- मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा: सिंधु घाटी सभ्यता के दो सबसे पुराने नियोजित शहरों की पूरी कहानी
- इनकी खोज कैसे हुई: राखालदास बनर्जी और जॉन मार्शल की भूमिका
- गढ़, महाकुंड, कोठार और नीचा नगर (बस्तियाँ और उनके वर्ग): बिना किसी नक़्शे के, तालिका और सूची के ज़रिए
- हथियार उस तरह क्यों नहीं मिले जैसे राजतंत्र में होते हैं, और लेखक की “दूसरी बात”: प्रभुत्व या दिखावे के तेवर का नदारद होना
- पाठ के शीर्षक “अतीत में दबे पाँव” को किस तरह पढ़ा जा सकता है
- पाठ की भाषा-शैली: यात्रा-वृत्तांत और रिपोर्ट का मिला-जुला रूप, और आठों अभ्यास प्रश्नों के मुख्य बिंदु
1 लेखक-परिचय और पाठ का स्वरूप
ओम थानवी हिंदी के जाने-माने पत्रकार और लेखक हैं। लंबे समय तक हिंदी
दैनिक जनसत्ता के संपादक रहे हैं और यात्रा-वृत्तांत तथा रिपोर्ट
लेखन के लिए जाने जाते हैं। NCERT की अपनी भूमिका में यह पाठ इस तरह बताया
गया है:
यह रचना ओम थानवी की यात्रा वृत्तांत और रिपोर्ट का
मिला-जुला रूप है, जो अब तक के ज्ञान में भारतीय भूमि ही नहीं, विश्व फलक पर घटित
सभ्यता की सबसे प्राचीन घटना को उतने ही सुनियोजित ढंग से पुनर्जीवित करता है,
जितने सुनियोजित ढंग से उसके दो महान नगर मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा बसे थे।
पाठ्यपुस्तक की अपनी भूमिका, वितान भाग 2
यानी यह पाठ न तो कहानी है, न आत्मकथा; यह लेखक की मुअनजो-दड़ो यात्रा का
आँखों-देखा वर्णन है, जिसमें साथ-साथ पुरातत्त्व की जानकारी भी पिरोई गई है।
नोट्स इसी क्रम में बने हैं: पहले स्थल का परिचय, फिर हर हिस्से का विवरण, और
अंत में लेखक का चिंतन।
पाठ्यपुस्तक की भूमिका के अनुसार यह रचना यात्रा-वृत्तांत और रिपोर्ट का
मिला-जुला रूप है। पाठ की विधा के बारे में प्रश्न पूछा जा सकता है; उत्तर में
दोनों शब्द (यात्रा-वृत्तांत, रिपोर्ट) लिखें।
2 मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा का परिचय
मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा केवल प्राचीन भारत के ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया
के दो सबसे पुराने नियोजित शहर माने जाते हैं। ये
दोनों सिंधु घाटी सभ्यता के परवर्ती यानी परिपक्व दौर के शहर हैं।
मुअनजो-दड़ो ताम्र-काल के शहरों में सबसे बड़ा है, और सबसे उत्कृष्ट भी;
व्यापक खुदाई यहीं संभव हुई, इसलिए यहीं से इमारतें, सड़कें, मूर्तियाँ,
मुहरें, बर्तन और खिलौने सबसे ज़्यादा मात्रा में मिले।
“मुअनजो-दड़ो” का शाब्दिक अर्थ है “मुर्दों का टीला”। यह सिंध प्रांत (पाकिस्तान) में स्थित है; वर्तमान समय में इसे
मोहनजोदड़ो कहा जाता है। हड़प्पा पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में
स्थित सिंधु घाटी सभ्यता का दूसरा प्रमुख नगर है।
हड़प्पा के ज़्यादातर साक्ष्य रेललाइन बिछने के दौरान नष्ट हुए;
लेखक के शब्दों में वे “विकास की भेंट चढ़ गए।” पाठ हड़प्पा के साक्ष्य के बारे
में इतना ही कहता है; इसे मुअनजो-दड़ो के उजड़ने के प्रश्न से मत मिलाइए।
इतनी बड़ी आबादी और क्षेत्रफल की वजह से लेखक इसे पाँच हज़ार साल पहले का
“महानगर” कहते हैं। शहर छोटे-मोटे (मानव-निर्मित) टीलों पर बसा था;
ईंटों से धरती की सतह को जान-बूझकर ऊँचा उठाया गया था, ताकि सिंधु नदी का बाढ़
का पानी अंदर न आ सके।
लेखक लिखते हैं कि आज भी मुअनजो-दड़ो की सड़कों और गलियों में घूमा जा
सकता है; किसी दीवार पर पीठ टिकाकर सुस्ताया जा सकता है, किसी घर की देहरी
पर पाँव रखा जा सकता है। पाँच हज़ार साल पुराना शहर होकर भी यह इतना
“ज़िंदा” महसूस होता है; पाठ के शीर्षक को इसी अनुभव से जोड़कर पढ़ा जा सकता है।
3 खोज की कहानी
मुअनजो-दड़ो के सबसे ऊँचे चबूतरे पर एक बड़ा बौद्ध स्तूप है; यह ध्यान
रखने की बात है कि यह स्तूप सिंधु सभ्यता के बिखरने के बहुत बाद, एक
जीर्ण-शीर्ण टीले पर बना था (छब्बीस सदी पहले, यानी सिंधु सभ्यता से हज़ारों
साल बाद का निर्माण)। इसी स्तूप की खुदाई से सिंधु घाटी सभ्यता की खोज हुई:
खोज की कहानी लिखते समय राखालदास बनर्जी (1922) और जॉन मार्शल, दोनों
नाम अलग-अलग भूमिका में लिखें: बनर्जी स्तूप की खोजबीन करने आए थे और उन्हें
ईसा पूर्व के निशान दिखे; मार्शल के निर्देश पर व्यापक खुदाई अभियान चला।
4 नगर-नियोजन: गढ़ और नीचा नगर
लेखक के शब्दों में, “नगर नियोजन की मुअनजो-दड़ो अनूठी मिसाल है।”
शहर मुख्यतः दो हिस्सों में बँटा था:
गढ़: मुअनजो-दड़ो के सबसे खास हिस्से को, जिसके एक सिरे पर स्तूप
वाला चबूतरा है, पुरातत्त्व के विद्वान “गढ़” कहते हैं। प्राचीन शहरों में सत्ता-केंद्र (राजसत्ता या धर्मसत्ता)
गढ़ में ही अवस्थित होते थे, और बाकी शहर गढ़ से कुछ दूर बसा होता था।
गढ़ के पीछे (पश्चिम में) सभी अहम इमारतें हैं: प्रशासनिक भवन, सभा भवन,
ज्ञानशाला, कोठार और महाकुंड। लेखक बताते हैं कि आज के वास्तुकार मुअनजो-दड़ो
की सीधी-आड़ी सड़कों को “ग्रिड प्लान” कहते हैं, और चंडीगढ़,
इस्लामाबाद, ब्रासीलिया जैसे आधुनिक नियोजित शहर इसी शैली में बने हैं,
जिन्हें आधुनिक नगर नियोजन के प्रतिमान माना जाता है। लेखक के अनुसार आज की
सेक्टर-मार्का कॉलोनियों का आड़ा-सीधा “नियोजन” रहन-सहन को नीरस बनाता है, और
ग्रिड शैली के इन शहरों की बसावट शहर के खुद विकसने का कितना अवकाश छोड़ती है,
इस पर बहुत शंका प्रकट की जाती है।
नीचे दी तालिका मुअनजो-दड़ो के दो मुख्य हिस्सों को एक नज़र में दिखाती है:
| हिस्सा | स्थिति | क्या था यहाँ |
|---|---|---|
| गढ़ | स्तूप वाले चबूतरे के पीछे (पश्चिम में) | बौद्ध स्तूप, प्रशासनिक भवन, सभा भवन, ज्ञानशाला, कोठार, महाकुंड |
| नीचा नगर (बस्तियाँ) | गढ़ के मुकाबले छोटे टीलों पर | आवासीय बस्तियाँ (डीके, एचआर, वीएस जैसे हलके), मुख्य सड़कें, कुएँ, नालियाँ |
बस्तियाँ और वर्ग: पाठ के अनुसार स्तूप वाले चबूतरे के पीछे “गढ़”
और ठीक सामने “उच्च” वर्ग की बस्ती है। दक्षिण में टूटे-फूटे घरों का जो जमघट
है, वह कामगारों की बस्ती है; लेखक कहते हैं, “कहा जा सकता है इतर वर्ग की।”
पूरब की बस्ती “रईसों की बस्ती” है (बड़े घर, चौड़ी सड़कें, ज़्यादा कुएँ), जबकि
आज के युग में पूरब की बस्तियाँ गरीबों की मानी जाती हैं। लेखक पूछते हैं,
“क्या निम्न वर्ग यहाँ नहीं था?” कहा जाता है कि निम्न वर्ग के घर इतनी मज़बूत
सामग्री के नहीं रहे होंगे कि पाँच हज़ार साल टिक सकें, और उनकी बस्तियाँ और
दूर रही होंगी। यह भी है कि अब तक इस इलाके के केवल एक-तिहाई हिस्से की खुदाई
हो पाई है।
5 महाकुंड: वास्तुकौशल का “अकेला ही काफ़ी” प्रमाण
गढ़ का अनुष्ठानिक महाकुंड सिंधु घाटी सभ्यता के अद्वितीय
वास्तुकौशल को स्थापित करने के लिए “अकेला ही काफ़ी माना जाता है”।
पाठ के अनुसार यहाँ यही एक निर्माण है जो अपने मूल स्वरूप के बहुत नज़दीक बचा
रह सका है; बाकी इमारतें इतनी उजड़ी हैं कि उनके उपयोग का अंदाज़ा भर लगाया जा
सकता है।

कुंड की खास बात पक्की ईंटों का जमाव है। कुंड का पानी रिस न सके और बाहर
का “अशुद्ध” पानी अंदर न आए, इसके लिए कुंड के तल में और दीवारों पर ईंटों
के बीच चूने और चिरोड़ी का गारा इस्तेमाल हुआ है। पार्श्व की दीवारों के
साथ एक दूसरी दीवार खड़ी की गई है, जिसमें सफ़ेद डामर का प्रयोग
है। कुंड में उत्तर और दक्षिण, दोनों तरफ़ से सीढ़ियाँ उतरती हैं। तीन
तरफ़ साधुओं के कक्ष बने हैं; उत्तर में दो पाँत में आठ स्नानघर हैं, और
किसी का द्वार दूसरे के सामने नहीं खुलता; लेखक इसे “सिद्ध वास्तुकला का एक
नमूना” कहते हैं। कुंड के पानी के बंदोबस्त के लिए एक तरफ़ कुआँ है; दोहरे घेरे
वाला यह अकेला कुआँ है, और इसे भी कुंड के पवित्र या अनुष्ठानिक होने का
प्रमाण माना गया है। पानी बाहर बहाने के लिए पक्की ईंटों से बनी व ढकी नालियाँ
हैं।

माना जाता है कि उस सभ्यता में सामूहिक स्नान किसी अनुष्ठान का अंग होता
था। धरोहर के प्रबंधकों ने महाकुंड की ओर जाने वाली गली का नाम “दैव मार्ग”
(डिविनिटि स्ट्रीट) रखा है; यह सायास है या संयोग, पता नहीं। महाकुंड के
वर्णन में आकार (लगभग 40 × 25 फ़ुट, गहराई 7 फ़ुट) और ईंटों के बीच चूने-चिरोड़ी
के गारे वाली बनावट, दोनों लिखें। ढकी हुई नालियों का उल्लेख पुरातात्त्विक
विद्वान और इतिहासकार ज़ोर देकर करते हैं; पाठ के अनुसार पानी-निकासी का ऐसा
सुव्यवस्थित बंदोबस्त इससे पहले के इतिहास में नहीं मिलता।
6 कोठार (अन्न-भंडार)
महाकुंड के दूसरी तरफ़ एक विशाल कोठार है। इसकी चौकियों (नौ-नौ की
तीन कतारें) और हवादारी की बनावट देखकर अनुमान लगाया गया है कि यहाँ कर के
रूप में हासिल अनाज जमा किया जाता था। पास ही एक गली है, जहाँ से बैलगाड़ियों
के ज़रिए अनाज की ढुलाई होती होगी। ठीक इसी तरह का एक कोठार हड़प्पा में भी
मिला है।
7 कृषि और व्यापार: एक पुरानी धारणा टूटी
बरसों यह माना जाता रहा कि सिंधु घाटी के लोग अनाज उपजाते नहीं थे, बल्कि
उसका आयात करते थे। नयी खोज ने इस धारणा को निर्मूल साबित कर दिया है
अब कुछ विद्वान मानते हैं कि यह सभ्यता मूलतः खेतिहर और पशुपालक थी।
लोहा शुरू में नहीं था, पर पत्थर और ताँबे की बहुतायत थी। पत्थर सिंध
में ही था, ताँबे की खानें राजस्थान में थीं; इनके उपकरण खेती-बाड़ी में प्रयोग
किए जाते थे।
इतिहासकार इरफ़ान हबीब के अनुसार यहाँ के लोग रबी की फ़सल लेते थे:
कपास, गेहूँ, जौ, सरसों और चने की उपज के पुख्ता सबूत खुदाई में मिले हैं।
विद्वानों का यह भी मानना है कि ज्वार, बाजरा और रागी की उपज भी होती थी;
खजूर, खरबूज़े और अंगूर भी उगाए जाते थे।
8 सूत, कपास और रंगाई उद्योग
कपास के बीज तो नहीं मिले, पर सूती कपड़ा ज़रूर मिला है, जो दुनिया के
दो सबसे पुराने सूत के नमूनों में एक है (दूसरा नमूना जॉर्डन का है, जो
तीन हज़ार ईसा-पूर्व का है)। मुअनजो-दड़ो में सूत की कताई-बुनाई के साथ-साथ
रंगाई भी होती थी। पुरातत्त्वविद माधोस्वरूप वत्स को खुदाई में एक
छोटा रंगाई कारखाना मिला, जहाँ ज़मीन में ईंटों के गोल गड्ढे उभरे हुए हैं,
जिनमें शायद रंगाई के बड़े बर्तन रखे जाते थे। छालटी (लिनन) और ऊन, कहते हैं,
सुमेर से आयात होते थे; शायद सूत उनको निर्यात होता हो। मेसोपोटामिया के शिलालेखों
में मुअनजो-दड़ो के लिए संभवतः “मेलुहा” शब्द का प्रयोग मिलता है।
9 उत्खनन क्षेत्र: बिना नक़्शे के, तालिका में
मुअनजो-दड़ो के खंडहरों को खुदाई करानेवाले पुरातत्त्ववेत्ताओं के नाम पर
संक्षिप्त नाम दे दिए गए हैं। स्थान समझने के लिए यहाँ नक़्शे की बजाय एक
तालिका दी गई है:
| हलका | किसके नाम पर | यहाँ क्या मिला / क्या ख़ास है |
|---|---|---|
| डीके | काशीनाथ दीक्षित | दोनों बस्तियों में सबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र; शहर की मुख्य सड़क (“फ़र्स्ट स्ट्रीट”), चौड़ाई 33 फ़ुट, जिस पर दो बैलगाड़ियाँ एक साथ आसानी से आ-जा सकती हैं; यह सड़क वहाँ पहुँचती है जहाँ कभी “बाज़ार” था |
| डीके-जी | काशीनाथ दीक्षित | ऊँची-मोटी दीवारों वाले घर, संभावित दूसरी मंज़िल के संकेत |
| डीके-बी, सी | — | दाढ़ी वाले “याजक-नरेश” की मूर्ति यहाँ मिली |
| एचआर | हेरल्ड हरग्रीव्ज़ (1924-25 में खुदाई) | कुछ कंकाल मिले; प्रसिद्ध “नर्तकी” की कांस्य मूर्ति भी यहीं मिली |
| वीएस | माधोस्वरूप वत्स | रंगरेज़ (कपड़ा-रंगाई) का छोटा कारखाना |
ऊपर की तालिका मुअनजो-दड़ो के भौगोलिक स्थान का नक़्शा नहीं है; यह
केवल यह बताती है कि हर हलके का नाम किसके नाम पर पड़ा और वहाँ क्या मिला।
10 घर, सड़कें और निजता
मुअनजो-दड़ो के डीके-जी हलके के सभी घर ईंट के हैं: एक ही आकार की ईंटें,
1:2:4 के अनुपात की, सभी भट्टी में पकी हुईं। (हड़प्पा इससे अलग है, जहाँ
पक्की और कच्ची ईंटों का मिला-जुला निर्माण मिला है।) ज़्यादातर घरों का आकार
तकरीबन तीस-गुणा-तीस फ़ुट का रहा होगा; कुछ इससे दुगने-तिगुने भी हैं। इनकी
वास्तु शैली कमोबेश एक-सी प्रतीत होती है। एक बड़े घर को “मुखिया” का घर कहा जाता है, जिसमें
दो आँगन और करीब बीस कमरे हैं।
सामने की दीवार में खिड़की नहीं
घरों की सामने की दीवार में केवल प्रवेश-द्वार बना है, कोई खिड़की
नहीं; खिड़कियाँ शायद ऊपर की दीवार में, यानी दूसरी मंज़िल पर रहती हों।
बड़े घरों के भीतर आँगन के चारों तरफ़ बने कमरों में खिड़कियाँ ज़रूर हैं।
दरवाज़े गलियों में खुलते थे
सड़क की ओर घरों की सिर्फ़ पीठ दिखाई देती थी; दरवाज़े अंदर की गलियों
में खुलते थे, यानी कोई घर सीधे मुख्य सड़क पर नहीं खुलता था।
बड़े घरों में छोटे कमरे देखकर अचरज होता है। इसका एक अर्थ यह लगाया गया
है कि शहर की आबादी काफ़ी रही होगी। दूसरा विचार अमेरिकी नृतत्त्वशास्त्री
ग्रेगरी पोसेल का है: बड़े घरों में निचली (भूतल) मंज़िल में
नौकर-चाकर रहते होंगे। इससे अलग, पाठ यह संभावना भी रखता है कि ऊपर की मंज़िल
में ज़्यादा खिड़कियाँ, झरोखे और साज-सज्जा रही हो।
चंडीगढ़ में ठीक यही शैली पचास साल पहले आधुनिक वास्तुकार
कार्बूजिए ने इस्तेमाल की: घर मुख्य सड़क पर नहीं खुलते, पहले सेक्टर में दाखिल होना
पड़ता है, फिर गली में, फिर घर में। लेखक सवाल उठाते हैं: क्या कार्बूजिए
ने यह सीख मुअनजो-दड़ो से ली?
11 जल-निकासी और कुओं की सभ्यता
मुख्य सड़क के दोनों तरफ़ समांतर ढकी नालियाँ हैं; हर घर में एक स्नानघर
है और घर के भीतर से पानी की नालियाँ बाहर हौदी तक जाती हैं। ज़्यादातर
नालियाँ ढकी (बंद) थीं; यह मुअनजो-दड़ो के बाशिंदों की स्वास्थ्य के प्रति
सजगता का बेहतर उदाहरण है।
इतिहासकारों के अनुसार सिंधु घाटी सभ्यता संसार की पहली ज्ञात संस्कृति है जो कुएँ खोदकर
भू-जल तक पहुँची। उनके मुताबिक अकेले मुअनजो-दड़ो में करीब सात सौ कुएँ
थे। दिलचस्प बात यह है कि कुओं को छोड़कर मुअनजो-दड़ो में लगभग सब कुछ
चौकोर या आयताकार है; कुएँ ही गोल आकार के हैं।
लेखक एक और दिलचस्प बात नोट करते हैं: मुअनजो-दड़ो के किसी भी घर में
खिड़कियों या दरवाज़ों पर छज्जों (शेड) के कोई चिह्न नहीं हैं, जबकि गरम
इलाकों के घरों में यह आम प्रावधान होता है। इससे लेखक सवाल उठाते हैं: क्या
उस वक्त यहाँ इतनी कड़ी धूप नहीं पड़ती होगी? उन्हें मुअनजो-दड़ो की मुहरों
पर मिलने वाले पशुओं की भी याद आती है: शेर, हाथी और गैंडा जैसे जानवर आज
इस मरु-भूमि में मिलना असंभव है, इसलिए लेखक पूछते हैं कि क्या उस दौर में
यहाँ जंगल भी रहे होंगे।
पुरातत्त्वी शीरीन रत्नागर का मानना है कि सिंधु-वासी कुओं से सिंचाई
कर लेते थे। (रत्नागर का मत इतना ही है।) लेखक आगे जोड़ते हैं कि मुअनजो-दड़ो
की किसी खुदाई में नहर होने के प्रमाण नहीं मिले, यानी बारिश उस काल में काफ़ी
होती होगी। फिर लेखक स्वयं दो सवाल उठाते हैं: क्या बारिश घटने और कुओं के
अत्यधिक इस्तेमाल से भू-तल जल भी पहुँच से दूर चला गया? और क्या पानी के अभाव
में यह इलाका उजड़ा और उसके साथ सिंधु घाटी की समृद्ध सभ्यता भी? (ये लेखक के
प्रश्न हैं, निष्कर्ष नहीं; पाठ इनका निश्चित उत्तर नहीं देता।)
12 प्रसिद्ध मूर्तियाँ
मुअनजो-दड़ो की खुदाई में मिली दो मूर्तियाँ सबसे ज़्यादा प्रसिद्ध हैं:
याजक-नरेश (लोकप्रिय रूप से “पुरोहित-राजा”)
- डीके-बी/सी हलके के एक घर से मिली दाढ़ी वाली मूर्ति
- सिर पर “मुकुट” है, इतना छोटा कि उससे भी छोटे सिरपेंच की कल्पना कठिन है
- प्रतीक है कि यहाँ के मूर्तिशिल्प भव्य नहीं, बल्कि छोटे आकार के थे
नर्तकी की मूर्ति
- एचआर हलके के एक छोटे घर की खुदाई में मिली कांस्य प्रतिमा
- पुरातत्त्वविद मार्टिमर वीलर: “संसार में इसके जोड़ की दूसरी चीज़ शायद ही होगी”
- अब दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित है


13 अजायबघर (संग्रहालय) में प्रदर्शित वस्तुएँ
मुअनजो-दड़ो का अजायबघर छोटा है; अहम चीज़ें कराची, लाहौर, दिल्ली और
लंदन में रखी हैं। यों अकेले मुअनजो-दड़ो की खुदाई में निकली पंजीकृत
चीज़ों की संख्या पचास हज़ार से ज़्यादा है; अजायबघर में उनमें से मुट्ठी
भर चीज़ें प्रदर्शित हैं, जो सिंधु सभ्यता की झलक दिखाने को काफ़ी हैं:
- काला पड़ा गेहूँ, ताँबे-काँसे के बर्तन, मुहरें, वाद्य
- मृद्-भांड (मिट्टी के बर्तन), उन पर काले-भूरे चित्र
- चौपड़ की गोटियाँ, दीये, माप-तौल पत्थर, ताँबे का आईना
- मिट्टी की बैलगाड़ी और खिलौने, दो पाटन वाली चक्की, कंघी
- मिट्टी के कंगन, पत्थरों के मनकों वाला हार, पत्थर के औज़ार
- ताँबे-काँसे की सुइयाँ; काशीनाथ दीक्षित को सोने की तीन सुइयाँ मिलीं (एक दो-इंच लंबी), जिनके बारीक कशीदाकारी में उपयोग का अनुमान है
अजायबघर में कभी कुछ सोने के गहने भी हुआ करते थे, जो चोरी हो
गए (अजायबघर में तैनात अली नवाज़ के अनुसार)। इसलिए उन्हें आज वहाँ
प्रदर्शित वस्तुओं में मत गिनिए।
14 हथियार उस तरह नहीं मिले, और “दूसरी बात”: दिखावे का नदारद होना
अजायबघर में प्रदर्शित सामान में औज़ार तो हैं, पर हथियार कोई नहीं
है। मुअनजो-दड़ो से लेकर हड़प्पा तक, यहाँ तक कि हरियाणा तक फैली पूरी
सिंधु सभ्यता में, हथियार उस तरह कहीं नहीं मिले जैसे किसी राजतंत्र में
होते हैं। इस बात को लेकर विद्वान सिंधु सभ्यता में शासन या सामाजिक प्रबंध के
तौर-तरीके को समझने की कोशिश कर रहे हैं। पाठ कहता है, “वहाँ अनुशासन ज़रूर
था, पर ताकत के बल पर नहीं।”
वे मानते हैं कोई सैन्य सत्ता शायद यहाँ न रही हो। मगर
कोई अनुशासन ज़रूर था जो नगर योजना, वास्तुशिल्प, मुहर-ठप्पों, पानी या
साफ़-सफ़ाई जैसी सामाजिक व्यवस्थाओं आदि में एकरूपता तक को कायम रखे हुए था।
पाठ से (विद्वानों का मत, जैसा लेखक बताते हैं)
इसके बाद लेखक “दूसरी बात” रखते हैं, जो सांस्कृतिक धरातल पर सिंधु
घाटी सभ्यता को दूसरी सभ्यताओं से अलग ला खड़ा करती है: प्रभुत्व या दिखावे
के तेवर का नदारद होना। दूसरी जगहों पर राजतंत्र या धर्मतंत्र की ताकत का
प्रदर्शन करने वाले महल, उपासना-स्थल, मूर्तियाँ और पिरामिड आदि मिलते हैं;
हड़प्पा संस्कृति में न भव्य राजप्रसाद मिले हैं, न मंदिर, न राजाओं-महंतों
की समाधियाँ। यहाँ के मूर्तिशिल्प
भी आकार में छोटे हैं; लोगों की नावें मिस्र की नावों जैसी बनावट की, पर
आकार में छोटी थीं। इसीलिए लेखक इस सभ्यता को “लो-प्रोफ़ाइल सभ्यता”
कहते हैं: “लघुता में भी महत्ता अनुभव करने वाली संस्कृति।”
मुअनजो-दड़ो सिंधु सभ्यता का सबसे बड़ा शहर ही नहीं था, उसे साधनों और
व्यवस्थाओं को देखते हुए सबसे समृद्ध भी माना गया है। फिर भी इसकी संपन्नता
की बात कम हुई है, तो शायद इसलिए कि उसमें भव्यता का आडंबर नहीं है; दूसरी वजह
यह है कि मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा पिछली सदी में ही उद्घाटित हो सके, और उनकी
अनबूझ लिपि अभी भी सारे रहस्य अपने में छिपाए हुए है।
हथियार उस तरह नहीं, भव्य राजप्रसाद नहीं, मंदिर नहीं
हथियार उस तरह नहीं मिले जैसे राजतंत्र में होते हैं; भव्य राजप्रसाद और
मंदिर नहीं मिले। पाठ के अनुसार यहाँ अनुशासन था, पर ताकत के बल पर नहीं।
15 अतीत और वर्तमान की निरंतरता, राजस्थान के कुलधरा गाँव से तुलना
जॉन मार्शल ने मुअनजो-दड़ो पर तीन खंडों का एक विशद ग्रंथ छपवाया था,
जिसमें खुदाई में मिली ठोस पहियों वाली मिट्टी की गाड़ी के चित्र के साथ सिंध
में पिछली सदी में बरती जा रही ठीक उसी तरह की बैलगाड़ी का चित्र भी छपा है। इससे लेखक एक सतत परंपरा
की ओर इशारा करते हैं: पहले ठोस पहिए, फिर आरे वाले पहिए, फिर जीप के पहिए,
और हवाई जहाज़ के उतारू पहिए बाज़ार में आने के बाद ऊँटगाड़ा; यानी हज़ारों साल पहले की
तकनीक की एक कड़ी आज तक चली आ रही है।
लेखक को मुअनजो-दड़ो घूमते हुए राजस्थान के कुलधरा गाँव (जैसलमेर
के पास) की याद आती है। कोई डेढ़ सौ साल पहले, राजा से तकरार होने पर, पूरे
गाँव ने रातोंरात अपना घर छोड़ दिया था। घर खंडहर तो हुए, पर ढहे नहीं;
दीवारें, प्रवेश-द्वार, खिड़कियाँ ऐसी हैं जैसे कल की बात हो। लेखक के
शब्दों में, “लोग निकल गए, वक्त वहीं रह गया।”
16 शीर्षक की सार्थकता: “अतीत में दबे पाँव”
पाठ शीर्षक का अर्थ स्वयं नहीं बताता; इसे इस तरह पढ़ा जा सकता है। एक
पाठ: मुअनजो-दड़ो की हज़ारों साल पुरानी सभ्यता टीलों और मिट्टी में
“दबी” रही, और खुदाई ने उसके अवशेष फिर सामने ला दिए (“पाँव” को अवशेषों
का रूपक मानकर)। दूसरा पाठ पाठ के ही एक वर्णन से जुड़ता है: खंडहरों में
“हममें कमोबेश हर कोई पाँव आहिस्ता उठाते हुए एक घर से दूसरे घर में बेहद धीमी
गति से दाखिल होता था”, मानो अतीत को निहारने की जिज्ञासा के साथ किसी अजनबी घर
में अनधिकार चहल-कदमी का अपराध-बोध भी हो। “दबे पाँव” चलने का यह भाव शीर्षक से
मेल खाता है।
उस दिन हवा बहुत तेज़ थी; सूने घरों में हवा की लय और ज़्यादा गूँजती थी,
“इतनी कि कोनों का अँधियारा भी सुनाई दे।” अब सब खंडहर हैं, कोई घर जुदा नहीं:
“एक घर दूसरे में खुलता है, दूसरा तीसरे में। जैसे पूरी बस्ती एक बड़ा घर हो।”
फिर भी लेखक कहते हैं कि घर एक नक्शा ही नहीं होता, हर घर का एक संस्कारमय
आकार होता है।
17 प्रमुख विषय (थीम्स)
नियोजित नगर-जीवन
पाँच हज़ार साल पहले भी शहर इतने सुनियोजित हो सकते थे, यह आधुनिक
शहरी नियोजन के लिए भी एक सवाल है।
अनुशासन बनाम ताकत
विद्वान मानते हैं कि यहाँ शायद कोई सैन्य सत्ता न रही हो, फिर भी कोई
अनुशासन ज़रूर था, जो नगर योजना से साफ़-सफ़ाई तक एकरूपता बनाए हुए था।
सौंदर्य-बोध: समाज-पोषित कला-सिद्धि
सिंधु सभ्यता साधनों और व्यवस्थाओं में सबसे समृद्ध मानी गई, पर उसमें
भव्यता का आडंबर नहीं था; पाठ के अनुसार वास्तुकला, मूर्तियाँ, मुहरें और
लिपि उसे तकनीक-सिद्ध से ज़्यादा कला-सिद्ध ज़ाहिर करती हैं।
अतीत और वर्तमान का जुड़ाव
कुलधरा और मुअनजो-दड़ो की तुलना, बैलगाड़ी के पहियों की निरंतरता दिखाती है कि
अतीत, वर्तमान में जीवित है।
यह पंक्ति पाठ के अभ्यास प्रश्न 2 में आई है; पाठ में यह मत “एक
पुरातत्त्ववेत्ता के मुताबिक” रखा गया है: “सिंधु-सभ्यता
की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है जो राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर
समाज-पोषित था।” यानी यह सौंदर्य-बोध किसी राजा या धर्म-संस्था की
महिमा के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा रुचि से उपजा था।
18 भाषा-शैली की विशेषताएँ
- यात्रा-वृत्तांत और रिपोर्ट का मिला-जुला रूप: तथ्य और निजी अनुभव दोनों साथ-साथ
- वर्णनात्मक और भावप्रवण भाषा: पाठक को स्थल पर मौजूद होने का एहसास कराने वाली शैली
- पुरातत्त्व के तकनीकी शब्दों (गढ़, महाकुंड, कोठार) का सहज, आसान प्रयोग
- प्रश्नवाचक वाक्यों का बार-बार प्रयोग: लेखक खुद सवाल उठाते हैं, सीधे उत्तर नहीं थोपते (जैसे कार्बूजिए वाला सवाल, भू-जल घटने वाला सवाल)
- तुलनात्मक शैली: मुअनजो-दड़ो की हर बात को आधुनिक उदाहरणों (चंडीगढ़, कुलधरा, जीप के पहिए) से जोड़ना
19 अभ्यास प्रश्नों के मुख्य बिंदु
पाठ के आठों अभ्यास प्रश्न किन बातों पर टिके हैं, एक नज़र में (पूरे उत्तर
NCERT समाधान में अलग से दिए गए हैं):
- प्रश्न 1 (साधन-संपन्न, पर आडंबर नहीं): साधनों और व्यवस्थाओं को देखते हुए मुअनजो-दड़ो सबसे समृद्ध माना गया; फिर भी न भव्य राजप्रसाद, न मंदिर, छोटे मूर्तिशिल्प, छोटा मुकुट, छोटी नावें (खंड 14)।
- प्रश्न 2 (समाज-पोषित सौंदर्य-बोध): कला या सुरुचि का महत्त्व ज़्यादा था; एक पुरातत्त्ववेत्ता के मुताबिक सौंदर्य-बोध राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित था (खंड 17)।
- प्रश्न 3 (ताकत नहीं, समझ से अनुशासन): हथियार उस तरह नहीं मिले जैसे राजतंत्र में होते हैं; फिर भी नगर योजना, वास्तुशिल्प, मुहर-ठप्पों, पानी और साफ़-सफ़ाई में एकरूपता (खंड 14)।
- प्रश्न 4 (अधूरी सीढ़ियाँ, “दुनिया की छत”): किसी आँगन की टूटी-फूटी सीढ़ियाँ अब कहीं नहीं ले जातीं, वे आकाश की तरफ़ अधूरी रह जाती हैं; पर उन पर खड़े होकर अनुभव किया जा सकता है कि “आप दुनिया की छत पर हैं, वहाँ से आप इतिहास को नहीं, उसके पार झाँक रहे हैं।” आशय: खंडहर अब किसी काम के नहीं, पर उन पर खड़े होकर पाठक किताबी इतिहास के आगे, उस सभ्यता के जीवन को अनुभव से महसूस कर सकता है।
- प्रश्न 5 (खंडहर, “धड़कती ज़िंदगियों के अनछुए समयों का दस्तावेज़”): पाठ के अनुसार आप आज भी किसी दीवार पर पीठ टिका कर सुस्ता सकते हैं, किसी घर की देहरी पर पाँव रखकर सहसा सहम सकते हैं, रसोई की खिड़की पर खड़े होकर उसकी गंध महसूस कर सकते हैं, सुनसान मार्ग पर बैलगाड़ी की रुनझुन सुन सकते हैं। यानी खंडहर इतिहास के साथ-साथ वहाँ जिए गए साधारण जीवन के क्षण भी सँजोए रहते हैं।
- प्रश्न 6 (अपने देखे किसी ऐतिहासिक स्थल का वर्णन): यह आत्मपरक प्रश्न है; लेखक की तरह स्थल का परिचय, आँखों-देखा विवरण और अपना अनुभव, तीनों लिखें।
- प्रश्न 7 (क्या यह “जल-संस्कृति” थी?): लेखक का प्रश्न पाठ में इस तरह है: “नदी, कुएँ, कुंड, स्नानागार और बेजोड़ पानी-निकासी। क्या सिंधु घाटी सभ्यता को हम जल-संस्कृति कह सकते हैं?” पक्ष के आधार: लगभग सात सौ कुएँ, महाकुंड, हर घर में स्नानघर, ढकी नालियाँ, कुएँ खोदकर भू-जल तक पहुँचने वाली पहली ज्ञात संस्कृति (इतिहासकारों के अनुसार)। लेखक प्रश्न पूछते हैं, सीधा उत्तर नहीं देते; उत्तर में अपना पक्ष तर्क के साथ लिखें।
- प्रश्न 8 (लिखित साक्ष्य के बिना बनी धारणा): लिपि अभी अनबूझी है, इसलिए हर धारणा अवशेषों पर टिका अनुमान है; पाठ स्वयं “शायद”, “माना जाता है”, “अनुमान है” जैसे शब्दों से यही सावधानी बरतता है। यह समूह-चर्चा का प्रश्न है।
- क्या मैं “मुअनजो-दड़ो” के शाब्दिक अर्थ के साथ इसकी खोज की पूरी कहानी (बनर्जी → मार्शल) बिना देखे लिख सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं महाकुंड का पूरा विवरण (आकार, बनावट, उद्देश्य) सुना सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं डीके, एचआर, वीएस हलकों के नाम और वहाँ मिली चीज़ें अलग-अलग बता सकता/सकती हूँ?
- क्या मैं समझा सकता/सकती हूँ कि हथियार “उस तरह” न मिलने और “दूसरी बात” (प्रभुत्व या दिखावे के नदारद होने) से विद्वान क्या समझते हैं?
- क्या मैं बता सकता/सकती हूँ कि शीर्षक “अतीत में दबे पाँव” को किस तरह पढ़ा जा सकता है, और नीचा नगर की बस्तियों के वर्ग गिना सकता/सकती हूँ?
- मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा: दुनिया के दो सबसे पुराने नियोजित शहर; “मुअनजो-दड़ो” का अर्थ है “मुर्दों का टीला”
- खोज: 1922 में राखालदास बनर्जी, फिर जॉन मार्शल के निर्देशन में व्यापक खुदाई
- शहर दो हिस्सों में: गढ़ और नीचा नगर (बस्तियाँ: सामने “उच्च” वर्ग, दक्षिण में कामगार, पूरब में “रईसों की बस्ती”)
- महाकुंड (40×25 फ़ुट, गहराई 7 फ़ुट): ईंटों के बीच चूने-चिरोड़ी का गारा, दूसरी दीवार में सफ़ेद डामर; वास्तुकौशल के लिए “अकेला ही काफ़ी” माना जाता है
- डीके (काशीनाथ दीक्षित), एचआर (हेरल्ड हरग्रीव्ज़, नर्तकी की मूर्ति यहीं मिली), वीएस (माधोस्वरूप वत्स): तीन अहम उत्खनन क्षेत्र
- इतिहासकारों के अनुसार सिंधु सभ्यता संसार की पहली ज्ञात संस्कृति जो कुएँ खोदकर भू-जल तक पहुँची; मुअनजो-दड़ो में करीब सात सौ कुएँ
- नयी खोज ने अनाज-आयात वाली पुरानी धारणा को निर्मूल साबित किया; अब कुछ विद्वान इसे मूलतः खेतिहर और पशुपालक सभ्यता मानते हैं
- हथियार उस तरह नहीं मिले जैसे राजतंत्र में होते हैं; विद्वान मानते हैं कि शायद कोई सैन्य सत्ता न रही हो। “दूसरी बात”: प्रभुत्व या दिखावे का नदारद होना, न भव्य राजप्रसाद, न मंदिर; “लो-प्रोफ़ाइल” सभ्यता
- लिपि आज भी अनबूझी है; खुदाई अब बंद है, क्षार-दलदल से खंडहरों को बचाना ही बड़ी चुनौती है
- शीर्षक को इस तरह पढ़ा जा सकता है: मिट्टी में दबी सभ्यता के अवशेष फिर मिलना, और खंडहरों में पाँव आहिस्ता उठाकर चलना