कक्षा 12 हिंदी अध्याय 6 बादल राग NCERT समाधान

NCERT की पुस्तक आरोह भाग 2 के अध्याय 6 «बादल राग» (सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’) के अभ्यास के तीनों भागों, ‘कविता के साथ’ (4 प्रश्न), ‘व्याख्या कीजिए’ (2 पद्यांश) और ‘कला की बात’ (5 प्रश्न), के सभी ग्यारह प्रश्नों के पूरे उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 कविता के साथ

प्रश्न 1

प्र. “अस्थिर सुख पर दुख की छाया” पंक्ति में दुख की छाया किसे कहा गया है और क्यों?

उत्तर:
यहाँ “दुख की छाया” से संकेत बादल की ओर माना जाता है, जो समीर-सागर (हवा के सागर) पर तिरता है। संसार का सुख अस्थिर (टिकने वाला नहीं) है, और उस पर बादल दुख की छाया की तरह छा जाता है, क्योंकि वह वर्षा के साथ गर्जन, मूसलधार वर्षण और वज्रपात भी लाता है। पाठ की भूमिका के अनुसार “बादल के भीतर सृजन और ध्वंस की ताकत एक साथ समाहित है”; इसीलिए बादल को सुख पर पड़ी दुख की छाया कहा जा सकता है।

प्रश्न 2

प्र. “अशनि-पात से शापित उन्नत शत-शत वीर” पंक्ति में किसकी ओर संकेत किया गया है?

उत्तर:
यह पंक्ति अशनि-पात (वज्रपात) से शापित, क्षत-विक्षत उन सैकड़ों उन्नत (ऊँचे) वीरों की ओर संकेत करती है जो “गगन-स्पर्शी” और “स्पर्द्धा-धीर” हैं। पाठ की भूमिका इन्हें बादल ही बताती है: “बादलों के अंग-अंग में बिजलियाँ सोई हैं, वज्रपात से उनके शरीर आहत भी हों तो भी हिम्मत नहीं हारते, बार-बार गिरकर उठते हैं। गगन स्पर्शी, स्पर्द्धा-धीर ये बादल दरअसल वीरों का एक प्रमत्त दल दिखाई देते हैं।” यानी बादल वज्रपात से आहत होकर भी हार नहीं मानते, बार-बार गिरकर उठते हैं।
कुछ व्याख्याएँ “अचल-शरीर” के आधार पर इन वीरों को वज्रपात से टूटने वाले ऊँचे वृक्ष या शिखर, और प्रतीक रूप में समाज के बड़े, शक्तिशाली लोग भी मानती हैं; यह एक व्याख्या है, पाठ का कथन नहीं। इनके सामने छोटे पौधे हँसते हुए, हाथ हिलाकर बादल को बुलाते हैं।

प्रश्न 3

प्र. “विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते” पंक्ति में विप्लव-रव से क्या तात्पर्य है? छोटे ही हैं शोभा पाते ऐसा क्यों कहा गया है?

उत्तर:
“विप्लव-रव” का अर्थ है क्रांति की गर्जना/शोर, यानी बादल की गड़गड़ाहट जो क्रांति का प्रतीक है। “छोटे ही हैं शोभा पाते” इसलिए कहा गया है कि बादल के गर्जन-वर्षण से छोटे पौधे हँसते हैं, हिल-हिल खिल-खिलकर हाथ हिलाते हैं और बादल को बुलाते हैं; इसी वर्षा से “शस्य अपार” (अपार हरियाली) आती है। पाठ की भूमिका कहती है: “क्रांति हमेशा वंचितों का प्रतिनिधित्व करती है— इस अर्थ में भी छोटे को देखा जा सकता है।” यानी छोटे पौधों को लघुमानव (आम आदमी) और वंचितों के रूप में भी पढ़ा जा सकता है, जिनके लिए क्रांति नई आशा लाती है।

प्रश्न 4

प्र. बादलों के आगमन से प्रकृति में होने वाले किन-किन परिवर्तनों को कविता रेखांकित करती है?

उत्तर:
पाठ की भूमिका के अनुसार बादल गरमी से तपी-झुलसी, रूखी-सूखी और मुरझाई धरती पर आते हैं। कविता इन परिवर्तनों को रेखांकित करती है: बार-बार गर्जन और मूसलधार वर्षण होता है, घोर वज्र-हुंकार सुनकर संसार हृदय थाम लेता है; पृथ्वी के उर में सोए अंकुर गर्जन-भेरी सुनकर नवजीवन की आशा से सिर ऊँचा करके ताकने लगते हैं; अशनि-पात (वज्रपात) होता है, जिससे गगन-स्पर्शी वीर क्षत-विक्षत होते हैं (पाठ की भूमिका इन्हें बादलों का ही “प्रमत्त दल” बताती है); छोटे पौधे हँसते हैं, हिल-हिल खिल-खिलकर हाथ हिलाते और बादल को बुलाते हैं, और अपार हरियाली (शस्य अपार) छा जाती है; सदा पंक पर ही जल-विप्लव-प्लावन होता है और क्षुद्र प्रफुल्ल जलज से सदा नीर छलकता है; और जीर्ण-शीर्ण कृषक अधीर होकर बादल को बुलाता है।

2 व्याख्या कीजिए

पद्यांश 1
“तिरती है समीर-सागर पर
अस्थिर सुख पर दुख की छाया—
जग के दग्ध हृदय पर
निर्दय विप्लव की प्लावित माया—”

व्याख्या:
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि बादल का चित्रण करते हुए कहता है कि बादल हवा के विशाल सागर पर तैरता हुआ आता है। संसार का सुख अस्थिर है, यानी स्थायी नहीं, और उसी अस्थिर सुख पर बादल दुख की छाया की तरह तिर रहा है। जग का हृदय तप्त है (दग्ध); पाठ की भूमिका के अनुसार गरमी से तपी-झुलसी धरती पर क्रांति के संदेश की तरह बादल आए हैं। उस दग्ध हृदय पर बादल निर्दय विप्लव (क्रांति, बाढ़) की प्लावित (बहा देने वाली) माया फैला रहा है। यहाँ बादल के भीतर सृजन और ध्वंस, दोनों की ताकत एक साथ दिखाई देती है।

पद्यांश 2
“अट्टालिका नहीं है रे
आतंक-भवन
सदा पंक पर ही होता
जल-विप्लव-प्लावन”

व्याख्या:
प्रस्तुत पंक्तियों में कवि धनिकों की ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं (महलों) के बारे में कहता है कि ये अट्टालिकाएँ नहीं, वास्तव में “आतंक-भवन” हैं, जिनमें रहने वाले (आगे की पंक्तियों के धनी) वज्र-गर्जन से काँपते हैं। क्रांति रूपी जल की बाढ़ (जल-विप्लव-प्लावन) सदा पंक (कीचड़) पर ही होती है, और आगे की पंक्तियाँ बताती हैं कि छोटे प्रफुल्ल कमलों (क्षुद्र प्रफुल्ल जलज) से सदा नीर छलकता है। पाठ की भूमिका के अनुसार इन पंक्तियों में वंचितों की पक्षधरता की अनुगूँज स्पष्ट है।

3 कला की बात

प्रश्न 1

प्र. पूरी कविता में प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। आपको प्रकृति का कौन-सा मानवीय रूप पसंद आया और क्यों?

उत्तर:
मुझे कविता में छोटे पौधों के मानवीकरण वाला रूप सबसे अधिक पसंद आया: “हँसते हैं छोटे पौधे लघुभार… हिल-हिल खिल-खिल, हाथ हिलाते, तुझे बुलाते।” यहाँ निर्जीव पौधों को हँसते, हाथ हिलाते और बादल को बुलाते हुए दिखाया गया है, मानो वे छोटे बच्चे हों जो उत्सव में उछल-कूद कर रहे हों। यह चित्र इसलिए पसंद आया क्योंकि यह बहुत सजीव और भावुक है: यह दिखाता है कि बादल के आने पर छोटे पौधे खुलकर उसका स्वागत करते हैं; पाठ के अनुसार इन “छोटों” को वंचितों के अर्थ में भी देखा जा सकता है।

प्रश्न 2

प्र. कविता में रूपक अलंकार का प्रयोग कहाँ-कहाँ हुआ है? संबंधित वाक्यांश को छाँटकर लिखिए।

उत्तर:
रूपक अलंकार वहाँ होता है जहाँ उपमेय (जिसकी उपमा दी जाए) और उपमान (जिससे उपमा दी जाए) में इतनी समानता मान ली जाती है कि दोनों को एक ही बता दिया जाता है। कविता में इसके निम्न उदाहरण हैं:
1. “समीर-सागर”: समीर (हवा) को ही सागर कह दिया गया है।
2. “यह तेरी रण-तरी”: बादल को सीधे युद्ध की नौका (रण-तरी) कह दिया गया है।
3. “ऐ विप्लव के वीर!”: बादल को क्रांति का वीर योद्धा कह दिया गया है।
4. “ऐ जीवन के पारावार!”: बादल को जीवन का असीम सागर (पारावार) कह दिया गया है।
इन सब में उपमेय (हवा, बादल) और उपमान (सागर, युद्ध-नौका, वीर) के बीच भेद मिटाकर उन्हें एक कर दिया गया है, जो रूपक अलंकार का लक्षण है।

प्रश्न 3

प्र. इस कविता में बादल के लिए ‘ऐ विप्लव के वीर!’, ‘ऐ जीवन के पारावार!’ जैसे संबोधनों का इस्तेमाल किया गया है। बादल राग कविता के शेष पाँच खंडों में भी कई संबोधनों का इस्तेमाल किया गया है, जैसे: अरे वर्ष के हर्ष!, मेरे पागल बादल!, ऐ निर्बंध!, ऐ स्वच्छंद!, ऐ उद्दाम!, ऐ सम्राट!, ऐ विप्लव के प्लावन!, ऐ अनंत के चंचल शिशु सुकुमार! उपर्युक्त संबोधनों की व्याख्या करें तथा बताएँ कि बादल के लिए इन संबोधनों का क्या औचित्य है?

उत्तर:
ये सभी संबोधन बादल के अलग-अलग रूपों को उजागर करते हैं। “ऐ विप्लव के वीर!” बादल को क्रांति का साहसी योद्धा कहता है। “ऐ जीवन के पारावार!” बादल को जीवन का असीम सागर बताता है। “अरे वर्ष के हर्ष!” में बादल को वर्षा-ऋतु के आनंद (हर्ष) का स्रोत कहा गया है। “ऐ विप्लव के प्लावन!” में उसे क्रांति की बाढ़ कहा गया है, जो इस खंड के “जल-विप्लव-प्लावन” की याद दिलाता है। “मेरे पागल बादल!” उसकी बेतरतीब, स्वच्छंद गर्जन-वर्षण को इंगित करता है। “ऐ निर्बंध!”, “ऐ स्वच्छंद!”, “ऐ उद्दाम!” बादल की किसी बंधन में न बँधने वाली, उन्मुक्त प्रकृति को दर्शाते हैं। “ऐ सम्राट!” उसकी सर्वोच्च शक्ति को, और “ऐ अनंत के चंचल शिशु सुकुमार!” उसकी कोमलता और चंचलता को दर्शाता है। इन संबोधनों का औचित्य यह है कि बादल एक साथ कई विरोधाभासी गुण समेटे है, वह शक्तिशाली भी है और कोमल भी, बंधनहीन भी है और जीवनदाता भी, और संबोधन शैली से कवि इस बहुरूपता को सीधे, भावनात्मक ढंग से पुकार कर व्यक्त कर पाता है।

प्रश्न 4

प्र. कवि बादलों को किस रूप में देखता है? कालिदास ने मेघदूत काव्य में मेघों को दूत के रूप में देखा। आप अपना कोई काल्पनिक बिंब दीजिए।

उत्तर:
कवि निराला बादलों को क्रांति और नव-निर्माण के प्रतीक के रूप में देखते हैं: पाठ के अनुसार बादल किसान के लिए उल्लास एवं निर्माण का, तो मज़दूर के संदर्भ में क्रांति एवं बदलाव का अग्रदूत है; बादल के भीतर सृजन और ध्वंस की ताकत एक साथ है। कविता में अट्टालिका “आतंक-भवन” है और धनी वज्र-गर्जन से काँपते हैं, जबकि छोटे पौधे और अधीर कृषक बादल को बुलाते हैं। यह कालिदास के मेघदूत से बिल्कुल अलग बिंब है, जहाँ मेघ को प्रेम-संदेशवाहक (यक्ष का दूत) के रूप में देखा गया है।
(विद्यार्थी अपनी कल्पना से बिंब लिखें, जैसे नमूने के तौर पर) मैं बादल को एक ऐसे कलाकार के रूप में देखता/देखती हूँ जो आकाश के विशाल कैनवास पर धूसर रंग बिखेरकर सूखी धरती को हरे रंग से रंग देता है: जो उजाड़ में भी जीवन का चित्र भर देता है।

प्रश्न 5

प्र. कविता को प्रभावी बनाने के लिए कवि विशेषणों का सायास प्रयोग करता है, जैसे- ‘अस्थिर सुख’। सुख के साथ अस्थिर विशेषण के प्रयोग ने सुख के अर्थ में विशेष प्रभाव पैदा कर दिया है। ऐसे अन्य विशेषणों को कविता से छाँटकर लिखें तथा बताएँ कि ऐसे शब्द-पदों के प्रयोग से कविता के अर्थ में क्या विशेष प्रभाव पैदा हुआ है?

उत्तर:
कविता में ऐसे कई सायास (जानबूझकर किए गए) विशेषण-प्रयोग मिलते हैं:
1. “निर्दय विप्लव”: क्रांति के साथ “निर्दय” जोड़कर उसकी निर्ममता और अटलता पर बल दिया गया है।
2. “उन्नत शत-शत वीर”: केवल “वीर” न कहकर “उन्नत” (ऊँचे) और “शत-शत” (सैकड़ों) जोड़कर उनकी शक्ति और संख्या दोनों पर बल दिया गया है, ताकि उनका क्षत-विक्षत होना और भी प्रभावी लगे।
3. “गगन-स्पर्शी स्पर्द्धा धीर”: वीरों की आकाश छूती ऊँचाई और होड़ में उनके धैर्य, दोनों को उभारा गया है (पाठ की भूमिका इन्हीं विशेषणों से बादलों को “वीरों का एक प्रमत्त दल” कहती है)।
4. “दग्ध हृदय”, “सुप्त अंकुर”, “क्षुद्र प्रफुल्ल जलज”, “सुकुमार शरीर”, “जीर्ण बाहु”, “शीर्ण शरीर”: तपे हुए संसार, सोई हुई आशा, छोटे-प्रसन्न वंचित, कोमल बचपन और अकाल से टूटे किसान की दशा एक-एक विशेषण से आँखों के सामने आ जाती है।
ऐसे विशेषणों के प्रयोग से सामान्य संज्ञा-शब्द भी विशेष अर्थ-छटा ग्रहण कर लेते हैं: केवल “सुख” कहने और “अस्थिर सुख” कहने में जो अंतर है, वही अंतर हर जगह दिखता है। इस तरह विशेषणों का यह सायास प्रयोग कविता के भावों को अधिक तीव्र, सटीक, चित्रमय और यादगार बना देता है।

परीक्षा संकेत

“व्याख्या कीजिए” वाले दोनों पद्यांश और “कला की बात” के प्रश्न 2 (रूपक अलंकार) और प्रश्न 3 (संबोधन शैली) के उत्तर उदाहरण-सहित तैयार रखें।