझकर किए गए) विशेषण-प्रयोग के उदाहरण देकर उनका प्रभाव बताइए।
उत्तर: कविता में निराला ने विशेषणों का सायास (जानबूझकर) प्रयोग किया है, जैसे “अस्थिर सुख” (सुख के क्षणिक होने पर बल), “निर्दय विप्लव” (क्रांति की निर्ममता पर बल), “उन्नत शत-शत वीर” (वीरों की संख्या और ऊँचाई दोनों पर बल), “सुप्त अंकुर” (धरती में सोई हुई आशा), और “जीर्ण बाहु”, “शीर्ण शरीर” (अकाल-पीड़ित किसान की दशा)। इन विशेषणों से सामान्य शब्द भी विशेष अर्थ-छटा ग्रहण कर लेते हैं: जैसे केवल “सुख” कहने से वह भाव नहीं बनता जो “अस्थिर सुख” कहने से बनता है। इस तरह विशेषणों का यह सायास प्रयोग कविता के भावों को अधिक तीव्र, सटीक और चित्रमय बना देता है।
प्र. “बादल राग” कविता में मुक्त छंद की क्या भूमिका है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: निराला ने इस कविता में परंपरागत छंद-बंधन (निश्चित मात्रा, तुकांत) को तोड़कर मुक्त छंद अपनाया है। पंक्तियों की लंबाई असमान है: कहीं “फिर-फिर”, “हिल-हिल”, “खिल-खिल” जैसी छोटी दो-अक्षर वाली पंक्तियाँ हैं तो कहीं “अशनि-पात से शापित उन्नत शत-शत वीर” जैसी लंबी पंक्तियाँ। पाठ के अनुसार निराला जब मुक्त छंद की बात करते हैं तो केवल छंद, रूढ़ियों आदि के बंधन को ही नहीं तोड़ते, बल्कि काव्य-विषय और युग की सीमाओं को भी अतिक्रमित करते हैं। (विद्यार्थी चाहें तो जोड़ सकते हैं कि छोटी-बड़ी पंक्तियों से लय भाव के अनुसार बदलती लगती है; यह अपनी व्याख्या है।)
प्र. कविता के शीर्षक “बादल राग” की सार्थकता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर: “राग” शब्द का एक अर्थ है संगीत की धुन। कविता में बादल की गर्जन-वर्षण एक ऐसा “राग” है जो एक साथ दो भाव जगाता है: एक ओर यह जीवन-निर्माण के नए राग (धुन) का सूचक है, जो सोए अंकुरों को जगाकर, अकाल-पीड़ित धरती को हरा-भरा करके नवनिर्माण करता है; दूसरी ओर यह उस भैरव संगीत (विनाश के राग) का सूचक भी है, जो नव-निर्माण का कारण बनता है (पाठ के शब्दों में: “बादल राग एक ओर जीवन निर्माण के नए राग का सूचक है तो दूसरी ओर उस भैरव संगीत का, जो नव निर्माण का कारण बनता है”)। इस तरह “बादल राग” शीर्षक कविता के केंद्रीय भाव, सृजन और ध्वंस की एक साथ उपस्थिति, को सटीक रूप से व्यक्त करता है।
4 6 अंक के प्रश्न
प्र. “बादल राग” कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि निराला ने बादल को क्रांति के प्रतीक के रूप में किस प्रकार चित्रित किया है।
उत्तर: 1. निराला ने बादल को समीर-सागर पर तैरती “रण-तरी” (युद्ध की नौका) के रूप में चित्रित किया है, जो “भरी आकांक्षाओं से” है: यह बादल की क्रांतिकारी पहचान की पहली झलक है।
2. बादल की गर्जन-भेरी सुनकर धरती के गर्भ में सोए अंकुर सिर उठाकर नवजीवन की आशा में जागते हैं: क्रांति नए जीवन और नए निर्माण का सूत्रपात करती है।
3. वज्रपात से गगन-स्पर्शी वीर (पाठ की भूमिका में बादलों का ही “प्रमत्त दल”) क्षत-विक्षत होते हैं, और छोटे पौधे हिल-खिलकर बादल का स्वागत करते हैं: “विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते”; पाठ के अनुसार क्रांति हमेशा वंचितों का प्रतिनिधित्व करती है।
4. अट्टालिका (महल) को आतंक-भवन कहकर और रोग-शोक में भी हँसते शिशु को दिखाकर कवि का संकेत है कि क्रांति वंचितों के साथ है; पाठ के अनुसार यहाँ “वंचितों की पक्षधरता की अनुगूँज” स्पष्ट है।
5. अंत में अकाल-पीड़ित कृषक बादल को “ऐ विप्लव के वीर!” और “ऐ जीवन के पारावार!” कहकर पुकारता है: यह संकेत करता है कि कृषक के लिए क्रांति (बादल) आशा है।
इस तरह निराला ने बादल में विनाश और सृजन, दोनों शक्तियों को एक साथ पिरोकर उसे लघुमानव के पक्ष में खड़ी क्रांति का सशक्त प्रतीक बना दिया है।
प्र. “बादल राग” के आधार पर निराला की काव्य-विशेषताओं का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर: 1. निराला छायावाद के ऐसे कवि हैं जो एक ओर कबीर की परंपरा से जुड़ते हैं तो दूसरी ओर समकालीन कवियों के प्रेरणा-स्रोत भी बनते हैं: उनकी कविता में संघर्ष-जीवन, क्रांति-निर्माण, ओज-माधुर्य, आशा-निराशा का द्वंद्व एक साथ मिलता है।
2. उन्होंने मुक्त छंद अपनाकर केवल छंद-रूढ़ि ही नहीं, बल्कि काव्य-विषय और युग की सीमाओं को भी तोड़ा: इसी कविता में पंक्तियों की असमान लंबाई और अनियमित तुक इसका उदाहरण है।
3. उनकी भाषा के दो रंग हैं: एक ओर तत्सम, सामासिक और ध्वन्यात्मक बिंबों से भरी भाषा (जैसे “राम की शक्ति पूजा”), दूसरी ओर देशी-टटके शब्दों की सोंधी भाषा (जैसे “कुकुरमुत्ता”)। “बादल राग” में तत्सम पदावली (जैसे “समीर-सागर”, “विप्लव-रव”) और सरल शब्द (जैसे “छोटे पौधे”, “हाथ हिलाते”) दोनों मिलते हैं।
4. वे “धिक् जीवन जो पाता ही आया विरोध” कहने वाले उत्कट आत्मशक्ति और अद्भुत जिजीविषा के कवि हैं: इसीलिए वर्षा ऋतु और बादल उन्हें विशेष रूप से आकृष्ट करते हैं, क्योंकि बादल में सृजन और ध्वंस दोनों शक्तियाँ एक साथ समाहित हैं, जो स्वयं निराला के व्यक्तित्व के निकट है।
5. उनकी कविता लघुमानव (आम आदमी) के दुख-सुख से गहरे जुड़ी है: “बादल राग” में किसान-मज़दूर की आकांक्षाओं को स्वर देना इसी प्रवृत्ति का उदाहरण है।
इस तरह “बादल राग” निराला की काव्य-प्रतिभा, यानी मुक्त छंद, द्वंद्वात्मक भाव, दोहरी भाषा-शैली और लघुमानव के प्रति प्रतिबद्धता, का प्रतिनिधि उदाहरण है।
प्र. कविता की भाषा-शैली और अलंकार-योजना का समग्र मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर: 1. भाषा-शैली की दृष्टि से यह कविता तत्सम, सामासिक पदावली (जैसे “समीर-सागर”, “विप्लव-रव”, “गगन-स्पर्शी”, “स्पर्द्धा-धीर”) और ध्वन्यात्मक बिंबों (“हिल-हिल खिल-खिल”, “फिर-फिर बार-बार”) से भरपूर है, साथ ही “छोटे पौधे”, “हाथ हिलाते, तुझे बुलाते” जैसे सरल शब्द भी हैं।
2. मानवीकरण अलंकार कई स्थलों पर है: छोटे पौधे हँसते और हाथ हिलाकर बादल को बुलाते हैं, अंकुर सिर ऊँचा कर ताकते हैं, शिशु रोग-शोक में भी हँसता है।
3. रूपक अलंकार के उदाहरण भी स्पष्ट हैं: बादल को “रण-तरी”, “विप्लव के वीर” और “जीवन के पारावार” कहना, यानी उपमेय और उपमान को एक मान लेना।
4. संबोधन शैली कविता की एक प्रमुख विशेषता है: “ऐ विप्लव के बादल!”, “ऐ विप्लव के वीर!”, “ऐ जीवन के पारावार!” जैसे सीधे संबोधनों से भावनात्मक तीव्रता बढ़ती है; शेष पाँच खंडों में भी ऐसे कई संबोधन (“मेरे पागल बादल!”, “ऐ निर्बंध!” आदि) मिलते हैं।
5. मुक्त छंद के कारण लय भाव के अनुरूप बदलती रहती है, और सायास विशेषण-प्रयोग (“अस्थिर सुख”, “निर्दय विप्लव”) अर्थ को गहरा और तीखा बनाते हैं।
इस प्रकार भाषा-शैली और अलंकार-योजना दोनों मिलकर कविता के केंद्रीय भाव, क्रांति की शक्ति और लघुमानव का पक्ष, को सशक्त रूप से व्यक्त करते हैं।
प्र. कविता के तीनों पदों का सार प्रस्तुत करते हुए कविता के केंद्रीय भाव का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर: पद 1 में बादल समीर-सागर पर तैरता हुआ आता है, “रण-तरी” के रूप में, “भरी आकांक्षाओं से”; उसकी गर्जन-भेरी से सोए अंकुर जागते हैं, वज्रपात से गगन-स्पर्शी वीर (पाठ की भूमिका में बादलों का “प्रमत्त दल”) क्षत-विक्षत होते हैं, पर छोटे पौधे हर्षित होते हैं। पद 2 में अट्टालिका को आतंक-भवन कहकर धनवानों के भीतर छिपे भय को उजागर किया गया है, जबकि शिशु रोग-शोक में भी हँसता है। पद 3 में अकाल-पीड़ित कृषक की दयनीय दशा (जीर्ण-शीर्ण शरीर, हाड़-मात्र आधार) दिखाकर वह बादल को आशा के रूप में “ऐ विप्लव के वीर!”, “ऐ जीवन के पारावार!” कहकर पुकारता है। तीनों पदों को जोड़कर देखने पर कविता का केंद्रीय भाव स्पष्ट होता है: बादल के भीतर सृजन और ध्वंस दोनों की ताकत है; लघुमानव (आम आदमी) के दुख से त्रस्त कवि बादल का आह्वान क्रांति के रूप में करता है, और पाठ के अनुसार बादल राग जीवन निर्माण के नए राग तथा नव निर्माण का कारण बनने वाले भैरव संगीत, दोनों का सूचक है।