- “जूझ” का पूरा कथासार, उसी क्रम में जिस क्रम में लेखक ने लिखा है
- नायक, दादा, माँ, दत्ता जी राव देसाई और सभी अध्यापकों का पूरा चरित्र-चित्रण
- सौंदलगेकर मास्टर से नायक के भीतर कविता के प्रति अनुराग कैसे जन्मा, पूरा प्रसंग
- शीर्षक “जूझ” की सार्थकता: यह नायक की किस चारित्रिक विशेषता को उजागर करता है
- पाठ के प्रमुख विषय: शिक्षा के प्रति ललक, ग्रामीण जीवन का यथार्थ, अकेलेपन से मुक्ति
- सभी छह अभ्यास प्रश्नों के मूल भाव
सौंदलगेकर मास्टरवसंत पाटीलआत्मकथात्मक अंश
अनंत काणेकरकेशव प्रथम वीर
1 लेखक-परिचय: आनंद यादव
“वितान भाग 2” का यह पाठ, जिसका शीर्षक जूझ है, मराठी के प्रख्यात कथाकार डॉ. आनंद यादव के बहुचर्चित आत्मकथात्मक उपन्यास का एक अंश है (पाठ्यपुस्तक की भूमिका)। पाठ के अंत में लिखा है कि इसका हिंदी अनुवाद केशव प्रथम वीर ने किया है।
पाठ्यपुस्तक की भूमिका के अनुसार यह एक किशोर के देखे और भोगे हुए गँवई (ग्रामीण) जीवन के खुरदरे यथार्थ की
अत्यंत विश्वसनीय जीवंत गाथा है। इसमें जीवन का मर्मस्पर्शी चित्रण तो है ही,
अस्त-व्यस्त-अलमस्त निम्नमध्यवर्गीय ग्रामीण समाज और लड़ते-जूझते किसान-मज़दूरों के संघर्ष की
भी झाँकी है। यहाँ लिए गए अंश में हर स्थिति में पढ़ने की लालसा लिए धीरे-धीरे
साहित्य और कविता की ओर बढ़ते एक किशोर के कदमों की कहानी है।
इस पाठ की बोली में “दादा” का अर्थ “पिता” है, “दादाजी” नहीं, जबकि
सामान्य हिंदी में “दादा” का अर्थ पितामह (दादाजी) होता है। पाठ में जहाँ भी
“दादा” आया है, वह नायक के पिता के लिए है (जैसे “जो बाबा के समय था, वह दादा के समय नहीं रहा”)।
2 कहानी का सार (कथावस्तु)
2.1 पढ़ाई की तड़प बनाम दादा का डर
नायक का मन पाठशाला जाने के लिए तड़पता था, पर दादा के सामने खड़े होकर यह
कहने की हिम्मत नहीं होती थी कि “मैं पढ़ने जाऊँगा”, डर था कि दादा
“हड्डी-पसली एक कर देगा।” नायक को विश्वास था कि जन्म-भर खेत में काम करते रहने
पर भी हाथ कुछ नहीं लगेगा; जो बाबा (पिता से पहले की पीढ़ी) के समय चलता था, वह
अब नहीं चलता। पढ़ जाने पर नौकरी लगेगी, चार पैसे हाथ में रहेंगे, विठोबा आण्णा
की तरह कुछ धंधा-कारोबार किया जा सकेगा।
दीवाली बीतने पर महीना-भर ईख पेरने का कोल्हू चलाना होता था। दादा कोल्हू
जल्दी शुरू करता था ताकि बाज़ार में गुड़ की क़ीमत ज़्यादा मिल जाए, पर बाक़ी
किसान इसके उलट ईख को देर तक खेत में खड़ी रहने देना सही मानते थे, ताकि रस
गाढ़ा हो और गुड़ ज़्यादा निकले। पाठ कहता है, “यह उसकी समझ कुछ हद तक सही थी”, क्योंकि सब कोल्हू चलने पर गुड़ की बहुतायत से भाव नीचे उतर आते थे। इसी सोच के चलते सारे गाँव में उनका कोल्हू
सबसे पहले शुरू होता था। नायक के आगे पढ़ाई की बात छेड़ने का यही मौक़ा था,
जब खेती के सारे काम निपट चुके थे।
2.2 माँ से बात और देसाई के यहाँ सिफ़ारिश
2.3 देसाई का दादा को बुलाना और डाँटना
माँ बहाना बनाकर दादा को देसाई के यहाँ भेजती है: वह दादा से कहती है कि साग-भाजी देने गई थी तो देसाई ने उसे बुलाया है। आधे घंटे बाद नायक भी “जीमने बुलाया है” कहने पहुँचता है। देसाई के पूछने पर नायक बताता है, “दादा ने मना कर दिया है। खेतों में पानी लगाने वाला कोई नहीं है।” देसाई दादा को “रतनाप्पा” कहकर
पुकारते हैं और जिरह करते हैं। पूछने पर सारा इतिहास बाहर निकल आता है और देसाई दादा पर ख़ूब
गुस्सा करते हैं: मन लगाकर खेत में श्रम न करने, फ़सल में लागत न लगाने,
पत्नी-बच्चों को काम में जोतकर स्वयं गाँव में साँड़ की तरह घूमने और अपनी
मस्ती के लिए बेटे के जीवन की बलि चढ़ाने का आरोप लगाते हैं।
- दादा उल्टे नायक पर आरोप लगाता है: कंडे-चारा बेचना, सिनेमा देखना,
खेलने जाना, खेती-घर के काम में ध्यान न देना - नायक सफ़ाई देता है, जिसे पाठ में वह स्वयं कहता है, “मैंने भी झूठ-सच मिलाकर ठोंक दिया”: मेले में पटा पर पैसे लगाना, गोबर
बीन-बीनकर कंडे थपवाकर कपड़े बनवाना, एक बार सिनेमा जाना - देसाई दादा का हर तर्क काट देते हैं और नायक से कहते हैं: सवेरे से पाठशाला जाता रह, पूरी फ़ीस भर दे, मन लगाकर पढ़ाई कर, साल न मारा जाए; और यदि दादा ने पढ़ने नहीं भेजा तो सीधा उनके यहाँ चला आए, सुबह-शाम काम करे और पाठशाला जाता रहे, “मैं पढ़ाऊँगा तुझे”। दादा के बारे में वे कहते हैं, “इसके पास ज़रा ज़्यादा बच्चे हो गए हैं इसलिए तुम्हारे साथ कुत्तों की तरह बर्ताव करता है।”
- दादा कहता है, “मैंने मना कब किया है जी?”, यानी उसे ग़लत-सलत आदतें पड़ गई थीं, इसलिए नज़रों के सामने रख लिया है
- बाहर निकलते-निकलते नायक देसाई को कहते सुनता है, “अरे, बच्चे की जात है। एकाध वक्त सिनेमा चला गया तो क्या हुआ?”
- दादा मन मारकर मान जाता है: “आप कहते हैं तो भेज देता हूँ कल से”
दत्ता जी राव देसाई (देसाई सरकार) गाँव के प्रतिष्ठित और प्रभावशाली
व्यक्ति हैं, जिनकी डाँट और सिफ़ारिश से दादा नायक को दोबारा पाठशाला भेजने पर
राज़ी होता है। देसाई के बाड़े का बुलावा दादा के लिए सम्मान की बात थी।
2.4 दादा की शर्तें
खाना खाते-खाते दादा नायक से वचन लेता है: पाठशाला 11 बजे होती है, इसलिए
दिन निकलते ही खेत पर हाज़िरी देनी होगी; 11 बजे तक पानी लगाना होगा; खेत से
सीधे पाठशाला पहुँचना होगा; बस्ता सवेरे साथ ले आना होगा; छुट्टी होते ही घर
बस्ता रखकर सीधे खेत आकर घंटा-भर ढोर चराना होगा; खेत का काम ज़्यादा हो तो
पाठशाला से ग़ैर-हाज़िरी लगानी होगी। नायक मन-ही-मन बेहद ख़ुश होकर सब कुछ मान
लेता है, मानो उसे हर शर्त मंज़ूर हो। दादा ताना भी मारता है, “बालिस्टर नहीं होनेवाला है तू?”
2.5 पाठशाला में पहला दिन: अपमान और अकेलापन
“खिलौने के लिए बनाए गए कौआ के बच्चे को खुले में रख देने पर जैसे कौए चारों
ओर से उस पर चोंच मारते हैं, वैसा ही मेरा हाल हो गया। मेरी ही पाठशाला मुझे
चोंच मार-मारकर घायल कर रही थी।”
पहले दिन के अपमान और अकेलेपन को दर्शाती पाठ की एक मार्मिक पंक्ति
2.6 धीरे-धीरे घुलना-मिलना और अध्यापकों का प्रभाव
माँ के पीछे पड़कर नायक ने नई टोपी और दो नाड़ीवाली चड्डी मँगवाई और धीरे-धीरे लड़कों से
परिचय बढ़ने लगा। इसी दौर में दो अध्यापकों और एक सहपाठी का गहरा असर नायक पर पड़ा:
मंत्री मास्टर (गणित)
छड़ी की जगह गरदन पकड़कर पीठ पर घूँसा मारते थे। लड़कों के मन में उनकी दहशत
बैठी हुई थी, इसलिए ऊधम करने वाले लड़कों को प्रायः मौका नहीं मिलता था और सभी लड़के घर से पढ़ाई करके आने लगे।
वसंत पाटील (सहपाठी, मॉनीटर)
दुबला-पतला पर बेहद होशियार, हमेशा सही सवाल निकालने वाला। नायक को
पहले लगा कि वह उससे छोटा है और मॉनीटरी उसे नहीं, मुझे मिलनी चाहिए; फिर उसी की तरह पढ़ाई का काम करने लगा, दोनों साथ मिलकर लड़कों के सवाल जाँचने लगे और दोस्ती जम गई।
न.वा. सौंदलगेकर मास्टर (मराठी)
नायक में कविता के प्रति रुचि इन्हीं से जगी (अगला भाग देखें)।
इसी दौर में मास्टर नायक को “आनंदा” कहकर बुलाने लगे, यह पहली बार था
कि किसी ने उसे इस नाम से पुकारा (माँ भी बहुत कम ही ऐसा कहती थी)। इससे पहले,
कक्षा में जब रणनवरे मास्टर ने पूछा था कि “तू कौन है?”, तो नायक ने अपना परिचय
“मैं जकाते, पिछले साल फ़ेल होकर इसी कक्षा में बैठा हूँ” कहकर दिया था।
3 कविता का जन्म: सौंदलगेकर मास्टर का प्रभाव
न.वा. सौंदलगेकर मास्टर मराठी पढ़ाने आते और पढ़ाते समय स्वयं रम जाते थे,
सुरीला गला, छंद की बढ़िया चाल और रसिकता उनके पास थी। पुरानी-नई मराठी
कविताओं के साथ उन्हें अनेक अंग्रेज़ी कविताएँ भी कंठस्थ थीं। पहले वे कविता
गाकर सुनाते, फिर अभिनय के साथ भाव समझाते; बीच-बीच में कवि यशवंत, बा.भ. बोरकर,
भा.रा. ताँबे, गिरीश, केशव कुमार आदि से अपनी मुलाक़ातों के संस्मरण सुनाते,
वे स्वयं भी कविता करते थे।
- मास्टर के दरवाज़े पर मालती की बेल पर लिखी उनकी अपनी कविता देखकर नायक
को लगा कि अपने गाँव-खेतों में भी ऐसे कितने ही दृश्य हैं जिन पर कविता
बन सकती है। भैंस चराते हुए फ़सलों और जंगली फूलों पर तुकबंदी करने लगा - कविता लिखने को जेब में काग़ज़-पेंसिल रखता; न हो तो लकड़ी के टुकड़े से
भैंस की पीठ पर या पत्थर की शिला पर कंकड़ से लिखकर कंठस्थ होते ही मिटा
देता - रविवार को बनी कविता सोमवार मास्टर को दिखाता, कभी धीरज न रहने पर रात
को ही मास्टर के घर जाकर दिखाता, मास्टर शाबाशी देते, कभी कविता-शास्त्र
(भाषा, छंद-जाति, लयक्रम, अलंकार, शुद्ध लेखन) पर पूरी महफ़िल जम जाती - इसी नज़दीकी से नायक की मराठी भाषा सुधरने लगी, वह लिखते समय सचेत रहने
लगा, “शब्दों का नशा चढ़ने लगा,” मन में मानो “कोई मधुर बाजा” बजता रहता

4 पात्र-परिचय
| पात्र | पहचान | कहानी में भूमिका |
|---|---|---|
| नायक (आनंद) | कथा-वाचक, किशोर छात्र | पढ़ाई के लिए संघर्ष करता है, धीरे-धीरे कविता की ओर आकर्षित होता है |
| दादा | नायक के पिता; देसाई उसे “रतनाप्पा” कहकर पुकारते हैं | पढ़ाई का विरोधी, खेती में जोतना चाहता है; देसाई की डाँट से झुकता है |
| माँ | नाम नहीं दिया गया | नायक की पढ़ाई की पक्षधर, देसाई तक बात पहुँचाने में मदद करती है |
| दत्ता जी राव देसाई | गाँव के प्रतिष्ठित व्यक्ति (देसाई सरकार) | दादा को डाँटकर नायक की पढ़ाई सुनिश्चित कराते हैं |
| रणनवरे मास्टर | पहले दिन कक्षा में आए मास्टर (नायक उन्हें पहले से नहीं जानता था) | पहले दिन गमछे की घटना में नायक को ग़लत डाँटते हैं |
| चव्हाण का लड़का | कक्षा का सबसे शरारती छात्र | पहले दिन नायक का मज़ाक उड़ाकर गमछा छीनता है |
| मंत्री मास्टर | गणित अध्यापक | अनुशासन से पूरी कक्षा को मन लगाकर पढ़ने पर मजबूर करते हैं |
| वसंत पाटील | कक्षा मॉनीटर, सहपाठी | नायक का घनिष्ठ मित्र बनता है, दोनों साथ पढ़ाई में जुटते हैं |
| न.वा. सौंदलगेकर मास्टर | मराठी अध्यापक, स्वयं कवि | नायक में कविता के प्रति अनुराग जगाने वाले अध्यापक |
5 नायक (आनंद) का चरित्र-चित्रण
- दृढ़ निश्चयी और संघर्षशील, दादा के डर के बावजूद पढ़ाई की तड़प नहीं
छोड़ता, माँ के साथ देसाई के यहाँ जाकर अपनी बात स्वयं भी उनके सामने रखता है - व्यावहारिक सूझबूझ रखने वाला, देसाई के सामने स्वयं तर्क रखता है कि
जनवरी है, अभी कक्षा में बैठकर दुहराई कर ले तो दो महीने में पाँचवीं की तैयारी हो जाएगी और साल बच जाएगा - संवेदनशील, पहले दिन के अपमान से गहरा आहत होता है, पर हार नहीं मानता,
अगली ही सुबह फिर पाठशाला जाता है - अनुकरण और अनुशासन से सीखने वाला, वसंत पाटील को देखकर अपनी आदतें
सुधारता है, सौंदलगेकर मास्टर की चाल-भाव को ध्यान से आत्मसात करता है - कल्पनाशील और भावुक, भैंस चराते हुए फ़सलों-फूलों पर तुकबंदी करने लगता
है, कविता में डूबकर अकेलेपन को भी सुंदर अनुभव में बदल लेता है
नायक के चरित्र-चित्रण में केवल “पढ़ाई में तेज़” लिखना काफ़ी
नहीं है; संघर्षशीलता, व्यावहारिक सूझबूझ और कविता के प्रति सहज
कल्पनाशीलता, तीनों गुण पाठ के उदाहरण सहित लिखें।
6 शीर्षक “जूझ” की सार्थकता
शीर्षक की सार्थकता वाले प्रश्न (अभ्यास प्रश्न 1) में “जूझ” का अर्थ और नायक की संघर्षशीलता उदाहरण सहित समझाएँ। “जूझ” का अर्थ है संघर्ष करना, और इसे नायक की
केंद्रीय चारित्रिक विशेषता के रूप में पढ़ा जा सकता है। वह दादा के विरोध से जूझता है, पहले दिन के
अपमान और सहपाठियों के मज़ाक से जूझता है, खेत के काम के बोझ से
जूझता है, और इसी बीच कविता जैसी नई राह भी खोज पाता है।
इस पढ़त के अनुसार शीर्षक किसी एक घटना का नहीं, बल्कि नायक के
स्वभाव, संघर्षशीलता, का नाम है।
7 प्रमुख विषय (थीम)
8 भाषा-शैली की विशेषताएँ
- यह अंश आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया है। नायक स्वयं प्रथम पुरुष
में अपनी कहानी सुनाता है, इसलिए भावों में गहरी आत्मीयता और सच्चाई है - पाठ में गँवई (ग्रामीण महाराष्ट्री) बोली के शब्द और मुहावरे भरपूर हैं,
“मळा” (खेत), “गड्ढे में धकेलना,” “साँड़ की तरह घूमना” जैसे बिंब ग्रामीण
जीवन को जीवंत बनाते हैं - पाठ मूल मराठी से अनूदित है; भाषा में सहज, बोलचाल जैसा प्रवाह
है, संवाद सीधे, छोटे और यथार्थवादी हैं - कौआ के बच्चे जैसी उपमाएँ और सजीव बिंब पाठ की भावनात्मक गहराई को
बढ़ाते हैं
9 अभ्यास प्रश्न 5 और 6 के मूल भाव
प्रश्न 5 (पढ़ाई-लिखाई को लेकर लेखक व दत्ता जी राव का रवैया सही था
या पिता का?): यह प्रश्न आपकी अपनी राय पूछता है। लेखक और दत्ता जी राव का रवैया अधिक दूरदर्शी लग सकता है, क्योंकि पाठ में नायक को खेती का सहारा कमज़ोर पड़ता दिखता है (“यह खेती हमें गड्ढे में धकेल रही है”), और शिक्षा से उसे नौकरी और आर्थिक सहारे की आशा थी (“पढ़ जाऊँगा तो नौकरी लग जाएगी”); पाठ अंतिम परिणाम नहीं बताता। दादा का रवैया मुख्य रूप से खेत के काम और तात्कालिक कमाई को प्राथमिकता देने वाला था; उसकी कोल्हू वाली समझ “कुछ हद तक सही” थी और उसकी चिंता थी कि “खेतों में पानी लगाने वाला कोई नहीं है”। उत्तर में अपना तर्क दें।
प्रश्न 6 (झूठ का सहारा न लिया जाता तो आगे क्या होता?): माँ-बेटे रात को देसाई से मिल आए थे, पर दादा से माँ ने कहा कि वह साग-भाजी देने गई थी और देसाई ने उसे बुलाया है; देसाई से भी यही कहने को कहा गया। (माँ ने देसाई को यह विश्वास भी दिला दिया था कि दादा ने आज़ादी से घूमने के लिए नायक को खेती में जोत दिया है, और नायक ने स्वयं “झूठ-सच मिलाकर” सफ़ाई दी।) यह बहाना न होता तो
दादा को पहले ही पता चल जाता कि शिकायत की गई है; वह बचाव की मुद्रा
में आ सकता था, घर में माँ-बेटे पर ग़ुस्सा कर सकता था, और देसाई की अचानक जिरह का असर शायद उतना न होता। पाठ से यह निश्चित नहीं होता कि वह पाठशाला भेजने से इनकार करता; यह अनुमान का प्रश्न है।
- नायक की पढ़ाई की तड़प, दादा के विरोध, माँ की मदद से दत्ता जी राव देसाई तक बात पहुँचना, यही कहानी की मूल घटना है
- देसाई की डाँट के बाद दादा शर्तों के साथ नायक को दोबारा पाठशाला भेजता है: खेत का काम और पढ़ाई, दोनों साथ-साथ
- पहले दिन कक्षा में अपमान (चव्हाण के लड़के का मज़ाक, रणनवरे मास्टर की ग़लत डाँट) पर भी नायक हार नहीं मानता
- मंत्री मास्टर के अनुशासन और वसंत पाटील की दोस्ती से नायक पढ़ाई में मन लगाने लगता है
- न.वा. सौंदलगेकर मास्टर के प्रभाव से नायक में कविता के प्रति गहरा अनुराग जन्मता है, अकेलापन अब बोझ नहीं, कविता गाने का अवसर बन जाता है
- अनंत काणेकर की कविता को नई चाल में गाने पर मिली सराहना नायक के आत्मविश्वास की नींव बनती है
- शीर्षक “जूझ” को नायक की संघर्षशीलता से जोड़कर पढ़ा जा सकता है
- क्या मैं नायक, दादा, देसाई और सौंदलगेकर मास्टर का चरित्र-चित्रण बिना देखे लिख सकता/सकती हूँ?
- क्या मुझे कविता के प्रति नायक का अनुराग जगने का पूरा प्रसंग क्रम से याद है?
- क्या मैं शीर्षक “जूझ” की सार्थकता पर चार-पाँच पंक्तियाँ लिख सकता/सकती हूँ?