कक्षा 12 हिंदी अध्याय 2 जूझ महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर सहित (Important Questions with Answers) हिंदी में

इस अध्याय के परीक्षा-उपयोगी प्रश्न, अंक-वार, हर प्रश्न के पूरे उत्तर के साथ। पहले स्वयं उत्तर लिखने की कोशिश कीजिए, फिर मिलाइए।

1 1 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (1 अंक)

प्र. जूझ पाठ के लेखक कौन हैं?

उत्तर: आनंद यादव।

प्रश्न 2 (1 अंक)

प्र. जूझ पाठ का हिंदी अनुवाद किसने किया है?

उत्तर: केशव प्रथम वीर ने।

प्रश्न 3 (1 अंक)

प्र. देसाई नायक के पिता (दादा) को किस नाम से पुकारते हैं?

उत्तर: रतनाप्पा।

प्रश्न 4 (1 अंक)

प्र. नायक की सिफ़ारिश किसने की थी?

उत्तर: दत्ता जी राव देसाई ने।

प्रश्न 5 (1 अंक)

प्र. पाठशाला में नायक को मास्टर किस नाम से बुलाने लगे थे?

उत्तर: आनंदा।

प्रश्न 6 (1 अंक)

प्र. कक्षा का मॉनीटर कौन था?

उत्तर: वसंत पाटील।

प्रश्न 7 (1 अंक)

प्र. नायक में कविता के प्रति अनुराग किस मास्टर से जगा?

उत्तर: न.वा. सौंदलगेकर मास्टर से।

प्रश्न 8 (1 अंक)

प्र. पाठ्यपुस्तक की भूमिका के अनुसार ‘जूझ’ पाठ किस रचना का अंश है?

उत्तर: मराठी के प्रख्यात कथाकार डॉ. आनंद यादव के बहुचर्चित आत्मकथात्मक उपन्यास का अंश; ‘जूझ’ इस अंश का शीर्षक है और हिंदी अनुवाद केशव प्रथम वीर ने किया है।

2 2 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (2 अंक)

प्र. नायक को पढ़ाई के प्रति क्यों तड़प थी?

उत्तर: नायक को विश्वास था कि जन्म-भर खेत में काम करते रहने पर भी हाथ कुछ नहीं लगेगा, जबकि पढ़ जाने पर नौकरी लगेगी और विठोबा आण्णा की तरह कुछ धंधा-कारोबार किया जा सकेगा।

प्रश्न 2 (2 अंक)

प्र. दादा कोल्हू सबसे पहले क्यों शुरू करवाता था?

उत्तर: दादा की समझ थी कि कोल्हू जल्दी शुरू करने से ईख की अच्छी कीमत मिल जाती है, क्योंकि बाद में बाज़ार में गुड़ की बहुतायत होने पर भाव नीचे उतर आते थे।

प्रश्न 3 (2 अंक)

प्र. माँ ने देसाई को दादा के बारे में क्या शिकायत की?

उत्तर: माँ ने बताया कि दादा सारे दिन बाज़ार में रखमाबाई के पास गुज़ार देता है और खेती के काम में हाथ नहीं लगाता। उसने देसाई को यह विश्वास भी दिला दिया कि दादा को गाँव भर आज़ादी से घूमने को मिलता रहे, इसलिए उसने नायक का पढ़ना बंद कर उसे खेती में जोत दिया है।

प्रश्न 4 (2 अंक)

प्र. देसाई ने नायक से क्या कहा, और दादा के बारे में क्या व्यवस्था बताई?

उत्तर: देसाई ने नायक से कहा कि सवेरे से पाठशाला जाता रह, पूरी फ़ीस भर दे, मन लगाकर पढ़ाई कर और साल न मारा जाए। दादा को उन्होंने खूब डाँटा, और नायक से कहा कि यदि दादा उसे पढ़ने नहीं भेजे तो वह सीधा उनके पास चला आए, सुबह-शाम काम करे और पाठशाला जाता रहे, वे स्वयं पढ़ाएँगे।

प्रश्न 5 (2 अंक)

प्र. पहले दिन कक्षा में नायक के साथ क्या घटना हुई?

उत्तर: कक्षा के सबसे शरारती चव्हाण के लड़के ने नायक की अजनबी पोशाक का मज़ाक उड़ाया और उसका गमछा छीन लिया, बाद में रणनवरे मास्टर ने नायक को ही ग़लती से डाँट दिया।

प्रश्न 6 (2 अंक)

प्र. मंत्री मास्टर की कक्षा में क्या असर था?

उत्तर: मंत्री मास्टर छड़ी की जगह गरदन पकड़कर पीठ पर घूँसा मारते थे, जिससे लड़कों में उनकी दहशत बैठी हुई थी, इसलिए शरारत कम होती और सभी घर से पढ़कर आते थे।

प्रश्न 7 (2 अंक)

प्र. वसंत पाटील की क्या विशेषताएँ थीं?

उत्तर: वसंत पाटील शरीर से दुबला-पतला पर बहुत होशियार था, स्वभाव से शांत, हमेशा पढ़ने में लगा रहता और उसके सवाल हमेशा सही निकलते थे; मास्टर ने उसे कक्षा मॉनीटर बना दिया था और कक्षा में उसका सम्मान था।

प्रश्न 8 (2 अंक)

प्र. नायक ने अनंत काणेकर की कविता को कैसे गाया?

उत्तर: नायक ने काणेकर की कविता (“चाँद रात पसरिते पाँढरी गाया धरणीवरी”) को मास्टर की चाल से अलग, एक सिनेमा के गाने की चाल में गाया; वह गाना “केशव करणी जाति” नामक छंद में था। वह इसे मास्टर की अपेक्षा ज़्यादा अभिनय के साथ, चेहरे पर कविता के भाव लाकर गाता था।

3 4 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (4 अंक)

प्र. नायक को दोबारा पाठशाला भेजे जाने की पूरी प्रक्रिया संक्षेप में लिखिए।

उत्तर: नायक ने माँ से पढ़ाई की बात छेड़ी, उसके कहने पर माँ दत्ता जी राव देसाई से बात करने को राज़ी हुई। रात को माँ-बेटे देसाई के यहाँ गए और सारी बात बताई; दादा से माँ ने कहा कि वह साग-भाजी देने गई थी तो देसाई ने उसे बुलाया है। देसाई ने दादा को बुलवाकर जिरह की, उस पर खेत में मन न लगाने और बेटे के जीवन की बलि चढ़ाने का आरोप लगाया, और नायक से कहा कि सवेरे से पाठशाला जाता रहे और पूरी फ़ीस भरे; दादा न भेजे तो वह देसाई के यहाँ चला आए। दादा मन मारकर मान गया और अपनी ओर से खेत के काम की शर्तें रखकर नायक को दोबारा पाठशाला भेजने को राज़ी हुआ।

प्रश्न 2 (4 अंक)

प्र. पहले दिन पाठशाला में नायक के अनुभव का वर्णन कीजिए।

उत्तर: पहले दिन खेती की चक्की से छुटकारे की खुशी थी, पर कक्षा में नायक अजनबी जैसा महसूस करता है, नाम के आगे पाँचवीं नापास दर्ज था, पुराने साथी आगे निकल चुके थे। चव्हाण के लड़के ने उसकी पोशाक का मज़ाक उड़ाया और गमछा छीन लिया, रणनवरे मास्टर ने भी ग़लती से उसे ही डाँटा। बीच की छुट्टी में उस लड़के ने धोती की काछ भी खींचने की कोशिश की। नायक को लगा जैसे खिलौने के लिए बनाए गए कौआ के बच्चे पर कौए चारों ओर से चोंच मार रहे हों, “मेरी ही पाठशाला मुझे चोंच मार-मारकर घायल कर रही थी।” घर जाते समय उसने सोचा, “नहीं जाऊँगा ऐसी पाठशाला में”, फिर भी अगली सुबह वह फिर उमंग से पाठशाला गया।

प्रश्न 3 (4 अंक)

प्र. सौंदलगेकर मास्टर ने नायक में कविता के प्रति अनुराग कैसे जगाया?

उत्तर: सौंदलगेकर मास्टर मराठी पढ़ाते हुए कविता को सुरीले गले, छंद की चाल और रसिकता के साथ गाकर सुनाते और अभिनय से भाव समझाते थे। वे कवियों से अपनी मुलाक़ातों के संस्मरण भी सुनाते। इससे प्रभावित होकर नायक अकेले में खेत पर वही कविताएँ मास्टर के ही हाव-भाव में गाने लगा, फिर स्वयं की नई चाल में कविताएँ गाने और भैंस चराते हुए तुकबंदी करने लगा। मास्टर ने सराहना करते हुए उसे कक्षा और समारोह में गवाया, जिससे नायक का आत्मविश्वास बढ़ा।

प्रश्न 4 (4 अंक)

प्र. नायक और दादा के बीच के मतभेद के मुख्य कारण क्या थे?

उत्तर: दादा ने पढ़ाई से इसलिए मना किया कि “खेतों में पानी लगाने वाला कोई नहीं है”, और वह नायक की पढ़ाई पर ताना मारता था, “बालिस्टर नहीं होनेवाला है तू?” दूसरी ओर नायक को विश्वास था कि जन्म-भर खेत में काम करने पर भी हाथ कुछ नहीं लगेगा और पढ़ जाने पर नौकरी लगेगी। माँ ने देसाई को यह विश्वास दिला दिया कि दादा गाँव भर आज़ादी से घूमने के लिए नायक को खेती में जोत रहा है, और देसाई ने भी उस पर यही आरोप लगाया। माँ और नायक दोनों शिक्षा के पक्ष में थे। यही टकराव कहानी के केंद्र में है।

प्रश्न 5 (4 अंक)

प्र. जूझ पाठ में ग्रामीण जीवन का यथार्थ किस तरह उभरा है?

उत्तर: पाठ में कोल्हू चलाना, ईख पेरना, गुड़ बनाना, खेत में पानी लगाना, ढोर चराना जैसे ग्रामीण कामों का सजीव चित्रण है। पारिवारिक दबाव और खेती से गुज़ारा न चलने की चिंता (“यह खेती हमें गड्ढे में धकेल रही है”) भी दिखती है। बोली में गँवई शब्दों और मुहावरों (साँड़ की तरह घूमना, गड्ढे में धकेलना) का प्रयोग जीवन को जीवंत बनाता है।

प्रश्न 6 (4 अंक)

प्र. नायक के चरित्र की मुख्य विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: नायक दृढ़ निश्चयी और संघर्षशील है, दादा के डर के बावजूद पढ़ाई की तड़प नहीं छोड़ता। वह व्यावहारिक सूझबूझ रखता है, देसाई के सामने स्वयं तर्क रखता है। पहले दिन के अपमान से आहत होकर भी हार नहीं मानता। वह अनुकरण और अनुशासन से सीखता है और अंततः कल्पनाशील व भावुक बनकर कविता में रम जाता है।

प्रश्न 7 (4 अंक)

प्र. दत्ता जी राव देसाई का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर: दत्ता जी राव देसाई गाँव के प्रतिष्ठित और प्रभावशाली व्यक्ति हैं। माँ की बात सुनकर वे कहते हैं, “आने दे अब उसे”, दादा को बुलवाते हैं और जिरह करके उसका हर ग़लत तर्क काट देते हैं। वे दादा से कहते हैं, “अरे, बच्चे की जात है। एकाध वक्त सिनेमा चला गया तो क्या हुआ?” और नायक की पढ़ाई के लिए सख़्ती से पेश आते हैं, यहाँ तक कि उसे अपने यहाँ रखकर पढ़ाने की पेशकश भी करते हैं।

4 6 अंक के प्रश्न

प्रश्न 1 (6 अंक)

प्र. शीर्षक जूझ की सार्थकता पर विचार करते हुए स्पष्ट कीजिए कि यह शीर्षक नायक की किसी केंद्रीय चारित्रिक विशेषता को उजागर करता है या नहीं।

उत्तर: जूझ शब्द का अर्थ है निरंतर संघर्ष करना, और यही नायक के पूरे व्यवहार में झलकता है। सबसे पहले वह दादा के भय और विरोध से जूझता है, दादा से सीधे कहने की हिम्मत न होने पर भी अपनी पढ़ाई की तड़प बनाए रखता है, माँ के साथ देसाई के यहाँ जाकर अपनी बात स्वयं भी रखता है। फिर वह पहले दिन कक्षा के अपमान, चव्हाण के लड़के के मज़ाक और मास्टर की ग़लत डाँट से जूझता है, पर अगली सुबह फिर पाठशाला जाता है। वह खेत और पाठशाला के दोहरे बोझ से भी जूझता है, दिन में खेत और पाठशाला दोनों सँभालता है। पहले अकेलापन उसे खटकता था, पर कविता के सहारे वह उससे भी पार पाता है और कविता जैसी नई राह खोज निकालता है। इसलिए मेरे विचार में यह शीर्षक किसी एक घटना का नाम नहीं, बल्कि नायक के स्वभाव, संघर्षशीलता, को उजागर करता है और सार्थक है।

प्रश्न 2 (6 अंक)

प्र. स्वयं कविता रच लेने का आत्मविश्वास लेखक के मन में कैसे पैदा हुआ, विस्तार से लिखिए।

उत्तर: आरंभ में नायक केवल सौंदलगेकर मास्टर की सुनाई कविताएँ खेत पर गुनगुनाता था, जिससे उसका अकेलापन कम होने लगा और वह उसमें आनंद लेने लगा। धीरे-धीरे उसने कविताओं के भाव और चाल से खेलना शुरू किया और अनंत काणेकर की कविता को अपनी अलग, सिनेमा-गीत आधारित चाल में गाकर देखा। मास्टर को यह प्रयोग इतना पसंद आया कि उन्होंने नायक को कक्षा और समारोह में गवाया, जिससे नायक को लगा कि उसके नए पंख निकल आए हैं। इसके साथ ही, मास्टर स्वयं कवि थे और घर में कई मराठी कवियों के काव्य-संग्रह और उनके निजी संस्मरण नायक को यह विश्वास दिला गए कि कवि भी अपने जैसा ही एक हाड़-माँस का; क्रोध-लोभ का मनुष्य ही होता है। मास्टर के दरवाज़े पर लिखी उनकी अपनी कविता देखकर नायक को लगा कि अपने गाँव-खेतों के दृश्यों पर भी कविता बन सकती है, और वहीं से उसने भैंस चराते हुए तुकबंदी और कविता लिखना शुरू किया।

प्रश्न 3 (6 अंक)

प्र. श्री सौंदलगेकर के अध्यापन की उन विशेषताओं को रेखांकित कीजिए जिन्होंने कविताओं के प्रति नायक के मन में रुचि जगाई।

उत्तर: सौंदलगेकर मास्टर का अध्यापन कई मायनों में विशेष था। पहला, वे स्वयं कविता पढ़ाते समय पूरी तरह उसमें रम जाते थे, सुरीला गला, छंद की बढ़िया चाल और रसिकता उनके पास थी। दूसरा, वे पहले कविता गाकर सुनाते और फिर अभिनय के साथ उसका भाव समझाते, जिससे कविता केवल पढ़ी नहीं, महसूस की जाती थी। वे उसी भाव की किसी अन्य कवि की कविता भी सुनाकर दिखाते। तीसरा, वे बीच-बीच में मराठी कवियों से अपनी निजी मुलाक़ातों के संस्मरण सुनाते, जिससे कविता और कवि, दोनों नायक को अपने आस-पास की, जीवंत चीज़ लगने लगे। चौथा, वे स्वयं भी कविता करते थे और नायक की कोशिशों को गंभीरता से देखकर उसे शाबाशी देते, कभी कविता-शास्त्र (भाषा, छंद की जाति, लयक्रम, अलंकार, शुद्ध लेखन) पर पूरी महफ़िल हो जाती; वे उसे पुस्तकें और कविता-संग्रह भी देते। इन्हीं सब बातों ने नायक के मन में कविता के प्रति गहरी रुचि जगाई।

प्रश्न 4 (6 अंक)

प्र. कविता के प्रति लगाव से पहले और उसके बाद अकेलेपन के प्रति नायक की धारणा में क्या बदलाव आया?

उत्तर: कविता के प्रति लगाव से पहले नायक को अकेलापन बहुत खटकता था, चाहे वह ढोर चराते समय हो या खेत पर पानी लगाते समय, उसे लगता था कि हमेशा कोई-न-कोई साथ में होना चाहिए, अकेले काम करना उसे उबाऊ लगता था। लेकिन सौंदलगेकर मास्टर से सीखी कविताओं को गाना शुरू करने के बाद यह धारणा पूरी तरह बदल गई। अब अकेलापन उसे ऊबाता नहीं था, बल्कि वह खुद से ही खेलने लगा, यहाँ तक कि उसे लगने लगा कि जितना अकेला रहे उतना अच्छा, क्योंकि तभी वह ऊँची आवाज़ में कविता गा सकता था, मनचाहा अभिनय कर सकता था और कविता गाते-गाते नाच भी सकता था। इस तरह अकेलापन, जो पहले बोझ था, अब उसकी रचनात्मकता और आनंद का साधन बन गया।

प्रश्न 5 (6 अंक)

प्र. आपके ख़याल से पढ़ाई-लिखाई के संबंध में नायक और दत्ता जी राव का रवैया सही था या नायक के पिता का, तर्क सहित उत्तर दीजिए।

उत्तर: मेरे विचार में नायक और दत्ता जी राव का रवैया अधिक सही और दूरदर्शी था। दादा ने पढ़ाई से इसलिए मना किया कि “खेतों में पानी लगाने वाला कोई नहीं है”, और वह ताना मारता था, “बालिस्टर नहीं होनेवाला है तू?” नायक को विश्वास था कि जन्म-भर खेत में काम करते रहने पर भी हाथ कुछ नहीं लगेगा, और उसे आशा थी कि पढ़ जाने पर नौकरी लग जाएगी और धंधा-कारोबार किया जा सकेगा; पाठ में यह सोच उसके अपने शब्दों में है। नायक इस बदलाव को समझता है और अपनी सूझबूझ से देसाई तक बात पहुँचाता है, जबकि दत्ता जी राव यह देखते हैं कि एक बच्चे का भविष्य पिता की तात्कालिक सुविधा के लिए बलि नहीं चढ़ाया जाना चाहिए। हालाँकि दादा की चिंता (खेत में पानी लगाने वाला कोई नहीं) को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता, और पाठ अंतिम परिणाम नहीं बताता, फिर भी नायक के लिए यही रवैया बेहतर माना जा सकता है, इसलिए मैं नायक और देसाई के पक्ष में हूँ।

5 केस स्टडी

केस स्टडी
फिर तू क्या करता है? सरकार ने दादा से जिरह करना शुरू किया तो सारा इतिहास बाहर निकल आया। सरकार ने दादा पर खूब गुस्सा किया। उन्होंने दादा की खूब हजामत बनाई। देसाई के मळा (खेत) को छोड़ देने के बाद दादा का ध्यान किसी काम की तरफ़ नहीं रहा। मन लगाकर वह खेत में श्रम नहीं करता है, फ़सल में लागत नहीं लगाता है, लुगाई और बच्चों को काम में जोतकर किस तरह खुद गाँव भर में खुले साँड़ की तरह घूमता है और अब अपनी मस्ती के लिए किस तरह छोरा के जीवन की बलि चढ़ा रहा है, यह सब उन्होंने सुनाया।

(क) 1 अंक गद्यांश में देसाई के गुस्से को किस मुहावरे से व्यक्त किया गया है?
उत्तर: “दादा की खूब हजामत बनाई”, यानी खूब डाँटा-फटकारा।

(ख) 2 अंक गद्यांश के अनुसार दादा ने खेती के काम में कैसा रवैया अपनाया था?
उत्तर: दादा मन लगाकर खेत में श्रम नहीं करता था, फ़सल में लागत नहीं लगाता था और लुगाई-बच्चों को काम में जोतकर स्वयं गाँव में साँड़ की तरह घूमता था।

(ग) 3 अंक गद्यांश में वर्णित देसाई के व्यवहार का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर: देसाई का व्यवहार न्यायप्रिय और ज़िम्मेदार दिखता है। वे केवल सुनकर चुप नहीं रहते, बल्कि जिरह करके सच्चाई बाहर निकालते हैं और दादा की ग़लत आदतों पर खुलकर गुस्सा जताते हैं। यह दिखाता है कि गाँव में प्रतिष्ठित व्यक्ति होने के नाते वे कमज़ोर बच्चे के पक्ष में खड़े होकर सामाजिक ज़िम्मेदारी निभाते हैं, और यही नायक की पढ़ाई के पक्ष में बड़ा सहारा बनता है।