कक्षा 12 हिंदी अध्याय 1 सिल्वर वैडिंग NCERT समाधान

NCERT की पाठ्यपुस्तक वितान भाग 2 के अध्याय 1 «सिल्वर वैडिंग» की प्रश्नावली (अभ्यास) के आठों प्रश्नों के पूर्ण उत्तर। पहले ख़ुद उत्तर सोचिए, फिर मिलाइए। प्रश्न 4, 5, 7 और 8 आत्मपरक (अपने अनुभव और सोच पर आधारित) हैं, इसलिए यहाँ दिया गया उत्तर एक संभावित नमूना है, अपने स्वयं के अनुभव से भी लिख सकते हैं।

1 पत्नी ढल पाती है, यशोधर बाबू नहीं ढल पाते

प्रश्न 1

प्र. यशोधर बाबू की पत्नी समय के साथ ढल सकने में सफल होती है लेकिन यशोधर बाबू असफल रहते हैं। ऐसा क्यों?

उत्तर: पत्नी के आधुनिक बनने के पीछे कोई गहरी वैचारिक स्वीकृति नहीं, बल्कि बच्चों की तरफ़दारी करने की मातृसुलभ मजबूरी है, वह उनके साथ खड़ी होने के लिए बदल जाती है, अपने विचार बदले बिना भी। यशोधर बाबू के लिए यह इतना आसान नहीं, क्योंकि उनकी पहचान ही किशनदा से मिली परंपराओं पर टिकी है, अगर वे भी बदल जाएँ तो उनके पास याद रखने और जीने के लिए कुछ नहीं बचता। इसके अलावा, संयुक्त परिवार वाले दौर में पत्नी को आचार-व्यवहार के ऐसे बंधनों में रखा गया था मानो वह जवान औरत नहीं, बुढ़िया हो, और बुढ़िया ताई वाले सारे नियम उस पर भी लागू करवाए गए; अब उन बंधनों से मुक्त होना उसके लिए राहत जैसा है, जबकि यशोधर बाबू के लिए पुरानी परंपरा उनके गौरव और आत्म-सम्मान का स्रोत रही है, इसलिए उसे छोड़ना उन्हें अपनी पहचान खोने जैसा लगता है।

2 “जो हुआ होगा” की अर्थ-छवियाँ

प्रश्न 2

प्र. पाठ में “जो हुआ होगा” वाक्य की आप कितनी अर्थ छवियाँ खोज सकते / सकती हैं?

उत्तर: पहली अर्थ-छवि सीधी उदासीनता की है, किशनदा की मृत्यु का कारण पूछने पर उनके एक बिरादर का जवाब बस इतना ही था, यानी पता नहीं क्या हुआ, ठीक-ठीक जानने की कोई कोशिश ही नहीं। दूसरी अर्थ-छवि नियति-स्वीकृति की है, जीवन में जो होना था वह हो गया, इसे बदला नहीं जा सकता, इसलिए इसकी चिंता करने का कोई फ़ायदा नहीं। तीसरी और सबसे गहरी अर्थ-छवि मृत्यु और अकेलेपन के दर्शन की है, कहानी के अंत में ध्यान के समय यशोधर बाबू को दिखाई दे रहे किशनदा कहते हैं कि सभी जन इसी “जो हुआ होगा” से मरते हैं और शुरू में और आख़िर में सब अकेले ही होते हैं, गृहस्थ हो या ब्रह्मचारी, अमीर हो या ग़रीब, यानी मृत्यु के आगे सारे भेद मिट जाते हैं। इस तरह यह एक ही वाक्य उदासीनता, नियति-स्वीकृति और अस्तित्व की नश्वरता, तीनों को एक साथ समेट लेता है।

3 “समहाउ इंप्रॉपर” और यशोधर बाबू का व्यक्तित्व

प्रश्न 3

प्र. “समहाउ इंप्रापर” वाक्यांश का प्रयोग यशोधर बाबू लगभग हर वाक्य के प्रारंभ में तकिया कलाम की तरह करते हैं। इस वाक्यांश का उनके व्यक्तित्व और कहानी के कथ्य से क्या संबंध बनता है?

उत्तर: यशोधर बाबू यह वाक्यांश उन नई, आधुनिक चीज़ों और आदतों के लिए बोलते हैं जिन्हें वे पूरी तरह अस्वीकार भी नहीं कर पाते और पूरी तरह अपना भी नहीं पाते: सालगिरह पर “इनसिस्ट” करना, बेटे का वेतन उनके हाथ में न रखना, बेटी की जीन और बगैर बाँह का टॉप, पत्नी की लाली और ख़िज़ाब, सिल्वर वैडिंग की भव्य पार्टी। इस वाक्यांश को उनकी उस मानसिक स्थिति के संकेत के रूप में पढ़ा जा सकता है जिसमें वे परंपरा और आधुनिकता के बीच लगातार झूलते रहते हैं, न वे पूरी तरह पुरानी पीढ़ी के अनुयायी रह पाए हैं, न नई पीढ़ी के साथ चल पाए हैं। कहानी का पूरा कथ्य ही पीढ़ी के इस अंतराल पर टिका है, इसलिए यह वाक्यांश सिर्फ़ एक आदत नहीं, बल्कि कहानी के व्यंग्य और उसके केंद्रीय विषय से जुड़ा माना जा सकता है।

4 किशनदा की भूमिका और अपने जीवन में मार्ग-दर्शक

प्रश्न 4 (आत्मपरक)

प्र. यशोधर बाबू की कहानी को दिशा देने में किशनदा की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। आपके जीवन को दिशा देने में किसका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा और कैसे?

उत्तर (नमूना): किशनदा ने यशोधर बाबू को दिल्ली में शरण, रोज़गार, आर्थिक मदद और बाद में नौकरी दिलवाकर उनके पूरे जीवन की दिशा तय कर दी, साथ ही अपनी आदतों, विचारों और दैनिक जीवन-शैली से भी उन्हें गहराई से प्रभावित किया। इसी तरह हर व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई ऐसा व्यक्ति होता है, माता-पिता, कोई शिक्षक, कोई बड़ा भाई-बहन या मित्र, जो कठिन समय में सहारा देकर, सही सलाह देकर या अपने उदाहरण से हमें एक दिशा दिखाता है। मुझे लगता है कि मेरे किसी अध्यापक/परिवार के किसी सदस्य ने भी ठीक इसी तरह मुझे कठिन निर्णयों में मार्ग-दर्शन दिया, जिसकी छाप आज भी मेरी सोच और आदतों में दिखती है, जैसे किशनदा की छाप यशोधर बाबू के जीवन-भर बनी रही। (छात्र यहाँ अपने स्वयं के अनुभव से लिख सकते हैं।)

5 आज के परिवार की संरचना और कहानी

प्रश्न 5 (आत्मपरक)

प्र. वर्तमान समय में परिवार की संरचना, स्वरूप से जुड़े आपके अनुभव इस कहानी से कहाँ तक सामंजस्य बिठा पाते हैं?

उत्तर (नमूना): कहानी में दिखाया गया संयुक्त परिवार से एकल, आधुनिक परिवार की ओर बदलाव आज भी बहुत हद तक सच है, बच्चों का करियर के लिए दूसरे शहरों या देशों में जाना, अपनी कमाई पर स्वतंत्र निर्णय लेना और अपने माता-पिता से अलग जीवन-शैली अपनाना आज के बहुत-से परिवारों में देखा जा सकता है। साथ ही पीढ़ियों के बीच पहनावे, भाषा और मूल्यों को लेकर मतभेद भी उतने ही सामान्य हैं जितने कहानी में यशोधर बाबू और उनके बच्चों के बीच दिखते हैं। पर आज संचार-माध्यमों (वीडियो कॉल आदि) ने दूरी के बावजूद परिवारों को पहले से ज़्यादा जोड़े रखा है, जो इस कहानी में फ़ोन और कार्ड से होने वाले संपर्क से एक बड़ा फ़र्क़ है। (छात्र यहाँ अपने अनुभव के आधार पर लिख सकते हैं।)

6 कहानी की मूल संवेदना

प्रश्न 6

प्र. निम्नलिखित में से किसे आप कहानी की मूल संवेदना कहेंगे/कहेंगी और क्यों? (क) हाशिए पर धकेले जाते मानवीय मूल्य (ख) पीढ़ी का अंतराल (ग) पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव

उत्तर: तीनों प्रवृत्तियाँ कहानी में मौजूद हैं, पर पीढ़ी का अंतराल (ख) ही इसकी मूल संवेदना कहलाने की सबसे मज़बूत दावेदार है, क्योंकि यही वह केंद्रीय टकराव है जिससे बाक़ी दोनों प्रवृत्तियाँ जन्म लेती हैं। मानवीय मूल्यों का हाशिए पर जाना, जैसे बेटे का वेतन पिता के हाथ में न रखना, और पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव, जैसे केक-पार्टी और आधुनिक पहनावा, दोनों ही पीढ़ी के इस अंतराल के परिणाम हैं, स्वतंत्र कारण नहीं। यशोधर बाबू और उनके बच्चों के बीच लगभग हर असहमति अंततः दो पीढ़ियों की सोच के फ़र्क़ से ही उपजती है, इसलिए पीढ़ी का अंतराल ही इस कहानी की सबसे केंद्रीय संवेदना है।

7 बुज़ुर्गों को न भाने वाले आधुनिक बदलाव

प्रश्न 7 (आत्मपरक)

प्र. अपने घर और विद्यालय के आस-पास हो रहे उन बदलावों के बारे में लिखें जो सुविधाजनक और आधुनिक होते हुए भी बुज़ुर्गों को अच्छे नहीं लगते। अच्छा न लगने के क्या कारण होंगे?

उत्तर (नमूना): मोबाइल फ़ोन और सोशल मीडिया का बढ़ता प्रयोग, ऑनलाइन खाना मँगवाना, बड़े मॉल में ख़रीदारी की जगह पुरानी दुकानों का बंद होना, ऐसे कई बदलाव आज सुविधाजनक ज़रूर हैं पर घर के बुज़ुर्गों को अच्छे नहीं लगते। इसका एक बड़ा कारण यह है कि इन बदलावों में बुज़ुर्गों की भूमिका और अनुभव की ज़रूरत ही नहीं रह जाती, जैसे यशोधर बाबू को अपने बेटों द्वारा नौकर रखने का सुझाव अखरता है क्योंकि इसमें उनके अपने हाथ से काम करने के मूल्य की कोई जगह नहीं बचती। दूसरा कारण यह भी है कि ये बदलाव प्रायः व्यक्तिगत सुविधा को पारिवारिक साझेदारी से ज़्यादा महत्व देते हैं, जिससे बुज़ुर्गों को लगता है कि पुराने रिश्ते और मूल्य पीछे छूटते जा रहे हैं। (छात्र यहाँ अपने घर/विद्यालय के वास्तविक उदाहरण से लिख सकते हैं।)

8 यशोधर बाबू के बारे में आपकी धारणा

प्रश्न 8

प्र. यशोधर बाबू के बारे में आपकी क्या धारणा बनती है? दिए गए तीन कथनों में से आप जिसके समर्थन में हैं, अपने अनुभवों और सोच के आधार पर उसके लिए तर्क दीजिए। (क) यशोधर बाबू के विचार पूरी तरह से पुराने हैं और वे सहानुभूति के पात्र नहीं हैं। (ख) यशोधर बाबू में एक तरह का द्वंद्व है जिसके कारण नया उन्हें कभी-कभी खींचता तो है पर पुराना छोड़ता नहीं। इसलिए उन्हें सहानुभूति के साथ देखने की ज़रूरत है। (ग) यशोधर बाबू एक आदर्श व्यक्तित्व है और नयी पीढ़ी द्वारा उनके विचारों का अपनाना ही उचित है।

उत्तर: इनमें दूसरा कथन (ख) सबसे उचित लगता है। यशोधर बाबू पूरी तरह पुराने विचारों के हठी बूढ़े नहीं हैं, क्योंकि वे (कहानी के शब्दों में “डेमोक्रेट बाबू”) बच्चों पर अपनी बात थोपना नहीं चाहते और बच्चों की तरक्की देखकर मन ही मन ख़ुश भी होते हैं। पर वे कोई पूर्णतः आदर्श व्यक्तित्व भी नहीं हैं, क्योंकि उनकी अपनी सोच में भी विरोधाभास है, वे उस परंपरा की दुहाई देते हैं जो उन्होंने किशनदा से सुनकर अपनाई है; पत्नी का कहना है, और कहानी इसे “सही कहना” मानती है, कि यशोधर जी का स्वयं का देखा हुआ कुछ नहीं है। यह भीतरी द्वंद्व, न पूरी तरह पुराने रह पाना, न पूरी तरह नए बन पाना, ही उन्हें एक यथार्थवादी और सहानुभूति के योग्य पात्र बनाता है, बदलते समय में फँसे एक साधारण, ईमानदार इंसान के रूप में।